युजवेंद्र चहल: एक प्रतिभा जो बिना कुछ खास उपलब्धि के क्रिकेट करियर की संघ्यावेला में पहुंचे

लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल 228 प्लस विकेटों के साथ इंडियन प्रीमियर लीग के सबसे सफल गेंदबाज हैं। वहं लंबे समय तक इस प्रारुप में भारत के भी सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज थे। लेकिन भारत का साल 2013 से 2023 तक का 10 साल का आईसीसी ट्रॉफी का सूखा ऐसा रहा कि वह अपने करियर में कुछ खास उपलब्धि लेकर नहीं जा पाए।

कहने को तो युजवेंद्र चहल टी-20 विश्वकप 2024 की विजेता टीम का हिस्सा थे लेकिन उस विश्वकप में उनको एक भी बार अंतिम ग्यारह में मौका नहीं मिला। कुछ ऐसे ही पिछले टी-20 विश्वकप गुजरे। इससे पिछले दो विश्व कप (T20I 2016- 2021) में से चहल एक में टीम का हिस्सा नहीं थे जबकि 2022 टी20 विश्व कप में टीम में होने के बाद भी उन्हें एक भी मैच में खेलने का मौका नहीं मिला।वहीं एकदिवसीय विश्वकप 2019 में जब वह टीम में थे तो टीम सेमीफाइनल में हार गई।

2016 में अपने सफेद गेंद क्रिकेट की शुरुआत करने वाले 33 वर्षीय युजवेंद्र चहल ने 72 वनडे मैच खेले हैं। 27.1 की औसत और 5.26 की इकॉनोमी के साथ उन्होंने 121 विकेट चटकाए। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदरेशन 42 रनों पर 6 विकेट लेना रहा। चहल ने 2022 की शुरुआत के बाद से 50 ओवर के प्रारूप में 16 मैचों में 24 विकेट लिए हैं। जनवरी 2023 में वह आखिरी बार न्यूजीलैंड के खिलाफ इंदौर में इस प्रारुप में देखे गए थे।

टी-20 अंतरराष्ट्रीय में चहल सबसे सफल गेंदबाज

वहीं टी-20 अंतरराष्ट्रीय की बात करें तो युजवेंद्र चहल ने अपना आखिरी टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच वेस्टइंडीज के खिलाफ अगस्त 2023 में खेला था। यह सीरीज भारत 2-3 से हारा था।युजवेंद्र चहल ने 80 मैचों में 25.1 की औसत और 8.19 की इकॉनोमी से 96 विेकेट चटकाए हैं।इस प्रारुप में उनसे ज्यादा विकेट हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह और अर्शदीप सिंह ने ही लिए हैं, वह भी इस कारण क्योंकि वह लगातार यह प्रारुप खेल रहे हैं और युजवेंद्र चहल लंबे समय से इस प्रारुप से बाहर हैं।

हाल ही में उन्होंने अपने फर्स्ट-क्लास करियर को अलविदा कह दिया है। इसके साथ ही भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने का उनका सपना तो खत्म हो गया है, व्हाइट-बॉल क्रिकेट में राष्ट्रीय टीम में वापसी के रास्ते तो खुले हैं। लेकिन 36 साल के स्पिनर को एशियाई खेलों तक में जगह नहीं मिली।

चहल ने कहा“मैंने अभी हार नहीं मानी है। देश के लिए खेलने की भूख अभी भी मुझमें बहुत ज़्यादा है। मेरा मानना है कि मुझमें अभी भी क्रिकेट बाकी है, और मैं वनडे और टी 20 फ़ॉर्मेट में एक और मौका पाने के लिए अपनी पूरी जान लगा दूँगा।हरियाणा क्रिकेट एसोसिएशन, रणबीर सिंह महिंद्रा सर और अनिरुद्ध सिंह चौधरी सर का मेरे सफ़र के दौरान लगातार समर्थन, भरोसा और विश्वास बनाए रखने के लिए खास तौर पर शुक्रिया। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “10 साल की उम्र में पहली बार रेड बॉल पकड़ने से लेकर अपना आखिरी फर्स्ट-क्लास मैच खेलने तक, यह एक शानदार सफ़र रहा है।”

टेस्ट टीम में जगह बनाने के करीब नहीं पहुँच पाए

युजवेंद्र चहल ने अपने फर्स्ट-क्लास करियर को अलविदा कह दिया है।वे कभी भी टेस्ट टीम में जगह बनाने के करीब नहीं पहुँच पाए, क्योंकि भारत के पास रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा की स्टार जोड़ी हमेशा मौजूद रही।

चहल ने इंस्टाग्राम पोस्ट में कहा, “मेरे लिए रेड-बॉल क्रिकेट कभी भी सिर्फ़ एक और फ़ॉर्मेट नहीं था।” “इसी फ़ॉर्मेट में मैंने धैर्य, चरित्र, मज़बूती और घंटों तक मैदान पर डटे रहकर हर रन और हर विकेट के लिए संघर्ष करने की असली खुशी को समझा।” चहल के फर्स्ट-क्लास करियर की शुरुआत 2009 में हरियाणा के साथ हुई थी और उन्होंने 49 मैचों में 32.27 के औसत से 148 विकेट लिए। उन्होंने 2026 का काउंटी चैंपियनशिप नॉर्थम्प्टनशायर के साथ खेला, जिसमें डिवीज़न टू में 16.14 के औसत से 21 विकेट लिए। उनका आखिरी फर्स्ट-क्लास मैच मिडलसेक्स के खिलाफ़ था, जिसमें मिडलसेक्स ने सात विकेट से जीत हासिल की और नॉर्थम्प्टनशायर के प्रमोशन की उम्मीदों को खत्म कर दिया। “मैंने अपना आखिरी फर्स्ट-क्लास मैच लॉर्ड्स में खेला था। ये शब्द कहना भावुक कर देने वाला है क्योंकि टेस्ट कैप पहनना हमेशा से मेरा सपना रहा है, जिसे मैंने कई सालों तक संजोकर रखा। भले ही वह सपना पूरा नहीं हो पाया, लेकिन मैं अपने अब तक के सफ़र से सचमुच संतुष्ट हूँ और इस फ़ॉर्मेट में मिले हर मौके के लिए बहुत आभारी हूँ।”

Asian Games में 44 साल बाद गोल्ड मेडल लाने वाली चक दे गर्ल्स को मिलेंगे 22 लाख रुपए

INDvsChina

हॉकी इंडिया ने शुक्रवार को जापान के काकामिगाहारा में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली महिला टीम की प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 11-11 लाख रुपये और प्रत्येक सहयोगी स्टाफ के लिए 5.5-5.5 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की।इसके अलावा  भाजपा शासित ओडिशा सरकार भी टीम के हर खिलाड़ी को 11-11 लाख रुपए की ईनामी राशी देगी।

गोलकीपर सविता पूनिया की शानदार भूमिका और मज़बूत डिफेंस की बदौलत भारतीय महिला हॉकी टीम ने चीन को 1-0 से हराकर एशियाई खेलों का गोल्ड मेडल जीता और लॉस एंजेलिस 2028 ओलंपिक के लिए सीधे जगह पक्की की।

लालरेम्सियामी ने पहले क्वार्टर में निर्णायक गोल किया और अपने 200वें इंटरनेशनल मैच को यादगार बना दिया। इसके बाद सविता और मज़बूत भारतीय डिफेंस ने बाकी मैच में धैर्य और डटकर खेलने का बेहतरीन उदाहरण पेश किया। इसके बाद का खेल खूबसूरती से ज़्यादा टिके रहने की जद्दोजहद वाला था।

चीन ने भारत पर लगातार हमले किए, लेकिन “वॉल ऑफ़ इंडिया” (भारत की दीवार) कही जाने वाली सविता बार-बार डिफेंडिंग चैंपियन और बराबरी के गोल के बीच दीवार बनकर खड़ी रहीं। भारतीय डिफेंस ने दबाव झेला, खतरे को टाला और घबराए बिना चीन के लगातार हमलों का सामना किया।

सबसे मुश्किल पल तीसरे क्वार्टर में आया जब चीन को पेनल्टी कॉर्नर मिला। शुरुआती कोशिश को तो रोक लिया गया, लेकिन रिबाउंड पर पेनल्टी स्ट्रोक मिल गया। भारत ने इस फैसले को चुनौती दी और रेफरल जीत लिया, जिससे स्ट्रोक का फैसला बदल गया और चीन को एक और पेनल्टी कॉर्नर मिला। चीन उस मौके को भी भुना नहीं पाया।

 

एक और चिंताजनक पल तब आया जब पेनल्टी कॉर्नर को डिफेंड करते समय सलीमा टेटे के हाथ में चोट लग गई और उन्हें इलाज के लिए मैदान से बाहर जाना पड़ा। वह आखिरी क्वार्टर से पहले वापस लौट आईं, जिससे भारतीय खेमे को राहत मिली। आखिरी कुछ मिनट लगभग पूरी तरह से चीन के दबदबे में खेले गए। खेल खत्म होने में चार मिनट बचे थे, तभी चीन ने अपने गोलकीपर को हटाकर एक अतिरिक्त आउटफील्ड खिलाड़ी को अटैक में उतार दिया।

भारत ने अपना संयम बनाए रखा। और जब आखिरी हूटर बजा, तो 1-0 की बढ़त बरकरार थी।इस गोल्ड मेडल के साथ ही एशियाई खेलों में महिला हॉकी खिताब के लिए भारत का 44 साल का इंतज़ार खत्म हो गया। उनकी पिछली जीत 1982 में हुई थी, जिसके बाद टीम को कई बार जीत के करीब आकर हार का सामना करना पड़ा, जिसमें 1998 और 2018 में मिले सिल्वर मेडल भी शामिल हैं।

लालरेम्सियामी के लिए यह उनके 200वें मैच का गोल था। सविता ने गोलपोस्ट के सामने एक बार फिर शानदार खेल दिखाया। और भारतीय महिला हॉकी के लिए, यह उस लंबे इंतज़ार का अंत था जो मैदान पर मौजूद कई खिलाड़ियों की उम्र से भी ज़्यादा समय से चल रहा था। 1982 के चैंपियन आखिरकार शीर्ष पर लौट आए हैं – और इस बार, इसके साथ ही लॉस एंजेलिस का ‘गोल्डन टिकट’ भी उन्हें मिल गया है।

‘हनुमान चालीसा का कर रहा था पाठ, सबको मरने नहीं दे सकता था…’ स्मित मच्छार ने PM मोदी को सुनाई डरावने वक्त की कहानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्लाई दुबई के कैप्टन स्मित मच्छार से वीडियो कॉल पर बात की। फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव फ्लाइट में को-पायलट के हमले में भारतीय स्मित मच्छार घायल हो गए हैं। पीएम से बातचीत के दौरान स्मित काफी इमोशनल हो गए। पीएम मोदी ने पायलट की हिम्मत और धैर्य की तारीफ की। बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि देशभर के लोग उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। वहीं पीएम से बात करते हुए स्मित मच्छार ने बताया कि कैसे उन्होंने मुश्किल वक्त में संयम बनाए रखा।

पीएम से बात हुए इमोशनल हुए कैप्टन

PM मोदी के सामने घटना को याद करते हुए मच्छार इमोशनल हो गए और कहा कि, वह उस मुश्किल वक्त में वह हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। कैप्टन के लिए हनुमान चालीसा मुश्किल वक्त में हिम्मत देने का सहारा बनी। पीएम से बात करते हुए कैप्टन स्मित मच्छार ने कहा, वह उनके सबसे बड़े आदर्श हैं और उनसे बात करना उनके लिए बहुत खास है। मच्छार ने बताया कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें प्रधानमंत्री से सीधे बात करने का मौका मिलेगा। पीएम से बातचीत के दौरान स्मित मच्छार काफी भावुक थे।

‘हनुमान चालीसा पढ़ता हूं’

मच्छार ने पीएम से कहा, “मुझे बहुत चोटें आईं, लेकिन मैंने खुद से कहा कि मुझे उठना होगा और कुछ करना होगा। उस समय, मैंने खुद को धक्का देकर कॉकपिट का दरवाजा खोला।” पीएम मोदी ने मच्छार से बातचीत के दौरान कहा कि, भारत को अपने उन लोगों पर गर्व है, जो किसी की जान लेने के बजाय दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डालने का साहस रखते हैं। मच्छार ने बताया कि ‘जब मैं मुश्किल में होता हूं तो हनुमान चालीसा पढ़ता हूं’

मुश्किल हालत का किया सामना

मच्छार ने बताया कि, जब भी वह मुश्किल में होते हैं, तो हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। फ्लाईदुबई विमान की घटना के दौरान भी उन्होंने ऐसा ही किया। उनके को-पायलट ने कॉकपिट में उन पर हमला कर दिया था, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बावजूद मच्छार ने हिम्मत नहीं छोड़ी और हालात को संभालने की कोशिश करते रहे। उन्होंने चोट लगने के बाद काफी कोशिश करके कॉकपिट का दरवाजा खोला, जिसके बाद केबिन क्रू और यात्रियों ने आगे आकर स्थिति को काबू में किया। फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में हुई इस घटना के बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित रूप से इमरजेंसी लैंड कराया गया। राहत की बात थी कि विमान में सवार सभी 174 लोगों की जान बच गई।

25 अक्टूबर से मुंबई एयरपोर्ट का टर्मिनल 1 बंद, नहीं मिलेगी कोई फ्लाइट्स, आखिर क्यों हुआ ऐसा?

PM मोदी ने कैप्टन स्मित से बात की, VIDEO:174 जानें बचाने वाले पायलट बोले- हनुमान चालीसा पढ़ रहा था, भगवान ने ही हमें बचाया

प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर से बात की और उनकी बहादुरी की तारीफ की। मोदी ने कैप्टन स्मित से कहा, “पूरा देश आपके लिए प्रार्थना कर रहा है। आपके अच्छे स्वास्थ्य के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जा रहा है। आपके साहस और सूझबूझ से कई लोगों की जान बची।” मोदी ने बातचीत के दौरान कहा कि देश गर्व से कह सकता है कि भारतीय दूसरों की जान लेने वाले नहीं, बल्कि दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित ने PM मोदी को बताया कि उस घटना के दौरान वे हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। पीएम मोदी ने स्मित की मां की तारीफ की प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान कैप्टन स्मित की मां गीताबेन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्मित की मां ने उन्हें भगवद्गीता के मूल्यों और उपदेशों के साथ बड़ा किया है। कैप्टन स्मित ने कहा कि प्रधानमंत्री का फोन आने से उन्हें बहुत गर्व महसूस हुआ। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनके जीवन में ऐसा पल आएगा। अस्पताल में भर्ती हैं कैप्टन स्मित कैप्टन स्मित अभी UAE के अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें कल सऊदी अरब से एयरलिफ्ट करके अबू धाबी ले जाया गया। UAE में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने अस्पताल में कैप्टन स्मित और उनके परिवार से मुलाकात की थी। उन्होंने बताया था कि पायलट की हालत स्थिर है और वे तेजी से ठीक हो रहे हैं। उनका मनोबल भी ऊंचा है। मित्तल ने कहा कि कैप्टन को अच्छा इलाज मिल रहा है और भारतीय दूतावास वहां के अधिकारियों के लगातार संपर्क में है। राजदूत ने कैप्टन स्मित को भारत का बहादुर बेटा बताया। उन्होंने कहा कि हवा में आपात स्थिति के दौरान उनकी बहादुरी से सैकड़ों लोगों की जान बची और एक बड़ी दुर्घटना टल गई। PM मोदी पहले भी कर चुके हैं तारीफ प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को कैप्टन स्मित मच्छर की बहादुरी और सूझबूझ की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पायलट ने धैर्य और साहस दिखाया। उनकी बहादुरी से पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है।

मोदी ने कहा, “इजराइल के प्रधानमंत्री ने भी कहा कि एक भारतीय ने 9/11 जैसी त्रासदी रोक दी। हमारे देश के हर नागरिक को स्मित की बहादुरी पर बहुत गर्व है।”

प्रधानमंत्री ने कैप्टन मच्छर के माता-पिता और पत्नी से भी बात की थी। उन्होंने पिता भूपेंद्रभाई, मां गीताबेन और पत्नी सोनलबेन से उनकी सेहत की जानकारी ली। साथ ही भरोसा दिलाया कि भारतीय मिशनों की ओर से पायलट और उनके परिवार को हर संभव मदद दी जाएगी। खबर अपडेट हो रही है… ——————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- फ्लाईदुबई को-पायलट का ईरान कनेक्शन हो सकता है:ऐसा हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि इजराइल जा रहे फ्लाईदुबई विमान के को-पायलट का ईरान से संबंध हो सकता है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Smit Machchhar: ‘हिंदुस्तानी ने 9/11 होने से बचा लिया…’; पीएम मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छार के परिवार से की बात, पायलट की बहादुरी की जमकर की तारीफ

Smit Machchhar: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को 174 लोगों की जान बचाने वाले भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार की पत्नी और माता-पिता से फोन पर बात की। इस दौरान उनकी बहादुरी की जमकर सराहना की। कैप्टन मच्छार ने ‘फ्लाईदुबई’ विमान को दुर्घटनाग्रस्त करने की अपने सह-पायलट की कोशिश को नाकाम कर दिया था, जिससे सैकड़ों लोगों की जान बची। पायलट की पत्नी और उनके माता-पिता के साथ फोन पर बातचीत में पीएम मोदी ने यह भी कहा कि भारतीय मिशन घायल पायलट को हर संभव मदद मुहैया करा रहे हैं। पायलट का सऊदी अरब के एक अस्पताल में इलाज किया जा रहा है।

सरकारी सूत्रों ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि फोन पर बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पायलट की बहादुरी की तारीफ की, जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जान बची। इससे पहले, पीएम मोदी ने भारतीय पायलट की प्रशंसा करते हुए उन्हें नायक बताया था। उन्होंने कहा था कि देश को उनकी बहादुरी पर गर्व है। पीएम मोदी ने कहा कि हिंदुस्तानी ने 9/11 होने से बचा लिया।

PM मोदी ने कैप्टन मच्छार की सराहना करते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने सैकड़ों लोगों की जान बचाने में मदद की और बड़ी त्रासदी टाली। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 ने बुधवार को इमरजेंसी अलर्ट भेजे थे। इसके बाद विमान 34,000 फुट की ऊंचाई से तेजी से 17,000 फुट से अधिक नीचे आ गया। बाद में उसका रूट सऊदी अरब के तबूक शहर स्थित प्रिंस सुल्तान बिन अब्देल अजीज एयरपोर्ट की ओर मोड़ दिया गया। विमान में 27 बच्चों समेत 174 यात्री सवार थे।

‘स्मित मच्छार एक नायक हैं’

PM मोदी ने X पर एक पोस्ट में कहा, “कैप्टन स्मित मच्छार एक नायक हैं। सबसे गंभीर खतरे का सामना करते हुए और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अदम्य साहस और अटूट संकल्प दिखाया। उनके साहस ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने में मदद की और बड़ी त्रासदी टाली।” प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को कैप्टन मच्छार पर गर्व है। उन्होंने कहा, “मैं उनके जल्द स्वस्थ होने और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं।”

‘भारत ने 9/11 होने से बचा लिया’

इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को ‘भारत मंडपम’ में UPSC के शताब्दी समारोह के दौरान भी भारतीय पायलट की तारीफ की। पीएम मोदी ने कहा, “कल एक घटना घटी थी जिसमें भारत के कैप्टन स्मित ने धैर्य, सूझबूझ और साहस का परिचय दिया है। कल इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत ने 9/11 होने से बचा लिया है। उनका यह पराक्रम हमें गौरव से भर देता है… आज पूरी दुनिया पर गर्व कर रही है। हम सभी स्मित की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करें और उनका अभिनंदन करें।”

नेतन्याहू ने भी की तारीफ

बुधवार रात इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी मच्छार की सराहना करते हुए उन्हें सच्चा नायक बताया। नेतन्याहू ने कहा, “चाकू से हमला किए जाने और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मुकाबला किया, हमलावर का प्रतिरोध किया तथा कॉकपिट का दरवाजा खोला, जिससे यात्री तथा चालक दल के सदस्य हमलावर को काबू में कर पाए। इससे हवा में एक भयावह दुर्घटना टल गई।”

इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा, “उन्होंने इजराइली नागरिकों और अन्य देशों के नागरिकों समेत 174 लोगों की जान बचाई। मैं कैप्टन मच्छार के जल्द और पूरी तरह स्वस्थ होने की कामना करता हूं। वह सच्चे नायक हैं।” उन्होंने कहा, “असाधारण बहादुरी दिखाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को मेरा सलाम।” सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में पायलट खून से लथपथ, ऑक्सीजन मास्क पहने और विमान की गैली में पीठ के बल लेटे हुए दिखाई दे रहे हैं।

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अपने पहले के बयान में नेतन्याहू ने कहा था कि एक इजरायली यात्री ने उन्हें बताया कि विमान तेजी से घूमने लगा और नीचे उतरने लगा। इसके बाद यात्री और चालक दल का एक सदस्य कॉकपिट में घुसने में कामयाब रहा और दोनों ने मिलकर उस पायलट पर काबू पाया, जिसने विमान की प्रणाली को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के दौरान मच्छार पर चाकू से हमला किया था। नेतन्याहू के अनुसार, चालक दल का एक अन्य सदस्य इसके बाद कॉकपिट में पहुंचा और विमान को स्थिर करने में मदद की।

Harsh Goenka: जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए हर्ष गोयनका की छोटी-सी लिस्ट, जानिए क्या हैं ये नियम

उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया पर जिंदगी को बेहतर तरीके से जीने के लिए कुछ आसान बातें साझा कीं। उनकी सलाह में धीमी आवाज में बात करने से लेकर सही खाना खाने, पर्याप्त नींद लेने और धैर्य के साथ काम करने जैसी रोजमर्रा की आदतें शामिल हैं। साथ ही उन्होंने ईमानदारी से कमाने, नियमित बचत करने और सोच-समझकर खर्च करने पर भी जोर दिया।

गोयनका ने इन बातों को सफलता से जोड़ते हुए कहा कि नियम सुनने में आसान हैं, लेकिन इन्हें लगातार अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाना मुश्किल है।

छोटी-छोटी आदतों पर टिका है पूरा फोकस

उनकी सूची में कोई बहुत मुश्किल या असाधारण सलाह नहीं थी। रचनात्मक तरीके से सोचना, दूसरों के साथ अच्छे व्यवहार से पेश आना और पैसों को समझदारी से इस्तेमाल करना जैसी बातें इसमें शामिल थीं। यही वजह रही कि पोस्ट पढ़ने के बाद कई लोगों ने इसे जिंदगी के लिए उपयोगी बताया। कुछ यूजर्स का कहना था कि असली चुनौती नियम जानने में नहीं, बल्कि उन्हें रोजाना अपनाने में है।

क्या ये सफलता के नियम हैं या सुकून के?

पोस्ट पर चर्चा का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही रहा। कुछ लोगों ने सवाल किया कि इन आदतों को सीधे सफलता का फॉर्मूला कहना कितना सही है। एक यूजर ने इसे सफलता के बजाय शांत और संतुलित जीवन जीने की सलाह बताया।

कुछ लोगों ने यह भी मजाक किया कि आजकल मोटिवेशन के लिए किताबों की जगह सिर्फ गोयनका के पोस्ट पढ़ना काफी होगा। इस तरह गंभीर सलाह के बीच सोशल मीडिया पर हल्के-फुल्के कमेंट भी खूब आए।

आसान बातें, लेकिन अमल करना मुश्किल

कई यूजर्स ने गोयनका की बात से सहमति जताई, लेकिन साथ ही माना कि इन सभी आदतों को एक साथ निभाना आसान नहीं है। किसी ने कहा कि एक-एक नियम अपनाया जाए तो बात आसान हो सकती है, असली परेशानी तब आती है जब सभी को साथ लेकर चलना हो।

एक अन्य यूजर ने इसे सरल बातों की विडंबना बताया जिंदगी की जरूरी चीजें अक्सर आसान होती हैं, लेकिन उन्हें लगातार निभाना ही सबसे मुश्किल काम बन जाता है।

पैसों से लेकर व्यवहार तक, पोस्ट ने छेड़ी चर्चा

गोयनका की पोस्ट ने सफलता की परिभाषा पर भी बातचीत शुरू कर दी। किसी के लिए ज्यादा कमाई और करियर की तरक्की सफलता हो सकती है, जबकि किसी दूसरे के लिए आर्थिक अनुशासन, बेहतर सेहत और मानसिक शांति ज्यादा मायने रख सकती है। यही वजह है कि कुछ ही लाइनों की इस पोस्ट पर लोगों ने अपनी-अपनी सोच साझा की। किसी ने इसे जिंदगी का आसान रिमाइंडर माना, तो किसी ने पूछा कि क्या केवल इन नियमों से सच में सफलता हासिल की जा सकती है।

एशियन गेम्स में जाने से पहले ही दे दिया था DSP की वर्दी का नाप! गोल्ड जीतने वाली एथलीट प्राची की ये गजब की बात वायरल

नीरु ने दुबारा गोल्ड किया ट्रैप, पुरुष साथी काईनन के साथ जीता खिताब

TraP Shooting

हरियाणवी शहर जिंद से पहलवान और कुश्ती के खिलाड़ी तो बहुत निकलते हैं लेकिन ट्रैप निशानेबाज नीरू हांडा ने निशानेबाजी जैसा धैर्य और एकाग्रता रखने वाले खेल में भारत को दो स्वर्ण पदक दिलाए। एकल प्रतियोगिता में उन्होंने कल ट्रैप शूटिंग में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था इसके बाद आज काइनन चेनाई के साथ मिलकर ट्रैप मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। यही नहीं नीरू ढांडा, आशीमा अहलावत और मनीषा कीर ने महिलाओं के ट्रैप टीम स्पर्धा में 328 अंकों के साथ रजत पदक जीता।

इसके साथ ही वह गुलवीर सिंह समेत कुछ चुनिंदा भारतीय एथलीटों में शामिल हो गई जिन्होंने अब तक तीन पदक जीते। हालांकि इसमें से 2 स्वर्ण पदक है तो नीरू इस एशियाड की सबसे सफल एथलीट कही जा सकती है। ट्रैप शूटिंग इवेंट में स्वर्ण पदक जीतने वाली इतिहास की पहली भारतीय महिला नीरू ने कल एकल प्रतियोगिता में बारिश के बीच गजब का संयम बनाकर कुल 30 अंको में से 28 अंक अर्जित किए थे।

आज भी उन्होंने वहीं से शुरुआत की जहां से उन्होंने कल खेल छोड़ा था।नीरू हांडा और काइनन चेनाई  ने चौथे स्थान पर रहकर फाइनल के लिए क्वालीफाई किया था। उन्होंने फाइनल में 34 का स्कोर बनाया। कतर के मोहम्मद अल रुमैही और रे बासिल ने 32 के स्कोर के साथ रजत पदक जीता।

भारतीय जोड़ी ने पहले दो राउंड में 46 और 46 का स्कोर बनाया और कुल मिलाकर 46, 46, 44 अंक बनाकर 136 का कुल स्कोर हासिल किया।
दोनों भारतीयों में काइनन ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए कुल 73 अंक हासिल किए।इसमें से नीरु के अकेले 63 अंक थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने दी बधाई

रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एशियाई खेलों में ट्रैप इवेंट में व्यक्तिगत और मिश्रित गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने पर नीरू ढांडा को बधाई दी है। प्रधानमंत्री ने उनके बेहतरीन निशाने और संयम की सराहना की और कहा कि उनकी इस उपलब्धि से देश को बहुत गर्व हुआ है।श्री मोदी ने भरोसा जताया कि यह ऐतिहासिक उपलब्धि और भी कई युवा खिलाड़ियों को शूटिंग (निशानेबाजी) अपनाने और सर्वोच्च सम्मान हासिल करने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करेगी।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक्स पर लिखा, “नीरू ढांडा ने भारत को जश्न मनाने का एक ऐतिहासिक पल दिया है! एशियाई खेलों में ट्रैप इवेंट में व्यक्तिगत और मिश्रित गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने पर उन्हें बधाई। उनके बेहतरीन निशाने और संयम ने देश को बहुत गर्व दिलाया है। यह उपलब्धि और भी कई युवा खिलाड़ियों को शूटिंग अपनाने और सर्वोच्च सम्मान हासिल करने का लक्ष्य रखने के लिए प्रोत्साहित करेगी। ”

Asian Games 2026: 44 साल बाद आया मेडल…सावन बारवाल ने रचा इतिहास! जानिए कौन हैं ये

Asian Games 2026 Sawan Barwal Silver Medal: एशियन गेम्स 2026 में भारतीय धावक सावन बारवाल ने इतिहास रच दिया है। सावन ने पुरुषों की मैराथन स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। इसके साथ ही भारत का एशियन गेम्स की मैराथन स्पर्धा में मेडल का 44 साल का लंबा इंतजार खत्म हो गया है।

सावन ने ना सिर्फ सिल्वर मेडल जीता, बल्कि 2:11:37 का समय निकालकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दर्ज किया और नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी कायम किया। रेस का स्वर्ण पदक जापान के यामाशिता ने जीता।

रेस में सावन बारवाल का शानदार प्रदर्शन (स्टेप-बाय-स्टेप)

शुरुआती बढ़त (10 किमी से 21 किमी): सावन शुरुआती 10 किलोमीटर के बाद से ही रेस के फ्रंट रनर्स में बने रहे। 21 किलोमीटर का हाफ-मैराथन मार्क पूरा करते ही (1:05:54 का समय) वह रेस में पहले स्थान पर आ गए।

टॉप-3 में मुकाबला (30 किमी से 35 किमी): रेस जैसे-जैसे आगे बढ़ी, जापान के यामाशिता, चीन के हान और भारत के सावन बारवाल के बीच मुख्य मुकाबला देखने को मिला।

36 किमी पर निर्णायक मोड़: 36 किलोमीटर के मार्क पर जापान के यामाशिता ने 20 से 30 मीटर की बढ़त बना ली। हालांकि, सावन ने धैर्य बनाए रखा और मजबूती से दूसरे स्थान पर टिके रहे।

फिनिश लाइन: सावन ने अपनी गति बरकरार रखी और दूसरा स्थान हासिल करते हुए भारत के लिए ऐतिहासिक सिल्वर मेडल पक्का किया।

इस स्पर्धा में हिस्सा ले रहे दूसरे भारतीय धावक कार्तिक करकरा शुरुआती चरण में आगे रहने के बाद पिछड़ गए और 19 धावकों के बीच 17वें स्थान पर रहे।

कौन है सावन बारवाल?

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के रहने वाले सावन बारवाल भारतीय सेना के एथलीट हैं। एशियन गेम्स 2026 में 2:11:37 का समय निकालकर रजत पदक जीतने वाले सावन ने इससे पहले इसी साल अप्रैल में रोटरडैम की प्रतिष्ठित NN मैराथन में 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़कर सनसनी मचा दी थी। साल 2023 में आयोजित ‘एशियन क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप’ में भारत को कांस्य पदक दिलाने वाले सावन अब लंबी दूरी की दौड़ में देश के सबसे भरोसेमंद एथलीट बनकर उभरे हैं।

एशियन गेम्स 2026 में आज ये है भारत के बड़े मुकाबले

कबड्डी में गोल्ड मेडल का मुकाबला: भारत की पुरुष और महिला दोनों टीमें गोल्ड मेडल मैच में ईरान से भिड़ेंगी। भारतीय पुरुष टीम अपने 9वें गोल्ड और महिला टीम चौथे खिताब की तलाश में मैदान में उतरेगी।

बैडमिंटन में पीवी सिंधु की शुरुआत: दो बार की ओलंपिक पदक विजेता पीवी सिंधु बैडमिंटन महिला सिंगल्स में अपने अभियान की शुरुआत करेंगी, जहां उनसे भारत की अगुवाई करने और मेडल दिलाने की बड़ी उम्मीदें हैं।

Asian Games 2026: भारतीय महिला शूटर्स का शानदार प्रदर्शन, 50m राइफल में सिल्वर पर कब्जा, तिलोत्तमा और विदर्सा ने फाइनल में बनाई जगह

Mahakavya Shri Ramayan Katha: भाव, भक्ति और मर्यादा के साथ बड़े पर्दे पर लौटी देव शर्मा-अंजलि अरोड़ा स्टारर ‘रामायण’

Mahakavya Shri Ramayan Katha: कुछ कहानियां हमें विरासत में मिलती हैं। ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ कुछ ऐसी है। रामायण सिर्फ एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति का ऐसा हिस्सा है, जिसकी कहानियां पीढ़ियों से घरों, मंदिरों, रामलीलाओं और परिवारों के बीच आगे बढ़ती रही है।

निर्देशक अभिषेक सिंह रामायण को किसी ऐसी कहानी के तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं करते, जिसे नए सिरे से बदलने की जरूरत हो। फिल्म को उसी भरोसे, प्यार, आस्था, त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और भक्ति की भावना के साथ बनाया गया है, जो इसे लेकर हर भारतीय अनुभव करता है।

फिल्म की खास बात यह है कि यह ऑरिजनल रामायण के इमोशन को बरकरार रखते हुए आज के दर्शक से कनेक्ट करने की कोशिश करती है। कथा की मूल पहचान को बदले बिना फिल्म के कई प्रसंगों में ऐसे भाव उभरते हैं, जिनसे वर्तमान पीढ़ी भी आसानी से जुड़ सकती है।

‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ का फोकस सिर्फ रॉयल सीन्स या बड़े पैमाने पर कहानी दिखाने के बजाय उन रिश्तों पर अधिक है, जो रामायण की आत्मा हैं। श्री राम और माता सीता का प्रेम, लक्ष्मण की अपने बड़े भाई के प्रति अटूट निष्ठा, हनुमान की श्री राम के प्रति पूर्ण भक्ति और राम की मर्यादा के सामने रावण का अहंकार — यही फिल्म की नींव हैं।

देव शर्मा ने श्री राम के किरदार को काफी संयम और गरिमा के साथ निभाया है। उनके एक्सप्रेशन सिर्फ वीरता दिखाने तक सीमित नहीं , बल्कि श्री राम के धैर्य, करुणा और मर्यादा को भी सामने लाते हैं। उनके किरदार में एक ठहराव दिखाई देता है। अंजलि अरोड़ा के किरदार को लेकर दर्शकों शक था, लेकिन माता सीता उन्होंने शानदार तरीके से निभाया हैं। फिल्म सीता के किरदार को सिर्फ राम की कहानी का हिस्सा बनाकर नहीं रखती, बल्कि उनके विश्वास, आत्मसम्मान और आंतरिक शक्ति को भी महत्व देती है।

शील वर्मा लक्ष्मण के रूप में राम परिवार की कहानी में एक महत्वपूर्ण इमोशनल परत जोड़ते हैं। श्री राम और माता सीता के प्रति उनका समर्पण और अपने बड़े भाई के साथ उनका रिश्ता फिल्म की यात्रा में लगातार महत्वपूर्ण बना रहता है। वहीं निर्भय वाधवा हनुमान के किरदार में ऊर्जा और भक्ति लेकर आते हैं। हनुमान की मौजूदगी वाले हिस्सों में उनका उत्साह कहानी को अलग गति देता है। जबकि राजनेश दुग्गल रावण के रूप में जच रहे हैं।

फिल्म का संगीत सुनने में अच्छा लगता है। संगीत कहानी के माहौल के साथ सटीक बैठता है। ‘सिया राम’ को जावेद अली ने अपनी आवाज दी है। वहीं फरहाद बिवंडीवाला की आवाज में ‘राम जी की सेना’ फिल्म में ऊर्जा और उत्साह लेकर आता है। कैलाश खेर का ‘हे हनुमान’ हनुमान से जुड़े सीन्स में भक्ति और जोश को बढ़ाता है। इसके अलावा शान, शाहिद मल्ल्या और वैशाली सामंत जैसे गायकों की आवाजें भी साउंडट्रैक का हिस्सा हैं।

बात वीएफएक्स की करें तो कुछ बड़े सीन्स में और बेहतर काम किया जा सकता था। खास कर युद्ध वाले सीन या लंका से जुड़े सीन थोड़े फीके लगते हैं। फिर भी यह कमी फिल्म की कहानी से जुड़ाव को पूरी तरह कमजोर नहीं करती है। अयोध्या से वनवास, सीता हरण, हनुमान के आगमन, लंका की ओर बढ़ती कहानी रावण के अंत तक की जर्नी दिखाती है।

शायद फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह अपने दर्शकों को अच्छी तरह समझती है। महाकाव्य श्री रामायण कथा रामायण को किसी चौंकाने वाले या पूरी तरह अलग रूप में पेश करने की कोशिश नहीं करती। यह आस्था और उन मूल्यों को केंद्र में रखती है, जिनके कारण यह कथा आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। फिल्म को हम 3.5 रेटिंग देते हैं।

फिल्म का निर्देशन अभिषेक सिंह ने किया है और इसका निर्माण प्रकाश महोबिया और संजय बुंदेला ने महोबिया फिल्म्स प्रोडक्शन के बैनर तले किया है। फिल्म को एजे फिल्म एंटरटेनमेंट वर्ल्ड और अजय कनोजिया प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि हनी कुलदीप अग्रवाल और मोनिका सेन सह-निर्माता हैं।

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

Shraddh Paksha 2026

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है।

 

लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं है। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं और दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, मगर अपने ही परदादा की तस्वीर कहाँ है, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने परिवार के लिए क्या किया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हम भविष्य की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि उस अतीत को भूलते जा रहे हैं, जिसकी नींव पर हमारा वर्तमान खड़ा है।

 

यहीं से श्राद्ध पक्ष की सार्थकता आरंभ होती है। यह केवल पंचांग की कुछ तिथियां नहीं हैं; यह हमारी सामूहिक स्मृति को जगाने वाला वह अवसर है, जब वर्तमान कुछ क्षण के लिए अतीत के सामने खड़ा होता है और स्वीकार करता है कि हम अकेले नहीं हैं—हमारे अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है।

 

‘श्राद्ध’ का वास्तविक अर्थ और पितृऋण

‘श्राद्ध’ शब्द का सीधा संबंध ‘श्रद्धा’ से है। इसलिए श्राद्ध का मूल अर्थ केवल पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मण भोजन कराना ही नहीं है। ये भले ही परंपरागत विधियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में जो मूल भाव है, वह है—अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय स्मरण।

 

भारतीय सनातन परंपरा ने मृत्यु को संबंधों का पूर्ण विराम नहीं माना है। शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु स्मृति और संस्कार जीवित रहते हैं। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके कर्म परिवार की अगली पीढ़ियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में पितरों के प्रति दायित्व को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे ‘पितृऋण’ कहा जाता है।

 

हमारे माता-पिता ने हमें जीवन दिया और हमारे दादा-दादी व पूर्वजों ने परिवार को संभाला। किसी ने अभाव में जीवन जिया, किसी ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, तो किसी ने परिवार के लिए अपने सुख त्याग दिए और उन संस्कारों की परंपरा को सुरक्षित रखा जो आज हमारे हाथों में है। हम जिस जीवन को अपना कहते हैं, उसकी नींव में उन सबका योगदान है। इसलिए पितृऋण कोई ऐसा ऋण नहीं है जिसे धन देकर चुकाया जा सके। इसे चुकाने का सबसे सुंदर मार्ग है—माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, परिवार में प्रेम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देना।

 

तर्पण और परंपराओं के पीछे छिपा भाव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जल, तिल और कुश आदि के माध्यम से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है। आस्था मानती है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति व शांति प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है। लेकिन तर्पण को केवल एक बाहरी कर्मकांड मानना, उसके भीतर छिपे गहरे भाव से वंचित रहना है।

 

तर्पण की जलधारा केवल जल नहीं होती; वह स्मृति और कृतज्ञता की धारा होती है। जब कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा, परदादा या अन्य पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अतीत को प्रणाम करता है। वह मानो यह स्वीकार करता है कि उसके वर्तमान में उसका अपना श्रम जितना है, उतना ही योगदान उन लोगों का भी है जो आज उसके साथ नहीं हैं।

 

श्राद्ध परंपरा में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना तथा ब्राह्मण, अतिथि या किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का विधान है। इन परंपराओं में जीव-दया, अन्नदान, सेवा और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। पूर्वजों के नाम पर यदि किसी भूखे का पेट भर जाए या किसी जीव को अन्न मिल जाए, तो श्रद्धा का दायरा और विस्तृत हो जाता है।

 

भारतीय धार्मिक साहित्य और महाकाव्यों में पितृकर्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। चाहे महाभारत में कर्ण से जुड़ी कथा हो या रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा पिता राजा दशरथ के निमित्त किया गया श्राद्ध—ये प्रसंग भारतीय समाज में पितरों के प्रति दायित्व की गहरी भावना को दर्शाते हैं।

 

इसी श्रृंखला में ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी व्यापक स्मरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो सका, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह तिथि बनी है। यह ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करने का दिन है।

 

आधुनिक दौर में श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता

आज श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच का संवाद घटता जा रहा है। बच्चे अपने दादा-दादी के जीवन-संघर्षों से परिचित नहीं हैं और अनेक बार उन्हें अपने परदादा का नाम तक मालूम नहीं होता। ऐसे समय में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों को बचाने का माध्यम बन सकता है:

  • घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों की कहानियां सुनाएं।
  • परिवार का एक ‘वंश-वृक्ष’ (Family Tree) तैयार किया जाए।
  • पुरानी तस्वीरों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए।
  • पूर्वजों के संघर्षों, उनके व्यवसाय, सामाजिक योगदान और जीवन-मूल्यों की जानकारी नई पीढ़ी को दी जाए।
  • क्योंकि जिसे अपनी जड़ों का पता नहीं होता, उसकी पहचान की ऊंचाई भी अधूरी रह जाती है।

 

भय नहीं, कृतज्ञता का नाम है श्राद्ध

पितृदोष जैसी धार्मिक मान्यताएं भी श्राद्ध परंपरा से जुड़ी हुई हैं। अनेक श्रद्धालु पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से तर्पण, पाठ और आध्यात्मिक साधनाएं करते हैं। इन आस्थाओं का सम्मान करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि श्राद्ध का व्यापक संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सदाचार सिखाना है।

 

यदि हम पितरों की शांति की कामना करते हैं, तो केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं हो सकता। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का आदर, परिवार में प्रेम, जरूरतमंदों की सहायता, जीवों के प्रति करुणा और अपने आचरण में सत्य व संयम रखना भी पितृ-सम्मान का ही विस्तार है।

 

  • आखिर पूर्वजों को सबसे बड़ा सम्मान क्या है?
  • क्या केवल एक दिन जल अर्पित कर देना?
  • क्या केवल भोजन करा देना और दान दे देना?
  • या फिर उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना?

 

उत्तर स्पष्ट है—यदि उन्होंने परिवार को जोड़कर रखा था, तो हम भी परिवार को जोड़ें। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखा था, तो हम भी धैर्य रखें। यदि उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की थी, तो हम भी सेवा करें। और यदि उन्होंने हमें संस्कार दिए थे, तो हम उन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। यहीं पर श्राद्ध कर्मकांड से ऊपर उठकर ‘जीवन का संस्कार’ बन जाता है।

 

स्मृति की अंजलि

श्राद्ध पक्ष मृत्यु का शोक नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह अतीत में लौटने का हठ नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम किसी शून्य से पैदा नहीं हुए हैं; हमारे पीछे अनेक पीढ़ियों का श्रम, संघर्ष, त्याग और संस्कार खड़े हैं।

 

इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में जब हम पितरों को जल अर्पित करें, तो अपने भीतर भी कृतज्ञता का दीप जलाएं। जब अन्न अर्पित करें, तो सेवा का संकल्प लें। जब पूर्वजों का नाम लें, तो उनके जीवन से कोई एक श्रेष्ठ गुण अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। और जब अपने बच्चों को उनके पूर्वजों की कहानियां सुनाएं, तो उन्हें यह अहसास कराएं कि वे केवल वर्तमान के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा के उत्तराधिकारी हैं।

 

पूर्वज चले जाते हैं, उनकी स्मृतियां नहीं।

चेहरे मिट जाते हैं, संस्कार नहीं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं, विरासत नहीं।

 

इसीलिए श्राद्ध केवल पितरों को स्मरण करने का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने का पर्व है। अंततः पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल जल की एक अंजलि भर नहीं है; सच्ची श्रद्धांजलि है—एक ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कार दिखाई दें, और ऐसा परिवार बनाना जिसे देखकर हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों पर गर्व कर सके।

 

श्राद्ध की सबसे बड़ी अंजलि जल की नहीं, स्मृति की है। सबसे बड़ा तर्पण कर्मकांड का नहीं, कृतज्ञता का है; और पितरों को सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उनके अच्छे संस्कार हमारे जीवन में निरंतर सांस लेते रहें।