IND vs ENG: ‘शोर नहीं होगा तो मजा नहीं आएगा’, रिटायरमेंट की अफवाहों पर रोहित शर्मा ने तोड़ी चुप्पी

IND vs ENG: भारत और इंग्लैंड के बीच 3 मैचों की वनडे सीरीज को इंग्लैंड ने 2-1 से अपने नाम किया है। वहीं लॉर्ड्स में वनडे से पहले रोहित शर्मा के संन्यास को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। तीसरे मुकाबले में रोहित शर्मा ने 110 गेंदों में 138 रन की तूफानी पारी खेली है। वहीं मैच के बाद ने रोहित ने अपने रिटायरमेंट की खबरों रिएक्शन दिया है। जब रोहित से इन अफवाहों पर सवाल किया गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “शोर नहीं होगा तो मजा भी नहीं आएगा।”

भारत सीरीज हार गई लेकिन रोहित ने शानदार शतक जड़कर ये साफ कर दिया कि वह अभी वनडे क्रिकेट से विदाई लेने के मूड में नहीं हैं। टीम के लिए बड़ी पारियां खेलने का दम रखते हैं।

रिटायमेंट पर रोहित ने क्या कहा

रोहित ने BCCI.tv से कहा, “मेरा काम मेरे बल्ले से जवाब देना है। मैदान पर उतरकर देश का प्रतिनिधित्व करना ही मेरी जिम्मेदारी है और डेब्यू के दिन से मैं यही करता आ रहा हूं।” उन्होंने आगे कहा, “जब से मैंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू किया है, तब से मेरे बारे में बातें होती रही हैं और जब तक मैं खेलूंगा, यह सिलसिला चलता रहेगा। मुझे इन बातों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मेरे लिए सबसे अहम यह है कि मैं मैदान पर अच्छा प्रदर्शन करूं और टीम की जीत में अपना योगदान दूं।”

 

आलोचकों को दिया ये जवाब

रोहित शर्मा ने साफ किया कि वह आलोचनाओं और अफवाहों को किस तरह देखते हैं। रोहित शर्मा ने कहा, “जब शोर नहीं होता, तो मजा नहीं आता। मेरा काम मैदान के अंदर अपना खेल दिखाना है, जबकि बाहर क्या बातें होती हैं, वह लोगों का काम है। मैं हमेशा इसे इसी नज़रिए से देखता हूं।” रोहित शर्मा को लेकर आगे भी तरह-तरह की चर्चाएं और सवाल उठते रह सकते हैं, लेकिन लॉर्ड्स में उनकी शानदार बल्लेबाजी ने साफ कर दिया कि वह अभी भी भारतीय टीम के लिए बड़ी पारियां खेलने का दम रखते हैं

2027 वर्ल्ड कप जीतना है भारत का लक्ष्य

अब रोहित शर्मा का पूरा ध्यान वनडे क्रिकेट पर है और उनकी सबसे बड़ी मंजिल 2027 वनडे वर्ल्ड कप मानी जा रही है। 2023 वर्ल्ड कप फाइनल में मिली हार का दर्द आज भी उनके साथ जुड़ा हुआ है। उस हार के बाद वह काफी निराश हो गए थे और खुद को संभालने में उन्हें काफी समय लगा। रोहित शर्मा टी20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद टी20 से संन्यास ले लिया और फिर टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया। अब उनका पूरा फोकस सिर्फ वनडे क्रिकेट पर है। माना जा रहा है कि रोहित की सबसे बड़ी कोशिश 2027 वनडे वर्ल्ड कप में भारत को चैंपियन बनाना है, ताकि वह अपने करियर का सबसे बड़ा अधूरा सपना पूरा कर सकें।

रोहित ने खेली शानदार पारी

रोहित शर्मा ने अपनी फिटनेस पर भी काफी मेहनत की है। रोहित ने करीब 10 किलो वजन घटाया, जिससे साफ पता चलता है कि वह अभी भी लंबे समय तक भारतीय टीम के लिए खेलना चाहते हैं। 388 रन के मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते हुए रोहित शर्मा ने शानदार बल्लेबाजी का प्रदर्शन किया। उन्होंने शुरुआत में संभलकर खेला और फिर अपने आक्रामक अंदाज में इंग्लैंड के गेंदबाजों पर दबाव बना दिया। रोहित ने मैदान के चारों ओर बेहतरीन शॉट लगाए और तेजी से रन बटोरे। उन्होंने 125 से ज्यादा के स्ट्राइक रेट से 138 रन की शानदार पारी खेली, जिसमें 17 चौके और 5 छक्के शामिल रहे। उनकी यह पारी भारत की उम्मीदों को काफी देर तक जिंदा रखे रही, लेकिन बाद में वह जैकब बेथेल की गेंद पर आउट हो गए।

कार्डिफ में खेले गए दूसरे वनडे में भारत की हार के बाद रोहित शर्मा के वनडे क्रिकेट से रिटायरमेंट लेने की चर्चा काफी बढ़ गई थी। कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि, लॉर्ड्स वनडे उनके करियर का आखिरी मैच हो सकता है। वहीं, बीसीसीआई ने इन खबरों को गलत बताते हुए किसी भी तरह की रिटायरमेंट की बात से इनकार कर दिया था।

UltraTech Cement Q1 Results: मुनाफा 17% बढ़ा, रेवेन्यू रहा 16% ज्यादा; शेयर 2% उछला

आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनी अल्ट्राटेक सीमेंट का अप्रैल-जून 2026 तिमाही में शुद्ध कंसोलिडेटेड मुनाफा सालाना आधार पर लगभग 17 प्रतिशत बढ़ गया। आंकड़ा 2599.28 करोड़ रुपये रहा, जबकि एक साल पहले यह 2225.90 करोड़ रुपये था। ऑपरेशंस से कंसोलिडटेड रेवेन्यू 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 24648.20 करोड़ रुपये हो गया। जून 2025 तिमाही में यह 21275.45 करोड़ रुपये था।

कंपनी ने शेयर बाजारों को बताया है कि जून 2026 तिमाही में कुल खर्च बढ़कर 21286.19 करोड़ रुपये के रहे, जो एक साल पहले 18405.19 करोड़ रुपये के थे। जून 2026 के आखिर तक कंपनी में प्रमोटर्स के पास 59.33 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।

UltraTech Cement का मार्केट कैप 3.51 लाख करोड़ रुपये

20 जुलाई को अल्ट्राटेक सीमेंट के शेयरों में तेजी है। दिन में BSE पर कीमत पिछले बंद भाव से 2 प्रतिशत चढ़कर 12000 रुपये के हाई तक गई। कंपनी का मार्केट कैप 3.51 लाख करोड़ रुपये हो गया है। शेयर की फेस वैल्यू 10 रुपये है। शेयर का 52 सप्ताह का एडजस्टेड हाई 13,104 रुपये है। एडजस्टेड लो 10,329 रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Tata Punch crosses 8 lakh sales milestone

Tata Punch

The Tata Punch has crossed the 8 lakh domestic sales milestone, becoming the second SUV in Tata Motors’ current passenger vehicle line-up after the Nexon to do so. The figures include combined wholesales of the Punch petrol, CNG and Punch EV, as Tata Motors does not report separate dispatch numbers for its ICE and electric models. The milestone comes less than five months after the Punch crossed the 7 lakh sales mark in early February this year.

  1. Record 21,006 units dispatched in June 2026
  2. Available with petrol, CNG and electric powertrains

From its launch in October 2021 until the end of June 2026, Tata Motors dispatched 797,479 units of the Punch. The remaining 2,521 units needed to cross the 8 lakh mark were sold in the first few days of July.

Tata Punch sales
Fiscal yearUnitsYoY change
FY2022*52,716
FY20231,33,819154%
FY20241,70,07627%
FY20251,96,56716%
FY20261,83,980-6%
FY2027**60,32167%
Total7,97,479

*Launched on October 21, 2021
**April-June 2026

Tata Punch sales momentum 

The Punch recorded its highest-ever monthly wholesales of 21,006 units in June 2026 and was India’s best-selling SUV in the first quarter of FY2027, with 60,321 units dispatched. Monthly sales have exceeded the 20,000-unit mark three times since the model’s launch, with all three instances coming this year.

Between February and June 2026, the Punch added another 1 lakh sales, helped by monthly wholesales of 18,748 units in February, 20,977 in March, 19,107 in April, 20,208 in May and 21,006 in June.

Tata Punch facelift expands line-up

Tata Motors launched the updated Punch in January this year with exterior and interior changes, additional features and new powertrain options. The range now includes a 1.2-litre turbo-petrol engine, a CNG-AMT option and an updated Punch EV with revised battery options and a Battery-as-a-Service (BaaS) programme.

The Punch is currently offered with petrol, CNG and electric powertrains across 32 variants. Prices for the petrol range start at Rs 5.70 lakh, while the CNG version starts at Rs 6.80 lakh. The updated Punch EV is priced from Rs 9.69 lakh (all prices, ex-showroom).

Tata Punch becomes fastest compact SUV to 8 lakh sales

The Punch crossed 1 lakh wholesales just 10 months after launch in October 2021, reached 4 lakh in June 2024, 5 lakh in January 2025, 6 lakh in July 2025 and 7 lakh in early February 2026. The latest run from 7 lakh to 8 lakh has taken less than five months, making it the quickest 1 lakh sales milestone for the model so far.

According to Tata Motors’ sales data, the Punch has become the fastest compact SUV to cross 8 lakh domestic wholesales. The Maruti Brezza took around 80 months to reach the milestone, followed by the Hyundai Venue at 85 months and the Tata Nexon at 89 months, while the Punch achieved it in a little over 57 months from launch.

With inputs from Dhruv Dhaka

Tata Harrier vs MG Hector petrol automatic: Real world mileage compared

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic mileage comparison

Since its introduction in 2019, the MG Hector has been available with a turbo-petrol engine with manual and CVT automatic transmissions. However, it wasn’t until January 2026 that Tata Motors equipped the Harrier with a turbo-petrol engine. Where MG offers the Hector in 7-seater configurations, the Tata Harrier petrol only offers seating for 5 occupants. That said, let’s find out which SUV delivers better fuel economy.

Explore full specs, features and a price breakdown in our Harrier vs Hector comparison.

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Specifications

The Harrier petrol has the clear power advantage over the equivalent Hector

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Specifications

 

Tata Harrier

MG Hector

Engine

4 cyl, petrol

4 cyl, petrol

Displacement (cc)

1498

1451

Power (hp)

170 (5,000rpm)

143 (5,200rpm)

Torque (Nm)

280 (1,750-3,500rpm)

250 (3,000rpm)

Gearbox

6-speed automatic

Continuously variable transmission

Fuel tank (litres)

50

60

While both SUVs are powered by 1.5-litre direct-injection turbo-petrol engines, the Harrier’s unit is ever so slightly bigger (by 47cc). It backs up this size advantage by developing 27hp and 30Nm more than the engine under the MG Hector’s bonnet. The Tata Harrier’s higher torque output is also available across a wide RPM band, with peak power coming in at 200rpm lower in the engine’s rev range when compared to the Hector.

A key differentiator here is that the Tata Harrier petrol is paired with a 6-speed torque converter automatic gearbox, while the MG Hector makes use of a CVT (continuously variable transmission). The latter also features a bigger fuel tank, holding 10 litres more petrol.

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Real-world fuel efficiency

The Hector’s more efficient in the city, but the Harrier manages a higher average economy

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Real-world mileage

 

Tata Harrier

MG Hector

Tested city mileage (kpl)

6.17

8.30

Tested highway mileage (kpl)

12.49

9.60

Tested average mileage (kpl)

9.33

8.95

During our time testing it in the real world, the MG Hector’s mileage figures remained in the single digits. In the city, the Hector turbo-petrol turned out to be 2.13kpl more frugal than the Tata Harrier. Out on the open highway, it was the Tata Harrier turbo-petrol that fared better by achieving a fuel economy in the double digits – it was 2.89kpl higher than the Hector.

A wider peak torque spread of the Tata SUV means that its engine is less stressed at higher speeds, one of the factors explaining its better mileage on the highway. On the other hand, if a majority of your drives are in a city environment, The Hector’s CVT gearbox helps it sip less fuel in the city, given this design’s inherent efficiency advantages at lower speeds. Unfortunately, the MG SUV’s average mileage is lower than the Harrier’s despite its lower kerb weight and the CVT. Both cars get an Eco drive mode, but neither features an automatic engine stop-start system.

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Prices

Tata Harrier vs MG Hector turbo-petrol automatic: Prices

 

Tata Harrier

MG Hector

Price range (in Rs, lakh)

17.70-24.25

17.00-20.00

There are six trim levels of the Tata Harrier petrol with the automatic gearbox, and all of them are priced higher than their MG Hector counterparts. At the bottom end, the Hector CVT is Rs 70,000 cheaper than the entry-level Harrier petrol automatic. For those wishing to get all the bells & whistles that are only available in the range-topping trims of each SUV, the top-end Hector CVT is Rs 4.25 lakh less expensive than its equivalent Tata Harrier petrol variant.

Autocar India’s fuel efficiency testing

Before our real-world fuel efficiency tests, we fill our test cars’ tanks to the brim and maintain tyre pressures based on the manufacturer’s recommendations. These cars are driven in fixed city and highway loops in and around Navi Mumbai, and we maintain certain average speeds. Throughout the tests, there is only one person in each car, running the air conditioner and other electricals, such as the audio system, indicators and wipers, when required, just like a regular user would. Periodic driver swaps further neutralise variations in driver patterns. At the end of each cycle, we calculate efficiency by filling the tanks to full again.

Prices are ex-showroom, India.

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मार्केट कर रहा नए बुल रन की तैयारी! दिग्गज निवेशक शंकर शर्मा की बड़ी भविष्यवाणी, जानें कब तक आएगी तेजी

Shankar Sharma Stock Market Outlook: भारतीय शेयर बाजार में पिछले दो दशकों में निवेशकों ने जिस तरह छप्परफाड़ कमाई की है, अब उन्हें अपनी उम्मीदों को थोड़ा कम करने की जरूरत है। ऐसा मानना है दिग्गज निवेशक शंकर शर्मा का। उन्होंने ये भी कहा कि, भारत में अगला बड़ा और मजबूत बुल मार्केट आने में अभी कम से कम एक से दो साल का वक्त लग सकता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अगला बुल रन पिछले रिकॉर्ड्स के मुकाबले काफी धीमी रफ्तार वाला होगा और इससे मिलने वाला रिटर्न भी काफी कम रहेगा।

मनीकंट्रोल की सीनियर कॉरेस्पोंडेंट जोया स्प्रिंगवाला को दिए एक इंटरव्यू में शंकर शर्मा ने बताया कि देश की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार का आकार अब इतना बड़ा हो चुका है कि पहले जैसी तूफानी रफ्तार को बरकरार रखना नामुमकिन है। आइए जानते हैं शंकर शर्मा ने मार्केट को लेकर और क्या-क्या कहा।

अब केवल 8-10% रिटर्न की ही उम्मीद रखें निवेशक

शंकर शर्मा ने साफ तौर पर कहा कि आने वाले समय में निवेशकों को अपने रिटर्न के नजरिए को बदलना होगा। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि अगले एक-दो सालों में हमें बाजार में एक ठोस बुल रैली देखने को मिलेगी। लेकिन लोगों को यह समझना होगा कि लंबी अवधि के रिटर्न का स्तर अब नीचे खिसक चुका है। भारत अब उस तरह का रिटर्न नहीं देगा जो हमारी पीढ़ी ने कमाया है।’

जहां पिछले दो दशकों में भारतीय निवेशकों को औसतन 14-15% का सालाना रिटर्न मिलने की आदत हो चुकी है, वहीं शंकर शर्मा के मुताबिक अब लंबी अवधि में 8-10% का सालाना रिटर्न ही मिलने की उम्मीद करनी चाहिए।

शंकर शर्मा की ‘1.6 बुल मार्केट्स’ थ्योरी क्या है?

शर्मा ने बाजार के इतिहास का विश्लेषण करते हुए अपनी ‘1.6 बुल मार्केट्स’ थ्योरी समझाई। उनके मुताबिक, 1991 के उदारीकरण के बाद भारत ने केवल एक बार पूरी तरह से टिकाऊ और बड़ा बुल मार्केट देखा है, जो 2003 से 2007 के बीच आया था। उन्होंने हर्षद मेहता वाले दौर को मार्केट की एक स्वाभाविक रैली नहीं माना।

साल 2003-2007 के बुल रन में निफ्टी ने करीब 55% का सालाना रिटर्न दिया था। इसके मुकाबले कोरोना महामारी के बाद आए उछाल में निफ्टी ने लगभग 31% का रिटर्न दिया, जो पिछले बार से 40% कम था। उनके अनुसार, अगला बुल मार्केट इससे भी निचले स्तर पर रहेगा।

क्यों धीमी होगी बाजार की रफ्तार?

शंकर शर्मा का मानना है कि इस मंदी या कम रिटर्न का कारण वैश्विक राजनीति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या ब्याज दरें नहीं हैं, बल्कि इसका असली कारण भारत की ‘स्केल’ है। भारत अब 4 से 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है। इस आकार पर सिर्फ अपनी जगह बने रहने के लिए भी हर साल जीडीपी में सैकड़ों अरब डॉलर जोड़ने पड़ते हैं। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएं बड़ी होती हैं, उनकी ग्रोथ स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है।

उन्होंने एचडीएफसी बैंक और इन्फोसिस जैसी बड़ी कंपनियों का उदाहरण देते हुए कहा, ‘आज कोई भी एचडीएफसी बैंक से 35-40% की रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद नहीं करता, क्योंकि यह बहुत बड़ा हो चुका है। देशों की अर्थव्यवस्था भी ठीक इसी तरह काम करती है।’

लार्ज-कैप के मुकाबले स्मॉल-कैप पर बड़ा दांव

शंकर शर्मा का मानना है कि भविष्य में जब भी अगला बुल मार्केट आएगा, उसकी अगुवाई आज के मुख्य सूचकांकों में शामिल दिग्गज लार्ज-कैप (Blue-chip) शेयर नहीं करेंगे। मेन इंडेक्स की मैच्योर हो चुकी कंपनियों के मुकाबले छोटी कंपनियों (Small-caps) में अर्निंग ग्रोथ और वेल्थ क्रिएशन की गुंजाइश कहीं ज्यादा है।

शंकर शर्मा ने कहां लगाया है पैसा?

अपने इसी भरोसे के चलते शंकर शर्मा ने खुद ₹100-200 करोड़ का निवेश स्मॉल-कैप कंपनियों में किया है। उन्होंने विशेष रूप से भारत के टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा-सेंटर इकोसिस्टम से जुड़े सेक्टर्स को चुना है, क्योंकि ये सेक्टर्स अभी अपने ग्रोथ साइकिल के शुरुआती चरण में हैं।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

Market Correction vs SIP: मार्केट क्रैश का इंतजार पड़ सकता है भारी! जानें क्यों एक्सपर्ट्स दे रहे हैं हर महीने SIP की सलाह

Market Crash Timing vs SIP Strategy: हर निवेशक के मन में कभी न कभी यह विचार जरूर आता है कि ‘जब मार्केट गिरेगा, तब पैसा लगाऊंगा’। सुनने में यह रणनीति बहुत समझदारी भरी लगती है कम कीमत पर खरीदो और बंपर मुनाफा कमाओ। लेकिन शेयर बाजार की सबसे बड़ी हकीकत यह है कि बाजार कभी ढिंढोरा पीटकर नहीं गिरता और न ही बढ़ता है।

भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर लगातार जारी है। ऐसे में निवेशकों के बीच एक पुरानी बहस फिर से छिड़ गई है क्या हर महीने SIP के जरिए निवेश करनी चाहिए, या फिर कैश बचाकर रखना चाहिए और बाजार में बड़ी गिरावट आने पर ही एकमुश्त पैसा लगाना चाहिए? आइए इसे समझते हैं।

बीते वक्त को देखना आसान है, बॉटम पकड़ना नामुमकिन

हर कोई चाहता है कि वह बाजार के बिल्कुल निचले स्तर यानी बॉटम पर शेयर या म्यूचुअल फंड खरीदे। लेकिन दिक्कत यह है कि जब बाजार गिर रहा होता है, तब कोई नहीं बता सकता कि बॉटम कहां है। बाजार कभी सीधी लकीर में नहीं चलता। अगर मार्केट 10% गिर चुका है, तो वहां से वह 10% और गिर सकता है या वहीं से रिकवरी शुरू कर सकता है।

‘परफेक्ट एंट्री पॉइंट’ के चक्कर में निवेशक अक्सर इस उम्मीद में बैठे रह जाते हैं कि कीमतें थोड़ी और गिरेंगी। नतीजा यह होता है कि जब तक बाजार में भरोसा लौटता है, तब तक मार्केट बहुत ऊपर निकल चुका होता है और निवेश का सही मौका हाथ से निकल जाता है।

एसआईपी क्यों है सबसे बेस्ट?

सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह बाजार को टाइम करने की टेंशन को पूरी तरह खत्म कर देता है। बाजार का सेंटिमेंट कैसा भी हो चाहे वह तेजी पर हो या मंदी पर आपकी तय रकम हर महीने खुद-ब-खुद निवेश हो जाती है।

ITR Filing 2026: क्या आपको पता हैं लीव ट्रैवल अलाउंस के ये नियम? टैक्स छूट का दावा करने से पहले ध्यान रखें ये बातें

जब बाजार गिरता है, तो आपकी SIP को ज्यादा यूनिट्स मिलती हैं। जब बाजार चढ़ता है, तो कम यूनिट्स मिलती हैं। इससे आपकी खरीद की लागत खुद ही एवरेज हो जाती है। निवेशकों को रोज-रोज यह नहीं सोचना पड़ता कि आज निवेश करने का सही दिन है या नहीं।

कैश होल्ड करना गलत नहीं, पर यह रणनीति का हिस्सा हो

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हाथ में नकदी रखना हमेशा एक गलत फैसला होता है। अनुभवी और मझे हुए निवेशक हमेशा अपने पोर्टफोलियो में कुछ कैश रिजर्व रखते हैं। यह कैश किसी आगामी जरूरी खर्च या बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए होता है। कैश रखना आपकी वित्तीय रणनीति का एक हिस्सा होना चाहिए, न कि बाजार की हर छोटी-बड़ी भविष्यवाणी करने का कोई जुआ।

रिकवरी मिस करना पड़ सकता है बहुत महंगा

बाजार में सुधार आने या क्रैश होने का इंतजार करने का सबसे बड़ा रिस्क यह है कि बाजार हमेशा उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से रिकवर करता है। इतिहास गवाह है कि शेयर बाजार में सबसे बड़ी और सबसे तेज बढ़त अक्सर एक बहुत तेज गिरावट के तुरंत बाद आती है।

जो निवेशक पूरी स्पष्टता के इंतजार में बैठे रहते हैं, वे इस शुरुआती और सबसे कमाऊ उछाल को मिस कर देते हैं। इसलिए वित्तीय सलाहकार हमेशा सलाह देते हैं कि जब तक आपके पास कोई बहुत ठोस योजना न हो, केवल सुधार के भरोसे कैश लेकर न बैठें।

बैलेंस्ड अप्रोच ही दिलाएगी सफलता

लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन के लिए आपको SIP या कैश में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है, बल्कि दोनों का तालमेल बिठाना चाहिए:

लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन के लिए आपको SIP या कैश में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है, बल्कि दोनों का तालमेल बिठाना चाहिए:

कुल मिलाकर आपको बता दें कि बाजार को प्रेडिक्ट करना जितना आसान दिखता है, असल में उतना होता नहीं है। एक आम और लंबी अवधि के निवेशक के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह बाजार में कब एंट्री लेता है बल्कि असली चुनौती यह है कि वह हर परिस्थिति में बाजार में टिका रहता है और अपनी इन्वेस्टमेंट जर्नी को बिना रुके जारी रखता है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ITR Filing 2026: क्या आपको पता हैं लीव ट्रैवल अलाउंस के ये नियम? टैक्स छूट का दावा करने से पहले ध्यान रखें ये बातें

Leave Travel Allowance Income Tax Rules: 31 जुलाई की इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइलिंग की डेडलाइन नजदीक आ रही है। ऐसे में कई नौकरीपेशा टैक्सपेयर्स अपने फॉर्म 16 में दिख रहे टैक्स डिडक्शन और एग्जेंप्शन की समीक्षा कर रहे होंगे। इसी में से एक महत्वपूर्ण टैक्स बेनिफिट है लीव ट्रैवल अलाउंस यानी LTA, जो कर्मचारियों को छुट्टी के दौरान की गई यात्रा के खर्चों पर टैक्स राहत का दावा करने की अनुमति देता है।

लेकिन ध्यान रहे, इनकम टैक्स एक्ट के तहत एलटीए पर टैक्स छूट पाने के लिए कुछ बेहद सख्त शर्तें लागू होती हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि वे पूरी छुट्टियों के खर्च पर टैक्स बचा सकते हैं, जबकि हकीकत ऐसी नहीं है। आइए समझते हैं LTA से जुड़े नियम, पात्रता और इसके तहत मिलने वाली छूट का पूरा गणित।

1. क्या होता है लीव ट्रैवल अलाउंस (LTA)?

लीव ट्रैवल अलाउंस (LTA), जिसे कुछ जगहों पर लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC) भी कहा जाता है, नियोक्ताओं द्वारा अपने कर्मचारियों को छुट्टी के दौरान होने वाले यात्रा खर्चों को पूरा करने के लिए दिया जाने वाला एक अलाउंस है।

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 10(5) और इनकम टैक्स रूल्स के नियम 2B के तहत, अगर कोई कर्मचारी सरकार द्वारा निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करता है, तो इस भत्ते पर टैक्स छूट का दावा किया जा सकता है।

LTA पर टैक्स छूट का लाभ केवल उन्हीं टैक्सपेयर्स को मिलता है जो पुरानी टैक्स व्यवस्था का विकल्प चुनते हैं। अगर आपने नई टैक्स व्यवस्था चुनी है, तो आप LTA पर किसी भी तरह की टैक्स छूट के हकदार नहीं होंगे।

2. कौन कर सकता है LTA का दावा?

LTA पर टैक्स छूट पाने के लिए कुछ बेसिक योग्यताओं का होना जरूरी है। यह छूट केवल उन्हीं वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए उपलब्ध है जिनके सैलरी पैकेज या सीटीसी स्ट्रक्चर में स्पष्ट रूप से LTA का कंपोनेंट शामिल होता है। अगर आपकी सैलरी में यह हिस्सा नहीं है, तो आप इसका क्लेम नहीं कर सकते। इसके अलावा, यह टैक्स छूट तभी मान्य होती है जब कर्मचारी वास्तव में छुट्टी पर हो और उस अवधि के दौरान उसने यात्रा की हो।

3. कौन से खर्चे टैक्स छूट के दायरे में आते हैं और कौन से नहीं?

LTA क्लेम करते समय खर्चों के वर्गीकरण को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि टैक्स विभाग केवल यात्रा के मुख्य साधन पर ही छूट देता है:

कौन से खर्चे टैक्स छूट के दायरे में आते हैं और कौन से नहीं?

4. 4 साल के ब्लॉक में कितनी बार मिलता है फायदा?

इनकम टैक्स नियमों के मुताबिक, आप हर वक्त या साल LTA का दावा नहीं कर सकते। सरकार द्वारा अधिसूचित चार कैलेंडर वर्षों के एक ब्लॉक में केवल दो यात्राओं के लिए ही LTA छूट का दावा किया जा सकता है। अगर कोई कर्मचारी किसी ब्लॉक के दौरान केवल एक ही यात्रा का दावा कर पाता है, तो बची हुई एक छूट को अगले ब्लॉक में ‘कैरी फॉरवर्ड’ बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए शर्त यह है कि अगले ब्लॉक के पहले ही कैलेंडर वर्ष में उस पेंडिंग यात्रा का लाभ उठाना होगा।

5. ITR दाखिल करते समय ध्यान रखने योग्य बातें और जरूरी दस्तावेज

अगर आप LTA का लाभ उठाना चाहते हैं, तो कागजी कार्रवाई में कोई ढिलाई न बरतें:

  1. दस्तावेज संभाल कर रखें: यात्रा के टिकट, बोर्डिंग पास और अन्य सहायक दस्तावेजों को सबूत के तौर पर सुरक्षित रखना चाहिए।
  2. फॉर्म 16 से मिलान: आमतौर पर अगर आपने अपने एंप्लॉयर को समय पर दस्तावेज जमा कर दिए हैं, तो वे इसे वेरिफाई करके आपके फॉर्म 16 में रिफ्लेक्ट कर देते हैं। ITR फाइल करने से पहले फॉर्म 16 में इस छूट की जांच जरूर कर लें।
  3. टैक्स स्क्रूटनी के लिए रहें तैयार: अगर आप सीधे ITR फाइल करते समय LTA का दावा कर रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि आपके पास सभी पुख्ता सबूत हों, क्योंकि टैक्स स्क्रूटनी या वेरिफिकेशन के दौरान असेसिंग ऑफिसर (AO) आपसे ये टिकट मांग सकता है।

एंडी बर्नहैम ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने:10 साल में सातवें PM; पाकिस्तानी मूल की शबाना महमूद वित्त मंत्री बन सकती हैं

ब्रिटेन में सोमवार को एंडी बर्नहैम ने नए प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाल लिया। वह पिछले 10 साल में ब्रिटेन के सातवें प्रधानमंत्री बने हैं। उन्होंने देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव का वादा करते हुए कहा है कि उनकी सरकार लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं, जैसे महंगाई और खराब सार्वजनिक सेवाओं, पर सबसे ज्यादा ध्यान देगी। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर विदाई भाषण देने के बाद किंग चार्ल्स को अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर एंडी बर्नहैम ने किंग से मुलाकात की और औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 56 वर्षीय बर्नहैम ऐसे समय सत्ता में आए हैं, जब ब्रिटेन कई चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें धीमी आर्थिक वृद्धि, खराब प्रदर्शन करने वाली सार्वजनिक सेवाएं और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं प्रमुख हैं। सरकार संभालने के साथ ही उन्हें अपनी नई कैबिनेट का भी गठन करना है। नई कैबिनेट पहली चुनौती होगी प्रधानमंत्री बनने के बाद बर्नहैम की पहली बड़ी चुनौती अपनी कैबिनेट का गठन होगी। खास तौर पर वित्त मंत्री की नियुक्ति पर सभी की नजर रहेगी, क्योंकि पहले भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के बीच मतभेद कई सरकारों के लिए मुश्किल बने हैं। ऊर्जा सुरक्षा मंत्री एड मिलिबैंड को पहले इस पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन अब गृह मंत्री शबाना महमूद का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। शबाना पाकिस्तानी मूल की नेता हैं। हालांकि बर्नहैम ने कहा है कि उन्होंने अभी अपनी टीम पर अंतिम फैसला नहीं लिया है और अटकलों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पहला फैसला- डिजिटल पहचान पत्र लागू करने का फैसला रद्द किया बर्नहैम सरकार के शुरुआती फैसलों पर भी सबकी नजर रहेगी। सरकार ने पहले ही एक अहम कदम उठाते हुए सभी कर्मचारियों के लिए डिजिटल पहचान पत्र लागू करने की योजना रद्द कर दी है। इस की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर सरकार ने सितंबर 2025 में की थी। इसका मकसद यह था कि देश में काम करने वाले हर कर्मचारी की पहचान और उसके काम करने के कानूनी अधिकार की डिजिटल तरीके से पुष्टि की जा सके। सरकार का मानना था कि इससे फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कम होगा और अवैध प्रवासन पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। हालांकि इस योजना का शुरुआत से ही विरोध होने लगा। आलोचकों का कहना था कि इससे सरकार नागरिकों की निजी जानकारी पर जरूरत से ज्यादा कंट्रोल हासिल कर सकती है। डेटा सुरक्षा और निजता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। बर्नहैम के सामने 5 बड़ी चुनौतियां 1. सुस्त अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से कमजोर बनी हुई है। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी, ब्रेक्जिट और कोविड-19 महामारी के कारण लोगों का जीवन स्तर लगातार प्रभावित हुआ है। बर्नहैम ने वादा किया है कि वह आम लोगों की जिंदगी में वास्तविक सुधार लाएंगे। उन्होंने टैक्स न बढ़ाने का भी वादा किया है। 2. यूक्रेन, मिडिल ईस्ट और अमेरिका के साथ रिश्तों में संतुलन बर्नहैम घरेलू मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देना चाहते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात उन्हें ऐसा करने की पूरी छूट नहीं देंगे। यूक्रेन युद्ध अभी जारी है और मिडिल ईस्ट में भी तनाव बढ़ा हुआ है। माना जा रहा है कि इन दोनों मुद्दों पर ब्रिटेन की विदेश नीति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा, क्योंकि NSA जोनाथन पॉवेल अपने पद पर बने रह सकते हैं। साथ ही अमेरिका के साथ ब्रिटेन के रिश्ते भी नई सरकार के लिए अहम होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की थी, लेकिन ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों का खुलकर समर्थन नहीं करने के कारण दोनों नेताओं के बीच तनाव पैदा हो गया था। 3. रक्षा बजट बढ़ाना और उसके लिए पैसा जुटाना रक्षा खर्च बढ़ाने को लेकर मतभेद की वजह से पिछले महीने कीर स्टार्मर सरकार के रक्षा मंत्री जॉन हीली ने इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि सेना के लिए प्रस्तावित बजट बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है। इसके कुछ हफ्तों बाद स्टार्मर ने अगले चार वर्षों में रक्षा बजट में 15 अरब पाउंड (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) की बढ़ोतरी का ऐलान किया। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि एक्स्ट्रा पैसा कहां से आएगा और किन सरकारी विभागों के बजट में कटौती कर इसकी भरपाई की जाएगी। 4. इमिग्रेशन पर सख्त नीति और राजनीतिक संतुलन हाल के वर्षों में ब्रिटेन में शुद्ध प्रवासन (नेट माइग्रेशन) में काफी गिरावट आई है। इसकी वजह पिछली कंजर्वेटिव सरकार द्वारा लागू की गई सख्त इमिग्रेशन नीतियां हैं। इसे लेबर सरकार ने भी जारी रखा है। मई में एंडी बर्नहैम ने माना था कि इमिग्रेशन में कमी आई है, लेकिन उन्होंने कहा कि इसे और कम करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह पूर्व गृह मंत्री शबाना महमूद की सख्त इमिग्रेशन नीति को बड़े पैमाने पर जारी रखेंगे। हालांकि लेबर पार्टी के कई सांसद और उदारवादी समर्थक इसका विरोध करते रहे हैं। ऐसे में बर्नहैम के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी के भीतर विरोध के बीच संतुलन बनाना होगी। 5. बढ़ता कल्याण और पेंशन खर्च ब्रिटेन में सरकार का सामाजिक कल्याण (वेलफेयर) पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह कामकाजी उम्र के उन लोगों की बढ़ती संख्या है, जो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आधार पर सरकारी सहायता ले रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है, जो बेरोजगार हैं। हालांकि सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले कुल सरकारी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा सेवानिवृत्त लोगों पर जाता है। सरकारी पेंशन और दूसरी सहायता योजनाओं पर कुल सामाजिक सुरक्षा बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा खर्च होता है। अगर बर्नहैम इस खर्च को नियंत्रित कर पाते हैं, तो उनके पास सामाजिक आवास जैसी दूसरी योजनाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करने का मौका मिलेगा। लेकिन यह आसान नहीं होगा। कीर स्टार्मर ने भी वेलफेयर खर्च घटाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी ही पार्टी के सांसदों के विरोध के बाद उन्हें अपने फैसले वापस लेने पड़े थे। यही वजह है कि बर्नहैम के लिए यह आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी सबसे कठिन चुनौतियों में से एक होगी।

एमबाप्पे ने लगातार दूसरी बार मेस्सी से छीन लिया गोल्डन बूट

कहां लियोनेल मेसी सोच रहे थे कि अर्जेंटीना अपना खिताब बरकरार रखने वाली चौथी टीम बनेगी लेकिन खिताब सिर्फ एमबाप्पे का बरकरार रहा जिन्होंने पिछले संस्करण में गोल्डन बूट जीता था।लियोनेल मेसी के रविवार को स्पेन के खिलाफ फाइनल में गोल करने में विफल रहने के बाद किलियन एमबापे ने विश्व कप गोल्डन बूट बरकरार रखा है।

उन्होंने 2026 विश्व कप में शानदार 10 गोल और 4 असिस्ट के साथ शीर्ष स्थान हासिल कर यह ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम की है।इसी के साथ लगातार दूसरी बार गोल्डन बूट जीतने वाले एमबाप्पे  पहले फुटबॉलर बन गए हैं।

फ्रांस और रियल मैड्रिड के स्ट्राइकर एमबापे ने तीसरे स्थान के प्लेऑफ में इंग्लैंड के खिलाफ 6-4 की हार में दो गोल किए, जिससे टूर्नामेंट में उनके गोलों की कुल संख्या 10 हो गई, और वह दो विश्व कप (2022, 2026) में गोल्डन बूट जीतने वाले पहले खिलाड़ी बन गए।

एमबापे ने अर्जेंटीना के मेस्सी (आठ गोल), नॉर्वे के एर्लिंग हालैंड (सात), इंग्लैंड के जूड बेलिंघम (सात) और हैरी केन (छह) और टीम के साथी उस्मान डेम्बेले (छह) से प्रतिस्पर्धा को मात दी । फ्रांस के पहले मैच में, सेनेगल के खिलाफ 3-1 की जीत में, एमबापे ने दो गोल किए और फिर इराक के खिलाफ 3-0 की जीत में भी दो गोल किए । उन्होंने नॉर्वे के खिलाफ 4-1 की जीत में कोई गोल नहीं किया, लेकिन राउंड ऑफ 32 के मुकाबले में स्वीडन के खिलाफ 3-0 से जीत में दो गोल किए।

पैराग्वे के खिलाफ राउंड ऑफ 16 में पेनल्टी से किया गया उनका गोल ही एकमात्र गोल था और क्वार्टरफाइनल में मोरक्को के खिलाफ 2-0 की जीत में उन्होंने एक गोल दागा था। सेमीफाइनल में फ्रांस, स्पेन से 2-0 से हार गया, लेकिन तीसरे स्थान के लिए खेले गए मुकाबले में इंग्लैंड के खिलाफ एमबापे ने दो और गोल दागे। हाफ टाइम तक 4-0 से पीछे चल रही उनकी टीम ने ब्रेक के बाद शानदार वापसी की।चार साल पहले, अर्जेंटीना के खिलाफ फाइनल में हैट्रिक लगाकर मेसी को पछाड़ते हुए एमबापे ने गोल्डन बूट जीता था।

SBI Funds IPO GMP: कल बाजार में मचेगा तहलका? लिस्टिंग से ठीक पहले GMP में भारी उछाल! जानें कितना हो सकता है मुनाफा

SBI Funds Management IPO GMP Update: देश के सबसे बड़े म्यूचुअल फंड मैनेजर, एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट के शेयरों की कल यानी मंगलवार, 21 जुलाई को घरेलू शेयर बाजार में एंट्री होने जा रही है। बाजार में कदम रखने से ठीक पहले ग्रे मार्केट में कंपनी के शेयरों को लेकर जबर्दस्त उत्साह देखा जा रहा है और यह करीब 18 फीसदी के मजबूत प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है।

यह आईपीओ सब्सक्रिप्शन के मामले में देश का पांचवां सबसे बड़ा आईपीओ बन चुका है। जिन निवेशकों ने इस आईपीओ में पैसा लगाया है, वे बेसब्री से कल सुबह की लिस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। आइए जानते हैं ग्रे मार्केट का ताजा हाल क्या है और संभावित लिस्टिंग प्राइस क्या हो सकती है।

देश का 5वां सबसे बड़ा आईपीओ, लगी थी बोलियों की झड़ी

₹9,813 करोड़ के इस विशाल आईपीओ को लेकर निवेशकों में गजब का क्रेज देखा गया। 14 जुलाई से 16 जुलाई तक खुले इस आईपीओ को रिकॉर्ड तोड़ रिस्पांस मिला था। यह आईपीओ कुल मिलाकर 41.66 गुना सब्सक्राइब हुआ था। क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) का हिस्सा रिकॉर्ड 140.11 गुना सब्सक्राइब हुआ था।

आईपीओ से जुड़ी कुछ अन्य बड़ी बातें

₹545 से ₹574 के प्राइस बैंड वाला यह आईपीओ पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल (OFS) था। इसके तहत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और अमुंडी इंडिया होल्डिंग (Amundi India Holding) ने मिलकर 20.37 करोड़ इक्विटी शेयर बेचे हैं। चूंकि यह ओएफएस था, इसलिए आईपीओ से मिलने वाली पूरी रकम प्रमोटर्स के पास जाएगी, कंपनी को कोई फंड नहीं मिलेगा।

मार्केट लीडर है कंपनी

साल 1992 में स्थापित हुई यह कंपनी देश के सबसे बड़े म्यूचुअल फंड ‘एसबीआई म्यूचुअल फंड’ का इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट संभालती है। साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, कंपनी का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) करीब ₹16.32 लाख करोड़ था और भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में इसकी हिस्सेदारी 15.5 फीसदी की है।

ग्रे मार्केट में दमदार प्रदर्शन, 18% मुनाफे के संकेत

आईपीओ पर नजर रखने वाले प्रमुख प्लेटफॉर्म्स ‘इन्वेस्टरगेन’ और ‘आईपीओ वॉच’ के मुताबिक, एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट के शेयरों का ग्रे मार्केट प्रीमियम ₹103 प्रति शेयर चल रहा है। इस जीएमपी के हिसाब से देखें तो आईपीओ के अपर प्राइस बैंड ₹574 के मुकाबले यह शेयर बाजार में ₹677 पर लिस्ट हो सकता है।

यानी कल पहले ही दिन निवेशकों को प्रति शेयर करीब 18% का तगड़ा लिस्टिंग गेन मिलने की उम्मीद है। कल सुबह 10 बजे जैसे ही बाजार खुलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह शेयर ग्रे मार्केट के अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए कोई नया रिकॉर्ड बनाता है या नहीं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।