गोल्ड और ओलंपिक क्वालिफिकेशन के बीच खड़ी है चीन की दीवार, देखें H2H रिकॉर्ड

शानदार फॉर्म में चल रही भारतीय टीम एशियाई खेलों के महिला हॉकी फाइनल में गत चैम्पियन चीन के खिलाफ शुक्रवार को उतरेगी तो नजरें 44 साल बाद स्वर्ण पदक जीतकर लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के लिये क्वालीफाई करके पुराने कई मलाल मिटाने पर लगी होंगी।

टोक्यो ओलंपिक 2020 में ऐतिहासिक चौथे स्थान पर रहने के बाद पेरिस ओलंपिक 2024 के लिये क्वालीफाई नहीं कर सकी भारतीय टीम के लिये सबसे बड़ी प्रेरणा लॉस एंजिलिस में दो साल बाद होने वाले खेलों का सीधे टिकट कटाना है। मौजूदा फॉर्म और विश्व कप में ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को देखते हुए यह संभव भी लग रहा है, बस अपेक्षाओं के दबाव से पार पाना होगा।

भारत ने एशियाई खेलों में एकमात्र स्वर्ण 1982 में दिल्ली में जीता था जब महिला हॉकी को पहली बार इन खेलों में शामिल किया गया था।उसके बाद से भारत 1998 और 2018 में फाइनल में पहुंचा लेकिन क्रमश: दक्षिण कोरिया और जापान से हारकर रजत पदक से संतोष करना पड़ा।लेकिन युवा खिलाड़ियों से सजी कोच शोर्ड मारिन की यह टीम लंबे इंतजार को खत्म करने और दमदार प्रतिद्वंद्वी को शिकस्त देने का माद्दा रखती है।

पिछले साल खराब फॉर्म से जूझती दिखी भारतीय महिला हॉकी टीम के लिये 2026 यादगार रहा है जिसमें एफआईएच नेशंस कप जीतकर प्रो लीग में वापसी की और पिछले महीने नीदरलैंड और बेल्जियम में हुए विश्व कप में पांचवां स्थान हासिल किया जो 1974 के बाद उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

विश्व कप में भारत ने ग्रुप चरण में दुनिया की चौथे नंबर की टीम चीन को 2-2 से ड्रॉ पर रोका था जबकि भारतीय टीम में 11 खिलाड़ियों का यह पहला विश्व कप था। पूरे टूर्नामेंट में भारत एकमात्र मैच सह मेजबान नीदरलैंड से 0-2 से हारा था।

इधर चीन को दूसरे सेमीफाइनल में मेजबान जापान ने निर्धारित 60 मिनट तक गोलरहित बराबरी पर रोका और पेनल्टी शूटआउट में 4 . 2 से जीत दर्ज करके चीन फाइनल में पहुंच सका।

भारत को भी दक्षिण कोरिया से कड़ी चुनौती मिली और 12 पेनल्टी कॉर्नर में से सिर्फ एक पर गोल हो सका। भारत के लिये सेमीफाइनल के 44वें मिनट में इशिका और चार मिनट बाद कप्तान सलीमा टेटे ने गोल किया।

भारत के लिये गोलकीपर सविता और बिछू देवी ने विश्व कप का शानदार फॉर्म जारी रखा है। भारत ने पेनल्टी कॉर्नर और ओपन प्ले में गोल किये हैं हालांकि कोरिया के खिलाफ पेनल्टी कॉर्नर उतना अच्छा नहीं रहा। दीपिका छह मैचों में 21 गोल कर चुकी है जिनमें से 19 पेनल्टी कॉर्नर पर आये । नवनीत ने दस गोल दागे हैं जिनमें से सात फील्ड गोल हैं।

चीन के लिये झोंग जियाकी ने नौ जबकि चेन यि और झांग यिंग ने सात सात गोल किये हैं।चीन एशियाई खेलों की सबसे कामयाब टीम रही है और 2023 में हांगझोउ खेलों समेत उसने छह खिताब जीते हैं। भारत और चीन के बीच अब तक 28 मुकाबले हुए हैं जिनमें से 12 चीन ने और 11 भारत ने जीते जबकि पांच मैच ड्रॉ रहे।

मैच का समय – दोपहर 3.30 पर

कहां देखें- सोनी सपोर्ट्स नेटवर्क या सोनी लिव पर

NCERT ने क्लास 9 के लिए मध्यकालीन इतिहास की किताब में बदलाव किया, नई किताब में क्या क्या लिखा गया सब जानिए

NCERT Book Row: राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की क्लास 9 की नई सोशल साइंस की किताब में कहा गया है कि भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। इसमें आगे कहा गया है कि सातवीं सदी से ही कई राजाओं और राजकुमारों ने लड़ाई के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के दूसरे रूपों को रक्षक के तौर पर याद किया है। ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 2’ नाम की यह किताब नए एकेडमिक सेशन के शुरू होने के छह महीने बाद मंगलवार (30 सितंबर) को जारी की गई। इस किताब का पहला हिस्सा जून में जारी किया गया था।

‘रसिस्टेंस एंड रीजिलियन्स’ (प्रतिरोध और मजबूती) नाम के चैप्टर में सातवीं सदी से भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए लगातार हमलों का जिक्र है। साथ ही युद्ध में धार्मिक परंपराओं के बारे में भी बताया गया है। किताब में लिखा है, “भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। काली, दुर्गा और भवानी जैसी देवियों की पूजा को एक पुरानी प्रथा बताया गया है, जिसमें शासक लड़ाई के समय शक्ति के रूपों को रक्षक के तौर पर याद करते थे।”

किताब में लिखा है, “भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। काली, दुर्गा और भवानी जैसी देवियों की पूजा को एक पुरानी प्रथा बताया गया है, जिसमें शासक लड़ाई के समय शक्ति के रूपों को रक्षक के तौर पर याद करते थे।”

इसमें कहा गया है, “माना जाता है कि बस्तर के शासक अन्नमराजा को उनकी तलवार माणिक्यदेवी (दंतेश्वरी) से मिली थी। जबकि विजयनगर के कुमार कंपन ने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से मिली तलवार का इस्तेमाल किया था। इसी तरह, पारंपरिक रूप से यह भी माना जाता है कि शिवाजी को देवी तुलजा भवानी से तलवार मिली थी।”

भारतीय शासकों के बारे में क्या कहा गया?

इस अध्याय में बताया गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने सातवीं सदी के बाद से क्षेत्रीय विस्तार और धार्मिक उद्देश्य से प्रेरित हमलों का लगातार सामना किया। इसमें यह भी बताया गया है कि भारतीय शासकों और समुदायों ने अरब, तुर्की, मुगल और यूरोपीय सेनाओं का विरोध कैसे और कब किया।

एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश सकलानी के अनुसार, “इस (सेकेंडरी) स्तर पर सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई से विश्लेषणात्मक और तार्किक क्षमता विकसित होने, आलोचनात्मक पड़ताल को बढ़ावा मिलने, अलग-अलग संस्कृतियों की समझ बढ़ने और सीखने वालों को नागरिक व सामाजिक जीवन में आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ भाग लेने में सक्षम बनाने की उम्मीद की जाती है।”

उन्होंने कहा, “इसी भावना के साथ माध्यमिक स्तर के लिए किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 2’ की रूपरेखा तैयार की गई और इसे विकसित किया गया है।”

अल्प ज्ञात महिला शासकों का उल्लेख

एनसीईआरटी की ओर से तैयार की गई कक्षा-9 की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में चालुक्य वंश की रानी नायकी देवी से लेकर उल्लाल की रानी अब्बक्का चौटा तक भारत की अल्प ज्ञात महिला शासकों के बारे में जानकारी दी गई है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के छह महीने बाद मंगलवार को ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ नामक यह किताब जारी की गई। किताब का पहला भाग इस साल जून में जारी किया गया था।

रानी नायकी देवी को 1178 में माउंट आबू के पास कसरहड़ा में मोहम्मद गोरी को हराने का श्रेय दिया जाता है। सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए एक के बाद एक आक्रमणों का विवरण देने वाले अध्याय प्रतिरोध और दृढ़ता में तुर्क आक्रमणकारियों के खिलाफ हिंदू शाही शासकों, चंदेलों, सोलंकियों और चौहानों के प्रतिरोध का भी उल्लेख किया गया है।

वर्तमान कर्नाटक के उल्लाल की शासक रानी अब्बक्का चौटा (1525 से 1570) ने पुर्तगालियों की नौसेना का डटकर सामना किया था। काकतीय वंश की रानी रुद्रमा देवी का भी इस किताब में उल्लेख किया गया है, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के समक्ष प्रतिरोध किया था।

चर्चित प्रतिरोध गाथाओं में क्या है?

पाठ्यपुस्तक में बताई गईं कम चर्चित प्रतिरोध गाथाओं में मदुरै के मुथु वीरप्पा नायक की कहानी भी शामिल है। माना जाता है कि उन्होंने मुगल दरबार की ओर से भेजी गई चप्पल के सामने झुकने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय उसमें अपना पैर रख दिया था।

किताब में यह भी बताया गया है कि तमिलनाडु के जिंजी (सेनजी) किले को 2025 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। इसके के अनुसार किले पर विजयनगर नायकों, बीजापुर सल्तनत, मुगलों, मराठों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों का शासन रहा।

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रानी दुर्गावती का भी जिक्र

इस किताब में शामिल ऐतिहासिक हस्तियों में रानी दुर्गावती भी थीं, जिन्हें गढ़ा/गोंड राज्य में साहस, नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता वाली शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस किताब में ‘द माइटी मराठा वुमेन’ विषय के तहत ताराबाई और अहिल्याबाई होलकर का भी उल्लेख किया गया है।

सपा को तीसरी सीट जीतने का भरोसा

उत्तर प्रदेश में 16 अक्टूबर को 10 सीटों में भाजपा की आठ और समाजवादी पार्टी की दो सीटें तय दिख रही हैं। लेकिन सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पिछली बार की तरह इस बार भी तीन उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय पांच सीटें खाली हैं। इसलिए फैसला 398 विधायकों को करना है। इस लिहाज से एक सीट जीतने के लिए 37 वोट की जरुरत है। समाजवादी पार्टी को दो सीटें जीतने के लिए 74 वोट की जरुरत है, जिसका इंतजाम उसके पास है। इसके बाद सपा के पास 28 वोट बचते हैं। इसमें सपा को नौ वोट और जोड़ने होंगे तब उनका तीसरा उम्मीदवार चुनाव जीत पाएगा। वे तीसरी सीट पर ऐसा उम्मीदवार उतारना चाहते हैं, जिसे भाजपा और एनडीए के कुछ वोट दिला सकें।

भाजपा की सहयोगी निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद की पिछले दिनों सपा के माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात हुई थी। कहा जा रहा है कि सपा की नजर उनके पांच विधायकों पर हैं। चार निर्दलीय और ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के छह विधायकों पर भी सपा की नजर है। अगर सपा इनमें से कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग कराती है तो भाजपा के आठवें उम्मीदवार के लिए मुश्किल होगी। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा के जिन विधायकों को टिकट कटने का खतरा दिख रहा है वे भी क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं और सपा की टिकट से लड़ सकते हैं। लोकसभा चुनाव में अपनी परफॉरमेंस से अखिलेश इस आत्मविश्वास में हैं कि वे भाजपा और एनडीए में क्रॉस वोटिंग करा लेंगे। ऐसा हुआ तो विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा।

Asian Games में इन 3 मुक्केबाजों ने किए मेडल पक्के, खोलेंगे खाता

भारत के सचिन सिवाच पुरुष 60 किग्रा क्वार्टरफाइनल में जापान के विश्व कांस्य पदक विजेता शुनसुके कितामोटो से 0-5 से हारकर बाहर हो गए जबकि परवीन हुड्डा,अंकुश पंघाल और नरेंद्र बेरवाल ने सेमीफाइनल में पहुंचकर देश के लिए तीन पदक पक्के कर दिए हैं।

परवीन ने रविवार को एशियाई खेलों में महिलाओं के 65 किग्रा भार वर्ग की स्पर्धा के क्वार्टरफाइनल में उज्बेकिस्तान की नवबखोर खमिदोवा को 5-0 से हराकर सेमीफाइनल में जगह बनाई। वहीं अंकुश पंघाल ने पुरुषों के 80 किग्रा वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बना ली है जबकि नरेंद्र बेरवाल ने पुरुष 90 किग्रा क्वार्टरफाइनल में थाईलैंड के अदथापोंग सेंगतेप को रेफरी स्टॉपेज के जरिए पहले राउंड में हराकर अपना पदक पक्का कर लिया।

आज परवीन हुड्डा ने महिलाओं के 65किग्रा वर्ग के क्वार्टरफाइनल में नवबखोर खमिदोवा पर शानदार 5-0 से जीत हासिल करके एशियन गेम्स में अपनी पिछली निराशा को पीछे छोड़ कर अपना पदक पक्का कर लिया। डोपिंग उल्लंघन के कारण परवीन का 2022 हांगझोउ एशियन गेम्स का कांस्य पदक छीन लिया गया था, लेकिन उन्होंने एक बार फिर अपने लिए पदक हासिल कर लिया है। खमिदोवा की एकमात्र उम्मीद इस मुक़ाबले को ज़बरदस्त टक्कर वाले मुक़ाबले में बदलने की थी और वह तेज़ी से आगे बढ़ीं, लेकिन परवीन ने एक बार फिर दूरी बनाए रखी और फिर तेजी से हमला करते हुए कुछ बॉडी शॉट्स और चेहरे पर जैब्स मारे, और फिर पीछे हट गईं।

उज्बेकिस्तान की मुक्केबाज ने अपनी रणनीति बदली और कुछ काउंटर-पंच मारने के लिए पीछे रहीं, लेकिन जब परवीन ने खुद हमला किया तो उनकी स्पीड और पहुंच उनके काम आई और उन्होंने आसानी से कुछ हिट्स किए। अंत में काफ़ी हलचल रही, लेकिन परवीन ने मेडल जीतने के लिए बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और परवीन 5-0 से जीतीं और सेमीफाइनल में पहुँच गईं।

फाइनल में पहुंचना परवीन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि संभावना है कि उनका मुकाबला चीन की ली शू से होगा जिन्होंने मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन कजाकिस्तान की आइदा अबिकेयेवा को क्वार्टरफाइनल में हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया है और अब सेमीफाइनल में परवीन से भिड़ेंगी।

इससे पहले वहीं शानदार फॉर्म में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स चैंपियन अंकुश पंघाल ने पुरुषों के 80 किग्रा वर्ग के सेमीफाइनल में जगह बनाकर एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला बॉक्सिंग मेडल पक्का कर लिया। एशियाई खेलों में अपना पहला मुकाबला खेल रहे हरियाणा के 21 वर्षीय बॉक्सर ने क्वार्टर फाइनल में ताजिकिस्तान के नेक्रुज़ सलीमोव को 5-0 से हराकर परिपक्व और नियंत्रित खेल दिखाया।अंकुश ने मुकाबले की शुरुआत से ही अपनी पकड़ बनाए रखी; उन्होंने तेज़ फुटवर्क के साथ सटीक सीधे पंच और सही समय पर काउंटर-पंच का इस्तेमाल किया। उन्होंने मुकाबले की दूरी को अपने हिसाब से तय किया और सलीमोव को अपनी लय में नहीं आने दिया।

पहले दो राउंड में स्पष्ट बढ़त बनाने के बाद, अंकुश ने आखिरी राउंड में भी शानदार संयम दिखाया। जल्दबाजी में उलझने के बजाय, उन्होंने समझदारी से मुकाबला खेला, अपने प्रतिद्वंद्वी को दूर रखा और अपनी बढ़त को बचाए रखते हुए सर्वसम्मत निर्णय से जीत हासिल की। इस जीत से अंकुश का कम से कम कांस्य पदक पक्का हो गया है और इससे आइची-नागोया में भारत के बॉक्सिंग अभियान को शुरुआती बढ़त मिली है।

यह युवा बॉक्सर के लिए हाल के शानदार सफर में एक और महत्वपूर्ण कदम है। अंकुश 80 किग्रा वर्ग में कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीतकर जापान पहुंचे थे और अब उन्होंने उसी आत्मविश्वास को एशियाई मंच पर भी बरकरार रखा है। उन्होंने राउंड ऑफ़ 16 में बहरीन के हम्सा वोगेल पर 5-0 की शानदार जीत के साथ एशियाई खेलों में अपने अभियान की शुरुआत की थी। प्रतियोगिता में दो मुकाबले खेलने के बाद भी अंकुश ने अभी तक एक भी राउंड नहीं गंवाया है, जो उनके अभियान में निरंतरता और नियंत्रण को दर्शाता है।

नरेंद्र बेरवाल ने पुरुष 90 किग्रा क्वार्टरफाइनल में थाईलैंड के अदथापोंग सेंगतेप को रेफरी स्टॉपेज के जरिए पहले राउंड में हराकर अपना पदक पक्का कर लिया। नरेंद्र ने शुरुआत से ही मुकाबले पर नियंत्रण बनाए रखा। अदथापोंग को दो बार स्टैंडिंग काउंट मिला और तीसरी बार काउंट मिलने के बाद रेफरी ने मुकाबला रोक दिया। मुकाबला दो मिनट से भी कम समय में खत्म हो गया। इसके साथ ही नरेंद्र, अंकुश पंघाल और परवीन हुड्डा के साथ भारत के लिए दिन का तीसरा बॉक्सिंग पदक पक्का करने वाले मुक्केबाज बन गए।

लव एंड वॉर में आलिया भट्ट का लुक जारी

संजय लीला भंसाली की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘लव एंड वॉर’ से आलिया भट्ट के दो पोस्टर जारी कर दिए गए हैं। रणबीर कपूर के फर्स्ट लुक के बाद सामने आए आलिया के पोस्टर में उनका ग्लैमरस और रेट्रो अंदाज नजर आ रहा है।

पोस्टर में आलिया कुर्सी पर बैठी दिखाई दे रही हैं। उन्होंने आकर्षक स्लिट स्कर्ट के साथ हेडपीस पहना है। रिच बैकग्राउंड और रेट्रो अंदाज वाले पोस्टर में आलिया का लुक स्टाइलिश और आत्मविश्वास से भरपूर नजर आता है।

‘लव एंड वॉर’ में रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और विक्की कौशल मुख्य भूमिकाओं में हैं। संजय लीला भंसाली निर्देशित यह फिल्म 21 जनवरी 2027 को हिंदी, तमिल और तेलुगु में दुनिया भर में रिलीज होगी।

Pic Credit : UNI

9 से 5 की नौकरी छोड़ बनी ट्रैवलर, अब एक ही ट्रिप से कमाती हैं 2.5 लाख रुपये! जॉब की किचकिच से इस युवती को ऐसे मिली आजादी

UK की एक 26 साल की महिला ने घूमने-फिरने के अपने शौक को फुल-टाइम करियर बना लिया है। विदेश में कम सैलरी वाली कई नौकरियां करने के बाद, उन्हें ट्रैवल कंटेंट से पैसे कमाने का तरीका मिल गया और अब वह दुनिया भर में ग्रुप टूर लीड करती हैं।

रियानन वुड के Instagram पर लगभग 60,000 फॉलोअर्स हैं। वह एक ही ट्रिप से कमीशन के तौर पर $3,000 (लगभग 2.5 लाख रुपये) तक कमा सकती हैं। वह ब्रांड डील्स और स्पॉन्सर्ड पोस्ट से भी पैसे कमाती हैं और अब अपनी ट्रैवल एजेंसी शुरू करने की दिशा में काम कर रही हैं।

यूनिवर्सिटी के दिनों से है घूमने का शौक

वुड को नई जगहों पर घूमने का अपना जुनून तब पता चला जब वह 2021-22 में फ्रांस के ल्योन में पढ़ाई कर रही थीं। आस-पास के देशों और आल्प्स की वीकेंड ट्रिप्स ने उन्हें ग्रेजुएशन के बाद भी घूमते रहने के लिए प्रेरित किया। बाद में वह कनाडा चली गईं, जहां उन्होंने बोट और कैनो रेंटल कंपनी, जिपलाइन बिजनेस और स्की रिजॉर्ट में काम किया। इन नौकरियों में उन्हें कम सैलरी मिलती थी।

2024 के आखिर में उन्होंने अपने ट्रैवल कंटेंट को कमाई का जरिया बनाने के मकसद से Instagram का इस्तेमाल ज्यादा गंभीरता से करना शुरू किया। उन्होंने सोशल मीडिया स्ट्रैटेजी के कोर्स किए और अपने अकाउंट को बढ़ाने और उससे पैसे कमाने का तरीका सीखने के लिए एक Instagram कोच को हायर किया।

उन्हें पहला बड़ा मौका चार महीने बाद मिला। ग्रुप-ट्रिप कंपनी Mapo Tapo ने उन्हें स्विट्जरलैंड में एक टूर लीड करने का मौका दिया, जिसके लिए उन्होंने £330 कमाए।

आउटडोर एक्टिविटीज के उनके अनुभव ने ग्रुप टूर में मदद की

Business Insider के अनुसार वुड को ऑर्गनाइज्ड टूर लीड करने का पहले कोई अनुभव नहीं था। हालांकि हाइकिंग, माउंटेनियरिंग और रॉक क्लाइंबिंग में उनके बैकग्राउंड ने उन्हें आउटडोर एक्टिविटीज पर आधारित ट्रिप्स प्लान करने में मदद की। स्विट्जरलैंड की ट्रिप से और भी मौके मिले। बाद में उन्होंने Skyscanner, Siroko और Roamless जैसी ट्रैवल और स्पोर्ट्स से जुड़ी कंपनियों के साथ काम किया।

टूर से उनकी कमाई ग्रुप के साइज़ और शामिल एजेंसी पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक ट्रिप से $3,000 तक कमाए हैं। शुरुआत में कुछ सौ डॉलर से शुरू हुई उनकी Instagram कोलैबोरेशन फीस भी बढ़कर $1,000 से ज्यादा हो गई है। बिजनेस इनसाइडर ने बताया कि वुड की मौजूदा कमाई पांच अंकों में है। वह अपनी टूर की कमाई का बड़ा हिस्सा बचाती हैं और स्पॉन्सरशिप से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल निजी खर्चों के लिए करती हैं।

ट्रैवल बिजनेस में रहती हैं काफी बिजी

इस लाइफस्टाइल में कई चुनौतियां भी हैं। वुड अक्सर सीमित सामान के साथ यात्रा करती हैं। बजट वाले होटलों में ठहरती हैं और लगभग एक साल से ज्यादातर समय बैकपैक में ही गुजारा कर रही हैं। उनके रोजाना के काम में कंटेंट बनाना, ईमेल का जवाब देना, ब्रांड डील पर चर्चा करना और ग्रुप ट्रिप आयोजित करना शामिल है। उन्होंने कहा- “मुझे शायद ही कभी छुट्टी मिलती है।”

वुड ने यह भी कहा कि जब उन्होंने शुरुआत की थी तो स्पॉन्सरशिप के लिए बातचीत करना मुश्किल होता था, क्योंकि उन्हें यह तय करने में आत्मविश्वास की कमी महसूस होती थी कि कितना चार्ज किया जाए। अब वह अपनी ट्रैवल एजेंसी शुरू करने की दिशा में काम कर रही हैं और एक ऐसा बिजनेस बनाना चाहती हैं, जिससे वह अपने फॉलोअर्स के साथ घूमती रह सकें।

DDU-GKY Success: सीवान के चंदन को सीधे मिली दुबई की नौकरी! इस ग्रामीण कौशल योजना ने बदली 12.35 लाख युवाओं की किस्मत

DDU-GKY Success: गांवों में आज भी कई परिवारों की कमाई खेती और फसल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर फसल अच्छी न हो या खेती से कमाई कम हो जाए, तो परिवार के सामने आमदनी का दूसरा जरिया तलाशने की चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में किसी युवा के पास कोई काम की स्किल होना उसके लिए कमाई के नए रास्ते खोल सकता है। इसी सोच के साथ सरकार की दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) ग्रामीण युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर रोजगार के अवसरों से जोड़ने का काम करती है।

बता दें कि इस योजना की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत की गई थी। यह योजना ग्रामीण इलाकों के गरीब और कमजोर परिवारों के युवाओं पर ध्यान देती है। इस योजना के तहत युवाओं को ऐसी स्किल की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे उन्हें नौकरी पाने और लंबे समय तक रोजगार से जुड़े रहने में मदद मिल सके। इसमें 15 से 35 साल की उम्र के युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है और उन्हें रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है।

वहीं, बदलते समय और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए DDU-GKY में भी बदलाव किए गए हैं। अब योजना के नए DDU-GKY 2.0 फ्रेमवर्क में ऐसी ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जिसकी जरूरत कंपनियों और इंडस्ट्री को है। इसका मकसद युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग देना नहीं, बल्कि उन्हें टिकाऊ रोजगार से जोड़ना है।

इसके तहत नौकरी मिलने के बाद भी युवाओं को मदद देने, नई स्किल सीखने और पहले से सीखी स्किल को बेहतर करने पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रेनिंग, असेसमेंट, सर्टिफिकेट, निगरानी और रोजगार की जानकारी रखने की पूरी प्रक्रिया को भी डिजिटल सिस्टम से जोड़ा गया है।

मकसद साफ है: ट्रेनिंग से नौकरी मिलनी चाहिए, और नौकरी लंबे समय तक चलनी चाहिए। जून 2026 तक, DDU-GKY के तहत 18.45 लाख ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग दी गई है, जबकि 12.35 लाख लोगों को नौकरी मिली है।

इन आंकड़ों के पीछे उन लोगों की कहानियां भी हैं, जिनकी जिंदगी तब बदल गई जब सीखने-सिखाने की प्रक्रिया ने उनके लिए नौकरी और रोजी-रोटी के रास्ते खोल दिए।

सपने को जिंदा रखना

नागालैंड की विमेथानो सखरी ने सालों तक अपनी मां को दस लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते देखा। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, विमेथानो आगे की पढ़ाई करना चाहती थीं, लेकिन पैसों की तंगी के कारण उनका यह सपना पूरा करना मुश्किल हो रहा था।

जब उन्हें DDU-GKY के बारे में पता चला, तो सब कुछ बदल गया। अपने सपनों को छोड़ने से इनकार करते हुए, उन्होंने DDU-GKY के टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। कुछ महीनों बाद, विमेथानो ने ‘द डेन बेंगलुरु’ में फूड एंड बेवरेज सर्विस में अपनी पहली नौकरी शुरू की। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी। यह उनके और उनके परिवार के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

अपनी यात्रा को याद करते हुए विमेथानो कहती हैं, “मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय और नागालैंड सरकार के NSRLM का शुक्रिया अदा करती हूं कि उन्होंने DDU-GKY को लागू किया, जिससे पूरे भारत में कई बेरोजगार युवाओं को मदद मिली है। यह मौका मेरे लिए एक वरदान था, और मुझे उम्मीद है कि और भी कई युवा इससे फायदा उठा सकेंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने उठाया।”

विमेथानो के लिए, DDU-GKY ने बीच में छूटी हुई पढ़ाई को करियर के लिए एक लॉन्चपैड में बदल दिया।

लेकिन हर युवा की कहानी एक जैसी नहीं होती। चंदन शाह के लिए यह मौका उन्हें अपने घर से बहुत दूर ले गया।

छोटे-मोटे कामों से विदेश में करियर तक का सफर

एक समय ऐसा था जब चंदन शाह के परिवार के लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल था। बिहार के सिवान जिले के तेतहली गांव में रहने के कारण, उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने की बहुत कम उम्मीद थी। हाई स्कूल के बाद उन्होंने खेतों में अपने पिता की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ दिया। आस-पास ज्यादा मौके न होने की वजह से, चंदन ने गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम शुरू किए। फिर भी, उस काम से इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि एक अच्छा जीवन जी सकें।

उनकी मां, जो ‘गेंदा जीविका स्वयं सहायता समूह’ (Genda JEEViKA Self Help Group) की सदस्य थीं, की वजह से उनके लिए एक नया मौका सामने आया। उन्होंने चंदन को DDU-GKY के बारे में जानने और उसे आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया। चंदन ने काउंसलिंग करवाई और असिस्टेंट इलेक्ट्रीशियन के तौर पर ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। इस ट्रेनिंग ने उन्हें करियर की ओर पहला कदम बढ़ाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाए। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें बद्दी में एक डिस्टिलरी में हेल्पर की पहली नौकरी मिली, जहां वे हर महीने ₹10,500 कमाते थे। इस शुरुआती अनुभव ने उन्हें आगे पेशेवर तरक्की के लिए एक मजबूत आधार दिया। इन्हीं हुनर ​​और अनुभव के दम पर, चंदन ने बाद में विदेश में काम करने का मौका तलाशा और दुबई चले गए, जहां वे ‘अल शफा जनरल कॉन्ट्रैक्टिंग’ (Al Shafa General Contracting) में इलेक्ट्रीशियन के तौर पर शामिल हुए।

तब तक, उनकी महीने की कमाई बढ़कर ₹35,000 हो गई थी। इसका असर सिर्फ उनके करियर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे उनके परिवार को भी बेहतर आर्थिक सुरक्षा मिली। चंदन अपने परिवार का खर्च उठाने और अपने भाई-बहनों की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम हो गए। उनके इस सफर ने उन्हें गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया।

चंदन की कहानी दिखाती है कि कैसे नौकरी का पहला मौका लगातार तरक्की करने वाले करियर की नींव बन सकता है। DDU-GKY ने उन्हें वह पहला कदम उठाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाया, जबकि उनके पक्के इरादे और अनुभव ने उन्हें आगे के मौकों को पाने में मदद की। इन सबके मेल से उन्हें अपने और अपने परिवार के लिए एक ज्यादा सुरक्षित भविष्य बनाने में मदद मिली।

हालांकि, DDU-GKY से जुड़ी हर कहानी घर से दूर जाने की नहीं है। कुछ युवाओं के लिए यह योजना उन्हें बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर ले जाती है, तो कुछ के लिए यही मौका उन्हें अपने घर और गांव वापस लौटने का रास्ता देता है। ऐसी ही कहानी है रूपाली हांसदा की।

नौकरी को एक बिनेस में बदलना

आर्थिक तंगी के कारण असम के चराइदेव की रहने वाली रूपाली हासदा को 9वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और उनके पिता ही घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति थे। उनकी मां, जो एक स्वयं-सहायता समूह (Self-Help Group) की सक्रिय सदस्य थीं, ने उनके सपनों को हमेशा बढ़ावा दिया। रूपाली को एक ‘जीविका सखी’ के जरिए DDU-GKY के बारे में पता चला और दिसंबर 2022 में उन्होंने ‘सिलाई मशीन ऑपरेटर’ ट्रेड में दाखिला लिया।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, उन्हें तमिलनाडु के तिरुपुर में KPR अपैरल मिल्स में नौकरी मिल गई। 5 महीने तक उन्होंने एक अनजान शहर में काम किया और नए माहौल में खुद को ढाला। फिर भी, उनका मन घर पर ही लगा रहता था। नौकरी से हुई बचत के साथ वह हाथीबंधा लौट आईं और सिलाई और कटाई केंद्र (Sewing and Cutting Centre) में 50,000 रुपये का निवेश किया। जो काम शुरू में सिर्फ उनकी अपनी आजीविका का जरिया था, उसने जल्द ही किसी और के लिए भी रोजगार का मौका बना दिया। उन्होंने केंद्र में एक युवा लड़की को काम पर रखा और अपने समुदाय में एक बिजनेस खड़ा करना शुरू किया। सालाना लगभग 1.10 लाख रुपये की कमाई के साथ, रूपाली का सफर स्किलिंग (कौशल विकास) का एक अलग पहलू दिखाता है। नौकरी ने उन्हें एक शुरुआत दी, लेकिन उन्होंने उस अनुभव को अपने खुद के काम में बदलने का फैसला किया।

रूपाली ने घर के पास ही अपनी आजीविका बनाने का फैसला किया। वहीं, हीरालाल ने एक अलग रास्ता चुना—ऐसा रास्ता जो उन्हें अपने सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए करियर बनाने में मदद करे।

अपना खुद का करियर

झारखंड के हीरालाल पंडित ने बचपन से ही देखा था कि कैसे हर फसल यह तय करती थी कि उनके परिवार का गुजारा कितने समय तक चलेगा। चार लोगों का उनका परिवार उनके पिता की मौसमी खेती पर निर्भर था, जिससे महीने में लगभग 5,000 रुपये की कमाई होती थी।

10वीं कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने हर संभव तरीके से अपने पिता की मदद करना शुरू किया। दिव्यांग होने के कारण उनके लिए नौकरी पाना आसान नहीं था, लेकिन हीरालाल ने अपनी परिस्थितियों को अपने भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में योगदान देते हुए अपना खुद का करियर बनाना चाहते थे। विकल्पों की तलाश करते समय, हीरालाल को DDU-GKY के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम की मुफ्त ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सहायता ने उन्हें हुनर ​​सीखने और नौकरी पाने का मौका दिया। उन्होंने झारखंड के दुमका में एक ट्रेनिंग सेंटर में ‘हेल्थकेयर मल्टीपर्पज’ ट्रेड में दाखिला लिया।

यह ट्रेनिंग हीरालाल के सफर का एक अहम मोड़ साबित हुई। उन्हें एक ऐसे माहौल में नई स्किल्स सीखने को मिलीं जहां उनके साथ सम्मान और बराबरी का व्यवहार किया गया। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें नासिक के SMBT हॉस्पिटल में ‘जनरल ड्यूटी असिस्टेंट’ के तौर पर नौकरी मिल गई। इस मौके ने उन्हें अपने परिवार की भलाई में योगदान देने के साथ-साथ खुद भी पैसे कमाने में मदद की। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अनुभव ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें अपनी काबिलियत के बारे में नई सोच दी।

आज, हीरालाल दूसरे युवाओं को भी अपनी मुश्किल हालात से आगे देखने और मिले हुए मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके लिए, यह सफर पहला कदम उठाने की हिम्मत से शुरू हुआ था। DDU-GKY ने उन्हें उस पहले कदम को एक करियर और ज्यादा सुरक्षित भविष्य की राह में बदलने में मदद की।

जब कोई हुनर ​​आजीविका का जरिया बन जाए

कोई हुनर ​​ग्रामीण परिवार की हर मुश्किल को दूर नहीं कर सकता, लेकिन यह बेहतर संभावनाओं के दरवाजे जरूर खोल सकता है। विमेथानो के लिए, इसने रोजगार का रास्ता तब बनाया जब आर्थिक तंगी की वजह से उसकी पढ़ाई रुक गई थी। चंदन के लिए, इसने एक ऐसे करियर की शुरुआत की जो उसे दुबई तक ले गया। रूपाली ने अपने हुनर ​​और अनुभव का इस्तेमाल करके अपना खुद का कारोबार शुरू किया, जबकि हीरालाल को रोजगार का जरिया और अपने परिवार की मदद करने का मौका मिला।

उनकी राहें अलग-अलग थीं, लेकिन उनमें एक बात समान थी: हुनर ​​सीखने, उसे आजमाने और आजीविका कमाने का मौका। DDU-GKY इसी पहले कदम को मुमकिन बनाना चाहता है, ताकि ग्रामीण युवा ट्रेनिंग से रोजगार की ओर और रोजगार से ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ आजीविका की ओर बढ़ सकें।

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Success Story: NSFDC की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम ने बदल दी जिंदगी, बांकुरा की शीला मंडल कमाने लगीं महीने का 35000

Success Story: बहुत छोटे स्तर के कारोबारियों के लिए सस्ती और आसान शर्तों पर कर्ज संजीवनी से कम नहीं होता। इससे उनके कारोबार को प्रोत्साहन मिलता है और परिवार का जीवन भी सुधरता है। कुछ इसी तरह की राहत पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले की शीला मंडल ने भी हासिल की है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (NSFDC) की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम की मदद से शीला ने अपने केबल ऑपरेटर कारोबार को विस्तार दिया है।

एनएसएफडीसी छोटे बिजनेस मालिकों के लिए सस्ता कर्ज उपलब्ध कराता है। इससे उनके काम को बढ़ाने और उनके परिवार की रोजी-रोटी को बेहतर बनाने के मौके मिल सकते हैं। बांकुरा की 39 साल की शीला मंडल का अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि एनएसएफडीसी की छोटी आर्थिक मदद ने उनके मौजूदा कारोबार को बढ़ाने में मदद की।

शीला मंडल बांकुरा जिले के बांकादाहा गांव की रहने वाली हैं। शीला यहां अपने चार लोगों के परिवार के साथ रहती हैं। पहले, वह अपना केबल बिजनेस छोटे स्तर पर चलाती थीं, जिससे उन्हें हर महीने लगभग 15,000-18,000 रुपये मिलते थे। यह आय परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं थी।

उन्हें पश्चिम बंगाल शेड्यूल्ड कास्ट्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (WBSCDC) के ज़िला ऑफिस से NSFDC की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम के बारे में पता चला। शीला ने 2023-24 के दौरान एनएसएफडीसी की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम के तहत 4.40 लाख रुपये का कर्ज लिया। उन्होंने अपने गांव में अपने केबल ऑपरेटर के बिजनेस को बढ़ाया। इससे उनकी महीने की आय लगभग 15,000-18,000 रुपये से बढ़कर लगभग 35,000 रुपये हो गई। उनके पति भी इसे चलाने में उनकी मदद करते हैं।

बढ़े हुए बिजनेस से, मंडल की महीने की इनकम लगभग 35,000 रुपये हो गई है। इस बढ़ी हुई आय से उनके परिवार को ज्यादा आराम से रहने में मदद मिली है। शीला का कहना है कि एनएसएफडीसी से मिली आर्थिक मदद से उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। इसके लिए वह एनएसएफडीसी की शुक्रगुजार रहेंगी।

Asian Games का पहला गोल्ड दिलाया महिला क्रिकेट टीम ने, श्रीलंका को 147 रनों से रौंदा

स्मृति मंधाना और ऋचा घोष की तूफानी पारियों के बाद स्पिनरों के फिरकी के जादू से गत चैंपियन भारत ने एशियाई खेलों की महिला टी20 क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल में मंगलवार को श्रीलंका को 147 रन से रौंदकर स्वर्ण पदक जीता जो मौजूदा खेलों में देश का सोने का पहला तमगा है।

भारत के 217 रन के बड़े लक्ष्य का पीछा करते हुए श्रीलंका की टीम दीप्ति शर्मा (छह रन पर तीन विकेट), शेफाली वर्मा (तीन रन पर दो विकेट), श्रेयंका पाटिल (नौ रन पर दो विकेट) और श्री चरणी (13 रन पर दो विकेट) की बलखाती गेंदों के सामने 15.4 ओवर में सिर्फ 69 रन पर ढेर हो गई। श्रीलंका की ओर से कप्तान चामरी अटापट्टूी ने सर्वाधिक 29 रन बनाए जबकि उनके अलावा सिर्फ कौशिनी नुथ्यांगना (14) और कविशा दिलहारी (11) ही दोहरे अंक में पहुंच सकी।भारत ने इसी महीने श्रीलंका को ही हराकर एशिया कप का खिताब भी जीता था।

भारत ने इससे पहले स्मृति (45 गेंद में 79 रन, सात छक्के, पांच चौके) के अर्धशतक और शेफाली (48 रन, 29 गेंद, तीन छक्के, तीन चौके) के साथ उनकी पहले विकेट की 99 रन की तेजतर्रार साझेदारी की बदौलत तीन विकेट पर 216 रन का बड़ा स्कोर खड़ा किया। ऋचा घोष (22 गेंद में नाबाद 49 रन, छह चौके, तीन छक्के) ने डेथ ओवरों में तूफानी बल्लेबाजी करते हुए भारत का स्कोर 200 रन के पार पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।श्रीलंका को रजत पदक मिला जबकि पाकिस्तान ने बांग्लादेश को 31 रन से हराकर कांस्य पदक जीता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम को बधाई दी।प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि टीम का प्रदर्शन शानदार रहा, जिसमें आत्मविश्वास, कौशल और बेहतरीन टीम वर्क देखने को मिला। उन्होंने कहा कि इस जीत के साथ भारत ने इन खेलों में अपना पहला स्वर्ण पदक भी हासिल किया है। टीम ने देश का मान बढ़ाया है और देशभर के अनगिनत युवा क्रिकेटरों को प्रेरित करेगी। उन्होंने पूरी टीम को शुभकामनाएं दीं।

एशियाई खेल में भारत को स्वर्ण का इंतजार

नागोया। एशियाई खेलों में भारत का स्वर्ण पदक जीतने का इंतजार सोमवार को भी जारी रहा। लेकिन निशानेबाजी में भारत ने दो रजत और एक कांस्य सहित तीन पदक जीते, जबकि सुचिका तारियाल ने मिश्रित मार्शल आर्ट्स (एमएमए) में देश को इस खेल का पहला एशियाई खेल पदक दिलाकर इतिहास रचा।

भारत के कुल पदकों की संख्या छह हो गई है। इनमें चार रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। सुचिका महिलाओं के 60 किग्रा एमएमए वर्ग में फाइनल में पहुंचने से महज 700 ग्राम के अंतर से चूक गईं। सिंगापुर की हुई हून तेओ के खिलाफ उनका सेमीफाइनल बराबरी पर रहा था।

सुबह कराए गए वजन में सुचिका अपनी प्रतिद्वंद्वी से 700 ग्राम अधिक वजन की थीं। तकनीकी नियमों के अनुसार मुकाबला ड्रॉ रहने पर कम वजन वाली खिलाड़ी को आगे बढ़ने का मौका मिलता है। इसलिए सुचिका को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। यह एमएमए में भारत का पहला एशियाई खेल पदक है।

निशानेबाजी में युवा खिलाड़ी हिमांशु ढिल्लों और रुद्रांक्ष पाटिल ने रोमांचक शूटआउट में संयम बनाए रखते हुए क्रमशः व्यक्तिगत रजत और कांस्य पदक जीता। इससे पहले दोनों ने किशोर निशानेबाज पार्थ माने के साथ मिलकर टीम रजत पदक हासिल किया था।

इन तीन पदकों के साथ भारत के निशानेबाजी में कुल पदकों की संख्या पांच हो गई है। इनमें चार रजत और एक कांस्य है। भारत इस स्पर्धा में फिर स्वर्ण से चूक गया। चीन के विश्व नंबर एक शेंग लिहाओ ने शानदार प्रदर्शन किया। शेंग, चांगहोंग झांग और सिहान मा ने 1899 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता और पिछले साल काहिरा में बनाए गए अपने ही 1898.4 अंक के विश्व रिकॉर्ड में सुधार किया।

सुचिका ने महिलाओं के 60 किग्रा वर्ग में एमएमए की पहली भारतीय एशियाई खेल पदक विजेता बनकर इतिहास रचा, लेकिन फाइनल में पहुंचने का मौका इतने कम अंतर से गंवाने के कारण उनकी उपलब्धि के साथ निराशा भी जुड़ी रही। बैडमिंटन, हॉकी और टेबल टेनिस में भी भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा। कबड्डी टीमों ने जीत के साथ शुरुआत की। बैडमिंटन में पुरुष टीम ने बांग्लादेश को 3-0 से हराकर क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई। लक्ष्य सेन, के. श्रीकांत और आयुष शेट्टी ने अपने-अपने एकल मुकाबले आसानी से जीते।

मुक्केबाजी में भी भारत ने आत्मविश्वास के साथ शुरुआत की। 70 किग्रा वर्ग में सुमित कुंदू ने आसान जीत दर्ज की।