
“लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा-ए-लखनऊ…”
यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस शहर की रूह है जहाँ तहज़ीब भी दस्तरख़्वान पर परोसी जाती है और मोहब्बत भी मसालों में घुली मिलती है।
लखनऊ पहुंचते ही मैंने तय कर लिया था कि इस शहर की पहली सलाम उसकी इमारतों को नहीं, उसके खाने को होगी। एयरपोर्ट से होटल पहुँचा, सामान रखा और रात के साढ़े दस बजे बिना एक पल गंवाए साइकल रिक्शा पकड़ा। मंज़िल थी—अमीनाबाद का मशहूर टुंडे कबाबी।
कहते हैं, “जो लखनऊ आया और टुंडे के कबाब नहीं खाए, उसने शहर को बस देखा है, जिया नहीं।”
रिक्शा पुराने लखनऊ की गलियों से गुज़र रहा था। इत्र की खुशबू, पान की दुकानें, रात में भी जागते बाज़ार, चिकनकारी के शो-रूम और हर नुक्कड़ पर खाने की महक। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर कह रहा हो—
“खूब खाइए कि आप लखनऊ में हैं।”
पहला निवाला… और फिर गिनती भूल जाइए
गरमा-गरम गलावटी कबाब प्लेट में आए। साथ में हरी चटनी, पतले कटे प्याज़ और लखनऊ का मशहूर पराठा। पहला कबाब जैसे ही ज़ुबान पर रखा, समझ आया कि इन्हें “गलावटी” क्यों कहते हैं। चबाने की ज़रूरत ही नहीं। कबाब खुद-ब-खुद घुलते चले जाते हैं।
मसालों का ऐसा संतुलन कि कोई मसाला दूसरे पर हावी नहीं। गोश्त की ऐसी नर्मी कि लगता है जैसे रसोइए ने पकवान नहीं, कोई नज़्म लिखी हो। दो प्लेट कब खत्म हुईं, पता ही नहीं चला।
किसी ने ठीक ही कहा है—
“ज़ुबां पे रखो तो लफ़्ज़ बन जाए,
लखनऊ का कबाब है जनाब, मज़ाक नहीं।”
टुंडे कबाबी सिर्फ़ खाना नहीं, विरासत है
कहानी मशहूर है कि नवाब आसफ़-उद-दौला के लिए ऐसा कबाब बनाया गया जो बिना दाँतों के भी खाया जा सके। फिर एक बावर्ची ने सैकड़ों मसालों का ऐसा मिश्रण तैयार किया कि स्वाद इतिहास बन गया।
आज भी उस रेसिपी को लेकर कई किस्से हैं। कोई कहता है 100 मसाले, कोई 160, कोई उससे भी ज़्यादा। लेकिन सच यह है कि उसकी असली रेसिपी शायद स्वाद से ज़्यादा, सदियों की परंपरा में छिपी है।
लखनऊ सिर्फ़ कबाब नहीं है
अगर आपने सोचा कि लखनऊ की पहचान सिर्फ़ गलावटी कबाब हैं, तो अभी आपकी प्लेट अधूरी है।
सुबह की शुरुआत निहारी-कुलचा से कीजिए। घंटों धीमी आँच पर पका गोश्त और मुलायम कुलचा।
दोपहर में अवधी बिरयानी। हैदराबादी बिरयानी की तरह मसालों का शोर नहीं, बल्कि हर दाने में नफ़ासत।
शाम को शीरमाल और रूमाली रोटी के साथ कोरमा।
और अगर मीठा नहीं खाया तो लखनऊ आपसे थोड़ा नाराज़ हो जाएगा। मक्खन मलाई (निमिष), मलाई गिलौरी, कुल्फी और रबड़ी… हर मिठाई में ऐसा सुकून जैसे सर्दियों की धूप। ये सब अगली बार के लिए बचाए गए हैं।

नवाबी सिर्फ़ खाने में नहीं, खिलाने में भी है
लखनऊ का सबसे बड़ा स्वाद उसके लोग हैं।
यहाँ वेटर भी प्लेट रखते हुए “हुज़ूर” कहता है। दुकानदार भी मुस्कुराकर पूछता है—”और कुछ पेश करूँ?”
यही वजह है कि यहाँ खाना सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं, मेहमाननवाज़ी का तरीका है।
शायर ने शायद ऐसे ही शहर के लिए कहा होगा—
“गुल से रंगीतर है ख़ारे-लखनऊ,
नशे से बेहतर है नज़ारे-लखनऊ।”
मेरे हिस्से का लखनऊ
हर शहर अपनी कोई याद साथ भेजता है। कहीं तस्वीरें, कहीं स्मारक, कहीं बाज़ार। लेकिन लखनऊ ने मुझे जो दिया, वह स्वाद था। ऐसा स्वाद जो लौटकर भी ज़ुबान पर रहता है।
ऐसा स्वाद जो याद दिलाता है कि हिंदुस्तान सिर्फ़ भाषाओं और संस्कृतियों का नहीं, बल्कि पकवानों का भी देश है।
लखनऊ से लौटते समय मेरे साथ गलावटी कबाब और बिरयानी के अलावा लेकिन यादों में पुरानी गलियाँ थीं, रिक्शे की घंटी थी और वह एहसास था जिसे सिर्फ़ एक ही वाक्य में समेटा जा सकता है— “खूब खाइए… कि आप लखनऊ में हैं।”