सीनियर सिटिजंस के लिए सरकार की बड़ी पहल, जानिए AVYAY स्कीम में क्या-क्या मिलती हैं सुविधाएं

Senior Citizen schemes: देश में वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। इसी क्रम में अटल वयो अभ्युदय योजना (AVYAY – Atal Vayo Abhyudaya Yojana) के तहत बुजुर्गों को आश्रय, स्वास्थ्य देखभाल, सहायक उपकरण और सहायता सेवाएं दी जा रही हैं।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री बीएल वर्मा ने लोकसभा में सांसद गणेश सिंह के एक सवाल के जवाब में इस योजना की स्टेट्स और सक्सेस रिपोर्ट शेयर की है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 से अब तक राष्ट्रीय वयोश्री योजना के तहत 7.68 लाख से अधिक वरिष्ठ नागरिकों को फायदा मिला है। राष्ट्रीय हेल्पलाइन एल्डरलाइन के माध्यम से 8.41 लाख से अधिक बुजुर्गों को समय पर सहायता पहुंचाई गई है।

बुजुर्गों के लिए आश्रय और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं (IPSrC)

अटल वयो अभ्युदय योजना के तहत वरिष्ठ नागरिकों के लिए इंटिग्रेटेड कार्यक्रम (IPSrC) चलाए जा रहे हैं। इसके माध्यम से पात्र संस्थाओं को वरिष्ठ नागरिक आवास, निरंतर देखभाल गृह, मोबाइल मेडिकेयर यूनिट्स और फिजियोथेरेपी क्लीनिक चलाने के लिए फाइनेंशियल असिस्टेंस दिया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य बेसहारा वरिष्ठ नागरिकों को भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य देखभाल और मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराना है।

सरकार ने बुजुर्गों की देखभाल और सुगम इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए न्यूनतम मानक तय किए हैं। वित्त वर्ष 2021-22 से अब तक इस कार्यक्रम से 6.98 लाख से अधिक वरिष्ठ नागरिक लाभान्वित हो चुके हैं। इसके अलावा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थानीय जरूरतों के मुताबिक योजनाएं लागू करने के लिए वरिष्ठ नागरिकों के लिए राज्य कार्य योजना (SAPSrC) को भी 2019-20 से लागू किया गया है।

राष्ट्रीय वयोश्री योजना: मुफ्त मिलेंगे शारीरिक सहायक उपकरण

उम्र से जुड़ी शारीरिक अक्षमताओं या दिव्यांगता से जूझ रहे ऐसे बुजुर्ग जिनकी मासिक आय 15000 रुपये तक है उनके लिए राष्ट्रीय वयोश्री योजना (RVY) चलाई जा रही है। योजना के तहत बुजुर्गों को उनके जीवन को आसान बनाने के लिए मुफ्त शारीरिक सहायता उपकरण दिए जाते हैं। इस योजना का क्रियान्वयन एलिम्को (ALIMCO – Artificial Limbs Manufacturing Corporation of India) द्वारा किया जा रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 से अब तक देश भर में 768749 वरिष्ठ नागरिकों को इस योजना का लाभ मिला है।

एल्डरलाइन (14567): इस हेल्पलाइन पर मिलती है मदद

वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के तुरंत समाधान के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन एल्डरलाइन (14567) रोजाना सुबह 8:00 बजे से रात 8:00 बजे तक चलती है। यह हेल्पलाइन बुजुर्गों को मुफ्त जानकारी, मार्गदर्शन, भावनात्मक समर्थन और दुर्व्यवहार या संकट के मामलों में फील्ड हस्तक्षेप/बचाव की सुविधा देती है। 1 अक्टूबर 2021 को शुरू होने के बाद बाद से अब तक 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 841734 वरिष्ठ नागरिकों को इस हेल्पलाइन के जरिए सहायता दी जा चुकी है।

केयरगिवर्स की ट्रेनिंग और टेक-स्टार्टअप्स को बढ़ावा

बढ़ती उम्र के साथ बुजुर्गों की देखभाल के लिए कुशल पेशेवरों की मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने विशेष पहल की है-

PM-SPECIAL योजना: वित्त वर्ष 2023-24 में शुरू की गई इस योजना के तहत अब तक 38893 जेरियाट्रिक केयरगिवर्स की ट्रेनिंग की जा चुकी है। इससे देश में बुजुर्गों की देखभाल का ढांचा मजबूत हुआ है।

SAGE पहल (Seniorcare Ageing Growth Engine): बुजुर्गों के लिए तकनीक-आधारित समाधान विकसित करने वाले स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत पात्र स्टार्टअप्स को 1 करोड़ रुपये तक की इक्विटी सहायता दी जाती है। अब तक स्वास्थ्य देखभाल और सहायक तकनीक से जुड़े 9 स्टार्टअप्स को इस पहल के तहत सहायता दी गई है।

8th Pay Commission: 7वें वेतन आयोग के जैसे इस बार भी फिटमेंट फैक्टर 2.57 रहा, तो कितनी बढ़ेगी चपरासी, टीचर और अधिकारी की सैलरी?

8th Pay Commission Salary Calculation: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों और नए पे मैट्रिक्स को लेकर उत्सुकता चरम पर है। कर्मचारियों की सबसे बड़ी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार फिटमेंट फैक्टर कितना तय करती है।

अगर सरकार 7वें वेतन आयोग के 2.57 फिटमेंट फैक्टर को ही 8वें वेतन आयोग में आधार मानती है, या फिर यूनियनों की मांग के मुताबिक इसमें बदलाव करती है, तो ग्रुप-डी कर्मचारी (चपरासी/एमटीएस), स्कूल शिक्षक (TGT/PGT) और क्लास-1 राजपत्रित अधिकारी के बेसिक पे और टेक-होम सैलरी में कितना उछाल आएगा? आइए समझते हैं पूरा गणित।

फिटमेंट फैक्टर क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

फिटमेंट फैक्टर वह गुणक होता है, जिसका उपयोग वर्तमान 7वें वेतन आयोग के बेसिक पे को नए वेतन आयोग के संशोधित बेसिक पे में बदलने के लिए किया जाता है।

नया बेसिक पे=मौजूदा 7th CPC बेसिक पे×फिटमेंट फैक्टर

7वें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जिससे न्यूनतम बेसिक पे ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हो गया था।

नया बेसिक पे तय होने के बाद महंगाई भत्ता (DA) 0% पर रीसेट हो जाता है और मकान किराया भत्ता (HRA) व परिवहन भत्ता (TA) नए बेसिक पे के प्रतिशत के आधार पर फिर से जोड़ा जाता है।

2.57 फिटमेंट फैक्टर पर चपरासी, टीचर और अधिकारी की सैलरी का गणित

7वें वेतन आयोग के न्यूनतम 2.57 फिटमेंट फैक्टर को आधार मानते हुए अलग-अलग पदों की संशोधित सैलरी इस प्रकार होगी:

A. चपरासी / सपोर्ट स्टाफ (Level 1 – MTS/Group D)

मौजूदा 7th CPC बेसिक पे: ₹18,000

2.57 फिटमेंट फैक्टर के आधार पर नया बेसिक पे: ₹18,000 × 2.57 = ₹46,260

मासिक बेसिक में बढ़ोतरी: ₹28,260 की सीधी वृद्धि।

B. शिक्षक / TGT (Level 7)

मौजूदा 7th CPC बेसिक पे: ₹44,900

2.57 फिटमेंट फैक्टर के आधार पर नया बेसिक पे: ₹44,900 × 2.57 = ₹1,15,393 (पे मैट्रिक्स में लगभग ₹1,15,400)

मासिक बेसिक में बढ़ोतरी: ₹70,500 से अधिक का उछाल।

C. क्लास-1 अधिकारी / एंट्री-लेवल गजटेड अफसर (Level 10)

मौजूदा 7th CPC बेसिक पे: ₹56,100

2.57 फिटमेंट फैक्टर के आधार पर नया बेसिक पे: ₹56,100 × 2.57 = ₹1,44,177 (पे मैट्रिक्स में लगभग ₹1,44,200)

मासिक बेसिक में बढ़ोतरी: ₹88,000 से अधिक की वृद्धि।

अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर पर बेसिक पे में संभावित बदलाव

वर्तमान में वित्तीय विश्लेषकों और कर्मचारी यूनियनों द्वारा 1.92x से लेकर 2.86x तक के फिटमेंट फैक्टर का अनुमान लगाया जा रहा है। नीचे दिए गए टेबल से समझिए कि किस स्तर पर कितना प्रभाव पड़ेगा:

अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर पर बेसिक पे में संभावित बदलाव

इन-हैंड सैलरी पर क्या असर होगा?

जब नया वेतन आयोग लागू होता है, तो महंगाई भत्ता (DA) 0% से दोबारा शुरू होता है। वहीं शहरों की श्रेणी (X – 30%, Y – 20%, Z – 10%) के हिसाब से नए बेसिक पे पर HRA जोड़ा जाता है।

2.57 फिटमेंट फैक्टर लागू होने पर कुल इन-हैंड सैलरी में लगभग 20% से 30% की प्रभावी बढ़ोतरी देखी जाती है, क्योंकि जमा हुआ महंगाई भत्ता नए मूल वेतन में समाहित हो जाता है।

अगर 8वां वेतन आयोग 7वें वेतन आयोग के 2.57 के फिटमेंट फैक्टर को न्यूनतम मानक स्वीकार करता है, तो केंद्रीय कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 से बढ़कर ₹46,000 के पार पहुंच जाएगी। वहीं मध्य स्तर के शिक्षकों की बेसिक सैलरी ₹1.15 लाख और राजपत्रित अधिकारियों की बेसिक सैलरी ₹1.44 लाख को पार कर जाएगी। अंतिम निर्णय सरकार द्वारा गठित वेतन आयोग की सिफारिशों और कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही स्पष्ट होगा।

NEET विवाद, CJP प्रमुख अभिजीत दिपके ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी, छात्रों के उत्पीड़न का लगाया आरोप

abhijeet dipke at jantar mantar

NEET विवाद को लेकर जारी आंदोलन के बीच Cockroach Janta Party (CJP) के प्रमुख अभिजीत दिपके ने मंगलवार को एक बार फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा प्रदर्शन कर रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है। दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अगर छात्रों के खिलाफ कथित कार्रवाई जारी रही तो उनकी पार्टी जल्द ही एक बड़ा और शांतिपूर्ण आंदोलन आयोजित करेगी। उन्होंने सरकार पर प्रदर्शन में शामिल छात्रों को निशाना बनाने का भी आरोप लगाया।

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छात्रों के उत्पीड़न पर बड़े प्रदर्शन की चेतावनी

 

अभिजीत दिपके ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पुलिस द्वारा छात्रों को परेशान करने की कार्रवाई जारी रहती है तो Cockroach Janta Party जल्द ही बड़े स्तर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेगी। उन्होंने सरकार से छात्रों को निशाना बनाना और कथित उत्पीड़न बंद करने की मांग की।

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आंदोलन खत्म नहीं हुआ, CJP ने जारी रखने की बात कही

 

हालांकि केंद्र सरकार द्वारा संगठन की प्रमुख मांगों में से एक को स्वीकार किए जाने के बाद प्रदर्शन समाप्त कर दिया गया था, लेकिन CJP नेताओं का कहना है कि उनका अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। अभिजीत दिपके ने कहा कि आंदोलन वापस लेने का मतलब यह नहीं है कि लड़ाई समाप्त हो गई है। उन्होंने कहा कि CJP को अभी 'लंबा रास्ता तय करना है' और प्रदर्शन का समापन केवल शुरुआत है।

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NEET विवाद में मृत छात्रों के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग

 

CJP प्रमुख ने परीक्षा विवाद के दौरान कथित रूप से आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग भी की है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि प्रभावित परिवारों को नियमों के अनुसार अधिकतम संभव सहायता प्रदान की जाएगी।

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शिक्षा सुधारों को लेकर अभियान जारी रखेगी CJP

CJP नेताओं ने संकेत दिए हैं कि संगठन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर अपना अभियान जारी रखेगा।  CJP प्रवक्ता सौरव दास ने समाचार कहा कि संगठन युवाओं से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाता रहेगा और शिक्षा एवं प्रशासनिक सुधारों के लिए प्रयास जारी रखेगा।

India’s Toy Industry: भारत के खिलौनों की दुनिया में बढ़ी धाक, 7 साल में 89% बढ़ा एक्सपोर्ट, जानें ये सक्सेस स्टोरी

Toy Industry updates: वैश्विक बाजार में भारतीय खिलौनों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले सात वर्षों में डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग और सरकार की प्रोत्साहन नीतियों के बल पर भारत के खिलौना उद्योग का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। वर्ष 2018-19 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत से खिलौनों के निर्यात में 89.1 प्रतिशत का बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। वहीं दूसरी तरफ विदेशी खिलौनों पर निर्भरता कम हुई है और आयात में 37.5 फीसदी की भारी कमी देखने को मिली है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने आज लोकसभा में एक लिखित जवाब के जरिए इस सफलता का ब्योरा साझा किया। भारत अब खिलौने आयात करने वाले देश से उभरकर एक शुद्ध निर्यातक बन चुका है और अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स तथा जर्मनी जैसे विकसित देशों को भारतीय खिलौने निर्यात किए जा रहे हैं।

सात वर्षों में बदला व्यापार का संतुलन

ट्रेडस्टैट आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 में भारत दुनिया भर से 371.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर के खिलौने आयात करता था। हालांकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा घटकर 232.3 मिलियन डॉलर पर आ गया। वर्ष 2018-19 में भारत का खिलौना निर्यात 203.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2025-26 में 89.1 फीसदी बढ़कर 384.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। यह बदलाव इस बात को दिखा रहा है कि देश में टॉय मैन्युफैक्चरिंग की क्षमताओं में तेजी से इजाफा हुआ है।

खिलौनों की गुणवत्ता और सुरक्षा में बड़ा सुधार

वर्ष 2018-19 में भारत आने वाले आयातित खिलौनों का एक बड़ा हिस्सा घटिया, असुरक्षित और नकली होता था। वर्ष 2019 में आयोजित एक मिस्ट्री शॉपिंग सर्वे के दौरान पाया गया था कि भारतीय बाजार में बिकने वाले सिर्फ 33 फीसदी खिलौने ही भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते थे। इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाए। इसी का नतीजा है कि साल 2025 में बीआईएस द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि अब देश में उपलब्ध 95 प्रतिशत खिलौने निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं।

टॉय बिज़ इंटरनेशनल 2026 में दिखा भारतीय ब्रांड्स का जलवा

टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा 4 से 7 जुलाई 2026 के दौरान नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 17वीं टॉय बिज़ इंटरनेशनल B2B प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस विशाल आयोजन में 400 भारतीय खिलौना ब्रांड्स, 40 से अधिक देशों के 100 अंतरराष्ट्रीय खरीदार और लगभग 30000 बिजनेस विजिटर्स शामिल हुए। इस प्रदर्शनी ने भारतीय निर्माताओं को वैश्विक खरीदारों, थोक विक्रेताओं, वितरकों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करने का एक बड़ा मंच प्रदान किया। आपको बता दें कि अभी केंद्र सरकार की कोई अलग से खिलौना नीति नहीं है, लेकिन अलग अलग मंत्रालयों के संयुक्त प्रयासों से इस उद्योग को जबरदस्त गति मिली है।

सरकारी नीतियों और पहलों का मिला फायदा

खिलौना उद्योग की इस सफलता के पीछे सरकार की खास रणनीति रही है। 14 मंत्रालयों और विभागों के समन्वय से 21 एक्शन पॉइंट्स वाली राष्ट्रीय खिलौना कार्य योजना (NAPT) लागू की गई, जिसमें भारतीय संस्कृति व इतिहास पर आधारित खिलौनों के डिजाइन और स्वदेशी क्लस्टरों को प्राथमिकता दी गई। इसके साथ ही फरवरी 2020 में बेसिक कस्टम ड्यूटी को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत और 2023 में 70 प्रतिशत किया गया जबकि बजट 2025-26 में इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के कलपुर्जों पर शुल्क 20 प्रतिशत संशोधित किया गया। 25 फरवरी 2020 को गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) जारी कर 1 जनवरी 2021 से लागू किया गया जिसके तहत बीआईएस ने घरेलू निर्माताओं को 1800 से अधिक और विदेशी निर्माताओं को 50 से अधिक लाइसेंस जारी किए हैं।

नई शिक्षा नीति, क्लस्टर विकास और निर्यात प्रोत्साहन

नई शिक्षा नीति 2020 के तहत एनसीईआरटी ने ‘टॉय बेस्ड पेडागोजी’ पर हैंडबुक जारी की, जिसने पढ़ाई में स्वदेशी खिलौनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। एमएसएमई मंत्रालय ने स्फूर्ति योजना के तहत 18 खिलौना क्लस्टरों को मंजूरी दी और कपड़ा मंत्रालय 40 क्लस्टरों को डिजाइनिंग व टूलिंग सहायता प्रदान कर रहा है। इसके अलावा डीपीआईआईटी द्वारा 700 से अधिक खिलौना स्टार्टअप्स को मान्यता दी गई है और RoDTEP योजना के जरिए 2200 से अधिक निर्यातकों को वित्तीय सहायता मिली है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ओमान, न्यूजीलैंड और यूके के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों से भारतीय खिलौनों को वैश्विक बाजारों में शून्य-शुल्क पहुंच मिली है। इसने भारत को खिलौना निर्माण का वैश्विक केंद्र बना दिया है।

PUC Validity: अब हर साल PUC बनवाने का झंझट खत्म, BS-VI गाड़ियों का 3 साल तक वैध रहेगा सर्टिफिकेट!

Vehicle PUC Certificate New Rules: देश में करोड़ों कार-बाइक मालिकों के लिए एक राहत भरी खबर है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय गाड़ियों के प्रदूषण सर्टिफिकेट को लेकर एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है। सरकार के नए प्रस्ताव के तहत BS-VI (BS-6) निजी वाहनों का पीयूसी सर्टिफिकेट अब 3 साल तक के लिए मान्य हो सकता है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन (संशोधन) नियमावली, 2026 का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। सरकार ने इस नए प्रस्ताव पर आम जनता और हितधारकों से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं।

वाहनों की श्रेणी के हिसाब से PUC की नई वैधता

गैजेट नोटिफिकेशन के अनुसार, वाहनों के एमिशन नॉर्म्स और उनके इस्तेमाल (कमर्शियल या प्राइवेट) के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) की वैधता इस प्रकार तय की जाएगी:

A. BS-VI (BS-6) निजी वाहन

शुरुआती 6 साल तक: प्रथम पंजीकरण की तारीख से पहले 6 साल तक 3 साल की वैधता मिलेगी।

6 से 10 साल पुराने वाहन: 6 साल से अधिक लेकिन 10 साल तक पुराने होने पर 1 साल की वैधता मिलेगी।

10 साल से पुराने वाहन: 10 वर्ष से अधिक पुराने होने पर 6 महीने की वैधता रहेगी।

B. BS-VI (BS-6) कमर्शियल वाहन

शुरुआती 6 साल तक: प्रथम पंजीकरण की तारीख से पहले 6 साल तक 2 साल की वैधता मिलेगी।

6 से 10 साल पुराने वाहन: 1 साल की वैधता मिलेगी।

10 साल से पुराने वाहन: 6 महीने की वैधता रहेगी।

C. अन्य BS स्टेज वाले वाहन

BS-I, BS-II और BS-III वाहन: इन गाड़ियों के लिए पीयूसी की वैधता 3 महीने रहेगी।

BS-IV (BS-4) वाहन: बीएस-4 उत्सर्जन मानकों वाली सभी गाड़ियों के लिए पीयूसी की वैधता 6 महीने होगी।

रिन्यूअल के लिए बनाए गए खास नियम

ड्राफ्ट में पीयूसी सर्टिफिकेट के नवीनीकरण को लेकर भी स्पष्टता दी गई है। अगर कोई वाहन मालिक अपने पीयूसी समाप्त होने की तारीख से 15 दिन पहले ही नया सर्टिफिकेट बनवा लेता है, तो नया सर्टिफिकेट पुरानी समाप्ति तिथि से ही प्रभावी माना जाएगा। अन्य सभी मामलों में, नया सर्टिफिकेट उसकी जारी होने या नवीनीकरण की तारीख से लागू होगा।

30 दिनों में मांगे गए सुझाव और आपत्तियां

सरकार द्वारा 22 जुलाई 2026 को हस्ताक्षरित और 24 जुलाई 2026 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर 30 दिनों का समय दिया गया है। आम जनता या कोई भी हितधारक अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल आईडी comments-morth@gov.in पर भेज सकते हैं। 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद प्राप्त सुझावों पर विचार करके केंद्र सरकार अंतिम नियम लागू करेगी।

धर्मेंद्र प्रधान को बचाने की हुई थी आखिरी कोशिश! शिक्षा मंत्रालय बदलने का ऑफर ठुकराया, इस्तीफे पर अड़ा रहा CJP

Dharmendra Pradhan Resignation: पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले केंद्र सरकार ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने उन्हें शिक्षा मंत्रालय से हटाकर किसी दूसरे मंत्रालय की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव तैयार किया था। लेकिन आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। संगठन का साफ कहना था कि धर्मेंद्र प्रधान का सिर्फ मंत्रालय बदलना नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा ही स्वीकार होगा।

बताया गया है कि 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले पिछले कई सप्ताह से NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के अभियान में बदल गया। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधान के पद छोड़ने से पहले केंद्र ने एक समझौता करने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार CJP के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को मनाने में नाकाम रही।

सरकार ने निकाला था बीच का रास्ता

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने विवाद को शांत करने के लिए एक समझौते का रास्ता तलाशने की कोशिश की। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने CJP के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी कि यदि धर्मेंद्र प्रधान से शिक्षा मंत्रालय लेकर उन्हें किसी अन्य मंत्रालय में भेज दिया जाए तो क्या आंदोलन समाप्त किया जा सकता है।

हालांकि आंदोलनकारी नेताओं ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी मुख्य मांग धर्मेंद्र प्रधान का पूर्ण इस्तीफा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच प्रभावी संवाद समय पर स्थापित नहीं हो सका, जिससे दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर और अधिक अड़ गए। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच लगातार बातचीत का जरिया न बन पाने की वजह से गतिरोध बना रहा। फिर दोनों पक्षों का रुख और कड़ा हो गया।

NEET विवाद से शुरू हुआ था आंदोलन

यह आंदोलन NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों के बाद शुरू हुआ था। बाद में यह सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। बल्कि भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग को लेकर व्यापक अभियान बन गया। CJP नेताओं ने इसे केवल एक मंत्री के खिलाफ विरोध नहीं। बल्कि परीक्षा प्रणाली में कथित खामियों और जवाबदेही की कमी के खिलाफ आंदोलन बताया।

बीजेपी के भीतर भी बढ़ी थी चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तीफे से करीब 48 घंटे पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार के भीतर भी यह महसूस किया जाने लगा था कि बढ़ते जनाक्रोश और संसद में लगातार हो रहे हंगामे के बीच धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री बने रहना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता जा रहा है। सरकार ने बैक-चैनल बातचीत के जरिए संकट टालने की कोशिश की। लेकिन जंतर-मंतर पर बैठे आंदोलनकारी किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं हुए।

खबरों के मुताबिक, सरकार ने पर्दे के पीछे से बातचीत करके और प्रधान को कैबिनेट से हटाने के बजाय कुछ रियायतें देकर संकट को कम करने की कोशिश की थी। हालांकि, CJP का कहना था कि आंदोलन की मुख्य मांग तभी पूरी होगी जब वे इस्तीफा देंगे। सोशल मीडिया पर मजबूत लामबंदी और पहली बार वोट देने वालों एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के बीच अपील के कारण इस विरोध प्रदर्शन को असामान्य राजनीतिक महत्व भी मिला।

आखिरकार देना पड़ा इस्तीफा

करीब पांच सप्ताह तक चले आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद CJP ने इसे छात्रों की जीत बताते हुए अपना आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार ने प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। ओडिशा के वरिष्ठ BJP नेता प्रधान ने पेट्रोलियम, स्टील और शिक्षा जैसे कई अहम मंत्रालय संभाले थे। लेकिन लगभग पांच सप्ताह के विरोध प्रदर्शन के बाद उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।

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Plastic currency notes : 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोटों पर सरकार की मुहर, ट्रायल के लिए RBI के प्रस्ताव को मिली मंजूरी, क्या बंद हो जाएंगे पुराने नोट

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केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 10 रुपए और 20 रुपए मूल्यवर्ग के पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा कागज के नोटों को पूरी तरह प्लास्टिक नोटों से बदलने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

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हाल ही में खबर आई थी कि RBI की नोट छापने वाली इकाई भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने सुरक्षा फीचर्स वाले पॉलिमर सब्सट्रेट शीट्स की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से रुचि पत्र (EOI) आमंत्रित किए हैं। हालांकि टेंडर में यह नहीं बताया गया है कि ये नोट किस मूल्यवर्ग में और कब से नियमित रूप से जारी किए जाएंगे।

लोकसभा में सोमवार को एक सवाल के लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि RBI के केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश पर 10 रुपए और 20 रुपए के एक-एक अरब (100 करोड़) पॉलिमर नोटों को फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव दिया गया था। ट्रायल सफल रहने के बाद इन्हें नियमित रूप से जारी करने की योजना है। इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है।

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मंत्री ने बताया कि RBI के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि पॉलिमर बैंक नोटों की उम्र कागज के नोटों की तुलना में काफी अधिक होती है। ये अधिक टिकाऊ होते हैं और लंबे समय तक उपयोग में रह सकते हैं। डिजिटल भुगतान पर संभावित असर को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में पंकज चौधरी ने कहा कि पॉलिमर नोटों की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।

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इनके नियमित रूप से जारी होने के बाद ही डिजिटल लेनदेन पर इनके प्रभाव का सही आकलन किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि नकद और डिजिटल भुगतान दोनों आम जनता के लिए एक-दूसरे के पूरक माध्यम हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉलिमर नोट मौजूदा कागज आधारित नोटों के साथ ही चलेंगे। फिलहाल कागज के नोटों को पूरी तरह हटाकर केवल प्लास्टिक नोट जारी करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

 

Plastic Currency: ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोटों को केंद्र सरकार से मिली मंजूरी, जल्द मार्केट में होगी एंट्री

₹10 and ₹20 Polymer Banknotes Trial: केंद्र सरकार ने 27 जुलाई 2026 को संसद में जानकारी दी कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के पॉलीमर बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। वित्त मंत्रालय ने संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया कि आरबीआई का उद्देश्य कागज के नोटों के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ पॉलीमर नोटों की उपयोगिता और जीवनकाल को परखना है।

100-100 करोड़ पीस पॉलीमर नोटों का होगा परीक्षण

वित्त मंत्रालय के अनुसार, आरबीआई ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश के बाद ₹10 और ₹20 के 1-1 अरब पीस पॉलीमर नोट जारी कर ट्रायल करने का प्रस्ताव रखा था।अगर यह फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो इसके बाद इन दोनों मूल्यवर्गों में पॉलीमर बैंक नोटों का नियमित रूप से जारी किया जाना शुरू कर दिया जाएगा। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि पॉलीमर नोटों की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।

क्यों पड़े पॉलीमर नोटों की जरूरत?

कागज के नोटों की तुलना में पॉलीमर नोटों के कई फायदे होते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, पॉलीमर यानी प्लास्टिक से बने नोट कागज वाले नोटों की तुलना में काफी लंबे समय तक चलते हैं। ये नोट पानी से खराब नहीं होते, आसानी से फटते नहीं हैं और पसीने या गंदगी से जल्दी मैले नहीं होते। ₹10 और ₹20 जैसे छोटे नोटों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है, इसलिए कागज के नोट जल्दी खराब हो जाते हैं।

क्या बंद हो जाएंगे पुराने कागज वाले नोट?

सरकार ने इस बात पर पूरी स्थिति साफ कर दी है। आरबीआई इन नए पॉलीमर नोटों को मौजूदा कागज के नोटों के साथ ही सर्कुलेशन में लाएगा। कागज की करेंसी को पूरी तरह बंद करने या उसे पॉलीमर नोटों से बदलने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।

डिजिटल पेमेंट पर क्या पड़ेगा असर?

यह पूछे जाने पर कि क्या प्लास्टिक नोट आने से यूपीआई और डिजिटल भुगतानों पर असर पड़ेगा, वित्त मंत्रालय ने कहा, इसका कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं, इसका सही आकलन पॉलीमर नोटों के नियमित रूप से जारी होने के बाद ही किया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि कागजी/पॉलीमर बैंक नोट और डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और जनता की सुविधा के लिए दोनों विकल्प मौजूद रहेंगे।

शिक्षामंत्री का इस्तीफा: किसी की जीत नहीं, सिर्फ राष्ट्रहित है

A picture of students protesting at Jantar Mantar against the education system and the NEET-UG exam

क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं,

कर्तव्य पथ पर जो मिला, यह भी सही वह भी सही। — अटल बिहारी वाजपेयी

 

राजनीति में पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन जब बात देश के भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और करोड़ों विद्यार्थियों के हित की आती है, तब केवल और केवल राष्ट्र प्रथम का विचार ही सर्वोपरि रहता है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में हुआ नेतृत्व परिवर्तन केवल एक सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह परिपक्व राजनीति, नैतिक उच्चता और देश को अस्थिर करने व अराजकता फैलाने का प्रयास करने वाली ताकतों को दिया गया मजबूत और करारा संदेश है।

 

पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का अपने पद से इस्तीफा देना यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या कुर्सी से कहीं ऊपर देश और युवाओं का भविष्य है, जैसा कि उन्होंने प्रधानमंत्री को स्वयं लिखे पत्र में भी उल्लेख किया है। जब जंतर-मंतर पर विभिन्न आंदोलनों और उपद्रवों की आड़ में देश को उद्वेलित करने और असंतोष फैलाने की साजिश रची जा रही थी, तब उन्होंने देश की युवाशक्ति के भविष्य को भ्रम और अनिश्चितता से बचाने के लिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की।

 

उन्होंने पहले ही दिन से परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए सीबीआई जांच सौंपी और कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट मोड जैसी व्यवस्थाएं लागू की। जब यह साफ दिखने लगा कि विरोध-प्रदर्शनों की आड़ में देशविरोधी और असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ने का एजेंडा चला रहे हैं, तब उन्होंने पद त्याग कर विरोधियों की पूरी साजिश को एक झटके में नाकाम कर दिया। उनके इस कदम से सिद्ध हुआ कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के लिए पद नहीं, बल्कि देश और विद्यार्थियों का हित ही सर्वोपरि है।

 

यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान जी पहले भी इस्तीफा दे सकते थे? लेकिन जैसे ही पेपर लीक का विषय सामने आया, उन्होंने जिम्मेदारियों से भागने के बजाय नीट-यूजी की परीक्षा का पुनः आयोजन पूर्ण पारदर्शिता के साथ करवाया।

उन्होंने नीट का परिणाम आने और पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता से संपन्न होने के बाद ही अपना इस्तीफा सौंपा। यदि वे विवाद के शुरुआती दौर में इस्तीफा दे देते, जब पूरा विपक्ष और असामाजिक तत्व चील की तरह नज़रें गड़ाए बैठे थे, तो इस महत्वपूर्ण परीक्षा प्रक्रिया में प्रशासनिक गतिरोध पैदा हो सकता था। अतः पूरी प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक संपन्न कराने के उपरांत ही इस्तीफा सौंपना अत्यंत व्यावहारिक, रणनीतिक और सही कदम था।

 

राष्ट्रपति ने धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब शिक्षा मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी प्रहलाद जोशी को सौंपी है। वे एक बहुत ही अनुशासित, दृढ़ और परिणाम-उन्मुख नेता माने जाते हैं। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत कर्नाटक के हुबली स्थित ईदगाह मैदान में राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराने के प्रखर राष्ट्रवादी संकल्प से हुई थी।

केंद्रीय संसदीय कार्य, कोयला व खान मंत्री के रूप में उन्होंने कई कठिन विधायकी कार्यों और संकटपूर्ण परिस्थितियों का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया है। वे अपने सख्त अनुशासन, प्रशासनिक पकड़ और स्पष्ट दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन और शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों को बिना किसी गतिरोध के आगे बढ़ाने में वे पूरी तरह सक्षम हैं। 

 

एक घोर राष्ट्रवादी और दृढ़ नेतृत्व के हाथों में शिक्षा मंत्रालय आने से देश की शिक्षा प्रणाली और अधिक सशक्त होने की आशा है। फिर भी इन सबके बीच जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में जारी विरोध-प्रदर्शनों के पीछे की मंशा अब पूरी तरह जनता के सामने आ चुकी है।

आंदोलन के नाम पर अनशन, उग्र और अश्लील नारों तथा सनातन धर्म एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लेने का प्रयास किया गया। सोनम वांगचुक जैसे चेहरों की भूख हड़ताल को आगे रखकर व्यवस्था पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन देश के जागरूक नागरिकों ने इस विघटनकारी सोच को अच्छी तरह समझ लिया है।

 

इस पूरे घटनाक्रम ने तथाकथित छात्र नेताओं और आंदोलनकारियों के दोहरे मापदंडों की भी पोल खोल दी है। जो खुद को छात्रों का रहनुमा बताते फिर रहे हैं, वे गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे पंजाब, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना में हुए पेपर लीक मामलों पर पूरी तरह खामोश बैठे हैं और मीडिया के सवालों से कतराते दिख रहे हैं।

लेकिन इन छात्र संगठनों और प्रवक्ताओं द्वारा वहां के शिक्षा मंत्रियों से इस्तीफे की मांग क्यों नहीं की जा रही? यह चुप्पी साबित करती है कि यह आंदोलन छात्रों के हित में नहीं, बल्कि केवल भाजपा से राजनीतिक द्वेष के तहत विपक्ष द्वारा प्रेरित था।

 

वहीं सरकार ने इस पूरे एजेंडे के जवाब में एक साथ कई बड़े रणनीतिक लक्ष्य साध लिए हैं। आंदोलन की आड़ में संसद का काम रोकने और देश का माहौल खराब करने का लक्ष्य पूरी तरह विफल हो गया है।

विपक्षी पार्टियों की पोल खुली है कि उनके लिए देश से पहले पार्टी है। वहीं हिंसक गतिविधियों और उपद्रव में लिप्त तत्वों की पहचान हो चुकी है, जिससे अब कानून के अनुसार उन पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। साथ ही, विपक्षी राज्यों में भी पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर वहां की सरकारों को घेरने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

 

कहते हैं अधर्म और षड्यंत्र रचने वाली शक्तियों को लगता है कि वे कुछ समय के लिए भ्रम फैला सकती हैं, लेकिन इतिहास साक्षी है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने भी धर्म की स्थापना के लिए चुनौतियों का सामना किया और अंततः रावण तथा कंस जैसी ताकतों का समूल नाश हुआ।

सनातन संस्कृति और देश को अस्थिर करने वाले अपने ही जाल में उलझकर रह गए हैं। उनका देश को नेपाल और बांग्लादेश बनाने के मंसूबे पर पानी फिर गया है। सत्य और धर्म की राह में सामयिक चुनौतियां अवश्य आती हैं, किंतु जीत राष्ट्रहित की ही होती है। एक बार फिर सिद्ध हो चुका है कि भारत की नीतियां किसी दबाव या षड्यंत्र से तय नहीं होंगी, वे केवल और केवल राष्ट्रहित से ही संचालित होंगी।