Hathras Victim Family Relocation: हाथरस पीड़िता के परिवार को 3 महीने में नोएडा या गाजियाबाद करें शिफ्ट; हाईकोर्ट का UP सरकार को निर्देश

Hathras Victim Family Relocation: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने हाथरस दुष्कर्म मामले की पीड़िता के परिवार के पुनर्वास को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने राज्य सरकार के 22 फरवरी, 2025 के फैसले को रद्द करते हुए उसे तीन महीने के भीतर पीड़िता के परिवार को गाजियाबाद या नोएडा में बसाने का निर्देश दिया। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस जसप्रीत सिंह की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने पहले राज्य सरकार को पीड़िता के परिवार को गाजियाबाद या नोएडा में बसाने के अनुरोध पर विचार करने का निर्देश दिया था। लेकिन सरकार ने इस अनुरोध पर समुचित ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने कहा कि सरकार ने अदालत के निर्देशों की अनदेखी करते हुए अपने फैसले में परिवार को पुनर्वास के लिए कासगंज, एटा और अलीगढ़ में से किसी एक स्थान को चुनने का विकल्प दिया था। सोमवार को दिए गए आदेश में पीठ ने कहा कि 22 फरवरी, 2025 के फैसले में सरकार ने गाजियाबाद या नोएडा में पुनर्वास के परिवार के अनुरोध का कोई उल्लेख नहीं किया था। इसलिए इसे हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में लिया गया फैसला नहीं माना जा सकता।

NCR में बसाने की मांग

पीठ ने कहा कि इस मामले में राज्य की ओर से अनावश्यक विरोध दिखाई देता है। उसके रवैये से परिवार के इस आरोप को बल मिलता है कि सरकार इस मामले को अपने खिलाफ मुकदमे की तरह देख रही है। पीड़िता के परिवार की ओर से पेश वकील महमूद प्राचा ने कहा कि कासगंज, एटा और अलीगढ़ हाथरस के करीब हैं। इससे परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा होती है। उन्होंने कहा कि इन जिलों में परिवार का कोई रिश्तेदार भी नहीं रहता है।

उन्होंने कहा कि इसके विपरीत परिवार के रिश्तेदार गाजियाबाद और नोएडा में रहते हैं, जहां बसने पर वे बिना किसी भय के सामान्य जीवन जी सकेंगे। अदालत ने निर्देश दिया कि पुनर्वास पूरा होने के बाद परिवार के एक सदस्य को रोजगार भी दिया जाए, जैसा कि 26 जुलाई, 2022 के आदेश में निर्देश दिया गया था।

मुख्य सचिव को अहम निर्देश

पीठ ने यूपी के अपर मुख्य सचिव (गृह) को अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि आदेश का पालन नहीं होने की स्थिति में उन्हें 30 नवंबर, 2026 को व्यक्तिगत रूप से उसके समक्ष पेश होना होगा।

क्या है केस?

उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में 14 सितंबर, 2020 को एक दलित युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की कथित घटना सामने आई थी। घटना के करीब दो सप्ताह बाद दिल्ली के एक अस्पताल में युवती की मौत हो गई थी।

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मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए अपने बयान में पीड़िता ने चार आरोपियों पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था। यह भी आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने परिवार की सहमति के बिना रात में पीड़िता का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया था। हालांकि, पुलिस ने इस दावे को गलत बताया था।

यूपी में लड़कियों को स्कूल में हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं; इलाहाबाद HC ने खारिज की मुस्लिम छात्रा की याचिका

Hijab in Islam: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्कूल में स्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति देने का स्कूल अधिकारियों को निर्देश जारी करने के अनुरोध वाली याचिका खारिज कर दी है। प्रयागराज के अतरसुइया थाना अंतर्गत टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा सुकैना रिजवी ने अपनी मां के जरिए यह याचिका दायर की थी। रिजवी ने इस स्कूल से 10वीं की परीक्षा पास की है। वह इसी स्कूल में 11वीं कक्षा में एडमिशन ले रही है। अदालत ने कहा कि दूसरी हाई कोर्ट्स की भी यही राय रही है कि हिजाब पहनना इस्लामिक आस्था का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने कहा, “हमने याचिकाकर्ता से जुड़ी विभिन्न कक्षाओं की तस्वीरें देखी हैं और केवल उसे छोड़कर किसी भी छात्रा ने हिजाब नहीं पहना है। यहां तक कि जिस धार्मिक समुदाय से वह आती है, उस समुदाय की छात्राओं ने भी हिजाब नहीं पहना है।”

अदालत ने कहा, “जब कभी भी यह मुद्दा उठा है, उच्च न्यायालयों का एकमत रहा है कि हिजाब पहनना इस्लामिक आस्था का आवश्यक हिस्सा नहीं है। एक महिला के हिजाब नहीं पहनने से आस्था खतरे में नहीं पड़ जाएगी।” हाई कोर्ट ने 21 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा, “यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि याचिका में यह दावा कि हिजाब पहनना एक जरूरी धार्मिक प्रथा है, केवल एक दावा भर है।”

स्टूडेंट ने स्कूल प्रशासन से यूनिफॉर्म के अलावा सिर पर स्कार्फ पहनने की इजाजत देने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लामिक परंपरा का एक जरूरी हिस्सा है। छात्रा उसी स्कूल में छठी कक्षा से ही इसे पहनती आ रही हैं।

‘हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की जरूरी प्रथा नहीं’

हाई कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की एक जरूरी प्रथा है। कोर्ट ने आगे कहा, “जहां भी यह मुद्दा उठा है, हाई कोर्ट्स की राय एक रही है कि महिलाओं के लिए हेडस्कार्फ पहनना इस्लामी आस्था का कोई जरूरी हिस्सा नहीं है, जिसके बिना आस्था खतरे में पड़ जाएगी।” अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा, “यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि रिट याचिका में यह दावा कि हेडस्कार्फ पहनना एक जरूरी धार्मिक प्रथा है, महज एक दावा भर है।”

कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जब तक किसी स्कूल का यूनिफॉर्म कोड निष्पक्ष और बिना भेदभाव का है। उसे संस्थान में अनुशासन और समानता बनाए रखने के लिए लागू किया गया है, तब तक संस्थान को अपने आंतरिक अनुशासन और ड्रेस कोड को लागू करने की पूरी आजादी है।

हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी बिना सरकारी मदद वाले प्राइवेट शिक्षण संस्थान को अपने परिसर में एक जैसा ड्रेस कोड लागू करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने माना कि तय स्कूल यूनिफॉर्म का पालन करना जरूरी है। साथ ही व्यक्तिगत आधार पर उसमें हेडस्कार्फ जोड़ने की अनुमति मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

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कोर्ट ने साफ किया कि अगर यूनिफॉर्म सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होती है। व्यक्तिगत छात्रों को अपनी पसंद के आधार पर तय यूनिफ़ॉर्म में बदलाव करने या उसे न पहनने की अनुमति देने से यूनिफॉर्म का मूल मकसद ही खत्म हो जाएगा। इससे स्कूल के अनुशासन को तय करने का अधिकार संस्थान के हाथ से निकलकर व्यक्तिगत छात्रों के हाथ में चला जाएगा।

1.25 लाख की डॉक्टर वाली नौकरी छोड़ी, 45 दिनों में कमाए 2 लाख रुपये, डॉ. चारुल सिंह की कहानी हैरान कर देगी

डॉक्टर बनना कई युवाओं का सपना होता है, लेकिन कुछ लोग सफलता की एक तय राह छोड़कर अपनी जिंदगी में नया रास्ता चुनने का साहस दिखाते हैं। डॉ. चारुल सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मेडिकल क्षेत्र में अच्छी पहचान बनाने के बाद उन्होंने अपने करियर को एक अलग दिशा देने का फैसला किया। एक समय अस्पतालों में सेवाएं देने वाली चारुल ने बदलती परिस्थितियों के बीच डिजिटल दुनिया में कदम रखा और यहां भी सफलता हासिल की। उनका सफर सिर्फ करियर बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि चुनौतियों से सीख लेकर आगे बढ़ने, नए अवसर तलाशने और अपने लिए बेहतर संतुलन बनाने की प्रेरणा देता है। पढ़ाई, नौकरी, परिवार और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने जिस तरह अपने फैसले लिए, वह कई लोगों के लिए सीख बन गया है।

45 दिनों में कमाए पहले ₹2 लाख

डॉ. चारुल ने अपनी डिजिटल यात्रा शुरू करने के सिर्फ 45 दिनों के अंदर ₹2 लाख की कमाई कर ली। हालांकि, उनका यह फैसला सिर्फ पैसे के लिए नहीं था। इसके पीछे कई सालों की पढ़ाई, अस्पताल की लंबी ड्यूटी, मां बनने की जिम्मेदारियां, कानूनी लड़ाई और आर्मी अधिकारी पति के साथ बदलती परिस्थितियों का अनुभव था।

BDS के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष

चारुल ने प्राइवेट कॉलेज से बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (BDS) की पढ़ाई पूरी की थी। उन्हें उम्मीद थी कि मेडिकल क्षेत्र में कदम रखते ही आर्थिक स्थिरता मिल जाएगी, लेकिन नौकरी की शुरुआत में उन्हें हकीकत का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि इतने सालों की पढ़ाई और परिवार के खर्च के मुकाबले शुरुआती नौकरी में मिलने वाली सैलरी काफी कम थी। यही वह समय था जब उन्होंने अपने करियर को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू किया।

परिवार और समाज की उम्मीदों के बीच बनाई अपनी राह

परंपरागत परिवार से आने वाली चारुल पर बड़ी बेटी होने की जिम्मेदारियां भी थीं। उम्र बढ़ने के साथ परिवार में करियर से ज्यादा शादी की बातें होने लगी थीं। लेकिन उन्होंने अपने सपनों को पीछे नहीं छोड़ा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी।

दिल्ली के बड़े अस्पतालों में हासिल किया अनुभव

चारुल ने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल और वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज में नॉन-PG जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सेवाएं दीं। कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने NEET-PG परीक्षा पास की और लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से पीडियाट्रिक डेंटिस्ट्री में मास्टर्स किया।

मेहनत का मिला फल, सैलरी पहुंची ₹1.25 लाख तक

अपने मेडिकल करियर में चारुल ने लंबा सफर तय किया। जूनियर रेजिडेंट के तौर पर उनकी शुरुआती सैलरी करीब ₹92 हजार प्रति माह थी। मास्टर्स के दौरान यह लगभग ₹1 लाख तक पहुंच गई और सीनियर रेजिडेंट बनने के बाद उनकी कमाई करीब ₹1.25 लाख प्रति माह हो गई।

शादी, मां बनने और नौकरी के बीच बड़ी चुनौती

मेडिकल करियर आगे बढ़ रहा था, तभी निजी जिंदगी में नई जिम्मेदारियां आईं। चारुल ने एक भारतीय सेना अधिकारी से शादी की। पति की अलग-अलग जगहों पर पोस्टिंग के कारण दोनों को कई शहरों में रहना पड़ा।

मां बनने के दौरान भी उन्होंने अस्पताल की लंबी शिफ्ट पूरी की और नवजात बच्चे की देखभाल के साथ अपनी मेडिकल जिम्मेदारियां निभाईं।

मातृत्व अवकाश के लिए लड़ी कानूनी लड़ाई

सीनियर रेजिडेंसी के दौरान चारुल को बॉन्डेड डॉक्टरों के लिए मैटरनिटी लीव से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कानूनी लड़ाई जीत हासिल की।

इस अनुभव ने उनकी सोच बदल दी। उन्हें एहसास हुआ कि खुद का कुछ बनाना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना कितना जरूरी है।

मेडिकल करियर से डिजिटल बिजनेस तक का सफर

पति की लगातार आर्मी पोस्टिंग और दूर-दराज इलाकों में रहने की वजह से चारुल के लिए नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस जारी रखना मुश्किल हो गया। इसके बाद उन्होंने करीब छह महीने तक डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन बिजनेस को समझा।

जून 2025 में उन्होंने अपना डिजिटल वेंचर शुरू किया, जिसकी शुरुआत पर्सनल ब्रांडिंग और स्टोरीटेलिंग से हुई।

अब डॉक्टर से बनीं डिजिटल मेंटर

धीरे-धीरे क्लाइंट मिलने लगे और उनका ऑनलाइन काम बढ़ता गया। चारुल ने बताया कि डिजिटल बिजनेस से उनकी कमाई अब उनकी पुरानी डॉक्टर वाली सैलरी से भी आगे निकल चुकी है।

आज वह Charul’s Inner Circle के जरिए लोगों, खासकर महिलाओं और शुरुआती स्तर के लोगों को डिजिटल स्किल्स और पर्सनल ब्रांडिंग सिखा रही हैं।

महिलाओं को दिया खास संदेश

डॉ. चारुल का मानना है कि मां बनने के बाद महिलाओं के सपने खत्म नहीं होते, बल्कि उनकी सोच और लक्ष्य बदल सकते हैं। उनका कहना है कि अवसरों का इंतजार करने के बजाय खुद के लिए नए रास्ते बनाने चाहिए। उनकी कहानी दिखाती है कि सही समय पर लिया गया बदलाव जिंदगी की नई शुरुआत बन सकता है।

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