आलिया भट्ट का सेल्फ हीलिंग मंत्र हुआ वायरल, मुश्किल वक्त में हर किसी के आ रहा काम!

जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कभी सब कुछ आसानी से चलता है, तो कभी अचानक ऐसी मुश्किलें सामने आ जाती हैं, जिनसे संभलना मुश्किल लगता है। ऐसे समय में अपने लोगों का साथ, अपने काम का मकसद और खुद पर भरोसा आगे बढ़ने की ताकत देता है। आलिया भट्ट की कही बात भी यही बताती है कि मुश्किल रास्ते से घबराने के बजाय आगे बढ़ते रहना चाहिए।

 

 

परिवार एक ताकत

मुश्किल समय में परिवार और अपने लोगों का साथ बहुत बड़ी ताकत बन सकता है। आलिया भट्ट ने बताया कि जब उनकी एनर्जी कम फील होती है, तो अपनी बेटी को देखकर उन्हें फिर से नई एनर्जी मिलती है। इसलिए परेशानी के समय खुद को अकेला रखने के बजाय अपनों के करीब रहना मन को सुकून दे सकता है।

 

 

अपने फैसले और जिम्मेदारियां

जिंदगी में कई जिम्मेदारियां ऐसी होती हैं जिन्हें खुद अपनी इच्छा से चुना जाता है। काम, परिवार, करियर या कोई नया सपना, हर चुनाव के साथ कुछ जिम्मेदारियां भी आती हैं। आलिया ने भी अपने एक्टर, प्रोड्यूसर, एंटरप्रेन्योर और मां बनने जैसे अलग-अलग रोल खुद चुने हैं। इसलिए शिकायत करने के बजाय याद रखें कि अपनी जिंदगी का फैसला खुद ही लिया गया था।

 

 

जिंदगी के उतार-चढ़ाव

जिंदगी का रास्ता हमेशा सीधा और आसान नहीं होता। कभी काम में परेशानी आती है, कभी रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते हैं और कभी अचानक ऐसी सिचुएशन बन जाती है जिसकी उम्मीद नहीं होती। इन मुश्किलों से हमेशा बच पाना संभव नहीं है। ऐसे समय में परेशानी के कारण रुकने के बजाय धीरे-धीरे रास्ता निकालकर आगे बढ़ना जरूरी होता है।

 

 

खुद पर भरोसा

मुश्किल समय में खुद पर भरोसा बनाए रखना बहुत जरूरी है। जब हालात सही नहीं होते, तब कई बार लगता है कि चीजें कभी ठीक नहीं होंगी। लेकिन ऐसे समय में अपने फैसलों और अपनी मेहनत पर विश्वास रखना चाहिए। छोटी-छोटी परेशानियों से घबराने के बजाय एक-एक कदम आगे बढ़ते रहना बेहतर होता है।

 

हिम्मत रखें

मुश्किल हालात में बार-बार यह सोचने से कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों हुआ, परेशानी कम नहीं होती। कोई अपना, कोई सपना या जिंदगी का कोई खास मकसद आगे बढ़ने की वजह बन सकता है। जब मन थकने लगे, तो खुद को संभालकर आगे बढ़ना जरूरी है।

 

 

जिंदगी में मुश्किल समय सभी के सामने आता है। ऐसे समय में घबराने के बजाय खुद को संभालना और आगे बढ़ते रहना जरूरी है। अपनों का साथ मुश्किल समय में हिम्मत देता है। हर चीज हमारे हिसाब से नहीं चल सकती, लेकिन परेशानी का सामना कैसे करना है, यह हमारे हाथ में होता है।

जब मन कहे कुछ गलत है तो रुककर जरूर सोचिए… Zomato के फाउंडर दीपिंदर गोयल ने बताया सफलता का ये मंत्र

दीपिंदर गोयल ज़ोमैटो के फाउंडर हैं। वे रिस्क लेने की क्षमता, एंटरप्रेन्योर वाली सोच और अपनी महत्वाकांक्षा के लिए जाने जाते हैं। उनकी सफलता का सफ़र बहुत दिलचस्प है। गोयल का जन्म पंजाब में हुआ था। मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर काम करने से पहले उन्होंने IIT दिल्ली से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वे अपनी कॉर्पोरेट नौकरी कर रहे थे, तभी उन्हें ज़ोमैटो बनाने का आइडिया आया। आखिरकार, ज़ोमैटो बनाने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। उनकी लीडरशिप क्वालिटी और ‘फ़र्स्ट मूवर एडवांटेज’ (सबसे पहले शुरुआत करने का फ़ायदा) का सही इस्तेमाल करने की क्षमता ने ही उन्हें आज एक ऐसा एंटरप्रेन्योर बनाया है जिसे हम आदर्श मानते हैं।

गोयल ने अक्सर लीडरशिप, फैसला लेने और इंस्टिंक्ट (अंतर्ज्ञान) के बारे में प्रैक्टिकल बातें शेयर की हैं। एक बार उन्होंने कहा था, “अपने इंस्टिंक्ट (अंदर की आवाज़) की अहमियत समझें—जब आपको लगे कि कुछ गड़बड़ है, तो उस पर गहराई से सोचें और फ़ैसला लेने में सिर्फ़ डेटा को ही हावी न होने दें।” यह वाकई एक दमदार बात है, आइए समझते हैं कि इसका असल मतलब क्या है।

इस कोट का क्या मतलब है?

आज की कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल दुनिया में, हमें सिर्फ़ नंबर, चार्ट और ठोस सबूतों पर भरोसा करना सिखाया जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि इंट्यूशन—यानी ‘गट फ़ीलिंग’ (अंदर की आवाज़)—असल में बरसों के सबकॉन्शियस ऑब्ज़र्वेशन (अवचेतन रूप से देखी-परखी बातें), पैटर्न पहचानने और असल ज़िंदगी के अनुभवों का नतीजा होती है। यह कोट हमें याद दिलाता है कि डेटा भले ही काम का हो, लेकिन उसे आपकी अंदर की आवाज़ को पूरी तरह दबाने नहीं देना चाहिए।

इसलिए, अगली बार जब आपको करियर के किसी फ़ैसले, बिज़नेस पार्टनरशिप या ज़िंदगी के किसी बड़े फ़ैसले को लेकर ज़बरदस्त हिचकिचाहट महसूस हो, तो उसे सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ न करें क्योंकि वह कागज़ पर अच्छा लग रहा है। रुकें और सोचें कि आपका इंस्टिंक्ट क्यों चेतावनी दे रहा है। ठोस तथ्यों और इंट्यूशन के बीच तालमेल बिठाने से आप ज़्यादा समझदारी भरे और सही फ़ैसले ले पाते हैं।

आज के समय में यह कितना प्रासंगिक है?

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो मेट्रिक्स और एनालिटिक्स से चलती है, जहां लोग अक्सर इंसानी समझ और असल ज़िंदगी की बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

प्रोफ़ेशनल्स अक्सर “एनालिसिस पैरालिसिस” (बहुत ज़्यादा विश्लेषण के कारण काम न कर पाना) का सामना करते हैं और ज़रूरी फ़ैसले लेने में देरी करते हैं क्योंकि वे और डेटा का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

एल्गोरिदम और नंबर इंसानी व्यवहार, टीम कल्चर या अंदरूनी भरोसे को नहीं समझ पाते।

तेज़ी से बदलते करियर और बिज़नेस में, 100% डेटा की पक्की जानकारी का इंतज़ार करने का मतलब हो सकता है कि आप ज़रूरी मौके गँवा दें या छिपे हुए जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दें।

लोग अक्सर खराब नौकरियों, बुरे रिश्तों या नाकाम हो रहे प्रोजेक्ट्स में बने रहते हैं क्योंकि स्प्रेडशीट कहती है कि सब ठीक है, जबकि उनका मन कुछ और ही कहता है।

इस कोट (कथन) से मिलने वाली सीख

अंतर्ज्ञान कोई जादू नहीं है। यह आपके अवचेतन मन द्वारा पुराने अनुभवों को असल समय में प्रोसेस करने की प्रक्रिया है।

डेटा आपको तथ्य देता है, लेकिन अंतर्ज्ञान आपको संदर्भ और भविष्य की समझ देता है।

मेट्रिक्स पर बहुत ज़्यादा निर्भरता आपको उन बारीक जोखिमों के प्रति अंधा बना सकती है जिन्हें आंकड़े नहीं पकड़ पाते।

महान नेता अनिश्चित या अनजान स्थितियों का सामना करते समय अपनी सहज समझ (instincts) पर भरोसा करते हैं।

अपनी मज़बूत अंदरूनी भावना (gut feeling) के खिलाफ़ लिया गया फ़ैसला अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है।

इस बात को मानने के लिए कुछ टिप्स

जब कोई बड़ा फ़ैसला लेना हो, तो डेटा क्या कहता है उसे लिखें, और फिर आपका मन (अंतर्मन) क्या कह रहा है, उसे भी लिखें।

अगर किसी प्रोजेक्ट या डील के आंकड़े अच्छे होने के बावजूद आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो कोई भी पक्का फ़ैसला लेने से पहले रुकें और गहराई से जाँच-पड़ताल करें।

खुद पर भरोसा बढ़ाने के लिए रोज़मर्रा के छोटे-मोटे फ़ैसलों में भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की आदत डालें।

सोचने के लिए कुछ शांत पल निकालकर घबराहट या डर को अपनी असली अंतर्दृष्टि (intuition) से अलग करें।

साफ़ चेतावनी के संकेतों या नैतिक शंकाओं को नज़रअंदाज़ करने के लिए डेटा का बहाना न बनाएँ।

औपचारिक रिपोर्ट और मेट्रिक्स के साथ-साथ अपने निजी अनुभव और व्यावहारिक समझ (street smarts) को भी महत्व दें।