MLA Salary: कार, बंगला और लाखों के भत्ते! जानिए किस राज्य के विधायक कमाते हैं सबसे ज्यादा पैसा

MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।

नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।

यह राज्यों का विषय है

सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।

विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।

पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।

किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?

2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।

किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?

पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।

विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?

विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।

सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
  • कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
  • सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
  • विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
  • राज्य की राजधानी में आवास
  • विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
  • टेलीफोन और संचार भत्ता
  • वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
  • कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
  • विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
  • हरियाणा में आवास और कार सुविधा
  • कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।

हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।

इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।

ओडिशा का विधायक विकास कोष

एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।

ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।

हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?

इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:

  • आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
  • उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
  • अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
  • कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।

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Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन के दिन 28 अगस्त को 3.18 घंटे रहेगा चंद्र ग्रहण, जानें राखी बांधने का मुहूर्त और सूतक का समय

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व इस साल 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। लेकिन इस साल रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण लगने से एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण से क्या राखी का त्योहार प्रभावित होगा? इससे राखी बांधने के मुहूर्त पर क्या असर होगा? और सूतक काल कब से कब तक रहेगा?

बता दें, इस साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में घटित होगा। इस दौरान चंद्रमा कुंभ राशि में संचार करेंगे, जहां पहले से ही छाया ग्रह राहु विराजमान हैं और केतु की भी दृष्टि बनी रहेगी। साथ ही सूर्य भी केतु से पीड़ित रहेंगे क्योंकि सिंह राशि में सूर्य और केतु की युति बन रही है। यह चंद्र ग्रहण 3 घंटे और 18 मिनट तक चलेगा। आइए जानें चंद्र ग्रहण के साये में कैसे मनेगा राखी का पर्व?

चंद्रग्रहण 2026 तारीख और समय

भारतीय समय के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन लगने वाले चंद्र ग्रहण की शुरुआत सुबह 8 बजकर 4 मिनट से होगी। चंद्र ग्रहण का मध्य काल 9 बजकर 43 मिनट पर होगा और समापन 11 बजकर 22 मिनट पर होगा। चंद्रग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 18 मिनट की रहने वाली है। चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई देने वाला नहीं है इसलिए सूतक काल मान्य नहीं होगा।

28 अगस्त को होगा चंद्र ग्रहण

28 अगस्त को लगने वाला चंद्र ग्रहण आंशिक होगा। इस दौरान चंद्रमा का बड़ा भाग पृथ्वी की छाया में ढक जाएगा, जिससे चंद्रमा गहरे लाल या तांबे के रंग जैसा नजर आने लगेगा, इसी वजह से इसे ब्लड मून भी कहा जाएगा। यह ग्रहण दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (पाकिस्तान, अफगानिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र समेत सऊदी अरब, शारजाह, ईराक, ईरान आदि), अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पूरी तरह दिखाई देने वाला है।

भारत में नहीं दिखेगा चंद्र ग्रहण

28 अगस्त को रक्षा बंधन के दिन लगने वाला साल का अंतिम चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और रक्षाबंधन के पर्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ना ही राखी बांधने का मुहूर्त बदलेगा। आप बिना किसी बाधा के त्योहार मना सकते हैं।

भद्रा मुक्त रहेगा रक्षा बंधन का पर्व

इस बार रक्षाबंधन पर सबसे अच्छी बात यह है कि भद्राकाल नहीं है। भद्रा रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व यानी 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे से रात्रि 9:32 बजे तक रहेगी। इसलिए 28 अगस्त को सूर्योदय के बाद बिना किसी बाधा के पूरे दिन राखी बांधी जा सकती है।

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28 अगस्त को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण, इन 4 राशियों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर, जानें जानें ज्योतिषीय संकेत और उपाय

Chandra Grahan 2026: साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को लगने जा रहा है। हालांकि यह आंशिक चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इस वजह से देश में इसकी वजह से पारंपरिक तौर पर लगने वाला सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसके बावजूद हिंदू ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण काल को आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक इस चंद्र ग्रहण का असर अलग-अलग राशियों पर देखने को मिल सकता है, लेकिन 4 विशेष राशियों वृषभ, कर्क, सिंह और वृश्चिक को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

चंद्र ग्रहण का समय और भारत में स्थिति

ग्रहण की तारीख : 28 अगस्त 2026

प्रारंभ समय : सुबह 8:04 बजे

चरम काल : सुबह 9:43 बजे

समापन समय : सुबह 11:22 बजे

इन 4 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान

वृषभ राशि : वृषभ राशि के जातकों को इस चंद्र ग्रहण के दौरान अपनी बोली और वित्तीय मामलों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है। वाद-विवाद से बचें, अपने गुस्से पर नियंत्रण रखें और किसी को भी पैसा उधार देने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। जल्दबाजी में लिया गया कोई भी फैसला आपके रिश्तों में खटास ला सकता है या आर्थिक परेशानी खड़ी कर सकता है।

कर्क राशि : कर्क राशि का स्वामी स्वयं चंद्रमा है, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण का प्रभाव इस राशि पर अधिक माना जाता है। इस अवधि में कर्क राशि के लोगों को तनाव से बचने, अनावश्यक चिंताओं से दूर रहने, परिवार के सदस्यों के साथ धैर्यपूर्वक बातचीत करने और पर्याप्त आराम करने की सलाह दी जाती है।

सिंह राशि : सिंह राशि का स्वामी सूर्य है, जिसका चंद्रमा के साथ महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संबंध होता है। ग्रहण काल के दौरान सिंह राशि के जातकों को अपने वर्कप्लेस पर व्यवहार ठीक बनाए रखना चाहिए। अपने सीनियर्स के साथ बेवजह की बहस से बचें और कोई भी महत्वपूर्ण बयान या निर्णय लेने से पहले गहराई से विचार करें।

वृश्चिक राशि : वैदिक ज्योतिष में वृश्चिक राशि को चंद्रमा की नीच राशि से जोड़ा जाता है। इसलिए ज्योतिषियों ने वृश्चिक राशि के जातकों को वित्त, पारिवारिक मामलों और भरोसे के संदर्भ में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। पैसों से जुड़े बड़े फैसले लेने से बचें और किसी भी व्यक्ति पर अंधाधुंध भरोसा न करें।

चंद्र ग्रहण के दौरान करें ये ज्योतिषीय उपाय

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कमजोर चंद्रमा को मजबूत करने और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे उपाय हैं जो फलदायी माने जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना करने से चंद्रमा के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। अपनी माता का आदर-सत्कार करें और उनका आशीर्वाद लें। दूध, चावल या अन्य सफेद चीजों का दान करना शुभ माना जाता है। मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए चंद्रमा से जुड़े मंत्रों का जाप और ध्यान करें।

आपको बता दें कि 28 अगस्त को होने वाला यह चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है जबकि इसके आध्यात्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन परंपराओं को मानने वाले लोगों के लिए इस दौरान शांत रहना, जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना और सकारात्मक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना लाभदायक माना जाता है।

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क्या एथेनॉल की वजह से महंगी हुई चीनी? सरकार ने गिनाई 5 वजहें और त्योहारों से पहले लिया यह बड़ा फैसला

Sugar Price Rise: देश में त्योहारों के सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतें रॉकेट हुई जा रही हैं। 20 जुलाई को चीनी का भाव 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम था जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। चीनी की कीमतों को लेकर पैनिक की स्थिति न आए, इसके लिए अब सरकार ने इसे लेकर डिटेल में जानकारी जारी की है। इसमें चीनी की बढ़ती कीमतों की असल वजहें और इसे कंट्रोल करने के उपायों के बारे में बताया गया है। आपको बता दें कि सरकार ने एक दशक के बाद पहली बार चीनी के आयात का भी फैसला लिया है, जिसे इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी रिलीज के मुताबिक सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और लोगों को उचिद दर पर चीनी उपलब्ध कराने के लिए तमाम कदम उठाए जा रहे हैं।

क्या एथेनॉल की वजह से बढ़ीं कीमतें? सरकार ने खारिज किया दावा

सरकार ने उन दावों को पूरी तरह से गलत बताया है जिनमें चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को माना जा रहा था। सरकार का दावा है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है। देश में बनाए जा रहे एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाजों, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है।

फिर चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?

सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी किसी एक वजह से नहीं हो रही है। इसके पीछे कई वजहें एक साथ जिम्मेदार हैं। सरकार ने बताया है कि शुरुआती अनुमानों की तुलना में घरेलू उत्पादन कम रहा है। त्योहारों का सीजन नजदीक आने से बाजार में मांग बढ़ी है। इसके अलावा मौसम की मार की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा है। चौथी वजह इंटरनेशनल बाजार में चीनी सप्लाई में कमी को बताया गया है। पांचवीं वजह में सरकार ने माना है कि कुछ तबकों द्वारा चीनी की जमाखोरी भी की गई है।

शुरुआती अनुमानों से कम रहा चीनी का उत्पादन

चालू पेराई सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों द्वारा शुरुआत में इसके 343 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान लगाया गया था। उत्पादन में इस गिरावट की मुख्य वजह गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का लगना और भारी बारिश से हुए जलजमाव को बताया जा रहा है। हालांकि उत्पादन अनुमान से कम रहने के बावजूद अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

दुनिया भर में बढ़ रहे हैं चीनी के दाम

चीनी की किल्लत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि फिलहाल यह एक वैश्विक समस्या है। वर्ष 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा लगभग 33 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। मौसम की विपरीत परिस्थितियों ने इसे ग्लोबली प्रभावित किया है। इंटरनेशनल बाजार में चीनी की कीमतें 30 जून को $474 प्रति टन थीं, जो 20 अगस्त 2026 तक 16% से अधिक बढ़कर $552 प्रति टन पर पहुंच गईं।

एथेनॉल प्रोग्राम से किसानों और मिलों को हुआ फायदा

भारत में आमतौर पर सालाना 320-340 लाख मीट्रिक टम चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280-290 लाख मीट्रिक के आसपास रहती है। सरप्लस उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त स्टॉक के कारण चीनी मिलों के फंड फंस जाते थे जिससे किसानों के गन्ने के भुगतान में देरी होती थी। ऐसे में एक्स्ट्रा चीनी को एथेनॉल में बदलने की पॉलिसी फायदा मिला है। इससे मिलों की फाइनेंशियल स्थिति में भी सुधार आया है। 20 अगस्त तक, 2025-26 चीनी सीजन के गन्ने के 97% बकाए का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।

इसकी वजह से मिलों की सरकारी मदद पर निर्भरता भी घटी है। 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को लगभग ₹14600 करोड़ की सब्सिडी दी गई थी जबकि 2021-22 के बाद से ऐसी किसी सब्सिडी की घोषणा नहीं की गई है। साथ ही, लंबी अवधि में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रही हैं और अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच इनमें सालाना सिर्फ 3% की ही वृद्धि हुई है।

जमाखोरी पर नकेल और त्योहारों से पहले सरकार के 5 बड़े फैसले

बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी पर रोक लगाने तथा आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। देशभर में चीनी व्यापारियों/डीलेरों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है। 1 सितंबर से बल्क कंज्यूमर्स को अपनी 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। जमाखोरी और आर्टिफिशियल किल्लत को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की संयुक्त टीमें मिलों में चीनी के स्टॉक का फिजिकल वेरिफिकेशन कर रही हैं। एहतियाती तौर पर घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति देने का फैसला लिया है।

इसके अलावा राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि इससे त्योहारों के दौरान बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी।

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Online Instruments के आईपीओ को सेबी की मंजूरी, 750 करोड़ जुटाएगी कंपनी

ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स (इंडिया) के आईपीओ को सेबी की मंजूरी मिल गई है। कंपनी ने सेबी के पास इस साल मई में ड्राफ्ट पेपर्स फाइल किए थे। कंपनी का आईपीओ 750 करोड़ रुपये का हो सकता है। इसमें कंपनी इनवेस्टर्स को नए शेयर इश्यू करेगी। इसमें ऑफर फॉर सेल भी होगा।

ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स बेंगलुरु की कंपनी है, जो ऑडियो-विजुअल सिस्टम इंटिग्रेशन सॉल्यूशन ऑफर करती है। कंपनी के प्रमोटर्स अनीता महेश बेलाड और राजेश्वरी शिवानंद महेशेट ऑफर फॉर सेल (OFS) में 57.1 लाख तक शेयर बेचेंगी। कंपनी प्री-आईपीओ प्लेसमेंट से भी 150 करोड़ रुपये तक जुटा सकती है।

कंपनी आईपीओ से जुटाए पैसे का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के साथ ही कुछ दूसरी जरूरतों के लिए करेगी। इसमें सामान्य कारोबारी जरूरतों के साथ ही अधिग्रहण का प्लान भी शामिल है। इक्विरस कैपिटल और मोतीलाल ओसवाल इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स इस आईपीओ के मर्चेंट बैंकर्स हैं। यह इश्यू ऐसे वक्त आ रहा है, जब आईपीओ बाजार में काफी हलचल है।

इस बीच, मुंबई की कंपनी सुनील गोल्ड इंडिया ने आईपीओ के पेपर्स वापस ले लिए हैं। यह कंपनी हैंड क्राफ्टेड ज्वेलरी की सप्लाई करती है। कंपनी ने 14 अगस्त को आईपीओ के लिए ड्राफ्ट पेपर्स फाइल किए थे। बाद में कंपनी ने पेपर्स वापस लेने का फैसला किया। कंपनी इनवेस्टर्स को नए 2 करोड़ शेयर्स जारी करने वाली थी। कंपनी का प्लान ऑफर फॉर सेल के जरिए भी शेयरों की बिक्री का था।

El Nino impact: भारत में अल नीनो और कमजोर मानसून का दोहरा वार! क्या बढ़ेंगे दाल, चावल और सब्जियों के दाम?

El Nino Impact on India: प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो का प्रभाव भारत की फूड इकॉनमी के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। जलवायु की यह स्थिति खेती की पैदावार पर असर डाल सकती है जिससे फूड सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा। ऐसा हुआ तो खाने-पीने के सामान पर महंगाई का असर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि भारत सरकार ने इस वित्त वर्ष में खरीफ की फसल को कम नुकसान का अनुमान दिया है पर भारत के विकास आउटलुक में पहले से ही महंगाई के जोखिम ने अपनी जगह बना रखी है।

रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि वित्त वर्ष 2026-27 में फूड और फ्यूल इंफ्लेशन भारत के आथिर्क विकास पर असर डाल सकते हैं। एजेंसी ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 फीसदी से कम है। Ind-Ra के मुताबिक FY27 में रिटेल इंफ्लेशन औसतन 4.9 प्रतिशत रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष में यह सिर्फ 2 फीसदी था। अल नीनो की वजह से फूड इंफ्लेशन बढ़ने के जोखिम को आर्थिक विकास में रुकावट डालने वाले प्रमुख कारकों में से एक माना गया है।

कृषि क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर और खरीफ की स्थिति

वैसे अल नीनो के खतरे के बावजूद मौजूदा खेती की तस्वीर बहुत अधिक चिंताजनक नजर नहीं आ रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्पष्ट किया था कि इस साल के खरीफ उत्पादन पर अल नीनो का कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ इलाकों को छोड़कर अल नीनो का बड़ा असर नहीं दिख रहा है और स्थिति कुल मिलाकर अच्छी बनी हुई है। अधिकांश हिस्सों में फसलों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बारिश हुई है।

देश के कृषि क्षेत्र ने कुछ इलाकों में कम बारिश के बावजूद व्यापक नुकसान से बचाव किया है। 14 अगस्त तक 1016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी, जो इस अवधि तक सामान्य रूप से कवर होने वाले औसत क्षेत्र का 92 प्रतिशत है। यह रकबा पिछले साल के स्तर से सिर्फ 2 फीसदी ही कम है। कृषि मंत्री के मुताबिक बुआई का अंतर काफी कम हुआ है और संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर लगभग 100 रह गई है।

हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति असमान बनी हुई है। कर्नाटक और तेलंगाना में जल संकट का सामना करना पड़ा है जबकि पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बारिश की कमी अधिक देखी गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 12 अगस्त तक कुल मानसूनी घाटा 12 प्रतिशत था। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में 26 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। आपको बता दें कि अल नीनो का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसमें कुछ हिस्से सूखे रह जाते हैं जबकि अन्य हिस्सों में सामान्य या अधिक बारिश होती है।

खाद्य कीमतों और अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का प्रभाव

अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के गर्म होने से होने वाला एक मौसमी बदलाव है। ये वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय परिसंचरण, बारिश और तापमान को बदल देता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर मानसून और कृषि पर देखा जाता है। कमजोर या असमान मानसून उन फसलों की उपज को घटा सकता है जो सिंचाई के बिना पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। उत्पादन में गिरावट से आपूर्ति कम होती है, जिससे थोक और खुदरा कीमतें बढ़ने लगती हैं।

फसल की यह कमी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती बल्कि पूरी फूड सप्लाई चेन (प्रॉक्यूरमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल) पर भी असल डालती है। मुख्य फसलों की कम उपलब्धता से आयात की मांग बढ़ती है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ पड़ता है और देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ता है। Ind-Ra के मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल नीनो की वजह से पैदा हुई महंगाई कच्चे तेल की कम कीमतों से भारत को मिलने वाले फायदे को भी खत्म कर सकती है।

जब अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां या अन्य फसलें कम पैदा होती हैं, तो बाजार में उनकी उपलब्धता घट जाती है। मांग समान रहने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके सीधे असर से खरीद लागत बढ़ जाती है। आखिरकार यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचती है जिससे घरेलू बजट बिगड़ता है। सरकार को भी कीमतें नियंत्रित करने के लिए अपने स्टॉक से अनाज छोड़ने, आयात बढ़ाने या निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। लगातार खाद्य मुद्रास्फीति बने रहने से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश भी कम हो जाती है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो का खतरा

मौजूदा अल नीनो एक बड़े वैश्विक जलवायु संकट का रूप ले रहा है। क्लाइमेट ब्रिंक डैशबोर्ड के मुताबिक प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 30 साल के औसत से लगभग 2.6°C अधिक हो चुका है। पूर्वानुमानों के अनुसार नवंबर तक यह अंतर 3.9°C तक पहुंच सकता है। ऐसा हुआ तो ये 2015 के शक्तिशाली अल नीनो के करीब 3°C के रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) का अनुमान है कि 69 प्रतिशत संभावना है कि यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बन जाएगा। इस वजह से दुनिया के कुछ हिस्से अत्यधिक गर्म और सूखे हो रहे हैं जबकि अन्य इलाकों में मूसलाधार बारिश और बाढ़ आ रही है। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में लंबे सूखे के कारण भीषण जंगलों की आग देखी गई है।

जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह अल नीनो वर्ष 2027 में वैश्विक तापमान में करीब 0.3°C और बढ़ा सकता है। इस वजह से ग्लोबल टेंप्रेचर औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.76°C ऊपर पहुंच सकता है, जिससे 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है।

मैन मेड ग्लोबल वार्मिंग भी अल नीनो के असर को और घातक बना रही है। गर्म हवा अधिक नमी सोखती है जिससे अति-बारिश की तीव्रता बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ उच्च तापमान मिट्टी की नमी सुखाकर सूखे को और भीषण बना देता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कोरल डेटा बताते हैं कि पिछली एक सदी में अल नीनो की तीव्रता में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत के लिए तात्कालिक निष्कर्ष यही है कि भले ही कृषि क्षति अभी व्यापक न हुई हो, लेकिन मानसून के घाटे और अल नीनो के मजबूत होने से खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर जोखिम लगातार मंडरा रहा है।

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Gold Silver Prices Today: दिल्ली में सोने में तेजी, चांदी सिर्फ दो दिन में 15000 रुपये चढ़ गई

Gold Silver Prices Today: दिल्ली सर्राफा बाजार में 21 अगस्त को सोने और चांदी की कीमतों में तूफानी तेजी आई। इससे सोने और चांदी का भाव तीन महीने की ऊंचाई पर पहुंच गया। 20 अगस्त को भी सोना तेजी के साथ बंद हुआ था। बुलियन में तेजी की वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और तेजी में जोरदार तेजी को माना जा रहा है। साथ ही डॉलर इंडेक्स में नरमी से भी कीमतों को सपोर्ट मिला।

सोने का भाव 19 मई के बाद पहली बार 1,63,500 रुपये पर

सोना 21 अगस्त को 1,200 रुपये चढ़कर 1,63,500 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इससे पहले सोने की यह कीमत 19 मई को थी। तब सोने का भाव 1,63,600 रुपये प्रति 10 ग्राम था। चांदी तो आज रॉकेट बन गई। 5000 रुपये के उछाल के साथ इसकी कीमत 2,50,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। सिर्फ दो दिन में चांदी में 15,000 रुपये का उछाल आया है।

इन वजहों से देश और विदेश में सोने और चांदी को लगे पंख

लेमन मार्केट डेस्क में रिसर्च हेड गौरव गर्ग ने कहा कि सोने में शुक्रवार को भी तेजी जारी रही। यह लगातार तीसरा हफ्ता है जब सोने में तेजी देखने को मिली है। चांदी भी सोने के पीछे-पीछे चलती दिख रही है। इसकी वजह डॉलर में कमजोरी और लंबी अवधि के अमेरिकी बॉऩ्ड की यील्ड में नरमी है। डॉलर में कमजोरी से दूसरी करेंसी में सोना खरीदना सस्ता हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तीन महीने बाद सोना 4600 डॉलर के पार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी में जोरदार तेजी दिखी। सोना 2 फीसदी यानी करीब 81 डॉलर के उछाल के साथ 4,600.91 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। सिल्वर में तो करीब 3 फीसदी का उछाल आया। इससे इसका भाव 69.87 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। एचडीएफसी सिक्योरिटीज में सीनियर कमोडिटीज एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा कि सोना 18 मई के बाद पहली बार 4,600 डॉलर के लेवल पर पहुंचा है।

यह सोने की कीमतों में तेजी का लगातार तीसरा हफ्ता रहा

मिरै एसेट शेयरखान में कमोडिटीज हेड प्रवीण सिंह ने कहा कि इस हफ्ते सोने में 4 फीसदी से ज्यादा का उछाल आया है। इसकी वजह अमेरिकी सरकार की तरफ से बॉन्ड पर्चेंज प्रोग्राम का ऐलान है। इससे डॉलर में नरमी आई है। बॉन्ड यील्ड में भी नरमी दिखी है। इसका असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ा है। हालांकि, अमेरिका-ईरान के बीच डील की कोई संभावना नहीं दिख रही। दोनों देशों के बीच गतिरोध जारी रहने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नहीं खुलने से क्रूड की कीमतें 93 डॉलर के पार बनी हुई हैं।

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क्रूड ऑयल की कीमतें अब भी काफी ऊंचे लेवल पर 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक क्रूड की कीमतों में नरमी नहीं आती है सोने और चांदी में तेजी जारी रहने की उम्मीद कम है। पिछले कई महीनों में काफी ज्यादा गिरावट के बाद सोने और चांदी में रिकवरी दिख रही है। इससे बुलियन के निवेशकों ने राहत की सांस ली है। उधर, कई देशों के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से भी सोने को सपोर्ट मिल रहा है।

असम में बाढ़ में घायल हथिनी ‘जॉयमोती’ को मिला नया जीवन, इलाज के लिए वंतारा किया गया एयरलिफ्ट

जॉयमोती नाम की 53 साल की मादा हाथी, जो जुलाई के दूसरे हफ्ते में नागालैंड और असम में आई बाढ़ के पानी में बह गई थी, को अब गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा ले जाया जा रहा है। संगठन ने शुक्रवार को बताया कि हाथी को तुरंत और विशेषज्ञ पशु चिकित्सा इलाज की जरूरत है, इसलिए उसे एयरलिफ्ट किया जा रहा है।

बाढ़ के दौरान जॉयमोती को स्थानीय लोगों ने सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर रेस्क्यू किया था। बाढ़ में बहने के बाद हाथी को कई गंभीर चोटें आई हैं। उसके माथे, दाहिने कान, पूंछ के ऊपर, बाईं अंदरूनी जांघ और पेट पर घाव हैं। साथ ही, उसके बाहरी जननांग के पास गहरी चोट भी है, जिसमें कीड़े पड़ गए थे।

उसकी दाहिनी आंख भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है, जिसकी वजह से उस आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई है और लगातार पानी भी निकल रहा है। इसके अलावा, उसके बाएं पिछले पैर में काफी समय से लंगड़ाने की समस्या है। यह समस्या उसे जंगल में पेड़ काटने के दौरान लगी चोट और फ्रैक्चर के कारण हुई थी। इस वजह से उसे सामान्य तरीके से चलने और खाना-पानी तक पहुंचने में परेशानी होती है।

रेस्क्यू के बाद जॉयमोती को स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार और शुरुआती पशु चिकित्सा सुविधा दी गई। इसमें घावों की ड्रेसिंग, दर्द की दवा, मल्टीविटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स के साथ जरूरी सपोर्टिव ट्रीटमेंट शामिल था। हालांकि, उसके शरीर पर कई जगह गंभीर चोटें हैं। साथ ही उसकी उम्र ज्यादा है और पहले से ही चलने-फिरने में परेशानी है। इन सभी वजहों से उसे तुरंत किसी विशेषज्ञ अस्पताल में इलाज की जरूरत थी।

हाथी को मेडिकल कारणों से किया गया शिफ्ट

हालांकि, वंतारा ने स्पष्ट किया है कि यह स्थानांतरण पूरी तरह से मेडिकल कारणों से किया जा रहा है। सड़क मार्ग के बजाय हवाई मार्ग से ले जाने का निर्णय हाथी को विशेष अस्पताल तक पहुंचाने में लगने वाले शारीरिक तनाव और समय को कम करने के लिए लिया गया है। पहुंचते ही जॉयमोती की पूरी पशु चिकित्सा जांच की जाएगी, जिसमें उसके घावों, आंखों की स्थिति और पोषण एवं सहायक देखभाल संबंधी सभी आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाएगा।

बता दें कि किसी हाथी को गंभीर इलाज के लिए हवाई रास्ते से अस्पताल ले जाना भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास है। इसके लिए पशु चिकित्सकों, एनिमल केयर टीम और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोगों ने काफी तैयारी की है।

जॉयमोती को ले जाने की पूरी प्रक्रिया में उसकी सेहत, आराम और सुरक्षा का खास ध्यान रखा गया। यात्रा से पहले मेडिकल जांच और तैयारी से लेकर विमान में चढ़ाने, उड़ान के दौरान उसकी निगरानी और अस्पताल पहुंचने तक हर चरण को सावधानी से पूरा किया गया।

वन्तारा असम में तीन वन्यजीव पशु चिकित्सा केंद्र स्थापित करेगी

इसके अतिरिक्त, वन्तारा ने असम में तीन वन्यजीव पशु चिकित्सा केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है, जिनमें हाथियों के लिए एक विशेष केंद्र भी शामिल है, ताकि वन्यजीवों की आपातकालीन पशु चिकित्सा देखभाल के लिए स्थानीय क्षमता को मजबूत किया जा सके। प्रस्तावित केंद्रों में प्रजाति-विशिष्ट सुविधाएं और पशु चिकित्सा सहायता उपलब्ध होगी, जिससे जरूरतमंद जानवरों को आपातकालीन स्थिति में उनके रहने के स्थान के पास ही समय पर और उचित उपचार मिल सकेगा। इन केंद्रों का संचालन पूरी तरह से असम वन विभाग द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।

इसका उद्देश्य स्थानीय क्षमता को मजबूत करना है ताकि असम में हाथियों और अन्य वन्यजीवों को उनके घर के पास ही उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल मिल सके और विशेष उपचार की आवश्यकता होने पर लंबी दूरी के परिवहन की आवश्यकता न पड़े।

बता दें कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी द्वारा स्थापित वंतारा एक पशु कल्याण और वन्यजीव संरक्षण संगठन है।

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क्या शेयर बाजार में तूफानी तेजी आने वाली है? JPMorgan ने दिया Nifty को 27000 का टारगेट, बुल केस और बीयर केस में ये है अनुमान

ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन की हालिया इंडिया स्ट्रैटेजी रिपोर्ट में निफ्टी के लिए 27,000 का बेस-केस टारगेट बरकरार रखा गया है। ब्रोकरेज का कहना है के बेहतर होते अर्निंग आउटलुक और घरेलू मांग में मजबूती को वजह से निफ्टी को सपोर्ट मिलेगा। जेपी मॉर्गन को उम्मीद है कि साल 2026 में MSCI इंडिया की अर्निंग्स 11 फीसदी और साल 2027 में 13 फीसदी बढ़त देखने को मिल सकती है। इसका निफ्टी के लिए’बुल-केस’टारगेट 30,000 के लेवल का है। जबकि ‘बेयर-केस’टारगेट 20,500 के लेवल का है।

ANI के मुताबिक जेपी मॉर्गन ने कहा है कि उसका झुकाव मुख्य रूप से तेज ग्रोथ वाले घरेलू साइक्लिकल शेयरों की ओर है। निफ्टी-50 के लिए जेपी मॉर्गन के बेस/बुल/बेयर केस टारगेट 27,000/30,000/20,500 के हैं।

इस ब्रोकरेज फर्म का कहना है वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही का अर्निंग्स सीजन उम्मीद से बेहतर रहा। पहली तिमाही में MSCI इंडिया कंपनियों का रेवेन्यू सालाना आधार पर 19 फीसदी बढ़ा,जबकि टैक्स के बाद मुनाफा 16 फीसदी बढ़ा। अर्निंग्स भी उम्मीद से बेहतर रही। लगभग 58 प्रतिशत MSCI इंडिया कंपनियों की अर्निंग्स उम्मीद से बेहतर रहीं,जबकि 24 प्रतिशत कंपनियां अनुमानों पर खरी नहीं उतर पाईं।

मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों के मुनाफे में मजबूत बढ़त

मार्केट-कैप के हिसाब से छोटी कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर रहा। जेपी मॉर्गन के अनुसार एनर्जी सेक्टर को छोड़कर देखें तो मिडकैप 100 कंपनियों का टैक्स के बाद का मुनाफा (PAT) सालाना आधार पर 42 फीसदी बढ़ा है। जबकि, निफ्टी स्मॉलकैप 100 कंपनियों का PAT 39 फीसदी बढ़ा है। इस तिमाही में मटीरियल्स,यूटिलिटीज,इंडस्ट्रियल्स और कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी सेक्टर में ज्यादा ग्रोथ देखने को मिली। ग्लोबल परेशानियों के बावजूद,मजबूत घरेलू मांग के चलते भारतीय कंपनियों को सहारा मिला।

पावर,ऑटो और डिफेंस सेक्टर में दिख रहा दम

जेपी मॉर्गन की राय है कि आगे बिजली की मांग,कैपिटल एक्सपेंडिचर और ग्रिड साइकल से जुड़े शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा डिफेंस, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर स्टेपल्स जैसे सेक्टरों में तेजी आ सकती है।

पहली तिमाही में भारत में बिजली की पीक डिमांड लगभग 271 GW तक पहुंच गई। ऑटोमोबाइल सेक्टर में कंपनियों को वॉल्यूम में बढ़त और एक्सपोर्ट से फायदा हुआ जबकि कंज्यूमर स्टेपल्स में वॉल्यूम-आधारित रिकवरी के संकेत दिखे। आगे भी इनमें मजबूती काय रह सकती है।

ANI के मुताबिक जेपी मॉर्गन का भारत के इक्विटी को लेकर नजरिया मजबूत अर्निंग और घरेलू मांग की उम्मीदों पर टिका हुआ है। वहीं, जियोपॉलिटिकल घटनाएं और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं जोखिम पैदा कर सकती हैं।

 

Market Outlook : दायरे में घूमने के बाद सपाट बंद हुआ बाजार, जानिए 24 अगस्त को कैसी रह सकती है इसकी चाल

 

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अश्विनी वैष्णव का बड़ा बयान, कहा-भारत को उत्पादन का हब बना सकती हैं एपल और गूगल

सरकार को उम्मीद है कि एपल और गूगल जैसी दुनिया की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनियां भारत को अपना बड़ा प्रोडक्शन हब बना सकती हैं। एपल आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी भारत में बनाना शुरू कर सकती है। गूगल एक्सपोर्ट्स के लिए भारत में उन प्रोडक्ट्स का उत्पादन शुरू कर सकती है, जिनका भी वह चीन में उत्पादन कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने यह उम्मीद जताई है। 21 अगस्त को मनीकंट्रोल के एक सवाल के जवाब में उन्होंने ये बातें कहीं।

एपल भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी बनाएगी

गूगल के अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन से हटाने की खबरों पर वैष्णव ने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि गूगल उन प्रोडक्ट्स के एक बड़े हिस्से का उत्पादन भारत में कर सकती है, जिनका वह एक्सपोर्ट करती है। उन्होंने कहा कि सरकार भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए एपल से भी बात कर रही है। उम्मीद है कि वह भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स का भी उत्पादन करेगी।

गूगल ने भारत में पिक्सल स्मार्टफोन के उत्पादन के प्लान के बारे में बताया था

एपल और गूगल भारत में अपने हार्डवेयर के उत्पादन का विस्तार करना चाहती हैं। गूगल ने अक्तूबर 2023 में कहा था कि वह इंडिया में पिक्सल स्मार्टफोन की मैन्युफैक्चरिंग करेगी। उसका प्लान पिक्सल 8 से इसकी शुरुआत करने का था। इसके लिए वह पार्टनरशिप के लिए भारतीय और विदेशी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों से बातचीत कर रही थी।

डिक्सन टेक्नोलॉजीज गूगल पिक्सल की एसेंबलिंग करती है

Dixon Technologies उन कंपनियों में शामिल है, जो भारत में Google Pixel स्मार्टफोन की एसेंबलिंग करती हैं। गूगल ने 2025 में भारत में पिक्सल रेंज के स्मार्टफोन का उत्पादन बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी। उसका प्लान एक्सपोर्ट्स के लिए इंडिया में अपने स्मार्टफोन का उत्पादन करने का था।

गूगल चीन की जगह भारत में बनाएगी फोन, वॉचेज और इयरबड्स

इस हफ्ते आईं खबरों में बताया गया कि गूगल 2027 से चीन में पिक्सल फोन, वॉचेज और वायरलेस इयरबड्स का उत्पादन बंद करना चाहती है। उसका प्लान चीन की जगह इंडिया और वियतनाम में इन उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग करने का है। गूगल ने सार्वजनिक रूप से इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है।

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एपल भारत में 2017 से ही आईफोन की एसेंबलिंग कर रही है

एपल पहले से इंडिया में काफी ज्यादा उत्पादन कर रही है। उसने 2017 में भारत में अपने आईफोन की एसेंबलिंग शुरू कर दी थी। तब से उन्हें Foxconn और टाटा ग्रुप सहित कई सप्लायर्स के जरिए इंडिया में अपना प्रोडक्शन बेस बढ़ाया है। काउंटरप्वाइंट रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, 2026 में एपल के आईफोन के कुल उत्पादन में इंडिया की हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी रह सकती है। एपल ने अपने आईफोन के लिए इंडिया को एक एक्सपोर्ट बेस बनाया है।