Sharmila Dhankhar: पोलियो, गरीबी और दहेज प्रताड़ना से लड़ी…अब देश के लिए जीता ऐतिहासिक गोल्ड, जानिए शर्मिला धनखड़ की प्रेरक कहानी

CWG 2026: शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं के शॉट पुट F57 इवेंट में सोमवार (27 जुलाई) को भारत को पैरा एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मेडल दिलाया। 40 साल की शर्मिला ने 9.81 मीटर के अपने सीजन के बेस्ट थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता। इसी के साथ उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा-एथलेटिक्स मेडल के लिए भारत के 20 साल के इंतजार को खत्म किया। इसी इवेंट में एक विवाद के बाद एक और भारतीय एथलीट शिल्पा शायला को ब्रॉन्ज मेडल दिया गया। शिल्पा ने 7.26 मीटर का अपना पर्सनल बेस्ट थ्रो किया था।

शुरुआत में नाइजीरिया की यूचेरिया इयियाजी ब्रॉन्ज मेडल की स्थिति में थीं। लेकिन भारतीय दल की आपत्ति और आधिकारिक समीक्षा के बाद उनके एकमात्र वैध प्रयास को फाउल करार दिया गया। नतीजतन, चौथे स्थान पर रहीं शिल्पा शैला को ब्रॉन्ज मेडल दिया गया। हालांकि, नाइजीरिया के इस फैसले के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने की संभावना है।

मेडल स्टैंडिंग में बदलाव की घोषणा के बाद भावुक शिल्पा ने शर्मिला के साथ जश्न मनाया। इस तरह, भारत ने इस इवेंट में दो मेडल जीते। F57 कैटेगरी उन एथलीटों के लिए है जिनके निचले अंगों में अक्षमता, अंगों की कमी या मांसपेशियों की ताकत कम होती है। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत का पहला पैरा एथलेटिक्स गोल्ड मेडल है।

2 साल की उम्र में पोलियो ने बदल दी जिंदगी

शर्मिला धनखड़ का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता छोटे किसान थे। जबकि उनकी मां नेत्रहीन थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने किसी तरह जीवनयापन किया। महज दो साल की उम्र में शर्मिला पोलियो की शिकार हो गईं। गांव में समय पर इलाज न मिलने के कारण उनका बायां पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

कम उम्र में शादी, दहेज प्रताड़ना और टूटा परिवार

शर्मिला की जिंदगी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई। लेकिन ससुराल में उन्हें दहेज की मांग को लेकर कथित तौर पर सालों तक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। आखिरकार, करीब 25 साल की उम्र में उन्हें अपनी दो बेटियों के साथ ससुराल छोड़कर मायके लौटना पड़ा। बाद में उनकी शादी अजीत सिंह से हुई। परिवार के सहयोग और पति के समर्थन ने उनकी जिंदगी को नई दिशा दी। इसी दौरान उन्होंने खेलों में करियर बनाने का फैसला किया।

34 साल की उम्र में शुरू किया खेल करियर

जहां अधिकांश खिलाड़ी बचपन से ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं। वहीं शर्मिला ने 34 वर्ष की उम्र में पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा। उन्होंने F57 वर्ग में शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में प्रतिस्पर्धा शुरू की और बहुत कम समय में देश की शीर्ष पैरा एथलीटों में अपनी अलग पहचान बना ली। साल 2021 की पैरा नेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने अपने पहले ही टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीतते हुए 7.40 मीटर के थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

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अब तक के प्रदर्शन पर एक नजर

  • 2025 इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (बेंगलुरु) में 9.77 मीटर के थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता।
  • 2026 फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (दुबई) में शॉट पुट में गोल्ड और डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।
  • 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स (बर्मिंघम) में वह पदक से मामूली अंतर से चूक गईं। लेकिन 8.43 मीटर के थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
  • 2023 एशियन पैरा गेम्स (हांगझोउ) में चौथे स्थान पर रहीं।

भारत ने श्रीलंका के खिलाफ 2 टेस्ट मैचों के लिए 4 स्पिनरों से युक्त घोषित की टीम

INDvsSL भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने सुबह तड़के श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरु हो रहे 2 टेस्ट मैचों के दौरे के लिए टीम की घोषणा कर दी। टीम में 4 स्पिनरों को जगह दी है और शीर्ष तेज गेंदबाजी क्रम अनुभवी है। हालांकि जसप्रीत बुमराह की फिटनेस पर संशय है। टीम में कुलदीप यादव, रविंद्र जड़ेजा, अफगानिस्तान के खिलाफ ड्रीम डेब्यू करने वाले मानव सुथार और इस सीरीज में डेब्यू करने वाले स्पिन ऑलराउंडर सारांश जैन को मौका मिला है।

BCCI (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के सचिव देवजीत सैकिया ने बताया कि टीम में कुछ छोटे-मोटे बदलावों को छोड़कर, ज़्यादा बदलाव नहीं है; यह टीम वैसी ही हैजैसी जून में शुभमन गिल की कप्तानी में अफगानिस्तान के खिलाफ खेली थी। चयन मीटिंग में मुख्य ध्यान  इस बात पर होगा कि क्या जसप्रीत बुमराह अंतिम ग्यारह में जगह बना पाएंगे या नहीं।

एक खुशखबरी यह सुनाई दे रही है कि रविंद्र जड़ेजा लाल गेंद की क्रिकेट में टीम की योजनाओं में है।टेस्ट क्रिकेट में उनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। साल 2012 से शुरु हुआ रविंद्र जड़ेजा का क्रिकेट करियर अब ढलान पर है। 89 मैचों में उन्होंने 38.3 की औसत से 4095 रन बनाए हैं। जिसमें 6 शतक और 28 अर्धशतक लगाए हैं। गेंदबाजी की बात करें तो उन्होंने 25 की औसत से 348 विकेट चटकाए हैं। इस दौरान उन्होंने 17 बार 4 विकेट और 15 बार 5 विकेट चटकाए हैं।

वहीं चोट से जूझ रहे कुछ खिलाड़ियों को दौरे से आराम दिया गया है। वॉशिंगटन सुंदर को टीम में शामिल नहीं किया गया है।श्रीलंका में स्पिन के मुफीद पिचों पर उनका ना रहना सही संकेत नहीं है।वहीं तेज गेंदबाज हर्षित राणा भी फिट नहीं है। उनके ना रहने से टीम शायद उतनी चिंतित ना हो। नीतीश कुमार रेड्डी, जो जून में न्यू चंडीगढ़ टेस्ट के लिए टीम का हिस्सा थे, पिछले महीने लगी क्वाड्रिसेप्स की चोट के कारण बेंगलुरु के Centre of Excellence में rehabilitation से गुज़र रहे हैं और इस दौरे के लिए नहीं चुने गए।

भारतीय टीम इस प्रकार है: शुभमन गिल (कप्तान), केएल राहुल (उपकप्तान), यशस्वी जायसवाल, ऋषभ पंत (विकेटकीपर), साई सुदर्शन, ध्रुव जुरेल (विकेटकीपर),रविंद्र जडेजा , कुलदीप यादव, मानव सुथार, जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज, प्रसिद्ध कृष्णा, गुरनूर बराड़, देवदत्त पडिक्कल, सारांश जैन।

चोटिल भारतीय टेस्ट टीम, किन खिलाड़ियों को बोर्ड भेजेगा श्रीलंका दौरे पर

श्रीलंका के खिलाफ होने वाली 2 मैचों की टेस्ट सीरीज़ के लिए टीम का चयन जब चयनकर्ता करने बैठेंगे तो बड़ा सवाल यह होगा कि चोटिल खिलाड़ियों की लंबी फहरिस्त की जगह किसको शामिल किया जाए।मीडिया सूत्रों से आर रही खबरों के मुताबिक वॉशिंगटन सुंदर की फिटनेस पर सस्पेंस बरकरार है। श्रीलंका में स्पिन के मुफीद पिचों पर उनका ना रहना सही संकेत नहीं है।

वहीं तेज गेंदबाज हर्षित राणा भी फिट नहीं है। उनके ना रहने से टीम शायद उतनी चिंतित ना हो लेकिन जसप्रीत बुमराह की फिटनेस भी ठीक नहीं है जो घुटने की चोट के कारण अंतिम वनडे से बाहर बैठे थे।भारत 15 से 27 अगस्त के बीच गाले और कोलंबो में दो टेस्ट मैच खेलेगा और घोषणा मंगलवार को संभावित है।

BCCI (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के सचिव देवजीत सैकिया ने बताया कि टीम में कुछ छोटे-मोटे बदलावों को छोड़कर, ज़्यादा बदलाव होने की संभावना नहीं है; यह टीम वैसी ही होगी जैसी जून में शुभमन गिल की कप्तानी में अफगानिस्तान के खिलाफ खेली थी। चयन मीटिंग में मुख्य ध्यान  इस बात पर होगा कि क्या जसप्रीत बुमराह को सीरीज़ के लिए चुना जाएगा या नहीं।

हालांकि उनके चुने जाने की संभावना है, और साथ ही मोहम्मद सिराज के भी, जिन्होंने बुमराह की गैर-मौजूदगी में अफगानिस्तान के खिलाफ गेंदबाजी की कमान संभाली थी, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि क्या चयनकर्ता पिछले रणजी सीज़न में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले आकिब नबी को टीम में मौका देंगे या नहीं।

इस बीच, खबर है कि नीतीश कुमार रेड्डी, जो जून में न्यू चंडीगढ़ टेस्ट के लिए टीम का हिस्सा थे, पिछले महीने लगी क्वाड्रिसेप्स की चोट के कारण बेंगलुरु के Centre of Excellence में rehabilitation से गुज़र रहे हैं और उनके चुने जाने की संभावना कम है। भारतीय टीम में शामिल कुछ चुनिंदा सभी प्रारुप के खिलाड़ियों में से एक, रेड्डी ने बेंगलुरु में गेंदबाजी शुरू कर दी है।

लेकिन सूत्रों का कहना है कि पांच दिन के मैचों के लिए उन पर विचार करना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि, उम्मीद है कि वह सितंबर में होने वाले कई सफेद गेंद मैचों के लिए तैयार हो जाएंगे। रेड्डी ने आखिरी बार जून में चेन्नई में अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे और आखिरी वनडे मैच में भारत के लिए खेला था।

वहीं एक खुशखबरी यह सुनाई दे रही है कि रविंद्र जड़ेजा लाल गेंद की क्रिकेट में टीम की योजनाओं में है।टेस्ट क्रिकेट में उनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। साल 2012 से शुरु हुआ रविंद्र जड़ेजा का क्रिकेट करियर अब ढलान पर है। 89 मैचों में उन्होंने 38.3 की औसत से 4095 रन बनाए हैं। जिसमें 6 शतक और 28 अर्धशतक लगाए हैं। गेंदबाजी की बात करें तो उन्होंने 25 की औसत से 348 विकेट चटकाए हैं। इस दौरान उन्होंने 17 बार 4 विकेट और 15 बार 5 विकेट चटकाए हैं।

अर्शदीप सिंह ने इंस्टा पर फोटो डाल माना समरीन कौर को अपनी गर्लफ्रेंड

भारत के सबसे सफल टी-20 अंतरराष्ट्रीय तेज गेंदबाज अर्शदीप सिंह ने मॉडल और अभिनेत्री समरीन कौर के साथ इंस्टाग्राम पर फोटो डालकर सबको बताना चाहा है कि समरीन कौर उनकी गर्लफ्रेंड है।

अर्शदीप सिंह कई समय से समरीन कौर के साथ सार्वजनिक स्थानों पर नजर आ चुके थे लेकिन संबंध पर अपने पत्ते नहीं खोल रहे थे। लेकिन आज उन्होंने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पर समरीन कौर संग फोटो डाल अपने पनपते रिश्ते की जानकारी दे दी।

समरीन कौर 26 वर्षीय मॉडल और अभिनेत्री हैं। वह जम्मू और कश्मीर की है और पूर्व मिस इंडिया रह चुकी हैं। इसके अलावा वह कई फिल्मों वेबसीरीज और पंजाबी और हिंदी  वीडियोज में भी आ चुकी है। वह भारत के पहले विश्वकप जीत पर बनी फिल्म 83 का भी हिस्सा थी। शिक्षा की बात करें तो वह पुणे के सिंबायोसिस से बीए हॉनर्स कर चुकी है।

2 बार के टी-20 विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा रहे अर्शदीप सिंह अब एकदिवसीय टीम का हिस्सा हैं। भारत के लिए वह टी-20 क्रिकेट में सर्वाधिक 135 विकेट निकाल चुके हैं। साल 2022 से अपने एकदिवसीय करियर की शुरुआत करने वाले अर्शदीप को अब तक सिर्फ 18 मैच खेलने को मिले हैं।

हालंकि टीम प्रबंधन ने यह साफ कर दिया है कि जसप्रीत बुमराह की मौजूदगी में वह दूसरे गेंदबाज होंगे और उनकी गैरमौजूदगी में प्रमुख गेंदबाज होंगे। वह विश्वकप 2027 के लिए टीम की योजना में है। जहां तक टेस्ट क्रिकेट की बात है तो वह अभी तक दुर्भाग्य से टीम के बाहर बैठे हैं। पिछले साल इंग्लैंड दौरे पर वह अंतिम ग्यारह में जगह नहीं बना सके थे।


श्रेयस अय्यर ने VVS लक्ष्मण की तारीफ कर उड़ा दिया गौतम गंभीर का मजाक

जिम्बाब्वे के खिलाफ बतौर कप्तान अपनी पहली टी-20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज जीतकर श्रेयस अय्यर ने दौरे पर गए कोच VVS लक्ष्मण के लिए तारीफ के पुल बांध दिए। इसे कई क्रिकेट फैंस इस नजरिए से देख रहे हैं कि श्रेयस अय्यर यह साबित करना चाहते हैं कि गौतम गंभीर की कोचिंग के कारण टीम को आयरलैंड और फिर इंग्लैंड के खिलाफ 0-2 और 0-4 की शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी।

गौरतलब है कि VVS लक्ष्मण का कोचिंग करियर खासा अच्छा गया है। साल 2022 से टीम के साथ कभी कभार कोचिंग की जिम्मेदारी संभालने वाले वीवीएस लक्ष्मण अब तक बतौर कोच एक भी सीरीज नहीं हारे हैं। भारत के टी20 कप्तान श्रेयस अय्यर और अंतरिम मुख्य कोच वीवीएस लक्ष्मण ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 3-0 से मिली जीत में एक-दूसरे की भूमिका की सराहना की।

अय्यर ने लक्ष्मण का आभार व्यक्त किया जिन्हें मुख्य कोच गौतम गंभीर को विश्राम दिए जाने के बाद इस दौरे के लिए अंतरिम कोच नियुक्त किया गया था।अय्यर ने कहा, ‘‘इस श्रृंखला में कुछ कैच छोड़ने के अलावा हमारा प्रदर्शन बेदाग रहा। सहयोगी स्टाफ सहित टीम के हर सदस्य ने अपना योगदान दिया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमें प्रेरित करने और हमारा हौसला बढ़ाने के लिए वीवीएस सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हर दिन जब हम मैदान पर कदम रखते थे, तो मुझे लगता था कि आपने जो कुछ भी कहा वह बिल्कुल सही था और हम उससे जुड़ाव महसूस कर सकते थे। इसलिए आपका बहुत-बहुत आभार।’’

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लक्ष्मण ने कहा, ‘‘मैं श्रेयस को विशेष रूप से बधाई देना चाहता हूं क्योंकि उनके कप्तानी करियर की शुरुआत थोड़ी मुश्किल रही, लेकिन जिस तरह से उन्होंने वापसी की, वह शानदार था। वह पहले मैच से एक दिन पहले जब हमसे जुड़े और तभी से जीत के लिए आश्वस्त थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इस टीम में कई नए खिलाड़ी शामिल थे। हम जानते हैं कि इंग्लैंड में खेलने वाले खिलाड़ियों में से केवल चार या पांच ही इस दौरे पर हमारे साथ शामिल थे। लेकिन वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे। जिस तरह से कप्तान ने आप सभी को प्रेरित किया उसे देखते हुए इस जीत का बहुत सारा श्रेय कप्तान को जाता है।’’

बैंक में 100 करोड़ रुपये, सिलिकॉन वैली में करोड़ों की कंपनी… फिर भी गांव में क्यों रह रहा है ये करोड़पति

सफलता को अक्सर पैसा, बड़ा बिजनेस और शानदार जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन कई बार जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं, जहां आर्थिक मजबूती भी परेशानियों को कम नहीं कर पाती। एक उद्यमी द्वारा साझा की गई कहानी ने इसी सोच को सामने रखा है। इसमें एक ऐसे व्यक्ति का जिक्र है, जिसने अपनी मेहनत से विदेश में बड़ी कामयाबी हासिल की, करोड़ों की संपत्ति बनाई और खुद को सफल साबित किया। हालांकि, निजी जिंदगी की चुनौतियों ने उसकी राह बदल दी।

परिवार से जुड़े विवाद, मानसिक तनाव और बदलते हालातों के बीच उसने अपनी जिंदगी को एक नई दिशा देने का फैसला किया। यह कहानी सिर्फ सफलता और असफलता की नहीं, बल्कि मानसिक शांति, रिश्तों और जीवन में संतुलन की अहमियत को भी उजागर करती है।

सिलिकॉन वैली में बनाई अपनी पहचान

विनीथ के अनुसार, उनके कॉलेज साथी ने अपनी मेहनत के दम पर अमेरिका में एक सफल कंपनी बनाई और खुद को डॉलर मिलियनेयर बनाया। करियर में सफलता, आर्थिक मजबूती और एक शानदार भविष्य उसके साथ था। लेकिन कुछ समय बाद जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।

परिवारिक विवादों ने बदली पूरी जिंदगी

विनीथ ने बताया कि उनके साथी को पत्नी, ससुराल पक्ष और परिवार से जुड़े विवादों का सामना करना पड़ा। इसके बाद कानूनी मामलों और मानसिक तनाव ने उनकी जिंदगी को काफी प्रभावित किया। उन्होंने दावा किया कि इन परिस्थितियों के बीच वह डिप्रेशन से भी गुजरे और अपने बच्चे से दूरी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। आखिरकार उन्होंने अमेरिका छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया।

₹100 करोड़ से ज्यादा संपत्ति, लेकिन जिंदगी गांव में

विनीथ के मुताबिक, आज उनके पूर्व साथी के पास बैंक में ₹100 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है, लेकिन वह अब शहरों की चमक-दमक से दूर एक छोटे गांव में रहते हैं। वह अपना समय आध्यात्मिक गतिविधियों में बिताते हैं और मानसिक शांति, उपचार और जीवन के अनुभवों से जुड़े वीडियो साझा करते हैं।

पैसे से ज्यादा जरूरी है मन की शांति

विनीथ ने इस कहानी के जरिए मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे कई मामले देखे हैं जहां आर्थिक सफलता के बावजूद लोग मानसिक परेशानियों से जूझते हैं। उनका संदेश था कि जिस तरह लोग अपनी संपत्ति की सुरक्षा करते हैं, उसी तरह अपने मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए।

सोशल मीडिया पर लोगों ने साझा किए अपने अनुभव

विनीथ की पोस्ट पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रिया दी और माना कि जिंदगी में मानसिक शांति और अच्छे रिश्तों की अहमियत को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक यूजर ने लिखा कि अच्छी नींद और मन की शांति को लोग कम आंकते हैं। वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि कई बार हालात इंसान के नियंत्रण में नहीं होते और मुश्किल समय का सामना करना ही एकमात्र रास्ता रह जाता है।

दौलत बड़ी है, लेकिन सुकून उससे भी ज्यादा जरूरी

इस कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि असली सफलता सिर्फ पैसा कमाने में है या फिर एक संतुलित और शांत जीवन जीने में। करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद अगर मन अशांत हो, तो जिंदगी की खुशियां अधूरी रह सकती हैं।

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1.25 लाख की डॉक्टर वाली नौकरी छोड़ी, 45 दिनों में कमाए 2 लाख रुपये, डॉ. चारुल सिंह की कहानी हैरान कर देगी

डॉक्टर बनना कई युवाओं का सपना होता है, लेकिन कुछ लोग सफलता की एक तय राह छोड़कर अपनी जिंदगी में नया रास्ता चुनने का साहस दिखाते हैं। डॉ. चारुल सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मेडिकल क्षेत्र में अच्छी पहचान बनाने के बाद उन्होंने अपने करियर को एक अलग दिशा देने का फैसला किया। एक समय अस्पतालों में सेवाएं देने वाली चारुल ने बदलती परिस्थितियों के बीच डिजिटल दुनिया में कदम रखा और यहां भी सफलता हासिल की। उनका सफर सिर्फ करियर बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि चुनौतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने, नए अवसर तलाशने और अपने लिए बेहतर संतुलन बनाने की प्रेरणा देता है। पढ़ाई, नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने जिस तरह अपने फैसले लिए, वह कई लोगों के लिए सीख बन गया है।

45 दिनों में कमाए पहले ₹2 लाख

डॉ. चारुल ने अपनी डिजिटल यात्रा शुरू करने के सिर्फ 45 दिनों के अंदर ₹2 लाख की कमाई कर ली। हालांकि, उनका यह फैसला सिर्फ पैसे के लिए नहीं था। इसके पीछे कई सालों की पढ़ाई, अस्पताल की लंबी ड्यूटी, मां बनने की जिम्मेदारियां, कानूनी लड़ाई और आर्मी अधिकारी पति के साथ बदलती परिस्थितियों का अनुभव था।

BDS के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष

चारुल ने प्राइवेट कॉलेज से बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) की पढ़ाई पूरी की थी। उन्हें उम्मीद थी कि मेडिकल क्षेत्र में कदम रखते ही आर्थिक स्थिरता मिल जाएगी, लेकिन नौकरी की शुरुआत में उन्हें हकीकत का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि इतने सालों की पढ़ाई और परिवार के खर्च के मुकाबले शुरुआती नौकरी में मिलने वाली सैलरी काफी कम थी। यही वह समय था जब उन्होंने अपने करियर को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू किया।

परिवार और समाज की उम्मीदों के बीच बनाई अपनी राह

परंपरागत परिवार से आने वाली चारुल पर बड़ी बेटी होने की जिम्मेदारियां भी थीं। उम्र बढ़ने के साथ परिवार में करियर से ज्यादा शादी की बातें होने लगी थीं। लेकिन उन्होंने अपने सपनों को पीछे नहीं छोड़ा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी।

दिल्ली के बड़े अस्पतालों में हासिल किया अनुभव

चारुल ने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल और वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में नॉन-PG जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सेवाएं दीं। कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने NEET-PG परीक्षा पास की और लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से पीडियाट्रिक डेंटिस्ट्री में मास्टर्स किया।

मेहनत का मिला फल, सैलरी पहुंची ₹1.25 लाख तक

अपने मेडिकल करियर में चारुल ने लंबा सफर तय किया। जूनियर रेजिडेंट के तौर पर उनकी शुरुआती सैलरी करीब ₹92 हजार प्रति माह थी। मास्टर्स के दौरान यह लगभग ₹1 लाख तक पहुंच गई और सीनियर रेजिडेंट बनने के बाद उनकी कमाई करीब ₹1.25 लाख प्रति माह हो गई।

शादी, मां बनने और नौकरी के बीच बड़ी चुनौती

मेडिकल करियर आगे बढ़ रहा था, तभी निजी जिंदगी में नई जिम्मेदारियां आईं। चारुल ने एक भारतीय सेना अधिकारी से शादी की। पति की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग के कारण दोनों को कई शहरों में रहना पड़ा।

मां बनने के दौरान भी उन्होंने अस्पताल की लंबी शिफ्ट पूरी की और नवजात बच्चे की देखभाल के साथ अपनी मेडिकल जिम्मेदारियां निभाईं।

मातृत्व अवकाश के लिए लड़ी कानूनी लड़ाई

सीनियर रेजिडेंसी के दौरान चारुल को बॉन्डेड डॉक्टरों के लिए मैटरनिटी लीव से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कानूनी लड़ाई जीत हासिल की।

इस अनुभव ने उनकी सोच बदल दी। उन्हें एहसास हुआ कि खुद का कुछ बनाना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है।

मेडिकल करियर से डिजिटल बिजनेस तक का सफर

पति की लगातार आर्मी पोस्टिंग और दूर-दराज इलाकों में रहने की वजह से चारुल के लिए नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस जारी रखना मुश्किल हो गया। इसके बाद उन्होंने करीब छह महीने तक डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन बिजनेस को समझा।

जून 2025 में उन्होंने अपना डिजिटल वेंचर शुरू किया, जिसकी शुरुआत पर्सनल ब्रांडिंग और स्टोरीटेलिंग से हुई।

अब डॉक्टर से बनीं डिजिटल मेंटर

धीरे-धीरे क्लाइंट मिलने लगे और उनका ऑनलाइन काम बढ़ता गया। चारुल ने बताया कि डिजिटल बिजनेस से उनकी कमाई अब उनकी पुरानी डॉक्टर वाली सैलरी से भी आगे निकल चुकी है।

आज वह Charul’s Inner Circle के जरिए लोगों, खासकर महिलाओं और शुरुआती स्तर के लोगों को डिजिटल स्किल्स और पर्सनल ब्रांडिंग सिखा रही हैं।

महिलाओं को दिया खास संदेश

डॉ. चारुल का मानना है कि मां बनने के बाद महिलाओं के सपने खत्म नहीं होते, बल्कि उनकी सोच और लक्ष्य बदल सकते हैं। उनका कहना है कि अवसरों का इंतजार करने के बजाय खुद के लिए नए रास्ते बनाने चाहिए। उनकी कहानी दिखाती है कि सही समय पर लिया गया बदलाव जिंदगी की नई शुरुआत बन सकता है।

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CWG 2026: कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, जीता गोल्ड मेडल

Mirabai Chanu Commonwealth Games: ग्लासगो कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स 2026 में भारत को पहला गोल्ड मेडल मिल गया है। भारतीय स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन किया। उनके इस दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत को गोल्ड मेडल मिला। मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसी के साथ उन्होंने भारत को इस सीजन का पहला गोल्ड मेडल भी दिलाया। शुरुआती स्नैच प्रयास में असफल रहने के बाद मीराबाई ने शानदार वापसी की और लगातार दो सफल लिफ्ट लगाते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के नए रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए।

मीराबाई चानू ने जीत गोल्ड मेडल

क्लीन एंड जर्क में मीराबाई चानू ने पहली कोशिश में 105 किलोग्राम वजन नहीं उठा सकीं, लेकिन दूसरी कोशिश में उन्होंने सफलतापूर्वक यह वजन उठाया। इस लिफ्ट के साथ उन्होंने एक और कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाया और अपना गोल्ड मेडल भी पक्का कर लिया। मीराबाई चानू ने स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन उठाकर कुल 190 किलोग्राम के साथ पहला स्थान हासिल किया। उनके शानदार प्रदर्शन से भारत को 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला स्वर्ण पदक मिला। इस जीत के साथ मीराबाई ने अपने करियर में एक और कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल जोड़ लिया। मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में सोना जीता।

जब मन कहे कुछ गलत है तो रुककर जरूर सोचिए… Zomato के फाउंडर दीपिंदर गोयल ने बताया सफलता का ये मंत्र

दीपिंदर गोयल ज़ोमैटो के फाउंडर हैं। वे रिस्क लेने की क्षमता, एंटरप्रेन्योर वाली सोच और अपनी महत्वाकांक्षा के लिए जाने जाते हैं। उनकी सफलता का सफ़र बहुत दिलचस्प है। गोयल का जन्म पंजाब में हुआ था। मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर काम करने से पहले उन्होंने IIT दिल्ली से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वे अपनी कॉर्पोरेट नौकरी कर रहे थे, तभी उन्हें ज़ोमैटो बनाने का आइडिया आया। आखिरकार, ज़ोमैटो बनाने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। उनकी लीडरशिप क्वालिटी और ‘फ़र्स्ट मूवर एडवांटेज’ (सबसे पहले शुरुआत करने का फ़ायदा) का सही इस्तेमाल करने की क्षमता ने ही उन्हें आज एक ऐसा एंटरप्रेन्योर बनाया है जिसे हम आदर्श मानते हैं।

गोयल ने अक्सर लीडरशिप, फैसला लेने और इंस्टिंक्ट (अंतर्ज्ञान) के बारे में प्रैक्टिकल बातें शेयर की हैं। एक बार उन्होंने कहा था, “अपने इंस्टिंक्ट (अंदर की आवाज़) की अहमियत समझें—जब आपको लगे कि कुछ गड़बड़ है, तो उस पर गहराई से सोचें और फ़ैसला लेने में सिर्फ़ डेटा को ही हावी न होने दें।” यह वाकई एक दमदार बात है, आइए समझते हैं कि इसका असल मतलब क्या है।

इस कोट का क्या मतलब है?

आज की कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल दुनिया में, हमें सिर्फ़ नंबर, चार्ट और ठोस सबूतों पर भरोसा करना सिखाया जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि इंट्यूशन—यानी ‘गट फ़ीलिंग’ (अंदर की आवाज़)—असल में बरसों के सबकॉन्शियस ऑब्ज़र्वेशन (अवचेतन रूप से देखी-परखी बातें), पैटर्न पहचानने और असल ज़िंदगी के अनुभवों का नतीजा होती है। यह कोट हमें याद दिलाता है कि डेटा भले ही काम का हो, लेकिन उसे आपकी अंदर की आवाज़ को पूरी तरह दबाने नहीं देना चाहिए।

इसलिए, अगली बार जब आपको करियर के किसी फ़ैसले, बिज़नेस पार्टनरशिप या ज़िंदगी के किसी बड़े फ़ैसले को लेकर ज़बरदस्त हिचकिचाहट महसूस हो, तो उसे सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ न करें क्योंकि वह कागज़ पर अच्छा लग रहा है। रुकें और सोचें कि आपका इंस्टिंक्ट क्यों चेतावनी दे रहा है। ठोस तथ्यों और इंट्यूशन के बीच तालमेल बिठाने से आप ज़्यादा समझदारी भरे और सही फ़ैसले ले पाते हैं।

आज के समय में यह कितना प्रासंगिक है?

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो मेट्रिक्स और एनालिटिक्स से चलती है, जहां लोग अक्सर इंसानी समझ और असल ज़िंदगी की बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

प्रोफ़ेशनल्स अक्सर “एनालिसिस पैरालिसिस” (बहुत ज़्यादा विश्लेषण के कारण काम न कर पाना) का सामना करते हैं और ज़रूरी फ़ैसले लेने में देरी करते हैं क्योंकि वे और डेटा का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

एल्गोरिदम और नंबर इंसानी व्यवहार, टीम कल्चर या अंदरूनी भरोसे को नहीं समझ पाते।

तेज़ी से बदलते करियर और बिज़नेस में, 100% डेटा की पक्की जानकारी का इंतज़ार करने का मतलब हो सकता है कि आप ज़रूरी मौके गँवा दें या छिपे हुए जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दें।

लोग अक्सर खराब नौकरियों, बुरे रिश्तों या नाकाम हो रहे प्रोजेक्ट्स में बने रहते हैं क्योंकि स्प्रेडशीट कहती है कि सब ठीक है, जबकि उनका मन कुछ और ही कहता है।

इस कोट (कथन) से मिलने वाली सीख

अंतर्ज्ञान कोई जादू नहीं है। यह आपके अवचेतन मन द्वारा पुराने अनुभवों को असल समय में प्रोसेस करने की प्रक्रिया है।

डेटा आपको तथ्य देता है, लेकिन अंतर्ज्ञान आपको संदर्भ और भविष्य की समझ देता है।

मेट्रिक्स पर बहुत ज़्यादा निर्भरता आपको उन बारीक जोखिमों के प्रति अंधा बना सकती है जिन्हें आंकड़े नहीं पकड़ पाते।

महान नेता अनिश्चित या अनजान स्थितियों का सामना करते समय अपनी सहज समझ (instincts) पर भरोसा करते हैं।

अपनी मज़बूत अंदरूनी भावना (gut feeling) के खिलाफ़ लिया गया फ़ैसला अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है।

इस बात को मानने के लिए कुछ टिप्स

जब कोई बड़ा फ़ैसला लेना हो, तो डेटा क्या कहता है उसे लिखें, और फिर आपका मन (अंतर्मन) क्या कह रहा है, उसे भी लिखें।

अगर किसी प्रोजेक्ट या डील के आंकड़े अच्छे होने के बावजूद आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो कोई भी पक्का फ़ैसला लेने से पहले रुकें और गहराई से जाँच-पड़ताल करें।

खुद पर भरोसा बढ़ाने के लिए रोज़मर्रा के छोटे-मोटे फ़ैसलों में भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की आदत डालें।

सोचने के लिए कुछ शांत पल निकालकर घबराहट या डर को अपनी असली अंतर्दृष्टि (intuition) से अलग करें।

साफ़ चेतावनी के संकेतों या नैतिक शंकाओं को नज़रअंदाज़ करने के लिए डेटा का बहाना न बनाएँ।

औपचारिक रिपोर्ट और मेट्रिक्स के साथ-साथ अपने निजी अनुभव और व्यावहारिक समझ (street smarts) को भी महत्व दें।

रतन टाटा की ये फेवरेट 5 फेमस किताबें, आपके करियर और कैरेक्टर को बिल्ड करने में कर सकती हैं मदद

लोग रतन टाटा की तारीफ़ उन कंपनियों के लिए करते हैं जिन्हें बनाने में उन्होंने मदद की, लेकिन कहानी बस इतनी ही नहीं है। कई बिज़नेस लीडर्स ने अरबों डॉलर की कंपनियां बनाई हैं। बहुत कम लोगों को ऐसा भरोसा मिला है कि लोग उनके बारे में सच्चे सम्मान के साथ बात करें। ऐसा तिमाही मुनाफ़े की वजह से नहीं होता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों को भरोसा होता है कि जब सुर्खियां आपके पक्ष में न हों, तब भी आपके मूल्य अडिग रहते हैं।

अक्सर लोग लीडरशिप को आत्मविश्वास, करिश्मा या मुश्किल फ़ैसले तेज़ी से लेने की क्षमता समझ लेते हैं। ये बातें मायने तो रखती हैं, लेकिन ये पूरी नहीं हैं। जो लीडर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं, वे आमतौर पर काम करने से ज़्यादा समय सीखने में बिताते हैं। वे खूब पढ़ते हैं, अपनी मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं और सफल होने के बाद भी नई चीज़ें जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। यह बात बहुत अच्छी लगती है क्योंकि इससे पता चलता है कि लीडरशिप कोई जन्मजात गुण नहीं है, बल्कि एक आदत है।

The Tata Story by Harish Bhat

अगर आप यह समझना चाहते हैं कि रतन टाटा की लीडरशिप आज भी लोगों के दिलों में क्यों बसी हुई है, तो आपको यहीं से शुरुआत करनी चाहिए। हरीश भट सिर्फ़ टाटा ग्रुप की अहम उपलब्धियों के बारे में ही नहीं बताते, बल्कि उन सिद्धांतों का भी ज़िक्र करते हैं जिन्होंने उन्हें आकार दिया। इस किताब से मिलने वाली सबसे बड़ी सीख कोई बिज़नेस एम्पायर खड़ा करने के बारे में नहीं है, बल्कि ऐसी साख बनाने के बारे में है जो तिमाही नतीजों से कहीं ज़्यादा समय तक कायम रहती है। किताब का कहना है कि मूल्य सफलता के साथ जुड़ी कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं हैं; बल्कि अक्सर यही वे कारण होते हैं जिनकी वजह से सफलता लंबे समय तक बनी रहती है।

Good to Great by Jim Collins

जिम कॉलिन्स एक ऐसा सवाल पूछते हैं जो सुनने में तो बहुत आसान लगता है, लेकिन असल में गहरा है: कुछ कंपनियां ‘अच्छी’ से ‘बेहतरीन’ कैसे बन जाती हैं, जबकि दूसरी कंपनियां एक ही स्तर पर अटकी रह जाती हैं? इसका जवाब करिश्मा या बड़े जोखिम उठाना नहीं है। इसका जवाब है – अनुशासित सोच, धैर्यपूर्ण नेतृत्व और लंबी अवधि की सोच के साथ काम करने की इच्छा। हालाँकि कुछ उदाहरण अब पुराने हो चुके हैं, लेकिन उनका मुख्य विचार – कि दिखावे या शोर-शराबे से कहीं ज़्यादा असरदार निरंतरता होती है – आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।

The Psychology of Money by Morgan Housel

लीडरशिप और पैसा, दोनों ही समझदारी की परीक्षा लेते हैं और मॉर्गन हाउसेल ने इस बात को बहुत शानदार ढंग से समझाया है। इन्वेस्टमेंट की रणनीतियाँ सिखाने के बजाय, वे इस बात पर चर्चा करते हैं कि समझदार लोग भी अक्सर पैसे के मामले में गलत फ़ैसले क्यों लेते हैं और सब्र को अक्सर कम अहमियत क्यों दी जाती है। यह किताब आपको एक आसान लेकिन ज़बरदस्त बात सिखाती है: जब दांव बड़ा हो, तो समझदारी से ज़्यादा आपके व्यवहार का महत्व होता है।

Start With Why by Simon Sinek

साइमन सिनेक की मुख्य बात का इतना ज़्यादा ज़िक्र किया जाता है कि यह भूलना आसान है कि असल में यह कितनी असरदार है। उनका मानना ​​सीधा-सा है: लोग सबसे पहले प्रोडक्ट नहीं खरीदते, वे मकसद से जुड़ते हैं। चाहे आप किसी कंपनी को चला रहे हों, कोई ब्रांड बना रहे हों या किसी छोटी टीम को मैनेज कर रहे हों, यह किताब आपको इस बात से आगे सोचने के लिए प्रेरित करती है कि आप क्या करते हैं, और इस बात पर ध्यान देने को कहती है कि वह काम क्यों ज़रूरी है।

Leaders Eat Last by Simon Sinek

साइमन सिनेक की किताबों में से यह किताब सबसे ज़्यादा ज़मीनी हकीकत से जुड़ी हुई लगती है। यह किताब अधिकार या पद का गुणगान करने के बजाय, लीडरशिप को एक ज़िम्मेदारी के तौर पर पेश करती है। सिनेक का कहना है कि बेहतरीन लीडर ऐसा माहौल बनाकर लोगों का भरोसा जीतते हैं जहाँ वे सुरक्षित और अहम महसूस करें, और अपना सबसे अच्छा काम करने के लिए प्रेरित हों। यह किताब हमें सही समय पर याद दिलाती है कि सबसे मज़बूत टीमें डर या ऊँच-नीच से नहीं, बल्कि देखभाल और जवाबदेही से बनती हैं।