9 वर्षों में उत्तर प्रदेश ने देश की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में बनाई मजबूत पहचान : योगी आदित्यनाथ

Chief Minister Yogi stated that over past nine years Uttar Pradesh has established strong identity among country's leading economies

– मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कानून का राज स्थापित होने से निवेश और विकास को मिली नई रफ्तार 

– सपा सरकार पर सीएम का तीखा हमला, बोले- सरकारी खजाने की हुई लूट और विकास रहा अधूरा

– यूपी में तीसरी बार बनेगी एनडीए की सरकार, भाजपा के नेतृत्व में लगेगी हैट्रिक

– उत्तर प्रदेश में 96 लाख एमएसएमई, सवा तीन करोड़ लोगों को मिला रोजगार

– नौ सालों में दंगा, कर्फ्यू और माफिया संस्कृति से मुक्त हुआ उत्तर प्रदेश

Chief Minister Yogi Adityanath : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रदेश सरकार ने नौ वर्षों के कार्यों, कानून-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, कृषि, निवेश और बुनियादी ढांचे में बड़ा बदलाव लाने में सफल रही है। वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश पहचान, सुरक्षा और विकास के संकट से जूझ रहा था, लेकिन पिछले नौ वर्षों में राज्य ने देश की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। कहा कि यूपी में पहली बार कोई सरकार तीसरी बार लगातार रिपीट होगी। एनडीए सरकार इस बार यूपी में हैट्रिक लगाएगी। मुख्यमंत्री बुधवार को लखनऊ में 'आज तक' न्यूज चैनल के विशेष कॉन्क्लेव 'पंचायत आज तक उत्तर प्रदेश' को संबोधित कर रहे थे। 
 

सीएम ने कहा कि 9 वर्षों की कार्यपद्धति और रिपोर्ट कार्ड भी जनता के सामने है। जनता जनार्दन फैसला करने को तैयार है। 2003 से 2017 तक सपा और अन्य सरकारों की कार्यपद्धतियां भी सबके सामने है। हम लोगों ने पीएम मोदी जी के विजनरी नेतृत्व में विकसित भारत को आगे बढ़ाने का काम किया।

डबल इंजन सरकार का लाभ हमने लिया है। इसमें यूपी सफल हुआ है। विकसित उत्तर प्रदेश की संकल्पना को केवल डबल इंजन की भाजपा की सरकार ही पूरा कर सकती है। गत वर्ष एक रिकॉर्ड टूटा था, इस बार एक नया टूटने वाला है। यूपी में पहली बार कोई सरकार तीसरी बार लगातार रिपीट करेगी। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए सरकार इस बार यूपी में हैट्रिक लगाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

 

सपा सरकार में लूटा गया सरकारी खजाना

सीएम ने कहा कि सपा का विकास का मॉडल होता तो यूपी कबका डूब गया होता। सैफई खानदान यूपी को तबाह कर रहा था, उसका नमूना जेपीएनआईसी बिल्डिंग है। सपा ने जेपीएनआईसी को बनाने के लिए 200 करोड़ का डीपीआर बनाया था, लेकिन 800 करोड़ रुपए खर्च हो जाने के बाद भी अधूरा है। आदि गंगा की मान्यता वाली गोमती के रिवर फ्रंट के नाम पर 166 करोड़ रुपए का डीपीआर किया था लेकिन 1400 करोड़ रुपए खर्च हो गए। साथ ही कार्य भी अधूरा है। सपा सरकार में केवल सरकारी खजाना लूटा जा रहा था।

 

सीएम ने कहा कि 2016 दिसंबर में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का तत्कालीन मुख्यमंत्री ने शिलान्यास किया। इसके बाद 15,200 करोड़ की लागत तय की गई। सरकार बदलने के बाद मई 2017 में उसकी समीक्षा की तो जमीन ही न होने का पता चला। इसमें बड़ी बेइमानी का पता चला तो टेंडर को रद्द किया गया। दो वर्ष जमीन खरीदने में लगे। 2018 में हमारे पास 90 प्रतिशत जमीन आ गई। इसके बाद 15,200 करोड़ का टेंडर मात्र 11,800 करोड़ रुपए का हो गया। इसी बजट में सपा सरकार से बेहतर पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का निर्माण कराया गया। 

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सीएम ने कहा कि यूपी की एक्साइस पॉलिसी में भी डैकती डाली जाती थी। पहले मात्र 12 हजार करोड़ रुपए की एक्साइस ड्यूटी आती थी। हमारी सरकार के लिए कठिन था, लेकिन पॉलिसी की बदल दी। आज पांच गुना ज्यादा 63,000 करोड़ रुपए एक्साइस ड्यूटी के रूप में सरकार को मिल रहे हैं।

 

विपक्ष ने राम मंदिर के विरोध में अधिवक्ता खड़े किए

सीएम ने कहा कि 2017 से पहले जब यूपी में सुरक्षा नहीं थी तो त्योहार के पहले कर्फ्यू लग जाता था, उपद्रव शुरू हो जाता है। आज हर समुदाय का पर्व व त्योहार शांतिपूर्ण ढ़ंग से पूरा हो रहा है। जिन लोगों ने अयोध्या में रामभक्तों पर गोलियां चलाई, वह आस्था की बात कर रहे हैं। साथ ही पवित्र हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाई। देश के उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर रहे थे कि भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण हुए ही नहीं। राम मंदिर के विरोध में अपने अधिवक्ता खड़े किए। जिन लोगों ने देश के खजाने को लूटा और पहचान का संकट खड़ा किया, आज उनको अयोध्या की चोरी दिख रही है लेकिन अपनी डकैती नहीं दिखती। 

 

अयोध्या चढ़ावा मामले में की गई कार्रवाई, हिंदू आस्था पर प्रहार करना न्याय संगत नहीं

सीएम योगी ने कहा कि अयोध्या की घटना निश्चित ही सभी रामभक्तों को आहत करती है। वह एक इंडिपेंडेंट ट्रस्ट है, जिसमें सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। ट्रस्ट के अनुरोध पर राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया। एसआईटी की रिपोर्ट आते ही ट्रस्ट ने कार्रवाई शुरू की, जो लोग चोरी करते हुए पकड़े गए उनकी व सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई। नैतिक आधार पर भी दो इस्तीफे हुए, लेकिन उसके नाम पर अयोध्या को, श्रीराम जन्मभूमि को बदनाम करना अथवा हिंदू आस्था पर प्रहार करना, ये न्याय संगत नहीं है।

यूपी में जब यह आस्था के केंद्र देश के लिए मॉडल बन रहे और यूपी पहचान में आगे बढ़ रहा हैं तो सपा को पीड़ा हो सकती है। आस्था के केंद्रों से अर्थव्यवस्था को गति मिली है। इससे फूल बेचने वाले, रिक्शा चलाने वाले, होटल व टैक्सी संचालकों की भी आर्थिक स्थिति सुधरी। प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान एक नाविक ने 30 करोड़ रुपए की कमाई की थी, लेकिन ये उनको अच्छा नहीं लगाता है।

 

दोनों युवराजों को चांदी के चम्मच से खाने की आदत

सीएम ने कहा कि समृद्धि केवल दो खानदानों ने अपने नाम पर पेटेंट करा लिया है। ये एक गरीब की पीड़ा को नहीं समझ सकते। दोनों राजकुमारों ने जहां जन्म लिया है, वहां चांदी के चम्मच से खाने की आदत रही है। देर से सोकर उठने की आदत रही है। गर्मी, बरसात की पीड़ा कैसी होती है, इन्हें नहीं पता है। दोनों फीफा कप का आनंद लेने ऑस्ट्रेलिया और टूरिस्ट वीजा पर यूएस की यात्रा पर गए हैं। ये किसके पैसे से विदेश की यात्रा कर रहे हैं। यहां समाज को बांटने का काम करते है, लेकिन जनता सारी करतूतों को जानती है।

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मेरे साथ दिल्ली या गोरखपुर से कोई अलग से टीम नहीं आई

सीएम ने कहा कि मुझे एक लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में काम करने से पहले एक सांसद के रूप में उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्र से देश की संसद में प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हुआ था। विभिन्न मुद्दों के लिए जूझता था और संसद में उठाने का प्रयास करता था। कभी-कभी निराशा भी होती थी। लगता था कि बीमारी व भूख से मरना, माफिया के सामने लोगों का नतमस्तक होना, बिजली व सामान्य जनसुविधाओं के लिए लोगों को तरसना, युवाओं के सामने पहचान का संकट, किसानों की आत्महत्या उत्तर प्रदेश की नियति बन गई है। पीड़ा के साथ लगता था कि क्या इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है।

जब पार्टी ने मुझे शासन-सत्ता का संचालन करने का अवसर दिया और अब उसके सकारात्मक परिणाम को देखता हूं। ऐसा नहीं की मेरे साथ दिल्ली या गोरखपुर से कोई अलग से टीम आई हो। मेरे साथ कोई भी व्यक्ति नहीं आया। गोरखपुर से पांच बार से सांसद रहा, वहां से भी एक व्यक्ति नहीं आया। जो टीम लखनऊ में मुझे मिली, उन्हीं के साथ काम करने का प्रयास किया। उसके परिणाम सबके सामने है। 

 

सीएम ने कहा कि यूपी को इन 9 वर्षों में पहचान के संकट से उबारा है। यूपी की अर्थव्यवस्था और प्रति व्यक्ति आय को तीन गुना करने में सफलता प्राप्त की है। महिला कर्मचारियों की उपस्थिति तीन गुना बढ़ी है। बीमारू राज्य की श्रेणी में रहने वाला उत्तर प्रदेश 9 वर्षों में देश के टॉप तीन अर्थव्य़वस्था के रूप में स्थापित हुआ है। ऐसे कौन से कारण थे, जो यूपी में नहीं हो सकते थे।

 

2014 के पहले भी थी एक डबल इंजन सरकार 

सीएम ने कहा कि 2014 के पहले भी एक प्रकार की डबल इंजन की सरकार थी। केंद्र में कांग्रेस व यूपीए की सरकार थी और यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। दोनों मिलकर काम कर रहे थे लेकिन जनता में विश्वास नहीं था। इन दोनों की स्थिति एक तरफ कुआं और खाई जैसी थी। आज ये लोग जो उपदेश देते हैं, वह 2014 से पहले अंगीकार किया होता तो हाशिए पर नहीं गए होते।

 

यूपी का नौजवान अपनी पहचान छिपाता था, उसे नौकरी नहीं मिलती थी। उसने आवेदन किया तो योग्यता के बाद भी वो चयनित नहीं होता था। क्योंकि नौकरी पर कुछ चंद जनपदों और लोगों का कब्जा था। 2017 के पहले सुरक्षा की स्थिति बदलहाल थी, बेटी और व्यापारी सुरक्षित नहीं थे। सत्ता के समानांतर माफियाओं की सरकारें चलती थीं। मीडिया, आम आदमी, व्यापारी, बेटी, उद्यमी कोई भी सुरक्षित नहीं था। व्यापारी और आम नागरिक भी घर से निकलता था तो ईश्वर से प्रार्थना करता था कि मुझे शाम को वापस परिवार का मुंह देखने का अवसर मिले।

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माफियाओं के साथ आज भी उन लोगों की सहानुभूति

सीएम ने कहा कि उद्यमी निवेश नहीं करना चाहता था। न सरकार की नीति थी और न नीयत थी। अराजकता चरम पर थी, माफिया के सामने सरकारें नाक रगड़ती हुई दिखाई देती थी। आज भी उनके भाषण सुनते होंगे, वे बोलते हैं कि सत्ता में आ गए तो जांच कराएंगे कि माफिया मारे क्यों जा रहे हैं। आज भी उन लोगों की सहानुभूति उन माफिया और उनके गुर्गों के प्रति है, जो जेल में है या जहन्नुम की यात्रा पर जा चुके हैं। उनकी सहानुभूति आज भी यूपी के नागरिकों के प्रति नहीं दिखती है।

 

23 वर्षों का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाएं

सीएम ने कहा कि 2003 से 2026 के 23 वर्षों के रिपोर्ट कार्ड को लेकर जनता के बीच लेकर जाइए। पहले पांच साल मुलायम सिंह के, अगले पांच साल मायावती के व अगले पांच वर्ष अखिलेश के और पिछले 9 वर्षों के हमारे कार्यकाल के, जनता से उनकी संतुष्टि के बारे में पूछिए। आपको स्वर्गीय राजीव गांधी का वह वाक्य याद आज जाएगा जिसमें निराश होकर कहा था कि हम 100 रुपए भेजते है, लेकिन नीचे 15 रुपए ही पहुंचता है। आखिर 85 रुपए कौन खा जा रहा था।

ये किसी छात्र-छात्रा की छात्रवृत्ति, युवा की नौकरी, बुर्जुग-निराश्रित महिला की पेंशन, गरीब का अनाज, बहन-बेटी के लिए बनने वाले शौचालय का पैसा था। जिस 85 प्रतिशत पैसे पर पिछली सरकारें डकैती डालने का काम करती थीं। आज डीबीटी के माध्यम से 100 रुपए दिल्ली या लखनऊ से भेजने पर सीधे लाभार्थी के खाते में जाता है। सभी तक योजनाओं का पूरा लाभ पहुंच रहा है। सीएम योगी ने कहा कि संकल्प और इच्छाशक्ति के दम पर देश की सबसे बड़ी आबादी का राज्य दंगा मुक्त, उपद्रव मुक्त, कर्फ्यू मुक्त और अपनी परांपरागत पहचान से युक्त हो सकता है, यह यूपी ने पिछले 9 वर्षों में करके दिखाया है।

 

अब इंसेफेलाइटिस से मौतें नहीं होतीं

सीएम ने कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर वर्ष इसी सीजन में इंसेफेलाइटिस से मौतें होती थीं। हर परिवार सशंकित रहता था कि पता नहीं कौन सा बच्चा इसकी चपेट में आ जाए। हर वर्ष 1200 से 1500 मौतें होती थीं। आज इंसेफेलाइटिस से होनी वाली मौतें शून्य पर पहुंच चुकी हैं। भूख से मौतें अलग से होते थीं, आज उन्हें 100 प्रतिशत सैचुरेट कर चुके हैं। उन्हें जमीन के पट्टे मिले, उनका आवास बना, आयुष्मान कार्ड, रसोई गैस के सिलेंडर और रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। 

 

परंपरागत उद्यम फिर जीवित हुए

सीएम ने कहा कि परंपरागत उद्यम फिर से जीवित हो चुके हैं, जिन्हों कभी यूपी को पहचान दिलाई थी। आजादी के तत्काल बाद 1950 में देश की अर्थव्यवस्था में यूपी का योगदान 14 प्रतिशत था, जो 2017 से पहले घटकर मात्र 7 प्रतिशत के आस-पास रह गया था। यूपी अवनति की ओर था। तब अन्नदाता को पानी, बीज, बिजली नहीं मिलती थी। किसान खेत में जाने से डरता था। वहीं पैदावार फसल का दाम किसानों को नहीं मिलता था, क्योंकि इसका फायदा बिचौलिए उठाते थे। कृषि यूपी का आधार है लेकिन सरकार के स्तर पर कोई प्रोत्साहन नहीं था।

मैन्युफैक्चरिंग पावर जब परंपरागत उद्यम के साथ जुड़ती है, तब अर्थव्यवस्था को तेज करती है। मैन्युफैक्चरिंग के लिए हमारे पास एमएसएमई का बेहतरीन नेटर्वक था लेकिन पिछली सरकारों के इंस्पेक्टर राज ने उसे तबाह कर दिया था। लोग विभागीय उत्पीड़न के शिकार होते थे। उस समय उद्यमी, कारीगर बन गया और किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गया था। ऐसे में यूपी की अर्थव्यवस्था को डूबना ही था।

 

कृषि विकास दर को 18 प्रतिशत तक पहुंचाया

सीएम योगी ने कहा कि 2017 से 2026 के बीच उत्तर प्रदेश की कृषि विकास दर को 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है। अमेरिका-ईरान व रूस-यूक्रेन का युद्ध चल रहा है, उर्वरक की कमी स्वाभाविक रूप से हो जानी चाहिए थी, लेकिन यूपी में किसान को फर्टिलाइजर, बीज, कीटनाशक समय पर मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के अंदर 10 वर्षों में डबल इंजन सरकार ने 24 लाख हेक्टेयर जमीन को अतिरिक्त सिंचाई की सुविधा प्रदान की है।

उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में अप्रूव हुई सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना को यूपी में डबल इंजन की सरकार ने पूरा कराया। उन्होंने बुंदेलखंड की अर्जुन सहायक परियोजना का भी जिक्र किया। बताया कि पहले महोबा के किसानों को प्रति बीघा 5 हजार रुपए मिलता था, आज उन्हीं अन्नदाता किसानों को 50 हजार रुपए मिल रहा है। उन्होंने बाणसागर परियोजना की सफलता की भी चर्चा की।

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बिचौलियों को हटाकर किसानों को दिलाया फायदा

सीएम ने कहा कि यूपी के किसानों को 10 घंटे बिजली खेती के लिए उपलब्ध कराई जा रही है, साथ ही बिजली उनके लिए मुफ्त है। प्रदेश में 16 लाख प्राइवेट ट्यूबवेल हैं, सबकी बिजली मुफ्त कर दी गई है। 2017 में 10 वर्ष का गन्ना मूल्य का भुगतान बाकी था। गन्ना किसानों को अब तक 3.23 लाख करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। 300 से 400 रुपए प्रति क्विंटल गन्ना का दाम किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है। सीएम ने कहा कि आज 122 चीनी मिलों का संचालन किया जा रहा है। 105 चीनी मिलें ऐसी हैं, जहां से 4 दिन में गन्ना मूल्य का भुगतान किसानों को हो रहा है।

शेष में प्रयास किया जा रहा है कि वह 15 दिन में गन्ना मूल्य का भुगतान कर दें। आज किसान की किसी भी उपज को बिचौलियों की जगह उन्हीं से सरकार द्वारा खरीदा जा रहा है। अगर बाजार में अच्छा दाम है तो किसान स्वतंत्र रूप से वहां बेच सकता है। अगर बाजार में उचित दाम नहीं मिल रहा है तो एमएसपी में लागत के डेढ़ गुना दाम पर सरकार किसान से खरीदेगी और फिर उसे अपने स्तर पर बाजार तक पहुंचाने का काम करेगी।

आज किसान के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना समेत हर प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। खेती में जो विकास दर बढ़ी है, उस विकास दर के पीछे डबल इंजन सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं का परिणाम देखने को मिल रहा है।

 

सीएम ने कहा कि पहले एमएसएमई दम तोड़ चुका था, कारीगर पलायन कर चुके थे, अब वह फिर से प्रगति कर रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा 96 लाख एमएसएमई यूनिट यूपी संचालित कर रहा है। सरकार हर यूनिट को 5 लाख रुपए की सामाजिक बीमा का कवर भी उपलब्ध करा रही है। सवा तीन करोड़ रुपए इसके साथ रोजगार से जुड़ चुके हैं। 

 

सुशासन के लक्ष्य प्राप्ति के लिए कानून का राज जरूरी

सीएम ने कहा कि यूपी जैसे राज्य में सुशासन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कानून का राज स्थापित कर दीजिए। सुरक्षा का बेहतरीन माहौल दे दीजिए। अपने आप सुशासन के लक्ष्य प्राप्त होते दिखाई देंगे। यूपी सरकार ने प्रभावी ढ़ग से इसे बढ़ाने का काम किया। आज यह सुनना अच्छा लगता है, जब कहा जाता है कि यूपी के मॉडल को सुरक्षा के मायने में अन्य राज्यों ने स्वीकार किया है। 

 

हर योजना में शीर्ष पर यूपी

सीएम ने कहा कि पहले दिल्ली में सरकारी योजनाओं को लागू करने में टॉप राज्यों की सूची देखता था। यूपी का कहीं पता नहीं होता था, वह बाटम 3 में दिखता था। तब सरकारों की मानसिकता भी ऐसी ही थी। पिछले 12 वर्षों में पीएम मोदी जी के नेतृत्व में 100 से ज्यादा जनकल्याण की स्कीमें निकली हैं। आज हर एक स्कीम में यूपी का नाम टॉप में आता है। यूपी में योजना की सफलता का मतलब है कि वह देश के अंदर सफल हो गई। साथ ही दुनिया के लिए मॉडल बन गई। सीएम ने कहा कि आज गरीब को मकान, शौचालय मिला है। हर गरीब को सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं, जिसके लिए दशकों से लालायित था। अब कोई शिकायत लेकर नहीं आता। 

 

ई-पॉस मशीन से आई पारदर्शिता

सीएम ने कहा कि पूर्वी जनपदों में 2017 से पहले भूख से मौत होती थी। इस सरकार ने ई-पॉश मशीनें लगाईं। आज के दिन 16 करोड़ लोगों को यूपी में मुफ्त राशन दिया जा रहा है। ई-पॉस मशीन से 80 हजार उचित मूल्य की दुकानों को जोड़ा गया है। किसी गांव में उचित मूल्य की दुकान में थोड़ी भी घटतौली होने पर अलर्ट आ जाता है, जिसके बाद टीम फौरन छापा मारकर कार्रवाई करती है।

 

यूपी में बिजली खपत 35 हजार मेगावाट तक पहुंची

सीएम ने कहा कि यूपी के सभी 75 जनपदों में सामान्य रूप से बिजली उपलब्ध कराई जा रही है। 2017 के पहले पीक आवर में कुल बिजली आपूर्ति 15-16 हजार मेगावाट ही होती थी, आज आपूर्ति 33 से 35 हजार मेगावाट हो रही है। ये यूपी की नई स्थिति है।

 

यूपी में 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव

सीएम ने कहा कि यूपी ने 34 से अधिक सेक्टोरल पॉलिसी बनाई गईं हैं, जिससे निवेश बढ़ा है। 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। 15 लाख करोड़ रुपए के प्रस्तावों की ग्राउंड ब्रेकिंग हो चुकी है और 7.50 लाख करोड़ रुपए के प्रस्तावों की ग्राउंड ब्रेकिंग की तैयारी चल रही है। ये नया यूपी है, जिसके तहत 65 लाख युवाओं को नौकरी दी गई है।

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सीएम ने कहा कि देश के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अच्छी सड़कें यूपी में मिलेंगी। देश के एक्सप्रेसवे में 60 प्रतिशत यूपी का योगदान है। सबसे ज्यादा एयरपोर्ट यूपी में हैं। 2017 से पहले यूपी में केवल दो एयरपोर्ट संचालित थे, आज 17 हैं। इनमें पांच इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं। जिसमें पीएम मोदी द्वारा उद्घाटन किए गए नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम भी शामिल है। इसके पास 14 हजार एकड़ जमीन है, देश में किसी भी एयरपोर्ट के पास इतनी जमीन नहीं है। नए एयरक्राफ्ट आने पर सभी एयरपोर्ट से हवाई सुविधा और बढ़ेगी। प्रदेश सरकार पांच नए एयरपोर्ट पर भी काम कर रही है। 

 

सीएम योगी ने कहा कि पहले कोई सोचता भी नहीं था कि आजमगढ़ में एयरपोर्ट होगा, लेकिन यह भी संभव हुआ। श्रावस्ती, अलीगढ़, मुरादाबाद, सोनभद्र में कोई एयरपोर्ट की कल्पना नहीं करता था, लेकिन वहां भी सपना पूरा किया गया। दिल्ली से मेरठ के बीच 12 लेन का एक्सप्रेसवे भी बन चुका है और रैपिड रेल भी आ चुकी है। देश की पहली इनलैंड वाटरवे वाराणसी-हल्दिया के बीच संचालित हो रही है। साथ ही यूपी के अंदर सबसे ज्यादा सात सिटी में मेट्रो सफलतापूर्वक संचालित हो रही है।

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

An image showing the allergic reaction in the skin caused by a mosquito bite

Mosquito Bite Scientific Reason: मच्छर का काटना केवल एक छोटी सी सुई चुभने जैसा होता है, लेकिन उसके कुछ ही सेकंड बाद होने वाली तेज खुजली और लाल निशान हमें परेशान कर देते हैं। अधिकांश मामलों में यह समस्या कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है, लेकिन यदि गंभीर एलर्जी, संक्रमण या बुखार जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।ALSO READ: Monsoon health tips: सावधान! बारिश में बीमारियों के खतरे से कैसे बचाएं खुद को, ये लक्षण दिखें तो ना करें नजरअंदाज

 

आइए इसके पीछे छिपे बेहद दिलचस्प वैज्ञानिक कारण और इससे राहत पाने के आसान घरेलू व डॉक्टरी उपचारों को समझते हैं।

 

मच्छर का काटना, वैज्ञानिक कारण

जब कोई मादा मच्छर (सिर्फ मादा मच्छर ही खून पीती हैं) हमारी त्वचा पर बैठती है, तो वह खून चूसने के लिए अपनी सूंड (Proboscis) को त्वचा में डालती है। इस प्रक्रिया के दौरान असली कारण शुरू होता है:

 

लार का प्रवेश (Saliva Injection): मच्छर की लार में विशेष प्रकार के प्रोटीन और थक्कारोधी (Anticoagulants) तत्व होते हैं। यह लार खून को जमने से रोकती है ताकि मच्छर बिना किसी रुकावट के आसानी से खून चूस सके। जैसे ही यह बाहरी लार हमारे शरीर में प्रवेश करती है, हमारा इम्यून सिस्टम इसे एक हमलावर मानकर तुरंत सक्रिय हो जाता है। इस लार से लड़ने के लिए हमारा शरीर 'हिस्टामाइन' नाम का एक रसायन छोड़ता है।

 

सूजन और खुजली: हिस्टामाइन के कारण प्रभावित हिस्से के आसपास की रक्त वाहिकाएं फैल जाती हैं। इससे वहां खून का प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे त्वचा लाल हो जाती है, सूज जाती है और वहां की नसें मस्तिष्क को खुजली का संकेत भेजने लगती हैं।

 

मच्छर के काटने पर क्या करें और क्या न करें?

सबसे जरूरी नियम: मच्छर के काटने वाली जगह को कभी भी जोर से न खुजलाएं। खुजलाने से त्वचा की ऊपरी परत छिल सकती है, जिससे बैक्टीरिया का संक्रमण यानी इंफेक्शन (Infection) होने का खतरा बढ़ जाता है और निशान भी गहरा हो जाता है।ALSO READ: Health Benefits of Banana: कच्चे और पके केले में कौन कौनसे विटामिन होते हैं?

 

* खुजली और सूजन दूर करने के आसान उपचार

यदि मच्छर ने काट लिया है और तेज खुजली हो रही है, तो आप नीचे दिए गए तरीकों से तुरंत राहत पा सकते हैं:

 

1. घरेलू उपचार

* बर्फ की सिकाई: प्रभावित जगह पर बर्फ का टुकड़ा कपड़े में लपेटकर 5 से 10 मिनट रखें। ठंडा तापमान नसों को सुन्न कर देता है, जिससे हिस्टामाइन का असर कम होता है और सूजन व खुजली तुरंत शांत हो जाती है।

 

एलोवेरा जेल: एलोवेरा में प्राकृतिक एंटी-इन्फ्लेमेटरी यानी सूजन रोधी गुण होते हैं। इसे काटने वाली जगह पर लगाने से ठंडक मिलती है।

 

शहद: शहद में प्राकृतिक एंटी-सेप्टिक गुण होते हैं। इसकी एक बूंद प्रभावित जगह पर लगाने से खुजली कम होती है।

 

बेकिंग सोडा पेस्ट: एक चम्मच बेकिंग सोडा में थोड़ा सा पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें। इसे 10 मिनट के लिए लगाएं और फिर धो लें। यह त्वचा के pH स्तर को संतुलित कर आराम देता है।

 

2. मेडिकल उपचार

कैलामाइन लोशन: Calamine Lotion इसे लगाने से त्वचा को ठंडक मिलती है और खुजली तुरंत बंद हो जाती है।

 

एंटीहिस्टामाइन क्रीम: यदि खुजली बहुत ज्यादा हो, तो डॉक्टर की सलाह से ओटीसी हाइड्रोकार्टिसोन (Hydrocortisone) या कोई हल्की एंटीहिस्टामाइन क्रीम  (Antihistamine Cream) लगाई जा सकती है जो हिस्टामाइन के प्रभाव को सीधे रोक देती है।

 

डॉक्टर के पास कब जाएं?

आमतौर पर मच्छर के काटने के निशान 2 से 3 दिनों में खुद ही ठीक हो जाते हैं। लेकिन यदि आपको काटने वाली जगह पर अत्यधिक दर्द, मवाद/ पस, लगातार बढ़ता लाल घेरा, या फिर बुखार, सिरदर्द और ठंड लगने जैसे लक्षण महसूस हों, तो यह डेंगू, मलेरिया या चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

 

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भारत को खेती-किसानी और फर्टिलाइजर (उर्वरक) के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने आज एक बड़ा फैसला लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया-2026 (NIPU-2026) को मंजूरी दे दी गई है। इस नई नीति के तहत देश में 8 से 9 नए यूरिया प्लांट स्थापित करने का रास्ता साफ हो गया है। इससे भारत की आयातित (इंपोर्टेड) यूरिया पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि इस नई निवेश नीति से देश में सालाना लगभग 1 करोड़ मीट्रिक टन (10 मिलियन टन) नई यूरिया उत्पादन क्षमता जुड़ेगी।

यूरिया का मौजूदा गणित: मांग, उत्पादन और 25% का गैप

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने देश में यूरिया की जरूरत और उत्पादन के मौजूदा आंकड़ों को साझा करते हुए बताया कि नई नीति की जरूर क्यों पड़ी। अभी भारत में यूरिया की कुल मांग 40 मिलियन टन है। इसके मुकाबले घरेलू उत्पादन क्षमता लगभग 30 मिलियन टन (वर्तमान घरेलू उत्पादन क्षमता करीब 26.9 मिलियन टन) है। मांग और आपूर्ति के बीच इस 10 मिलियन टन के अंतर (सप्लाई गैप) को पूरा करने के लिए भारत को हर साल भारी मात्रा में यूरिया का आयात करना पड़ता है। यह गैप कुल मांग का लगभग 25 प्रतिशत है। देश में यूरिया की आवश्यकता में हर साल 5 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में यह नई नीति देश की संपूर्ण यूरिया आवश्यकता को स्थानीय स्तर पर पूरा करने में मदद करेगी।

प्राकृतिक गैस आधारित होंगे 8-9 नए प्लांट, प्रस्ताव तैयार

सरकार के अनुसार नई निवेश नीति के तहत जिन 8-9 नए यूरिया प्लांटों की स्थापना की जाएगी वे प्राकृतिक गैस आधारित होंगे। इस परियोजना के लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की तरफ से प्रस्ताव मिल चुके हैं। इससे पहले लागू की गई न्यू इन्वेस्टमेंट पॉलिसी (NIP)-2012 के तहत पिछले एक दशक में देश में छह नए यूरिया प्लांट शुरू किए गए थे। इनमें से चार प्लांट सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के संयुक्त उद्यम के माध्यम से और दो प्लांट निजी फर्मों द्वारा स्थापित किए गए थे। इससे यूरिया के आयात पर निर्भरता काफी कम हुई थी। अब NIPU-2026 इसी नीति का एक विस्तारित रूप है।

नीति के 3 मजबूत स्तंभ

कंपनियों और निवेशकों को आकर्षित करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए इस नई नीति को तीन मुख्य स्तंभों पर तैयार किया गया है:

लागत संरचना का संशोधन (पारदर्शिता): सब्सिडी की गणना को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए इसमें निश्चित लागत और परिवर्तनीय लागत को पूरी तरह से अलग-अलग कर दिया गया है।

12-16% रिटर्न की गारंटी: यूरिया प्लांट लगाने वाली कंपनियों के लिए इक्विटी पर 12 से 16 प्रतिशत का सुनिश्चित रिटर्न तय किया गया है।

विदेशी मुद्रा जोखिम से सुरक्षा: विदेशी मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने के लिए व्यवस्था की गई है। इसके तहत चार साल के बाद तत्कालीन विनिमय दरों के आधार पर निश्चित लागतों को रुपये में परिवर्तित कर दिया जाएगा।

₹250 करोड़ की बड़ी बचत: सरकार के मुताबिक नीति में किए गए इन सुधारात्मक बदलावों से प्रत्येक यूरिया प्लांट के लिए 250 करोड़ रुपये से अधिक की बचत होने की उम्मीद है।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों से सुरक्षित रहेंगे भारतीय किसान

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सरकार की व्यापक उर्वरक रणनीति को रेखांकित करते हुए भरोसा दिलाया कि वैश्विक स्तर पर फर्टिलाइजर की कीमतों में आने वाले उछाल और उतार-चढ़ाव से भारतीय किसानों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। सरकार द्वारा लगातार दी जा रही सब्सिडी सहायता के माध्यम से किसानों पर वैश्विक कीमतों के बढ़ने का कोई असर नहीं पड़ने दिया गया है और आगे भी उन्हें यह सुरक्षा मिलती रहेगी।

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विराट कोहली का एक और रोहित शर्मा का एक और Failure, क्या होगा आगे?

कल इंग्लैंड के खिलाफ भारत को जीत मिली लेकिन विराट कोहली और रोहित शर्मा ने अपने विकेट पहले दस ओवर में फेंक दिए। रोहित शर्मा को 21 गेंदों में 11 रन पर सैम करन ने अपना शिकार बनाया और विराट कोहली को जोफ्रा आर्चर ने 5 रनों पर पगबाधा कर दिया। इन दोनों की बल्लेबाजी के बाद लोगों में चर्चा शुरु हो गई है कि विश्वकप तक इनमें से कौन अपनी जगह बचा पाएगा।

रोहित ने कप्तानी गंवाने के बाद अपने आक्रामक रवैए पर अंकुश लगाया लेकिन उन्हें अभी तक इससे खास फायदा नहीं हुआ है।रोहित ने पिछले साल अक्टूबर से 13 वनडे मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने एक शतक और चार अर्धशतकों की मदद से 46.91 के औसत से 563 रन बनाए हैं।यह कोई मामूली रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन भारतीय ड्रेसिंग रूम के मौजूदा हालात ने रोहित के लिए लगभग हर मैच में अच्छा प्रदर्शन करना अनिवार्य बना दिया है।

अभी यह सोचना कल्पना से परे होगा कि रोहित अगले कुछ मैचों में असफल रहने पर 2027 में होने वाले वनडे विश्व कप की दौड़ से बाहर हो जाएंगे। लेकिन जिस तरह से हाल में टीम प्रबंधन ने सूर्यकुमार यादव और संजू सैमसन को खराब प्रदर्शन के कारण टीम से बाहर किया, वह 39 वर्षीय रोहित के लिए चेतावनी हो सकती है।

रोहित अब इस स्थिति में है कि वह किसी भी चीज को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ सकते हैं क्योंकि भारत के शीर्ष क्रम में इशान किशन के रूप में विकल्प मौजूद है।अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे एकदिवसीय मैच को छोड़ दे तो इस साल रोहित का प्रदर्शन औसत से नीचे रहा है।पहले मैच में वह 16 रन बनाकर रनआउट हो गए और दूसरे मैच में वह 39 गेंदों में 48 रन बनाकर बोल्ड हो गए।इससे पहले न्यूजीलैंड के खिलाफ पहली एकदिवसीय सीरीज में रोहित शर्मा फ्लॉप रहे और टीम को शुरुआत में बड़ा स्कोर नहीं दे सके। रोहित शर्मा 3 मैचों में 20 की औसत से 61 रन बना पाए। पूरी सीरीज में उन्होंने 9 चौके और 2 छक्के लगाए।पहले मैच में उन्होंने 29 गेंदो पर 26 रन, दूसरे मैच में उन्होंने 38 गेंदो में 24 रन और तीसरे मैच में 13 गेंदो में 11 रन बनाए।

रोहित के विपरीत एक अन्य सीनियर खिलाड़ी विराट कोहली फिटनेस और आंकड़ों दोनों के मामले में बेहतर स्थिति में हैं। कोहली ने पिछले साल अक्टूबर से 10 मैचों में 77.62 के औसत से 621 रन बनाए हैं, जिसमें तीन शतक और इतने ही अर्धशतक शामिल हैं। वह भी रोहित की तरह पहले मैच में नहीं चल पाए लेकिन टीम में उनके स्थान पर किसी तरह का खतरा नजर नहीं आ रहा है।

कुछ ऐसा ही ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और रोहित अगले 2 मैच में अर्धशतक जमाकर मैन ऑफ द सीरीज का खिताब पाए थे। इंग्लैंड की परिस्थितियों से विराट कोहली भली भांति परिचित है क्योंकि अब वह इस देश में ही रहते हैं। ऐसे में फैंस का मानना है कि कोहली अगले 2 मैच में बड़ी पारी खेलकर मैन ऑफ द सीरीज का अवार्ड पाएंगे।

सोना खरीदने वालों के लिए राहत! अब कीमतें ज्यादा नहीं बढ़ेंगी? जानिए 5 बड़े कारण

Gold Price Outlook: सोने में हालिया गिरावट के बाद थोड़ी रिकवरी जरूर आई है। लेकिन 2026 में जनवरी जैसा रिकॉर्ड हाई दोबारा देखने को मिले, इसकी संभावना फिलहाल कम दिख रही है। Fitch Solutions की रिसर्च यूनिट BMI ने 2026 के लिए सोने के औसत भाव का अनुमान 4,600 डॉलर से घटाकर 4,400 डॉलर प्रति औंस कर दिया है।

फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड 4026 डॉलर के आसपास है। इस हिसाब से गोल्ड में करीब ज्यादा से ज्यादा 9% उछाल का अनुमान है। रिपोर्ट का कहना है कि मजबूत डॉलर, कम होते वैश्विक तनाव और बेहतर होती अर्थव्यवस्था की वजह से सोने पर दबाव बना रह सकता है।

मजबूत डॉलर से सोना महंगा पड़ता है

जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तो दूसरे देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है। इससे मांग पर असर पड़ता है।

BMI का अनुमान है कि डॉलर इंडेक्स 98 से 102 के बीच रह सकता है। अगर यह बढ़कर 105 से 110 तक पहुंचा, तो सोने की तेजी पर ब्रेक लग सकता है।

ब्याज दरें घटने की उम्मीद कम

सोना ब्याज या डिविडेंड नहीं देता। इसलिए जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो निवेशक बॉन्ड जैसे विकल्पों की ओर ज्यादा जाते हैं।

BMI का मानना है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve 2026 के बाकी समय में ब्याज दरों में कटौती नहीं करेगा। दरें 3.75% पर बनी रह सकती हैं। ऐसे में सोने की मांग पर दबाव रह सकता है।

दुनिया की अर्थव्यवस्था संभल रही है

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद वैश्विक कारोबार और ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई है।

जब अर्थव्यवस्था बेहतर होती है, तो निवेशक सुरक्षित निवेश छोड़कर शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले एसेट्स की तरफ बढ़ते हैं। BMI ने 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ 2.4% रहने का अनुमान लगाया है।

कम होते वैश्विक तनाव का भी असर

पिछले एक साल में सोने की तेजी की बड़ी वजह वैश्विक तनाव रहे थे। लेकिन अब हालात पहले से कुछ शांत दिख रहे हैं।

BMI का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने से सोने को मिलने वाला ‘सेफ हेवन’ सपोर्ट भी कमजोर पड़ सकता है। अगर हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही सामान्य रहती है, तो सोने की मांग और घट सकती है।

महंगाई कम रही, तो मांग भी घट सकती है

महंगाई बढ़ने पर लोग अक्सर सोने में पैसा लगाते हैं। लेकिन अगर महंगाई काबू में रहती है, तो सोने की मांग भी कम हो सकती है।

BMI का कहना है कि ऊर्जा की कीमतों में नरमी से महंगाई का दबाव घट रहा है। अगर आगे भी यही स्थिति रही, तो सोने को मिलने वाला एक और बड़ा सहारा कमजोर पड़ सकता है।

क्या फिर भी सोना टूट जाएगा?

BMI ऐसा नहीं मानता। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कई केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं। इससे कीमतों को सपोर्ट मिलता रहेगा।

हालांकि, अगर भविष्य में Federal Reserve ब्याज दरें घटाता है या डॉलर कमजोर पड़ता है, तो सोना फिर 4,500 डॉलर प्रति औंस के ऊपर जा सकता है। वहीं, अगर डॉलर और मजबूत हुआ या बॉन्ड यील्ड बढ़ी, तो कीमतें 3,500 डॉलर प्रति औंस तक भी आ सकती हैं।

Gold Jewellery Price: 10 ग्राम का नेकलेस या 5 ग्राम की अंगूठी खरीदने जा रहे? जानिए कितना बनेगा बिल

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बड़ी चेतावनी! अगर आप भी पीते हैं सिगरेट या शराब, तो आज ही जान लें हेल्थ इंश्योरेंस का यह नियम वरना फंस जाएगा क्लेम!

Smoking Impact Health Insurance Premium & Claims: जब भी लोग अपने लिए कोई नया हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते हैं, तो उनका पूरा ध्यान पॉलिसी के कवरेज, प्रीमियम की लागत और कैशलेस अस्पतालों के नेटवर्क पर ही होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी देने से पहले एक और बेहद महत्वपूर्ण चीज पर पैनी नजर रखती हैं? वह है आपका लाइफस्टाइल।

स्मोकिंग और अत्यधिक शराब पीने जैसी आदतें इंश्योरेंस कंपनियों के लिए जोखिम का आकलन करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। अधिकांश लोगों को यह अंदाजा नहीं होता कि ये आदतें प्रीमियम की कीमतों और पॉलिसी की शर्तों को कितना प्रभावित कर सकती हैं। आइए समझते हैं कि सिगरेट और शराब की लत से आपके हेल्थ इंश्योरेंस पर क्या असर पड़ता है।

धूम्रपान करने वालों के लिए क्यों महंगा होता है इंश्योरेंस?

मेडिकल साइंस में धूम्रपान को कई गंभीर बीमारियों की मुख्य वजह माना गया है। सिगरेट पीने से दिल की बीमारी, स्ट्रोक, कैंसर और सांस से जुड़ी कई खतरनाक बीमारियां होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

चूंकि धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के बीमार होने की संभावना गैर-धूम्रपान करने वालों से अधिक होती है, इसलिए इंश्योरेंस कंपनियां उनसे समान कवरेज के लिए भी ज्यादा प्रीमियम वसूलती हैं।

कई मामलों में कंपनियां पॉलिसी जारी करने से पहले मेडिकल टेस्ट कराने की मांग भी कर सकती हैं। यह एक्स्ट्रा लागत आपकी उम्र, पहले से मौजूद बीमारियों और आप कितनी मात्रा में धूम्रपान करते हैं, इस पर निर्भर करती है।

शराब पीने की आदत का पॉलिसी पर क्या असर होता है?

अल्कोहल का सेवन करने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रीमियम हमेशा बढ़े, ऐसा जरूरी नहीं है। इंश्योरेंस कंपनियां रिस्क का आकलन करते समय आपकी ड्रिंकिंग फ्रीक्वेंसी और वॉल्यूम की जांच करती हैं। अत्यधिक शराब पीने से लिवर, दिल और शरीर के अन्य अंगों से जुड़ी गंभीर बीमारियां होने का जोखिम रहता है।

अगर मेडिकल इवैल्यूएशन में शराब की वजह से स्वास्थ्य जोखिम अधिक पाया जाता है, तो कंपनियां प्रीमियम की रकम को बढ़ा देती हैं। आप कितनी भी कम मात्रा में शराब पीते हों, इसका खुलासा फॉर्म में करना बेहद अनिवार्य है।

पॉलिसी लेते समय सच बताना क्यों है बेहद जरूरी?

हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते समय सबसे महत्वपूर्ण नियम है पूरी ईमानदारी। प्रपोजल फॉर्म भरते समय आवेदकों को तंबाकू, धूम्रपान और शराब के सेवन से जुड़ी सभी आदतों का बिल्कुल सही-सही जानकारी देना चाहिए।

अगर कोई निवेशक अपनी इन आदतों को छुपाता है, तो भविष्य में क्लेम के समय बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। गैर-प्रकटीकरण की स्थिति में कंपनियां क्लेम को रोककर मामले की गहन जांच शुरू कर देती हैं।

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शुरुआत में ही सही और पूरी जानकारी देने से पॉलिसी सही शर्तों पर जारी होती है, जिससे भविष्य में क्लेम सेटलमेंट के दौरान किसी भी तरह के विवाद या क्लेम रिजेक्ट होने की संभावना खत्म हो जाती है।

क्या स्मोकिंग या शराब पीने वालों का क्लेम रिजेक्ट हो जाता है?

केवल स्मोकिंग या शराब पीने की आदत होने की वजह से ही आपका क्लेम खारिज नहीं किया जाता है। असल समस्या तब आती है जब आपने पॉलिसी लेते समय इस बात को छिपाया हो। अगर आपने आवेदन के दौरान अपनी आदतों की बिल्कुल सटीक जानकारी दी है और आप पॉलिसी के नियमों व शर्तों का पालन कर रहे हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी बिना किसी रुकावट के आपके क्लेम को पास करेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. क्या धूम्रपान करने वालों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम हमेशा ज्यादा होता है?

जवाब: हां, अधिकांश मामलों में ऐसा ही होता है। धूम्रपान की वजह से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के कारण कंपनियों की नजर में ऐसे लोग ‘हाई-रिस्क’ केटेगरी में आते हैं, जिससे उनका प्रीमियम बढ़ जाता है।

2. क्या कभी-कभार शराब पीने से भी प्रीमियम पर असर पड़ता है?

जवाब: इसका सीधा असर इस बात पर निर्भर करता है कि आपके शराब पीने की मात्रा से आपके बीमार होने की संभावना कितनी बढ़ रही है। हालांकि, इसकी जानकारी देना हर हाल में जरूरी है।

3. क्या क्लेम के समय धूम्रपान की आदत छिपाना भारी पड़ सकता है?

जवाब: बिल्कुल, अगर क्लेम के दौरान यह पाया गया कि आपने अपनी इस आदत को कंपनी से छिपाया था, तो आपकी क्लेम प्रक्रिया बेहद जटिल हो सकती है और क्लेम रिजेक्ट भी हो सकता है।

Gold Jewellery Price: 10 ग्राम का नेकलेस या 5 ग्राम की अंगूठी खरीदने जा रहे? जानिए कितना बनेगा बिल

Gold Jewellery Price: सोने की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। ऐसे में अगर आप शादी, त्योहार या निवेश के लिए ज्वेलरी खरीदने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ गोल्ड का रेट जानना काफी नहीं है। दुकान पर जो बिल बनता है, उसमें सोने की कीमत के साथ मेकिंग चार्ज और GST भी जुड़ता है। यही वजह है कि कई बार ₹1.30 लाख का सोना खरीदने पर बिल ₹1.50 लाख के करीब पहुंच जाता है।

अगर आज आप 10 ग्राम का नेकलेस या 5 ग्राम की अंगूठी बनवाने जाते हैं, तो जेब से कुल कितना पैसा निकल सकता है? आइए आसान हिसाब से समझते हैं।

पहले जानिए आज का रेट

दिल्ली में 15 जुलाई को 24 कैरेट सोने का भाव (Gold Price Today) ₹1,42,940 प्रति 10 ग्राम है। वहीं, 22 कैरेट का ₹1,31,040 प्रति 10 ग्राम और 18 कैरेट का ₹1,07,240 प्रति 10 ग्राम है।

हालांकि, बाजार में बिकने वाले ज्यादातर नेकलेस, अंगूठियां और दूसरी ज्वेलरी 22 कैरेट या 18 कैरेट सोने से बनाई जाती हैं। इसलिए आगे का पूरा हिसाब 22 कैरेट सोने की कीमत के आधार पर समझते हैं।

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10 ग्राम का नेकलेस का खर्च?

मान लीजिए आपने 10 ग्राम का सिंपल नेकलेस पसंद किया। सिर्फ सोने की कीमत ₹1,31,040 होगी। अब इसमें मेकिंग चार्ज जुड़ता है। अगर ज्वेलर 10% मेकिंग चार्ज लेता है, तो यह करीब ₹13,100 बैठेगा। इसके बाद कुल रकम पर 3% GST लगेगा, जो करीब ₹4,300 होगा।

यानी 10 ग्राम का नेकलेस बनवाने पर आपका कुल बिल करीब ₹1.48 लाख बन सकता है। अगर आपने भारी डिजाइन वाला नेकलेस चुना और मेकिंग चार्ज 20% हुआ, तो यही बिल ₹1.60 लाख के आसपास पहुंच सकता है।

5 ग्राम की अंगूठी का बिल?

अब मान लीजिए आप 5 ग्राम की सोने की अंगूठी बनवा रहे हैं। 5 ग्राम 22 कैरेट सोने की कीमत करीब ₹65,520 होगी। अगर मेकिंग चार्ज 10% है, तो इसमें करीब ₹6,550 जुड़ जाएंगे। इसके बाद GST जोड़ने पर कुल बिल करीब ₹74,200 तक पहुंच सकता है।

अगर अंगूठी का डिजाइन ज्यादा बारीक या स्टोन वाला है, तो मेकिंग चार्ज बढ़ सकता है। ऐसे में कीमत ₹78,000 से ₹80,000 तक भी जा सकती है।

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आखिर बिल इतना ज्यादा क्यों बनता है?

बहुत से लोगों को लगता है कि दुकान पर वही कीमत देनी होगी, जो अखबार या वेबसाइट पर सोने के भाव में दिखाई जा रही है। लेकिन ऐसा नहीं होता। गोल्ड रेट सिर्फ धातु की कीमत होती है।

ज्वेलरी बनाने की मजदूरी यानी मेकिंग चार्ज अलग से देना पड़ता है। इसके बाद पूरे बिल पर 3% GST भी लगता है। कुछ ज्वेलर्स वेस्टेज चार्ज भी जोड़ते हैं। इसलिए अंतिम बिल हमेशा गोल्ड रेट से ज्यादा होता है।

  • खरीदने से पहले ये सवाल जरूर पूछें
  • मेकिंग चार्ज कितने प्रतिशत है?
  • क्या वेस्टेज अलग से लगेगा?
  • GST किस रकम पर लगेगा?
  • क्या ज्वेलरी BIS हॉलमार्क है?
  • पुराना सोना एक्सचेंज करने पर क्या रेट मिलेगा?

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Direct vs Regular: एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम, फिर भी एक को मिला ₹50 लाख ज्यादा रिटर्न! समझें एक्सपेंस रेशियो का असली खेल

Direct vs Regular Mutual Funds Comparison: म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले हर निवेशक के सामने दो विकल्प होते हैं- डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान। हाल ही में ऑनलाइन ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म ग्रो द्वारा रेगुलर म्यूचुअल फंड सेगमेंट में ‘MF Prime’ सर्विस लॉन्च करने के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। यह नई सर्विस उन निवेशकों के लिए है जो अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने और सही फंड चुनने के लिए एक्सपर्ट्स की सलाह चाहते हैं।

वहीं, जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ का कहना है कि खुद से निवेश करने वाले निवेशकों के लिए डायरेक्ट प्लान एक ‘नो-ब्रेनर’ यानी सबसे आसान और समझदारी भरा विकल्प है, क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन नहीं देना पड़ता। उन्होंने बताया कि उनके प्लेटफॉर्म ‘कॉइन’ पर निवेशकों ने कमीशन न देकर अब तक हजारों करोड़ रुपये बचाए हैं। आइए समझते हैं कि डायरेक्ट और रेगुलर फंड्स में क्या अंतर है और कैसे डायरेक्ट प्लान आपके पोर्टफोलियो में ₹50 लाख तक एक्स्ट्रा जोड़ सकता है।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

इन दोनों प्लान्स में सबसे बड़ा और मुख्य अंतर एक्सपेंस रेशियो यानी फंड मैनेजमेंट के खर्च का होता है:

डायरेक्ट प्लान: इसमें निवेशक सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) यानी म्यूचुअल फंड हाउस से यूनिट्स खरीदता है। इसमें बीच में कोई ब्रोकर, एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता, इसलिए कोई कमीशन नहीं कटता। नतीजा यह होता है कि इसका एक्सपेंस रेशियो काफी कम होता है।

रेगुलर प्लान: इसमें निवेशक किसी डिस्ट्रीब्यूटर, ब्रोकर या फाइनेंशियल एडवाइजर के माध्यम से निवेश करता है। फंड हाउस इन मध्यस्थों को कमीशन देता है, जिसे एक्सपेंस रेशियो में जोड़ दिया जाता है। इसलिए, रेगुलर प्लान का खर्च डायरेक्ट प्लान से थोड़ा ज्यादा होता है।

रिटर्न पर असर: अगर दो अलग-अलग निवेशक एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम में एक जितनी रकम और एक जितनी अवधि के लिए निवेश करते हैं, तो डायरेक्ट प्लान वाले निवेशक को कम लागत के कारण रेगुलर प्लान की तुलना में थोड़ा अधिक रिटर्न मिलेगा।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

लॉन्ग टर्म में कैसे जुड़ सकते हैं ₹50 लाख एक्स्ट्रा?

दिखने में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के एक्सपेंस रेशियो में महज 0.50% से 1% तक का ही अंतर नजर आता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर ब्याज के कारण यह मामूली अंतर एक विशाल रकम में बदल जाता है।

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मान लीजिए कि आप 30 साल के लिए एक बड़ी रकम निवेश करते हैं। रेगुलर प्लान में जहां आपका डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन कटता रहेगा, वहीं डायरेक्ट प्लान में वह बचा हुआ 1% कमीशन हर साल आपके पोर्टफोलियो में दोबारा निवेश होता रहेगा। 30 साल की लंबी अवधि में यही बची हुई रकम कंपाउंड होकर आपके कुल फंड में ₹30 लाख से ₹50 लाख तक का अतिरिक्त मुनाफा जोड़ सकती है।

क्या कम खर्च का मतलब हमेशा बेहतर रिटर्न है?

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कम एक्सपेंस रेशियो देखकर डायरेक्ट प्लान चुन लेना ही समझदारी नहीं है, क्योंकि निवेश में सबसे बड़ा रोल इन्वेस्टर बिहेवियर का होता है।

म्युचुअल फंड रिसर्च फर्म फंड्सइंडिया के रिसर्च सीनियर मैनेजर जीरल मेहता के मुताबिक, ‘आंकड़े बताते हैं कि कई बार फंड्स जितना रिटर्न कमा कर देते हैं, आम निवेशकों को उतना रिटर्न नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह है कि निवेशक बाजार में गिरावट आने पर डरकर अपने पैसे निकाल लेते हैं या फिर बाजार के बहुत ऊंचे होने पर निवेश करते हैं।’

इसे ‘बिहेवियर गैप’ कहा जाता है। यह गैप डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के खर्चों के अंतर से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। एक डायरेक्ट प्लान का निवेशक अगर 30 साल के सफर में सिर्फ दो बार भी गलत समय पर बाजार से बाहर निकलता है, तो वह डायरेक्ट प्लान से मिलने वाले सारे कॉस्ट-बेनिफिट को पूरी तरह बर्बाद कर देता है।

फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका और सही चुनाव

यहीं पर एक रेगुलर प्लान और फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका अहम हो जाती है:

रेगुलर प्लान किसके लिए सही है? – ऐसे निवेशक जिन्हें मार्केट की गहरी समझ नहीं है, जो उतार-उढ़ाव देखकर घबरा जाते हैं और जिन्हें समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा और रीबैलेंसिंग के लिए किसी गाइड की जरूरत होती है, उनके लिए रेगुलर प्लान बेहतर है। यहां थोड़ा ज्यादा एक्सपेंस रेशियो देना अंततः फायदेमंद साबित होता है क्योंकि एडवाइजर आपको गलत फैसले लेने से रोकता है।

डायरेक्ट प्लान किसके लिए सही है? – अगर आप एक ‘डू-इट-योरसेल्फ’ (DIY) इन्वेस्टर हैं, जो खुद रिसर्च कर सकते हैं, बाजार की गिरावट में शांत रह सकते हैं और बिना किसी बाहरी मदद के अनुशासित रहकर निवेश जारी रख सकते हैं, तो डायरेक्ट प्लान आपके लिए सबसे ज्यादा कॉस्ट-इफेक्टिव और मुनाफेमंद साबित होगा।

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