अस्मिता और हर्ष के एतिहासिक स्वर्ण पदक, जूडो में 3 पदक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन

हर्ष सिंह और अस्मिता डे ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को पहली बार जूडो कराटे में मेडल दिलवाया वह भी गोल्ड। अस्मिता कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में गोल्ड जीतने वाली पहली महिला जूडोका बनी वहीं इसके बाद हर्ष सिंह भी पहले पुरष जूडोका बने जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स  में गोल्ड जीता। इसके अलावा यामिनी ने भी 48.किग्रा वर्ग में सिल्वर मेडल जीता।

भारत ने जूडो में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीता जो 1990 के ऑकलैंड राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो के पदक खेल बनने के बाद भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

त्रिपुरा की 23 वर्षीय अस्मिता डे जूडो स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बन गई जिन्होंने 48 किग्रा से कम भार वर्ग में कनाडा की हेडी क्वाच को नाटकीय ‘गोल्डन स्कोर’ मुकाबले में हराकर खिताब जीता।

हर्ष सिंह राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले पुरूष खिलाड़ी बन गए जिन्होंने आस्ट्रेलिया के अनुभवी जोशुआ कैट्ज को हराकर पुरूषों के 60 किलो फाइनल में स्वर्ण पदक जीता ।

पहली बार इन खेलों में उतरे 23 वर्ष के हर्ष ने खिताब के प्रबल दावेदार माने जा रहे जूडोका के खिलाफ संयम खोये बिना जबर्दस्त खेल दिखाया । यामिनी काफी करीब से स्वर्ण पदक जीतने से चूक गईं और उन्हें महिलाओं के 57 किग्रा से कम भार वर्ग के ‘गोल्डन स्कोर’ तक पहुंचे फाइनल में इंग्लैंड की अनुभवी एसिल्या टॉपराक से हारकर रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

मेरे पापा मुझे बहुत सपोर्ट करते थे… गोल्ड जीतकर फूट-फूटकर रोईं अस्मिता डे और ऐसी इमोशनल बात कही कि आंखें हो जाएंगी नम

जुडोका अस्मिता डे कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने की खबर सबसे पहले उसी इंसान को बताना चाहती थीं, जिसे वे अब कभी नहीं बता सकती थीं। उनके पिता, जो साइकिल ठीक करके महीने में मुश्किल से 300 रुपये कमाते थे और त्रिपुरा के एक छोटे से गाँव में मिट्टी के घर में परिवार का गुजारा करते थे, सात महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक से गुजर गए थे।

शुक्रवार को, जब 23 साल की अस्मिता महिलाओं के 48kg कैटेगरी में कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय जुडोका बनीं, तो उन्हें लगा कि यह मेडल जितना उनका है, उतना ही उनके पिता का भी है। अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आंसू रोकते हुए अस्मिता ने कहा, “जब मेरे पिता गुजर गए, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है क्योंकि वही मेरा साथ देते थे।”

कुछ पल के लिए, जश्न के बीच उन पिता की यादें ताजा हो गईं जिन्होंने उनके सपने को तब से संजोया था जब वह भारत का सपना भी नहीं बना था। उन्होंने कहा, “मैं त्रिपुरा के एक बहुत छोटे से गांव से हूं। वहां लोग इतने बड़े सपने नहीं देखते। लेकिन पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया।”

पैसे की हमेशा तंगी रहती थी। उनके पिता गुजारे के लिए साइकिल ठीक करते थे और दिन में लगभग 300 रुपये कमाते थे, जिससे बस घर का खर्च चल पाता था। परिवार एक साधारण से मिट्टी के घर में रहता था, लेकिन उन्होंने कभी भी आर्थिक तंगी को अपनी बेटी के पसंदीदा खेल में रुकावट नहीं बनने दिया।

जब घुटने की चोट से उनका करियर खतरे में पड़ गया, तो पिता उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले गए, दवाइयां खरीदीं और अपनी क्षमता के अनुसार हर संभव कोशिश की ताकि वे दोबारा मैट पर लौट सकें। उन्होंने याद करते हुए कहा- वह मुझे इलाज के लिए दिल्ली लाए और दवाइयां खरीदीं।

पिछले साल दिसंबर में उनकी अचानक मौत से अस्मिता बुरी तरह टूट गई थीं। जो इंसान उनका सबसे बड़ा सपोर्टर और हमेशा हिम्मत बंधाने वाला था, वह अब नहीं रहा था और उन्हें लगा कि उनके साथ ही सबसे बड़े मंच पर मुकाबला करने का उनका सपना भी खत्म हो गया।

लेकिन जब अस्मिता इस दुख से उबरने की कोशिश कर रही थीं, तब उनकी मां ने चुपचाप अपने पति की जगह ले ली। अंतिम संस्कार के सिर्फ 10 दिन बाद ही उन्होंने अपनी बेटी से ट्रेनिंग पर लौटने के लिए कहा। उन्होंने अस्मिता से कहा, “अगर मैं तुम्हें आज रोकती हूं, तो तुम्हारे पिता को लगेगा कि मैं तुम्हारे सपने तोड़ रही हूं।”

अस्मिता ने अपना सामान बांधा और भोपाल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया सेंटर लौट गईं। कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले वह बहुत घबराई हुई थीं और कई रातें सो नहीं पाई थीं। उन्होंने बताया कि मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की है। इस मेडल से पहले, मैं भारत में सो नहीं पाती थी। मैं मुकाबलों के बारे में सोचकर जागती रहती थी। भले ही मेरा शरीर थका होता था, फिर भी मुझे नींद नहीं आती थी। मैं बेचैन महसूस करती थी और फिर सुबह 5:30 बजे ट्रेनिंग के लिए उठ जाती थी।” ग्लासगो पहुंचने के बाद भी घबराहट बनी रही।

“जब मैं यहां पहुंची, तो मुझे बहुत घबराहट हो रही थी कि क्या होगा। मैं बस यही सोचती रहती थी कि मुझे सबको हराना है और जीतना है।” यह पक्का इरादा ट्रेनिंग हॉल से आगे भी बना रहा। छोटी-छोटी खुशियां भी उस लक्ष्य की याद दिलाती थीं जिसे वह हासिल करना चाहती थीं।

उनके भाई की लाई हुई उनकी पसंदीदा मिठाई, ‘लौंग लत्ता’, घर पर फ्रिज में वैसी ही रखी रही। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं उसे फ्रिज में देखती थी और कई बार तो उसे खाने ही वाली थी, लेकिन फिर खुद को रोक लेती थी।” शुक्रवार को, हर त्याग का फल मिल गया। गोल्ड मेडल ने भारतीय जूडो के रिकॉर्ड बुक में नया इतिहास रच दिया।

CWG 2026: कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में मीराबाई चानू ने रचा इतिहास, जीता गोल्ड मेडल

Mirabai Chanu Commonwealth Games: ग्लासगो कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स 2026 में भारत को पहला गोल्ड मेडल मिल गया है। भारतीय स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने महिलाओं की 48 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन किया। उनके इस दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत को गोल्ड मेडल मिला। मीराबाई चानू ने 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसी के साथ उन्होंने भारत को इस सीजन का पहला गोल्ड मेडल भी दिलाया। शुरुआती स्नैच प्रयास में असफल रहने के बाद मीराबाई ने शानदार वापसी की और लगातार दो सफल लिफ्ट लगाते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के नए रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए।

मीराबाई चानू ने जीत गोल्ड मेडल

क्लीन एंड जर्क में मीराबाई चानू ने पहली कोशिश में 105 किलोग्राम वजन नहीं उठा सकीं, लेकिन दूसरी कोशिश में उन्होंने सफलतापूर्वक यह वजन उठाया। इस लिफ्ट के साथ उन्होंने एक और कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाया और अपना गोल्ड मेडल भी पक्का कर लिया। मीराबाई चानू ने स्नैच में 85 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 105 किलोग्राम वजन उठाकर कुल 190 किलोग्राम के साथ पहला स्थान हासिल किया। उनके शानदार प्रदर्शन से भारत को 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला स्वर्ण पदक मिला। इस जीत के साथ मीराबाई ने अपने करियर में एक और कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल जोड़ लिया। मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में सोना जीता।