भारत का बॉर्डर रेल प्रोजेक्ट! चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर 45000 करोड़ खर्च कर बिछेगा रेलवे का जाल

Indian Rail Border Project: बदलती रीजनल मोबिलिटी और रणनीतिक चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी स्ट्रैटिजिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की कोशिशों के तहत चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगती अपनी सीमाओं पर रेलवे नेटवर्क के विस्तार और अपग्रेडेशन के लिए लगभग ₹45000 करोड़ ($4.7 बिलियन) के निवेश की योजना बना रहा है। आने वाले 18 से 24 महीनों के भीतर लागू होने वाली यह परियोजना अगले दो वर्षों के लिए नियोजित कुल रेलवे इंफ्रा आउटले का करीब 22 फीसदी हिस्सा है।

इन सीमावर्ती राज्यों में बिछेगा रेलवे का जाल

रिपोर्ट के मुताबिक इस डेवलपमेंट से जुड़े लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस खर्च का इस्तेमाल देश के संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों में नई पटरियां बिछाने, नए प्लेटफॉर्म बनाने और नेटवर्क को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। इस योजना में पाकिस्तानी सीमा से लगते पश्चिमी राज्य पंजाब और राजस्थान, बांग्लादेश सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटे पश्चिम बंगाल और असम के रणनीतिक क्षेत्र, चीन सीमा के पास और सुदूर पर्वतीय क्षेत्र वाले हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं।

आपको बता दें कि ये नया प्लान भारत सरकार के सीमावर्ती क्षेत्रों में रेलवे नेटवर्क, पुल और सुरंगों बनाने के उस $3.4 बिलियन ($340 करोड़) के प्लान से भी बड़ा है, जिसकी जानकारी पहले सामने आई थी।

संवेदनशील सीमाओं पर बदलती रणनीतिक स्थितियां

सीमावर्ती कनेक्टिविटी पर भारत का ये फोकस तब सामने आया है जब पड़ोसी देशों के साथ संबंध नए फेज में आगे बढ़े हैं। 6 साल पहले हुई घातक झड़प के बाद चीन के साथ संबंधों में अब स्थिरता आई है। आपको बता दें कि पिछले साल पाकिस्तान के साथ एक ब्रीफ कॉन्फ्लिक्ट देखने को मिला था। इसके अलावा साल 2024 में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक उलटफेर ने भारत के पहले से स्थिर साझेदारी के संबंधों को जटिल बना दिया है।

नागरिक सुविधा के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स को मजबूती

इस भारी निवेश से डुअल यूजर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि ये सिविलियन रेलवे नेटवर्क होंगे जिनका इस्तेमाल आम नागरिकों की आवाजाही के लिए तो होगा ही, साथ ही आपात स्थिति में ये सैन्य लॉजिस्टिक्स को भी पूरा सहारा देंगे।

हिमालयी क्षेत्रों, सिलीगुड़ी कॉरिडोर और पूर्वोत्तर के राज्यों जैसी संवेदनशील सीमाओं तक उच्च क्षमता वाले, ऑल-वेदर रेल नेटवर्क को मजबूत करके ट्रूप मोबलाइजेशन टाइम को भी स्ट्रैटिजकली कम किया जा सकता है। इसके साथ ही रिजनल प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ यह अहम सप्लाई लाइन को भी सुरक्षित करता है।

सीमावर्ती बुनियादी ढांचे पर पीएम मोदी का जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संवेदनशील क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को लगातार प्राथमिकता दी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने इसे लेकर लगातार कदम उठाए हैं। पाकिस्तान सीमा के पास 1450 किलोमीटर नई सड़कें बनाई गई हैं। डोकलाम के करीब इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर है।

पिछले साल कश्मीर घाटी को बाकी भारत से जोड़ने वाले दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल का उद्घाटन किया गया। पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर भारत में लगभग 1700 किलोमीटर नई रेल लाइनें जोड़ी गई हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों के इस्तेमाल के लिए 1962 से निष्क्रिय पड़े एयरसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से सक्रिय किया गया है।

ये भी पढ़ें- Bankipur Bypoll Result 2026: बिहार में आज होगा ऐतिहासिक सियासी उलटफेर? बांकीपुर उपचुनाव में बुलेट ट्रेन की रफ्तार में भाग रहे प्रशांत किशोर

चीन की ओर से भी जारी है निर्माण

रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी तरफ चीन ने भी 2017 में डोकलाम में हुए सैन्य गतिरोध के बाद से अपनी ओर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण काफी तेज कर दिया है। चीन अपनी सीमा में एयरपोर्ट और हेलीपोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है। चीन के इस विस्तार ने उपकरण और सैनिकों की तेजी से आवाजाही के जरिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की लॉजिस्टिक्स क्षमताओं को बढ़ाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अभी भारत के रेल मंत्रालय की ओर से इस निवेश योजना पर कोई आधिकारिक बयान या टिप्पणी नहीं आई है।

पटरियों पर किसी के लिए धड़कती जिंदगी को लेकर दौड़ी ट्रेन! पहली बार वंदे भारत ट्रेन से पहुंचाया गया लाइव डोनर हार्ट

भारतीय रेलवे ने स्वास्थ्य सेवा और मानव जीवन को बचाने के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान बना दिया है। भारत में पहली बार ट्रेन के जरिए एक लाइव डोनर हार्ट एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाया गया है। इस लाइफसेविंग मिशन को मुंबई सेंट्रल-गांधीनगर कैपिटल वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिए अंजाम दिया गया। दिल को सूरत से अहमदाबाद लाया गया। यूएन मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर अहमदाबाद में ट्रांप्लांट के लिए इसके सफलतापूर्वक डिलिवर किया गया है।

तालमेल और ग्रीन कॉरिडोर से पूरा हुआ ये मिशन

आपको बता दें कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक टाइम बाउंड वाली सेंसटिव प्रक्रिया है। इसमें एक-एक मिनट की कीमत होती है। इस ऑपरेशन के लिए भारतीय रेलवे, रेलवे सुरक्षा बल (RPF), गुजरात राज्य पुलिस और चिकित्सा टीमों के बीच सटीक योजना और बिना किसी ब्रेक के कोऑर्डिनेशन की जरूरत थी। ट्रांसप्लांट प्रक्रिया बिना किसी देरी के शुरू हो सके, इसके लिए रेलवे सुरक्षा बल और गुजरात पुलिस द्वारा अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 से यूएन मेहता अस्पताल तक एक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर अहमदाबाद के मंडल रेल प्रबंधक (DRM) वेद प्रकाश ने कहा कि यह भारतीय रेलवे के लिए बेहद गर्व और संतोष का क्षण है। वंदे भारत एक्सप्रेस के माध्यम से सूरत से अहमदाबाद तक लाइव डोनर हार्ट का सफल परिवहन पारंपरिक यात्री और माल ढुलाई से आगे बढ़कर समाज की सेवा करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे जीवनरक्षक मिशनों में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। भारतीय रेलवे, आरपीएफ, गुजरात राज्य पुलिस और मेडिकल टीमों के बीच उत्कृष्ट समन्वय ने इस मिशन की सफलता सुनिश्चित की। मानव जीवन को बचाने में योगदान देना न सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है बल्कि सेवा और मानवता के प्रति हमारा सर्वोच्च कर्तव्य भी है।

इस सफलता ने वंदे भारत एक्सप्रेस की गति, समय की पाबंदी और विश्वसनीयता को एक बार फिर साबित कर दिया है। यह मिशन दिखाता है कि कैसे देश का आधुनिक रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के आपातकालीन स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारतीय रेलवे ने इस चुनौतीपूर्ण मिशन को सफल बनाने के लिए रेलवे सुरक्षा बल, गुजरात पुलिस, डॉक्टरों, अंग प्रत्यारोपण समन्वयकों और रेलवे अधिकारियों सभी के प्रयासों की तारीफ की है।

यह भी पढ़ें: IB अधिकारी हत्या मामले में ताहिर हुसैन समेत 5 दोषियों को उम्रकैद, कोर्ट ने कहा- ‘शव को जानवर की तरह घसीटा गया’

वंदे भारत की रफ्तार से दौड़ी पहली फ्रेट ट्रेन, 145 kmph की स्पीड छूकर बनाया नया रिकॉर्ड

भारत अपने रेलवे फ्रेट नेटवर्क को आधुनिक बनाने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गया है। देश की पहली वंदे भारत प्लेटफॉर्म-बेस्ड फ्रेट इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (EMU) ने राजस्थान के कोटा डिवीजन में टेक्निकल ट्रायल का पहला दिन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इस दौरान इस हाई-स्पीड फ्रेट ट्रेन ने 145 किमी/घंटा की टॉप स्पीड हासिल की, जो भारतीय रेलवे के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

16-कोच वाले इस प्रोटोटाइप ट्रेन को चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) ने वंदे भारत प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके तैयार किया है। इसे सामान को पहले से ज्यादा तेज और बेहतर तरीके से पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है, खासकर उन सेक्टरों के लिए जिन्हें तेजी से डिलीवरी की जरूरत होती है, जैसे कि ई-कॉमर्स, पार्सल सर्विस और कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स।

ट्रेन 145 kmph की टॉप स्पीड तक पहुंची

यह ट्रायल ‘रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन’ (RDSO) की ओर से कोटा-नागदा-सवाई माधोपुर हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर किया जा रहा है, जो इंडियन रेलवे के सबसे एडवांस्ड टेस्टिंग रूट्स में से एक है।

कोटा डिवीजन के सीनियर डिवीजनल कमर्शियल मैनेजर सौरभ जैन के अनुसार, मालगाड़ी बुधवार सुबह 6 बजे कोटा से रवाना हुई और महिदपुर रोड तक गई। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे पहले कोटा-महिदपुर रोड सेक्शन पर 120 kmph की रफ्तार से बिना रिकॉर्डिंग वाले टेस्ट किए गए।

बाद में ट्रेन ने महिदपुर रोड और भवानी मंडी के बीच 120 kmph और 135 kmph की रफ्तार से ट्रायल रन पूरे किए। कोटा लौटते समय इसने 145 kmph की अधिकतम रफ्तार हासिल की, जो ट्रायल के पहले दिन दर्ज की गई सबसे ज्यादा रफ्तार थी।

अधिकारियों ने बताया कि टेस्टिंग के दौरान ट्रेन हर दिन कम से कम दो राउंड ट्रिप करेगी।

एक महीने तक चलेगा ट्रायल, परफॉर्मेंस और सुरक्षा की होगी जांच

कमर्शियल इस्तेमाल के लिए मंज़ूरी मिलने से पहले प्रोटोटाइप का एक महीने तक टेस्टिंग प्रोग्राम चलेगा। इन टेस्ट में ट्रेन की परफॉर्मेंस को 120, 130, 140 और 145 kmph की स्पीड पर, लोड के साथ और बिना लोड के, परखा जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इंजीनियर इमरजेंसी ब्रेकिंग डिस्टेंस, ट्रैक्शन, ब्रेकिंग क्षमता, रीजेनरेटिव एनर्जी परफॉर्मेंस, कपलर की मजबूती और घुमावदार रास्तों पर ट्रेन के व्यवहार की भी जांच करेंगे।

इसके अलावा, ट्रेन के सिग्नल और टेलीकम्युनिकेशन इंटरफेरेंस टेस्ट, PAPIS वेरिफिकेशन, दरवाजों के कामकाज की जांच और सुरक्षा से जुड़ी जांच भी की जाएगी।

इसके साथ ही लाइटिंग सिस्टम, CCTV कैमरे, अंदर के इक्विपमेंट और इलेक्ट्रिकल प्रोटेक्शन सिस्टम पर भी स्टैटिक टेस्ट किए जाएंगे।

तेजी से सामान पहुंचाने के लिए डिजाइन की गई

वंदे भारत फ्रेट EMU को खास तौर पर ऐसे सामान की तेज रफ्तार से ढुलाई के लिए डिजाइन किया गया है, जिसे जल्दी पहुंचाने की जरूरत होती है। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, इससे एक्सप्रेस पार्सल सर्विस, ई-कॉमर्स, रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट और समय पर निर्भर लॉजिस्टिक्स जैसे उद्योगों को फायदा होने की उम्मीद है।

16-कोच वाली इस ट्रेन में दो रेफ्रिजरेटेड DTC कोच, दो नॉन-ड्राइविंग ट्रेलर कोच और 12 पार्सल कोच शामिल हैं। बता दें कि इसकी पेलोड क्षमता 397 टन से ज्यादा है और XL लोड 20 टन से अधिक है।

यह ट्रेन, वंदे भारत बोगी सिस्टम, आधुनिक ब्रेकिंग और प्रोपल्शन सिस्टम, रेफ्रिजरेटेड स्टोरेज सुविधा, फोर्स्ड वेंटिलेशन और सामान को आसानी से लोड और अनलोड करने के लिए न्यूमैटिक रिट्रैक्टेबल रोलर फ्लोरिंग से लैस है।

इसमें एडवांस्ड सेफ्टी फीचर्स दिए गए हैं

इस मालगाड़ी में कई मॉडर्न सेफ्टी फीचर्स भी हैं। इसमें ऑपरेशनल सेफ्टी को बेहतर बनाने के लिए ‘कवच’ (KAVACH) ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम लगाया गया है।

सेफ्टी को और मजबूत बनाने के लिए ट्रेन के सभी दरवाजे 5 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा स्पीड होने पर अपने आप लॉक हो जाते हैं। इसके अलावा, जब तक ट्रेन के सभी दरवाजे ठीक से बंद और लॉक नहीं हो जाते, तब तक ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकती। इससे सफर के दौरान सुरक्षा का स्तर और बेहतर होगा।

यह भी पढ़ें: 12 साल में 88% घटे ट्रेन हादसे! आखिर भारतीय रेलवे ने ऐसा क्या किया कि रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ी सुरक्षा?

कोलकाता पोर्ट से डायरेक्ट बिराटनगर! भारत से पहली बार नेपाल पहुंची 40 वैगन की कंटेनर मालगाड़ी, जानिए इसमें क्या है खास

भारतीय रेलवे ने भारत और नेपाल के बीच माल ढुलाई और सीमा पार व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। कोलकाता पोर्ट से नेपाल के बिराटनगर कस्टम्स यार्ड के लिए पहली बार सीधी व्यावसायिक कंटेनर मालगाड़ी का सफल संचालन किया गया है। कैनोला (Canola) यानी सफेद सरसों की खेप लेकर निकली 40 वैगनों की यह मालगाड़ी संशोधित भारत-नेपाल रेल ट्रांजिट प्रोटोकॉल के तहत अपनी यात्रा पूरी कर नेपाल पहुंची। यह कदम दोनों पड़ोसी देशों के बीच रेल-आधारित सीमा पार माल परिवहन के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

बिना किसी ट्रांसशिपमेंट के सीधी पहुंचेगी मालगाड़ी

इस सफल संचालन के बाद अब कोलकाता पोर्ट से बिराटनगर तक कंटेनरीकृत कार्गो की सीधी रेल आवाजाही संभव हो गई है। पहले सीमा पर सामान को उतारने और चढ़ाने की आवश्यकता होती थी, जो अब पूरी तरह समाप्त हो गई है। इस नई व्यवस्था से माल ढुलाई के समय, लॉजिस्टिक्स लागत और कार्गो हैंडलिंग में भारी कमी आएगी। सीधे रेल संपर्क से सीमा पार व्यापार अधिक कुशल, विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी बनेगा।

जून 2023 में हुआ था रेल लिंक का उद्घाटन

इस ऐतिहासिक उपलब्धि की नींव भारत और नेपाल के बीच बिछाए गए ब्रॉड-गेज रेल नेटवर्क से जुड़ी है। भारत के जोगबनी से नेपाल के बिराटनगर के बीच ब्रॉड-गेज रेल लिंक का उद्घाटन जून 2023 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इसके बाद नवंबर 2025 में संशोधित लेटर ऑफ एक्सचेंज (LoE) पर हस्ताक्षर किए गए। इसी समझौते के आधार पर अब बिराटनगर के लिए सीधी व्यावसायिक रेल सेवा औपचारिक रूप से शुरू हो गई है जिससे द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर खुल गए हैं।

व्यापार जगत, उद्योग और पर्यावरण को मिलेगा बड़ा फायदा

सीधी रेल मालगाड़ी सेवा से आयात और निर्यात दोनों तरह के कार्गो की आवाजाही को बड़ा बढ़ावा मिलेगा। यह परिवहन का एक तेज, अधिक किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर माध्यम साबित होगा। सप्लाई चेन में कई हैंडलिंग पॉइंट्स के कम होने से निर्यातकों, आयातकों, लॉजिस्टिक्स ऑपरेटरों और सीमा पार व्यापार में लगे उद्योगों को सीधा फायदा मिलेगा। इसके अलावा सड़क परिवहन की तुलना में यह एक हरित और अधिक भरोसेमंद विकल्प प्रदान करेगा।

अंतरराष्ट्रीय रेल कनेक्टिविटी बढ़ाने पर भारतीय रेलवे का जोर

यह उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेल कनेक्टिविटी का विस्तार करने और लॉजिस्टिक्स को मजबूत करने के लिए भारतीय रेलवे की ओर से लगातार किए जा रहे प्रयासों को भी दिखाती है। आधुनिक परिवहन बुनियादी ढांचे के माध्यम से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने के विजन को भी इससे मजबूती मिली है।

भारतीय रेलवे का सबसे लग्जरी कोच देखकर फ्लाइट भूल जाओगे! चलता-फिरता 5 स्टार होटल है

आप रातभर ट्रेन में सफर करते हैं और चाहते हैं कि जर्नी आरामदायक होने के साथ लग्जरी भी लगे, तो मुंबई-बेंगलुरु (Mumbai-Bengaluru) वंदे भारत स्लीपर ट्रेन (Vande Bharat Sleeper train) आपके लिए खास हो सकती है। इसका फर्स्ट AC कोच मॉडर्न डिजाइन, प्राइवेसी और प्रीमियम सुविधाओं के साथ तैयार किया गया है, जिसकी पहली झलक ने ही ट्रैवलर का ध्यान खींच लिया है:

First AC Cabin (फर्स्ट एसी केबिन)

This may contain: there is a small room with bunk beds and green carpeted flooring on the train

इस ट्रेन का फर्स्ट AC कोच सबसे बड़ा हाईलाइट माना जा रहा है। इसमें प्राइवेट केबिन (private cabin) दिए गए हैं, जिनमें स्लाइडिंग दरवाजे लगाए गए हैं। इससे पैसेंजर को पहले के मुकाबले ज्यादा प्राइवेसी और आराम मिल सकता है। केबिन का डिजाइन ऐसा रखा गया है कि सफर होटल (hotel-like travel) जैसा महसूस हो।

Premium Interior (प्रीमियम इंटीरियर)

Vande Bharat Sleeper: Luxurious Interiors Unveiled in India| sleeper vande bharat features| Vande Bharat trains

कोच के अंदर का इंटीरियर मॉडर्न और अट्रैक्टिव बनाया गया है। लकड़ी जैसी फिनिश, सॉफ्ट LED लाइटिंग और खूबसूरत कलर थीम इसे स्टैंडर्ड ट्रेन कोच से अलग बनाती है। पूरा माहौल शांत और आरामदायक रखने की कोशिश की गई है।

Comfortable Journey (आरामदायक सफर)

ट्रेन में आरामदायक बर्थ, मजबूत सीढ़ियां (sturdy ladder) और हर सीट के पास चार्जिंग पॉइंट जैसी सुविधाएं दी गई हैं। लंबी दूरी (long-distance travel) की पैसेंजर को ध्यान में रखते हुए कोच को इस तरह डिजाइन किया गया है कि पैसेंजर आसानी से आराम कर सकें।

Smart Facilities (मॉडर्न सुविधाएं)

This may contain: the inside of a bus with beds and windows

इस वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में पैसेंजर इंफॉर्मेशन डिस्प्ले सिस्टम, मॉडर्न बायो-वैक्यूम टॉयलेट, बेहतर LED लाइटिंग, CCTV सुरक्षा और अन्य कई स्मार्ट सुविधाएं (smart feature) दी गई हैं। इनका उद्देश्य सफर (journey) को पहले से ज्यादा सुविधाजनक और सिक्योर बनाना है।

Better Overnight Travel (बेहतर ओवरनाइट यात्रा)

"</p

मुंबई (Mumbai) और बेंगलुरु (Bengaluru) के बीच रोज बड़ी संख्या में लोग सफर करते हैं। यह ट्रेन खासतौर पर रातभर की जर्नी को ज्यादा आरामदायक बनाने के लिए तैयार की गई है, ताकि पैसेंजर सुबह अपनी मंजिल पर फ्रेश होकर पहुंच सकें।

 

Ticket Booking (टिकट बुकिंग)

Concept train - Vande Bharat (sleeper version) Coming soon ...

फिलहाल मुंबई-बेंगलुरु वंदे भारत स्लीपर ट्रेन की कमर्शियल सेवा शुरू नहीं हुई है और टिकट बुकिंग भी अभी शुरू नहीं हुई है। सोशल मीडिया के वीडियो ने इसकी शानदार झलक दिखाकर पैसेंजर की उत्सुकता जरूर बढ़ा दी है।

Vande Bharat चलाने वाले पायलट की सैलरी जानकर रह जाएंगे हैरान, इतनी होती है महीने की कमाई!

वंदे भारत एक्सप्रेस सिर्फ अपनी रफ्तार और आधुनिक सुविधाओं के लिए ही नहीं, बल्कि इसे चलाने वाले लोको पायलटों की जिम्मेदारी और कौशल के लिए भी चर्चा में रहती है। देश की इस प्रीमियम ट्रेन को सुरक्षित तरीके से चलाने के लिए रेलवे अनुभवी और प्रशिक्षित लोको पायलटों का चयन करता है। यात्रियों को समय पर और सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने के पीछे इन पायलटों की अहम भूमिका होती है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि जिस ट्रेन को देश की सबसे खास ट्रेनों में गिना जाता है, उसे चलाने वाले लोको पायलट की कमाई कितनी होती है।

उनकी सैलरी सिर्फ बेसिक वेतन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई तरह के भत्तों और सुविधाओं के साथ उनकी मासिक आय काफी बढ़ जाती है। आइए जानते हैं वंदे भारत लोको पायलट की सैलरी और मिलने वाली सुविधाओं के बारे में।

वंदे भारत लोको पायलट की सैलरी कितनी होती है?

भारतीय रेलवे में वंदे भारत लोको पायलट के लिए अलग से कोई विशेष पे-स्केल तय नहीं है। आमतौर पर इस ट्रेन को चलाने वाले लोको पायलट 7वें वेतन आयोग के तहत लेवल-6 के अनुभवी कर्मचारी होते हैं। इनका बेसिक पे करीब ₹35,400 से शुरू होता है, लेकिन भत्तों और अन्य सुविधाओं को जोड़ने के बाद उनकी कुल आय काफी बढ़ जाती है। अनुभव और पोस्टिंग के आधार पर उनकी बेसिक सैलरी लगभग ₹56,000 से ₹60,000 तक पहुंच सकती है।

भत्तों से बढ़ जाती है लाखों तक कमाई

लोको पायलट की कमाई सिर्फ मूल वेतन तक सीमित नहीं होती। उन्हें कई तरह के सरकारी भत्ते मिलते हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • महंगाई भत्ता (DA)
  • मकान किराया भत्ता (HRA)
  • रनिंग अलाउंस
  • नाइट ड्यूटी अलाउंस
  • ट्रांसपोर्ट अलाउंस
  • मेडिकल सुविधाएं और अन्य सरकारी लाभ

इन सभी को मिलाकर वंदे भारत के अनुभवी लोको पायलट की मासिक आय करीब ₹90,000 से ₹1.30 लाख या इससे ज्यादा तक पहुंच सकती है।

वंदे भारत चलाने वालों को ज्यादा सुविधाएं क्यों मिलती हैं?

वंदे भारत जैसी हाई-स्पीड ट्रेन चलाना बेहद जिम्मेदारी वाला काम है। लोको पायलट को तेज रफ्तार के दौरान सिग्नल, ट्रैक की स्थिति, मौसम और सुरक्षा नियमों पर लगातार नजर रखनी पड़ती है। छोटी सी लापरवाही भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। इसी जिम्मेदारी को देखते हुए उन्हें रनिंग अलाउंस समेत कई अतिरिक्त लाभ दिए जाते हैं।

कैसे बनते हैं वंदे भारत के लोको पायलट?

कोई भी व्यक्ति सीधे वंदे भारत ट्रेन का ड्राइवर नहीं बन सकता। इसके लिए सबसे पहले रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) के जरिए असिस्टेंट लोको पायलट (ALP) के पद पर चयन होता है। इसके बाद वर्षों का अनुभव, विभागीय प्रमोशन, मेडिकल फिटनेस और विशेष तकनीकी प्रशिक्षण पूरा करने के बाद ही किसी लोको पायलट को वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेन चलाने का मौका मिलता है।

कितनी मुश्किल होती है लोको पायलट की नौकरी?

वंदे भारत के लोको पायलट का काम सिर्फ ट्रेन चलाना नहीं होता। उन्हें लंबे समय तक सतर्क रहकर ड्यूटी करनी पड़ती है। मौसम चाहे गर्मी का हो, सर्दी का या बारिश का, यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमेशा उनके कंधों पर रहती है। यही कारण है कि रेलवे इस जिम्मेदारी भरे पद के लिए अनुभवी और कुशल कर्मचारियों को ही चुनता है।

सैलरी के साथ मिलता है सम्मान भी

वंदे भारत ट्रेन चलाने वाले लोको पायलट की कमाई अनुभव, ड्यूटी घंटे, पोस्टिंग और मिलने वाले भत्तों के आधार पर बदलती रहती है। अच्छी सैलरी के साथ यह भारतीय रेलवे की सबसे जिम्मेदार और प्रतिष्ठित नौकरियों में से एक मानी जाती है।

NEET Protest में छाई ये ‘देसी मां’, पोस्टर पर लिखी एक लाइन पढ़कर इंटरनेट हुआ दीवाना

Indian Railways: AC कोच में 2 बेडशीट क्यों देता है? जानिए इसके पीछे की असली वजह

भारतीय रेलवे में AC कोच से सफर करने वाले यात्रियों को मिलने वाली बेडरोल किट में कई चीजें शामिल होती हैं, लेकिन एक बात अक्सर लोगों का ध्यान खींचती है दो बेडशीट। ज्यादातर यात्री इसे अतिरिक्त सुविधा मानते हैं, जबकि इसके पीछे एक खास वजह छिपी है। हाल ही में संसद में इस मुद्दे पर सवाल पूछे जाने के बाद रेलवे ने इसकी पूरी जानकारी दी। साथ ही लिनेन की सफाई, कंबलों के इस्तेमाल और यात्रियों की स्वच्छता से जुड़े नियमों पर भी स्थिति स्पष्ट की गई। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि रेलवे सिर्फ सफर को आरामदायक ही नहीं, बल्कि अधिक स्वच्छ और सुरक्षित बनाने के लिए भी कई व्यवस्थाएं अपनाता है।

बेडरोल किट में क्या-क्या मिलता है?

भारतीय रेलवे First AC, Second AC, Third AC और AC Economy में सफर करने वाले यात्रियों को टिकट के साथ बेडरोल किट उपलब्ध कराता है। इसकी अलग से कोई कीमत नहीं ली जाती क्योंकि इसका खर्च टिकट में शामिल होता है।

एक बेडरोल किट में आमतौर पर ये सामान मिलता है

  • 2 बेडशीट
  • 1 तकिए का कवर
  • 1 हैंड टॉवल
  • 1 कंबल

आखिर 2 बेडशीट क्यों दी जाती हैं?

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्यसभा में बताया कि दोनों बेडशीट का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्य के लिए होता है।

  • पहली बेडशीट सीट या बर्थ पर बिछाने के लिए होती है।
  • दूसरी बेडशीट कंबल के नीचे ओढ़ने से पहले इस्तेमाल की जाती है, ताकि कंबल सीधे यात्री के शरीर के संपर्क में न आए।

उन्होंने बताया कि यह अतिरिक्त बेडशीट स्वच्छता बनाए रखने के लिए दी जाती है और इसे हर इस्तेमाल के बाद धोया जाता है।

कंबल हर बार क्यों नहीं धोए जाते?

संसद में यह सवाल भी पूछा गया कि जब बेडशीट हर यात्रा के बाद धुलती है, तो ऊनी कंबलों को महीने में केवल एक बार ही क्यों साफ किया जाता है।

इसके जवाब में रेलवे ने बताया कि यात्रियों और कंबल के बीच अतिरिक्त बेडशीट का इस्तेमाल करने से सीधे संपर्क से बचाव होता है, जिससे स्वच्छता बेहतर बनी रहती है।

अब AI करेगा लिनेन की जांच

रेल मंत्री ने बताया कि रेलवे ने लिनेन की सफाई की गुणवत्ता जांचने के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।

  • सभी मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री में Whito-Meter से बेडशीट की सफाई जांची जाती है।
  • लॉन्ड्री की निगरानी के लिए CCTV कैमरे लगाए गए हैं।
  • पुणे, जयपुर और जोधपुर में AI Camera Stain Detection तकनीक का पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया गया है, जिससे बेडशीट पर बचे दाग की पहचान की जा सके।

किन ट्रेनों में शुरू हुई नई व्यवस्था?

रेलवे ने यात्रियों की सुविधा और स्वच्छता बढ़ाने के लिए फिलहाल कुछ ट्रेनों में कंबल कवर उपलब्ध कराने की शुरुआत की है।

यह सुविधा अभी North Western Railway की ट्रेनों और कामाख्या-हावड़ा वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू की गई है।

कब बदली जाती हैं बेडशीट और कंबल?

रेलवे के तय नियमों के अनुसार अलग-अलग लिनेन की एक निश्चित उपयोग अवधि होती है। समय पूरा होने या खराब होने पर इन्हें बदल दिया जाता है।

तकिए का कवर 9 महीने तक इस्तेमाल किया जाता है।

फेस टॉवल की निर्धारित अवधि भी 9 महीने है।

हैंडलूम बेडशीट को 12 महीने बाद बदल दिया जाता है।

Polyvastra (KVIC) बेडशीट की उपयोग अवधि 24 महीने तय है।

तकिए को 24 महीने तक इस्तेमाल किया जाता है।

वहीं, ऊनी कंबल भी सामान्य तौर पर 24 महीने की निर्धारित अवधि पूरी होने या खराब होने पर बदल दिए जाते हैं।

रेलवे का फोकस अब सफाई और आराम दोनों पर

भारतीय रेलवे का कहना है कि यात्रियों को साफ-सुथरा और सुरक्षित सफर देने के लिए लिनेन की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखी जा रही है। नई तकनीक, नियमित जांच और समय पर लिनेन बदलने जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर स्वच्छता और आराम उपलब्ध कराना है।

होटल की लिफ्ट में क्यों गायब होता है 13वां फ्लोर? जानें इस अजीब परंपरा के पीछे की कहानी

प्लेटफॉर्म टिकट से भी सस्ता! भारत की पहली हाईड्रोजन ट्रेन का किराया जानकर रह जाएंगे हैरान

भारत ने अपनी पहली हाइड्रोजन से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन शुरू करके ग्रीन रेल ट्रांसपोर्ट के एक नए दौर में कदम रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार, 17 जुलाई को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। यह सेवा क्लीन-एनर्जी टेक्नोलॉजी और इंडियन रेलवे नेटवर्क पर सबसे सस्ते टिकट दामों में से एक का मेल है।

नॉर्दर्न रेलवे के जींद-सोनीपत सेक्शन पर चलने वाली यह ट्रेन भारत को उन चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल करती है, जिन्होंने हाइड्रोजन से चलने वाली पैसेंजर रेल सर्विस शुरू की है। स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से विकसित इस प्रोजेक्ट का मकसद पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए साफ-सुथरे ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना है।

लॉन्च के बाद सबसे ज़्यादा चर्चा ट्रेन के किराए को लेकर हो रही है। कम से कम टिकट की कीमत 5 रुपये तय की गई है। जबकि ज़्यादा से ज़्यादा किराया 25 रुपये है। यह तय की गई दूरी पर निर्भर करता है। उद्घाटन सेवा में यात्रा करने वाले यात्रियों ने भी 5 रुपये वाले टिकट ही खरीदे। इसका शुरुआती किराया कई रेलवे स्टेशनों पर लगने वाले प्लेटफ़ॉर्म टिकट से भी कम है, जिससे यह सेवा भविष्य की तकनीक वाली और सस्ती दोनों बन जाती है।

किराये पर एक नज़र

• कम से कम किराया- ₹5

• ज़्यादा से ज़्यादा किराया- ₹25

• किराया इस पर निर्भर करता है- तय की गई दूरी

रूट, स्टॉप और यात्रियों की क्षमता

हाइड्रोजन से चलने वाली यह ट्रेन जींद जंक्शन और सोनीपत के बीच चलेगी और लगभग दो घंटे में करीब 90 किलोमीटर का सफ़र तय करेगी। इसे ज़्यादा से ज़्यादा 75 किमी/घंटा की रफ़्तार से चलाने की मंज़ूरी मिली है, जबकि इसकी डिज़ाइन स्पीड 110 किमी/घंटा है।

रूट पर पड़ने वाले स्टेशन

•जींद जंक्शन

•जींद सिटी

•पांडु पिंडारा

•ललित खेड़ा हॉल्ट

•भंभेवा

•ईसापुर खेड़ी हॉल्ट

•बुटाना हॉल्ट

•खांडराई हॉल्ट

•राबराह हॉल्ट

•लाठ

•मोहाना

•बरवासनी हॉल्ट

•सोनीपत

10 कोच वाली इस ट्रेन में लगभग 2,600 यात्री सफर कर सकते हैं और उम्मीद है कि यह इस रूट पर रोज़ाना यात्रा करने वालों के काम आएगी।

यह ट्रेन दूसरों से अलग क्यों है?

आम ट्रेनों के उलट, जो डीज़ल इंजन या ऊपर लगे तारों से मिलने वाली बिजली पर चलती हैं, यह ट्रेन हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल करके खुद ही बिजली बनाती है। फ्यूल सेल के अंदर, हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ मिलकर बिजली बनाती है। इस प्रक्रिया में बाई-प्रोडक्ट के तौर पर सिर्फ़ पानी की भाप और गर्मी निकलती है, जिससे यह ट्रांसपोर्ट का ज़ीरो-एमिशन (बिना प्रदूषण वाला) ज़रिया बन जाता है। इसे चलाने के लिए ज़रूरी हाइड्रोजन की सप्लाई जींद में बने एक खास प्लांट से की जाएगी।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की मुख्य विशेषताएं

• 10-कोच वाली हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित ट्रेन

• हाइड्रोजन से चलने वाली दो ड्राइविंग पावर कारें

• आठ ट्रेलर कोच और 1,200 kW का हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम

• लगभग 2,600 यात्रियों की क्षमता और अधिकतम ऑपरेशनल स्पीड 75 kmph

• डिज़ाइन स्पीड 110 kmph

• हाइड्रोजन लीक, धुआं, आग और ज़्यादा गर्म होने का पता लगाने के लिए एडवांस्ड सिस्टम

• बिना पारंपरिक ओवरहेड इलेक्ट्रिक तारों के चलती है

भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन सुविधा

इस प्रोजेक्ट के तहत जींद में भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन स्टोरेज और रीफ्यूलिंग सुविधा भी बनाई गई है। सरकार के अनुसार, इस सुविधा में लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर की जा सकती है और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माने जाने वाले सुरक्षा मानकों के अनुसार विकसित किया गया है। यात्रियों के लिए सेवा शुरू करने से पहले इसकी स्वतंत्र सुरक्षा जांच भी की गई है।

भारत ग्लोबल हाइड्रोजन रेल नेटवर्क में शामिल हुआ

इस सर्विस के शुरू होने के साथ ही, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने हाइड्रोजन से चलने वाली रेल टेक्नोलॉजी अपनाई है। जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, इटली, जापान, चीन और अमेरिका जैसे देशों में हाइड्रोजन ट्रेनें पहले से ही चल रही हैं या उनके ट्रायल चल रहे हैं। इस लॉन्च के साथ भारत उन देशों की लिस्ट में शामिल हो गया है जो अगली पीढ़ी के, कम प्रदूषण वाले रेलवे सिस्टम में निवेश कर रहे हैं।

हरियाणा के CM ने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने इस प्रोजेक्ट को देश की क्लीन एनर्जी यात्रा में एक बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि हाइड्रोजन ट्रेन ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ के विज़न को दिखाती है, साथ ही यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मज़बूत करती है और आर्थिक विकास में मदद करती है।

PM मोदी ने दूसरे बड़े प्रोजेक्ट्स भी लॉन्च किए

हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के साथ-साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ के तहत नए सिरे से तैयार किए गए जालंधर कैंट रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया और देश भर के 75 अपग्रेड किए गए रेलवे स्टेशनों को वर्चुअली देश को समर्पित किया।

उन्होंने अमृतसर और वाराणसी को जोड़ने वाली संत रविदास एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाई। चंडीगढ़ दौरे के दौरान, प्रधानमंत्री ने PGIMER में बड़े हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का उद्घाटन किया, जिसमें ‘एडवांस्ड मदर एंड चाइल्ड सेंटर’ भी शामिल है।