Stock in Focus: पंजाब सरकार के साथ 15 साल की डील, 4 अस्पतालों में PET-CT सुविधा संभालेगी डायग्नोस्टिक्स कंपनी

Stock in Focus: मेडिकल टेस्ट और जांच की सुविधाएं देने वाली कंपनी Krsnaa Diagnostics ने पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन (PHSC) के साथ 15 साल का करार किया है। इसके तहत कंपनी पंजाब के चार सरकारी अस्पतालों में PET-CT डायग्नोस्टिक सुविधाएं बनाएगी। इन्हें चलाने और मेंटेन करने का काम भी कंपनी ही करेगी।

यह Krsnaa Diagnostics की PET-CT सेगमेंट में एंट्री है। कंपनी को यह प्रोजेक्ट पंजाब सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के जरिए मिला है।

PPP मॉडल पर होगा काम

यह प्रोजेक्ट Public Private Partnership यानी PPP मॉडल पर होगा। मतलब कि सरकारी अस्पताल में सुविधा डेवलप करने और उसे चलाने की जिम्मेदारी प्राइवेट कंपनी की होगी।

प्रोजेक्ट DBFOT मॉडल पर है। यानी कंपनी सुविधा को डिजाइन करेगी, बनाएगी, पैसा लगाएगी, चलाएगी और उसका रखरखाव करेगी। 15 साल बाद तय शर्तों के मुताबिक इसे सरकार को ट्रांसफर किया जाएगा।

कमाई कितनी होगी?

इस प्रोजेक्ट की कुल वैल्यू अभी तय नहीं है। क्योंकि कंपनी को कोई तय रकम नहीं मिलेगी। उसकी कमाई सीधे PET-CT स्कैन की संख्या और मरीजों से लिए जाने वाले यूजर चार्ज पर निर्भर करेगी।

जितने ज्यादा स्कैन होंगे, रेवेन्यू की संभावना उतनी ज्यादा होगी। कंपनी को इससे एक नया रेवेन्यू स्ट्रीम मिलेगा। साथ ही, 15 साल का करार होने से लंबे समय के रेवेन्यू की विजिबिलिटी भी मिलेगी।

Krsnaa Diagnostics के शेयर

कंपनी का शेयर बुधवार को 1.36% की बढ़त के साथ 549 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 साल में स्टॉक 35.09% टूटा है। कंपनी का मार्केट कैप 1.78 हजार करोड़ रुपये है।

Krsnaa Diagnostics का काम सिर्फ सामान्य पैथोलॉजी टेस्ट तक सीमित नहीं है। कंपनी रेडियोलॉजी और दूसरी एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सेवाओं में भी काम करती है। अब पंजाब के इस प्रोजेक्ट के जरिए यह PET-CT सेगमेंट में भी उतर रही है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

2027 Kawasaki Ninja H2 revealed

2027 Kawasaki Ninja H2 revealed
2027 Kawasaki Ninja H2

Kawasaki has revealed the 2027 Ninja H2, ending weeks of anticipation that began with homologation filings and a cryptic teaser campaign. The supercharged flagship returns with an updated engine that now makes slightly less power, but is now Euro5+ compliant, allowing the H2 to return to European markets.

  1. 2027 Ninja H2 produces 209hp and 135Nm
  2. Gets Brembo Hypure four-piston front calipers
  3. Also available in an H2 Carbon variant

2027 Kawasaki Ninja H2 price and details

Retains overall design but features redesigned supercharger internals and a new exhaust

While the 998cc supercharged inline-four appears visually unchanged, Kawasaki says it has been revised substantially. The impeller and intake system have been completely redesigned, along with the pistons, cylinder head and crankshaft. These changes now allow the engine to meet Euro5+ emissions standards while delivering what the company describes as stronger low- to mid-range torque. The new single-exit exhaust, like on the H2 SX and Z H2, replaces the previous twin-exit can.

Changes to the hardware include the addition of Brembo Hypure four-piston front calipers, in place of the outgoing model’s Stylema units. The bike has a kerb weight of 238kg, which is identical to that of the previous-generation Ninja H2 that’s still currently not on sale in the US market.

Also new is an updated instrument cluster, with an analogue tachometer alongside a TFT screen. It appears to be the same unit used on the Ninja H2 SX and gives you access to a host of rider aids, including multiple levels of power and traction control, as well as cruise control.

At the moment, the 2027 Ninja H2 has only been launched in the UK, where it is priced at £28,600 (equivalent to Rs 36.90 lakh). It is also available in an H2 Carbon variant, which adds a carbon-fibre-reinforced upper cowling and is priced at £31,350 (Rs 40.44 lakh). It remains to be seen if the Ninja H2 returns to India after it was discontinued some years ago.

Land Rover considering a Defender Pickup Truck

Land Rover considering a Defender Pickup Truck
Land Rover Defender pickup rendering

Jaguar Land Rover (JLR), along with its Stellantis partner, is considering a Defender Pickup truck for the US market, according to a report by The Times. This comes just a few months after JLR and Stellantis signed a Memorandum of Understanding (MOU) aimed specifically at collaborating for product development opportunities for buyers in North America.

  • The Defender Pickup is aimed at the US market.
  • Likely to be localised in the States to avoid import tariffs.
  • To be one of several new models JLR’s planning for the region.

Land Rover Defender Pickup: What we know so far?

While the two brands have signed a MoU, exact details regarding the upcoming Land Rover pickup truck are expected to emerge towards the end of 2026. Former Executive Director of Vehicle Programmes at JLR, Nick Collins, admitted to Autocar UK in 2021 that not only is “there a customer demand” for such a pickup truck, but also that one “can be made from a monocoque as there are no structural limitations”.

However, it remains to be seen which platform the Defender Pickup truck actually uses. For perspective, JLR and Stellantis have at their disposal the Defender’s monocoque platform and the body-on-frame designs used by Stellantis-owned brands like Jeep and RAM. Buyers looking for high-end pickup trucks in North America currently have popular options that include range-topping variants of the Ford F-150, Chevrolet Silverado 1500, GMC Sierra 1500 and RAM 1500 – all of which are body-on-frame models. 

While the Defender SUV range sold worldwide rolls out of JLR’s Slovakia facility, The Times report indicated that the Defender Pickup truck is likely to be produced locally in the US to avoid import tariffs. The US is a “priority growth market” and will lead to “exclusive offerings” in due course, PB Balaji, Chief Executive Officer of JLR, said. JLR’s plans for North America stretches beyond just one model. “Working with Stellantis allows us to explore complementary capabilities in product and technology development that support our long‑term growth plans for the US market,” Balaji added.

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स्कॉटलैंड-वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ने ब्रिटेन से आजादी मांगी:अलग होने पर पहली बार तीनों नेताओं की मीटिंग, कहा- लंदन हमें नहीं रोक सकता

स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की आजादी की मांग करने वाली पार्टियों के नेता पहली बार एक साथ आए हैं। वेल्स की राजधानी कार्डिफ में हुई बैठक में तीनों ने कहा कि इन देशों के लोगों को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार है। उन्होंने ब्रिटेन की संसद वेस्टमिंस्टर को संदेश दिया कि वह लोकतांत्रिक तरीके से आजादी की मांग को रोक नहीं सकती। तीनों पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों को ब्रिटेन से ज्यादा अधिकार देने और आगे चलकर अलग देश बनाने की मांग करती हैं। हालांकि, आजादी के लिए जनमत संग्रह कब और कैसे कराया जाए, इस पर तीनों की राय एक जैसी नहीं है। समझौते में कही गईं 8 अहम बातें ब्रिटेन से अलग होना इतना आसान क्यों नहीं? यूनाइटेड किंगडम चार हिस्सों से बना है- इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की अपनी संसद और सरकारें हैं। उन्हें कई मामलों में अपने फैसले लेने की ताकत मिली हुई है। लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी लंदन की सरकार के पास हैं। यह व्यवस्था अमेरिका या जर्मनी जैसी नहीं है, जहां केंद्र और राज्यों के अधिकार संविधान में साफ-साफ बांटे गए हैं। सबसे अहम बात यह है कि इन चारों में से कोई भी हिस्सा अपने दम पर ब्रिटेन से अलग होने का फैसला नहीं कर सकता। स्कॉटलैंड में पहले हो चुका है आजादी पर जनमत संग्रह स्कॉटलैंड में ब्रिटेन से अलग होने को लेकर 2014 में जनमत संग्रह हो चुका है। यह जनमत संग्रह वेस्टमिंस्टर की मंजूरी के बाद कराया गया था। इसमें लोगों से पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड को ब्रिटेन से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहिए। नतीजे में 55% लोगों ने आजादी के खिलाफ और 45% ने इसके पक्ष में वोट दिया था। वेल्स में स्थिति अलग है। वहां की संसद सेनेड अपने दम पर आजादी के लिए जनमत संग्रह नहीं करा सकती। नॉर्दर्न आयरलैंड के लिए नियम कुछ अलग हैं। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर ब्रिटेन के नॉर्दर्न आयरलैंड सचिव को लगता है कि वहां बहुमत लोग आयरलैंड के साथ जुड़ने के पक्ष में वोट कर सकते हैं, तो ब्रिटिश सरकार को जनमत संग्रह कराना होगा। आजादी के समर्थन में कितने लोग हैं? हाल के कुछ सर्वे बताते हैं कि तीनों जगह ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था बदलने की मांग को समर्थन मिल रहा है। हालांकि, तीनों जगह स्थिति अलग-अलग है। लेकिन इन आंकड़ों को तीनों जगह एक जैसा नहीं देखा जा सकता। जैसे वेल्स की प्लेड कमरी पार्टी ने चुनाव में आजादी के मुद्दे पर ज्यादा जोर नहीं दिया था। वहीं, स्कॉटलैंड में आजादी का मुद्दा काफी बड़ा है, जबकि नॉर्दर्न आयरलैंड में इसके पीछे की राजनीतिक स्थिति अलग है। ऐसे में कार्डिफ की बैठक अहम है। पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की आजादी समर्थक पार्टियां एक साथ आई हैं और ब्रिटेन के भविष्य को लेकर अपनी बात रखी है। तीनों पार्टियों का कहना है कि अपने भविष्य का फैसला करने का हक आखिरकार इन देशों के लोगों के पास होना चाहिए। ———————— ब्रिटेन से अलग हो सकते हैं स्कॉटलैंड-वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड:कल नेताओं की मीटिंग, आजादी के फैसले पर जनमत संग्रह संभव
UK के एकजुट रहने पर फिर सवाल उठ रहे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

लंदन में पहली बार गंगा आरती, हजारों लोग शामिल हुए:थेम्स नदी के किनारे वाराणसी घाटों जैसी झलक

लंदन में रविवार को पहली बार थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती का आयोजन हुआ। इस आरती में हजारों लोग शामिल हुए थे। भजन और मंत्रों के जाप के साथ हुई आरती ने थेम्स के किनारे वाराणसी के घाटों जैसी झलक दिखाई। चिन्मय मिशन UK ने टोटली थेम्स फेस्टिवल के साथ मिलकर यह आयोजन किया। यह चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हो रहे कार्यक्रमों का हिस्सा था। आरती के जरिए नदी, प्रकृति और जीवन के लिए आभार जताया गया। फीडबैक को देखते हुए थेम्स नदी के किनारे गंगा आरती हर साल आयोजित की जा सकती है। भजन, मंत्र और दीपों के साथ हुई आरती कार्यक्रम में भजन, मंत्रोच्चार और संगीत प्रस्तुतियां हुईं। बड़ी संख्या में लोगों ने आरती में हिस्सा लिया और दिए जलाकर नदी के लिए सम्मान जताया। चिन्मय मिशन UK की रेजिडेंट टीचर ब्रह्मचारिणी श्रीप्रिया चैतन्य ने कहा कि पीढ़ियों से लोग गंगा के किनारे नदी, प्रकृति और जीवन के लिए सम्मान जताने के लिए दिए जलाते हैं। थेम्स पर हुई यह आरती इसी भावना को लंदन तक पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि चिन्मय मिशन के लिए गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रवाह का भी प्रतीक है। मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानंद ने वेदांत के ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने के लिए अपना जीवन लगा दिया था। चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर यह आयोजन उनकी इसी विरासत को याद करने का एक तरीका था। थेम्स में नहीं बहाए गई पूजा सामाग्री इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि आरती के दौरान थेम्स नदी में कोई दिए, फूल या दूसरी पूजा सामग्री नहीं डाली गई। चिन्मय मिशन के प्रवक्ता ने बताया कि आरती में इस्तेमाल किए गए दीपक भी नदी में नहीं छोड़े गए, बल्कि किनारे पर ही रखे गए। कार्यक्रम में कचरा कम करने और सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने पर भी ध्यान दिया गया। यानी आयोजन में धार्मिक परंपरा के साथ नदी और पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ा गया। चिन्मय मिशन के 350 से ज्यादा केंद्र चिन्मय मिशन की स्थापना 1951 में हुई थी। यह वेदांत पर आधारित वैश्विक संगठन है और दुनिया भर में इसके 350 से ज्यादा केंद्र हैं। वहीं, टोटली थेम्स फेस्टिवल 1997 से आयोजित हो रहा है। इसमें थेम्स नदी से जुड़े कला, पर्यावरण, विरासत और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। ————————– ये खबर भी पढ़ें… ब्रिटेन पहुंचे मोहन भागवत, हिंदू संगठनों ने स्वागत किया 100 से ज्यादा ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का ब्रिटेन पहुंचने पर स्वागत किया। पूरी खबर पढ़ें…

ब्रिटेन के बंटवारे पर साथ आएंगे स्कॉटलैंड, वेल्स-नॉर्दर्न आयरलैंड:तीनों जगहों के नेताओं की कल मीटिंग, अलग होने के पक्ष में

UK के एकजुट रहने पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलेंगे। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की सरकार के प्रमुख को फर्स्ट मिनिस्टर कहा जाता है। इनके साथ अलग देश आयरलैंड की पार्टी सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी रहेंगी। बैठक में नेता हर क्षेत्र को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार देने की बात पर साझा बयान जारी कर सकते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर आजादी या दूसरे बड़े बदलावों पर जनमत संग्रह कराने की बात भी शामिल है। इस बैठक से UK पर दबाव बढ़ सकता है। UK से अलग होने के पक्ष में तीनों जगहों की पार्टियां ब्रिटेन की केंद्र सरकार देश को एकजुट रखने के पक्ष में है। लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार और बड़े बदलाव की मांग बढ़ रही है। इन तीनों जगहों पर ऐसी पार्टियां प्रभावशाली हैं जो ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहती हैं। स्कॉटलैंड में SNP आजादी का समर्थन करती है। वेल्स में प्लाइड कम्री भी आजादी की मांग करती है। वहीं नॉर्दर्न आयरलैंड में सिन फेन आयरलैंड के साथ जुड़ने का समर्थन करती है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रुन एपी इओर्थवर्ट के साथ नॉर्दर्न आयरलैंड का नेतृत्व भी साझा घोषणा का समर्थन कर सकता है। बैठक में आजादी और संवैधानिक बदलाव के अलावा अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, यूरोप और दूसरे देशों से रिश्ते मजबूत करने पर भी चर्चा होगी। स्कॉटलैंड में फिर जनमत संग्रह की चर्चा स्कॉटलैंड की आजादी इस पूरी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल ही में कहा था कि अगर स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में आजादी के पक्ष में लोगों के बीच सहमति बनती है, तो एक और जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है। SNP ने बर्नहम के इस बयान को तुरंत मुद्दा बना लिया। इसके बाद में बर्नहम को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर स्विनी को चिट्ठी लिखकर कहा कि अगले आम चुनाव से पहले आजादी पर जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा। नॉर्दर्न आयरलैंड को लेकर भी उन्होंने कहा कि अभी ब्रिटेन से अलग होने को लेकर ऐसा माहौल नहीं है। बर्नहम ने 2024 के चुनावी घोषणापत्र का हवाला देते हुए कहा कि लेबर पार्टी स्कॉटलैंड की आजादी या एक और जनमत संग्रह का समर्थन नहीं करती। स्विनी – UK पर एकजुट रहने का दबाव बढ़ा स्विनी ने बर्नहम के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे फर्स्ट मिनिस्टर हैं जो आजादी के पक्ष में हैं। उनके मुताबिक, इससे साफ है कि ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। वहीं, वेल्स में भी ज्यादा अधिकार की मांग तेज हो गई है। मई में हुए चुनाव में वहां ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली पार्टियों को मजबूती मिली है।

96 सीट पर हुए चुनाव में अलग देश की समर्थक प्लाइड कम्री को 43 जबकि लेबर पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। इस चुनाव के बाद प्लाइड कम्री के रुन एपी इओर्थवर्ट वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर बने। नॉर्दर्न आयरलैंड के पास आयरलैंड से जुड़ने का रास्ता नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर यह संभावना दिखे कि नॉर्दर्न आयरलैंड के ज्यादातर लोग ब्रिटेन से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है। यहां की नेता सिन फेन का कहना है कि कार्डिफ की बैठक में भी इसी अधिकार की बात उठाई जाएगी कि हर देश और क्षेत्र को लोकतांत्रिक तरीके से अपना भविष्य तय करने का मौका मिलना चाहिए। ट्रम्प के बयान से आयरलैंड के एकीकरण की चर्चा बढ़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाल में आयरलैंड के एकीकरण पर बयान दिया है। शनिवार को डबलिन दौरे के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपतियों का इस मुद्दे पर आमतौर पर सावधानी भरा रुख रहा है। ऐसे में ट्रम्प का बयान इस बहस को और चर्चा में ले आया है। मामला सिर्फ आजादी का नहीं, पैसा और यूरोप भी अहम कार्डिफ की बैठक सिर्फ ब्रिटेन से अलग होने की मांग तक सीमित नहीं है। तीनों जगहों की कई प्रमुख पार्टियां यूरोपीय यूनियन के साथ करीबी रिश्तों की समर्थक हैं। UK 2020 में आधिकारिक तौर पर यूरोपीय यूनियन से आजाद हो गया था। इसके लिए 2016 में वोटिंग हुई थी। अगर स्कॉटलैंड या वेल्स भविष्य में आजाद होते हैं, तो वे EU की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं अगर नॉर्दर्न आयरलैंड आयरलैंड में शामिल होता है, तो वह EU का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से EU का सदस्य है। अब जानिए कि ये तीनों इलाके ब्रिटेन से कैसे जुड़े और अब अलग होने की मांग क्यों हो रही है… स्कॉटलैंड करीब 300 साल पहले स्कॉटलैंड और इंग्लैंड दो अलग-अलग देश थे। दोनों के अपने राजा, संसद और कानून थे। साल 1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मौत हो गई। उनका कोई वारिस नहीं था। तब स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बन गए। यानी अब एक ही व्यक्ति दो देशों का राजा था, लेकिन दोनों देश फिर भी अलग-अलग थे। इसके करीब 100 साल बाद बड़ा फैसला हुआ। 1707 में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की संसद ने समझौता किया। दोनों देश मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बन गए। इसके बाद दोनों की अलग-अलग संसद नहीं रही और एक साझा संसद बनी। अलग देश बनने की मांग कब तेज हुई 20वीं सदी में स्कॉटलैंड की आजादी की मांग को राजनीतिक ताकत मिलने लगी। 1934 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी (NSP) बनी, जिसका मकसद स्कॉटलैंड को अलग देश बनाना था। इसके बाद यह मुद्दा धीरे-धीरे मजबूत होता गया। 1999 में स्कॉटलैंड को अपनी संसद और सरकार वापस मिली। इससे स्कॉटलैंड को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे कई मामलों में खुद फैसले लेने का अधिकार मिला, लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अब भी ब्रिटेन की केंद्र सरकार के पास रहे। फिर आया 2014 का जनमत संग्रह। स्कॉटलैंड के लोगों से पूछा गया कि क्या वे UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहते हैं। करीब 55% लोगों ने अलग होने के खिलाफ और 45% ने समर्थन में वोट दिया। इसलिए स्कॉटलैंड UK का हिस्सा बना रहा। साल 2016 के बाद स्कॉटलैंड में आजादी की मांग फिर तेज होने लगी। दरअसल स्कॉटलैंड के ज्यादातर लोगों ने 2016 में यूरोपीय यूनियन में बने रहने के लिए वोट किया था, जबकि पूरे UK ने EU छोड़ने का फैसला किया। वेल्स 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा कर लिया। इंग्लैंड के साथ जुड़ने के बावजूद वेल्स ने अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान बनाए रखी। 19वीं और 20वीं सदी में इन्हें बचाने के आंदोलन तेज हुए। इसी दौर में 1925 में प्लाइड कम्री पार्टी बनी। शुरुआत में पार्टी का जोर वेल्श भाषा और संस्कृति बचाने पर था। बाद में उसने वेल्स को ज्यादा अधिकार और फिर स्वतंत्र देश बनाने की मांग शुरू की। 1999 में वेल्स को अपनी अलग संसद और सरकार मिली। हालांकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी UK सरकार के पास हैं। वेल्स में आजादी की मांग स्कॉटलैंड के मुकाबले कमजोर है। लेकिन प्लाइड कम्री इसे लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए है। नॉर्दर्न आयरलैंड वेल्स, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन चुके थे। 1801 में आयरलैंड भी इसमें शामिल हो गया। हालांकि शुरुआत से ही आयरलैंड के कई हिस्से में इसका विरोध जारी रहा। लंबे संघर्ष के बाद 1922 में आयरलैंड का ज्यादातर हिस्सा UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा यानी नॉर्दर्न आयरलैंड UK के साथ ही रहा। नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन के समर्थकों को यूनियनिस्ट कहा जाता है। ये ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग थे। दूसरी तरफ आयरिश राष्ट्रवादी और ज्यादातर कैथोलिक समुदाय था, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहता था। आज भी नॉर्दर्न आयरलैंड में दो तरह की सोच मौजूद है। कुछ लोग UK के साथ रहना चाहते हैं, जबकि कुछ आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते हैं।

iPhone Duo यहां मिल रहा सबसे सस्ता, भारत से करीब 1 लाख रुपए कम है कीमत, iPhone 18 Pro और Pro Max की कीमत भी जानिए

iPhone Duo यहां मिल रहा सबसे सस्ता, भारत से करीब 1 लाख रुपए कम है कीमत, iPhone 18 Pro और Pro Max की कीमत भी जानिए

iPhone Duo

iphone duo cheapest price country : Apple ने 9 सितंबर के लॉन्च इवेंट में अपने नए प्रीमियम स्मार्टफोन iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max पेश किए। इसी इवेंट में कंपनी ने पहली बार फोल्डेबल स्मार्टफोन सेगमेंट में कदम रखते हुए iPhone Duo भी पेश किया है। Apple के इस फोल्डेबल फोन को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसकी कीमत को लेकर है।

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भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत 2,99,900 रुपये रखी गई है। लेकिन अगर अलग-अलग देशों की कीमतों पर नजर डालें तो यह फोन भारत के मुकाबले कुछ देशों में काफी सस्ता है। खास तौर पर अमेरिका में iPhone Duo की शुरुआती कीमत करीब 1.90 लाख रुपये के आसपास बैठती है। यानी भारतीय कीमत के मुकाबले करीब 1.10 लाख रुपये का अंतर दिखाई देता है।

 

iPhone Duo सबसे सस्ता कहां मिल रहा है?

दिए गए बाजारों की तुलना में अमेरिका iPhone Duo के लिए सबसे सस्ता बाजार नजर आता है। वहां 256GB मॉडल की कीमत 1,999 डॉलर है, जो भारतीय मुद्रा में करीब 1.90 लाख रुपये बैठती है। इसके मुकाबले UAE में iPhone Duo की कीमत करीब 2.20 लाख रुपये, जबकि चीन और जापान में करीब 2.27 लाख रुपये से शुरू होती है। जर्मनी में इसकी कीमत करीब 2.55 लाख रुपये और UK में करीब 2.57 लाख रुपये बताई गई है।

 

भारत में यही फोन 2,99,900 रुपये की शुरुआती कीमत पर उपलब्ध होगा।

 

इस हिसाब से अमेरिका और भारत की शुरुआती कीमत में करीब 1.10 लाख रुपये का अंतर दिखाई देता है। हालांकि अमेरिकी कीमत में स्थानीय Sales Tax अलग से जुड़ सकता है, इसलिए वास्तविक खरीद कीमत राज्य के हिसाब से अधिक हो सकती है।

 

भारत में कितना महंगा है iPhone Duo?

देश iPhone Duo की शुरुआती कीमत

  • अमेरिका करीब ₹1.90 लाख
  • UAE करीब ₹2.20 लाख
  • चीन करीब ₹2.27 लाख
  • जापान करीब ₹2.27 लाख
  • जर्मनी करीब ₹2.55 लाख
  • UK करीब ₹2.57 लाख
  • भारत ₹2,99,900

 

यानी दिए गए देशों में भारत में iPhone Duo की शुरुआती कीमत सबसे ज्यादा दिखाई देती है।

 

भारत में iPhone 18 Pro कितने का है?

 

iPhone 18 Pro की भारत में शुरुआती कीमत ₹1,64,900 है। यह कीमत 256GB मॉडल के लिए है। वहीं 256GB स्टोरेज वाला iPhone 18 Pro Max ₹1,79,900 से शुरू होता है। 512GB मॉडल की बात करें तो iPhone 18 Pro की कीमत ₹1,89,900, जबकि Pro Max की कीमत ₹2,04,900 है। 1TB मॉडल के लिए Pro की कीमत ₹2,39,900 और Pro Max की कीमत ₹2,54,900 बताई गई है। 2TB स्टोरेज वाला iPhone 18 Pro ₹3,14,900 और iPhone 18 Pro Max ₹3,29,900 का है।

 

iPhone 18 Pro भी अमेरिका में काफी सस्ता

 

iPhone 18 Pro की कीमत की तुलना करें तो अमेरिका में इसका 256GB मॉडल 1,199 डॉलर, यानी करीब ₹1.14 लाख में शुरू होता है। भारत में इसी स्टोरेज वाले iPhone 18 Pro की कीमत ₹1,64,900 है। इस तरह दिए गए अनुमानित आंकड़ों के हिसाब से अमेरिका और भारत के बीच करीब 50 हजार रुपये का अंतर दिखाई देता है। जापान में इसकी कीमत करीब ₹1.37 लाख, चीन में करीब ₹1.42 लाख और UAE में करीब ₹1.32 लाख से शुरू होती है। वहीं जर्मनी में कीमत करीब ₹1.61 लाख और UK में करीब ₹1.54 लाख से शुरू होती है।

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iPhone 18 Pro Max में भी अमेरिका सबसे सस्ता

 

iPhone 18 Pro Max के 256GB मॉडल की अमेरिका में शुरुआती कीमत 1,299 डॉलर, यानी करीब ₹1.24 लाख है।वहीं UAE में यह करीब ₹1.42 लाख, जापान में करीब ₹1.49 लाख और चीन में करीब ₹1.56 लाख से शुरू होता है। UK में इसकी शुरुआती कीमत करीब ₹1.67 लाख, जबकि जर्मनी में करीब ₹1.77 लाख बताई गई है।

Kawasaki teases updated Ninja H2

Kawasaki teases updated Ninja H2
Outside action shot showing the Kawasaki Ninja H2

Kawasaki launched the Ninja H2 at EICMA 2014, and later the H2R, as supercharged sportbikes unlike anything else. Receiving its last major update in 2019, the H2 was the most powerful road-legal sportbike at the time, with 228hp of power. It was discontinued in the UK in 2021, following the Euro5 regulations kicking in, though it continues to be available in the US. Cut to now, and Kawasaki appears to be bringing back the most powerful Ninja.

  1. The 2021 version was the most powerful road legal sportbike at the time
  2. 2027 Ninja H2 appears to share a lower power engine with the Z H2
  3. International debut likely to be at EICMA 2026

Ninja H2 making a European comeback in 2027

International launch likely at EICMA 2026; Indian launch unconfirmed

On their social media, Kawasaki UK has posted a short teaser with a caption “Return To Beyond Belief” accompanied by the soundtrack of an engine accelerating through the gears and the recognizable supercharger flutter. What makes us believe that this is indeed the H2, is the caption’s callback to the original, 2014 launch slogan for the series, “Built Beyond Belief”. In July, we had reported that Kawasaki appears to be bringing back the Ninja H2 but with a lower 197hp engine, shared with the super-naked, Z H2. Since the information was obtained from Kawasaki’s US filings, we can expect the detuned H2 to head there as well, alongside the UK.

In its last version, the Ninja H2 had a hyperbike-like stance with a hefty 238kg of kerb weight. It remains to be seen whether the new one will change the design in any way, or drop a few kilos to become more agile, in line with a conventional sportbike. Besides the loaded caption and the engine’s sound, Kawasaki’s post did not reveal any details about the Ninja H2’s launch; but we could see it debut at EICMA 2026, just like the very first iteration.

As for India, the iteration of the H2 platform we last had access to was in the form of the Ninja H2 SX SE. The sports-tourer was listed on Kawasaki India’s website until July, but it’s since been removed. Kawasaki hasn’t revealed any plans to bring the updated H2 to India—which isn’t unusual—so we will have to wait and see if that changes in the future.
 

Skoda may retire Superb amid VW restructuring

Skoda may retire Superb amid VW restructuring
skoda superb in street

Skoda is evaluating the discontinuation of its flagship sedan, the Superb, amid a larger cost-reduction effort by the Volkswagen Group – the conglomerate aims to halve the number of models it sells within the next decade. First introduced in 1934, the Superb nameplate was originally used for a full-size luxury car made by Skoda up until 1949. Skoda revived the Superb nameplate in 2001 for its flagship sedan, which is now in its fourth generation and has sold over 1.6 million units to date worldwide.

Skoda Superb might end up on the chopping block

In a recent media interaction (reported on by Autocar UK), Skoda CEO Klaus Zellmer said it’s “not a given” that it wouldn’t shrink its model line-up in the future. This is despite the fact that the Czech carmaker reported its most profitable H1 numbers yet in 2026 – €16 billion in revenue and an 8.5 percent return on sales.

Zellmer hinted that Skoda’s sedan and estate line-up could be subject to reductions due to fading buyer interest in these body styles. “The big question is going forward: saloons and limousines and combis [estates] are not on the rising path. The [next-gen SSP] platform caters for wiggle room to go up to Superb dimensions. We’re currently looking into whether we still need the full monty, or whether we will have a smart way to cover both segments and target groups,” he said.

The fourth-gen Superb is offered as both a sedan and an estate, while the Octavia sits below it and has sold nearly 8 million units over its 30-year tenure. Zellmer said the “Octavia has led its segment since 2016,” giving the carmaker a strong seller that increasingly overlaps with the Superb in terms of size and practicality. Therefore, Skoda is examining whether it needs two models covering these buyers or whether a single model could serve both groups more efficiently.

Interestingly, the fourth-gen Superb is set to launch in India as a fully-imported model sometime during the first half of 2027. The Superb will also mark the return of diesel power for Volkswagen Group’s India portfolio, as the sedan will come equipped with a 150hp 2.0-litre TDI engine.

Could the production-spec Vision O replace the Superb?

Skoda’s Vision O concept, which was unveiled in 2025 and previews the next-gen Octavia, provides a possible indication of how the carmaker could consolidate its future estate offerings. The 4,850mm-long concept previews the next-generation Octavia as an electric estate, and is 152mm longer than the current Octavia Combi (4,698mm) and just 52mm shorter than the Superb Combi (4,902mm).

This could enable the next-gen Octavia to move upmarket and provide the space and practicality currently offered by the Superb, thus allowing Skoda to axe the latter nameplate. That said, Skoda has not confirmed if the production-spec Vision O will replace the Superb. The concept’s production version is expected to land by the end of the decade and will use the Volkswagen Group’s next-gen SSP architecture.

Skoda is also keeping its options open on powertrains in light of slowing EV adoption, with Zellmer stating that the carmaker’s current model line-up is the largest in its history as a result of “catering for a market still divided between combustion drivetrains and electric vehicles, and everything in between such as mild hybrid, full hybrid, plug-in hybrid.” To that end, a range-extender hybrid setup is being considered for the production-spec Vision O. The EV sales downturn may prompt Skoda to extend the lifespan of its ICE-powered models as well.