कई नेताओं के प्रयास जारी हैं

भाजपा के कई वरिष्ठ नेता संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। जिनको संगठन में या सरकार में जगह मिल गई है वे भी प्रयास कर रहे हैं। कई मुख्यमंत्री इस कोशिश में लगे हैं तो कई केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री भी प्रयास कर रहे हैं। हालांकि संसदीय बोर्ड को लेकर अब पहले वाली बात नहीं है। पहले इसका सदस्य होने का मतलब था कि आप शीर्ष नेतृत्व हैं। लेकिन पिछली बार जो बदलाव हुए थे उसमें जिन नए लोगों को शामिल किया गया था उनमें एक बीएस येदियुरप्पा को छोड़ कर कोई अपने राज्य के भी शीर्ष 10 नेताओं में होने का दावा नहीं कर सकता। संसदीय बोर्ड का सदस्य बन जाने के बाद भी उनका राजनीतिक कद जस का तस रहा था। वैसे तो अब भाजपा के पदाधिकारियों या केंद्रीय मंत्रियों की भी हैसियत पहले वाली नहीं रह गई है। लेकिन भाजपा के जो नेता अपने दम पर बड़े हैं वे जरूर अपना कद बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

तभी इस बात की बहुत चर्चा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस संसदीय बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं। दोनों अपने अपने स्तर पर जोर लगा रहे हैं। सीएम रहते शिवराज सिंह चौहान संसदीय बोर्ड के सदस्य बने थे। लेकिन उसके बाद किसी सीएम को मौका नहीं मिला है। हालांकि जरूरी नहीं है कि दो सबसे मजबूत मुख्यमंत्रियों में से किसी को जगह मिले। हो सकता है कि रेखा गुप्ता शामिल हो जाएं, जिससे महिला औ मुख्यमंत्री दोनों कोटा पूरा हो जाए। वैसे शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा और नायब सिंह सैनी के नाम की भी चर्चा है। यह भी संभव है कि पर्ची के जरिए सीएम बने किसी नेता को शामिल कर लिया जाए।

बहरहाल, आदिवासी के तौर पर असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नाम की चर्चा है। संगठन महामंत्री के अलावा एक और महामंत्री इसमें शामिल हो सकता है। विनोद तावड़े सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। दलित चेहरे के तौर पर यूपी, बिहार का कोई जाटव या रविदास समाज का नेता हो सकता है। केंद्रीय मंत्रियों में शिवराज सिंह चौहान और पीयूष गोयल की चर्चा हो रही है। अल्पसंख्यक के रूप में पंजाब से किसी सिख नेता को भी जगह मिलने की चर्चा है।

यूपी का राज्यपाल नहीं बदलेगा!

छह राज्यों के राज्यपाल बदल गए हैं। दो राज्यपालों के राजभवन बदले हैं, जबकि चार नए राज्यपाल नियुक्त किए गए हैं। पिछले कई दिनों से राज्यपाल और उप राज्यपाल बदले जाने की चर्चा चल रही थी। लेकिन जिस राज्य में बदलाव की सबसे ज्यादा चर्चा थी वहां बदलाव नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश के राजभवन में ऐसा लग रहा है कि अभी आनंदी बेन पटेल रहेंगी। वे पांच साल से ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। उससे पहले दो साल वे मध्य प्रदेश की भी राज्यपाल रही थीं। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटने के कुछ दिन बाद ही वे राज्यपाल बनी थीं और पिछले सात साल से ज्यादा समय से राज्यपाल हैं।

पिछले महीने जब वे लंबी छुट्टी पर गईं तो कहा गया कि अब उनकी विदाई तय हो गई है। उससे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर में जाकर वहां शिक्षा व्यवस्था और यूनिवर्सिटी के हालात पर बहुत तीखी टिप्पणी की थी। उससे भी उनके हटने का अंदाजा लगाया जा रहा था। लेकिन वे 10 दिन की छुट्टी पर रहीं और किसी अन्य राज्यपाल को उत्तर प्रदेश का प्रभार नहीं दिया गया। उन्होंने लौट कर कार्यभार संभाल लिया। जब वे छुट्टी पर गई थीं तब सूत्रों के हवाले से खबर आ रही थी कि किसी बड़े ब्राह्मण नेता को लखनऊ राजभवन में लाया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब चार महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। देखना है कि आनंदी बेन पटेल ही चुनाव तक रहती हैं या कोई नया चेहरा लाया जाता है।

अखिलेश की चुनौती का क्या मतलब

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनौती दी। पिछले दिनों अखिलेश अयोध्या गए तो उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर हिम्मत है तो योगी आदित्यनाथ अयोध्या से लड़ कर दिखाएं। ध्यान रहे पिछले कुछ समय से यह चलन हो गया है कि जिन राज्यों में विधान परिषद है वहां मुख्यमंत्री आमतौर पर उसी के सदस्य होते हैं। बिहार में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहते विधान परिषद के ही सदस्य रहे। ऐसे ही योगी आदित्यनाथ भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े हैं। वे विधान परिषद के सदस्य हैं। अखिलेश यादव भी जब मुख्यमंत्री थे तब विधान परिषद में ही थे।

अखिलेश ने सिर्फ एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ा था, 2022 में कन्नौज सीट से। तब सपा को सरकार बनने की उम्मीद थी। लेकिन जब सरकार नहीं बनी तो अखिलेश ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। बिना मुख्यमंत्री बने सिर्फ विधायक या नेता विपक्ष रहना उनको अपने कद के अनुरूप नहीं लगा। इस बार पता नहीं वे विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे या नहीं। लेकिन योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ने की चुनौती दी। जब योगी ने चुनौती स्वीकार कर ली और अखिलेश को अपने सामने आकर लड़ने को कहा कि अखिलेश पीछे हट गए। उन्होंने कहा कि कोई पीडीए प्रहरी ही योगी को हरा देगा। लेकिन अगर सचमुच अखिलेश चुनाव का माहौल बनाना चाहते हैं तो उन्हें योगी को लड़ने के लिए मजबूर करना चाहिए और खुद उनके सामने लड़ना चाहिए। अरविंद केजरीवाल ने ऐसा करके ही 2013 में शीला दीक्षित को हराया था। इस साल शुभेंदु अधिकारी भी ममता बनर्जी के गढ़ में जाकर लड़े थे।

मोदी के नाम पर होगा जेवर एयरपोर्ट!

लखनऊ। नोएडा से सटे जेवर में बने नए हवाईअड्डे का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा जाएगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को इसका ऐलान किया। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जेवर हवाईअड्डे का नाम प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर रखने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश की कैबिनेट की बैठक में पास कर दिया गया है। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि नाम बदलने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। वहां से मंजूरी के बाद नाम बदल जाएगा।

गौरतलब है कि अगर जेवर एयरपोर्ट का नाम मोदी के नाम पर होता है तो यह दूसरा मामला होगा, जब किसी सार्वजनिक प्रतिष्ठान का नाम मोदी के नाम पर रखा जाएगा। इससे पहले 24 फरवरी, 2021 को गुजरात के अहमदाबाद में क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम किया गया था।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च 2026 को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण का उद्घाटन किया था। एयरपोर्ट के पहले चरण में 33 सौ एकड़ जमीन पर टर्मिनल और रनवे बनाए गए हैं। यहां से हर साल लगभग 1.2 करोड़ यात्री सफर करेंगे। इस पर 11 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में चार महीने के बाद चुनाव होने वाले हैं।

अयोध्या आकर भी अखिलेश यादव का ‘राम लला’ से परहेज! क्या कहते हैं रामनगरी के प्रबुद्धजन

अयोध्या आकर भी अखिलेश यादव का 'राम लला' से परहेज! क्या कहते हैं रामनगरी के प्रबुद्धजन

Akhilesh Yadav ayodhya visit

Akhilesh Yadav Ayodhya Visit: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गुरुवार को अयोध्या के कृष्णापुर खानपुर (रसूलाबाद) गांव पहुंचे। मौका था सपा सरकार में मंत्री रहे तेज नारायण पांडेय उर्फ ‘पवन पांडेय’ के आवास पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ का। इस अवसर पर उन्होंने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चेतावनी भी दे डाली। 

 

​अखिलेश ने व्यास पीठ का पूजन किया, कथा व्यास डॉ. राघवाचार्य जी महाराज से आशीर्वाद लिया और संतों द्वारा भेंट की गई गदा स्वीकार की। हालांकि, राम नगरी की पावन धरती पर कदम रखने के बावजूद राम जन्मभूमि मंदिर न जाने और राम लला के दर्शन न करने को लेकर अयोध्या के प्रबुद्ध वर्ग और संतों में गहरी नाराजगी है।

अखिलेश की सीएम योगी को चुनौती

​2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए इस दौरे के गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद, पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी ‘खब्बू’ समेत कई दिग्गज स्थानीय नेता मौजूद रहे। अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि विकास और एयरपोर्ट के नाम पर गरीबों व व्यापारियों को उजाड़ा गया है। उन्होंने वादा किया कि सपा सरकार बनने पर किसानों को सर्किल रेट का 6 गुना मुआवजा और 300 यूनिट मुफ्त बिजली दी जाएगी।

​

सपा प्रमुख ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधा ललकारते हुए कहा कि वे स्वयं अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाएं। उन्होंने दावा किया कि भाजपा को अयोध्या से लड़ने के लिए कोई नया प्रत्याशी तक नहीं मिल रहा है। राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे की चोरी के हालिया विवाद को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा।

​मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पलटवार

​दूसरी ओर, सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा प्रमुख को अयोध्या की चिंता करने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि सपा शासन के दौरान ही रामभक्तों पर गोलियां चलाई गई थीं और थानों-जेलों में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के आयोजनों पर रोक लगाई गई थी।

​राम सबके हैं, दूरी क्यों?

​अयोध्या आकर भी राम लला के दर्शन न करने पर स्थानीय नागरिकों, बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ​इक़बाल अंसारी (पूर्व पक्षकार, बाबरी मस्जिद) ने कहा कि अयोध्या धर्म की नगरी है और यहां से लोगों का अटूट विश्वास जुड़ा है। अखिलेश यादव को राम लला का दर्शन-पूजन जरूर करना चाहिए था, जिससे उन्हें ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ मिलता।

 

​प्रो. आशुतोष सिंह ने कहा कि जब अखिलेश जी ने ही राम मंदिर में चंदा चोरी का प्रकरण उठाया था, तो उन्हें मंदिर आकर देखना चाहिए था कि व्यवस्थाएं कैसी चल रही हैं। डॉ. वंदना जायसवाल ने कहा कि भगवान राम किसी एक व्यक्ति या दल के नहीं हैं, राम तो सबके हैं। अयोध्या आने पर उन्हें मंदिर जरूर जाना चाहिए था। डॉ. अविनाश तिवारी ने कहा कि राम मंदिर किसी सरकार का नहीं है। जनता का मान रखने के लिए उन्हें राम लला से दूरी नहीं बनानी चाहिए थी।

 

​डॉ. मनीष सिंह ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें जनता की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए था और मंदिर जाकर व्यवस्थाओं का जायजा लेना चाहिए था। ​डॉ. आशीष प्रताप सिंह (अध्यक्ष, शिक्षक संघ) ने कहा कि राम मंदिर कोई राजनीतिक स्थान नहीं है। राम लला के दर्शन करने से उन्हें लाभ ही होता, यह बेहद दुखद है।

​

डॉ. रमेश प्रताप सिंह ने कहा कि एक यदुवंशी होने के नाते उन्हें राम मंदिर जाना ही चाहिए था। दर्शन न करने से ऐसा प्रतीत होता है कि चंदा चोरी का मुद्दा उन्होंने सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए उठाया था। ​डॉ. समरेन्द्र बहादुर सिंह का कहना है कि सपा की छवि राम मंदिर आंदोलन में खलनायक जैसी रही है। निर्माण के बाद आए बदलावों को देखने के बजाय उन्होंने केवल कमियां ढूंढने और इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया। डॉ. कुमुद रंजन ने कहा कि अयोध्या जैसी पवित्र भूमि पर आकर भगवान राम के द्वार न जाना अनुचित है। इस राजनीतिक रवैये का असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी का 25 अक्टूबर को काशी में जेन-जी संवाद प्रस्तावित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 25 अक्टूबर को काशी में हजारों युवाओं के साथ जेन-जी संवाद कार्यक्रम प्रस्तावित है। इसके आयोजन की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। सूत्रों के अनुसार, कार्यक्रम काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) अथवा संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित किए जाने की तैयारी है।

प्रस्तावित कार्यक्रम में 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के करीब 30 हजार युवाओं के शामिल होने की संभावना है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जिला और महानगर इकाइयों के साथ ही क्षेत्रीय संगठन भी आयोजन की तैयारियों में जुटे हैं। काशी में 22, 24 और 25 अक्टूबर को भव्य एयर शो भी प्रस्तावित है।

नमो घाट पर आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई गणमान्य लोगों के शामिल होने की संभावना है। एयर शो की तैयारियों के तहत नमो घाट पर छह बेड का अस्थायी अस्पताल बनाया जा रहा है, जबकि सुरक्षा व्यवस्था के दृष्टिगत डोमरी में वॉच टावर भी बनाया जा रहा है।

Also Read : प्रधानमंत्री मोदी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर धामी ने काशी विश्वनाथ मंदिर में की विशेष पूजा

एसपीजी और एटीएस समेत विभिन्न सुरक्षा एजेंसियां तैयारियों में जुटी हैं। प्रस्तावित एयर शो में सेना के विभिन्न प्रकार के विमान और एयरक्राफ्ट करीब 90 मिनट तक हवाई करतब प्रस्तुत करेंगे। गंगा के दोनों तटों से इस भव्य आयोजन को देखने के लिए करीब 30 लाख दर्शकों के पहुंचने की संभावना है। इसे देखते हुए पुलिस आयुक्त मोहित अग्रवाल ने अधिकारियों को भीड़ के दबाव वाले संभावित स्थानों को चिह्नित कर विस्तृत क्राउड मैनेजमेंट प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं।

पुलिस आयुक्त ने सभी प्रमुख घाटों और दर्शक स्थलों पर प्रवेश एवं निकास के लिए अलग-अलग मार्ग, बैरिकेडिंग, होल्डिंग एरिया, क्यू मैनेजमेंट तथा पैदल आवागमन के लिए निर्धारित मार्ग बनाने के निर्देश दिए हैं।

Pic Credit : UNI

मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के तौर पर सरकार के मुखिया रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर बुधवार को यहां श्री विनायक मंदिर में पूजा अर्चना की और देश की खुशहाली की कामना की।

श्री मोदी आज सुबह सबसे पहले राष्ट्रीय राजधानी के सरोजनी नगर स्थित श्री विनायक मंदिर पहुंचे और उन्होंने विध्नहर्ता की पूजा-अर्चना की। श्री मोदी ने सोशल मीडिया में एक पोस्ट में लिखा, “आज नई दिल्ली के श्री विनायक मंदिर में पूजा-अर्चना की। भगवान श्री गणेश से देशभर के अपने परिवारजनों की सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की। विघ्नहर्ता की कृपा से सबका कल्याण हो और देश निरंतर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।

Also Read : अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन की जीत ही देश को दिवालिया होने से बचा सकती है: ट्रंप

उल्लेखनीय है कि श्री मोदी सात अक्टूबर, 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। तब से लेकर आज तक वे लगातार सत्ता में रहे हैं- पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और 2014 से प्रधानमंत्री के रूप में। आज ठीक 25 वर्ष पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत कई नेताओं ने उन्हें बधाई दी और उनके नेतृत्व, जनसेवा तथा विकसित भारत के संकल्प की सराहना की।

Pic Credit : UNI

UP Shiksha Mitra: दिवाली से पहले यूपी के 1.27 लाख शिक्षामित्रों को बड़ा तोहफा, इस बार डबल से ज्यादा आएगी सैलरी

UP Shiksha Mitra Mandeya 2026: उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के लिए दिवाली से पहले बड़ी खुशखबरी आई है। सीएम योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने बढ़े हुए मानदेय के भुगतान के लिए ₹460.23 करोड़ का बजट जारी कर दिया है। इसके बाद प्रदेश के 1,27,841 शिक्षामित्रों को सितंबर और अक्टूबर महीने का बढ़ा हुआ मानदेय मिलने का रास्ता साफ हो गया है। खास बात यह है कि दोनों महीनों की सैलरी एक साथ उनके बैंक खातों में भेजी जा सकती है।

₹10 हजार से बढ़कर ₹18 हजार हुआ मानदेय

सरकार ने शिक्षामित्रों के मानदेय को ₹10,000 से बढ़ाकर ₹18,000 प्रति माह करने की घोषणा की थी। अब सितंबर और अक्टूबर के बढ़े हुए मानदेय के भुगतान के लिए बजट जारी किया गया है। यानी पात्र शिक्षामित्रों को दो महीने के लिए कुल ₹36,000 तक का भुगतान मिल सकता है, जो पहले के दो महीने के ₹20,000 मानदेय से ₹16,000 अधिक है।

सभी जिलों को भेजा गया बजट

NDTV की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा विभाग की ओर से जारी बजट सभी जिलों को भेज दिया गया है। महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) को भुगतान प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि शिक्षामित्रों के खातों में राशि भेजने में किसी तरह की लापरवाही न हो।

दूसरे कर्मचारियों को भी मिल सकता है दिवाली गिफ्ट

शिक्षामित्रों के बाद यूपी सरकार के अन्य कर्मचारियों को भी दिवाली से पहले राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसके अलावा कर्मचारियों को करीब ₹3,000 से 7,000 रुपये तक बोनस मिलने की भी संभावना है। इससे प्रदेश के लाखों कर्मचारी और पेंशनर्स राहत की सांस लेंगे।

स्थायी नौकरी की मांग अब भी जारी

मानदेय बढ़ने के बावजूद शिक्षामित्रों की स्थायी रोजगार की मांग खत्म नहीं हुई है। शिक्षामित्र लंबे समय से नियमितीकरण और शिक्षक भर्ती में उचित लाभ दिए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे वर्षों से सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। लेकिन उन्हें स्थायी नियुक्ति या विशेष TET में उचित अवसर नहीं दिया जा रहा।

ये भी पढ़ें- France protests: ‘फ्रांस पर कब्जा करना चाहता है इस्लाम’; ट्रंप ने पेरिस में छात्रों के प्रदर्शन को बताया बेकाबू माइग्रेशन का नतीजा

हालांकि, हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों को विशेष TET में शामिल होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। शिक्षामित्रों का आरोप है कि सालों की सेवा के बावजूद उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। उन्हें नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त वेटेज या अवसर नहीं मिल रहा है। इस नाराजगी को देखते हुए योगी सरकार की तरफ से आगामी यूपी चुनाव से पहले शिक्षामित्रों को मनाने की कोशिश जारी है।

प्रधानमंत्री जीत तय मानता है, जनता धोखा देती है!

यह दिल्ली की सत्ता की पुरानी बीमारी है। सत्ता में बैठ कर प्रधानमंत्री को धीरे-धीरे विश्वास होने लगता है कि उसने भारत को समझ लिया है। जनता को पढ़ लिया है। किसे राशन चाहिए, किसे आरक्षण, किस जाति को क्या चाहिए, किस धर्म को किससे डराना है, किस लाभार्थी को कितने रुपये देने हैं और किस नारे से चुनाव जीतना है, इसका हिंसाब लगातार पकाया जाता है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह तो यों भी चौबीसों घंटे हिसाब बनाते है। इनकी सर्वे टीम, लगातार काम करती है। पार्टी, संघ संगठन अलग से सर्वे, फीडबैक देते है। दरबारी पूजा करते ही है तो प्रचारतंत्र से पूरे देश को मीडिया, सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम चौबीसों घंटे, सातों दिन खुद मोदी बताते है कि वे लोगों की भलाई के लिए कैसे दीन-रात अपना खून सूखा रहे है!

जवाहरलाल नेहरू को छोडकर हर प्रधानमंत्री भारत के मतदाताओं के साथ इसी विश्वास में जीया है कि जब इतना कर रहे है तो लोग उन्हे बदले में उन्हे ही वोट देंगे। न कि लोहिया की भीड, जनसंघ के नारों और समाजवाद को कोसने वाले स्वतंत्र पार्टी के उधमियों को। बावजूद इसके नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री को जनता ने तब भी सत्ता से बेदखल किया जब वे शाईनिंग इंडिया जैसी बातों में झूमते-झूमाते हुए थे।

ऐसा इंदिरा गांधी के साथ हुआ। राजीव गांधी, नरसिंह राव के साथ हुआ तो अटलबिहारी वाजपेयी के साथ भी हुआ। फिर दस वर्ष की मनमोहन सिंह सरकार के साथ हुआ। वजह हर बार एक नहीं थी। कहीं आंदोलन था, कहीं भ्रष्टाचार मुद्दा था, कहीं विपक्ष एक हुआ, कहीं महंगाई और स्थानीय असंतोष था। लेकिन हर बड़ी चुनावी हार में एक समानता जरूर थी। सत्ता को अपने बनाए गणित पर चुनावी मतगणना तक भरोसा था कि वे जीत रहे है। और मुझे पता है सरकारी खुफिया एजेंसियां भी ऐसे ही हिसाब, ऐसे मुगालतों में रही है।

सोचें, इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में क्या बाकी छोड़ा था? विपक्ष जेल में, प्रेस पर सेंसरशिप, प्रशासन सरकार के हाथ और प्रधानमंत्री की सत्ता अपने चरम पर। मगर 1977 में जब चुनाव हुआ तो कांग्रेस 154 सीटों पर रह गई। वही लावारिस जनता पार्टी ने 295 सीटें जीती। स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली, संजय गांधी अमेठी हार गए। जिस सत्ता के सामने देश खामोश दिखाई देता था, उसी खामोशी ने मतपेटी में उसका फैसला किया।

और राजीव गांधी! दिसंबर 1984 में किसे कल्पना थी कि नौजवान प्रधानमंत्री का चक्रवर्ती जनादेश पांच वर्ष भी नहीं टिकेगा? उन्होने 1984-85 में 414 सीटें जीती थीं। 1989 में उनकी कांग्रेस 197 सीटों पर रह गई।

भारत में हर बडी चुनावी हार सरकार, सत्ता के हर तरह के दुरूपयोग, आंतक, चुनावी धांधलियों, शाईनिंग इंडिया जैसे ढिढोरों के बावजूद हुई है। सोचे, किसने सोचा शाईनिंग नेतृत्व, शाईनिंग इंडिया के बावजूद प्रधानमंत्री वाजपेयी 2004 में सोनिया गांधी के आगे हारेंगे? कोई माने या न माने अन्ना, केजरीवाल के आंदोलनों, अपनी भारी-भरकम वर्चुअल कैंपेनिंग के बावजूद नरेंद्र मोदी को भी भरोसा नहीं था कि हिंदीभाषी इलाके में उनकी आंधी जैसे चुनाव परिणाम होंगे!

आगे 2024 के चुनाव में जो हुआ वह सामान्य नहीं था। ध्यान रहे ये चुनाव अयोध्या में राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद हुए थे। बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस उत्तरप्रदेश में भी कम सीटे मिली जहां रामजी का नगाड़ा घर-घर गूंजा था। भाजपा 303 से घटकर 240 सीटों पर सिमटी। गठबंधन से जरूर बहुमत बचा, लेकिन भाजपा अपना अकेला बहुमत तो खो बैठी थी।

तभी से नरेंद्र मोदी- अमित शाह मतदाताओं की सूचियों को सुधारने के नाम पर उन्हे कैसे मनमाफिक बनवाने के अभियान में जुटे है, इसके ढेरों किस्से, साक्ष्य अब जगजाहिर है। जीतने की ऐसी हठ से स्वभाविक सवाल है कि मोदी के रहते कुल मतदाताओं की संख्या में क्या संघ परिवार-भाजपा पचास प्रतिशत से ऊपर की संख्या वफादार वोटों, भक्तों की बनवा लेगै? आखिर इसके बिना तो लगातार चुनाव को गारंटीनुमा जीतना संभव नहीं है? क्या लोग ऐसा होने देंगे? गली-गली, घऱ-घर में किसी के नाम होने, किसी के कटे होने की वासत्विकताओं में क्या लोगों को जाहिर नहीं होगा कि वोटर लिस्ट की ऐसी गडबडी किसलिए? नतीजतन वही वही मौन सत्ता पलट क्रांति होगी जैसे इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी के खिलाफ हुई थी।

मगर प्रधानमंत्री ऐसे नहीं सोचता। वह सत्ता है तो मुमकिन के विश्वास में जीता होता है।

ऐसा आत्मविश्वास मैंने लालू यादव के समय के बिहार में देखा था तो एनटी रामराव, वीपीसिंह (राजा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ)। या कांसीराम-मायावती का हुंकारा-जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। सोचे वीपीसिंह, मायवती, लालू-राबडी यादव का गणित आधारित चक्रवर्तीय शासन कितनी पीड़ी फला-फूंला?

पुराने नेताओं और नरेंद्र मोदी की गणित में एक बुनियादी फर्क है। नरेंद्र मोदी ने अजैविक, दैवीय जन्म के विश्वास में हिंदुओं में अपना भक्ति आंदोलन बनाया है। बावजूद इसके जरा गौर करे कि इन कथित भगवानजी को भी चुनाव आयोग के जरिए वोटरलिस्ट का पुर्नलेखन करवाना पड रहा है। उसी बूते तो भगवानजी को विश्वास है, संघ-भाजपा के सत्ताभोगियों की तैयारियां है कि 2047 तक तो उनका राज पक्का है। 2034 तक मोदी, 2034 से 2043 तक अमित शाह और 2043 -2047 के सौ वर्षीय भारत के युगप्रवर्तक प्रधानमंत्री होंगे योगी आदित्यनाथ! कल्पना करें तब तक एक नंबर बन चुके चीन के आगे भारत के नेतृत्वकर्ता के चेहरे पर।

हां, गांठ बांधे रखे मोदी है तो सब संभव है। दरअसल हजार साला गुलामी में जीया हुआ, धड़कता हुआ भक्त हिंदू ऐसे ही सोचा करता है। यही हिंदू राष्ट्र का सत्य है और भविष्य की खामोख्याली है।

इसलिए उन बातों, उन वीडियों को नहीं देखे जो दो अक्टूबर को मुंबई में नौजवानों के विशाल हूजुम में मौजूद है या दिल्ली में मौजूद था। नौजवान जंतर-मंतर पर बैठ कर भले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले या ज्ञानेश कुमार का। प्रदर्शन कॉकरोचों का हो, आम आदमी-वामपंथियों का हो या कांग्रेस-ममता बनर्जी और विपक्षी गठजोड़ का, इन सबका नमोदी- शाह पर रत्ती भर असर नहीं होना है!

नोट रखे भारत में सत्ता प्रदर्शन नहीं देखती। स़डक का गुस्सा नहीं समझती। सत्ता हमेशा अपने आंकड़े देखती होती है। दिल्ली की सत्ता की खूबी है जो प्रधानमंत्री और उसके अनुचरों को सौ टका विश्वास दिलाए रहती है कि आप प्रधानमंत्री नहीं, भारत भाग्य विधाता हैं। हम जनता के लिए इतना कुछ तो कर रहे हैं। भारत अब शाइनिंग इंडिया है। आप माईबाप, हुजूर सभी को रोटी खिला रहे हैं। राशन दे रहे है। घर दिया। शौचालय दिया। गैस दी। राशन दिया। खाते में पैसा दिया। रामजी की ऊंगली पकड़ उन्हे राममंदिर में प्रतिष्ठित किया। भारत का दुनिया में डंका बजा हुआ है। औरतें भी कह रही हैं, हमने नमक खाया है तो मोदीजी को ही वोट देंगे। इं

दिरा गांधी ने भी सब किया था। वाजपेयी, उनके साथी धुरंधरों, प्रमोद महाजन, वेंकेया, जेतली, सुषमा जैसे ढेरों नाम शाईनिंग इंडिया से देश गुंजाते हुए थे। ध्यान रहे दंगों के बाद की हिंदू राजनीति के पीक के बावजूद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने प्रदेश गुजरात में 26 सीटों में से 14 सीटे ही भाजपा को जीता पाए थे।

और हर बार वही कहानी। चुनावी मतगणना के दिन ही सत्ता को मालूम होता है अरे यह क्या! सो नोट रखे भारत का मतदाता भी कभी किसी प्रधानमंत्री की स्थायी संपत्ति नहीं हुआ। भक्तों की भी आस्था के भगवान समय अनुसार चुपचाप बदलते रहते है!

हर तरफ अमित शाह का जलवा

थोड़े दिन पहले तक हर जगह अमित शाह को खोजा जा रहा था। उनकी राजनीतिक गतिविधियां शिथिल हो गई थीं। परदे के पीछे से कुछ काम कर रहे थे तो वह अलग बात है। उसकी जानकारी लोगों को नहीं मिल रही थी। लेकिन अब हर तरफ अमित शाह ही दिखाई दे रहे हैं। वे ऐसे काम भी कर रहे हैं, जो पहले प्रधानमंत्री करते थे। यह भी कह सकते हैं कि जो काम करने का विशेषाधिकार प्रधानमंत्री का था वह भी अमित शाह कर रहे हैं। बिगबैंग के साथ अमित शाह की वापसी 13 और 14 सितंबर को महाराष्ट्र से हुई। उनके दो दिन के दौरे में खूब राजनीति हुई। उसके बाद 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के रोज वडनगर में जो कार्यक्रम हुए उसके बाद से लगातार अमित शाह का कोई न कोई कार्यक्रम हो रहा है। मुंबई से लेकर दिल्ली, नोएडा और पंजाब तक हर तरफ वे दिखाई दे रहे हैं।

दिल्ली में अमित शाह ने मंगलवार को 19 सौ करोड़ रुपए से ज्यादा की परियोजनाओं का उद्घाटन किया। इनमें एक परियोजना पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाले बारापुला रोड की भी थी। इसके उद्घाटन कार्यक्रम को लेकर मंगलवार को अखबारों में जो विज्ञापन छपा उसमें ऊपर एक कोने में प्रधानमंत्री की तस्वीर थी और अमित शाह की बड़ी आदमकद तस्वीर लगी थी। ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सरकारी विज्ञापनों में सिर्फ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर छपेगी। हालांकि सरकारें कोई न कोई लूपहोल निकाल कर दूसरे नेताओं की भी तस्वीरें छापती हैं।

लेकिन दिल्ली के इस विज्ञापन में दिखा कि पूरा कार्यक्रम अमित शाह था। उद्घाटन के बाद बुधवार के अखबारों में जो तस्वीरें हैं वो बिल्कुल उस तरह की हैं, जैसी प्रधानमंत्री मोदी की होती हैं। वे पुल या फ्लाईओवर का उद्घाटन करने के बाद जैसे उस पर चलते हैं और हाथ हिलाते हैं वैसे अमित शाह कर रहे थे। सोचें, राजधानी दिल्ली में इतने बड़े बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट का उद्घाटन था वह प्रधानमंत्री की बजाय गृह मंत्री अमित शाह ने किया!

इससे ठीक पहले नोएडा की तस्वीरें आई थीं। उत्तर प्रदेश के इंटरनेशनल ट्रेड शो का उद्घाटन अमित शाह ने किया था। कुछ दिन पहले पूछा जा रहा था कि अमित शाह उत्तर प्रदेश से क्यों दूर हैं और उनके योगी आदित्यनाथ के साथ विवाद की खबरें चल रही थीं। लेकिन शाह ने ट्रेड शो का उद्घाटन किया, योगी आदित्यनाथ की तारीफ की और अगले चुनाव में जीत का दावा किया। बहरहाल, दिल्ली के बाद अमित शाह का मुकाम पंजाब था।

वे बुधवार, 30 सितंबर को पंजाब के जालंधर पहुंचे, जहां उन्होंने एक बड़ी रैली को संबोधित किया। भाजपा ने इस रैली में एक लाख लोगों को जुटाने का दावा किया था। हालांकि लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में हुए हंगामे और विवाद का असर रैली पर दिखा। फिर भी पंजाब के चुनाव से पहले अमित शाह की जालंधर रैली का बड़ा मतलब है। दोआबा के इस इलाके को साधने के लिए ही कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी भी जालंधर गए थे। अमित शाह ने भाजपा की नशामुक्त पंजाब रैली का समापन किया है। सो, अमित शाह न सिर्फ पूरी तरह से कमान में दिख रहे हैं, बल्कि हर तरफ दिखाई भी दे रहे हैं।