अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस:हारे तो मनमानी पर रोक लगेगी, नवंबर में होनी है वोटिंग

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। इप्सॉस-एएपीआई सर्वे के मुताबिक, चुनाव में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के हारने की आशंका 65% तक है। नवंबर में मिडटर्म के लिए वोटिंग होनी है। मिडटर्म चुनाव ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल के बीच होने वाला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के साथ राज्यों और स्थानीय सरकारों के कई अहम पदों के लिए वोटिंग होगी। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के करीब 80% उम्मीदवार पहले ही तय हो चुके हैं। मिडटर्म में रिपब्लिकन पार्टी हारती है तो ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। लेकिन कांग्रेस में बहुमत खोने पर उनके फैसलों पर रोक-टोक बढ़ सकती है। टैरिफ, वीजा और दूसरे बड़े नीतिगत फैसलों को लागू करने में ट्रम्प को डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। कार्यकाल के बाकी दो साल में उन्हें कांग्रेस के साथ ज्यादा तालमेल बनाकर चलना होगा। मिडटर्म में ट्रम्प की तीन सबसे बड़ी चुनौती… महंगाई, इमिग्रेशन और ईरान युद्ध 1. महंगाई: ट्रम्प की आर्थिक रेटिंग 32% पर​ फिसल गई अमेरिकी वोटरों की सबसे बड़ी चिंता महंगाई है। इप्सोस सर्वे में 54% लोगों ने महंगाई और अर्थव्यवस्था को वोट का बड़ा मुद्दा बताया। वहीं, एपी-एनओआरसी सर्वे में सिर्फ 32% लोगों ने माना कि ट्रम्प अर्थव्यवस्था अच्छी तरह संभाल रहे हैं। 69% अमेरिकियों को मौजूदा आर्थिक हालात खराब लगते हैं। इप्सोस सर्वे में 65% लोगों ने कहा कि रोजमर्रा का किराना महंगा पड़ रहा है, जबकि 48% को डर है कि अगले साल आर्थिक हालात और खराब हो सकते हैं। ईरान युद्ध: 20% वोटरों के लिए बड़ा मुद्दा ईरान युद्ध अब सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं है। इसका असर सीधे अमेरिकी लोगों की जेब पर पड़ रहा है। इप्सोस सर्वे में 20% वोटरों ने ईरान युद्ध को वोट का अहम मुद्दा बताया। अगर जंग लंबी खिंची और तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। यानी ट्रम्प के सामने चुनौती है ईरान पर सख्ती भी दिखानी है और अमेरिकी लोगों को महंगाई से राहत का भरोसा भी देना है। इमिग्रेशन: 61% अमेरिकी ट्रम्प की नीति से नाराज 2024 में इमिग्रेशन ट्रम्प की बड़ी ताकत था, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। हालिया सर्वे में 61% अमेरिकियों ने ट्रम्प की इमिग्रेशन नीति का विरोध किया, जबकि समर्थन सिर्फ 39% रहा। दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ट्रम्प की इस नीति को 49% लोगों का समर्थन था। रिपब्लिकन वोटरों में भी समर्थन घटकर 80% रह गया है। सख्त डिपोर्टेशन और इमिग्रेशन कार्रवाई के बीच बढ़ती नाराजगी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प के लिए बड़ा नुकसान बन सकती है। ट्रम्प पर महाभियोग का खतरा बढ़ेगा अगर रिपब्लिकन कांग्रेस में बहुमत खो देते हैं, तो ट्रम्प पर महाभियोग की कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है। डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में मजबूत होते हैं तो वे ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। कांग्रेस के पास टैरिफ और इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों पर बड़ा अधिकार है। वह ट्रम्प के फैसलों पर कानून बनाकर रोक लगा सकती है और वीजा नीति को भी चुनौती दे सकती है। ईरान युद्ध में भी कांग्रेस सैन्य कार्रवाई और युद्ध के लिए फंडिंग पर ट्रम्प पर दबाव बना सकती है। यानी कांग्रेस का बहुमत गया तो ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लग सकती है।

Asian Market Today: कमजोर जॉब रिपोर्ट से दौड़ा ग्लोबल बाजार, एशिया में तेजी, निक्केई, कोस्पी 1.5% ऊपर

Asian Market Today:  एशियाई शेयर बाज़ारों में तेजी देखने को मिली। वॉल स्ट्रीट में शुक्रवार के सत्र के बाद आई बढ़त को देखते हुए थी, जो उम्मीद से कमज़ोर अमेरिकी जॉब डेटा के कारण हुई थी। रिकॉर्ड ऊंचाई पर S&P बंद हुआ। नैस्डैक में भी 1 फीसदी से ज्यादा की बढ़त देखने को मिली। निक्केई में 1.29% और कोस्पी में 1.47% की बढ़त हुई, जबकि टोपिक्स में 0.36% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। हैंग सेंग फ्यूचर्स में 0.5% की तेज़ी दिखी, हालांकि S&P 500 फ्यूचर्स में 0.2% की गिरावट आई।

यह तेज़ी उस खबर के बाद आई जिसमें पता चला कि अमेरिकी नियोक्ताओं ने जुलाई में उम्मीद के उलट नौकरियों में कटौती की थी, और पिछले दो महीनों के हायरिंग के आंकड़ों को भी घटाकर संशोधित किया गया था।

वॉल स्ट्रीट

रविवार रात S&P 500 फ्यूचर्स में गिरावट आई, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच जल्द समझौते की संभावना को लेकर चिंताएं बढ़ गई।

S&P 500 से जुड़े फ्यूचर्स में लगभग 0.2% की गिरावट आई, जबकि नैस्डैक-100 फ्यूचर्स में 0.1% की बढ़त हुई। डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज फ्यूचर्स 99 अंक या 0.2% गिरे।

कच्चे तेल की कीमतें

सोमवार को तेल की कीमतों में बढ़त हुई क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य के फिर से खुलने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। ईरान ने कहा कि ओमान के साथ नए शिपिंग रूट बनाने का समझौता पूरा होने वाला है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका को अभी भी कुछ अतिरिक्त शर्तें पूरी करनी होंगी।

ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 91 सेंट या 1.09% बढ़कर $84.46 प्रति बैरल हो गए, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड फ्यूचर्स 61 सेंट या 0.78% बढ़कर $78.79 प्रति बैरल हो गए।

पिछले हफ़्ते इन दोनों बेंचमार्क में 7% से ज़्यादा की गिरावट आई थी। यह गिरावट इस उम्मीद में हुई थी कि ईरान और ओमान एक समझौते के करीब हैं, जिससे होर्मुज़ जलडमरूमध्य के फिर से खुलने का रास्ता साफ़ हो सकता है। युद्ध से पहले दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुज़रता था।

अमेरिका-ईरान युद्ध

ईरान ने रविवार को कहा कि ओमान के साथ समझौता “अंतिम चरण” में है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य तभी फिर से खोला जाएगा जब अमेरिका अतिरिक्त शर्तें पूरी कर लेगा। इन शर्तों में तेहरान को उन बड़े हमलों के लिए मुआवज़ा देना भी शामिल है जिनका उसे सामना करना पड़ा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच अभी कोई बातचीत नहीं हो रही है और जब तक अमेरिका जून में हुए अंतरिम समझौते का उल्लंघन करता रहेगा, ईरान बातचीत शुरू नहीं करेगा।

इस बीच, ईरान का समर्थन करने वाली हूथी सेनाओं ने रविवार को दावा किया कि उन्होंने सऊदी अरामको की जाज़ान रिफाइनरी को निशाना बनाया है। यह घटना सऊदी अरब द्वारा तुर्की और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता करने के दो दिन बाद हुई, जबकि ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल के टकराव के कारण इलाके में तनाव बढ़ रहा है।

अलग से, संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी ADNOC ने शुक्रवार को कहा कि संघर्ष शुरू होने के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरते समय उसके 15 जहाजों पर हमले हुए हैं।

आज सोने की कीमत

जनवरी के बाद से सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त दर्ज करने के बाद सोने की कीमतें काफी हद तक स्थिर रहीं। ट्रेडर्स ने अमेरिकी लेबर मार्केट में अप्रत्याशित गिरावट का आकलन किया, जिससे ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की चिंता कम हुई।

पिछले हफ्ते 7% से अधिक की बढ़त के बाद, एशियाई बाजार में शुरुआती घंटों में सोना लगभग $4,345 प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था।

हाल के हफ्तों में यह कीमती धातु काफी हद तक $4,000 प्रति औंस के अहम सपोर्ट लेवल से ऊपर बनी हुई है। जून में युद्ध के कारण हुई भारी बिकवाली से सोना ‘बेयर मार्केट’ (गिरावट वाले बाजार) में चला गया था, जिसके बाद अब कम कीमत पर खरीदारी (dip-buying) में तेजी आई है।

हालिया रिकवरी के बावजूद, सोना अभी भी फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर से लगभग 20% नीचे है।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

पाकिस्तान पर अटैक हुआ तो सऊदी-तुर्किये हमला करेंगे? नए ‘इस्लामिक NATO’ का भारत के लिए क्या मायने है?

Saudi Arabia-Turkey-Pakistan Mecca Alliance: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस मक्का डील के तहत इनमें से किसी एक भी देश पर किये गए हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपने देश को आतंकवाद का शिकार बताने की कोशिशें शुरू कर दी है। उन्होंने इस समझौते को ‘इस्लामिक NATO’ करार दिया। साथ ही भारत और इजरायल की तरफ से पैदा की गई चुनौतियों से निपटने का आग्रह किया।

एक संयुक्त बयान के अनुसार, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी युवराज (क्राउन प्रिंस) मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने मक्का के अल-सफा पैलेस में हुई एक बैठक के दौरान ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। संयुक्त रक्षा के लिए मक्का अल-मुकर्रमा शिखर सम्मेलन के दौरान हुए इस समझौते का मकसद किसी भी तरह के हमले के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है।

एक देश पर हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा

बयान के अनुसार, “इसमें यह भी तय किया गया कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी हुआ कोई भी सशस्त्र हमला, उन सभी पर हमला माना जाएगा।” बयान में कहा गया है कि इसमें तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को बेहतर बनाने की बात भी शामिल है। बयान में कहा गया है, “यह समझौता एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की दिशा में अपनी सामूहिक सुरक्षा को और मजबूत करने तथा क्षेत्र और उसके बाहर शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए तीनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।”

यह समझौता पाकिस्तान (जो परमाणु हथियारों से लैस एकमात्र मुस्लिम देश है), सऊदी अरब (जो इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों का केंद्र और दुनिया के प्रमुख तेल निर्यातकों में से एक है) और तुर्की (जो नाटो का सदस्य है) को एक साथ जोड़ता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष कई मोर्चों पर फैल गया है। इसमें लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी शामिल हैं, जिसके कारण खाड़ी देशों को क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग मजबूत करना पड़ा है। शहबाज शरीफ ने अप्रैल में सऊदी अरब का दौरा किया था, जिस दौरान उन्होंने वहां के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत की थी।

तुर्किये और इजरायल में बढ़ा तनाव

हाल के महीनों में तुर्किये और इजरायल के बीच तनाव बढ़ा है। पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें यह संकल्प लिया गया था कि उन दोनों में से किसी भी देश पर हमले को दोनों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई माना जाएगा। रक्षा समझौते के तहत, पाकिस्तान ने संयुक्त ट्रेनिंग, रक्षा सहयोग और सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतों में मदद के लिए सैन्य कर्मियों और विमानों को तैनात किया।

संयुक्त बयान में कहा गया है कि मक्का समझौता तीनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक संबंधों से प्रेरित है। यह भाईचारे और इस्लामी एकजुटता के मजबूत संबंध पर आधारित है जो उन्हें आपस में जोड़ते हैं। साथ ही यह उनके साझा रणनीतिक हितों और लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग पर भी आधारित है। शुक्रवार को हुई बैठक के दौरान, तीनों पक्षों ने अपने संबंधों की समीक्षा की और पारस्परिक हित के कई मुद्दों पर चर्चा की।

क्या बोले एक्सपर्ट?

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते से पश्चिम एशिया में अमेरिका की रणनीतिक भूमिका काफी कम हो सकती है। रक्षा विश्लेषक और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एक पूर्व प्रमुख के बेटे अब्दुल्ला हमीद गुल ने कहा कि यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों को सुरक्षा मुहैया कराने की अमेरिका की क्षमता को लेकर क्षेत्र में शंकाएं बढ़ रही हैं।

गुल ने कहा, “खाड़ी देशों में अमेरिका के 27 सैन्य अड्डे थे। उनमें से 17 को अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान ईरान ने तबाह कर दिया। इससे क्षेत्र में ये सवाल उठने लगे कि क्या अमेरिकी वाकई उनकी रक्षा कर सकते हैं। इसी वजह से ऐसे समझौते करने की जरूरत पड़ी।” गुल ने कहा कि इस समझौते के साथ ही क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका बहुत कम या कहें कि खत्म सी हो जाएगी। गुल ने कहा, “कतर और कुवैत भी जल्द ही पाकिस्तान के साथ इसी तरह के समझौतों में शामिल होंगे।”

उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को आभास हो गया था कि ईरान के बजाय इजरायल उनके लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती खड़ी कर सकता है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ मोहम्मद मेहदी ने कहा कि इस समझौते ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति को लेकर धारणा बदल दी है। वहीं, रिटायर्ड ब्रिगेडियर फारूक हमीद ने कहा कि इस समझौते में यह प्रावधान है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। लिहाजा पाकिस्तान और भारत के बीच भविष्य में किसी तरह के संघर्ष के विरुद्ध यह प्रावधान ‘निवारक’ के रूप में काम करेगा।गठजोड़ से नई दिल्ली की बढ़ेगी टेंशन?

मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने एक-दूसरे की सुरक्षा को लेकर सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता जताई है। इस समझौते की सबसे अहम शर्त यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान इस समझौते की तुलना NATO के Article 5 से किए जाने की सबसे बड़ी वजह है। NATO के Article 5 के तहत किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसके सदस्य देश सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया देने की प्रतिबद्धता जताते हैं।

पाकिस्तान ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा

समझौते पर हस्ताक्षर के अगले ही दिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपने देश को आतंकवाद से पीड़ित राष्ट्र के रूप में पेश करने की कोशिश की। उन्होंने कथित तौर पर ‘Islamic NATO’ से उन चुनौतियों से निपटने की अपील, जिन्हें उन्होंने भारत और इजरायल से जुड़ा बताया। पाकिस्तान की इस बयानबाजी को खास तौर पर भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच लंबे समय से सुरक्षा, आतंकवाद और सीमा संबंधी मुद्दों पर तनाव बना रहा है।

एक पर हमला तो तीनों आएंगे साथ?

मक्का में हुए इस संयुक्त रक्षा समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामूहिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता है। यानी अगर समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विश्लेषक इसे NATO मॉडल से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, केवल इस प्रावधान के आधार पर इसे NATO का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। NATO एक व्यापक, संस्थागत और दशकों पुराना सैन्य गठबंधन है। जबकि पाकिस्तान-सऊदी अरब और तुर्किये के बीच यह समझौता तीन देशों की रक्षा साझेदारी पर आधारित है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह एग्रीमेंट?

नई दिल्ली के लिए इस समझौते का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों शामिल हैं। साथ ही तुर्किये भी पाकिस्तान के साथ करीबी रक्षा संबंध रखता है। भारत की चिंता का एक पहलू यह हो सकता है कि पाकिस्तान भविष्य में क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सुरक्षा चिंताओं को सामूहिक रक्षा के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश करे।

ये भी पढ़ें- Khamenei Video: ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई की हालत बेहद गंभीर! अचानक सामने आया वीडियो, बीमारी की खबरों के बीच मचा हड़कंप

खासकर तब, जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री भारत और इजरायल को कथित चुनौतियों से जोड़ रहे हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस नए डिफेंस डील का इस्तेमाल पाकिस्तान अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए करेगा?

क्या भारत के खिलाफ बनेगा सैन्य मोर्चा?

फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि यह समझौता सीधे तौर पर भारत के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन है। समझौते का घोषित आधार तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा और सुरक्षा सहयोग है। लेकिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा भारत और इजरायल का नाम लेकर बयान देना निश्चित रूप से इस घटनाक्रम को नई दिल्ली के लिए अधिक संवेदनशील बना देता है। भारत के लिए अब सबसे अहम सवाल यह होगा कि यह समझौता केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहता है या भविष्य में इसे किसी व्यापक राजनीतिक-सैन्य गठबंधन का रूप दिया जाता है।

भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल अमेरिकी सीनेट में पास:रूसी तेल खरीदने वाले 5 देशों पर कार्रवाई; 86 सांसदों ने पक्ष में वोट किया, 11 विरोध में

अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर दिया है। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। यह बिल रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के समर्थन से लाया गया। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके तहत रूस के अधिकारियों, शैडो टैंकर बेड़े, केंद्रीय बैंक और सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। अगर वहां भी बिल पास हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति ट्रम्प के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। उनकी मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून बनेगा। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम को भी इसके दायरे में रखा गया है। हालांकि, जो देश रूस की कुल गैस निर्यात का 15% से कम आयात करते हैं और अपनी निर्भरता घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें छूट मिल सकती है। सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Trading plan: हफ्ते के आखिरी दिन रेंज में रहा बाजार, जानिए सोमवार के लिए क्या हो रणनीति

Trading plan: हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन बाजार में एक रेंज में कारोबार होता दिखा। निफ्टी करीब 80 प्वाइंट फिसलकर 24600 के नीचे आ गया है। SBI के अच्छे नतीजों से बैंक निफ्टी में थोड़ी रिकवरी आई है। वहीं हल्की बढ़त के साथ मिडकैप कर रहा है आउटपरफार्म कर रहा है। उधर INDIA VIX 2 परसेंट ऊपर है। कमजोर बाजार में IT शेयरों ने दम दिखाया है। आईटी इंडेक्स करीब 1.5 फीसदी चढ़ा है। TCS करीब तीन फीसदी की उछाल के साथ निफ्टी का टॉप गेनर बना है। साथ ही LTM, KPIT और एम्फैसिस भी दो से तीन फीसदी भागे हैं।

NBFCs के साथ केमिकल और कंज्यूमर ड्यूरेबल शेयरों में भी दबाव देखने को मिल रहा है। दोनों सेक्टर इंडेक्स करीब 0.50 फीसदी फिसले हैं। वहीं दूसरी ओर ऑटो शेयरों में तूफानी रफ्तार है। ऑटो इंडेक्स करीब 1.5 फीसदी चढ़ा है।

शनिवार को वायदा कंपनी डेल्हीवरी के नतीजे आएंगे। डेल्हीवरी का मुनाफा 61% घट सकता है। हालांकि रेवेन्यू में 27% की बढ़त संभव है। साथ ही सोमवार को भारत फोर्ज,बॉश और वोडाफोन के रिजल्ट आएंगे।

बाजार: मिलाजुला दिन

बाजार की आगे की चाल पर बात करते हुए सीएनबीसी-आवाज के मैनेजिंग एडिटर अनुज सिंघल ने कहा कि बाजार में आज फिर एक रेंज में कारोबार हुआ। निफ्टी ने खरीदारी और बिकवाली दोनों जोन का सम्मान किया। सुबह के नजरिए के मुताबिक बैंक नीचे हैं और IT ऊपर। मिडकैप और स्मॉलकैप में मामूली आउटपरफॉर्मेंस रहा। Advance/Decline भी 1:1 पर रहा। नतीजों का आज भी काफी बड़ा रिएक्शन दिखा। हीरो मोटो,समवर्धना मदरसन,ब्रिटानिया और अरबिंदो फार्मा में तेजी रही। क्रॉम्प्टन और ट्रेंट में गिरावट दिखी। बजाज फाइनेंस में बड़ी गिरावट आई। इस पर RBI ड्राफ्ट नियमों का असर दिखा।

बाजार: अब क्या?

वीकेंड में बहुत बड़े डेवलपमेंट हो सकते हैं। आज शाम को US में मेक ऑर ब्रेक डे है। पेरोल डाटा US बाजार का सबसे बड़ा संकेत है। इसके अलावा US-ईरान युद्ध पर भी वीकेंड का जोखिम है। हालांकि पिछले दो सोमवार बाजार के लिए शानदार रहे हैं। अगर पोजिशन लेकर जा रहे हैं तो हेज जरूर करें। वरना बेहतर होगा न्यूट्रल रहें, सोमवार को नया नजरिया लेंगे। IT में भी जाते-जाते मुनाफावसूली के बारे में सोच सकते हैं।

निफ्टी-बैंक निफ्टी पर रणनीति

निफ्टी के लिए 24,500-24,550 पर सपोर्ट और 24,350-24,400 पर बड़ा सपोर्ट है। वहीं, 24,650-24,700 पर इसके लिए रेजिस्टेंस है। बैंक निफ्टी के लिए 57,500-57,700 पर सपोर्ट और 58,000-58,200 पर रेजिस्टेंस है।

सोमवार के लिए रणनीति

वीकेंड से पहले लालच से बचिए। न्यूट्रल पोजिशन के साथ जाएं। वीकेंड पर ग्लोबल बाजारों के लिए मेक ऑर ब्रेक ट्रिगर्स हैं।

 

 

Q1 नतीजों के बाद मोतीलाल ओसवाल के सिद्धार्थ खेमका का इन शेयरों पर आया दिल, क्या हैं आपके पास?

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Market Insight : वीकेंड में कोई ट्रेड लेकर ना जाएं, जो भी है उससे आज ही निपटा कर जाएं

Market Insight : गैप डाउन के बाद बाजार में हल्की रिकवरी आई है। निफ्टी करीब 60 प्वाइंट की गिरावट के साथ 24600 के करीब दिख रहा है। बैंक निफ्टी भी करीब 200 प्वाइंट नीचे है। मिड और स्मॉलकैप फ्लैट कारोबार कर रहे हैं। उधर INDIA VIX 2 फीसदी ऊपर दिख रहा है। IT शेयरों में आज तूफानी तेजी है। निफ्टी आईटी इंडेक्स 1.5 फीसदी से ज्यादा चढ़ा है। TCS और टेक महिंद्रा करीब 1.5 फीसदी की तेजी के साथ निफ्टी के टॉप गेनर्स में शामिल हैं। साथ ही परसिस्टेंट LTM और एम्फैसिस में भी अच्छी खरीदारी आई है।

IT के बाद ऑटो स्पेस में भी जोश दिख रहा है। निफ्टी ऑटो इंडेक्स करीब 1 फीसदी मजबूती के साथ कारोबार कर रहा है। साथ ही रियल्टी और FMCG में भी रौनक है। लेकिन फाइनेंशियल शेयरों पर प्रेशर है। बजाज फाइनेंस और फिनसर्व निफ्टी के टॉप लूजरों में शामिल हैं।

सट्टा नहीं करना है

ऐसे में बाजार पर अपनी आज की रणनीति बताते हुए सीएनबीसी-आवाज़ के मैनेजिंग एडिटर अनुज सिंघल ने कहा कि उनकी लाइन सिंपल है– सट्टा मत करिए। ऑप्शंस में 3:15 के बाद की ट्रेडिंग सट्टा है। हीरो-जीरो ट्रेड के चक्कर में पैसा मत बर्बाद करें। सभी ऑप्शंस पोजिशंस 3:15 तक निपटा लें। अगर आप F&O ट्रेडर हैं तो ये मानें कि बाजार 3:15 पर बंद हो रहा है।

बाजार: अब कहां हो नजर?

अनुज सिंघल ने आगे कहा कि ग्लोबल बाजारों के लिए एक बड़ा वीकेंड है। सोमवार सुबह बाजार को बहुत कुछ रिएक्ट करना होगा। आज शाम को US का पेरोल डाटा आएगा। FT की रिपोर्ट के मुताबिक बाजार के विरोध के बावजूद चेयरमैन केविन वार्श फेड के संदेश पर टिके रहेंगे। फेड/वार्श सितंबर में दरें बढ़ाने के लिए तैयार हैं। ऐसे में डॉलर इंडेक्स और US बॉन्ड यील्ड पर नजर रखें। इसमें आप US-ईरान युद्ध का फैक्टर भी जोड़ दीजिए। इसीलिए वीकेंड में कोई ट्रेड लेकर ना जाएं, जो भी है उससे आज ही निपटा कर जाएं।

कच्चे तेल और डॉलर का वापस ऊपर आना IT के लिए एल्गो पॉजिटिव है। कल रिलायंस में बड़ा ब्रेकआउट आया, आज उसका टेस्ट होगा। रिलायंस करीब 52-हफ्ते का निचला स्तर छूने के बाद भागा है। HDFC बैंक बाजार की सबसे कमजोर कड़ी है। HDFC बैंक में आज शायद 52-हफ्ते का नया निचला स्तर लगे। लगातार हमारा नजरिया रहा है HDFC बैंक से दूर रहें।

इनके अलावा आज हीरो मोटो और ब्रिटानिया के नतीजों पर रिएक्शन दिखेगा। आज SBI के नतीजे बैंक निफ्टी के लिए मेक और ब्रेक होंगे। पिछली तिमाही में SBI ने काफी निराश किया था।

बाजार: क्या हो रणनीति?

दिक्कत ये है कि बाजार में फॉलो थ्रू नहीं है। लेकिन निफ्टी अपनी रेंज से बाहर आ चुका है। कल बैंक निफ्टी ने ब्रेकआउट के संकेत दिए थे। लेकिन आज फिर कमजोरी के संकेत हैं। बैंकों से ज्यादा NBFCs में मजबूती रही है। कल भी श्रीराम फाइनेंस और PNB हाउसिंग अच्छे भागे थे। आज मेटल्स की चाल देखने वाली होगी। मेटल के भाव ऊपर आए लेकिन डॉलर भी ऊपर आया है।

हीरो मोटो ने बहुत ही शानदार नतीजे पेश किए हैं। 2-व्हीलर पैक इस समय सबसे ज्यादा मजबूती में है। शेयर चल चुके हैं,फिर भी बने रहें और गिरावट में जोड़ें जरूर। इसके अलावा आज ट्रेंट और ब्रिटानिया पर भी नजर होगी। ब्रिटानिया के नतीजे थोड़े फीके रहे लेकिन कमेंट्री और वॉल्यूम अच्छे हैं। ल्यूपिन के नतीजे काफी अच्छे हैं,आज फार्मा फिर फोकस में होगा।

निफ्टी पर रणनीति

निफ्टी के लिए पहला सपोर्ट 24,500-24,550 पर और बड़ा सपोर्ट 24,350-24,400 पर है। इसके लिए पहला रजिस्टेंस 24,650-24,700 पर और बड़ा रजिस्टेंस 24,750-24,800 पर है। खरीदारी का सबसे अच्छा जोन 24,450-24,550 पर है। इसके लिए SL 24,400 पर रखे। 24,650-24,700 रिजेक्ट होने पर बेचें, SL 24,750 पर सेट करें।

बैंक निफ्टी पर रणनीति

बैंक निफ्टी के लिए 57,400-57,500 मेक ऑर ब्रेक जोन है। अगर इसके नीचे फिसले तभी रैली फेल होगी। लेकिन बड़ी तेजी के लिए 58,200 के ऊपर बंद होना जरूरी है।

 

 

Market Trend : दायरे में फंसे बाजार में इन दो शेयरों में दिख रहे अच्छी कमाई के मौके, इनसे न चूके नजर

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Crude Oil Price: क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज गिरावट, अचानक प्राइस गिरने की वजह क्या है?

क्रूड ऑयल की कीमतों में अचानक तेज गिरावट आई। भारतीय समय के मुताबिक, 4 बजे के करीब ब्रेंट क्रूड 2.23 फीसदी गिरकर 81 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। डब्ल्यूटीआई क्रूड तो एक समय 3 फीसदी से ज्यादा गिर गया था। शाम करीब 6 बजे यह 2.84 फीसदी की गिरावट के साथ 78 डॉलर प्रति बैरल था।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने पर जल्द समझौते की उम्मीद

क्रूड ऑयल की कीमतों में अचानक गिरावट की वजह अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने पर बहुत जल्द यहां तक कि मंगलवार या बुधवार को समझौता हो सकता है। अगर दोनों देशों के बीच यह समझौता हो जाता है तो क्रूड की कीमतों पर इसका बड़ा असर पड़ेगा।

अमेरिका और ईरान में समझौते के लिए बातचीत जारी

सीएनबीसी से बातचीत में बेसेंट ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत जारी है। उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही जल्द शुरू हो जाने की उम्मीद जताई। यह पूछने पर कि क्या प्रस्तावित समझौते से ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का इस्तेमाल करने वाले जहाजों से टोल वसूलने का अधिकार मिल जाएगा, उन्होंने कहा कि अमेरिका का भरोसा आवाजाही की आजादी में है।

पहले भी अमेरिका और ईरान में समझौते की कोशिशें हो चुकी हैं

बेसेंट के इस बयान से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा है कि दोनों देशों के बीच मामले के हल के लिए कूटनीतिक स्तर पर कोशिशें जारी हैं। हालांकि, ईरान ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका से किसी तरह की सीधी बातचीत से इनकार किया है। इससे पहले भी दोनों देशों के बीच समझौते की कई कोशिशें हो चुकी हैं। लेकिन, उनका कोई नतीजा नहीं निकला।

छह महीने मध्यपूर्व में जारी लड़ाई से क्रूड की कीमतों में उछाल

अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई 28 फरवरी को हुई थी। इसके बाद क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान में पहुंच गईं। हालांकि, 120 डॉलर प्रति बैरल तक जाने के बाद कीमतों में नरमी आई हैं। इसके बावजूद ये लड़ाई से पहले के अपने लेवल से काफी ऊपर हैं। क्रूड की ऊंची कीमतें भारत के लिए अच्छा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड में उछाल से ऑयल मार्केटिंग कंपनियां चार बार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा चुकी हैं।

यह भी पढ़ें: चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों? समझिए US प्रतिबंध के खतरे और ईरान युद्ध के बीच भारत कैसे बचाएगा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद रहने से ऑयल की सप्लाई पर पड़ सकता है असर

भारत क्रूड की अपनी 90 फीसदी जरूरत इंपोर्ट करता है। क्रूड महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ जाता है। लंबे समय तक क्रूड के हाई लेवल पर रहने का काफी खराब असर सरकार की सेहत पर पड़ेगा। स्ट्रेट ऑफ होर्मजु के रास्ते जहाजों की आवाजाही नहीं होने से भारत में क्रूड की सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है।

चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों? समझिए US प्रतिबंध के खतरे और ईरान युद्ध के बीच भारत कैसे बचाएगा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट

Chabahar Port Challenge: ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश अब तक की सबसे कठिन और जटिल परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट की अवधि समाप्त होने, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य संघर्ष, जटिल कूटनीति के बीच भारत अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को बचाने और अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए सभी संभव विकल्पों का आकलन कर रहा है।

इस बीच भारत ईरान के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को संसाधन उपलब्ध कराने और उसके संचालन के लिए 10 साल के समझौते के तहत अपनी 120 मिलियन डॉलर (लगभग 12 करोड़ डॉलर) की मदद का वादा भी पूरा कर चुका है। हालांकि, अप्रैल में अमेरिकी प्रतिबंध छूट की मियाद खत्म होने के बाद से इस प्रोजेक्ट के संचालन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

संसद में सरकार का बयान और भारत के सामने धर्मसंकट

भारत सरकार ने 31 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित जानकारी में बताया कि चाबहार परियोजना के लिए अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल को ही खत्म हो चुकी है। केंद्र सरकार ने कहा कि वह इसके प्रभावों और जटिलताओं से निपटने के लिए इससे जुड़े स्टेकहोल्डर्स के साथ लगातार संपर्क में है और बातचीत जारी है।

सरकार का यह बयान भारत के सामने मौजूद बड़े रणनीतिक धर्मसंकट की ओर भी इशारा है। भारत का मुख्य उद्देश्य एक तरफ अपने सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट की रक्षा करना है, तो दूसरी तरफ भारतीय संस्थाओं और कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित रखना भी है। चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों में सीधे प्रवेश करने की दीर्घकालिक रणनीति का मेन आधार भी है।

120 मिलियन डॉलर का निवेश और भारत की परिचालन भूमिका

भारत सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) के माध्यम से इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड वर्ष 2018 से इस बंदरगाह का संचालन कर रही है। मई 2024 में ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ 10 साल का एक लंबा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था। इसके तहत भारत ने टर्मिनल के ऑपरेशन और उपकरण लगाने के लिए 120 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी।

सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है कि अगस्त 2025 तक अंतिम किस्त सहित पूरी 120 मिलियन डॉलर की राशि ईरान को ट्रांसफर की जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के इस कड़े दौर में भी चाबहार पर अपना ऑपरेशनल कंट्रोल और रणनीतिक प्रभाव बनाए रख पाएगा या नहीं।

भारत के लिए क्यों बेहद खास और रणनीतिक है चाबहार पोर्ट?

ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं में एक अनूठा स्थान रखता है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने भारत को अफगानिस्तान तक जाने के लिए जमीनी रास्ता देने से हमेशा इनकार किया है। चाबहार ने भारत को इस भौगोलिक और राजनीतिक बाधा से बाहर निकलने का सीधा समुद्री और जमीनी विकल्प दिया है।

चाबहार पोर्ट, पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर पोर्ट से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्वादर पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में चाबहार में भारत की मौजूदगी इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बेहद जरूरी रणनीतिक काउंटर-वेट है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय संचालन शुरू होने के बाद से चाबहार के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 25 लाख टन से अधिक गेहूं और 2000 टन दालें मानवीय सहायता के रूप में भेजी गई हैं। इसके अलावा इस बंदरगाह ने अब तक 90000 TEU से अधिक कंटेनर ट्रैफिक और 84 लाख मीट्रिक टन से अधिक बल्क और जनरल कार्गो को संभाला है।

चाबहार पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से भी जुड़ा है, जो भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला एक बहु-स्तरीय नेटवर्क है। पूर्व भारतीय राजदूत फुंचोक स्टोबदान के मुताबिक INSTC और चाबहार पोर्ट रूस और यूरेशिया के साथ भारतीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए एक-दूसरे के पूरक होंगे।

अमेरिकी प्रतिबंधों की समयसीमा और कानूनी अड़चनें

चाबहार परियोजना के सामने सबसे बड़ी और तात्कालिक अड़चन अमेरिका का रुख है। इससे पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास में चाबहार की भूमिका को स्वीकार करते हुए भारत को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी थी। इस छूट को सितंबर 2025 में रद्द कर दिया गया था और भारत को अपने संचालन को व्यवस्थित करने के लिए एक सशर्त समय दिया गया था, जो अंततः 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया।

भारत के लिए समय बहुत जटिल रहा क्योंकि ईरान के साथ 10 साल का मुख्य अनुबंध मई 2024 में हुआ था और 120 मिलियन डॉलर का पूरा भुगतान भी कर दिया गया था। अब भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखने और चाबहार में अपने निवेश व प्रभाव को बचाने के बीच का रास्ता खोज रहा है।

क्या हैं भारत के पास आगे के विकल्प?

सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक भारत और ईरान इस बंदरगाह के प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रहे हैं। एक विकल्प पर चर्चा चल रही है कि जब तक अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थितियां बदल नहीं जातीं, तब तक ईरानी पोर्ट अथॉरिटी के साथ मिलकर एक अस्थायी व्यवस्था बनाई जाए ताकि भारत के हितों और निवेश की रक्षा की जा सके। चुनौती यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था भारत की दीर्घकालिक परिचालन भूमिका को हमेशा के लिए कमजोर न करे।

भारत का पूरी तरह पीछे हटना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि भारत के कदम पीछे खींचते ही चीन या दूसरी क्षेत्रीय शक्तियां यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, इसके व्यावसायिक संचालन के लिए सिर्फ भारत की मौजूदगी ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए बेहतर सड़क एवं रेल कनेक्टिविटी, नियमित जहाजों की आवाजाही और कार्गो की भारी मात्रा की आवश्यकता है।

ये भी पढ़ें- पेट्रोल पंपों पर तेल में मिलावट की खबरें खारिज! सिर्फ 2 जगह मिली क्लोराइड की शिकायत, तुरंत बिक्री रोक सख्त कार्रवाई का ऐलान

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, ईरान के इर्द-गिर्द बढ़ता तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों की अनिश्चितता ने इस प्रोजेक्ट के जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। इसके बावजूद, भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस प्रोजेक्ट से पीछे नहीं हट रही है। भारत की रणनीति धैर्यपूर्ण कूटनीति की है। इसके तहत तेहरान के साथ कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जाएंगे और प्रतिबंधों के जोखिम से बचते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखा जाएगा।

Silver Price Outlook: चांदी इस साल ₹65000 सस्ती हुई, एक्सपर्ट्स से जानिए अब दाम घटेंगे या बढ़ेंगे

Silver Price Outlook: इस साल चांदी ने निवेशकों को निराश किया है। साल की शुरुआत से अब तक इसकी कीमत करीब 23% गिर चुकी है। सिर्फ जून महीने में ही इसमें 22% की बड़ी गिरावट आई। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी करीब 58 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही है। भारत में इसका भाव करीब ₹2.20 लाख प्रति किलो है। इसका मतलब है कि इस साल चांदी ₹65,000 प्रति किलो सस्ती हो चुकी है।

हालांकि, पिछले एक साल में चांदी ने 50% से ज्यादा का रिटर्न दिया था। लेकिन अब कीमतें दिसंबर 2025 के स्तर के आसपास लौट आई हैं। सवाल यह है कि आखिर चांदी पर दबाव क्यों बना हुआ है?

तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी वजह

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। ईरान युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ा है। इससे तेल की सप्लाई पर असर पड़ा और कीमतें चढ़ गईं। फिलहाल ब्रेंट क्रूड करीब 86 डॉलर प्रति बैरल पर है, जो युद्ध शुरू होने से पहले के मुकाबले करीब 20% ज्यादा है। अगर तनाव और बढ़ता है, तो तेल महंगा हो सकता है। इससे महंगाई बढ़ेगी और दुनिया भर के बाजारों पर दबाव आएगा।

फेड की ब्याज दरें क्यों हैं अहम?

तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ती है। ऐसे में अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बनता है। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो डॉलर मजबूत होता है। ऐसे समय में निवेशक सोना और चांदी जैसे बिना ब्याज वाले एसेट छोड़कर डॉलर आधारित निवेश की ओर रुख करते हैं। यही वजह है कि चांदी की कीमतों पर दबाव बना रहता है।

चांदी सोने से ज्यादा उतार-चढ़ाव वाली

चांदी की कीमतें सोने के मुकाबले ज्यादा तेजी से ऊपर-नीचे होती हैं। इसकी वजह यह है कि चांदी सिर्फ निवेश का जरिया नहीं, बल्कि औद्योगिक धातु भी है। इसका इस्तेमाल सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल, डेटा सेंटर और पावर ग्रिड जैसे सेक्टरों में होता है। इसलिए औद्योगिक मांग में थोड़ा भी बदलाव कीमतों पर बड़ा असर डाल सकता है।

गोल्ड सिल्वर रेशियो क्या होता है

जून 2026 में जब सोना 4,000-4,060 डॉलर प्रति औंस के बीच था, तब चांदी 60-61 डॉलर प्रति औंस पर थी। उस समय गोल्ड-सिल्वर रेशियो करीब 67 था। इससे पहले मई में यह 55 और जनवरी में 50 तक आ गया था।

गोल्ड-सिल्वर रेशियो बताता है कि 1 औंस सोना खरीदने के लिए कितने औंस चांदी चाहिए। इसे सोने की कीमत को चांदी की कीमत से भाग देकर निकाला जाता है। अगर रेशियो 75 या उससे ज्यादा हो, तो इसका मतलब माना जाता है कि चांदी सोने के मुकाबले सस्ती है। वहीं, अगर यह 50-60 या उससे नीचे हो, तो सोना सस्ता माना जाता है।

क्या अभी चांदी सस्ती है?

Bonanza के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निरपेन्द्र यादव का कहना है कि 70 का रेशियो अपने लंबे समय के औसत के करीब है। यह बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी चांदी सोने के मुकाबले थोड़ी सस्ती नजर आती है। खासकर तब, जब औद्योगिक मांग मजबूत बनी रहे। भारत में दिसंबर 2025 से चांदी की कीमत लगातार ₹2 लाख प्रति किलो से ऊपर बनी हुई है।

आगे किस धातु में ज्यादा दम?

निरपेन्द्र यादव का मानना है कि फिलहाल गोल्ड-सिल्वर रेशियो 65 से 75 के बीच रह सकता है। यह काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति और वैश्विक आर्थिक स्थिति पर निर्भर करेगा। अगर फेड ब्याज दरें घटाता है, डॉलर कमजोर पड़ता है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुधार आता है, तो चांदी सोने से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। इससे Gold-Silver Ratio घटकर 60-65 तक आ सकता है।

वहीं, अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, मंदी का खतरा गहराता है या निवेशक सुरक्षित निवेश की तरफ भागते हैं, तो सोना चांदी से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। ऐसे में यह रेशियो 70 से ऊपर बना रह सकता है।

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा समय में सिर्फ सोना या सिर्फ चांदी चुनने के बजाय दोनों में संतुलित निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है।

अगर आपका लक्ष्य पूंजी की सुरक्षा है और आप कम जोखिम लेना चाहते हैं, तो सोना बेहतर विकल्प माना जा सकता है। लेकिन अगर आप थोड़ा ज्यादा जोखिम उठा सकते हैं और लंबी अवधि के निवेशक हैं, तो धीरे-धीरे चांदी में हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है। क्योंकि मौजूदा वैल्यूएशन के हिसाब से चांदी में आगे बेहतर प्रदर्शन की संभावना बनी हुई है।

Gold Price Today: अगस्त के पहले दिन सोना हुआ और महंगा, 24 और 22 कैरेट दोनों का बढ़ गया भाव

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

महंगाई की मार! त्योहारों से पहले डिटर्जेंट से लेकर पेंट तक के बढ़ सकते हैं दाम; कंपनियां कर रहीं तैयारी

भारत की बड़ी कंज्यूमर कंपनियां त्योहारों के मौसम से पहले और लगातार दूसरी तिमाही में प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। हो सकता है कि डिटर्जेंट से लेकर टायर और पेंट तक और महंगे हो जाएं। मिडिल ईस्ट में लंबे समय से चल रहे अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण कच्चे माल की लागत बढ़ रही है। ऐसे में महंगाई के ऊंचे स्तर पर बने रहने का खतरा है। कंपनियां होम अप्लायंसेज से लेकर किचन की जरूरी चीजों तक हर चीज की कीमतों में बढ़ोतरी के दूसरे दौर की योजना बना रही हैं।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड आने वाली तिमाही में डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग बार जैसी कैटेगरी में कीमतों में नपी-तुली बढ़ोतरी करने वाली है। इसके अलावा डोडला डेयरी लिमिटेड और एशियन पेंट्स लिमिटेड समेत कम से कम 7 और कंपनियां भी कीमतें बढ़ाने की सोच रही हैं।

जून 2026 में कितनी रही खुदरा महंगाई

इस साल जून में देश में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई। मई महीने में यह 3.93 प्रतिशत थी। खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई 5.32 प्रतिशत रही, जबकि मई में 4.78 प्रतिशत थी। माना जा रहा है कि आने वाले महीनों में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है क्योंकि कंपनियां कीमतें बढ़ा रही हैं। कम मॉनसून के कारण खाने-पीने की चीजों की कीमतें और बढ़ने का खतरा है। ईरान युद्ध के कारण एनर्जी कॉस्ट लगातार ऊंची बनी हुई है। इसका मतलब है कि जल्द ही कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।

भारत में त्योहारों का सीजन आमतौर पर अगस्त से नवंबर तक चलता है। इस दौरान कंज्यूमर खर्च भी आमतौर पर बढ़ जाता है, खासकर दिवाली के समय। कई कंपनियों की सालाना बिक्री में से लगभग एक तिहाई बिक्री इसी त्योहारी सीजन में होती है।

प्रोडक्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी न केवल भारत में खपत की मांग की मजबूती की परीक्षा लेगी, बल्कि पॉलिसी मेकर्स की भी परीक्षा लेगी क्योंकि वे महंगाई के दबाव पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। RBI ने कहा है कि वह तभी कोई कदम उठाएगा जब महंगाई का दबाव और गहरा हो जाएगा। भारत के वित्त मंत्रालय ने हाल ही में चेतावनी दी कि महंगाई का असर अब खाने-पीने की चीजों से आगे भी फैल रहा है। ग्लोबल स्तर पर ईंधन की बढ़ती कीमतें और खराब मौसम का असर कई तरह के कंज्यूमर प्रोडक्ट्स की कीमतों पर पड़ रहा है।

RBI की मीटिंग के फैसले 5 अगस्त को

RBI की मौद्रिक नीति समिति ने इस साल जून की बैठक में रेपो रेट में लगातार तीसरी बार कोई बदलाव न करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर स्थिर छोड़ दिया। उम्मीद है कि 3-5 अगस्त को होने वाली अगली मीटिंग में भी ऐसा ही किया जाएगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि भूराजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या नहीं। साथ ही इस पर भी नजर रहेगी कि मॉनसून से गर्मियों की फसल को नुकसान होता है या नहीं।