सीएम डॉ. मोहन यादव ने की केन-बेतवा लिंक परियोजना की समीक्षा, 44 लाख से ज्यादा लोगों को मिलेगा पीने का पानी

सीएम डॉ. मोहन यादव ने की केन-बेतवा लिंक परियोजना की समीक्षा, 44 लाख से ज्यादा लोगों को मिलेगा पीने का पानी

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खजुराहो में केन-बेतवा लिंक परियोजना की समीक्षा की। उन्होंने जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट को परियोजना की उच्च प्राथमिकता के साथ नियमित मॉनिटरिंग करने तथा संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय महत्व की केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के विकास में मील का पत्थर साबित होगी। परियोजना से क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि विकास के साथ प्रभावित और विस्थापित परिवारों के हितों का पूरा ध्यान रखना सरकार की प्राथमिकता है।

 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पन्ना-छतरपुर जिला प्रशासन को निर्देश दिए कि प्रभावित गांवों में अधिकारी घर-घर पहुंचकर परिवारों की वास्तविक स्थिति और समस्याओं को समझें। जनजातीय परिवारों की कठिनाइयों को संवेदनशीलता के साथ सुनकर उनका प्राथमिकता से निराकरण करें। उन्होंने कहा कि विस्थापित परिवारों को शासन की पात्र योजनाओं का लाभ उनके घर तक पहुंचाया जाए। जहां परिवारों ने नए स्थान पर निवास बना लिया है, वहां स्कूल, आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक भवन सहित जरूरी मूलभूत सुविधाओं के लिए ठोस कार्य योजना तैयार की जाए।

 

रूंझ-मझगांव परियोजना के प्रभावितों को अतिरिक्त राशि का शीघ्र भुगतान

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पन्ना की रूंझ-मझगांव परियोजना में स्वीकृत अतिरिक्त राशि का प्रभावितों को शीघ्र भुगतान कराने के निर्देश दिए। जिन प्रभावितों के पास उम्र संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, उनकी आयु का निर्धारण मेडिकल परीक्षण के आधार पर करने को कहा। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में जन चौपाल और जागरूकता यात्राओं के माध्यम से लोगों को परियोजना से मिलने वाले लाभों की जानकारी दी जाए। मैदानी स्तर पर सकारात्मक गतिविधियां आयोजित कर लोगों की आशंकाओं और समस्याओं का समाधान किया जाए।

 

लाखों परिवारों को होगा फायदा

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि परियोजना पूर्ण होने पर मध्यप्रदेश में लगभग 8.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता बढ़ेगी और 44 लाख से अधिक लोगों को पेयजल सुविधा का लाभ मिलेगा। परियोजना के तहत 103 मेगावाट जल विद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन भी प्रस्तावित है। बुंदेलखंड एवं मध्य भारत के पन्ना, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी, सागर, विदिशा, रायसेन, शिवपुरी और दतिया जिलों के 1,382 गांवों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद है। छतरपुर और पन्ना जिले में कुल 5,039 परियोजना प्रभावित परिवार हैं। इनमें पन्ना जिले के 1,321 तथा छतरपुर जिले के 3,718 परिवार शामिल हैं। सभी प्रभावित परिवारों ने पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन विशेष पैकेज का विकल्प चुना है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना केवल जल संसाधन विकास की योजना नहीं, बल्कि बुंदेलखंड में आर्थिक और सामाजिक बदलाव का माध्यम है। सरकार का प्रयास है कि परियोजना से प्रभावित परिवारों का पुनर्वास सम्मानजनक ढंग से हो और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।

सीएम डॉ. मोहन यादव का मास्टर स्ट्रोक, फिर शुरू होगी कैलारस शुगर मिल, जानें कब खुलेंगे टेंडर?

सीएम डॉ. मोहन यादव का मास्टर स्ट्रोक, फिर शुरू होगी कैलारस शुगर मिल, जानें कब खुलेंगे टेंडर?

भोपाल। मध्यप्रदेश में उद्योगों को फलता-फूलता देखने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव दिन-रात काम कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में प्रदेश को लाखों करोड़ों का निवेश भी मिला है। इसी कड़ी में उन्होंने एक और बड़ा फैसला किया है। दरअसल, मुरैना जिले की बंद पड़ी कैलारस शुगर मिल को फिर से चालू करने की कवायद शुरू कर दी गई है। इस संबंध में एमएसएमई विभाग ने रुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित की है। इस मिल के शुरू होने से क्षेत्र का तस्वीर ही बदल जाएगी। 

 

इस संबंध में एमएसएमई विभाग के आयुक्त दिलीप कुमार ने बताया कि मिल को शुरू करने के लिए 15 सितंबर तक ऑनलाइन प्रस्ताव आमंत्रित किए गए हैं। इन प्रस्तावों को अगले दिन 16 सितंबर को खोला जाएगा। गौरतलब है कि 19 अगस्त 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई थी। इस बैठक में हुए निर्णय के तहत कैलारस चीनी मिल की जमीन एमएसएमई विभाग को हस्तांतरित कर दी गई थी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव और राज्य सरकार का उद्देश्य इस मिल के पुनरुद्धार से क्षेत्र में रोजगार, औद्योगिक गतिविधि और स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। 

 

एमएसएमई विभाग के आयुक्त दिलीप कुमार ने बताया कि अब सरकार मिल को जैसी है, जहां है के आधार पर लीज पर देने जा रही है। जो लोग इस लीज को लेना चाहते हैं, वे 31 अगस्त और 1 सितंबर को सुबह 11 बजे से मिल की साइट विजिट कर सकते हैं। मिल को लीज पर देने के संबंध में 3 सितंबर मीटिंग होगी। यह मीटिंग दोपहर 3 बजे से विंध्याचल भवन की चौथी मंजिल पर स्थित मीटिंग हॉल में होगी। जो लोग इस संबंध में लिखित प्रश्न पूछना चाहते हैं, वे 7 सितंबर शाम 5 बजे तक प्रश्न पूछ सकते हैं। रुचि की अभिव्यक्ति जमा करने की अंतिम तिथि 15 सितम्बर शाम 5 बजे रखी गई है। अगले दिन 16 सितंबर को प्रस्ताव शाम 5 बजे खोले जाएंगे।

 

शुगर और संबंधित उप-उत्पादों के निर्माण में सक्षम कंपनियां www.mptenders.gov.in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकती हैं। विस्तृत जानकारी http://mpmsme.gov.in पर उपलब्ध है। एमएसएमई आयुक्त सिंह ने बताया कि कैलारस शुगर मिल एनएच-552 पर, कैलारस रेलवे स्टेशन से 3 किमी से कम दूरी पर स्थित है। मिल की क्षमता प्रति दिन 1,250 गन्ना पेराई है। मिल की संपत्तियों में फैक्ट्री बिल्डिंग, प्लांट-मशीनरी, गोदाम, वर्कशॉप और 12.86 हेक्टेयर भूमि है। उन्होंने बताया कि लीज अवधि 30 वर्ष होगी। संतोषजनक कार्य के आधार पर यह अवधि बढ़ाई जा सकेगी।

यमुना इवेंट केस में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ को बड़ी राहत, SC ने NGT का फैसला पलटा; ₹5 करोड़ लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को दिल्ली में 2016 में हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ के दौरान यमुना के बाढ़ वाले इलाके (फ्लडप्लेन) को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। साथ ही, कोर्ट ने दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) को निर्देश दिया कि वह संगठन द्वारा जमा किए गए 5 करोड़ रुपये के पर्यावरण मुआवजे की रकम वापस करे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ की अपील को मंजूरी दे दी। यह ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ से जुड़ा एक रजिस्टर्ड पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल और यमुना के बाढ़ क्षेत्र को हुए नुकसान के बीच सीधा संबंध था। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए पूरी तरह जिम्मेदार तभी ठहराया जा सकता है, जब उसके कथित काम और पर्यावरण को हुए नुकसान के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध साबित हो।

कोर्ट ने यह भी पाया कि NGT ने अपील करने वाले को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया था और जरूरी जानकारी को नजरअंदाज किया था। कोर्ट ने ध्यान दिया कि कार्यक्रम स्थल पहले से ही जर्जर हालत में था।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA की आलोचना की

‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को राहत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान (फ्लडप्लेन) पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने के लिए DDA की आलोचना की।

कोर्ट ने कहा, “जिस तरह से DDA ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी, वह गलत था।”

कोर्ट ने पाया कि DDA बाढ़-मैदान की सुरक्षा की अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा और उस इलाके के लिए जिम्मेदार अथॉरिटी के तौर पर उस पर किए गए भरोसे का उल्लंघन किया।

हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि अपील में DDA द्वारा दी गई अनुमति की वैधता कोई मुद्दा नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA को NGT के निर्देशों के अनुसार यमुना बाढ़-मैदान के पुनर्वास का काम जारी रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने देखा कि पुनर्वास का काम पहले ही शुरू हो चुका था और इसे जारी रखने का आदेश दिया।

5 करोड़ रुपये का मुआवजा कैसे तय हुआ

NGT ने दिसंबर 2017 में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ पर 5 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया था। यह मुआवजा 11 से 13 मार्च, 2016 तक हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ की तैयारियों के दौरान फ्लडप्लेन (नदी के किनारे की जमीन) को हुए नुकसान के लिए लगाया गया था।

फेस्टिवल के पहले दिन, यानी 11 मार्च को, आयोजकों ने NGT से पूरी रकम जमा करने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा। ट्रिब्यूनल ने उस दिन शुरुआती तौर पर 25 लाख रुपये जमा करने की इजाजत दी और बाकी बचे 4.75 करोड़ रुपये जमा करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया।

संगठन ने 25 लाख रुपये जमा कर दिए। इसके बाद उसने NGT से अनुरोध किया कि बाकी 4.75 करोड़ रुपये को भुगतान के बजाय बैंक गारंटी के रूप में स्वीकार किया जाए। संगठन ने यह भी प्रस्ताव दिया कि इस रकम का इस्तेमाल इलाके में बायोडायवर्सिटी पार्क बनाने के लिए किया जाए।

बाद में पूरी 5 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि जमा कर दी गई। इसके बाद व्यक्ति विकास केंद्र ने NGT के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

कर्नाटक जमीन अतिक्रमण मामला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने के कुछ हफ्ते बाद आया है, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’, उससे जुड़ी संस्थाओं और अन्य लोगों पर बड़े पैमाने पर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने का सरकारी आदेश दिया गया था।

3 अगस्त को जस्टिस ई.एस. इंदिरेश ने ‘वेद विज्ञान महा विद्या पीठ ट्रस्ट’ (जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ से जुड़ी संस्था है) की याचिका पर एक अंतरिम आदेश पारित किया। इस ट्रस्ट ने SIT बनाने के 17 जुलाई, 2026 के सरकारी आदेश को चुनौती दी थी।

SIT को कग्गलिपुरा गांव के सर्वे नंबर 46 और आस-पास के इलाकों में कथित कब्जे की जांच का काम सौंपा गया था। इसमें कई अधिकारी शामिल थे, जिनमें बेंगलुरु डिवीजन के रीजनल कमिश्नर और रेवेन्यू डिपार्टमेंट के कानूनी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे एक रिटायर्ड जिला जज शामिल थे।

SIT के खिलाफ तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट श्रीरंगा एस. ने तर्क दिया कि ट्रस्ट और ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ ने अपनी जमीन की ‘पोडी’ और ‘हुदबस्त’ (यानी सीमा तय करने और सर्वे) के लिए कई बार रेवेन्यू अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

याचिकाकर्ता ने कहा कि बिना जमीन की सीमाएं तय किए और कानून के मुताबिक संयुक्त सर्वे कराए सरकार यह नहीं कह सकती कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ है।

एडवोकेट सुमना नागानंद के जरिए दायर याचिका में SIT बनाने के कानूनी आधार को चुनौती दी गई। इसमें तर्क दिया गया कि कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 195 सरकारी अधिकारियों को अपनी शक्तियां दूसरों को सौंपने की इजाजत तो देती है, लेकिन SIT बनाने का अधिकार नहीं देती।

याचिका में ‘कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट, 2011’ की धारा 8 का भी हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह कानून को लागू करने और उसका कामकाज देखने के लिए तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारी की नियुक्ति की इजाजत तो देता है, लेकिन सरकार को कोई जांच एजेंसी बनाने का अधिकार नहीं देता।

याचिकाकर्ता ने SIT में ‘शिरास्तेदारों’ (Shirastedars) को शामिल करने पर भी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि कानून तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारियों की नियुक्ति की इजाजत नहीं देता। साथ ही, एक रिटायर्ड जिला जज को “लिटिगेशन मैनेजमेंट कंसल्टेंट” के तौर पर नियुक्त करने पर भी सवाल उठाए गए।

उचित प्रक्रिया पर सवाल

याचिका में दलील दी गई कि कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट के तहत बनाई गई विशेष अदालत के पास जमीन अतिक्रमण के मामलों पर सुनवाई शुरू करने का अधिकार है। इसके बावजूद सरकार ने उस अदालत में कार्रवाई शुरू किए बिना ही SIT का गठन कर दिया।

याचिका में रीजनल कमिश्नर अमलान आदित्य बिस्वास को SIT का प्रमुख बनाए जाने पर भी सवाल उठाया गया। सरकार के आदेश में बिस्वास की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। उन्होंने 7 जुलाई को सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि ट्रस्ट और अन्य लोगों ने प्रथम दृष्टया सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिस अधिकारी ने पहले ही अतिक्रमण की बात कही है, उसी को SIT का प्रमुख बनाना पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण है।

सरकार के आदेश में सितंबर 2025 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के एक आदेश का भी हवाला दिया गया था। इस आदेश में अधिकारियों को कथित अतिक्रमण के मामले में कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इसके बाद की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया।

कर्नाटक हाई कोर्ट को यह भी बताया गया कि कथित जमीन अतिक्रमण के मामले में ट्रस्ट के एक पदाधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला पहले से अदालत में लंबित है।

कर्नाटक का यह मामला SIT के गठन की वैधता और जमीन से जुड़े आरोपों की जांच में राज्य सरकार की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया से जुड़ा है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील का मामला 2016 के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के दौरान यमुना के बाढ़ क्षेत्र को कथित नुकसान के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की जिम्मेदारी से जुड़ा था।

यह भी पढ़ें: कल का मौसम: 23 अगस्त को 15 राज्यों में तूफानी हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश की चेतावनी, यूपी से ओडिशा तक IMD ने दिया ये अलर्ट

Raksha Bandhan 2026 Bhadra timing: इस बार रक्षा बंधन पर नहीं होगा भद्रा का साया, जानें कौन हैं भद्रा और इसमें क्यों नहीं बांधनी चाहिए राखी

Raksha Bandhan 2026 Bhadra timing: हिंदू धर्म में पूरे दिन में कुछ विशेष समय को अशुभ माना जाता है। इस समय में कोई शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। ऐसा ही एक समय है भद्रा का। हिंदू पौराणिक कथाओं और पंचांग का एक विशेष भाग है। इस समय में रक्षा बंधन का पर्व भी नहीं मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय में राखी भी नहीं बांधनी चाहिए। इस साल रक्षा बंधन का पर्व 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनको तिलक लगाकर मुंह मीठा कराती हैं। साथ ही, उनकी शुभ और मंगल की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को हमेशा रक्षा करने का वचन देते हैं और भेंट देकर विदा करते हैं।

इस बार भद्रा का साया नहीं

इस बार रक्षा बंधन पर भद्रा का साया नहीं रहीं हेगा। भद्रा रक्षा बंधन के दिन सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए भद्रा की अड़चन के बिना पूरे दिन राखी का त्योहार मनाया जा सकेगा।

कौन है भद्रा?

पौराणिक पहचान : धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भद्रा भगवान सूर्यदेव और माता छाया की पुत्री हैं, तथा भगवान शनिदेव की सगी बहन हैं।

स्वभाव : शनिदेव की तरह भद्रा का स्वभाव भी अत्यंत क्रोधी और उग्र माना जाता है। जन्म लेते ही वे यज्ञों और मांगलिक कार्यों में विघ्न डालने लगी थीं।

ज्योतिष/पंचांग में स्थान : उनके उग्र स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मा जी ने उन्हें पंचांग के 11 करणों में से 7वें करण (विष्टि करण) में स्थान दिया। भद्रा काल एक ऐसा समय होता है जब भद्रा का प्रभाव पृथ्वी पर रहता है।

भद्रा में राखी क्यों नहीं बांधनी चाहिए?

ज्योतिष शास्त्र और हिंदू मान्यताओं में भद्रा काल को अशुभ और किसी भी शुभ या नए कार्य के लिए वर्जित माना गया है। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं :

अशुभ प्रभाव और अनिष्ट की आशंका : भद्रा के दौरान किए गए शुभ कार्यों का फल नहीं मिलता या वे कार्य निष्फल हो जाते हैं। भाई-बहन का रिश्ता अटूट रहे, इसलिए इस उग्र काल को छोड़कर शुभ मुहूर्त में ही रक्षासूत्र बांधा जाता है।

पौराणिक कथा : प्रचलित कथा के अनुसार, लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा ने रावण को भद्रा काल में ही राखी बांधी थी। इसके फलस्वरूप उसी वर्ष रावण के वंश और साम्राज्य का विनाश हो गया। इसी कारण से भद्रा के साये में राखी बांधने से बचा जाता है।

Putrada Ekadashi Date and Muhurat: 23 अगस्त को होगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत, खास संयोग में पूजा से पूरी होगी संतान की मनोकामना

अराजक या एंग्री यंग मैन? राहुल गांधी- भारतीय राजनीति का सबसे आक्रामक नेता प्रतिपक्ष

अराजक या एंग्री यंग मैन? राहुल गांधी- भारतीय राजनीति का सबसे आक्रामक नेता प्रतिपक्ष

Rahul Gandhi Anarchist or Angry Young Man?:

Rahul Gandhi Anarchist or Angry Young Man?: राहुल गांधी को समझना आसान नहीं है। पिछले 15 वर्षों में उनकी राजनीति ने कई चेहरे देखे हैं—‘पप्पूसे लेकर भारत जोड़ो यात्रा के यात्री तक, और अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में सत्ता को खुली चुनौती देने वाले नेता तक।

लेकिन राहुल गांधी की कहानी का एक पहलू ऐसा भी है जिसे राजनीति अक्सर ढक देती है—उनकी सहजता, परिवार के प्रति लगाव और आम आदमी के साथ बिना औपचारिकता घुलने-मिलने की कोशिश।
यही विरोधाभास राहुल को दिलचस्प बनाता है।

एक तरफ संसद और सड़क पर बेहद आक्रामक राहुल गांधी, दूसरी तरफ मां सोनिया का हाथ थामे, बहन प्रियंका को टॉफी देते या किसी साधारण मोची के घर बैठकर जूते सिलना सीखते राहुल गांधी।

तो आखिर राहुल गांधी कौन हैं?

अराजक? एंग्री यंग मैन? या भारतीय राजनीति का वह नेता जिसे विरोधी भले नापसंद करें, लेकिन आम आदमी अब भला इंसानमानने लगा है?

2011 का राहुल और 2026 का राहुल

करीब डेढ़ दशक पहले राहुल गांधी के पास विरासत बहुत थी, लेकिन अपनी राजनीतिक पहचान कम। 2014 में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई। 2019 में वे अमेठी हार गए। ‘पप्पू’ की छवि इतनी मजबूत थी कि उनके गंभीर राजनीतिक प्रयास भी अक्सर मजाक में बदल जाते थे।

लेकिन हार ने राहुल को बदला।

उनकी भाषा बदली। तेवर बदले। संसद से सड़क तक उनकी मौजूदगी बढ़ी।

फिर आई भारत जोड़ो यात्रा। यह राहुल गांधी का राजनीतिक पुनर्जन्म था।
कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल चलने वाला नेता लोगों के बीच बैठा, बच्चों से मिला, किसानों से बात की, युवाओं के सवाल सुने। पहली बार राहुल गांधी को टीवी के मंच पर नहीं, सड़क पर देखा गया।
और यहीं ‘पप्पू’ वाली छवि में पहली बड़ी दरार पड़ी।

राहुल की राजनीति में गुस्सा है, लेकिन आदमी में सहजता

राहुल गांधी की राजनीति आज जितनी आक्रामक है, उनका सार्वजनिक व्यवहार अक्सर उतना ही सहज दिखाई देता है। यही शायद उनकी सबसे बड़ी मानवीय ताकत है।

2024 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के मोची रामचेत की दुकान पर रुकना और उनसे जूते सिलना सीखना केवल राजनीतिक फोटो-ऑप था या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन इसके महीनों बाद रामचेत और उनके परिवार को दिल्ली स्थित अपने घर बुलाना एक अलग तस्वीर पेश करता है। राहुल ने उन्हें गले लगाया; प्रियंका और सोनिया गांधी ने भी उनके परिवार से मुलाकात की।

यह वह राहुल है जिसे राजनीति की शब्दावली में आसानी से फिट नहीं किया जा सकता।

वह नेता जो संसद में प्रधानमंत्री पर सबसे तीखे हमले कर सकता है, वही किसी आम आदमी के घर बैठकर उसकी कहानी भी सुन सकता है।

यही भारतीय समाज की उस पुरानी परंपरा से जुड़ता है जिसमें राजनीति चाहे जितनी कठोर हो, परिवार और रिश्तों में आदमी की पहचान उसके व्यवहार से होती है।

भारत में नेता केवल भाषण से नहीं बनता। लोग यह भी देखते हैं कि वह अपनी मां के साथ कैसा है, बहन के साथ कैसा है, गरीब के साथ कैसा है और कमजोर आदमी के सामने उसका व्यवहार कैसा है।

सोनिया और प्रियंका : राहुल के राजनीतिक व्यक्तित्व का मानवीय पक्ष

राहुल गांधी को परिवार से अलग करके देखना संभव भी नहीं है और शायद सही भी नहीं। सोनिया गांधी उनकी मां ही नहीं, उनकी सबसे लंबी राजनीतिक छाया भी रही हैं।

हाल के दिनों में सोनिया गांधी की आने वाली आत्मकथा के संदर्भ में राहुल और प्रियंका दोनों का अपनी मां के प्रति भावनात्मक सार्वजनिक संदेश इस रिश्ते के निजी पक्ष को सामने लाता है। राहुल ने पिता राजीव गांधी का संदर्भ देते हुए मां के जीवन और संघर्ष के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

और प्रियंका? यह रिश्ता शायद राहुल गांधी के व्यक्तित्व का सबसे सहज आईना है।

राजनीति में दोनों भाई-बहन एक-दूसरे के सहयोगी हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में कई बार उनका रिश्ता बिल्कुल आम भाई-बहन जैसा दिखाई देता है।

रक्षाबंधन पर दोनों का स्नेहपूर्ण संवाद हो या संसद परिसर में राहुल का प्रियंका को टॉफी देकर कहना—“Have a sweet”—इन छोटे क्षणों में नेता नहीं, भाई दिखाई देता है।

फरवरी 2026 में राहुल ने मजाकिया अंदाज में यह भी बताया कि एक समय प्रियंका उनसे नाराज थीं और वायनाड के एक प्रसंग ने दोनों के बीच का तनाव खत्म किया। यह किस्सा जितना सामान्य लगता है, उतना ही महत्वपूर्ण भी है—क्योंकि राजनीति में परिवार अक्सर केवल शक्ति-समीकरण बन जाता है, जबकि राहुल-प्रियंका के रिश्ते में भाई-बहन की सहजता अब भी दिखाई देती है।

यही राहुल गांधी का दूसरा चेहरा है।

जो नेता सत्ता से लड़ते समय तल्ख हो सकता है, वही परिवार में बेहद सहज और भावुक भी है।

और शायद यही Gen-Z को आकर्षित कर रहा है

आज का Gen-Z नेता में ‘महानता’ से ज्यादा ऑथेंटिसिटी खोजता है। उसे बहुत बनावटी भाषण पसंद नहीं। उसे ऐसा नेता चाहिए जो सवाल सुने, गलती स्वीकार करे, हंसे, मजाक करे और जरूरत पड़े तो उसके साथ जमीन पर बैठे।

राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में इसी भाषा को अपनाया है।

वे युवाओं से बेरोजगारी पर बात करते हैं, छात्रों से NEET और परीक्षा व्यवस्था पर संवाद करते हैं और रोजगार को राजनीतिक बहस के केंद्र में रखते हैं। 2022 की भारत जोड़ो यात्रा में बेरोजगारी पर युवाओं के साथ उनका संवाद इसी राजनीति का हिस्सा था।

2024 में NEET छात्रों से उनकी मुलाकात और लगातार युवा मुद्दों को उठाना भी इसी दिशा में देखा जा सकता है। और उनका छात्रों की गूंज कार्यक्रम भी इसी संवाद की निरंतरता है, जिसका उद्देश्य छात्रों के सवाल सुनना और उनसे सीधे चर्चा करना है।

लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि Gen-Z राहुल गांधी का नया वोट बैंक बन चुका है।

लेकिन इतना जरूर है— राहुल अब युवाओं के बीच केवल एक राजनीतिक चुटकुला नहीं हैं। वे बातचीत का विषय हैं। और राजनीति में perception का बदलना कभी छोटी बात नहीं होती।

एंग्री यंग मैनउम्र से नहीं, तेवर से

राहुल गांधी अब युवा नहीं हैं। लेकिन उनकी राजनीति में ‘एंग्री यंग मैन’ का तेवर जरूर है।

  • व्यवस्था से नाराजगी।
  • बेरोजगारी पर गुस्सा।
  • असमानता पर सवाल।
  • संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर बेचैनी।
  • और सत्ता से लगातार टकराने की इच्छा।

21 अगस्त 2026 को छात्र प्रदर्शन में घायल युवक के लिए दिल्ली के संसद मार्ग थाने के बाहर करीब घंटों धरने पर बैठना इसका ताजा उदाहरण है। उनके साथ प्रियंका गांधी भी थीं।

इसे कोई अराजकता कह सकता है। कोई राजनीतिक नौटंकी। लेकिन समर्थक इसे विपक्ष के सड़क पर उतरने की जिम्मेदारी कहेंगे। यही राहुल की राजनीति का नया चरित्र है—वे अब लड़ने से कतराते नहीं हैं।

लेकिन क्या वे अराजक हैं?

आक्रामक होना और अराजक होना एक बात नहीं। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्ता से सवाल पूछना है। संसद में विरोध करना, सड़क पर उतरना और सरकार को चुनौती देना उसका अधिकार है।

समस्या तब शुरू होती है जब राजनीतिक विरोध और संस्थाओं पर अविश्वास के बीच की रेखा मिटने लगे। ‘वोट चोरी’ जैसे आरोप बेहद गंभीर हैं। इसलिए उनके साथ गंभीर प्रमाण भी जरूरी हैं।

राहुल की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा जोखिम एक ही है— वे अब पीछे हटने वाले नेता नहीं हैं।

जनता की नजर में राहुल : नेता नहीं, पहले भला आदमी?

शायद राहुल गांधी की छवि में सबसे बड़ा बदलाव यही है। एक समय जनता उन्हें केवल ‘गांधी परिवार के बेटे’ के रूप में देखती थी।

आज एक वर्ग उन्हें पहले भला इंसान, फिर नेता के रूप में देखने लगा है। यह बदलाव चुनावी जीत की गारंटी नहीं है।

लेकिन राजनीति में किसी नेता के प्रति ‘भला आदमी’ वाली धारणा महत्वपूर्ण होती है। भारतीय मतदाता नेता की नीतियों से असहमत हो सकता है, लेकिन अगर उसे लगता है कि आदमी नीयत से ठीक है, तो राजनीतिक रिश्ते की एक जमीन तैयार हो जाती है।

राहुल गांधी शायद इसी जमीन पर खड़े हैं। उनके आलोचक उनकी राजनीति को नकारात्मक मान सकते हैं। उनके विरोधी उनकी शैली को आक्रामक कह सकते हैं। 

लेकिन उनके समर्थक और बढ़ता युवा वर्ग उनमें एक ऐसा नेता देखता है जो कम से कम सुनता है, लोगों के बीच जाता है और सत्ता से सवाल पूछने में डरता नहीं।

सबसे आक्रामक नेता प्रतिपक्ष?

आज राहुल गांधी निश्चित रूप से भारत के सबसे मुखर और आक्रामक विपक्षी नेताओं में हैं।

वे संसद में लड़ते हैं। सड़क पर लड़ते हैं। चुनाव में लड़ते हैं। सरकार से लड़ते हैं।

और अब युवाओं के सवालों और हक के लिए भी सड़क पर उतरते हैं। लेकिन आक्रामकता अपने आप में नेतृत्व नहीं है। नेतृत्व तब साबित होगा जब वही गुस्सा नीति में बदले, विरोध विकल्प में बदले और आंदोलन शासन की क्षमता में।

पप्पूसे पॉलिटिकल चैलेंजरतक

‘पप्पू’ से ‘पॉलिटिकल चैलेंजर’ बनने की यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने अपने विरोधियों को भी अपनी राजनीति पर बात करने के लिए मजबूर किया है। राहुल गांधी की 15 साल की कहानी शायद तीन शब्दों में लिखी जा सकती है—

पप्पू → भला आदमी → पॉलिटिकल चैलेंजर।

पहला नाम उनके विरोधियों ने दिया। दूसरी छवि जनता के एक हिस्से ने बनाई। तीसरी पहचान राहुल गांधी खुद बनाने की कोशिश कर रहे हैं। और शायद यहीं उनके नाम का अर्थ फिर लौटता है।

राहुल—दुःखों पर विजय पाने वाला। यह दावा नहीं कि राहुल गांधी ने राजनीति जीत ली है।

अभी नहीं। लेकिन उन्होंने एक बात जरूर साबित की है— उपहास किसी नेता का अंतिम परिचय नहीं होता।
महात्मा गांधी को पीटरमारित्जबर्ग की एक ठंडी रात ने बदल दिया था। शायद राहुल को वर्षों के राजनीतिक उपहास ने। गांधीजी ने अपमान के बाद संघर्ष चुना। राहुल ने उपहास के बाद पुनर्निर्माण। दोनों की यात्रा समान नहीं है, इतिहास दोनों को एक तराजू में नहीं तौल सकता।

लेकिन एक सबक समान जरूर है— जिसे आप सार्वजनिक रूप से छोटा समझते हैं, वही कभी-कभी सबसे लंबी लड़ाई लड़ने की जिद लेकर खड़ा हो जाता है।

राहुल ने उपहास से सम्मान तक की दूरी तय कर ली है। अब सम्मान से विश्वास तक जाना बाकी है।  2029 में सवाल यह नहीं होगा कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी की सत्ता पर कितनी जोरदार चोट करते हैं।

सवाल होगा— क्या वे उस युवा भारत के विश्वसनीय विकल्प बन पाएंगे, जो नौकरी चाहता है, अवसर चाहता है, अपनी आवाज चाहता हैऔर साथ ही ऐसा नेता भी चाहता है जो सत्ता में बैठकर भी इंसान बना रहे?
क्योंकि सरकार गिराने के लिए जनता का आक्रोश काफी है। लेकिन सरकार चलाने के लिए नीति, क्षमता और विश्वास—तीनों चाहिए। और राहुल गांधी की अगली राजनीतिक लड़ाई इन्हीं तीन शब्दों की है।

श्रीलंका के कप्तान धनंजय टेस्ट टीम की इस कमी से हैं परेशान

श्रीलंका के कप्तान धनंजय डीसिल्वा चाहते हैं कि टीम के पास 140 किमी प्रति घंटे से ज़्यादा रफ़्तार से गेंदबाज़ी करने वाले कम से कम “दो या तीन गेंदबाज़” होने चाहिए।धनंजय डीसिल्वा चाहते हैं कि उनके पास चुनने के लिए ज़्यादा तेज़ गेंदबाज़ हों, और वह मौजूदा तेज़ गेंदबाज़ों से भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद रखते हैं।

असिता फ़र्नांडो पिछले कुछ वर्षों में अपने बेहतर प्रदर्शन के कारण श्रीलंका के प्रमुख तेज़ गेंदबाज़ बन गए हैं। हालांकि वह 130 किमी प्रति घंटे के आसपास की रफ़्तार से लगातार सटीक लाइन-लेंथ और तीव्रता के साथ गेंदबाज़ी करते हैं। श्रीलंका आम तौर पर दूसरे छोर से अधिक रफ़्तार वाले गेंदबाज़ के ज़रिए बल्लेबाज़ों को परेशान करने की कोशिश करता है।

असिता के साथ यह भूमिका फ़िलहाल लहिरू कुमारा निभाते हैं, जिनके नाम 36 टेस्ट में 36.38 की औसत से 106 विकेट हैं। भारत के ख़िलाफ़ गॉल टेस्ट में उन्होंने 175 रन देकर सिर्फ़ दो विकेट लिए थे। इसके अलावा चोटों ने भी उनके करियर का बड़ा हिस्सा प्रभावित किया है।

दूसरे टेस्ट से पहले डीसिल्वा ने कहा, “हमने लहिरू कुमारा को चोट-मुक्त रखने के लिए बहुत मेहनत की है। फ़िलहाल हमारे संसाधनों को देखते हुए असिता के साथ खेलने के लिए वही सबसे उपयुक्त विकल्प हैं। असिता की लाइन और लेंथ बेहतरीन है और लहिरू कुमारा के पास रफ़्तार है। अभी हमारे पास यही सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं।”

हालांकि डीसिल्वा चाहते हैं कि उनके पास ज़्यादा तेज़ गेंदबाज़ों के विकल्प हों। श्रीलंका के पास दुश्मंता चमीरा, दिलशान मदुशंका और मथीशा पथिराना जैसे गेंदबाज़ भी हैं। मदुशंका तो गॉल टेस्ट के लिए श्रीलंका की टेस्ट टीम का हिस्सा भी थे, लेकिन बाद में उन्हें घरेलू टी 20 खेलने के लिए रिलीज़ कर दिया गया और एसएससी टेस्ट के लिए भी टीम में जगह नहीं मिली।

चमीरा ने अपने करियर में 12 टेस्ट खेले हैं, लेकिन उनका आख़िरी टेस्ट 2021 में आया था। चोटों के इतिहास और सीमित ओवरों की टीम में उनकी अहमियत को देखते हुए श्रीलंका ने उन्हें सफ़ेद गेंद वाले क्रिकेट के लिए सुरक्षित रखा है।

चयनकर्ताओं और टीम प्रबंधन ने अभी तक बहु-दिवसीय क्रिकेट के लिए तेज़ गेंदबाज़ों का दायरा बढ़ाने की कोई गंभीर योजना नहीं बनाई है। डीसिल्वा ने कहा, “मैं यह भी चाहता हूं कि हमारे पास 140 किमी प्रति घंटे से ज़्यादा रफ़्तार वाले दो या तीन गेंदबाज़ हों, लेकिन दुर्भाग्य से टेस्ट सेटअप में अभी हमारे पास सिर्फ़ एक ही ऐसा गेंदबाज़ है। फ़िलहाल मुझे इस बारे में कोई बड़ी योजना नहीं बताई गई है कि टेस्ट टीम में किन खिलाड़ियों को लाया जा सकता है। उम्मीद है कि भविष्य में हम ऐसे और क्रिकेटर तैयार करेंगे।”

डीसिल्वा की कप्तानी में आक्रमण में दो तेज़ गेंदबाज़ खिलाना एक नियमित रणनीति रही है। पूर्व कोच क्रिस सिल्वरवुड और सनथ जयसूर्या भी तेज़ गेंदबाज़ी प्रतिभा को विकसित करने पर ज़ोर देते रहे हैं। 2010 के दशक के उत्तरार्ध में श्रीलंका घरेलू मैदानों पर स्पिन पर इतना निर्भर हो गया था कि वह अक्सर सिर्फ़ एक तेज़ गेंदबाज़ के साथ खेलता था।

डीसिल्वा ने कहा, “मेरी कप्तानी में खेले गए हर मैच में हमने दो तेज़ गेंदबाज़ खिलाए हैं, जबकि पहले सिर्फ़ एक गेंदबाज़ होता था। मेरा मानना है कि श्रीलंका में भी तेज़ गेंदबाज़ों की भूमिका है। अगर आपके तेज़ गेंदबाज़ यहां विकेट ले सकते हैं तो वे दुनिया में कहीं भी विकेट ले सकते हैं। यह बात हमें जल्दी सीखनी होगी।”

पिछले 15 वर्षों में श्रीलंका में सिर्फ़ एक श्रीलंकाई तेज़ गेंदबाज़ ने पांच विकेट लेने का कारनामा किया है। नुवान प्रदीप ने 2017 में भारत के ख़िलाफ़ 132 रन देकर छह विकेट लिए थे। इसी अवधि में 14 विदेशी तेज़ गेंदबाज़ों ने श्रीलंका में पांच विकेट लिए हैं। मिचेल स्टार्क और जुनैद ख़ान ने यह उपलब्धि तीन-तीन बार हासिल की है।

डीसिल्वा ने कहा, “उदाहरण के लिए गॉल में विदेशी तेज़ गेंदबाज़ पांच विकेट ले चुके हैं, लेकिन हाल के वर्षों में हमारे किसी सीमर ने गॉल या एसएससी में ऐसा नहीं किया है। हमारे तेज़ गेंदबाज़ों में उस तरह का आत्मविश्वास नहीं है। अगर वे अपने खेल में कुछ प्रतिशत भी सुधार कर लें तो हम एक टीम के रूप में कहीं बेहतर आगे बढ़ सकते हैं।”

कल का मौसम: 23 अगस्त को 15 राज्यों में तूफानी हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश की चेतावनी, यूपी से ओडिशा तक IMD ने दिया ये अलर्ट

Weather Update: देश भर में मानसूनी गतिविधियों के चलते मौसम का मिजाज बदला हुआ है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 23 अगस्त के लिए मौसम का ताजा पूर्वानुमान जारी करते हुए देश के अलग अलग हिस्सों में मूसलाधार बारिश, बिजली कड़कने और तेज आंधी-तूफान को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर प्रदेश से लेकर ओडिशा तक और मध्य भारत से लेकर दक्षिणी राज्यों तक मौसम का असर देखने को मिलेगा। मौसम विभाग ने नागरिकों को खराब मौसम के दौरान सतर्क रहने और आवश्यक एहतियात बरतने की सलाह दी है।

WhatsApp Image 2026-08-22 at 6.33.08 PM

छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान

मौसम विभाग के बुलेटिन के मुताबिक 23 अगस्त को छत्तीसगढ़ और ओडिशा में अलग-अलग जगहों पर भारी से बहुत भारी बारिश होने की पूरी संभावना है। इन राज्यों के प्रभावित इलाकों में जलभराव और नदियों के जलस्तर में अचानक से बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

इन 15 राज्यों और क्षेत्रों में भारी बारिश का अलर्ट

देश के 15 से अधिक राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर भारी बारिश की संभावना जताई गई है। इनमें उत्तर भारत का उत्तराखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इसके अलावा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और विदर्भ क्षेत्र में भारी बारिश का अनुमान है। पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के साथ-साथ नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में भी बारिश की गतिविधियां तेज रहेंगी। पूर्वी भारत के गांगेय पश्चिम बंगाल और झारखंड में बारिश का अलर्ट है। दक्षिण भारत के तटीय कर्नाटक, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक, केरल और माहे तथा तेलंगाना में भी भारी बारिश होने की संभावना जताई गई है।

40 से 50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलेंगी तूफानी हवाएं

बारिश के साथ-साथ कई इलाकों में आकाशीय बिजली चमकने और तूफानी हवाएं चलने की चेतावनी दी गई है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल में अलग-अलग जगहों पर आकाशीय बिजली के साथ 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है।

अन्य राज्यों में बिजली गिरने और 30 से 40 किमी प्रति घंटे की हवाओं की चेतावनी

पूर्वी राजस्थान, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख, झारखंड, कर्नाटक, केरल और माहे, लक्षद्वीप, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल और सिक्किम के दूर-दराज के इलाकों में गरज और बिजली चमकने के साथ 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं। अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और उत्तराखंड के कई स्थानों पर आकाशीय बिजली गिरने की आशंका जताई गई है। इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों में सतह पर तेज हवाएं चलने का पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है।

अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के लिए समुद्री चेतावनी

समुद्र में खराब मौसम के कारण मछुआरों और तटीय क्षेत्रों को विशेष रूप से अलर्ट पर रखा गया है। अरब सागर में सोमालिया तट के साथ और उससे सटे इलाकों, मध्य-पश्चिम और उससे सटे दक्षिण-पश्चिम अरब सागर के कुछ हिस्सों में 45 से 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलेंगी, जिनकी स्पीड बढ़कर 65 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही कर्नाटक, केरल, लक्षद्वीप क्षेत्र और उससे सटे समुद्री क्षेत्रों में 35 से 45 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है, जो बढ़कर 55 किलोमीटर प्रति घंटे तक जा सकती हैं।

बंगाल की खाड़ी की बात करें तो मन्नार की खाड़ी, कॉमोरिन क्षेत्र, दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और दक्षिण श्रीलंका तट के आसपास के इलाकों में 45 से 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तूफानी हवाएं चलने का अनुमान है, जो 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार छू सकती हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तरी आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों, मध्य-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के कुछ हिस्सों तथा अंडमान सागर में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से हवाएं चलने की उम्मीद है, जो बढ़कर 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती हैं।

यह भी पढ़ें: Hyderabad Building Collapse: 7 मंजिला इमारत भरभराकर गिरी, 2 की मौत; नाले के पास हो रहा था निर्माण

SIP Calculator: हर महीने SIP से ₹5 हजार इनवेस्ट कर सकता हूं, 10 साल में कितना बड़ा फंड बन जाएगा?

पिछले कुछ सालों में सेविंग्स और निवेश को लेकर लोगों की सोच बदली है। खासकर युवा निवेश के पुराने तरीकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। वे म्यूचुअल फंड जैसे निवेश के विकल्पों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इसमें सिप का बड़ा हाथ है। सिप के जरिए कोई व्यक्ति हर महीने अपनी क्षमता के हिसाब से म्यूचुअल फंड की स्कीम में निवेश कर सकता है। जरूरत पड़ने पर वह अपना पैसा निकाल सकता है।

अच्छे रिटर्न की वजह से सिप में बढ़ रही दिलचस्पी

सिप से निवेश में दिलचस्पी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इसका रिटर्न है। सिप से लंबी अवधि तक निवेश कर लोगों ने बड़े फंड बनाए हैं। अब तो लोग रिटायरमेंट बाद के खर्च के लिए भी सिप से म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में निवेश के बारे में सोचने लगे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि म्यूचुअल फंड्स की स्कीम में सिप या एकमुश्त निवेश पर तभी अच्छा रिटर्न मिलता है, जब निवेश लंबी अवधि के लिए किया जाए।

हर महीने 5000 रुपये के सिप से तैयार हो सकता है बड़ा फंड

गाजियाबाद के रहने वाले मनोहर लाल एक जूता फैक्ट्री में काम करते हैं। उन्होंने बताया है कि वह हर महीने म्यूचुअल फंड में सिप के जरिए 5000 रुपये का निवेश कर सकते हैं। उनका सवाल है कि अगर वह यह निवेश लगातार 10 साल तक करते हैं तो इससे कितना बड़ा फंड वह बना सकते हैं?

लंबी अवधि में म्यूचुअल फंड का सालान रिटर्न कम से कम 12%

मनीकंट्रोल ने यह सवाल एक्सपर्ट से पूछा। एक्सपर्ट ने बताया कि सिप से 10 साल तक लगातार निवेश करने पर काफी बड़ा फंड तैयार हो सकता है। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड की स्कीम का सालाना रिटर्न लंबी अवधि में कम से कम 12 फीसदी रहता है। म्यूचुअल फंड की स्कीम के पिछले रिटर्न को देख यह अनुमान लगाया गया है।

5000 रुपये के मंथली सिप से 10 साल में तैयार होगा 11 लाख का फंड

अगर लाल हर महीने 5000 का निवेश सिप से करते हैं तो इसका मतलब है कि वह 10 साल में कुल 6,00,000 रुपये का निवेश करेंगे। अगर इस पर सालाना 12 फीसदी का रिटर्न मान लिया जाए तो उनका पैसा 10 साल में बढ़कर 11,20,179 रुपये हो जाएगा। इसका मतलब है कि उनके कुल 6 लाख रुपये के निवेश पर 5,20,179 रुपये का रिटर्न मिलेगा।

सिप अमाउंट हर साल 10 फीसदी बढ़ाने पर तैयार होगा 16 लाख का फंड

अगर वह हर साल निवेश के अमाउंट में 10 फीसदी इजाफा करते हैं तो उनके लिए और बड़ा फंड तैयार हो जाएगा। चूंकि लाल नौकरी करते हैं, जिससे हर साल उनकी सैलरी कुछ-न-कुछ बढ़ती रहेगी। इसलिए हर साल सिप के अमाउंट को 10 फीसदी बढ़ाने में उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी। अगर वह हर साल 10-10 फीसदी सिप अमाउंट बढ़ाते हैं तो 10 साल में उनके लिए 16,34,449 रुपये का फंड तैयार हो जाएगा।

# यह कैलकुलेशन ऑनलाइन उपलब्ध सिप कैलकुलेटर पर आधारित है।

Hyderabad Building Collapse: 7 मंजिला इमारत भरभराकर गिरी, 2 की मौत; नाले के पास हो रहा था निर्माण

Hyderabad Building Collapse: हैदराबाद के अंजैया नगर में शनिवार को उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब एक निर्माणाधीन सात मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर पड़ी। हादसे में कम से कम दो लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य घायल हो गए। बता दें कि जिस इलाके में यह घटना हुई, वह माधापुर पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आता है।

वहीं, घटना की जानकारी मिलते ही राहत और बचाव टीमें मौके पर पहुंचीं और मलबे में फंसे लोगों की तलाश शुरू कर दी है।

हैदराबाद में गिरी इमारत: वीडियो में दिखा नुकसान का मंजर

खबरों के मुताबिक, गिरी हुई इमारत लगभग 50 वर्ग गज के प्लॉट पर बन रही थी और एक नाले के पास स्थित थी। निर्माण से जुड़ी परिस्थितियों ने बिल्डिंग और सुरक्षा नियमों के संभावित उल्लंघन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब अधिकारी यह जांच करेंगे कि इमारत के निर्माण के लिए जरूरी मंजूरी ली गई थी या नहीं और निर्माण के दौरान नियमों का पालन किया गया था या नहीं।

हैदराबाद में गिरी इमारत: नाले के पास बनी थी गिरी हुई इमारत

इस घटना में आस-पास की इमारतों को भी नुकसान पहुंचा है। बताया जा रहा है कि व्हाइटफील्ड में पास के एक अपार्टमेंट पर गिरे इमारत के मलबे से उसे काफी नुकसान हुआ। एहतियात के तौर पर पास के एक हॉस्टल को भी खाली कराया गया।

फिलहाल, अधिकारी अभी तक इमारत गिरने की सही वजह का पता नहीं लगा पाए हैं। वहीं, हादसे में नुकसान कितना हुआ है और घटना के समय इमारत के अंदर कितने लोग हो सकते थे, इसका भी पता लगाया जा रहा है।

एक विस्तृत जांच से यह भी पता चलने की उम्मीद है कि क्या इमारत के ढांचे में कमी, निर्माण से जुड़े नियमों का उल्लंघन या अन्य कारणों से यह हादसा हुआ।

बता दें कि हैदराबाद में निर्माण से जुड़ा यह हादसा कोई पहली घटना नहीं है। मार्च 2026 में टोलिचौकी इलाके में एक निर्माणाधीन इमारत की स्कैफोल्डिंग (बांस-बल्लियों/लोहे के सहारे की संरचना) गिरने से दो मजदूरों की मौत हो गई थी। डेक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने पाया था कि इमारत को सिर्फ दो मंजिल बनाने की अनुमति मिली थी, लेकिन कथित तौर पर चार अतिरिक्त मंजिल और एक पेंटहाउस अवैध तरीके से बना दिया गया था। हादसे के वक्त मजदूर छठी मंजिल पर काम कर रहे थे।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 की एक और घटना में तेलंगाना के भद्राचलम में बन रही छह मंजिला इमारत की ऊपरी चार मंजिला ढह गईं। पुलिस ने बताया कि ये मंजिले गैर-कानूनी तरीके से बनाई गई थीं और इमारत ढहने के बाद कम से कम दो मजदूरों की मौत की आशंका जताई गई।

यह भी पढ़ें: तमिलनाडु के सरकारी अस्पताल में पैदा हुए बच्चों को मिलेगी सोने की अंगूठी, 1.28 लाख रिंग का वर्क ऑर्डर जारी

प्रदेश में पर्याप्त चीनी, आमजन परेशान न हों : CM योगी

प्रदेश में पर्याप्त चीनी, आमजन परेशान न हों : CM योगी

CM Yogi Adityanath: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को आश्वस्त किया कि राज्य में चीनी की कोई कमी नहीं है, इसलिए आम नागरिक कतई परेशान न हों। प्रदेश की चीनी मिलों में वर्तमान में 179.38 लाख क्विंटल चीनी का भंडार उपलब्ध है। चीनी मिलों ने दो महीने (जून-जुलाई) में 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है। सीएम योगी ने निर्देश दिया कि आवश्यकता पड़ने पर चीनी मिलें 15 अक्टूबर से संचालित की जाएं।

15 अक्टूबर से संचालित की जाए चीनी मिलें 

मुख्यमंत्री ने समीक्षा बैठक में कहा कि सहकारी चीनी मिलों में 23.60 लाख क्विंटल, निगम की चीनी मिलों में 5.28 लाख क्विंटल और निजी चीनी मिलों में 150.50 लाख क्विंटल (कुल 179.38 लाख क्विंटल) चीनी प्रदेश में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त जून व जुलाई में चीनी मिलों ने 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है, इसमें से अधिकांश चीनी अभी भी खुले बाजार में उपलब्ध है। आवश्यकता पड़ने पर 15 अक्टूबर से चीनी मिलों को संचालित किया जाए।

भ्रम फैलाने व कालाबाजारी करने वालों पर करें कार्रवाई 

सीएम योगी ने आमजन से अपील की कि चीनी की कमी बताकर भ्रम फैलाने वालों से सावधान रहें। मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि चीनी की कालाबाजारी और भ्रम फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। उन्होंने भारत सरकार के निर्देश के क्रम में कहा कि कोई भी डीलर 30 दिन से अधिक चीनी स्टॉक का भंडारण नहीं करेगा और वे एक समय में 400 टन से ज्यादा स्टॉक भी नहीं रख सकते। बल्क कंज्यूमर्स (10 मीट्रिक टन प्रतिमाह खपत) भी 15 दिन से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकते। चीनी मिलें भी अपने मासिक कोटे के अंतर्गत विक्रित चीनी को विक्रय की तिथि से 7 दिन से अधिक अवधि तक गोदाम में नहीं रोकेंगी। 

सीएम ने दिया निर्देश- भौतिक सत्यापन कराएं जिलाधिकारी

मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि जनपद की समस्त पंजीकृत चीनी मिलों, थोक एवं फुटकर विक्रेताओं के गोदामों का भौतिक सत्यापन कराते हुए उपलब्ध स्टॉक की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट प्राप्त करें। निर्धारित सीमा से अधिक स्टॉक धारित करने अथवा जमाखोरी पर कठोर कार्रवाई की जाए। जनपद में चीनी की उपलब्धता एवं मूल्य पर सतत निगरानी रखते हुए किसी भी प्रकार की कृत्रिम कमी अथवा मूल्यवृद्धि की स्थिति में तत्काल शासन को अवगत कराएं।

48 लाख किसानों को किया गया 32,554 करोड़ का भुगतान 

बैठक में मुख्यमंत्री जी को अवगत कराया गया कि पेराई सत्र 2026-27 के लिए 28.14 लाख हेक्टेयर गन्ना क्षेत्रफल संभावित है। इससे 90 लाख टन चीनी उत्पादन की संभावना है। उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह अनुमानित चीनी खपत लगभग 4 लाख टन है। पेराई सत्र 2025-26 में 48 लाख किसानों को 32,554 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी किया गया है।