सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली सरकार को निर्देश, पैलेट गन से जख्मी छात्रों का करवाए निशुल्क इलाज

Supreme Court Jantar Mantar Protest

Supreme Court Jantar Mantar Protest: संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुए खौफनाक एक्शन और पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को साफ-साफ निर्देश दिए हैं कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल छात्रों का इलाज सरकार अपने खर्चे पर कराएगी। 

 

सुप्रीम कोर्ट ने ने केंद्र सरकार को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है और पैलेट गन की SOP पर जवाब मांगा है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हम जल्द ही प्रोटोकॉल भी बनाने वाले हैं। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के हथियारों के इस्तेमाल के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया है। ALSO READ: NEET विवाद, CJP प्रमुख अभिजीत दिपके ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी, छात्रों के उत्पीड़न का लगाया आरोप

क्या है पूरा मामला?

बीती 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले पेपर लीक के खिलाफ निकले 'संसद मार्च' के दौरान पुलिस की कार्रवाई का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में गरमा गया है। आरोपों के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने हक की आवाज उठा रहे निहत्थे छात्रों पर न केवल बेदर्दी से लाठियां भांजीं, बल्कि पैलेट गन का भी इस्तेमाल किया। इस कार्रवाई में कई छात्र गंभीर रूप से जख्मी हुए, जबकि एक छात्र की आंखों की रोशनी जाने का दावा जा रहा है। ALSO READ: CJP के प्रोटेस्ट में घुसे थे हत्या, लूट और रेप के आरोपी, 989 क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले शातिर, 480 पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल जांच के घेरे में

CJI सूर्यकांत की बेंच का कड़ा रुख

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी मोहाना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता और पैलेट गन के शिकार पीड़ितों का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में पुलिसिया कार्रवाई की खौफनाक तस्वीर पेश की। दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फौरन निर्देश जारी किया कि पैलेट गन से घायल याचिकाकर्ता समेत तमाम लोगों को बिना किसी देरी के सबसे बेहतरीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। ALSO READ: विदेशी मीडिया ने CJP की जीत पर क्या कहा, पाकिस्तान से लेकर मिडिल-ईस्ट और अमेरिका में सुर्खियों में 'कॉकरोच'

हथियारों के इस्तेमाल का रिकॉर्ड रखना होगा सुरक्षित

कोर्ट ने सिर्फ इलाज तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि पुलिस की कार्रवाई पर शिकंजा कसते हुए बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा इस्तेमाल किए गए तमाम हथियारों और कारतूसों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के सख्त निर्देश दिए हैं। 

 

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद और घायल छात्रों द्वारा दायर इस जनहित याचिका में धातु वाली पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि बेहद असाधारण परिस्थितियों में पुलिस को पैलेट गन के इस्तेमाल का अधिकार है। लेकिन, कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि वह 20 जुलाई की घटना में हुए पैलेट गन के इस्तेमाल की जांच और सुनवाई के लिए पूरी तरह तैयार है।

PM मोदी की फेसबुक पोस्ट हटने के विवाद पर Meta का बड़ा कदम, अब VIP अकाउंट्स के लिए लागू किए नए सुरक्षा प्रोटोकॉल

PM Modi post row: दिग्गज अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनी मेटा ने भारत सरकार को एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य प्रमुख हस्तियों द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए लागू किए गए कड़े और एडवांस्ड सुरक्षा प्रोटोकॉल के बारे में जानकारी दी है। प्रधानमंत्री मोदी की फेसबुक पोस्ट कुछ समय के लिए हटाए जाने के विवाद के बाद Meta ने प्रमुख VIP अकाउंट्स की सुरक्षा के लिए नए प्रोटोकॉल लागू किए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने गुरुवार (30 जुलाई) को पत्रकारों से बातचीत में बताया कि कंपनी ने सरकार को इस बारे में जानकारी दी है।

उन्होंने बताया कि अगले 7 से 10 दिनों के भीतर इस मुद्दे पर एक विस्तृत बैठक भी होगी। पत्रकारों से बातचीत में एस. कृष्णन ने कहा कि Meta ने सरकार को बताया है कि 28 जुलाई की घटना के बाद नए सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं। इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हट गया था, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया था। बता दें कि मेटा, फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाती है।

मेटा ने लेटर में क्या कहा?

सूत्रों ने बताया कि मेटा ने सूचना प्रौद्योगिकी (IT) मंत्रालय को सूचित किया है कि प्रधानमंत्री और अन्य प्रमुख हस्तियों द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट की अतिरिक्त निगरानी की जाएगी। साथ ही कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कई स्तरों पर इसकी समीक्षा की जाएगी। सूत्रों ने पीटीआई को बताया कि मेटा की टीम इस सप्ताह के अंत में या अगले सप्ताह की शुरुआत में सरकारी अधिकारियों से उस घटना के संबंध में मिल सकती है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए हटा दिया गया था।

सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी की एक फेसबुक पोस्ट को कुछ समय के लिए हटाए जाने के मुद्दे पर मंगलवार को मेटा के ग्लोबल हेड ऑफ पब्लिक पॉलिसी को तलब किया था। 23 जुलाई की पोस्ट में प्रधानमंत्री ने युवाओं को संबोधित किया था। उन्हें पेपर लीक के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया था। अमेरिका स्थित सोशल मीडिया कंपनी ने इस घटना के लिए तकनीकी खराबी को जिम्मेदार ठहराते हुए माफी मांगी थी। हालांकि, IT मंत्रालय ने इस स्पष्टीकरण को अपर्याप्त माना था।

प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो संदेश शुरू में 23 जुलाई को इंस्टाग्राम पर साझा किया गया था। बाद में फेसबुक पर पोस्ट किया गया था। लेकिन मेटा ने इसे अस्थायी रूप से ब्लॉक कर दिया था। सूत्रों के अनुसार, मेटा ने इस स्थिति के लिए अपने ऑटोमेटेड AI कंटेंट फिल्टर में तकनीकी खराबी को जिम्मेदार ठहराया। कंपनी ने कहा कि जो कंटेंट गलती से हटा दिया गया था, उसे बाद में बहाल कर दिया गया।

मेटा के अधिकारियों से इन पहलुओं पर होगी चर्चा

MeitY सचिव ने बताया कि प्रस्तावित बैठक में इस पूरे मामले के नीतिगत (Policy) और तकनीकी (Technical) दोनों पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। साथ ही यह भी समीक्षा की जाएगी कि Meta ने सरकार की चिंताओं के समाधान के लिए क्या कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि Meta ने सरकार को एक लेटर लिखकर इस घटना पर खेद (Regret) भी जताया है। साथ ही यह बताया है कि किन कारणों से पोस्ट हटाई गई थी।

Meta के जवाब की जांच जारी

एस. कृष्णन ने कहा कि केंद्र सरकार अभी Meta द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण का अध्ययन कर रही है। इसके अलावा, यूजरनेम से जुड़े मुद्दे पर विभिन्न मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स द्वारा दिए गए सुझावों और प्रस्तुतियों की भी जांच की जा रही है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने प्रधानमंत्री की फेसबुक पोस्ट हटाए जाने के मामले में Meta के वरिष्ठ वैश्विक अधिकारियों को तलब किया था।

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सरकारी सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार Meta के इस स्पष्टीकरण से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है कि पोस्ट ऑटोमेटेड सिस्टम की तकनीकी गलती (Automated Error) के कारण हटाई गई थी। सरकार और Meta के बीच इस मुद्दे पर बातचीत आगे भी जारी रहेगी।

‍बिहार में किन्नर बनाएंगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मंदिर, क्या है इसकी अहम वजह

Modi Temple Bihar

PM Modi Temple Bihar: बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की आधिकारिक बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर एक मंदिर का निर्माण कराने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया है। यह प्रस्ताव ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में उन्हें मिले कानूनी अधिकारों, सामाजिक सम्मान और संस्थागत पहचान के प्रति आभार व्यक्त करने के उद्देश्य से लाया गया है। बताया जा रहा है कि यह मंदिर राजधानी पटना में बनाया जाएगा। हालांकि इसके लिए स्थान का चयन अभी नहीं किया गया है। 

क्यों बनाया जा रहा है मोदी का मंदिर?

बिहार के पटना स्थित समाज कल्याण विभाग के कार्यालय में 'बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड' की आधिकारिक बैठक आयोजित की गई। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 लागू होने के बाद बोर्ड की यह पहली आधिकारिक बैठक थी। इसी बैठक के दौरान बोर्ड के सदस्य राजन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम समर्पित एक मंदिर बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव रखा।

प्रस्ताव की जानकारी देते हुए राजन सिंह ने बताया कि बिहार में ट्रांसजेंडर समुदाय के पास अभी तक अपना कोई आधिकारिक मंदिर या मुख्य सांस्कृतिक केंद्र नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2019 में ऐतिहासिक कानून बनाकर ट्रांसजेंडर समाज को न केवल अधिकार दिए, बल्कि समाज और राज्य सचिवालय जैसी संस्थाओं में प्रतिनिधित्व और सम्मान भी दिलाया। इसी सम्मान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समुदाय ने उनके नाम पर मंदिर निर्माण का निर्णय लिया है। ALSO READ: बिहार छात्र आंदोलन पर AK-47 से फायरिंग करने वाला सिपाही सस्पेंड, भाजपा सांसद संबित पात्रा घिरे

समुदाय के लिए 2019 कानून का महत्व

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार द्वारा 2019 में पारित किए गए ट्रांसजेंडर अधिकार कानून के तहत इस समुदाय को सामाजिक-आर्थिक विकास और सशक्तिकरण के कई अधिकार मिले हैं। इसी कानून के तहत गठित बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड के माध्यम से समुदाय के लोगों को राज्य स्तर पर संस्थागत आवाज मिली है। हालांकि बिहार के कटिहार में पहले से ही प्रतीकात्मक प्रतिमा मौजूद है। हालांकि एक्स पर की गई इस पोस्ट पर लोगों ने तीखे कमेंट किए हैं। 

8th Pay Commission: 3 नहीं, 5 ‘फैमिली यूनिट्स’ का नया फॉर्मूला! समझिए वो एक अकेला फैक्टर, जो आपकी सैलरी में करेगा बंपर इजाफा

8th Pay Commission Family Unit Formula: केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन में कितना बड़ा उछाल आएगा, इसका फैसला केवल महंगाई दर (DA) या आम आंकड़ों से तय नहीं होने वाला। इस बार एक ऐसा ‘मास्टर फैक्टर’ चर्चा में है, जो अगर लागू हो गया, तो आपकी न्यूनतम बेसिक सैलरी में 283% का ऐतिहासिक इजाफा हो सकता है।

यह मास्टर फैक्टर है ‘फैमिली यूनिट’ की संख्या में बदलाव। आसान भाषा में समझें तो अब तक सरकार आपके परिवार में सिर्फ 3 लोगों (आप, आपकी पत्नी/पति और बच्चे) का पेट पालने का खर्च जोड़कर सैलरी तय करती थी। लेकिन 8वें वेतन आयोग से मांग की जा रही है कि इसमें आश्रित माता-पिता को जोड़कर 5 फैमिली यूनिट्स का खर्च शामिल किया जाए।

आइए आसान गणित और सटीक उदाहरणों से समझते हैं कि यह ‘फैमिली यूनिट’ का नियम आपकी इनहैंड सैलरी और फिटमेंट फैक्टर पर कितना बड़ा असर डालेगा।

क्या है ‘फैमिली यूनिट’ और अब तक कैसे तय होती थी सैलरी?

वेतन आयोग कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन तय करने के लिए 1957 के 15वें इंडियन लेबर कांफ्रेंस (ILC) के मानकों का इस्तेमाल करता है। 7th पे कमीशन में 3 यूनिट्स का नियम था।

कर्मचारी = 1 यूनिट

पति/पत्नी = 1 यूनिट

2 बच्चे = 1 यूनिट (0.5 + 0.5)

कुल योग = 3 यूनिट्स

इसी 3 यूनिट के फॉर्मूले पर 7वें वेतन आयोग ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर दिया और आपकी न्यूनतम बेसिक पे ₹18,000 तय हुई।

8th Pay Commission में 5 यूनिट्स का नया प्रस्ताव

कर्मचारी = 1 यूनिट

पति/पत्नी = 1 यूनिट

2 बच्चे = 1.6 यूनिट (0.8 + 0.8)

आश्रित माता-पिता = 1.6 यूनिट (0.8 + 0.8)

कुल योग = 5.2 यूनिट्स (राउंड ऑफ करके 5 यूनिट्स)

3 बनाम 5 यूनिट से आपकी सैलरी में कितना फर्क आएगा?

मान लीजिए, एक परिवार के प्रति व्यक्ति महीने भर का न्यूनतम लिविंग कॉस्ट यानी राशन, कपड़ा, बिजली, मकान किराया, बच्चों की पढ़ाई, डॉक्टर का खर्च आज की महंगाई में ₹13,800 बैठता है।

केस A: पुराने फॉर्मूले (3 यूनिट) के तहत

3 यूनिट × ₹13,800 = ₹41,400 (अनुमानित न्यूनतम सैलरी)

केस B: नए प्रस्ताव (5 यूनिट) के तहत

5 यूनिट × ₹13,800 = ₹69,000 (प्रस्तावित न्यूनतम सैलरी)

फर्क साफ है कि सिर्फ 2 यूनिट्स माता-पिता का खर्च जुड़ने से ही आपकी बेसिक सैलरी सीधे ₹27,600 प्रति महीना अतिरिक्त बढ़ जाती है!

‘फिटमेंट फैक्टर’ में कैसे आएगा बंपर उछाल?

फिटमेंट फैक्टर वह मल्टीप्लायर होता है, जिससे आपकी पुरानी बेसिक सैलरी में गुणा करके नई बेसिक सैलरी निकाली जाती है।

7वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर: 2.57 (न्यूनतम बेसिक पे: ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हुई)।

5 यूनिट लागू होने पर 8वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर: 3.83

उदाहरण से समझें अपनी सैलरी की कैलकुलेशन:

अगर किसी केंद्रीय कर्मचारी (लेवल-1) की मौजूदा बेसिक सैलरी ₹18,000 है:

नई बेसिक सैलरी=मौजूदा बेसिक सैलरी×फिटमेंट फैक्टर

नई बेसिक सैलरी=₹18,000×3.83=₹68,940(≈₹69,000)

यानी 5 यूनिट्स का फॉर्मूला मंजूर होते ही आपकी बेसिक सैलरी ₹18,000 से बढ़कर सीधे ₹69,000 हो जाएगी। इसके ऊपर से मिलने वाला महंगाई भत्ता (DA), HRA और अन्य अलाउंस अलग से जुड़ेंगे।

कर्मचारी यूनियनों ने 5 यूनिट्स के लिए क्या कानूनी तर्क दिए हैं?

नेशनल काउंसिल ऑफ जेसीएम (NC-JCM) ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे ज्ञापन में 5 यूनिट्स लागू करने के लिए बेहद ठोस आधार पेश किए हैं:

सीनियर सिटीजन एक्ट का हवाला: ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम’ के तहत अपने बुजुर्ग माता-पिता का ध्यान रखना कर्मचारी की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।

सोशल सिक्योरिटी कोड 2020: नए लेबर कोड्स में भी कर्मचारी के परिवार की परिभाषा में आश्रित माता-पिता को कानूनी रूप से शामिल किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश: सुप्रीम कोर्ट (1991 और भूपेंद्र नाथ हजारिका केस) ने भी माना है कि सरकार को अपने कर्मचारियों को सिर्फ ‘जीवित रहने लायक’ नहीं, बल्कि एक ‘सम्मानजनक जीवन’ जीने लायक वेतन देना चाहिए।

8वें वेतन आयोग की चर्चाओं में ‘फिटमेंट फैक्टर 3.83’ की चाबी इसी ‘5 फैमिली यूनिट’ वाले नियम में छिपी है। अगर पे-पैनल माता-पिता के खर्च को आधार मानते हुए 5 यूनिट्स का नियम अपनाता है, तो यह देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन में अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उछाल लेकर आएगा।

LPG Cylinder Price: क्या फिर महंगा होगा LPG सिलेंडर? जानें दिल्ली से पटना तक के ताजा रेट

LPG Cylinder Price: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और होर्मुज में टैंकरों पर हो रहे हमले के कारण हाल के दिनों में इस अहम शिपिंग रूट से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है। ऐसे में अगर यही सिलसिला जारी रहा तो, जल्द ही पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। फिलहाल, भारत में कई दिनों से 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू और 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।

वहीं, अब इस बार देश की केंद्र सरकार दोबारा LPG की सप्लाई को लेकर समस्या नहीं झेलना चाहती है, और इसी वजह से भारत ने मिडिल ईस्ट पर निर्भरता कम करने और सप्लाई में रुकावट से बचने के लिए 2027 तक अपनी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की कुल इंपोर्ट का एक-चौथाई हिस्सा अमेरिका से मंगाने की योजना बना रहा है। भारत के इस कदम से अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर भी बात कुछ आगे बढ़ने की उम्मीद है।

शहरवार LPG की कीमतें

शहर घरेलू सिलेंडर की कीमतकमर्शियल सिलेंडर की कीमत
दिल्ली 942.0 रुपये3113.5 रुपये
मुंबई941.5 रुपये 3067.5 रुपये
कोलकाता968.0 रुपये3256.0 रुपये
चेन्नई 957.5 रुपये 3283.0 रुपये
बेंगलुरु944.5 रुपये 3198.0 रुपये
अमृतसर983.0 रुपये 3220.0 रुपये
लखनऊ979.5 रुपये3236.0 रुपये
गाजियाबाद939.50 रुपये3113.50 रुपये
पटना1031.5 रुपये3400.5 रुपये

खाड़ी देशों से आगे बढ़ेगा भारत का LPG नेटवर्क

साल की शुरुआत में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव और युद्ध जैसे हालात के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने भारत के लिए एलपीजी सप्लाई को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। इस संकट के बाद अब भारत ने अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया है। सरकार अब एलपीजी आयात के स्रोतों को बढ़ाने और किसी एक देश पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा रही है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति में घरेलू गैस आपूर्ति प्रभावित न हो।

बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है। 2025 में भारत ने अपने 21.85 मिलियन मीट्रिक टन LPG आयात का लगभग 90% हिस्सा मिडिल ईस्ट से मंगाया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में LPG की कुल खपत में आयात की हिस्सेदारी लगभग 66% थी।

कब बदले थे कमर्शियल और घरेलू सिलेंडर के दाम

1 जुलाई 2026 को 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर के दाम में 183.50 की कटौती की गई थी। जिसका सीधा फायदा होटल, रेस्टोरेंट और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को मिला है। जबकि इससे पहले 7 जून को घरेलू LPG सिलेंडर का दाम 29 रुपये बढ़ा गया था।

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किसान सम्मान के नाम से ई-20 पेट्रोल बिकेगा

भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार के बारे में एक बात माननी होगी। दोनों अपने किसी फैसले को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी तर्क खोज सकते हैं। जरूरी नहीं है कि फैसले को जस्टिफाई करने के लिए प्राइमरी तर्क पर ही अड़े रहे हैं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने फैसले को सही ठहराने के लिए प्राइमरी तर्क पर तभी अड़ती है, जब उसका फैसला उन्हीं तर्कों पर आधारित होता है। यहां उलटा है। यहां फैसला हो जाता है और उसके बाद उसको न्यायसंगत ठहराने के तर्क खोजे जाते हैं और तथ्य तैयार किए जाते हैं। नोटबंदी के फैसले के बाद पूरे देश ने देखा कि कितने तरह के तर्कों से इसे जस्टिफाई किया गया। प्राइमरी तर्क काला धन रोकना था। लेकिन बाद में कहा गया कि जाली नोट बंद होगा, नक्सलियों की कमर टूटेगी, आतंकवादियों का नेटवर्क समाप्त होगा और जब यह सब नहीं चला तो कहा गया कि डिजिटल लेन देन को बढ़ावा देने के लिए फैसला हुआ है। इन सबमें प्राइमरी तर्क कहीं गायब हो गया और आज उस समय के मुकाबले दो गुने से ज्यादा नकदी चलन में है।

बहरहाल, यही हाल इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल के मामले में दिख रहा है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का काम इसलिए शुरू हुआ था ताकि कच्चे तेल के आयात का बिल कम हो और लोगों को सस्ता पेट्रोल मिले। लेकिन न आयात बिल कम हुआ और न पेट्रोल सस्ता हुआ। जब मिश्रण शुरू हुआ था तब पेट्रोल की कीमत 60 रुपए लीटर के आसपास थी और अब जब सौ फीसदी पेट्रोल पंपों पर ई-20 पेट्रोल ही नॉर्मल पेट्रोल के तौर पर मिलने लगा तो कीमत दोगुनी हो गई है। आयात बिल भी बढ़ा है। इसलिए अब उसकी बात नहीं हो रही है। अब इसे किसानों के सम्मान और देश के अभिमान के नाम पर बेचा जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद और पार्टी के महासचिव विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट लिख कर कहा है, ‘ई-20 हर बूंद में किसान का सम्मान, हर सफर में आत्मनिर्भर भारत का अभिमान’। मतलब अब किसानों की भलाई के नाम पर इथेनॉल मिश्रण को जस्टिफाई किया जाएगा। सोचें, किसानों की भलाई के नाम पर ही तंबाकू लॉबी भी प्रचार करती है।

नीलेकणी क्या नीट खत्म करने की सिफारिश करेंगे?

इंफोसिस के सह संस्थापक और भारत में आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी के ऊपर केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने का जिम्मा सौंपा है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ को भी इस उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का सदस्य बनाया गया है। पता नहीं लोगों को याद हो कि न हो, दो साल पहले इसरो के पूर्व प्रमुख के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। जैसे 2026 में नीट यूजी पेपर लीक के बाद यह कमेटी बनी है वैसे ही 2024 में नीट यूजी पेपर लीक के बाद वह कमेटी बनी थी। राधाकृष्ण कमेटी ने एक सौ ज्यादा सिफारिशें की थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक उनकी 27 सिफारिशें ऐसी हैं, जिन पर ध्यान नहीं दिया गया। कुछ सिफारिशें आंशिक तौर पर मानी गईं और 57 सिफारिशों को पूरी तरह से स्वीकार किया गया। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? दो साल के बाद फिर पेपर लीक हो गया!

राधाकृष्ण कमेटी ने सिफारिश की थी नीट यूजी सहित करीब 20 प्रतियोगिता परीक्षाएं कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए में विषय के विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद भी पेपर लीक होना जारी है और दूसरी गड़बड़ियां भी हो ही रही हैं तो इसका अर्थ है कि एकमात्र समस्या यह नहीं है कि एनटीए में विषय के विशेषज्ञ नहीं हैं। समस्या संरचनात्मक और व्यवस्थागत है। अगर नंदन नीलेकणी संरचनात्मक समस्याओं को समझ कर उसे ठीक करने का सुझाव देते हैं तब तो ठीक है अन्यथा इसका भी कोई मतलब नहीं होगा।

उनके सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे अखिल भारतीय परीक्षा के सिद्धांत को खत्म करने की सिफारिश करेंगे? क्या वे कहेंगे कि एक बार में 24 लाख छात्रों वाली नीट यूजी की परीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या वे यह सिफारिश कर सकते हैं कि मेडिकल में दाखिले की पुरानी व्यवस्था बहाल हो और नीट यूजी की बजाय राज्यों को अपने कॉलेजों में दाखिले का अधिकार पहले जैसा दिया जाए? यानी शिक्षा और परीक्षा के मामले में राज्यों की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। अगर नंदन नीलेकणी की कमेटी नीट समाप्त करने और मेडिकल में दाखिले की परीक्षा का विकेंद्रीकरण करने की सिफारिश नहीं करती है तो उनकी सिफारिशों का स्कोप बहुत सीमित हो जाएगा और तब किसी बड़े सुधार की संभावना कम हो जाएगी।

अब सवाल है कि अगर नीट समाप्त करने या नीट जैसी दूसरी अखिल भारतीय परीक्षाएं खत्म करने की सिफारिश नीलेकणी कमेटी नहीं करती है तो उसके पास क्या विकल्प बचेगा? सबसे अच्छा तो यही होगा कि नीट को समाप्त किया जाए। लेकिन अगर सरकार की ओर से कमेटी की सिफारिशों का जो स्कोप तय किया जाएगा यानी जो फ्रेमवर्क दिया जाएगा उसमें पहले ही यह स्पष्ट कर दिया जाए कि नीट की परीक्षा जारी रहेगी तो फिर नीलेकणी कमेटी को नीट को इंजीनियरिंग में दाखिले की परीक्षा जेईई की तरह दो चरणों में कराने की सिफारिश करनी चाहिए। ध्यान रहे अगले साल नीट की परीक्षा जेईई की तरह कंप्यूटर आधारित होगी और कई पालियों में होगी। हालांकि उसमें प्रश्नपत्रों की कठिनता के आधार पर अंकों के सामान्यीकरण की अलग समस्या आती है। फिर भी कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा पेपर लीक की संभावना को कम करती है। इसके साथ साथ अगर नीट की परीक्षा भी जेईई के तरह दो चरण में हो तो पेपर लीक की संभावना और कम हो सकती है। दो चरण का अर्थ है कि पहले चरण में प्रारंभिक परीक्षा हो और दूसरे चरण में एडवांस परीक्षा हो। पहले चरण में मल्टीपल च्वाइस वाले प्रश्न हों और दूसरे चरण में सब्जेक्टिव प्रश्न पूछे जाएं।

इसके अलावा नीलेकणी कमेटी को मेडिकल की पढ़ाई की फीस को नियमित करने के बारे में भी सुझाव देने चाहिए। अभी मेडिकल की परीक्षा में सबसे ज्यादा प्रश्न पत्र इसलिए लीक होते हैं कि एक बार में परीक्षा होती है और 720 अंकों की परीक्षा में अगर अच्छे अंक आ गए तो देश के प्रीमियम संस्थान में बहुत कम फीस में पढ़ने का मौका मिलता है। अन्यथा निजी कॉलेजों में फीस इतनी ज्यादा है कि लोग स्वाभाविक रूप से पेपर लीक पर पैसा खर्च करने के लिए प्रेरित होते हैं। खुद सरकार इसी वजह से इसे हाई स्टेक यानी बड़े दांव वाली परीक्षा मानती है। नीट के बचाव में तर्क दिया जाता है कि इसमें क्वालिफाई करके गरीब बच्चे भी मेडिकल की पढ़ाई कर सकते हैं। यह गलत है। निजी मेडिकल कॉलेजों में फीस एक से डेढ़ करोड़ रुपए तक है। ऐसे में कौन गरीब अपने बच्चों को वहां पढ़ा पाएगा! अगर डोनेशन नहीं देना पड़े तब भी निजी कॉलेजों में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर है।

बहरहाल, नीलेकणी कमेटी को सिर्फ नीट पर विचार नहीं करना है, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने के सुझाव देने हैं। इसकी शुरुआत एनटीए से हो सकती है। भारत सरकार ने एक देश, एक परीक्षा की महत्वाकांक्षी योजना के तहत एनटीए का गठन किया। इसके बाद एक एक करके परीक्षाओं को अखिल भारतीय स्वरूप दिया जाने लगा। मेडिकल की परीक्षा के साथ साथ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए भी सीयूईटी की परीक्षा ली जाने लगी। इसमें अलग समस्याएं हैं। वास्तविकता यह है कि एनटीए देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधार में शून्य योगदान दे रहा है। सो, नीलेकणी कमेटी एनटीए को खत्म करने और पुरानी विकेंद्रित परीक्षा व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश करे। सवाल है कि अगर एनटीए को समाप्त करना उसके स्कोप ऑफ वर्क से बाहर हो तो क्या करना चाहिए? तब उसे एनटीए में सुधार की सिफारिश करनी चाहिए।

सबसे पहला सुधार तो यह जरूरी है कि एनटीए को कम से कम वैधानिक दर्जा दिया जाए। अगर सरकार चाहती है कि यूपीएससी की तरह इसकी परीक्षाएं विश्वसनीय बनें तो इसे संवैधानिक नहीं तो वैधानिक दर्जा दिया जाए। इसका अपना कैडर बने ताकि तदर्थ ढंग से काम नहीं हो। अभी इधर उधर से ले आकर अधिकारियों को रखा जाता है और गड़बड़ी होने पर बाद में उनको वापस अपने कैडर में भेज दिया जाता है। इससे जवाबदेही नहीं बनती है। इसके बाद ठेके पर नियुक्ति रोकने की सिफारिश की जाए और परीक्षा से जुड़े काम आउटसोर्स करने पर रोक लगे। यूपीएससी की तरह एनटीए का अपना बुनियादी ढांचा बने। विशेषज्ञों की नियुक्ति हो और पूरे साल इसका काम चले। जैसे यूपीएससी की परीक्षा में प्रश्न पत्र के ढेर सारे सेट बनते हैं और किसी को पता नहीं होता है कि परीक्षा में कौन से सेट का इस्तेमाल होगा वैसी व्यवस्था एनटीए द्वारा आय़ोजित की जाने वाली परीक्षाओं के लिए भी की जाए। एनटीए जिन परीक्षाओं का आयोजन करता है उसके अलावा भी कई एजेंसियां हैं, जो दाखिला और भर्ती परीक्षा आयोजित करती हैं। उनमें भी एनटीए की तर्ज पर ही सुधार की सिफारिश होनी चाहिए। हालांकि सिर्फ कमेटी की सिफारिशों से कुछ खास नहीं होगा। सरकार की मंशा और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए तभी जरूरी सुधार होंगे।

Paper Leak Law 2026 : लोकसभा से पास हुआ नया एंटी पेपर लीक बिल, अब 10 साल की जेल और 10 रुपए करोड़ तक जुर्माना, क्या-क्या बदला

Paper Leak Law 2026

प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक को लेकर लगातार उठ रहे विवाद और संसद में कई दिनों तक चले राजनीतिक घमासान के बीच लोकसभा ने पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 (Public Examination (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026) को पारित कर दिया है। सरकार का दावा है कि यह नया कानून पहले से कहीं अधिक सख्त होगा और इससे पेपर लीक माफियाओं पर प्रभावी कार्रवाई संभव हो सकेगी।

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संसद में विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। विपक्ष ने हाल के परीक्षा विवादों और छात्रों के प्रदर्शन का मुद्दा उठाया, जबकि सरकार ने कहा कि पेपर लीक किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार के मुताबिक इस संशोधन का उद्देश्य केवल सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता बनाए रखना और करोड़ों छात्रों के भविष्य की रक्षा करना है।

 

क्यों लाना पड़ा नया संशोधन?

 

केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट लागू किया था ताकि पेपर लीक और परीक्षा में धांधली को अपराध बनाया जा सके। हालांकि इसके बाद भी कई भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं, खासकर NEET पेपर लीक मामले, ने पूरे देश में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। सरकार का कहना है कि 2024 के कानून को लागू करने के दौरान जो कमियां सामने आईं, उन्हें दूर करने और दोषियों के खिलाफ तेज कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए यह संशोधन लाया गया है।

 

संसद में सरकार ने क्या कहा?

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा कि सरकार ने पूरी ईमानदारी से परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से यह संशोधन किया है। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न किया जाए क्योंकि विभिन्न राज्यों और अलग-अलग दलों की सरकारों के दौरान भी पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं।

 

उन्होंने बताया कि 2024 में कानून लागू होने के बाद से अब तक 52 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि पेपर लीक से जुड़े मामलों के कारण होने वाली आत्महत्या की घटनाओं में भी कमी आई है।

 

नए एंटी पेपर लीक कानून में क्या-क्या बदलेगा?

1. हर राज्य में फास्ट-ट्रैक कोर्ट

 

अब प्रत्येक राज्य में पेपर लीक और परीक्षा घोटालों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे। इससे मामलों का जल्द निपटारा हो सकेगा।

 

2. दो महीने में जांच पूरी करना होगा

 

विधेयक के अनुसार, पेपर लीक से जुड़े मामलों की जांच अधिकतम दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी, ताकि चार्जशीट और ट्रायल में देरी न हो।

 

3. 10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपए जुर्माना

 

यदि कोई व्यक्ति पेपर लीक का दोषी पाया जाता है, तो उसे 10 साल तक की सजा और 50 रुपए लाख तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। सरकार का मानना है कि इससे ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगेगी।

 

4. संगठित गैंग पर 10 करोड़ रुपए तक जुर्माना

 

यदि कोई संगठित गिरोह बड़े स्तर पर पेपर लीक रैकेट चलाता हुआ पाया जाता है, तो उस पर ₹10 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। इसका उद्देश्य पेपर लीक माफिया के पूरे नेटवर्क को खत्म करना है।

 

क्यों है यह कानून अहम?

 

देश में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में लाखों छात्र शामिल होते हैं। ऐसे में पेपर लीक होने से न केवल छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में देरी और पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।

 

पिछले कुछ वर्षों में कई बड़ी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के आरोप लगे, जिसके बाद देशभर में प्रदर्शन, अदालतों में याचिकाएं और परीक्षा सुधार की मांग तेज हुई।

 

क्या नया कानून पूरी तरह खत्म कर देगा पेपर लीक?

 

एक्सपर्ट्स के मुताबिक केवल कानून सख्त बनाने से पेपर लीक पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। इसके लिए परीक्षा प्रणाली की डिजिटल सुरक्षा मजबूत करनी होगी, प्रश्नपत्रों की प्रिंटिंग और वितरण प्रक्रिया को सुरक्षित बनाना होगा, जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा और परीक्षा कराने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।

 

छात्रों के लिए क्या मायने?

सरकार का कहना है कि नया संशोधन करोड़ों छात्रों को निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कानून का पालन कितनी प्रभावी और समयबद्ध तरीके से किया जाता है।

Rahul Gandhi : राहुल गांधी के आरोपों से लोकसभा में हंगामा, अमित शाह पर छात्रों पर गोली चलवाने का आरोप, सरकार ने मांगा सबूत, पेपर लीक बिल पर तीखी बहस

rahul gandhi

लोकसभा में 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026' पर चर्चा के दौरान विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर बल प्रयोग और पैलेट गन चलाने का आदेश गृह मंत्री ने दिया था।

आज शाम 6 राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी करेंगे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर पोस्ट में कहा कि मुझे बीजेपी ने बोलने नहीं दिया। उनके इस बयान पर सदन में भारी हंगामा मच गया और भाजपा सांसदों ने आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे। राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि गृह मंत्री ने हमारे छात्रों पर गोली चलाने का आदेश दिया। उन्होंने छात्रों के शरीर में पैलेट पहुंचाए। छात्रों पर बल प्रयोग का आदेश केवल गृह मंत्री या प्रधानमंत्री ही दे सकते हैं।” उन्होंने अमित शाह की अनुपस्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि गृह मंत्री सदन में आने का साहस नहीं दिखा रहे हैं और वे डरे हुए हैं।

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किरण रिजिजू ने पूछा- आरोप का आधार क्या है?

 

राहुल गांधी के बयान पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “आप इतने गंभीर आरोप किस आधार पर लगा रहे हैं? आपको यह जानकारी किसने दी? यह पूरी तरह गलत है। इस बयान को सदन की कार्यवाही से हटाया जाना चाहिए।” रिजिजू ने राहुल गांधी से माफी मांगने की भी मांग की और कहा कि नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहते हुए इस तरह का निराधार आरोप लगाना संसदीय गरिमा के खिलाफ है।

 

RSS पर भी साधा निशाना

 

राहुल गांधी ने अपने भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्रालय पर RSS का प्रभाव है और पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान केवल एक प्रतीक थे। उन्होंने कहा, “शिक्षा मंत्रालय की आत्मा पर RSS का कब्जा है। मंत्रालय को वास्तव में RSS चला रहा है।”

 

राहुल गांधी ने हालिया छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि एक छात्र ने उन्हें समाज की तीन श्रेणियां बताईं—स्टूडेंट्स, इडियट्स और अंधभक्त। उन्होंने अंधभक्तों को लेकर की गई टिप्पणी भी दोहराई, जिस पर सत्ता पक्ष ने कड़ा विरोध जताया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राहुल गांधी की कई टिप्पणियों को असंसदीय बताते हुए कार्यवाही से हटाने (Expunge) का निर्देश दिया।

 

पेपर लीक संशोधन विधेयक 2026 लोकसभा से पारित

 

लोकसभा ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। सरकार का दावा है कि यह कानून पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करेगा और परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाएगा।

 

डिंपल यादव ने उठाए सरकार की मंशा पर सवाल

 

समाजवादी पार्टी सांसद डिंपल यादव ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि वर्ष 2024 में भी इसी विषय पर कानून पारित किया गया था और उसमें 101 सिफारिशें शामिल थीं। इसके बावजूद देशभर में लगातार पेपर लीक की घटनाएं हो रही हैं।

 

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार की नीयत और नीति दोनों स्पष्ट नहीं हैं और पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार से प्रभावित हो चुका है। उनके मुताबिक केवल संशोधन लाने से कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा और इसका नुकसान देश के युवाओं को उठाना पड़ रहा है।

 

अनुराग ठाकुर बोले- राहुल गांधी युवाओं से माफी मांगें

 

भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्होंने छात्रों के लिए 'इडियट' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिसके लिए उन्हें देश के युवाओं से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा, “आंदोलन के दौरान कहीं भी गोली नहीं चली। राहुल गांधी ने गृह मंत्री पर झूठे आरोप लगाए हैं। उन्हें अमित शाह और देश के युवाओं से माफी मांगनी चाहिए।”

 

प्रियंका गांधी बोलीं- देश ने सब देखा

 

लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद परिसर के बाहर कहा, “पूरे देश ने देखा कि क्या हुआ। एक छात्र की आंख चली गई।”

 

जितेंद्र सिंह का राहुल गांधी पर तंज

 

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि 21 जुलाई को वह प्रधानमंत्री आवास 7, लोक कल्याण मार्ग के बाहर बैठ गए थे क्योंकि उनकी इच्छा वहां रहने की थी। उन्होंने कहा कि जब उन्हें वहां से हटाने की विनम्र कोशिश की गई तो उन्होंने स्वयं कहा कि उन्हें वहां से हटाया जाए।

 

अखिलेश यादव ने गृह मंत्रालय को ठहराया जिम्मेदार

 

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि घायल छात्रों को विपक्ष के पहुंचने से पहले ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उनके मुताबिक दिल्ली पुलिस और सुरक्षा बल गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं, इसलिए इसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है।

 

इस पूरे घटनाक्रम के बीच पेपर लीक, छात्र आंदोलन और सरकार की कार्रवाई को लेकर संसद में तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। विपक्ष सरकार पर युवाओं के साथ अन्याय का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार विपक्ष पर भ्रामक और निराधार आरोप लगाने का आरोप लगा रही है।

एक्टिविज्म करना है तो सजा के लिए तैयार रहें, नड्डा का खरगे पर पलटवार

JP Nadda statement Rajya Sabha: संसद के मॉनसून सत्र में नीट पेपर लीक और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर बुधवार को राज्यसभा में भारी हंगामा हुआ। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने पुलिस कार्रवाई और माकपा कार्यालय में पुलिस के प्रवेश को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। इस पर पलटवार करते हुए राज्यसभा में सदन के नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने पुलिस कार्रवाई का बचाव किया और स्पष्ट कहा कि अगर किसी छात्र को एक्टिविज्म करना है, तो उसे इस तरह की कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए।

 

बुधवार को राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने नीट पेपर लीक और दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज का मुद्दा उठाकर जोरदार हंगामा किया। सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने माकपा कार्यालय में दिल्ली पुलिस के दाखिल होने और जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष को गिरफ्तार करने के प्रयास का मामला उठाया। उन्होंने कहा कि 2021 के एक मामले में सादे कपड़ों में आई पुलिस टीम ने केवल इसलिए यह कार्रवाई की क्योंकि आइशी घोष ने जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन में भाग लिया था। ALSO READ: संसद में आर-पार, सपा सांसदों का दानपेटी प्रदर्शन, प्रियंका बोलीं मैंने कुछ गलत नहीं कहा

खरगे का सरकार पर हमला

कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि एक राष्ट्रीय पार्टी के कार्यालय में घुसकर किसी को गिरफ्तार करने की कोशिश करना बेहद शर्मनाक है। क्या इससे लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ता? खरगे ने पुलिस टीम पर कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि ऐसे कदम देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर आघात हैं।

केन्द्रीय मंत्री नड्डा का पलटवार

खरगे के आरोपों का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री और सदन के नेता जेपी नड्डा ने पुलिस कार्रवाई का मजबूती से समर्थन किया। अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए नड्डा ने कहा कि ये बहुत ही सामान्य स्थिति है। मैं खुद स्टूडेंट एक्टिविस्ट रहा हूं। इमरजेंसी के दौरान मुझे कई बार क्लासरूम से उठाकर ले जाया गया, तब देश में कांग्रेस की सरकार थी। अगर किसी छात्र को एक्टिविज्म करना है तो उसे ये सब झेलना ही पड़ेगा। ALSO READ: Priyanka Gandhi : प्रियंका गांधी के बयान पर संसद में बवाल, प्रह्लाद जोशी पर टिप्पणी से मचा हंगामा, माफी की उठी मांग

 

नड्डा ने आगे कहा कि जब कोई कानून हाथ में लेता है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को अपनी जिम्मेदारी निभानी ही पड़ती है। इसे गैर-जरूरी तरीके से सनसनीखेज बनाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि मैंने खुद दो बार गिरफ्तारी झेली है, इसलिए छात्र राजनीति में ऐसी सजाओं के लिए तैयार रहना पड़ता है।