Tata vs Tata: एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर टाटा ग्रुप में रार! ट्रस्ट ने दी अभिषेक मनु सिंघवी को कमान

Tata Trusts vs Tata Sons Conflict: टाटा ग्रुप में महासंग्राम छिड़ा हुआ है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल की नियुक्ति और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर विवाद चरम पर पहुंच गया है। इस मुद्दे पर टाटा संस और टॉप शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स आमने-सामने हैं।

इस हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट जंग को जीतने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने देश के दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतार दिया है। सिंघवी की एंट्री से इस कानूनी लड़ाई के तेवर और तीखे हो गए हैं।

आइए समझते हैं इस बड़े विवाद की असली वजह क्या है और अभिषेक मनु सिंघवी के उन बयानों के पीछे का गणित क्या है, जिसने कॉरपोरेट जगत से लेकर शेयर बाजार तक में हड़कंप मचा दिया है:

क्यों भड़का टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस में विवाद?

विवाद की मुख्य वजह 17 सितंबर को हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक है। टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को अगले 5 सालों के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पास किया। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स ने इस प्लान को ‘गैर-कानूनी’ और ‘कानूनी रूप से शून्य’ करार दिया।

विवाद की एक और वजह टाटा संस की लिस्टिंग बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की याचिका खारिज होने के बाद, कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर भी दोनों धड़ों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।

अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा 

दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखते हुए कहा कि वे दिवंगत रतन टाटा और दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों के करीब रहे हैं, इसलिए वे भारी मन से यह केस लड़ रहे हैं। इस मामले में सिंघवी ने कॉरपोरेट गवर्नेंस और शेयरधारकों के अधिकारों पर कई गंभीर सवाल उठाए।

सिंघवी ने कहा, ‘मौजूदा मामले में शेयरधारक-मालिकों के मौलिक अधिकारों को खारिज नहीं किया जा सकता। शेयरधारिता अधिकारों को दबाना देश की सैकड़ों कंपनियों के कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए कयामत जैसा होगा।’

उन्होंने टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के साथ संबंधों में टाटा ट्रस्ट्स की प्रधानता को साफ तौर पर स्वीकार किया था, जिसे अब चुनिंदा तरीके से भुलाया जा रहा है।

सिंघवी ने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के 100 साल से भी पुराने रिश्ते को एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय है। जब आपसी भाईचारा और सौहार्द खत्म हो जाता है, तो ऐसे मामलों का समाधान केवल कानूनी रास्ते से ही निकल सकता है।

टाटा संस की ओर से हरीश साल्वे करेंगे पैरवी

दूसरी तरफ, टाटा संस की ओर से भी दिग्गज वकीलों की फौज तैयार है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी कंपनी लगातार गतिरोध की स्थिति में काम नहीं कर सकती। निदेशक मंडल और शेयरधारकों को कंपनी के दैनिक कामकाज और दीर्घकालिक रणनीतियों के लिए एक व्यावहारिक रास्ता खोजना ही होगा।

शेयर बाजार और टाटा ग्रुप की कंपनियों पर असर

दोनों धड़ों के बीच जारी इस जंग का असर टाटा ग्रुप की लिस्टिड कंपनियों पर भी देखने को मिल रहा है। इस विवाद की खबर बाहर आते ही टाटा ग्रुप के शेयरों के मार्केट कैप में करीब ₹40,000 करोड़ तक की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो टाटा ग्रुप के बड़े निवेश फैसलों, फंडिंग और भविष्य की रणनीतियों पर बुरा असर पड़ सकता है।

ममता को सचमुच ‘श्राप’ लग गया

अभी पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम चल रहा है उसे देख कर कह सकते हैं कि ममता बनर्जी अपनी ही बनाई दवाई के प्रयोग झेल रही हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी जिस तरह की राजनीति की उसी का प्रतिफल उनको मिल रहा है। वे जिस पार्टी में रहीं और अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाया उसी कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाई। कांग्रेस के नेताओं को साथ लेकर कांग्रेस को समाप्त करने की साजिश रची।

पश्चिम बंगाल की 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को किसकी नजर लगी है? पश्चिम बंगाल के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने तो पहले ही कह दिया था, ‘आपको भगवान राम का श्राप लग गया है’। भाजपा नेताओं का कहना है कि  जनवरी 2024 में जिस दिन अयोध्या में भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन होना था उस दिन ममता बनर्जी ने कोलकाता में इसके विरोध में जुलूस निकाला था। उसके बाद से ही उनके बुरे दिन की शुरुआत हो गई थी। राजनीति में ऐसी प्रतीकात्मक चीजों का अपना महत्व है। परंतु यह वास्तविकता है कि चार मई को आए चुनाव नतीजों में ममता बनर्जी की पार्टी बुरी तरह से पराजित हुई। उसके बाद पार्टी के टूटने और बिखरने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके साथ ही कानून का शिकंजा भी कसने लगा। पहले उनकी पार्टी के 60 विधायक अलग हुए। उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना लिया, जिसे विधानसभा स्पीकर ने मान्यता भी दे दी। उसके बाद 20 सांसद अलग होकर त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल में हो गए।

पार्टी के सांसदों और विधायकों का टूटना एक शुरुआत थी। उसके बाद कानूनी मुश्किलों का दौर शुरू हुआ। उनकी पार्टी हाथ से निकली तो पार्टी के सैकड़ों करोड़ रुपए वाले खातों पर भी पाबंदी लगी और कार्यालय भी हाथ से निकला। उसके बाद असली झटका ममता बनर्जी को अब लगा है, जब चुनाव आयोग ने उनसे उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह छीन लिया है। पिछले एक चौथाई सदी से ज्यादा समय से ममता बनर्जी जिस तृणमूल कांग्रेस और दो पत्तियों के चुनाव चिन्ह पर राजनीति कर रही थीं, उसकी जगह अब उनको ममता टीएमसी का नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह मिला है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लोग कह सकते हैं कि यह कानूनी और तकनीकी मामला है, जिसमें चुनाव आयोग ने पक्षपात किया है। यह भी कह सकते हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और पार्टी का नाम व चुनाव चिन्ह हासिल करने का प्रयास करेंगे।

हो सकता है कि यह कानूनी और तकनीकी पहलू हो लेकिन ममता बनर्जी उपचुनाव में जिसे उम्मीदवार बनाएं वह चुनाव मैदान से हट जाए, इसे क्या कहेंगे? यह काम तो चुनाव आयोग नहीं करा रहा है! यह तो स्पष्ट रूप से राजनीतिक शक्ति समाप्त होने या बहुत कम हो जाने का संकेत है। पता नहीं ममता बनर्जी, उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी और दूसरे समर्थक इस सचाई को क्यों नहीं देख पा रहे हैं? यह चार महीने में दूसरा मौका है, जब उनका उम्मीदवार मैदान छोड़ कर हटा है। चार मई को चुनाव नतीजे आने के बाद पहली घटना फालता सीट पर हुई थी, जहां 21 मई को चुनाव हुआ। वहां से ममता की पार्टी का उम्मीदवार जहांगीर खान मैदान छोड़ कर हट गया था। और अब नंदीग्राम की सीट पर उपचुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मैदान से हटने की घोषणा की है।

यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्ममंथन की बात है कि लोग उस दल के नाम और चुनाव चिन्ह पर लड़ना नहीं चाहते हैं। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश में, जहां विधानसभा चुनाव की टिकट हासिल करने के लिए लोग क्या क्या जतन करते हैं, वहां अगर ममता बनर्जी की पार्टी की टिकट लोग छोड़ रहे हैं तो इसका अर्थ है कि पार्टी का जमीनी आधार बहुत कमजोर हो गया है। उनको ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के साथ अपना भविष्य नहीं दिख रहा है। यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि नेताओं से बेहतर राजनीतिक हवा का रुख कोई नहीं भांप सकता है और नेता हमेशा अपना भविष्य देख कर ही निर्णय करते हैं। असल में ममता बनर्जी की पार्टी की चमक दमक पूरी तरह से समाप्त  हो गई है। राजनीतिक आधार सिमट गया है और नेताओं को उनमें अपना भविष्य नहीं दिख रहा है।

इसका मुख्य कारण यह नहीं है कि इस बार उनकी पार्टी चुनाव हार गई। पार्टियां चुनाव हारती और जीतती रहती हैं। मुख्य कारण यह है कि ममता बनर्जी ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया है और ऐसे खराब नतीजे के बाद भी वे इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं कर रही हैं। चार मई के नतीजों के बाद भी उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अभिषेक के सम्मान में खड़ा करके ताली बजवाई थी। इससे भी नेता आहत हुए थे और माना जाता है कि उसी समय बहुत से नेताओं ने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया था। पहले भी अभिषेक बनर्जी की वजह से तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी थी। खुद सुवेंदु अधिकारी उनकी वजह से पार्टी छोड़ गए थे। मुकुल रॉय ने भी अभिषेक के कारण पार्टी छोड़ी थी। परंतु ममता बनर्जी ने इस मामले में आंखों पर पट्टी बांध रखी है।

बहरहाल, अभी पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम चल रहा है उसे देख कर कह सकते हैं कि ममता बनर्जी अपनी ही बनाई दवाई के प्रयोग झेल रही हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी जिस तरह की राजनीति की उसी का प्रतिफल उनको मिल रहा है। वे जिस पार्टी में रहीं और अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाया उसी कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर अपनी अलग पार्टी बनाई। कांग्रेस के नेताओं को साथ लेकर कांग्रेस को समाप्त करने की साजिश रची। बाद में जब जरुरत हुई तब कभी भाजपा के साथ तो कभी कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ा और अपनी सुविधा के हिसाब से उनको छोड़ दिया। केंद्र में भाजपा की सरकार में भी मंत्री रहीं और कांग्रेस की सरकार में भी। इसका अर्थ है कि उन्होंने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी भी न तो वैचारिक प्रतिबद्धता दिखाई और न निजी निष्ठा व विश्वसनीयता का ध्यान रखा। पार्टियों और व्यक्तियों दोनों के साथ उनका व्यवहार हमेशा अविश्वसनीय और इस्तेमाल करके छोड़ने वाला रहा। ध्यान रहे ममता बनर्जी का राजनीतिक पुनर्जन्म अटल बिहारी वाजपेयी की शरण में जाने से हुआ था। लेकिन उनकी पार्टी भाजपा को भी ममता ने मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण नहीं बख्शा।

यह भी वास्तविकता है कि उनकी पार्टी का गठन चिटफंड की दो कंपनियों रोज वैली और शारदा की मदद से हुआ था। लेकिन जब वे सत्ता में आ गईं तो उसके बाद रोज वैली के प्रमोटर गौतम कुंडू और शारदा चिटफंड के सुदीप्तो सेन दोनों जेल गए और अभी तक जेल में बंद हैं। उपयोगिता समाप्त होते ही अपने नजदीकी लोगों से मुंह फेर लेने का जैसा रिकॉर्ड ममता बनर्जी का है वैसा ही शायद ही किसी और नेता का होगा। एकाध अपवाद छोड़ दें तो वे शायद ही किसी नेता के साथ संकट में खड़ी हुईं। किसी नेता के साथ तभी तक खड़ी हुईं, जब तक उस नेता का राजनीतिक महत्व था या उपयोगिता थी। अब उनकी पार्टी के नेता उनके साथ भी ऐसा ही बरताव कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि उनके लिए ममता बनर्जी या उनकी पार्टी की कोई उपयोगिता नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं, विधायकों, सांसदों आदि के मन में क्या चल रहा है, इस बारे में कोई व्यक्ति सबसे प्रामाणिक तरीके से जानकारी रख रहा था वह मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि तृणमूल के नेता उनके साथ ज्यादा सहज और आत्मीय रिश्ता रखते थे। सुवेंदु अधिकारी जब भाजपा में शामिल हो गए उसके बाद भी उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ अपना संबंध विच्छेद नहीं किया। महुआ मोइत्रा जैसे कई नेताओं ने बाद में कहा कि जब भी जरुरत पड़ी तो उनके साथ सुवेंदु अधिकारी खड़े रहे। तभी उनको अनुमान था कि तृणमूल कांग्रेस के अंदर क्या चल रहा है। उनको यह भी अनुमान था कि एक बार ममता बनर्जी चुनाव हारीं तो सारे नेता उनका साथ छोड़ेंगे। क्योंकि नेता उनके संपर्क में थे और उनको अपनी व्यथा सुनाते थे।

सुवेंदु अधिकारी एक तरफ भारतीय जनता पार्टी को शक्तिशाली बनाने और चुनाव जीतने के उपाय कर रहे थे तो दूसरी ओर ममता बनर्जी की पार्टी को कमजोर करने का रास्ता भी बना रहे थे। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 207 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल किया। परंतु वे इतने पर नहीं रूके। उन्होंने ममता बनर्जी की पार्टी के विधायकों व सांसदों की नाराजगी और परेशानी को भाजपा की राजनीतिक पूंजी में बदला। यह उनका राजनीतिक कौशल है कि आज पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी भी उनका समर्थन करने वाला है और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को 20 सांसदों का अतिरिक्त समर्थन मिला है। भाजपा को इतना शक्तिशाली बनाने के बाद भी वे दो सीटों के उपचुनाव को लेकर जैसा रणनीतिक तानाबाना बुन रहे हैं उससे स्पष्ट दिख रहा है कि वे एक जीत से आश्वस्त होकर बैठ जाने और सत्ता के आनंद में डूब जाने वाले नेता नहीं हैं। वे विजय की निरंतरता को बनाए रखने वाले नेता हैं। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

Bhuvan Bam: अभी तो तेरा करियर शुरू हुआ है…., समय रैना के शो पर रेखा-अमिताभ बच्चन के जोक करने पर मुकेश छाबड़ा ने भुवन को लताड़ा

Bhuvan Bam: ‘इंडियाज गॉट लेटेंट 2’ के हालिया एपिसोड में मुकेश छाबड़ा, भुवन बाम और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी पैनल में समय रैना के साथ शामिल हुए। एपिसोड के दौरान कास्टिंग डायरेक्टर छाबड़ा ने भुवन को तब चेतावनी दी जब उन्होंने बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और रेखा के साथ उनके रोमांस की अफवाहों पर मजाक करने की कोशिश की।

यह सब तब शुरू हुआ जब प्रतीक भारद्वाज नाम के एक कंटेस्टेंट ने स्टेज पर बिग बी की मिमिक्री की। उनकी एक्टिंग स्किल्स से प्रभावित होकर भुवन ने पूछा, “आपके टैलेंट की कोई रेखा है?” उनका इशारा एक्ट्रेस रेखा की ओर था। हालांकि इस बात पर सभी जोर-जोर से चीयर करने लगे, लेकिन मुकेश छाबड़ा ने तुरंत भुवन पर आपत्ति जताई और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा, “बेटा, तेरा अभी तो फिल्म करियर शुरू हुआ है मेरी जान।” इस पर कंटेंट क्रिएटर-एक्टर ने भी कहा, “मैं इंडिपेंडेंट भी ठीक हूं।”

अमिताभ बच्चन और रेखा का रोमांस

अमिताभ बच्चन और रेखा ने 1976 और 1981 के बीच नौ बड़ी फिल्मों में साथ काम किया, जिनमें ‘सिलसिला’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ शामिल हैं। दोनों स्क्रीन पर सबसे मशहूर जोड़ियों में से एक बन गए। जब रेखा 2001 में सिमी गरेवाल के शो ‘रेंडेजवस’ में आईं तो उनसे सीधे पूछा गया कि क्या उन्हें कभी अमिताभ बच्चन से प्यार हुआ था। हालांकि उस समय रेखा ने इस सवाल को “बेवकूफी भरा” बताया और घुमा-फिराकर जवाब देते हुए कहा कि देश में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो बिग बी से प्यार न करता हो।

रेखा ने कहा था कि “बिल्कुल। अरे यह तो बेवकूफी भरा सवाल है। मुझे अभी तक ऐसा कोई भी आदमी, औरत या बच्चा नहीं मिला है जो उनसे पूरी तरह, जुनून के साथ, पागलपन की हद तक, बेतहाशा और शिद्दत से प्यार न करने से खुद को रोक सके। तो मुझे ही क्यों अलग किया जाए? मैं किस बात से इनकार करूं? मुझे उनसे प्यार नहीं है? बेशक है। दुनिया भर का प्यार ले लीजिए और उसमें थोड़ा और जोड़ लीजिए – मैं उस व्यक्ति के लिए ऐसा ही महसूस करती हूं। बस यही बात है,।

बता दें कि अमिताभ बच्चन की शादी जया बच्चन से हुई है। वे पहली बार ऋषिकेश मुखर्जी की 1971 की फिल्म ‘गुड्डी’ के सेट पर मिले थे। दोनों ने 3 जून 1973 को शादी की थी और उनका रिश्ता आज भी मजबूत है। अमिताभ बच्चन और जया बच्चन, एंटरप्रेन्योर और लेखिका श्वेता बच्चन और एक्टर अभिषेक बच्चन के माता-पिता हैं। अगस्त्य नंदा, नव्या नंदा और आराध्या बच्चन उनके पोता-पोती हैं।

Mirzapur The Movie Box Office Collection Day 14: पंकज त्रिपाठी की फिल्म ने भारत में 200 करोड़ का आंकड़ा किया पार

Mirzapur The Movie Box Office Collection Day 14: ‘मिर्जापुर द मूवी’ ने बॉक्स ऑफिस पर अपने दूसरे गुरुवार को भी अपनी रफ्तार बनाए रखी। फिल्म ने भारत में 3.75 करोड़ रुपये (नेट) की कमाई की। इसके साथ ही Sacnilk के अनुसार फिल्म का भारत में कुल नेट कलेक्शन 203.20 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

14वें दिन फिल्म के हिंदी 2D शो में कुल 17.33% ऑक्यूपेंसी (दर्शक संख्या) दर्ज की गई। पूरे देश में दिन भर में इसके 6,926 शो हुए। मॉर्निंग शो में 9.46% ऑक्यूपेंसी रही, जबकि दोपहर के शो में 17.62% ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई। शाम के शो में ऑक्यूपेंसी 19.38% रही और सबसे ज्यादा ऑक्यूपेंसी 20.69% नाइट शो के दौरान देखी गई।

ट्रेड वेबसाइट Sacnilk के अनुसार ‘मिर्जापुर द मूवी’ ने बुधवार को भारत में ₹3.75 करोड़ (नेट) की कमाई की थी, जिससे इसकी कुल घरेलू कमाई ₹199.45 करोड़ हो गई। फिल्म के 6991 शो में 15% ऑक्यूपेंसी देखी गई। सोमवार और मंगलवार की कमाई के मुकाबले इसमें गिरावट देखी गई थी।

गुरमीत सिंह द्वारा निर्देशित और पुनीत कृष्णा द्वारा लिखित ‘मिर्जापुर द मूवी’ इस मशहूर फ्रैंचाइजी को बड़े पर्दे पर लाती है। इस फिल्म को एक्सेल एंटरटेनमेंट के बैनर तले रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर ने प्रोड्यूस किया है। थिएटर में रिलीज हुई यह फिल्म दर्शकों को ओरिजिनल सीरीज की दुनिया में वापस ले जाती है। इसकी कहानी सीजन 1 के छठे और सातवें एपिसोड के बीच की घटनाओं पर आधारित है। इसमें वे किरदार भी शामिल हैं जिनकी सीरीज में बाद में मौत हो गई थी, जैसे कि मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येंदु द्वारा अभिनीत) और गोलू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी द्वारा अभिनीत)।

पंकज त्रिपाठी अखंडानंद ‘कालीन’ त्रिपाठी के रूप में अपनी भूमिका दोहरा रहे हैं, जबकि अली फजल गुड्डू पंडित और दिव्येंदु मुन्ना त्रिपाठी के किरदार में वापसी कर रहे हैं। कलाकारों में रसिका दुग्गल, श्वेता त्रिपाठी शर्मा, श्रिया पिलगांवकर, जितेंद्र कुमार, रवि किशन, अभिषेक बनर्जी, सोनल चौहान, मोहित मलिक और सुशांत सिंह भी हैं।

Lust Stories 3 Movie Review: चार बड़े फिल्ममेकर, चाहत को देखने के चार बिल्कुल अलग नजरिए

Lust Stories 3 Movie Review: एंथोलॉजी बनाना आसान नहीं होता। दर्शक अभी एक कहानी में पूरी तरह डूब भी नहीं पाता कि उसे दूसरी दुनिया में पहुंचना पड़ता है। लेकिन’लस्ट स्टोरी 3′ इस फॉर्मेट की इसी खासियत को अपनी ताकत बना लेती है। चारों कहानियों को एक जैसा बनाने की कोशिश करने के बजाय हर निर्देशक को अपनी आवाज और अपना अंदाज रखने की पूरी जगह दी गई है।

विक्रमादित्य मोटवाने की कहानी चारों में सबसे अलग है। राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक शर्मा एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं, जो कोरियन फिक्शन से प्रभावित अंदाज में पति-पत्नी के पार्टनर बदलने जैसे विषय को एक्सप्लोर करती है। विषय अपने आप में असहज है, लेकिन फिल्म इस असहजता से भागती नहीं बल्कि इसी को कहानी का हिस्सा बना लेती है।

किरण राव गुरफतेह पीरजादा और सना थंपी के साथ माहौल को पूरी तरह बदल देती हैं। उनकी कहानी में हल्की-फुल्की ठगी वाली थ्रिलर का अंदाज है, जिसमें ड्रग्स, पैसे और इतने ट्विस्ट हैं कि मनोरंजन बना रहता है। जब आपको लगता है कि अब कहानी समझ आ गई है, तभी एक मजेदार फिल्मी सरप्राइज सामने आ जाता है।

शकुन बत्रा का सेगमेंट रिश्तों पर बनी ड्रामा कहानी के लिहाज से शायद सबसे ज्यादा जाना-पहचाना महसूस होता है। अली फजल और राधिका मदान एक ऐसे रिश्ते को सामने लाते हैं, जो चाहत, थेरेपी, परिवार की उम्मीदों और अधूरी भावनाओं के बोझ तले दबा हुआ है। कहानी शारीरिक रिश्ते से आगे जाकर यह समझने की कोशिश करती है कि जब भावनात्मक उलझनें हावी होने लगती हैं तो क्या होता है।

विशाल भारद्वाज की कहानी एक खूबसूरत बदलाव लेकर आती है। अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ और गजराज राव हमें 1987 में ले जाते हैं, जहां सेक्स एजुकेशन जैसे विषय को उस दौर की पृष्ठभूमि में पेश किया गया है। कहानी का रिदम बाकी से अलग है और नक्स वोमिका व बेलाडोना जैसे क्वर्की संदर्भ इसे और खास बनाते हैं। चारों कहानियां एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करतीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि चाहत को समझने और देखने के कितने अलग-अलग तरीके हो सकते हैं।

लस्ट स्टोरीज 3 यह साबित करती है कि किसी फ्रेंचाइज़ी को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए खुद को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं होती। यह नजदीकियों और रिश्तों को एक्सप्लोर करती रहती है, लेकिन चारों फिल्ममेकरों को चार बिल्कुल अलग कहानियां कहने की आजादी देती है। दो सफल अध्यायों के बाद भी यह फॉर्मेट फ्रेश महसूस होता है और अपनी अलग पहचान बनाए रखता है।

‘राका’ के रहस्यमयी 37 अंक ने बढ़ाई प्रशंसकों की उत्सुकता

अभिनेता अल्लू अर्जुन और निर्देशक एटली की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘राका’ एक बार फिर चर्चा में है। फिल्म निर्माताओं ने हाल ही में सामाजिक माध्यम पर एक रहस्यमयी पोस्टर जारी किया, जिसमें केवल ’37’ अंक के साथ ‘कुछ बड़ा आने वाला है’ लिखा है। पोस्टर में अन्य कोई जानकारी नहीं होने से प्रशंसकों के बीच फिल्म के अगले अपडेट को लेकर तरह-तरह की अटकलें शुरू हो गई हैं।

सामाजिक माध्यम पर सबसे अधिक चर्चा ’37’ अंक को लेकर हो रही है। कुछ प्रशंसक इसे निर्देशक एटली के 21 सितंबर को होने वाले जन्मदिन से जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि 3 गुणा 7 बराबर 21 के जरिए यह अंक एटली के जन्मदिन की ओर संकेत करता है और उस दिन फिल्म से जुड़ी कोई बड़ी घोषणा या झलक जारी की जा सकती है।

Also Read : प्लेयर ऑफ द मैच और प्लेयर ऑफ द सीरीज बने अभिषेक शर्मा

कुछ प्रशंसक ’37’ को 37 दिनों से जोड़कर 24 अक्टूबर की तारीख का अनुमान लगा रहे हैं, जबकि कुछ इसे तीन महीने और सात दिन के संकेत के रूप में देख रहे हैं। एक अन्य चर्चा में ‘3.7’ को मार्च 2027 से जोड़कर फिल्म की संभावित प्रदर्शन अवधि का अनुमान लगाया जा रहा है।

प्रशंसकों के बीच यह अटकल भी है कि ’37’ फिल्म के किसी पात्र, कहानी या महत्वपूर्ण घटनाक्रम से जुड़ा संकेत हो सकता है। हालांकि, इन चर्चाओं की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

सन पिक्चर्स के बैनर तले बन रही ‘राका’ सामाजिक-काल्पनिक पृष्ठभूमि वाली एक्शन फिल्म है, जिसमें पहली बार अल्लू अर्जुन और एटली साथ काम कर रहे हैं। फिल्म में दीपिका पादुकोण को महिला मुख्य भूमिका के लिए आधिकारिक रूप से घोषित किया गया है।

रश्मिका मंदाना, जाह्नवी कपूर और मृणाल ठाकुर के नाम भी फिल्म से जोड़े जा रहे हैं, हालांकि उनकी भूमिका की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल ’37’ के पीछे का वास्तविक अर्थ रहस्य बना हुआ है और प्रशंसकों को निर्माताओं की अगली आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

Pic Credit : ANI

प्लेयर ऑफ द मैच और प्लेयर ऑफ द सीरीज बने अभिषेक शर्मा

भारत की अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे टी 20 में तूफानी शतक बनाने वाले अभिषेक शर्मा को प्लेयर ऑफ द मैच और प्लेयर ऑफ द सीरीज दोनों का पुरस्कार मिला।

अभिषेक ने गुरूवार को मैच के बाद कहा मैंने पहले भी कहा है कि हम ऐसा पिछले दो साल से कर रहे हैं और एकाध ख़राब सीरीज से हमारा मूल्यांकन नहीं हो सकता। 

Also Read : शादाब और मोकीम ने अमेजन वॉरियर्स को 76 रन पर समेटा

एक बल्लेबाज और क्रिकेटर के तौर पर उतार-चढ़ाव आता है लेकिन एक टीम के तौर पर हम क्या सोचते हैं यह मायने रखता है। यह प्रोसेस पर निर्भर करता है, मैं सीरीज से पहले काफी तैयारी करता हूं और एक बल्लेबाज के तौर पर मैं काफी स्पेसिफिक तौर पर सोचता हूं कि पावरप्ले में कैसे बल्लेबाजी करनी है और किनके ख़िलाफ आक्रमण करना है।

उन्होंने कहा ऐसे में कोच और कप्तान से समर्थन मिलना जरूरी होता है और मुझे काफी समर्थन मिल रहा है। मैं किसी एरिया तक ख़ुद को बांधना नहीं चाहता हूं, मैं बॉल को देखकर हिट करने का प्रयास करता हूं और आने वाले मुक़ाबलों में भी ऐसा ही करूंगा। हमारी टीम में कल्चर यही है कि हमें पावरप्ले में अधिक से अधिक रन बटोरने हैं और विपक्षी टीम पर हावी होना है।

Pic Credit : ANI

अभिषेक शर्मा ने 30 गेंदों में T20I शतक लगाकर तोड़ा रोहित शर्मा का रिकॉर्ड

अभिषेक शर्मा (108) ने भारत का सबसे तेज टी 20 शतक बनाया जिसकी बदौलत टीम इंडिया ने अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे टी 20 में गुरूवार को यहाँ अरुण जेटली स्टेडियम में सात विकेट पर 221 रन का विशाल स्कोर बना लिया।

यह टी 20 इतिहास में तीसरा सबसे तेज शतक है और भारत की तरफ से सबसे तेज शतक। अभिषेक ने 34 गेंदों में नौ चौकों और 11 छक्कों की मदद से 108 रन की तूफानी पारी खेली। अभिषेक ने टी 20 के पावरप्ले में किसी बल्लेबाज़ का सर्वोच्च स्कोर का रिकॉर्ड भी बनाया। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के ट्रैविस हेड के नाम था 74 रनों का रिकॉर्ड। भारत ने टी 20 में 100 रन का सर्वाधिक पावरप्ले स्कोर का रिकॉर्ड भी बनाया, इससे पहले यह रिकॉर्ड 95 रन का था।

अभिषेक ने मात्र 30 गेंदों में अपना शतक पूरा किया और रोहित शर्मा का रिकॉर्ड तोड़ा। रोहित शर्मा (35 गेंद) ने 2017 में इंदौर में श्रीलंका के खिलाफ शतक बनाया था। शतक पूरा करने के बाद अभिषेक पिच पर ओम के उच्चारण की मुद्रा में बैठ गए। अभिषेक का टी 20 में यह कुल 10वां शतक है और उन्होंने विराट कोहली के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है।

एक समय भारत का 297 का सर्वोच्च स्कोर भी ख़तरे में लग रहा था। लेकिन अभिषेक के आउट होने के बाद भारतीय पारी लड़खड़ा गई और अंत तक भारत स्कोरबोर्ड पर 221 रन ही जोड़ पाया। सैमसन और अभिषेक के बीच पहले विकेट के लिए 142 रनों की आक्रामक साझेदारी हुई और अभिषेक ने 30 गेंदों पर रिकॉर्ड तेज़ शतक भी जड़ा।

सैमसन के बल्ले से भी अर्धशतक आया लेकिन इन दोनों के अलावा कोई अन्य बल्लेबाज़ टिक नहीं पाया। अफ़ग़ानिस्तान की ओर से सबसे सफल गेंदबाज़ ओमरज़ाई रहे जिन्होंने दो विकेट हासिल किए लेकिन राशिद ने भी एक विकेट लेने के साथ ही बेहतरीन फ़ील्डिंग का प्रदर्शन किया।

अभिषेक शर्मा की पारी तो कमाल की थी! इस तूफ़ानी ओपनर ने अफ़गानिस्तान के गेंदबाज़ों की धज्जियां उड़ा दीं और शुरू से ही मैदान के चारों ओर ज़बरदस्त शॉट लगाए। उनके ज़बरदस्त हमले की बदौलत भारत ने पावरप्ले में ही 100 रन बना लिए, और फील्डिंग की पाबंदियां हटने के बाद भी यह तबाही जारी रही।

अभिषेक ने रिकॉर्ड बुक में अपना नाम दर्ज कराया और टेस्ट खेलने वाले देशों के खिलाड़ियों में सबसे तेज़ टी20 शतक लगाया; उन्होंने सिर्फ़ 30 गेंदों में यह मुकाम हासिल किया। इस शानदार ओपनर के ज़बरदस्त हमले से अफ़गानिस्तान की टीम लड़खड़ा गई।

संजू सैमसन ने भी अहम योगदान दिया और सीरीज़ में लगातार दूसरी फिफ्टी लगाई। संजू ने 35 गेंदों पर 50 रन में दो चौके और चार छक्के लगाए। कुल मिलाकर, भारत के ओपनर्स का दबदबा देखने को मिला। लेकिन इसके बाद भारत के बाकी बल्लेबाज़ों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और टीम लड़खड़ा गई।

अफ़गानिस्तान के गेंदबाज़ों ने लगातार विकेट लेकर वापसी की और भारत को उस बड़े स्कोर तक नहीं पहुंचने दिया, जिसकी उम्मीद लग रही थी। एक समय 250 से ज़्यादा रन बनते दिख रहे थे, लेकिन लगातार विकेट गिरने की वजह से भारत का स्कोर आखिर में 221 रन ही रहा।भारत ने इस तरह टी 20 में रिकॉर्ड 53वीं बार 200 रन का आंकड़ा पार किया।

TMC Vs TMC: तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों पर चुनाव आयोग का बड़ा एक्शन, बंगाल उपचुनाव में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक

TMC Vs TMC: चुनाव आयोग (ECI) ने गुरुवार (17 सितंबर) को एक अंतरिम आदेश में पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दोनों गुटों को पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न (फूल और घास) के इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी। निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को शुक्रवार यानी 18 सितंबर की सुबह तक अपनी पसंद के तीन नाम और चुनाव चिह्न सौंपने का निर्देश दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि कल तृणमूल कांग्रेस के दोनों बागी खेमों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह मिल सकता है। चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों से कहा है कि वे पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनाव के लिए आयोग द्वारा अधिसूचित कोई भी चुनाव चिह्न और पार्टी का कोई दूसरा नाम चुनें।

सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार दोपहर 3 बजे ऋतब्रत बनर्जी सहयोगी नेताओं के साथ चुनाव आयोग से मुलाकात करेंगे। इसके बाद शाम 4 बजे कल्याण बनर्जी सहयोगियों के साथ निर्वाचन आयोग से मिलेंगे। माना जा रहा है इसके बाद चुनाव आयोग शाम तक कोई अंतरिम आदेश जारी कर सकता है।

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से की मुलाकात

निर्वाचन आयोग ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर पार्टी के ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी गुटों की अलग-अलग सुनवाई की। इसमें ममता गुट ने किसी भी अंतरिम आदेश का विरोध किया। जबकि ऋतब्रत गुट ने पश्चिम बंगाल में छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से पहले चुनाव चिह्न के संबंध में जल्द निर्णय लेने की मांग की। बागी गुट में पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी, चंद्रिमा भट्टाचार्य, अकरुल ज़मान, अरूप रॉय और एक वकील शामिल हैं। उन्होंने आयोग के सभी सदस्यों से मुलाक़ात की तथा अपनी बात रखी।

सुनवाई के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने कहा, “हमने अपना पक्ष रखा और हमसे पूछे गए सवालों के जवाब दिए।” उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न का मुद्दा इसलिए अहम हो गया है क्योंकि नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव होने वाले हैं और दोनों गुटों की ओर से उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किये हैं। इसके बाद, ममता बनर्जी गुट के सदस्य डेरेक ओब्रायन, कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा और सागरिका घोष ने आयोग के सदस्यों से मुलाकात की।

ममता गुट ने किया विरोध

कल्याण बनर्जी ने कहा कि पार्टी ने किसी भी अंतरिम आदेश का विरोध किया है। ममता गुट का कहना है कि ऐसे निर्देश का कोई आधार नहीं है। उन्होंने कहा, “हमने कहा है कि कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए। कोई भी आदेश जारी नहीं किया जाना चाहिए।” तृणमूल सांसद ने बागी नेताओं के 6 और 19 मई को पार्टी की बैठकों में शामिल होने और 3 जून को लोकसभा अध्यक्ष से मिलने का जिक्र किया, जब उन्होंने दावा किया था कि वे तृणमूल का हिस्सा हैं।

ये भी पढ़ें- Abhishek Sharma: अभिषेक शर्मा ने रचा इतिहास, सिर्फ 30 गेंदों में शतक जड़ रोहित शर्मा का तोड़ा रिकॉर्ड

उन्होंने कहा, “उस तारीख तक आपने पार्टी के अस्तित्व को माना था। अचानक 22 जून को आपने कह दिया कि तृणमूल कांग्रेस है ही नहीं। आप ये दोनों बात कैसे कह सकते हैं।” ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि उनके प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से आग्रह किया है कि आगामी उपचुनावों को देखते हुए वह जल्द निर्णय ले। उन्होंने कहा, “हमने आयोग से जल्द फैसला करने का अनुरोध किया है क्योंकि उपचुनाव नजदीक हैं। हम निर्वाचन आयोग का सम्मान करते हैं और उस पर विश्वास करते हैं।”

Abhishek Sharma: अभिषेक शर्मा ने रचा इतिहास, सिर्फ 30 गेंदों में शतक जड़ रोहित शर्मा का तोड़ा रिकॉर्ड

Abhishek Sharma: सलामी भारतीय बल्लेबाज अभिषेक शर्मा ने गुरुवार (17 सितंबर) को नई दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे और आखिरी टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में महज 30 गेंदों में शतक जड़ दिया। इसी के साथ वह इस फॉर्मेट में सबसे तेज शतक लगाने वाले भारतीय क्रिकेटर बन गए हैं। बाएं हाथ के इस स्टार बल्लेबाज ने 10 छक्के और 9 चौके लगाकर शतक पूरा किया। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व कप्तान रोहित शर्मा का सबसे तेज टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक का रिकॉर्ड तोड़ दिया जो उन्होंने दिसंबर 2017 में श्रीलंका के खिलाफ 35 गेंदों में लगाया था।

अभिषेक शर्मा ने 317.64 के शानदार स्ट्राइक रेट से बल्लेबाजी करते हुए 34 गेंदों में 108 रन बनाए। उनकी पारी में 11 छक्के और नौ चौके शामिल रहे। अभिषेक का शतक किसी टेस्ट खेलने वाले देश के खिलाफ किसी भी बल्लेबाज का सबसे तेज टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक भी है। उन्होंने भारतीय पारी के नौवें ओवर में एक रन लेकर अपना शतक पूरा किया। इस 30 गेंद के शतक से अभिषेक अब टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे तेज शतक लगाने वाले बल्लेबाजों की लिस्ट में तीसरे स्थान पर हैं।

तीसरी बार ठोका ऐतिहासिक शतक

एस्तोनिया के साहिल चौहान ने जून 2024 में साइप्रस के खिलाफ 27 गेंद में शतक लगाकर सबसे तेज टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक का रिकॉर्ड बनाया था। वहीं, तुर्किए के लिए खेलते हुए मुहम्मद फहाद ने जुलाई 2025 में बुल्गारिया के खिलाफ 29 गेंद में शतक लगाया था। यह अभिषेक का छोटे फॉर्मेट में तीसरा शतक है। इसके अलावा उनके नाम 12 अर्धशतक भी हैं।

अभिषेक ने धीमी शुरुआत के बाद तेजी पकड़ी। बाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने पारी के पहले ओवर की चौथी गेंद पर अपना पहला चौका लगाया। दूसरे ओवर में उन्होंने अजमतुल्लाह उमरजई के खिलाफ दो छक्के और एक चौका लगाकर लय हासिल की। इसके बाद तीसरे ओवर में फजलहक फारूकी की पहली चार गेंदों पर दो छक्के और दो चौके जड़ दिए।

16 गेंद में पूरा किया अर्धशतक 

अभिषेक ने पांचवें ओवर में केवल 16 गेंद में अपना अर्धशतक पूरा किया। उन्होंने 22 गेंदों में 76 रन बना लिए थे और पावरप्ले के अंत तक भारत का स्कोर 100 रन के पार पहुंचा दिया। उनकी तूफानी पारी का अंत 10वें ओवर की पांचवीं गेंद पर हुआ। जब राशिद खान की गेंद पर वह किनारा लगाकर विकेट के पीछे कैच आउट हो गए।

26 वर्षीय अभिषेक ने 2024 में जिम्बाब्वे के खिलाफ पदार्पण करते हुए अपना पहला टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक लगाया था। लेकिन गेंदों का सामना करने के हिसाब से बृहस्पतिवार के शतक से पहले उनका सबसे तेज शतक मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में इंग्लैंड के खिलाफ था।

ये भी पढ़ें- अमेरिकी कंपनी ने 5 मिनट की Google Meet में पूरी भारतीय टीम को जॉब से निकाला? 80 कर्मचारियों की नौकरी जाने का दावा

इंग्लैंड के खिलाफ 54 गेंद की 135 रन की पारी के दौरान उन्होंने 37 गेंद में शतक पूरा किया था। यह गुरुवार तक टी20 प्रारूप में किसी भारतीय का दूसरा सबसे तेज शतक था। अब 30 गेंदों में शतक के साथ अभिषेक भारतीय बल्लेबाजों के सबसे तेज टी20 अंतरराष्ट्रीय शतकों की सूची में तीसरे स्थान पर हैं। भारत ने तीसरे और अंतिम टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में अफगानिस्तान को 127 से हराकर सीरीज 3-0 से अपने नाम कर ली है।