इटली में बढ़ती महंगाई के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद भारतीय दूतावास ने वहां रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दूतावास ने सोमवार को भारतीयों से भीड़भाड़ वाली जगहों और प्रदर्शन वाले इलाकों से दूर रहने और स्थानीय खबरों पर नजर रखने को कहा है। इस बीच, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की घटनाओं के बाद सोमवार को इमरजेंसी सिक्योरिटी बैठक बुलाई है। भारतीय दूतावास ने आपात स्थिति में मदद के लिए रोम और मिलान स्थित अपने कार्यालयों के नंबर जारी किए हैं। मिलान में पुलिस से भिड़े प्रदर्शनकारी, दुकानों में लूटपाट इटली के कई शहरों में रविवार को बढ़ती महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए। शुरुआत में शांतिपूर्ण रहे इन प्रदर्शनों के दौरान मिलान में हिंसा भड़क गई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर, कूड़ेदान और कुर्सियां फेंकीं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। वीकेंड पर मिलान में 5,000 से ज्यादा लोग जुटे थे। हिंसा के दौरान दुकानों में लूटपाट की गई और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया। इटली की न्यूज एजेंसी अंसा के मुताबिक, पुलिस ने 200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया। इनमें करीब 80% नाबालिग हैं। झड़पों में पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों के घायल होने की भी खबर है। ट्यूरिन में पत्थर और हथौड़े लेकर घूम रहे लोग पकड़े गए हिंसा का असर इटली के दूसरे शहरों में भी देखने को मिला। मेलोनी के मुताबिक, ट्यूरिन में कुछ लोगों को पत्थर और शीशे तोड़ने वाले हथौड़े लेकर जाते समय हिरासत में लिया गया। वहीं, बोलोन्या में गड़बड़ी की आशंका के चलते एक रेलवे स्टेशन को एहतियातन बंद कर दिया गया। मिलान के मेयर ग्यूसेपे साला ने कहा कि दुकानों के टूटे शीशे, लूटपाट और डरे हुए नागरिकों को देखकर चिंता होती है। उनके मुताबिक, ऐसी घटनाएं दुनिया के कई शहरों में देखने को मिल रही हैं। मेलोनी बोलीं- प्रदर्शन करना अधिकार, शहरों में आग लगाना नहीं प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा, ‘प्रदर्शन करना अधिकार है, लेकिन हमारे शहरों को बर्बाद करना नहीं।’ उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ उपद्रवियों ने प्रदर्शनों का फायदा उठाकर अराजकता फैलाने की कोशिश की। मेलोनी ने विपक्षी दलों से भी हिंसा की स्पष्ट रूप से निंदा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस मामले में किसी तरह की अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हिंसा की निंदा करने में हिचकिचाहट को उसका समर्थन समझा जा सकता है। ———————– ये खबर भी पढ़ें… यूरोप के 6 देशों में शिक्षा-महंगाई पर प्रदर्शन:फ्रांस में आगजनी-लूटपाट, इटली में स्कूलों पर कब्जा किया, ग्रीस में संसद के सामने बैठे आंदोलनकारी यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गए हैं। फ्रांस में प्रदर्शनकारियों ने दुकानों में लूटपाट की और कई सरकारी इमारतों में आग लगा दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पेरिस की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और आग के बीच एक महिला का जॉगिंग करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। सड़क पर जलती बैरिकेड और चारों ओर धुएं के बावजूद महिला अपनी दौड़ जारी रखती नजर आई। इस नजारे ने इंटरनेट पर लोगों को दो गुटों में बांट दिया है। कुछ यूजर्स उसके व्यवहार को लापरवाही बता रहे हैं, जबकि दूसरे लोग इसे अपनी दिनचर्या जारी रखने का फैसला मान रहे हैं। आखिर तनावपूर्ण माहौल में भी महिला ने दौड़ना क्यों नहीं रोका, यही सवाल चर्चा का विषय बन गया है।
सड़क पर आग और धुआं
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में एक महिला सड़क पर जॉगिंग करती दिखाई देती है। उसके रास्ते में एक बैरिकेड आग की लपटों में घिरा नजर आता है। आसपास काला धुआं फैला हुआ है और सड़कों पर तनावपूर्ण माहौल दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद महिला अपनी दौड़ जारी रखती है। यह वीडियो ऐसे समय सामने आया, जब पेरिस में महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े खर्चों को लेकर विरोध प्रदर्शनों की खबरें सामने आ रही थीं। ईंधन, खाने-पीने की चीजों और दूसरी जरूरी वस्तुओं की बढ़ती लागत को लेकर लोगों की चिंताओं के बीच जलती बैरिकेड और बाधित सड़कों की तस्वीरें भी चर्चा में रहीं। हालांकि, वायरल क्लिप से महिला की मंशा या उसके वहां मौजूद होने की पूरी वजह स्पष्ट नहीं होती।
The most dystopian fitness video on the internet just dropped.
Paris is literally burning, protesters are shutting down the streets, and this woman is casually jogging past a burning barricade like it’s a treadmill session. She is literally running through thick black smoke because hitting her daily step count is a higher priority than whatever revolution is happening around her.
Pure, unfiltered main character syndrome. The absolute disrespect to the entire riot.
— Atulya (@DesiMemesTweets) October 18, 2026
किसी ने बताया ‘मेन कैरेक्टर सिंड्रोम’, तो किसी ने किया बचाव
वीडियो को X पर साझा करते हुए एक यूजर ने महिला के व्यवहार पर सवाल उठाए। उसने इस दृश्य को ऐसे पेश किया, मानो शहर में अफरा-तफरी के बीच भी महिला के लिए रोजाना की फिटनेस पूरी करना सबसे जरूरी हो। इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी खतरनाक स्थिति में जॉगिंग करना कितना समझदारी भरा फैसला है। जलती बैरिकेड और घने धुएं के बीच दौड़ना स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरा हो सकता है।
‘हो सकता है वह तनाव दूर करने के लिए दौड़ रही हो’
दूसरी ओर, कई यूजर्स ने महिला का बचाव भी किया। उनका कहना था कि कुछ सेकंड के वीडियो के आधार पर किसी के इरादों का अंदाजा लगाना सही नहीं है। संभव है कि वह तनावपूर्ण माहौल में अपनी दिनचर्या बनाए रखने या मानसिक तनाव कम करने के लिए दौड़ रही हो।
एक यूजर ने कहा कि महिला अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है और उसे प्रदर्शनकारियों के साथ शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दूसरे यूजर्स ने भी माना कि हर व्यक्ति का मुश्किल हालात से निपटने का तरीका अलग होता है।
वायरल वीडियो ने छेड़ी बहस
इस घटना ने सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग नजरिए सामने रखे हैं। एक पक्ष इसे खतरनाक परिस्थिति में लापरवाही मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष महिला के निजी फैसले का समर्थन कर रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 27 अक्टूबर को होने वाले संसदीय चुनावों में कड़े मुकाबले का सामना कर रहे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू का औपचारिक रूप से समर्थन किया है।
रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर जारी पोस्ट में श्री ट्रंप ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमरीका का साथ देने के लिए इजरायली नेता की सराहना की। उन्होंने कहा कि वे श्री नेतान्याहू को अपना ‘पूर्ण और समग्र समर्थन’ दे रहे हैं। श्री ट्रंप ने लिखा बीबी नेतान्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे!
अमरीकी राष्ट्रपति का यह समर्थन इजरायली चुनाव से ठीक नौ दिन पहले सामने आया है, जबकि इससे पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि शायद वे किसी का समर्थन नहीं करेंगे।इससे पहले इस महीने की शुरुआत में ‘टाइम’ पत्रिका को दिए साक्षात्कार में जब श्री ट्रंप से इजरायली प्रधानमंत्री के कामकाज को लेकर बार-बार सवाल पूछे गए थे, तो उन्होंने नेतान्याहू का समर्थन करने से इनकार कर दिया था।
साक्षात्कारकर्ता के जोर देने पर भी श्री ट्रंप इस मुद्दे से बचते रहे और बातचीत को अपनी लोकप्रियता तथा पश्चिम एशिया की सुरक्षा की ओर मोड़ दिया। श्री ट्रंप ने रविवार को समाचार वेबसाइट ‘एक्सियोस’ को दिए साक्षात्कार में कहा कि नेतन्याहू का समर्थन करने को लेकर उनके मन में कभी कोई संदेह नहीं था।
श्री ट्रंप ने संक्षिप्त टेलीफोन वार्ता में कहा मैं हमेशा से उनका समर्थन करने वाला था, बस बहुत जल्दी ऐसा नहीं करना चाहता था। यह जरूरी है कि इजरायल के पास एक ऐसा नेता हो जिस पर भरोसा किया जा सके। एक्सियोस के अनुसार, जब श्री ट्रंप से पूछा गया कि क्या वे नेतन्याहू के अलावा किसी अन्य इजरायली नेता के साथ काम कर सकते हैं, तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया।
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श्री ट्रंप ने कहा शायद करूं, शायद न भी करूं, लेकिन यह जोखिम कौन लेना चाहता है?” समर्थन का ऐलान करते हुए श्री ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के फैसले का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि अगर वे पहल न करते तो ईरान जल्द ही अमरीका और इजरायल दोनों पर हमला कर देता।
श्री ट्रंप ने कहा कि इस युद्ध ने सैन्य और वित्तीय रूप से ईरान को पूरी तरह तबाह कर दिया है, और अगर उसने जल्द ही अपना रवैया नहीं बदला तो काम पूरा कर दिया जाएगा। श्री ट्रंप ने लिखा यदि इजरायल में गलत नेता चुना गया, जो श्री बीबी (नेतन्याहू) के अलावा कोई भी हो सकता है, तो अमरीका को यह काम अकेले करना पड़ेगा, और मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है।
उन्होंने लिखा इजरायल के भीतर से भी हो रहे भारी विरोध के बावजूद श्री बीबी नेतन्याहू पूरी मजबूती, साहस और बुद्धिमत्ता से टिके रहे हैं। श्री ट्रंप के इस बयान के जवाब में श्री नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर अमरीकी राष्ट्रपति का आभार व्यक्त किया।श्री नेतन्याहू ने कहा आपके इस अभूतपूर्व समर्थन से मैं बेहद सम्मानित महसूस कर रहा हूं। ह्वाइट हाउस में इजरायल का इससे बड़ा दोस्त कभी नहीं रहा।
ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर हो रही घरेलू आलोचनाओं के आगे न झुकने के लिए श्री नेतन्याहू ने श्री ट्रंप की सराहना की। इसके साथ ही उन्होंने महंगाई से जूझ रहे अमरीकी मतदाताओं से सीधे अपील करते हुए श्री ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन किया।
श्री नेतन्याहू ने कहा मैं अमरीकी जनता से कहना चाहता हूं कि अगर आप आज ईंधन की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, तो सोचिए कि अगर ईरान ने परमाणु हथियार हासिल कर लिए तो क्या होगा। ऐसा हम और श्री डोनाल्ड ट्रंप कभी नहीं होने देंगे।
उन्होंने कहा जब उस शासन का खतरा खत्म हो जाएगा, तो ईंधन के दाम तेजी से नीचे आ जाएंगे। लेकिन ऐसा केवल श्री ट्रंप के नेतृत्व में ही संभव है, उन लोगों के हाथ में नहीं जो तानाशाहों के आगे झुकना चाहते हैं।
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फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुई हिंसा और लूटपाट को लेकर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को सख्त कार्रवाई का वादा किया। उन्होंने रविवार रात अपने संबोधन में कहा कि जिन लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट की है, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। मैक्रों ने गृहमंत्री लॉरेंट नुनेज का इस्तीफा भी नामंजूर कर दिया। मैक्रों ने नुनेज से कहा कि वे सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाएं। इस बीच प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को सरकार की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है। इसमें हिंसा की घटनाओं और उनसे निपटने के तरीकों पर चर्चा होगी। 1500 दुकानों में लूटपाट, 1000 पुलिकर्मी घायल महंगाई और सरकारी सुविधाओं में कमी के खिलाफ शनिवार को 8 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। शुरुआत में हालात शांतिपूर्ण थे लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ लोगों ने तोड़फोड़ और लूटपाट शुरू कर दी। अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट की गई या उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालात संभालने के लिए पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और भीड़ पर पानी की बौछारें कीं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार को करीब 1000 पुलिसकर्मी घायल हुए। इनमें सात की हालत गंभीर थी। गृह मंत्री नुनेज पर आरोप लग रहे हैं कि वे पहले से तय प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए। मैक्रों को देश का सबसे कमजोर राष्ट्रपति माना जा रहा हिंसा के बाद खबरें सामने आई कि मैक्रों कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगा सकते हैं या आपातकाल घोषित कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने रविवार को टीवी पर देश को संबोधित किया। उन्होंने हिंसा के लिए कट्टर वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को जिम्मेदार ठहराया। मैक्रों ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की और भरोसा दिलाया कि हिंसा करने वालों को सजा मिलेगी। हालांकि, फ्रांस के मीडिया ने उनके भाषण की आलोचना की। उनका कहना है कि मैक्रों ने यह साफ नहीं किया कि सरकार आगे क्या कदम उठाएगी। लूटपाट और तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई कैसे होगी, शहरों को दोबारा ऐसी घटनाओं से कैसे बचाया जाएगा, जिन दुकानदारों का नुकसान हुआ है, उन्हें मुआवजा कैसे मिलेगा। संसद तीन गुटों में बंटी, कोई भी फैसला लेना आसान नहीं फ्रांस की संसद तीन बड़े राजनीतिक गुटों में बंटी हुई है। इनके बीच इतने मतभेद हैं कि संसद का कामकाज प्रभावित हो रहा है। ऐसे माहौल में सरकार के लिए कोई बड़ा फैसला लेना आसान नहीं है। राष्ट्रपति मैक्रों का कार्यकाल खत्म होने वाला है। अप्रैल 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। ऐसे में देश में राजनीतिक खींचतान भी बढ़ गई है। राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबले की तैयारी कर रहे नेताओं में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों भी शामिल हैं। ले पेन प्रवासियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं, जबकि मेलांशों पूंजीवाद के विरोधी हैं। दोनों नेता मौजूदा हालात में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। फ्रांस पर कर्ज का दबाव भी बढ़ रहा फ्रांस की सरकार के सामने आर्थिक मुश्किलें भी हैं। देश पर बढ़ते सरकारी कर्ज को काबू में करने के लिए निवेशक सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। लेकिन सरकार को डर है कि अगर उसने सरकारी सुविधाओं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की, तो और ज्यादा लोग नाराज होकर सड़कों पर उतर सकते हैं। देश में लोग पूछ रहे हैं कि अब आगे क्या होगा और क्या फ्रांस की व्यवस्था टूटने की कगार पर पहुंच गई है। शनिवार को हुई हिंसा ने लोगों को डरा दिया है। ————————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, आंदोलन के पीछे 5 बड़ी वजहें समझिए फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांस में बढ़ती महंगाई, शिक्षा बजट में कटौती और चरमराती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ जारी देशव्यापी प्रदर्शनों के दाैरान हिंसक दंगों, लूटपाट की घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ‘शांति और व्यवस्था’ बनाए रखने की अपील की है।
राष्ट्रपति कार्यालय (एलिसी पैलेस) से राष्ट्र के नाम दिए टीवी संबोधन में श्री मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों से स्थिति को और न बिगड़ने देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हम सभी गुस्सा और शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदर्शनकारियों की ‘जायज मांगों’ और तोड़फोड़ व लूटपाट के जिम्मेदार उपद्रवियों के बीच स्पष्ट फर्क किया जाना चाहिए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को पूरे फ्रांस में 5,50,000 से अधिक लोग सड़कों पर उतरे। अधिकतर प्रदर्शन हालांकि शांतिपूर्ण रहे, लेकिन रात ढलते ही कई शहरों में हिंसा भड़क उठी। सप्ताहांत के दौरान पुलिस ने 2,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं गृह मंत्रालय ने यह संख्या लगभग 2,400 बताई है।
पेरिस, मार्सिले, ल्योन और लिमोगेस में नकाबपोश समूहों ने दुकानों में तोड़फोड़ की, गाड़ियों में आग लगा दी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया। लिमोगेस में आग लगने के कारण 143 वर्ष पुराने टाउन हॉल का गुंबद ढह गया। रविवार को भी पेरिस के कुछ हिस्सों में झड़पें जारी रहने पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।
श्री मैक्रों ने इस हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ऐसी तबाही को ‘किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता’। उन्होंने वादा किया कि उपद्रवियों को सख्त सजा दी जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने जनता की शिकायतों के समाधान के लिए इस सप्ताह ठोस उपायों पर बैठकों की प्रतिबद्धता जताई।
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यह विरोध प्रदर्शन सितंबर में पेरिस के उपनगरीय इलाकों के विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों की हड़ताल से शुरू हुआ था, जो कर्मी बढ़ाने और बेहतर संसाधनों की मांग कर रहे थे। बाद में कक्षाओं में भीड़, कर्मचारियों की कमी, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता को लेकर यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।
वायरल वीडियो में एक पुलिसकर्मी द्वारा छात्रा को प्रतिबंधित तरीके से गर्दन से दबोचने की घटना सामने आते ही जन आक्रोश और भड़क गया। पुलिस पर बेतहाशा बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में कूद पड़े। इस अशांति ने मैक्रों सरकार को भारी राजनीतिक दबाव में ला खड़ा किया है। विरोधी सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रशासन प्रदर्शन के इतने बड़े पैमाने का अंदाजा लगाने में पूरी तरह नाकाम रहा। स्थिति पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू सोमवार को कैबिनेट की आपात बैठक करने वाले थे।
घटनाक्रम पर राजनीतिक नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने वामपंथियों पर जन आक्रोश का फायदा उठाने का आरोप लगाया, वहीं वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेनचोन ने छात्रों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बचाव किया। आगे उपद्रव की आशंका के मद्देनजर मार्सिले प्रशासन ने सभाओं पर पाबंदी लगा दी है।
फ्रांस का यह आंदोलन बढ़ती महंगाई, मकानों की किल्लत और बदहाल सार्वजनिक सेवाओं को लेकर पूरे यूरोप में पनप रहे असंतोष का हिस्सा है। बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली और अल्बानिया में भी ऐसे ही आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं।
इस स्थिति ने फ्रांस सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बहाल करने के साथ-साथ प्रदर्शनों के पीछे की बुनियादी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
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IMF के आंकड़ों के मुताबिक तेज विकास दर के बावजूद रुपये की कमजोरी के कारण भारत के 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य 2029 तक टल सकता है। इसके पहले अनुमान थी कि 2027 में भारत जापान और UK को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन IMF के पूर्वानुमानों के ‘मनीकंट्रोल’ द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि रुपये की गिरावट ने 5 लाख करोड़ डॉलर के टारगेट को एक साल और आगे के लिए टाल दिया है।
भारत 2027 में जापान और यूके को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, लेकिन 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का देश का यह लक्ष्य एक साल के लिए पिछड़ सकता है। इस टारगेट को रुपये की गिरती कीमत की वजह से झटका लग सकता है। जानकारों का कहना है कि रुपए के वैल्यू में कमी आने से डॉलर के हिसाब से देश के आर्थिक उत्पादन की वैल्यू में कमी आ रही है।
मनीकंट्रोल द्वारा इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के नवीनतम ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ (WEO) डेटाबेस के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की अर्थव्यवस्था के 2029 में 5 लाख करोड़ डॉलर के स्तर को पार करने का अनुमान है, जबकि अप्रैल में इसके 2028 तक इस स्तर को पार करने का अनुमान लगाया गया था।
IMF ने रुपये के संदर्भ में भारत के आर्थिक आउटपुट के अनुमान को तो बढ़ाया है, लेकिन 2028 के लिए भारत की नॉमिनल GDP के अपने अनुमान को 5.1 लाख करोड़ डॉलर से घटाकर 4.996 लाख करोड़ डॉलर कर दिया है।
5 लाख करोड़ डॉलर का टारगेट खिसका दूर
यह अंतर भारत की डॉलर-मूल्य वाली जीडीपी पर मुद्रा के अवमूल्यन (मूल्य में गिरावट) के बढ़ते प्रभाव को दिखाता है, जो ग्लोबल इकोनॉमिक रैंकिंग में देश की स्थिति तय करता है।
आईएमएफ (IMF) के अक्टूबर के अनुमानों के अनुसार, 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 4.06 लाख करोड़ डॉलर की होगी, जो 2027 में बढ़कर 4.52 लाख करोड़ डॉलर और 2029 में 5.54 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी।
रुपये की गिरावट ने मजबूत घरेलू विकास के असर को किया बेअसर
ताजा अनुमान बताते हैं कि 5 लाख डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने में हो रही देरी की मुख्य वजह भारत की नॉमिनल आर्थिक ग्रोथ में आई गिरावट नहीं, बल्कि विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) से जुड़े अनुमान में हुआ बदलाव है।
IMF का अब अनुमान है कि 2028 में रुपया प्रति डॉलर औसतन 95.5 के स्तर पर रहेगा, जबकि अप्रैल के अनुमानों में यह आंकड़ा 93.3 था। 2027 के लिए, एक्सचेंज रेट का अनुमान 93 से बदलकर 95 हो गया है।
साल की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया 5 प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हो चुका है। शुक्रवार को रुपया 96.73 के स्तर पर बंद हुआ, जिसके बाद RBI ने इसमें और गिरावट को रोकने के लिए कदम उठाए।
इस बीच, घरेलू मुद्रा में भारत की नॉमिनल GDP के 2028 में 477.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। अप्रैल में यह अनुमान 471.9 लाख करोड़ रुपये था, यानी इस अनुमान में 1.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन, जब इसे डॉलर में बदला जाता है तो आर्थिक आउटपुट का यह अनुमान लगभग 63 अरब डॉलर कम हो जाता है।
मनीकंट्रोल की गणना से पता चलता है कि अप्रैल के 93.3 रुपए प्रति डॉलर के एक्सचेंज रेट अनुमान के आधार पर, 2028 के लिए भारत की रुपये में मापी गई GDP का IMF का ताजा अनुमान लगभग 5.11 लाख करोड़ डॉलर बैठता है, जो 5 लाख करोड़ डॉलर के आंकड़े से काफी ऊपर है। हालांकि, एक्सचेंज रेट के संशोधित अनुमान के आधार पर यह आंकड़ा घटकर लगभग 4.996 लाख करोड़ डॉलर रह जाता है।
इससे पता चलता है कि रुपये की कमजोरी, घरेलू नॉमिनल आउटपुट में हुई बढ़ोतरी के असर को पूरी तरह खत्म कर देती है। इससे यह भी साफ होता है कि भारत कब इस डॉलर-बेस्ड अहम इकोनॉमिक माइल स्टोन को हासिल करेगा, यह तय करने में विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) में होने वाले बदलाव कितने अहम होते हैं।
2027 में भारत, जापान और UK को छोड़ सकता है पीछे
इस देरी के बावजूद, 2027 में भारत के ग्लोबल आर्थिक रैंकिंग में चौथे स्थान पर पहुंचने का अनुमान है। इस सूची में भारत अमेरिका, चीन और जर्मनी के बाद आएगा।
IMF के अक्टूबर के अनुमानों के अनुसार, 2027 में भारत की GDP 4.52 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी। यह यूनाइटेड किंगडम की 4.49 लाख करोड़ डॉलर और जापान की अनुमानित 4.47 लाख करोड़ डॉलर की GDP से थोड़ी अधिक होगी। हालांकि, इन तीनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच का अंतर काफी कम है, जिसका मतलब है कि विनिमय दरों (exchange rates) में उतार-चढ़ाव अंतिम नतीजों को बदल सकते हैं।
IMF के ताजा अनुमानों के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था के और विस्तार करने की उम्मीद है। 2030 में यह 6.13 लाख करोड़ डॉलर और 2031 में 6.74 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। इस स्तर पर भारत जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
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यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, महंगाई, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के हिंसक विरोध में अब तक 1800 लोग गिरफ्तार हुए हैं। स्पेन में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना बढ़ चुका है। बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में भी छात्र शिक्षा पर खर्च बढ़ाने, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। फ्रांस: 140 शहरों में 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और बढ़ती महंगाई के विरोध में 17 अक्टूबर को 140 शहरों में प्रदर्शन हुए। करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इसमें छात्र संगठनों के साथ ट्रेड यूनियन और कर्मचारी भी शामिल थे। पेरिस, मार्सेई और बोर्डो समेत कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। लीमोज में 143 साल पुराने ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई और कई गाड़ियों को जला दिया गया। 18 अक्टूबर तक करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और दमकलकर्मियों के घायल होने की खबर है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की है। सरकार का कहना है कि कुछ हिंसक समूहों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का फायदा उठाया। इटली: स्कूलों की हालत पर 30 अक्टूबर को हड़ताल का ऐलान इटली में छात्र शिक्षा पर कम सरकारी खर्च, जर्जर स्कूलों और पढ़ाई के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जा कर लिया। 16 अक्टूबर को रोम में हजारों छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। उन्होंने शिक्षा मंत्री ग्यूसेपे वाल्दितारा के फैसलों का विरोध किया। इससे पहले हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़प और पथराव की घटनाएं भी हुई थीं। अब छात्र संगठन इस आंदोलन से कर्मचारियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने 30 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। छात्रों की मांग है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए और सस्ते हॉस्टल उपलब्ध कराए जाएं। स्पेन: बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन स्पेन में महंगे घरों और बढ़ते किराए के खिलाफ आंदोलन कई शहरों में फैल गया है। राजधानी मैड्रिड के सोल चौक पर प्रदर्शनकारी कई दिनों से टेंट लगाकर बैठे हैं। सितंबर के आखिर में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को किराया बढ़ने के कारण घर से निकाल दिया गया था। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारी किराए पर नियंत्रण लगाने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और सस्ते सरकारी मकान बनाने की मांग कर रहे हैं। किराएदारों के संगठन और आवास अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मैड्रिड के अलावा दूसरे शहरों में भी रैलियां निकाली गई हैं। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने आवास संकट दूर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है, लेकिन प्रस्तावित उपायों पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच, 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान भी किया गया है। ग्रीस: हॉस्टल की कमी के खिलाफ टेंट लगाकर प्रदर्शन ग्रीस की राजधानी एथेंस में छात्रों ने संसद के सामने टेंट लगाकर प्रदर्शन किया। छात्र हॉस्टल की कमी, महंगे किराए और पढ़ाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। छात्र संगठनों के मुताबिक, देश में बहुत कम छात्रों को हॉस्टल मिल पाते हैं। करीब 96% छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, जबकि पिछले 10 साल में कमरों का किराया तीन गुना हो गया है। कुछ छोटे कमरों का मासिक किराया 600 यूरो तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी किराए की सीमा तय करने, सरकारी हॉस्टल बनाने, स्कॉलरशिप बढ़ाने और यूनिवर्सिटीज का बजट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। बेल्जियम: शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ गुस्सा बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में शिक्षा बजट में कटौती और सुधारों के विरोध में छात्रों ने मार्च निकाला। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और पुलिस पर चीजें फेंकीं। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें आईं। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। सरकार ने हिंसा की निंदा की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी पढ़ाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और यूनिवर्सिटीज की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। हजारों युवा 15 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। सरकारी इमारतों और बैंकों में भी आग लगा दी गई। पांच दिन से चल रहे आंदोलन में 167 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए है। आंदोलन में छात्र संगठनों के अलावा सरकार से नाराज दूसरे लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रामा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने छात्रों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही। उनका कहना है कि हिंसा से अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। पूरी खबर पढ़ें…

नई दिल्ली। फ्रांस में पिछले कई दिन से हो रहे दंगे और भड़क गए हैं। राजधानी पेरिस से लेकर दूर दराज के शहरों में भी हिंसा फैल गई है। फ्रांस की पुलिस के मुताबिक रविवार तक करीब दो हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने फ्रांस के हालात पर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप और वेंस दोनों ने कहा है कि प्रवासियों के कारण फ्रांस के ऐसे हालात हैं। दोनों ने फ्रांस को सीमा बंद करने को कहा है।
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने फ्रांस से अपनी सीमाएं बंद करने की अपील की है और कहा है कि यह सब कुछ प्रवासियों के कारण हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि दूसरी दुनिया से आए लोगों के मन सिर्फ नफरत भरी है। ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, ‘फ्रांस जल रहा है। एक बिल्कुल अलग दुनिया से आए लोगों के आप्रवासन ने, जिसके दिलों में नफरत भरी है, इस कभी महान रहे देश को तबाह कर दिया है। बहुत देर होने से पहले अपनी सीमाएं बंद करें और नियंत्रण अपने हाथ में लें’।
गौरतलब है कि फ्रांस में बड़े पैमाने पर विरोध, प्रदर्शन चल रहे हैं। कहा जा रहा है कि बढ़ती महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। लेकिन ज्यादातर जगहों पर प्रवासी इस हिंसा में शामिल हैं। इस प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं, बड़े पैमाने पर लूटपाट हुई और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, इन प्रदर्शनों में साढ़े पांच लाख के करीब लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारी दुकानें लूट रहे हैं और उसमें आग लगा रहे हैं।
अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी इसके लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि फ्रांस और अन्य पश्चिमी देश, लोगों को समाज में शामिल करने और उनके बीच तालमेल बिठाने के मुद्दे को सुलझाने में विफल रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में वेंस ने कहा, ‘पश्चिमी उदारवादियों ने विविधता और करुणा के नाम पर ‘तीसरी दुनिया’ के लोगों को फ्रांस और अन्य देशों में लाकर बसा दिया। उन्होंने समाज में घुलने मिलने और तालमेल बिठाने जैसे बुनियादी सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया’।
फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

