लेजेंड्स बूट्स क्यों टांग देते हैं?

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महान करियर का सबसे मुश्किल क्षण वह नहीं होता, जब आपको यह साबित करना हो कि आप अब भी जीत सकते हैं। मुश्किल क्षण वह होता है, जब आप यह तय करते हैं कि अब आपको कुछ और साबित करने की जरूरत नहीं है।

 

यही किसी महान खिलाड़ी की विदाई को इतना भावुक बना देता है। दुनिया आमतौर पर मानती है कि हार करियर खत्म करती है। लेकिन महान खिलाड़ी कई बार हार से पहले ही चले जाते हैं।

 

वे तब विदा होते हैं, जब तालियां अभी बाकी होती हैं। जब शरीर अभी कुछ और मुकाबले लड़ सकता है। जब दर्शक अभी एक और प्रदर्शन की मांग कर रहे होते हैं।

 

लियोनेल मेसी की विदाई कुछ ऐसी ही है।

 

39 साल की उम्र में मेसी अर्जेंटीना की जर्सी उतार रहे हैं—इसलिए नहीं कि दुनिया ने उन्हें बता दिया कि उनका समय खत्म हो गया है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने खुद तय किया कि अब समय आ गया है।

यह फर्क महत्वपूर्ण है।

 

2022 में उन्होंने अर्जेंटीना को विश्व कप जिताया। 2026 में टीम को फिर फाइनल तक पहुंचाया और टूर्नामेंट में आठ गोल किए। अर्जेंटीना के लिए 207 मैच और 125 गोल के साथ वह अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कह रहे हैं। क्लब फुटबॉल में उनकी कहानी अभी जारी है।

 

फिर भी उनके शब्दों में जीत का अहंकार नहीं, विदाई का दर्द है। फैसला उन्हें भीतर तक चोट पहुंचाता है, लेकिन वह समझते हैं कि यही सही समय है। मेसी की विदाई का सबसे मार्मिक हिस्सा यह नहीं कि वह जा रहे हैं। बल्कि यह कि वह तब जा रहे हैं जब उनके पास अभी भी देने के लिए कुछ बाकी दिखता है। 

 

यह बात सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि मेसी दुनिया के महानतम फुटबॉलरों में से एक हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेसी ने तब रुकने का फैसला किया जब वे अभी भी मेसी थे।

 

यही विदाई को सुंदर बनाता है। 

 

शायद यही महानता की सबसे कठिन परीक्षा है— जब आप अभी भी अच्छा खेल सकते हों, तब यह पहचानना कि अब रुक जाना चाहिए।

चार लेजेंड्स, चार अलग विदाइयां

सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट इसलिए नहीं छोड़ा कि उनका क्रिकेट से प्रेम खत्म हो गया था। 24 साल और 200 टेस्ट के बाद उन्होंने उस खेल से विदाई ली, जिसे 11 साल की उम्र से उन्होंने अपना जीवन बना लिया था।

 

कल्पना कीजिए—जिस व्यक्ति की सुबह, दोपहर, शाम और पहचान क्रिकेट के इर्द-गिर्द बनी हो, उसके लिए क्रिकेट छोड़ना किसी नौकरी छोड़ने जैसा नहीं था।

 

उनके लिए वो अपने ही एक हिस्से से अलग होना था।

 

रोज नेट्स पर न जाना। ड्रेसिंग रूम में न लौटना। दर्शकों का शोर न होना। बल्ले से टकराती बॉल की आवाज न सुनना। फिर भी एक समय उन्होंने समझा कि एक सपना अपनी पूर्णता तक पहुंच चुका है।

 

रोजर फेडरर के सामने सवाल कुछ और था। शरीर वर्षों से संकेत दे रहा था—चोटें, सर्जरी, लंबी रिकवरी और बार-बार लौटने की कोशिश।

 

41 की उम्र में उन्होंने आखिरकार स्वीकार किया कि कभी-कभी दिमाग अब भी दौड़ना चाहता है, लेकिन शरीर अपनी सीमा पहले ही बता चुका होता है। फेडरर ने अपने शरीर की सुनी। 

 

राफेल नडाल की कहानी में शरीर के साथ समय भी खड़ा था। 38 की उम्र में, वर्षों की चोटों से जूझने के बाद, उन्होंने स्वीकार किया कि खेल अब पहले जैसी शर्तों पर संभव नहीं था।

 

नडाल ने अपने करियर को “much more successful than I could have ever imagined” कहकर पीछे देखा। 

सचिन ने कहा—“जब मेरा दिल कहता है कि अब समय आ गया है।”

 

फेडरर ने अपने शरीर का संदेश सुना।

 

और मेसी कह रहे हैं—दर्द हो रहा है, लेकिन समय आ गया है।

 

चार महान खिलाड़ी। चार अलग कारण।

 

लेकिन एक बात समान—  किसी ने दुनिया से यह प्रमाणपत्र नहीं मांगा कि अब उसका समय पूरा हो चुका है।

 

उन्होंने खुद पहचाना। महान खिलाड़ी सिर्फ यह नहीं जानते कि कितना खेलना है; वे यह भी जानते हैं कि कब खेलना बंद करना है।

यहीं खेल अचानक जिंदगी बन जाता है

हममें से ज्यादातर लोग कभी विश्व कप फाइनल नहीं खेलेंगे। किसी स्टेडियम में 70 हजार लोग हमारा नाम नहीं पुकारेंगे। लेकिन जीवन किसी न किसी मोड़ पर हमसे वही सवाल पूछेगा— अब रुकना कब है?

 

50 की उम्र के बाद यह सवाल और साफ सुनाई देता है। तीन दशक तक आपका परिचय आपके काम से रहा— मैं पत्रकार हूं। मैं डॉक्टर हूं। मैं अधिकारी हूं। मैं कारोबारी हूं। 

 

फिर एक दिन designation चला जाता है। विजिटिंग कार्ड बदल जाता है। कुर्सी पर कोई और बैठ जाता है। और पहली बार सवाल नौकरी का नहीं रहता।

 

सवाल यह होता है—मैं कौन हूं, जब मैं वह नहीं रहा जो इतने वर्षों तक था?

 

शायद रिटायरमेंट का असली डर वेतन या पद खोने का नहीं है। अपने उस रूप को खो देने का है, जो नौकरी के साथ बना था।

 

इसीलिए कुछ लोग रिटायर नहीं होते—भले ही उन्हें पैसों की जरूरत न हो। उन्हें काम से ज्यादा जरूरी होने का एहसास चाहिए।
 

लेकिन जरूरी होना और मूल्यवान होना एक बात नहीं

यह उम्र के साथ सीखा जाने वाला शायद सबसे कठिन सबक है। कोई संस्था हमसे बड़ी होती है।

 

अखबार हमारे बिना भी निकलता है। कंपनी नया नेतृत्व खोज लेती है। टीम नया कप्तान चुन लेती है। 

दुनिया आगे बढ़ जाती है।

 

यह समझना कि आप replaceable हैं, पहले चोट करता है। फिर मुक्त करता है। क्योंकि जब आपको हर कीमत पर अपनी जगह बचाने की जरूरत नहीं रहती, तब आप एक बेहतर सवाल पूछ सकते हैं— “अब मैं वह क्या दे सकता हूं, जो खुद को साबित करने में व्यस्त रहते हुए नहीं दे पाया?”

 

यहीं अनुभव की असली कीमत शुरू होती है।

 

खिलाड़ी कोच बनता है।

 

बॉस mentor बनता है।

 

विशेषज्ञ शिक्षक बनता है।

 

और जो व्यक्ति कभी जगह के लिए लड़ता था, वह किसी और के लिए जगह बनाने लगता है।

 

शायद उम्र का सबसे बड़ा विशेषाधिकार यही है कि कमरे का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने की जरूरत खत्म हो जाए और किसी दूसरे को महत्वपूर्ण बनाने में खुशी मिलने लगे।

 

रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती

  • फेडरर 41 पर रुके। 
  • नडाल 38 पर।
  • सचिन 40 पर।

 

कुछ लोग इससे बहुत आगे तक काम करते हैं। कुछ को करना चाहिए। कुछ को नहीं।

 

सवाल बस चार हैं— 

  • क्या मैं सीख रहा हूं?
  • क्या मैं योगदान दे रहा हूं?
  • क्या शरीर रुकने का संकेत दे रहा है?
  • और क्या मैं किसी युवा को अपनी जगह देने के लिए तैयार हूं?

 

अगर जवाब बदल रहे हैं, तो अगली पारी सामने है। जरूरी नहीं कि वह संन्यास हो—शायद सिर्फ भूमिका बदलनी हो।

 

भगवद्गीता की एक परिचित पंक्ति है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

 

हम इसे आमतौर पर कर्म और उसके फल से विरक्ति के रूप में समझते हैं। लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर इसका एक और अर्थ खुल सकता है— आपकी कीमत हमेशा स्कोरबोर्ड से तय नहीं हो सकती।

 

जिंदगी की पहली पारी में हम स्कोर गिनते हैं—पद, पैसा, पुरस्कार, उपलब्धियां, प्रभाव। 

 

दूसरी पारी में शायद सवाल बदल जाता है— “मैंने जो सीखा, अब उसका करूंगा क्या?” यहीं करियर धीरे-धीरे उपलब्धि से विरासत में बदलता है। 

 

हर किसी को विश्व कप फाइनल, 200वां टेस्ट या आखिरी ग्रैंड स्लैम जैसा विदाई मंच नहीं मिलेगा। हममें से अधिकांश की आखिरी विदाई बहुत शांत होगी। एक खाली होती मेज।

 

बदलता हुआ विजिटिंग कार्ड। एक आखिरी ईमेल। और बंद होता हुआ एक दरवाजा। लेकिन सवाल वही रहेगा— क्या हम तब रुकेंगे जब कोई और हमें बता देगा कि हमारा समय खत्म हो गया है?

 

या हममें इतनी समझ होगी कि उससे पहले पहचान लें कि हमारी सबसे अच्छी पारी अब कहीं और है? 

 

और फिर बात मेसी पर लौटती है।  

 

उन्होंने फुटबॉल नहीं छोड़ा है।

 

तेंदुलकर ने क्रिकेट छोड़ा, उसकी समझ नहीं।

 

फेडरर ने प्रतिस्पर्धी टेनिस छोड़ा, खेल से रिश्ता नहीं।

 

नडाल ने कोर्ट छोड़ा, टेनिस नहीं।

 

शायद महान संन्यास की यही खूबसूरती है— आप मंच छोड़ते हैं। अपनी कहानी नहीं।

 

क्योंकि महानता सिर्फ यह नहीं कि आपने खेल में कितने लंबे समय तक टिके रहे। महानता यह भी है कि कब समझा कि खेल ने आपको सब कुछ दे दिया है—और अब आपकी बारी है कुछ लौटाने की।

 

शायद बूट्स इसलिए नहीं टांगे जाते कि देने को कुछ नहीं बचा। कभी-कभी इसलिए टांगे जाते हैं क्योंकि जो बचा है, वह अगली पारी के लिए है।

927 गोलों पर रुका मेस्सी का करियर, नहीं तोड़ पाए रोनाल्डो का यह रिकॉर्ड

फुटबॉल के ‘बेताज बादशाह’ लियोनेल मेसी ने अपने करियर में 1,171 मैचों में 927 गोल करने के बाद अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल को अलविदा कहा है। मेसी ने अपने आखिरी मैच में चार गोल करके इंटर मियामी को शनिवार को मेहमान टीम सीएफ मॉन्ट्रियल पर रिकॉर्ड 7-1 से जीत दिलाई। मियामी के लिए मेसी के चार गोल के शानदार प्रदर्शन से उनके करियर के गोल की संख्या 1,171 मैचों में 927 हो गई है।

लगभग दो दशकों से, पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी फुटबॉल की सबसे बड़ी व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विताओं में से एक में शामिल रहे हैं। उन्होंने बैलन डी’ओर, चैंपियंस लीग रिकॉर्ड, लीग खिताब और गोल करने के मील के पत्थर के लिए प्रतिस्पर्धा की है, और लगातार एक-दूसरे को असाधारण स्तर तक आगे बढ़ाया है। लेकिन संन्यास के बाद लियोनेल मेसी 1,000 करियर गोल की दौड़ में क्रिस्टियानो रोनाल्डो से पीछे रह गए हैं

शनिवार को मॉन्ट्रियल के खिलाफ इंटर मियामी की 7-1 से शानदार जीत में मेसी के चार गोल के प्रदर्शन ने उन्हें 1,171 मैचों में 927 करियर गोल तक पहुंचा दिया।इस बीच, रोनाल्डो 1000 गोल के मील के पत्थर के बहुत करीब हैं। पुर्तगाली सुपरस्टार ने 1,333 मैचों में 978 गोल किए हैं, जिससे वे 1,000 गोल से सिर्फ़ 22 गोल दूर हैं।

हालांकि, रोनाल्डो ने बार-बार साबित किया है कि उम्र उनके लिए कोई रुकावट नहीं है। 41 साल की उम्र में भी वे लगातार गोल कर रहे हैं। उन्होंने अपनी बेहतरीन फिटनेस और टॉप पर बने रहने की बेमिसाल चाहत के दम पर अपना करियर बनाया है। पुर्तगाली खिलाड़ी ने मेसी के मुकाबले करियर में 51 गोल ज़्यादा किए हैं।

अंतरराष्ट्रीय गोलो में मेस्सी से आगे रोनाल्डो

 

लियोनेल मेसी ने अपने करियर में 207 इंटरनेशनल मैचों में 125 गोल किए हैं, जिससे वे अर्जेंटीना के लिए अब तक के सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए हैं। इंटरनेशनल फुटबॉल में सबसे ज्यादा गोल करने वालों की लिस्ट में भी मेसी दूसरे नंबर पर हैं, उनसे आगे सिर्फ उनके प्रतिद्वंद्वी क्रिस्टियानो रोनाल्डो हैं।

मेसी का भावुक विदाई संदेश : ‘मेरे पास देने के लिए अब कुछ नहीं बचा’ 

एक दिल तोड़ने वाले संदेश के ज़रिए, लियोनेल मेसी ने अर्जेंटीना की नेशनल टीम से रिटायर होने का अपना पक्का फ़ैसला सार्वजनिक किया। ऐतिहासिक कप्तान ने माना कि यह फ़ैसला उनकी आत्मा को गहरी चोट पहुँचाता है, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्होंने दो दशकों तक इस जर्सी के लिए अपना सब कुछ दिया।

मेसी ने अपने संदेश में कहा, “मैंने अपना सब कुछ दिया, मेरे पास देने के लिए अब कुछ नहीं बचा।” रोसारियो में जन्मे इस स्टार ने अपने बयान में बताया कि अब पीछे हटने और नई पीढ़ी के लिए जगह बनाने का समय आ गया है। उन्होंने अपने परिवार, कोच, टीम के साथियों और फ़ैन्स का उन्हें मिले प्यार के लिए दिल से शुक्रिया अदा किया और भरोसा दिलाया कि अब वह स्टैंड्स से किसी भी दूसरे सपोर्टर की तरह टीम का हौसला बढ़ाएंगे।

सोचा-समझा और पक्का किया गया फ़ैसला : मेसी ने बताया कि उन्होंने ये शब्द 21 जुलाई को, विश्व कप फ़ाइनल खेलने के दो दिन बाद लिखे थे। उन्होंने यह भी बताया कि हाल की पारिवारिक घटनाओं ने ‘एल्बिसेलेस्टे’ (अर्जेंटीना टीम) के साथ इस शानदार दौर को खत्म करने के उनके फ़ैसले को और मज़बूत किया।

न्यूजीलैंड दौरे के लिए तैयार किए जाएंगे आकिब नबी, सरे के लिए खेलेंगें काउंटी

रणजी ट्रॉफी में चमक बिखेरने के बाद भारतीय टेस्ट टीम दल में शामिल होने वाले आकिब नबी को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड काउंटी का अनुभव देना चाहती है ताकि न्यूजीलैंड श्रृंखला में भारत के पास तेज गेंदबाजी विकल्प रहें। गौरतलब है कि जसप्रीत बुमराह के फिटनेस पर संदेह के बादल हैं और मोहम्मद सिराज की गेंद की गति धीमी होती जा रही है।ऐसे में टीम को एक विश्वसनीय नाम चाहिए जो कि न्यूजीलैंड में विकेट निकाले।

इसी सिलसिले में जम्मू-कश्मीर के प्रतिभाशाली तेज गेंदबाज आकिब नबी भारत के अक्टूबर में होने वाले न्यूजीलैंड दौरे को ध्यान में रखते हुए काउंटी चैंपियनशिप डिवीजन एक में सरे के लिए तीन मैच खेलने के लिए ब्रिटेन रवाना हुए।    नबी को हाल में श्रीलंका के खिलाफ दो टेस्ट की श्रृंखला के लिए चोटिल जसप्रीत बुमराह के स्थान पर भारतीय टीम में शामिल किया गया था लेकिन उन्हें पदार्पण का मौका नहीं मिला।

गोपनियता की शर्त पर शीर्ष भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के एक सूत्र ने बताया, ‘‘नबी दुबई से ब्रिटेन के लिए रवाना हो गए हैं और बुधवार को यॉर्कशर के खिलाफ होने वाले मैच में खेलने को लेकर बेताब हैं।’’

रणजी ट्रॉफी के पिछले सत्र में सर्वाधिक विकेट लेने वाले नबी के समय पर लौटने की भी उम्मीद है जिससे कि वह पुडुचेरी में ऑस्ट्रेलिया ए के खिलाफ भारत के चार दिवसीय अनौपचारिक टेस्ट मैच में हिस्सा ले सकें। यह श्रृंखला 22 सितंबर से शुरू होगी।जम्मू-कश्मीर ने पिछले सत्र में पहली बार रणजी ट्रॉफी का खिताब जीता था।

इससे पहले खबर आई थी कि सरे को स्विंग गेंदबाज की तलाश थी और नबी को कुछ मैच में क्लब की ओर से खिलाने को लेकर बातचीत चल रही थी।यॉर्कशर के खिलाफ दो से पांच सितंबर तक होने वाले मुकाबले के बाद सरे को आठ से 11 सितंबर तक ससेक्स और 15 से 18 सितंबर तक ग्लेमोर्गन का सामना करना है।

आकिब बने थे रणजी के मैन ऑफ द मैच

अबूधाबी में हुए IPL नीलामी में दिल्ली कैपिटल्स से 8.40 करोड़ रुपये की भारी भरकम रकम मिली। हालांकि सफेद गेंद से उनका प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा लेकिन वह लाल गेंद के सिद्धहस्त गेंदबाज माने जाते हैं।

नबी ने पिछले दो रणजी ट्रॉफी सत्र में कुल 104 विकेट लिए थे, जिनमें 2025-26 सत्र में लिए गए 60 विकेट भी शामिल हैं। उन्होंने जम्मू कश्मीर को पहली बार रणजी ट्रॉफी जिताने में अहम भूमिका निभाई थी। वह बल्लेबाजी में भी उपयोगी योगदान देने में सक्षम हैं।

Dhoni: धोनी ने मांगी थी CSK में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी? सीईओ ने तोड़ी चुप्पी

MS dhoni: भारत के दिग्गज खिलाड़ी और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पिछले कुछ समय से नों काफी चर्चा में हैं। ऐसी खबरे थी धोनी ने चेन्नई सुपर किंग्स में महेंद्र सिंह धोनी की हिस्सेदारी की मांग की थी। दावा किया गया था कि धोनी ने सीएसके में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी (स्टेक) की मांग की थी, लेकिन कंपनी 5.5 प्रतिशत ही स्टेक ऑफर किया था, जिसे धोनी ने मना कर दिया। CSK मैनेजमेंट और धोनी के बीच बात नहीं बन पाई। वहीं अब इन खबरों पर फ्रेंचाइजी के CEO काशी विश्वनाथन ने अपना रिएक्शन दिया है।

CEO ने क्या कहा

CSK के CEO काशी विश्वनाथन ने धोनी के टीम में हिस्सेदारी लेने वाली खबरों को खारिज कर दिया। साथ ही, उन्होंने IPL के अगले सीजन को लेकर भी धोनी के CSK के साथ जुड़े रहने पर जानकारी दी है। बता दें धोनी के CSK में हिस्सेदारी लेने की खबरों के बाद फ्रेंचाइजी और उनके बीच रिश्तों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। लेकिन, इन खबरों की कोई पक्की पुष्टि नहीं हुई थी। इसके बावजूद सोशल मीडिया और क्रिकेट जगत में धोनी और CSK के बीच मतभेद होने की अटकलें लगाई जाने लगी थीं।

क्या थी अफवाह

क्रिकब्लॉगर की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, धोनी ने शुरुआत में CSK में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग की थी, जिसे बाद में घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इसके जवाब में CSK ने उन्हें 5.5 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की पेशकश की थी।

विश्वनाथन ने इन दावों को किया खारिज

CSK के CEO काशी विश्वनाथन ने PTI से बातचीत में इन सभी दावों को खारिज कर दिया और खबरों को “पूरी तरह से बेबुनियाद” बताया। उन्होंने IPL 2027 में धोनी के खिलाड़ी के तौर पर भविष्य को लेकर भी बात की। विश्वनाथन ने कहा, “धोनी ने अभी तक यह नहीं कहा है कि वह नहीं खेलेंगे। इसलिए हमें इंतजार करना चाहिए।” उन्होंने हिस्सेदारी से जुड़ी खबरों को भी “प्लांटेड स्टोरी” बताया।

नए कोच की तलाश में सीएसके

सूत्रों के मुताबिक, IPL 2027 से पहले CSK की टीम को लेकर एमएस धोनी की भूमिका अहम हो सकती है। टीम के नए हेड कोच के चयन से लेकर खिलाड़ियों की टीम तैयार करने तक धोनी की राय को महत्व दिया जा सकता है। स्टीफन फ्लेमिंग के जाने के बाद फ्रेंचाइजी अब नए कोच की तलाश में है। फ्लेमिंग ने इंग्लैंड टेस्ट टीम की जिम्मेदारी संभालने के लिए CSK का साथ छोड़ा था।

धोनी 2008 में IPL शुरू होने के बाद से ही सीएसके के साथ जुड़े हैं। CSK ने IPL 2025 से पहले धोनी को 4 करोड़ रुपये में टीम में रिटेन किया था। धोनी ने अपनी कप्तानी में टीम को 5 ट्रॉफी जीता चुके हैं। वहीं चोट के चलते वह IPL 2026 में CSK की ओर से एक भी मैच नहीं खेल पाए थे।

Shivani Mehrotra: ‘उम्र के साथ सपने धुंधले नहीं पड़ते’; 43 साल की शिवानी ने हौसलों से फतह की यूरोप की सबसे ऊंची चोटी, माउंट एल्ब्रुस पर फहराया तिरंगा

Who is Shivani Mehrotra: कुछ सपने उम्र के साथ धुंधले नहीं पड़ते, बल्कि जिम्मेदारियों के बीच और मजबूत होते जाते हैं। इसका जीवंत उदाहरण 43 साल की शिवानी मेहरोत्रा हैं, जिन्होंने 18 वर्षीय बेटी की परवरिश, परिवार की जिम्मेदारियां एवं रोजमर्रा की जिंदगी के बीच अपने पर्वतारोहण के जुनून को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर लगातार अपने हौसले तथा हदों को परखती रहीं।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की निवासी शिवानी मेहरोत्रा की शादी 24 साल की उम्र में लखनऊ में हुई और अब वह अपने परिवार के साथ मुंबई में रहती हैं। इस साल स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी रूस स्थित ‘माउंट एल्ब्रुस’ पर तिरंगा फहराकर इस दिन को अपने लिए यादगार बना दिया।

‘हौसले की परीक्षा थी’

शिवानी ने रूस से भारत लौटने के दौरान न्यूज एजेंसी पीटीआई से फोन पर कहा कि 15 अगस्त को चोटी तक पहुंचना जितना शरीर की ताकत का इम्तिहान था। उतना ही मन के हौसले की भी परीक्षा थी।उन्होंने कहा, उम्र सिर्फ एक नंबर भर है। असली ताकत लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प और उसे पाने के लिए जरूरी अनुशासन में होती है।”

शिवानी के लिए पर्वतारोहण अपने सपनों और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की कहानी भी है। वह अपने माता-पिता, पति, बेटी और दोस्तों को अपनी ताकत मानती हैं। शिवानी बताती हैं कि खासकर 40 वर्ष की उम्र पार कर चुकी महिला पर्वतारोहियों और ट्रेकर की संख्या बहुत कम है।

शिवानी ने कहा, “मुझे पहाड़ों पर 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं बहुत कम ही दिखाई देती हैं।” उन्होंने कहा, “मेरे परिवार ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया और मुझे यह करने का साहस दिया।” वह अपने पर्वतारोहण अभियानों का खर्च भी काफी हद तक अपनी बचत से उठाने की कोशिश करती हैं।

कैसे हुआ पहाड़ों से लगाव?

शिवानी ने बताया कि पहाड़ों से उनका लगाव 2019 में गहरा हुआ, जब उन्होंने अपनी सबसे करीबी दोस्त के साथ ‘माउंट एवरेस्ट’ आधार शिविर तक ट्रेकिंग की योजना बनाई थी। एक यात्रा की वह छोटी-सी योजना कब जुनून में बदल गई, उन्हें खुद पता नहीं चला। इसके बाद कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और हिमालय के कई हिस्से उनकी मंजिल बनते चले गए।

इसके बाद शिवानी ने ‘फ्रेंडशिप पीक’ और ‘माउंट किलिमंजारो’ जैसी कठिन चोटियों पर भी चढ़ाई की। कैलाश से जुड़े पांच प्रमुख पर्वत अभियानों में से चार वह अब तक पूरा कर चुकी हैं। हालांकि, उनका सबसे बड़ा सपना अभी बाकी है ‘माउंट एवरेस्ट’ फतह करना। साथ ही दुनिया की सातों सबसे ऊंची चोटियों पर भारतीय तिरंगा फहराना।

दुबई होते हुए पहुंचीं रूस

‘माउंट एल्ब्रुस’ अभियान के लिए शिवानी ने आठ अगस्त को मुंबई से अपनी यात्रा शुरू की। दुबई होते हुए वह रूस के मिनरल्नी वोडी पहुंचीं। 10 दिन के इस अभियान का आयोजन रूस की ‘चतुर टूर्स’ नामक कंपनी ने किया था। शिखर पर मौसम के अचानक बदलने की आशंका को देखते हुए अभियान में एक अतिरिक्त दिन भी रखा गया था।

खराब मौसम ने चढ़ाई को और कठिन बना दिया। तेज बर्फबारी, बारिश, कड़ाके की ठंड और ऊंचाई की चुनौती के बीच दल ने अंतिम चढ़ाई से पहले खुद को मौसम और ऊंचाई के अनुकूल बनाने के लिए कई अभ्यास चढ़ाइयां कीं। इनमें करीब 3,000, 4,000 और 4,700 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचना शामिल था।

“रुकना नहीं है, चलते रहना है…”

शिखर पर पहुंचने वाले दिन दल ने रात करीब दो बजे चढ़ाई शुरू की। इस दौरान अंधेरा से लेकर जमा देने वाली ठंड, तेज हवाएं, भारी सामान और कम ऑक्सीजन लेवल तक… हर कदम मुश्किल था। लेकिन शिवानी के भीतर एक ही बात गूंजती रही- “रुकना नहीं है, चलते रहना है।” करीब साढ़े चार घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद उन्होंने शिखर पर कदम रखा।

उन्होंने कहा कि इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर छोटे से छोटा काम भी मुश्किल हो जाता है। 5,000 मीटर के बाद ऑक्सीजन का स्तर तेजी से कम होने लगता है। बर्फीले मौसम से बचाव के लिए भारी भरकम कपड़ों और जूतों में लगे कांटेदार उपकरणों के साथ एक-एक कदम बढ़ाना भी शरीर के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।

‘सेल्फ-अरेस्ट’ तकनीकों की ट्रेनिंग भी ली

इस अभियान में शिवानी ने खुद को बचाने की तकनीक का ट्रेनिंग भी लिया। बर्फ पर फिसलने की स्थिति में खुद को रोकना और आपात स्थिति में सही तरीके से प्रतिक्रिया देना इसका हिस्सा था। शिवानी ने कहा कि चढ़ाई का आखिरी पड़ाव अक्सर शरीर से ज्यादा मन के हौसले की परीक्षा लेता है।

उन्होंने कहा, “पहले की यात्राओं में जहां मुझे लगता था कि अब मैं इससे आगे नहीं जा सकती, वहीं मैंने सीखा कि असल शुरुआत तो वहीं से होती है।” शिखर पर पहुंचते ही वह घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने पहाड़, अपने दोस्तों और उन पर विश्वास जताने वालों के प्रति आभार जताया।

उस पल को याद करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने माउंट एल्ब्रुस के सामने सिर झुकाया और कहा-धन्यवाद।” उनके लिए यह चोटी उस बड़े सपने की एक सीढ़ी थी, जिसे वह अभी पूरा करना चाहती हैं।

फिटनेस पर काफी ध्यान देती हैं शिवानी

शिवानी फिटनेस पर भी बहुत ध्यान देती हैं। वह फुल मैराथन, हाफ मैराथन के अलावा 50 किलोमीटर की दौड़ भी पूरी कर चुकी हैं। कोरोना वायरस महामारी के दौरान उन्होंने योग को अपनाया। बाद में उन्होंने एडवांस्ड योग इंस्ट्रक्टर और थेरेपिस्ट के तौर पर ट्रेनिंग लिया। करीब छह वर्षों से वह योग सिखा रही हैं। इनमें गर्भावस्था से पहले और बाद की महिलाओं तथा कैंसर रोगियों के लिए विशेष योग कार्यक्रम भी शामिल हैं।

कैसी है दिनचर्या?

उनकी दिनचर्या भी उनके संकल्प जैसी ही सख्त है। वह तड़के करीब साढ़े तीन बजे उठती हैं और योग, जिम में कसरत, दौड़ तथा पर्वतारोहण की तैयारी करती हैं। खान-पान को लेकर भी वह बेहद अनुशासित रहती हैं। शिवानी के लिए पर्वतारोहण सिर्फ किसी निश्चित ऊंचाई तक पहुंचने का नाम नहीं है।

Shivani Mehrotra

वह कहती हैं, “मैं नहीं मानती कि ऊंचाई के आधार पर कोई चोटी कम या ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। हर पहाड़ अपने साथ एक अलग अनुभव लाता है और हर पहाड़ सम्मान मांगता है।” अब उनकी नजर नेपाल की ऊंचाई वाली चोटियों पर है। यह तैयारी उन्हें अपने सबसे बड़े लक्ष्य माउंट एवरेस्ट तक ले जाएगी।

पैसे की चुनौती आई सामने

उन्होंने विश्वास के साथ कहा, “एवरेस्ट मेरा मुख्य लक्ष्य है। मुझे इसे करना ही है।” हालांकि, इस सपने की राह में पैसे भी बड़ी चुनौती है। एवरेस्ट अभियान पर करीब 40 से 50 लाख रुपये खर्च हो सकते हैं। दूसरे अंतरराष्ट्रीय पर्वत अभियानों का खर्च भी कई लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

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शिवानी ने अब तक अपने योग पेशे से हुई बचत से ही अधिकांश अभियानों का खर्च उठाया है। उन्होंने कहा, “मैं यह अपने दम पर करना चाहती हूं।” इस उम्र में भी शिवानी के कदम रुके नहीं हैं। उनका कहना है, “अगर आपने मन में ठान लिया है कि आपको कुछ हासिल करना है, तो आप उसे कर सकते हैं। बस अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखना होता है।”

बच्चों में कैंसर क्यों होता है? इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज, डॉक्टर से जानें पूरी जानकारी

बच्चे के बार-बार बीमार पड़ने पर ज्यादातर माता-पिता इसे मौसम बदलने, संक्रमण या सामान्य कमजोरी से जोड़कर देखते हैं। लेकिन अगर बुखार बार-बार लौट रहा हो, हड्डियों में लगातार दर्द हो, शरीर पर बिना चोट के नीले निशान पड़ रहे हों या कोई असामान्य गांठ दिखाई दे रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये लक्षण कई सामान्य बीमारियों में भी हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकते हैं।

हाल ही में द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित एक अध्ययन ने दक्षिण एशिया में बच्चों में होने वाले कैंसर के बोझ पर ध्यान खींचा है। अध्ययन के मुताबिक, सार्क देशों में बच्चों के कैंसर के करीब 69 प्रतिशत मामले भारत में सामने आते हैं। भारत की बड़ी आबादी और यहां जांच व उपचार की बेहतर उपलब्धता भी इस आंकड़े की एक वजह हो सकती है। वहीं, जागरूकता और समय पर जांच की कमी के कारण कुछ मामलों की पहचान देर से होने की आशंका भी रहती है।

क्या बदलती जीवनशैली और पर्यावरण जिम्मेदार हैं?

बदलता खानपान, प्रदूषण और रसायनों का बढ़ता संपर्क आज बच्चों की सेहत को लेकर कई सवाल खड़े करता है। हालांकि, विशेषज्ञ साफ तौर पर कहते हैं कि बच्चों में होने वाले कैंसर को केवल जीवनशैली की वजह से नहीं जोड़ा जा सकता। राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के हेमेटोलॉजिस्ट और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, के अनुसार बच्चों में कैंसर के ज्यादा मामले सामने आने की एक वजह यह हो सकती है कि अब पहले के मुकाबले बीमारी की पहचान बेहतर हो रही है। ज्यादा बच्चे अस्पतालों और कैंसर उपचार केंद्रों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए पहले से अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में कैंसर के वास्तविक मामलों में बढ़ोतरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में उन इलाकों की हवा, पानी, मिट्टी और खानपान से जुड़े पर्यावरणीय कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। लेकिन किसी एक कारण को बच्चों में कैंसर की सीधी वजह मानना सही नहीं होगा।

बच्चों में ल्यूकीमिया सबसे आम क्यों?

बच्चों में होने वाले कैंसर में ल्यूकीमिया यानी रक्त कैंसर सबसे आम है। इसकी वजह समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बचपन में शरीर तेजी से बढ़ता है और नई कोशिकाएं तेजी से बनती हैं। खून बनाने वाली जगह यानी अस्थि मज्जा भी इस दौरान काफी सक्रिय रहती है।

नई कोशिकाएं बनते समय कभी-कभी उनके आनुवंशिक पदार्थ में बदलाव हो सकते हैं। ज्यादातर बदलाव शरीर खुद संभाल लेता है, लेकिन कुछ बदलाव कोशिकाओं की सामान्य वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं और आगे चलकर ल्यूकीमिया जैसी बीमारी का कारण बन सकते हैं।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ज्यादातर बच्चों में ल्यूकीमिया का कोई एक निश्चित कारण नहीं मिलता। इसलिए बच्चे को कैंसर होने पर माता-पिता को खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए।

इन लक्षणों को सामान्य समझकर न टालें

ल्यूकीमिया के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य संक्रमण जैसे लगते हैं। लंबे समय तक या बार-बार बुखार आना, बहुत ज्यादा कमजोरी, खून की कमी, बार-बार संक्रमण होना, बिना चोट के शरीर पर नीले निशान पड़ना, नाक या मसूड़ों से खून आना और हड्डियों या जोड़ों में लगातार दर्द इसके संभावित संकेत हो सकते हैं। इसके अलावा कुछ दूसरे बच्चों के कैंसर में भी विशेष संकेत दिखाई दे सकते हैं। पेट में बिना दर्द की गांठ किडनी से जुड़े कुछ कैंसर का संकेत हो सकती है। वहीं, आंख की पुतली में फोटो खींचने पर सफेद चमक दिखाई देना या अचानक भेंगापन आना आंख के कैंसर का संकेत हो सकता है।

हालांकि, इन लक्षणों का मतलब कैंसर होना नहीं है। कई सामान्य बीमारियों में भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें, बार-बार लौटें या इलाज के बाद भी ठीक न हों, तो बाल रोग विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

बच्चों में कैंसर को कैसे रोका जा सकता है?

बच्चों में होने वाले ज्यादातर कैंसर को आज की स्थिति में पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, क्योंकि इनके पीछे अक्सर कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक बदलाव होते हैं। इसका मतलब यह भी है कि बच्चे के कैंसर के लिए माता-पिता की सामान्य जीवनशैली या किसी एक गलती को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। फिर भी बच्चे को संतुलित आहार देना, साफ वातावरण उपलब्ध कराना, जरूरी टीके लगवाना और सामान्य स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। इससे बच्चे का समग्र स्वास्थ्य बेहतर रहता है।

सबसे बड़ा बचाव समय पर पहचान है। अगर बच्चे में बार-बार बुखार, लगातार दर्द, असामान्य खून आना, बिना वजह नीले निशान, असामान्य गांठ या आंख में सफेद चमक जैसे संकेत दिखाई दें, तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ल्यूकीमिया समेत बच्चों में होने वाले कई कैंसर का इलाज संभव है और कई मामलों में बच्चे पूरी तरह स्वस्थ भी हो सकते हैं। इसलिए डरने के बजाय सही समय पर डॉक्टर से सलाह लेना और जरूरत पड़ने पर जांच करवाना सबसे जरूरी कदम है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य स्वास्थ्य सुझावों पर आधारित है। इसे किसी योग्य चिकित्सा राय का विकल्प न मानें। किसी भी नए व्यायाम को शुरू करने से पहले विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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Asian Games में मेडल जीते बिना घर नहीं जाएंगी मीराबाई चानू, खा ली कसम

भारत की मीराबाई चानू का मानना है कि जापान के आइची, नागोया में होने वाले एशियाई खेल 2026 उनके इंटरनेशनल वेटलिफ्टिंग करियर की “सबसे मुश्किल प्रतियोगिताओं” में से एक होंगे।

मीराबाई चानू एशियाई खेलों में पांच सदस्यों वाली भारतीय वेटलिफ्टिंग टीम की अगुवाई करेंगी। तीन बार ओलंपिक में हिस्सा ले चुकीं मीराबाई टीम की चार महिला खिलाड़ियों में से एक होंगी। एशियाई खेलों में वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता 22 से 28 सितंबर तक आइची के टोकाई सिटिज़न जिम्नेजियम में होगी।

कॉमनवेल्थ गेम्स में अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीतने के बाद, टोक्यो 2020 की सिल्वर मेडलिस्ट मीराबाई को लगता है कि एशियाई खेलों में मुकाबला “ओलंपिक स्तर” का होगा। मीराबाई ने कहा, “मेरी वेट कैटेगरी (49 किग्रा) में सबसे मजबूत लिफ्टर एशिया से ही आते हैं और आपको जापान में ओलंपिक जैसी झलक देखने को मिलेगी।”

इससे पहले चोटों की वजह से मीराबाई चानू एशियाई खेलों में मेडल नहीं जीत पाई थीं। हांगझोऊ में हुए पिछले खेलों में, हिप और जांघ की चोट के कारण स्नैच राउंड में ही उनका अभियान खराब हो गया था और वह 49 किग्रा कैटेगरी में चौथे स्थान पर रही थीं। जकार्ता में हुए 2018 के खेलों में, पीठ की गंभीर चोट के कारण मीराबाई चानू बाहर हो गई थीं।

आगामी एशियाई खेलों से पहले चोट से दूर रहना मीराबाई की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।उत्तर प्रदेश के मोदीनगर में एक सेंटर पर उनकी ट्रेनिंग की देखरेख करने वाले दो लोग कोच विजय शर्मा और अमेरिकी स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच डॉ. एरन हॉर्शिग हैं। डॉ. हॉर्शिग के साथ उनका जुड़ाव नवंबर 2020 में शुरू हुआ था और आज भी जारी है।

मीराबाई ने कहा, “हम हर गुरुवार उनसे वीडियो कॉल पर बात करते हैं और ट्रेनिंग, रिकवरी और आगे के कदमों के बारे में चर्चा करते हैं।” “हर चीज़ की बारीकी से समीक्षा की जाती है और चूंकि डॉ. हॉर्शिंग खुद एक वेटलिफ्टर थे, इसलिए उन्हें शरीर की हर मांसपेशी के बारे में जानकारी है। इस लगातार समीक्षा ने मुझे फिट रखा है।”

एशियाई खेलों की तैयारी ज़ोर-शोर से चल रही है। ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद मीराबाई और उनकी टीम ने एक भी दिन बर्बाद नहीं किया। कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजकों ने वेटलिफ्टिंग हॉल हटा दिया था, लेकिन मीराबाई, विजय शर्मा और फिजियो रोहित छाबड़िया ने ग्लासगो में एक जिम ढूंढा और ट्रेनिंग सेशन के लिए पैसे दिए।

मीराबाई ने कहा, “मैं सीधे मोदीनगर में ट्रेनिंग के लिए लौट आई। असल में, मैं घर नहीं गई और मैंने खुद को एक चुनौती दी है कि ‘जब तक मैं एशियाई खेलों में मेडल नहीं जीत लेती, तब तक घर नहीं जाऊंगी’।”

कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीन गोल्ड मेडल जीतने के बावजूद, यह भारतीय वेटलिफ्टर ग्लासगो में मुकाबले के स्तर को बहुत ज़्यादा अहमियत नहीं दे रही हैं। मीराबाई ने कहा, “सच कहूं तो, कॉमनवेल्थ गेम्स में मुकाबला मेरे लिए मुश्किल नहीं था। मुझे ग्लासगो में बहुत ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। असली परीक्षा एशियाई खेलों में होगी।”

ग्लासगो में, मीराबाई ने महिलाओं के 48 किग्रा वर्ग में कुल 190 किग्रा (स्नैच – 85 किग्रा; क्लीन एंड जर्क – 105 किग्रा) वजन उठाकर गोल्ड मेडल जीता और स्नैच, क्लीन एंड जर्क और कुल वज़न में नए कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड बनाए।

नाइजीरिया की रूथ असुकुओ न्योंग ने कुल 168 किग्रा (75 किग्रा 93 किग्रा) वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीता, जबकि मलेशिया की आइरीन जेन हेनरी ने 167 किग्रा (77 किग्रा 90 किग्रा) वजन उठाकर ब्रॉन्ज़ मेडल जीता।

मीराबाई का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन 205 किग्रा (89 किग्रा 116 किग्रा) है, जो उन्होंने 2021 एशियाई चैंपियनशिप और हाल ही में फरवरी 2026 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में किया था। “मैं देखना चाहती हूं कि मैं जापान में कितना आगे जा सकती हूं। एशियाई खेल मेरे लिए सबसे मुश्किल रहे हैं।”

मीराबाई का कहना है कि उन्हें चीन, उत्तर कोरिया, जापान और थाईलैंड के वेटलिफ्टरों से सबसे कड़े मुकाबले की उम्मीद है। पेरिस 2024 में, थाईलैंड की सुरोदचाना खाम्बाओ ने मीराबाई को सिर्फ़ एक किलो के अंतर से चौथे स्थान पर धकेल दिया। थाई एथलीट ने कुल 200 किलो वज़न उठाया था।

मीराबाई ने कहा, “हम फ़िटनेस को लेकर सावधान रहे हैं और अब तक मुझे अपने शरीर में अच्छा महसूस हुआ है।” उन्होंने आगे कहा कि एशियाई खेल ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। “मैं देखूँगी कि एशियाई खेलों में कैसा प्रदर्शन रहता है। लॉस एंजेलिस में वेट क्लास 53 किलो होगी और मुझे अपना वज़न बढ़ाना होगा। “यह कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन सब कुछ एशियाई खेलों के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा और उसके बाद हम दिसंबर में होने वाले ओलंपिक क्वालीफ़ायर के लिए योजना बना सकते हैं। मुझे लगता है कि जो भी जापान में मुक़ाबला करेंगे, वे लॉस एंजेलिस 2028 को लक्ष्य बनाएँगे, लेकिन अभी मेरे लिए मिशन एशियाई खेल ही है।”

ऋषभ पंत की आलोचना करते अश्विन भिड़ गए एंकर से, वीडियो हुआ वायरल

टेस्ट क्रिकेट में ऋषभ पंत के आक्रामक अंदाज़ ने भारत के लिए कई यादगार पल दिए हैं, लेकिन पूर्व स्पिनर रविचंद्रन अश्विन का मानना है कि विकेटकीपर-बल्लेबाज़ को अभी यह सीखना बाकी है कि कब अपने आक्रामक रवैये पर काबू रखना है।पंत ने श्रीलंका के दो टेस्ट मैचों के दौरे पर 168 रन बनाए, लेकिन उनके कुछ शॉट सिलेक्शन ने अश्विन को प्रभावित नहीं किया। भारत के पूर्व स्पिनर ने ज़ोर देकर कहा कि उनकी आलोचना पंत की काबिलियत या उनके स्वाभाविक बल्लेबाज़ी अंदाज़ को लेकर नहीं थी, बल्कि हालात के हिसाब से फ़ैसले लेने के उनके तरीके पर थी।

अश्विन का मानना है कि पंत, जो अब एक अनुभवी टेस्ट क्रिकेटर हैं, उन्हें यह समझने की ज़रूरत है कि टीम को कब उनसे आक्रामक खेल की ज़रूरत है और कब उन्हें ज़्यादा संयम बरतना चाहिए।

अपने यूट्यूब चैनल ‘ऐश की बात’ पर बात करते हुए अश्विन ने कहा कि सीरीज़ में पंत का प्रदर्शन उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा जो उन्हें उनसे थीं। अश्विन ने कहा, “ऋषभ पंत से मेरी उम्मीदें अब तक पूरी नहीं हुई हैं। मुझे बहुत अफ़सोस है। सोनल दिनुशा का स्ट्राइक रेट भी काफ़ी अच्छा था। लेकिन फ़र्क ज़्यादा जोखिम वाले विकल्पों का है। जब खेल आपके हाथ में हो, तो ये सब बातें मायने नहीं रखतीं कि ‘ऋषभ ऐसे ही खेलते हैं।’ असल बात यह है कि आपकी टीम को क्या चाहिए।”

जोखिम लेने की पंत की आदत उनके टेस्ट करियर की एक अहम पहचान रही है, जिससे उन्हें अक्सर मैचों का रुख बदलने में मदद मिली है। हालाँकि, अश्विन का मानना है कि यह पहचान खराब फ़ैसलों का बहाना नहीं बन सकती, खासकर तब जब कोई जोखिम भरा शॉट टीम को मुश्किल में डाल सकता हो।

उन्होंने आगे कहा, “ऋषभ ने सिडनी और ब्रिस्बेन में शानदार पारियां खेलीं, लेकिन आप वाशिंगटन सुंदर और शार्दुल ठाकुर के बिना वह मैच नहीं जीत सकते थे। टेस्ट मैच बनाने और खेल के आखिरी सेशन में उसे जीतने के लिए 11 क्रिकेटरों की ज़रूरत होती है, लेकिन टेस्ट हारने के लिए बेवकूफी भरा एक पल ही काफ़ी होता है।”

अश्विन ने कहा कि पंत की प्रतिभा पर कोई सवाल नहीं है, लेकिन अगर वह टेस्ट क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो मैच की स्थिति को समझने और उसके अनुसार अपना खेल बदलने की उनकी क्षमता बहुत अहम होगी।पंत के श्रीलंका दौरे पर भी उन्हें कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कोलंबो में लाहिरू कुमारा की गेंद कलाई पर लगने के बाद चोटिल होकर रिटायर होने से पहले उन्होंने दो अर्धशतक लगाए। अगले दिन वह फिर बल्लेबाजी करने उतरे और तुरंत ही आक्रामक अंदाज अपनाते हुए छक्का जड़ा।

हालांकि, अश्विन का मानना है कि कुछ हालात ऐसे होते हैं जब पंत को अपनी स्वाभाविक आक्रामकता के बजाय टीम की जरूरतों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं बस उन मौकों की बात कर रहा हूं जब मैच नाजुक मोड़ पर होता है और ऐसे जोखिम उठाए जाते हैं। मुझे खिलाड़ी के तौर पर ऋषभ पसंद हैं। इस फॉर्मेट में हालात के हिसाब से खेलना जरूरी है।”

पूर्व स्पिनर इस बात से भी सहमत नहीं थे कि मैच जिताने की काबिलियत रखने वाले खिलाड़ियों के साथ अलग व्यवहार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “किसी एक खिलाड़ी को खास तवज्जो न दें। अगर (पीढ़ी में एक बार आने वाले) खिलाड़ी का समर्थन करना है, तो सबके लिए करें। (यशस्वी) जायसवाल भी ऐसे ही खिलाड़ी हैं। ऋषभ के बारे में मैं बस इतना कह रहा हूं कि वह अनुभवी हैं, उन्होंने 50 टेस्ट खेले हैं। उन्हें जिम्मेदारी लेने की जरूरत है।”

अश्विन ने टेस्ट क्रिकेट के दो सबसे खतरनाक बल्लेबाजों – वीरेंद्र सहवाग और एडम गिलक्रिस्ट – का भी जिक्र किया। उन्होंने समझाया कि आक्रामक शैली अपनाने का मतलब यह नहीं है कि खेल की समझ को नजरअंदाज कर दिया जाए। उन्हें लगता है कि पंत अपनी स्वाभाविक आक्रामकता और हर स्थिति की मांग के बीच सही संतुलन बनाकर और भी बेहतर खिलाड़ी बन सकते हैं।अश्विन ने कहा, “जिस दिन आप उन्हें सच बताएंगे, वह भारत के लिए सभी फॉर्मेट में खेलने वाले खिलाड़ी बन जाएंगे।”

मां मान चुकी थी कि बेटा नहीं रहा फिर नेपाल बाढ़ के बीच हुआ चमत्कार! 8 साल के मासूम ने पेड़ पर चढ़ यूं बचा ली थी अपनी जान

नेपाल में आई भयानक बाढ़ ने हजारों परिवारों की जिंदगी बदलकर रख दी है। इस तबाही में कई परिवार अपनों से बिछड़ गए हैं। वहीं इस त्रासदी में कई बच्चे भी प्रभावित हुए है। वहीं इस बाढ़ के बीच 8 साल के जोयाल की कहानी काफी वायरल हो रही है। नेपाल में आई भयानक बाढ़ से बचने के लिए 8 साल के जोयाल जंगल की ओर भाग गया और कुछ समय तक पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचाई। इस दौरान उसकी मां बेहद परेशान थी। बाद में वह आखिरकार अपनी मां से मिल गया। लंबे इंतजार के बाद बच्चे के सुरक्षित मिलने से परिवार ने राहत की सांस ली है। आइए जानते हैं पूरी कहानी

सुरक्षित निकाला गया बाहर

बाढ़ से प्रभावित नेपाल के रसुवा जिले से जोयाल घाले को हेलिकॉप्टर की मदद से सुरक्षित बाहर निकाला गया। जोयाल के पैर में चोट लगी थी और चेहरे पर भी कई कट और चोट के निशान थे। उसकी 28 वर्षीय मां मैटी माया तमांग पूरे दिन राहत शिविरों और लोगों को जुटाने वाली जगहों पर अपने दोनों बेटों को तलाशती रहीं। काफी समय तक बच्चों का कोई पता नहीं चलने पर उन्हें डर सताने लगा था कि शायद दोनों की बाढ़ में जान चली गई है।

कैसे पता चला बेटा जिंदा है

मैटी माया तमांग ने रॉयटर्स को बताया, “मुझे लगने लगा था कि मेरे दोनों बच्चे अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं सिर्फ रो रही थी और खुद को संभाल नहीं पा रही थी।” बाद में उन्हें पता चला कि उनका बेटा जोयाल जिंदा है। रॉयटर्स की पत्रकार सहाना बजराचार्य ने उनसे संपर्क किया और बताया कि वह पास के नुवाकोट के एक अस्पताल में जोयाल से मिली थीं। जब तमांग को पता चला कि जोयाल जिंदा है और उसे इलाज के लिए काठमांडू ले जाया गया है, तो उन्हें इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ। उन्होंने कहा, “जब आपने बताया कि आपको पता है कि जोयाल कहां है, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने तो पहले ही उम्मीद छोड़ दी थी कि मैं उसे कभी ढूंढ पाऊंगी।” तमांग ने कहा, “जब मुझे अपने बड़े बेटे के बारे में पता चला, तो लगा जैसे मेरी जिंदगी वापस मिल गई हो।” तमांग को उनका छोटा बेटा भी सुरक्षित मिल चुका था।

हर तरफ फैले थे कीचड़

बुधवार सुबह जोयाल और उसका भाई स्कूल की गाड़ी से स्कूल गए थे, जबकि उनकी मां घर पर बुनाई का काम कर रही थीं। तभी उन्हें भूकंप जैसी तेज आवाज सुनाई दी। तमांग तुरंत स्कूल की ओर भागीं, लेकिन वहां पहुंचकर वह हैरान रह गईं। उन्होंने बताया, “समझ ही नहीं आ रहा था कि स्कूल कहां है और बाजार कहां था। हर तरफ सिर्फ पानी, पत्थर और कीचड़ नजर आ रहा था।” बाढ़ में स्कूल की पूरी इमारत तबाह हो गई थी। लेकिन, जोयाल किसी तरह अपनी जान बचाने में कामयाब रहा। बाद में उसने बचावकर्मियों को बताया कि जब बाढ़ आई, तब वह पढ़ाई कर रहा था और अचानक चारों तरफ “बहुत ज्यादा अंधेरा” छा गया।

करीब 17 हजार बच्चे हुए प्रभावित

बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ता देख जोयाल अपने एक दोस्त के साथ स्कूल से निकलकर पास के जंगल में चला गया। दोनों बच्चों ने पानी से बचने के लिए पेड़ों पर चढ़कर शरण ली। जब आठ साल के जोयाल से पूछा गया कि क्या उस समय उसे डर लगा था, तो उसने सिर्फ सिर हिलाकर “नहीं” कहा। जोयाल और उसका भाई भी उन हजारों बच्चों में शामिल हैं जो नेपाल में आई बाढ़ के कारण मुश्किल में फंस गए। यूनिसेफ के मुताबिक, रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग जिलों में करीब 17 हजार बच्चे बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। संस्था नेपाल सरकार के साथ मिलकर ऐसे बच्चों की जानकारी जुटा रही है जो अपने परिवार से अलग हो गए हैं। इन बच्चों की पहचान कर उन्हें रजिस्टर किया जा रहा है और उनके परिवारों से मिलाने की कोशिश की जा रही है।

बता दें, लांगटांग लिरुंग पहाड़ के पास ग्लेशियर का एक हिस्सा अचानक टूट गया, जिससे बाढ़ आ गई। इसके बाद बर्फ और पत्थर तेजी से नीचे आने लगे और घाटी में पानी, कीचड़ और मलबा भर गया

Asian Games से बाहर हुए नीरज चोपड़ा, भारतीय एथलेटिक्स दल को बढ़ा झटका

Neeraj Chopra

भारत के भाला फेंक स्टार नीरज चोपड़ा प्रशिक्षण के दौरान चोट लगने के कारण आगामी एशियाई खेलों से बाहर हो गए हैं। चोपड़ा ने शनिवार को सोशल मीडिया मंच इंस्टाग्राम पोस्ट में यह जानकारी देते हुए कहा कि लुसाने में 88.05 मीटर का सीजन का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करने के तुरंत बाद उनके टखने में लिगामेंट फट गया।

चोपड़ा ने कहा, “कड़ी मेहनत के एक दौर के बाद, मुझे आखिरकार लगा कि मैं वह गति हासिल कर रहा हूं जिसकी मुझे तलाश थी, और यह गति मुझे लुसाने में सीजन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ मिली।दुर्भाग्यवश, कुछ ही समय बाद, प्रशिक्षण के दौरान मेरे टखने के लिगामेंट में चोट लग गई। अपने चिकित्सा और टीम से सलाह मशवरा करने के बाद, हमने फैसला किया है कि मैं इस सीजन के बाकी बचे मैचों में नहीं खेल पाऊंगा। यह निराशाजनक है, खासकर इसलिए क्योंकि मुझे लग रहा था कि मैं अपनी लय पाने के करीब था। लेकिन जैसा कि कहते हैं, उतार-चढ़ाव तो जीवन का हिस्सा होते हैं।

”उन्होंने आगे कहा, “अब मेरा ध्यान पूरी तरह से ठीक होने और पहले से भी अधिक मजबूत होकर वापसी करने पर है।”

चोपड़ा के सीजन से हटने का मतलब यह भी है कि वह डायमंड लीग फाइनल और पहले विश्व एथलेटिक्स अल्टीमेट चैंपियनशिप में भी हिस्सा नहीं ले पाएंगे, जिसके लिए उन्होंने क्वालीफाई कर लिया था। उन्होंने जून और अगस्त में दोहा और लुसाने में आयोजित डायमंड लीग स्पर्धाओं में दूसरा स्थान हासिल किया था और ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में 85.83 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीता था।

बाद में उन्होंने लुसाने डायमंड लीग में अपने प्रदर्शन को सुधारते हुए 88.05 मीटर का थ्रो किया। टोक्यो ओलंपिक चैंपियन को हाल ही में चोटों से काफी परेशानी हुई है, पिछले साल सितंबर से उन्हें पीठ के निचले हिस्से में एक और चोट सता रही है, जिसके कारण पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने का उनका प्रयास विफल रहा।

73 भारतीय एथलीटों की अगुवाई करने वाले थे नीरज चोपड़ा

दो बार के ओलंपिक पदक विजेता नीरज चोपड़ा, जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक होने वाले एशियन गेम्स 2026 में 73 सदस्यों वाली भारतीय एथलेटिक्स दल की अगुवाई करने वाले थे। भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर (भाला फेंकने वाले खिलाड़ी) नीरज चोपड़ा एशियन गेम्स में दो बार के गत चैंपियन के तौर पर हिस्सा लेने वाले थे। उन्होंने जकार्ता 2018 और हांगझोऊ 2023 में गोल्ड मेडल जीता था।