एफसीआरए पर बनी जेपीसी की पहली बैठक

ईडी

नई दिल्ली। विदेशी चंदे के नियमन से जुड़े एफसीआरए कानून में संशोधन के लिए लाए गए बिल पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी की पहली बैठक शुक्रवार को नई दिल्ली में हुई। भाजपा सांसद संजय जायसवाल की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति में 31 सदस्य हैं, जिसमें भाजपा के 14 सांसद हैं। समिति में एनडीए का बहुमत है। इसलिए समिति का फैसला सरकार के बिल के खिलाफ नहीं होगा।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस विवादित बिल को मार्च में पेश किया था लेकिन केरल के विधानसभा चुनाव की वजह से इसे रोक दिया था। चुनाव नतीजों के बाद संसद के मानसून सत्र में बिल को जेपीसी में भेजा गया। जेपीसी को 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक लोकसभा में रिपोर्ट देनी है।

विपक्ष का आरोप है कि एफसीआरए में संशोधन का बिल ईसाई एनजीए और अल्पसंख्यक संस्थानों की वैध फंडिंग रोक कर अल्पसंख्यकों को परेशान करने के लिए लाया गया है। सरकार ने इस आरोप खारिज करते हुए कहा है कि बिल धर्म विशेष से जुड़ा नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि विदेशी और खास कर अमेरिका के दबाव में इस बिल को टाला जा रहा है।

यह बिल इस साल 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्षी दलों के लगातार विरोध के बाद इसे 12 अगस्त को जेपीसी को भेजा गया। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि बिल के कुछ प्रावधान बेहद आपत्तिजनक हैं, जिसमें विदेशी फंडिंग बंद होने या एफसीआरए लाइसेंस निरस्त होने पर एनजीओ की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी शामिल है। समिति अब बिल के सभी प्रावधानों की विस्तृत जांच करेगी। लोकसभा में बिल पेश करते समय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि कानून का लक्ष्य पारदर्शिता बढ़ाना है। उन्होंने कहा था कि इससे विदेश से मिले फंड का सही इस्तेमाल सुनिश्चित होगा।

यूपीआई पेमेंट पर लगेगा शुल्क

नई दिल्ली। आखिरकार केंद्र सरकार ने यूपीआई से पेमेंट करने पर शुल्क लगाने का फैसला कर लिया। लंबे समय से चल रही अटकलों को समाप्त करते हुए सरकार ने ऐलान किया है कि अब किसी भी वस्तु या सेवा के लिए यूपीआई से दो हजार रुपए से ज्यादा का भुगतान करने पर 0.4 फीसदी शुल्क लगेगा। हालांकि सरकार ने यह भी तय किया है कि शुल्क की अधिकतम सीमा तीन सौ रुपए होगी। यानी कितने रुपए का भुगतान हो, अधिकतम शुल्क तीन सौ रुपए होगा।

सरकार की ओर से बताया गया है कि 0.4 फीसदी शुल्क ग्राहकों से नहीं, बल्कि व्यापारी से लिया जाएगा। दो हजार रुपए तक के भुगतान पर ग्राहक या व्यापारी किसी को कोई शुल्क नहीं देना होगा। वित्त मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना में इसकी जानकारी दी गई है। रूपे डेबिट कार्ड से होने वाले पेमेंट को भी इसमें शामिल किया गया है। सरकार ने रेलवे, संचार आदि कई सेवाओं के लिए पांच रुपए का फिक्स्ड चार्ज तय किया है।

गौरतलब है कि अगस्त में संसद के मानसून सत्र में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) एक्ट, 2026 पास हुआ था। उसके बाद से यूपीआई के जरिए होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने चर्चा शुरू हो गई थी। बहरहाल, वित्त मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को बिना किसी शुल्क के पैसा भेज सकता है।

इसे लेकर भी सवाल उठाया जा रहा है। लोगों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को एक लाख रुपए भेजे तब भी उसका पर कोई शुल्क नहीं लगेगा लेकिन दो हजार रुपए से ज्यादा का भुगतान किसी वस्तु या सेवा के लिए करने पर शुल्क देना होगा। सरकार ने तीन सौ रुपए के अधिकतम शुल्क की जो सीमा लगाई है उसके मुताबिक 75 हजार या उससे ज्यादा के हर लेन देन पर तीन सौ रुपए का ही शुल्क लगेगा।

सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक रेलवे, संचार सेवाओं, इंश्योरेंस और ईंधन जैसी कुछ श्रेणियों में दो हजार रुपए से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर पांच रुपए का फिक्स्ड चार्ज लगेगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने यूपीआई को प्रमोट करने की योजना 2021 में शुरू की थी और तब कहा गया था कि इसे फ्री रखा जाएगा। इसके तहत ग्राहक से छोटे दुकानदार को होने वाले दो हजार रुपए तक के यूपीआई पेमेंट पर 0.15 फीसदी इंसेंटिव दिया जाता था। 2024-25 तक इस पर 8,276 करोड़ का इंसेंटिव दिया गया।

बहरहाल, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में जून 2026 तक करीब 55.5 करोड़ यूपीआई यूजर्स थे। वित्त वर्ष 2025-26 में दुकानदारों को 198 लाख करोड़ रुपए का भुगतान यूपीआई के जरिए हुआ। इनमें दो हजार रुपए से ज्यादा की लेनदेन सिर्फ चार फीसदी हुई, लेकिन इनका कुल मूल्य 131 लाख करोड़ रुपए था, जो यूपीआई के कुल भुगतान का 66 फीसदी है।

‘₹30,500 करोड़ खर्च वाला ये सिस्टम बंद कर दो…’, अश्नीर ग्रोवर ने UPI पर चार्ज लगाने के बीच समझाया ये गणित

Ashneer Grover On UPI MDR Charge: भारतपे के सह-संस्थापक और अपनी किताब ‘दोगलापन’ के लिए मशहूर अश्नीर ग्रोवर ने UPI के नए नियमों पर एक गजब का फार्मूला बताया है। सरकार के ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या चार्ज लगाने की अटकलों के बीच उन्होंने सरकार और बैंकिंग सिस्टम को आड़े हाथों लिया है।

हाल ही में सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर साफ किया है कि ₹2,000 तक के UPI ट्रांसजेक्शन और RuPay डेबिट कार्ड से भुगतान पर बैंक या पेमेंट सिस्टम कोई चार्ज नहीं वसूल सकते। हालांकि, इस नोटिफिकेशन में ₹2,000 से ऊपर के UPI भुगतानों पर चार्ज लगाने या न लगाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। इसी को लेकर अश्नीर ग्रोवर ने सोशल मीडिया (X) पर आंकड़ों के साथ पूरा गणित समझाते हुए सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं।

आइए आपको बताते हैं कि अश्नीर ग्रोवर ने क्या गणित बिठाया है और सरकार आखिर UPI पर चार्ज का फ्रेमवर्क क्यों ला रही है।

बंद करो ATM, UPI पर टैक्स की बलि क्यों?

अश्नीर ग्रोवर ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि UPI पर किसी भी तरह का चार्ज लगाना सिर्फ टैक्स वसूली जैसा है। उन्होंने कहा, ‘UPI भारत की एक ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धि है जिसे पूरी दुनिया मानती है, पर अब यह टैक्स की बलि चढ़ेगी।’

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि, देश में कैश और ATM इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने का सालाना खर्च करीब ₹30,500 करोड़ आता है। ग्रोवर की सलाह है कि अगर सरकार को खर्च कम ही करना है, तो एटीएम बंद कर दे और यूपीआई को बढ़ावा दे। ग्रोवर ने याद दिलाया कि RBI ने सरकार को ₹2.87 लाख करोड़ का सरप्लस ट्रांसफर किया है, सभी लिस्टेड बैंकों का मुनाफा ₹4.11 लाख करोड़ है और NPCI के पास टैक्स से पहले ₹1,888 करोड़ का सरप्लस है।

‘जब बैंक और आरबीआई इतना भारी मुनाफा कमा रहे हैं, तो फिर यूपीआई की वजह से किसका नुकसान हो रहा है? सरकार ऐसी कौन सी सब्सिडी दे रही है जिससे नुकसान हो रहा है?’

सरकार का नया नियम: ₹2,000 की लिमिट और MDR

14 सितंबर को जारी गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, ₹2,000 तक के UPI या RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर बैंक या पेमेंट ऐप कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चार्ज नहीं वसूल सकते।

संसद के मानसून सत्र (जो 13 अगस्त 2026 को समाप्त हुआ) में पेमेंट एक्ट की धारा 10A में संशोधन किया गया। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पर MDR लगाने का एक रास्ता तैयार हो गया है।

NPCI के नेतृत्व वाली ‘यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी’ अब यह तय करेगी कि ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट भुगतानों पर कितना MDR चार्ज लगाया जाएगा।

सरकार क्यों लाना चाहती है MDR फ्रेमवर्क?

सरकार का तर्क है कि UPI अब काफी बड़ा हो चुका है और इसके सुरक्षित संचालन के लिए पैसों की जरूरत है। लेनदेन की भारी मात्रा को संभालने के लिए साइबर सुरक्षा और फ्रॉड रोकने के लिए लगातार बड़े निवेश की जरूरत है। सरकार का मानना है कि UPI के अगले चरण के विस्तार के लिए केवल सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना मुमकिन नहीं है।

जब डिजिटल पेमेंट कंपनियों को कमाई (MDR) का जरिया मिलेगा, तो इस सेक्टर में नई कंपनियां आएंगी, जिससे कॉम्पिटिशन और इनोवेशन बढ़ेगा।

कितना बड़ा हो चुका है देश का UPI का नेटवर्क?

NPCI द्वारा संचालित UPI ने पिछले एक दशक में डिजिटल पेमेंट की दुनिया बदल दी है। वित्त वर्ष 2017 में जहां UPI के जरिए ₹0.07 लाख करोड़ का ट्रांजैक्शन हुआ था, वहीं वित्त वर्ष 2026 (FY26) में यह बढ़कर ₹314 लाख करोड़ हो गया। यानी 10 सालों में 4,000 गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी।

UPI अब भारत के अलावा दुनिया के 11 देशों में इस्तेमाल हो रहा है। उज्बेकिस्तान इस लिस्ट में शामिल होने वाला नया देश बना है। इसके अलावा सिंगापुर, यूएई, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका, कंबोडिया और ग्रीस में भी यूपीआई स्वीकार किया जाता है।

GIDC प्लॉट धारकों के लिए बड़ी राहत: राज्य सरकार ने घोषित की ‘GIDC एम्नेस्टी स्कीम’

GIDC प्लॉट धारकों के लिए बड़ी राहत: राज्य सरकार ने घोषित की 'GIDC एम्नेस्टी स्कीम'

Bhupendra Patel

उद्योगपतियों को राहत देने, सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने और औद्योगिक विकास को गति देने के दृष्टिकोण के साथ राज्य सरकार उद्योग क्षेत्र के लिए पारदर्शी और विकासोन्मुख प्रशासन प्रदान करने के लिए लगातार कार्यरत है। GIDC के प्लॉट धारकों द्वारा औद्योगिक प्लॉट या शेड के हस्तांतरण (ट्रांसफर) के समय पंजीकृत लीज डीड करने के बजाय केवल अलॉटमेंट लेटर या सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट दिए जाते थे। इसके कारण पूर्व प्लॉट धारकों द्वारा अधिकांश मामलों में स्टांप ड्यूटी का भुगतान नहीं किया गया था। ALSO READ: गुजरात विधानसभा का 3 दिवसीय मानसून सत्र 9 सितंबर से: पहले दिन दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि के बाद शुरू होगी कार्यवाही

 

गुजरात स्टांप अधिनियम में संशोधन और जुर्माना के प्रावधान

राज्य सरकार ने दिनांक 02/04/2025 से गुजरात स्टांप अधिनियम, 1958 में समेकित संशोधन किए हैं। इसके तहत धारा-39(1)(ख) के अनुसार, यदि कोई पक्षकार स्वेच्छा से मूल दस्तावेज प्रस्तुत करता है, तो हस्ताक्षर की तिथि से प्रति माह 2% साधारण ब्याज के साथ बकाया स्टांप ड्यूटी के 4 गुना से अधिक न हो उतना जुर्माना वसूला जाएगा। यदि सरकारी तंत्र द्वारा जांच के दौरान दस्तावेज जब्त किया जाता है, तो प्रति माह 3% साधारण ब्याज के साथ 6 गुना से अधिक न हो उतना जुर्माना वसूलने का प्रावधान 10/04/2025 से लागू हुआ है। 

 

वर्तमान मालिकों पर वित्तीय बोझ

इन कानूनी प्रावधानों के परिणामस्वरूप जब वर्तमान मालिक को बैंक लोन या किसी अन्य सरकारी आवश्यकता के लिए पंजीकृत लीज डीड करानी होती है, तब पिछले सभी अनरजिस्टर्ड सौदों की बकाया स्टांप ड्यूटी, भारी जुर्माना और ब्याज के साथ भरने का अत्यधिक वित्तीय बोझ उन पर आ पड़ता है। ALSO READ: Gen Z के मुद्दों पर विपक्ष को जवाब देंगे पीएम मोदी: 11 साल बाद वडोदरा में युवाओं के बीच भरेंगे हुंकार

 

GIDC एम्नेस्टी स्कीम की घोषणा

इस संदर्भ में राज्य के उद्योगपतियों और GIDC एसोसिएशंस की ओर से मिले ज्ञापनों पर संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने GIDC प्लॉटों के पिछले हस्तांतरण सौदों में बकाया स्टांप ड्यूटी और पेनल्टी के बोझ से पात्र MSME उद्योगों को राहत देने के लिए 'GIDC एम्नेस्टी स्कीम' लागू करने का निर्णय लिया है।
 

GIDC एम्नेस्टी स्कीम क्या है?

अतीत में प्लॉट या शेड के आवंटन के समय पंजीकृत दस्तावेज के बजाय केवल अलॉटमेंट लेटर या सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट किए जाने के कारण स्टांप ड्यूटी का भुगतान नहीं हो सका था। वर्तमान मालिकों को नए दस्तावेज के पंजीकरण के समय खड़े होने वाले भारी जुर्माने के प्रश्न का व्यावहारिक समाधान प्रदान करने के लिए यह एम्नेस्टी योजना शुरू की गई है। 

 

MSME उद्योगपतियों को 80% तक स्टांप ड्यूटी में राहत

इस योजना के तहत पात्र मामलों में लागू स्टांप ड्यूटी में से 80% तक की राशि माफ करके केवल 20% स्टांप ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूल की जाएगी। हालांकि, जिन मामलों में 20% स्टांप ड्यूटी और पेनल्टी की कुल राशि मूल स्टांप ड्यूटी से कम होती है, वहां मूल स्टांप ड्यूटी के बराबर राशि वसूल कर राहत का लाभ दिया जाएगा। 

 

योजना के लिए पात्रता मानदंड (किसे मिलेगा लाभ?)

इस स्कीम का लाभ मुख्य रूप से वैध उद्यम प्रमाणपत्र (Udyam Certificate) रखने वाली MSME इकाइयों को मिलेगा। इस योजना के तहत दिनांक 30 जून, 2025 तक हुए पात्र अलॉटमेंट लेटर, शेयर ट्रांसफर, लीज/सब-लीज और संपत्ति हस्तांतरण से संबंधित सौदों को शामिल किया जाएगा। ALSO READ: किसानों के लिए बड़ी राहत, गुजरात सरकार ने बढ़ाई कृषि उपकरण खरीद की समय सीमा, अब 15 दिन का और मौका

 

दस्तावेज का पंजीकरण और अपील/कोर्ट मामलों में राहत

राहत का लाभ उठाने वाले वर्तमान आवंटी को निर्धारित 20% ड्यूटी और पेनल्टी का भुगतान करके संबंधित संपत्ति का कानूनी पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, जहां सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील की गई हो और 25% राशि जमा की गई हो या कोर्ट में याचिका लंबित हो, वहां याचिका वापस लेने की शर्त पर निर्धारित नियमों के अधीन योजना का लाभ मिलेगा। 

 

01 जनवरी, 2018 से पहले और बाद के सौदों के लिए राहत

दिनांक 01/01/2018 से पहले हुए हस्तांतरणों के मामलों में अंतिम हस्तांतरण के दस्तावेज के बाजार मूल्य के आधार पर निर्धारित स्टांप ड्यूटी में 80% की राहत देकर 20% ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूल की जाएगी। इसके अलावा, दिनांक 01/01/2018 को या उसके बाद हुए उन सभी हस्तांतरणों में जहां स्टांप ड्यूटी देय बनती है, वहां भी 80% राहत देकर 20% ड्यूटी और लागू पेनल्टी वसूलने का प्रस्ताव है।

यूपी में ‘आधी आबादी’ पर दांव, क्या डिंपल यादव बन सकती हैं सपा का CM चेहरा?

यूपी में 'आधी आबादी' पर दांव, क्या डिंपल यादव बन सकती हैं सपा का CM चेहरा?

Dimple Yadav: उत्तर प्रदेश में आगामी ‍विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक बिसात पर समाजवादी पार्टी (सपा) 'आधी आबादी' यानी महिलाओं को साधने में पूरी ताकत से जुट गई है। रक्षाबंधन के अवसर पर महिलाओं के लिए 'स्त्री सम्मान समृद्धि योजना' जैसी बड़ी घोषणाओं के केंद्र में मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव नजर आईं।

 

इस बीच, जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव से डिंपल यादव को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने को लेकर सवाल किया गया, तो उनके गोल-मोल जवाब और रहस्यमयी मुस्कान ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। इस समय यूपी में योगी आदित्य के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार है। योगी भी राज्य में तीसरी बार सरकार बनाने की जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। 

 

दरअसल, हाल के दिनों में डिंपल यादव के राजनीतिक कद और शैली में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। संसद के मानसून सत्र से लेकर दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन तक, डिंपल बेहद मुखर होकर पार्टी की बात रख रही हैं। 'स्त्री सम्मान समृद्धि योजना' के तहत महिलाओं को सालाना 40,000 रुपए देने के बड़े चुनावी वादे का ऐलान भी अखिलेश ने डिंपल यादव के हाथों ही कराया। इससे यह साफ संदेश जाता है कि सपा अब महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर डिंपल को 'फ्रंटफुट' पर रखकर आगे बढ़ाना चाहती है।

अखिलेश की रहस्यमयी मुस्कान!

पत्रकारों द्वारा जब डिंपल यादव को राज्य में पार्टी का सीएम चेहरा बनाए जाने पर सीधा सवाल पूछा गया, तो अखिलेश यादव ने सीधे न तो इसका समर्थन किया और न ही सवाल का खंडन किया। वे केवल मुस्करा कर रह गए। इससे इन अटकलों को बल मिला है। दरअसल, भाजपा की की महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं की काट के लिए सपा एक मजबूत और सर्वमान्य महिला चेहरे की तलाश में है, जिसमें डिंपल यादव पूरी तरह फिट बैठती हैं। इसके साथ ही डिंपल की सौम्य और सादगी से भरी छवि महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। अखिलेश ने डिंपल को आगे करके यह संकेत दिया है कि पार्टी का नेतृत्व एक नया और व्यापक सामाजिक आधार तैयार करने के लिए तैयार है।

कौन हैं डिंपल यादव?

डिंपल यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख महिला चेहरा और समाजवादी पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं। वह वर्तमान में मैनपुरी लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी की सांसद हैं। डिंपल यादव, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की बहू तथा सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी हैं। उनका जन्म 15 जनवरी 1978 को पुणे (महाराष्ट्र) में एक सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे, जिसके कारण उनकी शुरुआती पढ़ाई अलग-अलग स्थानों पर हुई। उन्होंने अपनी इंटरमीडिएट (12वीं) की परीक्षा आर्मी पब्लिक स्कूल, लखनऊ से पास की। वे लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं। 

 

डिंपल यादव पहली बार 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट से निर्विरोध सांसद चुनी गई थीं। इसके बाद 2014 में भी वह कन्नौज से सांसद रहीं। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने मैनपुरी से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। डिंपल यादव अपनी सादगी, सौम्यता और महिलाओं व युवाओं के मुद्दों को मुखरता से उठाने के लिए जानी जाती हैं। हाल के समय में वे पार्टी के भीतर नीतिगत फैसलों और अभियानों में बेहद सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

नितिन गडकरी का संन्यास वाला बयान संगठन के बाद सरकार में पीढ़ी परिवर्तन का संकेत?

नितिन गडकरी का संन्यास वाला बयान संगठन के बाद सरकार में पीढ़ी परिवर्तन का संकेत?

Nitin Gadkari

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी और जेन-जी के बड़े विरोध प्रदर्शन के बाद पहली बार जिस तरह से मोदी सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही है, उससे अब मोदी सरकार में बड़े बदलाव की अटकलें लगाई जा रही है।  संसद से मानसून सत्र के बाद अब कभी मोदी कैबिनेट का विस्तार हो सकता है।

सियासी गलियारों में इस बात की अटकलें लगाई जा रही है कि मोदी कैबिनेट के इस विस्तार में कई सीनियर मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता  है। इन अटकलों को मंगलवार को उस वक्त और हवा मिल गई जब मोदी कैबिनेट में शामिल सीनियर मंत्री नितिन गडकरी ने इशारों ही इशारों  में राजनीति  से संन्यास के संकेत दे दिए है। हलांकि नितिन गडकरी के बयान के बाद जिस तरह नागपुर से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल दिखाई दी उसके बाद गडकरी के दफ्तर से सफाई भी आई।
 
पहले बयान, फिर सफाई- रविवार को नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि वे तीन दशकों से ज्यादा समय से सक्रिय सार्वजनिक जीवन में हैं और अपने राजनीतिक सफ़र के दौरान उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, कई जिम्मेदारियां निभाई हैं और कई सम्मान हासिल किए हैं। लेकिन अब मैं ज्यादा काम नहीं कर सकता. नई पीढ़ी को काम करने का मौका मिलना चाहिए।
 
गडकरी के इस बयान को उनके राजनीति के संन्यास के नजरिए से देखा जाने लगा और इस पर कई तरह की प्रतिक्रिया आने लगी। इसके बाद गडकरी के दफ्तर से बयान पर स्पष्टीकरण आया कि
उनकी इस टिप्पणी का गलत मतलब निकाला गया कि युवा पीढ़ी को ज्यादा जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।  उनकी बात साफ तौर पर ट्रस्ट के कामकाज और भविष्य के नेतृत्व से जुड़ी थी। हालांकि, कुछ टेलीविजन चैनल इस बयान को राजनीतिक टिप्पणी के तौर पर पेश कर रहे हैं और इसे इसके असली संदर्भ से अलग दिखा रहे हैं।
 
भाजपा में पीढी परिवर्तन का दौर- भाजपा अब पीढी परिवर्त के दौर से गुजर रही है। नितिन नबीन के रूप में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने  के बाद पिछले दिनों पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कई नए  चेहरों को जगह दी गई। इसमें स्मृति ईरानी, कवित पाटीदार, राममाधव, वीडी शर्मा जैसे नाम है जिनको भाजपा में युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व माना जाता है। ऐसे में जब भाजपा का झुकाव अब जेन-जी वोटर्स की तरफ तेजी से  हो रहा है तब 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए मोदी कैबिनेट में कई नए चेहरों को जगह मिल सकती है।
 
दरअसल केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों को जिस तरह से सरकारी परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार और सरकारी स्कूलों की खराब हालत को लेकर छात्रों के भारी गुस्से का सामना करना पड़ा उससे पार्टी बैकफुट पर दिखाई दे रही है। इसलिए अब भाजपा युवा वर्ग (जेन-जी) को साधन के लिए सरकार और संगठन स्तर पर बड़े बदलाव की तरफ आगे बढ़ रही है।
 

क्या Swiggy, Zomato और Zepto पर लागू होंगे बाइक-टैक्सी के नियम? जानिए ऐसा हुआ तो क्या बदलेगा

महाराष्ट्र सरकार स्विगी, जोमैटो, जेप्टो, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर्स को लेकर नए नियम लागू करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों को परिवहन विभाग से मिले यूनिक लाइसेंस नंबर को दिखाना जरूरी हो सकता है। इसके साथ ही कंपनियों को इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल, ड्राइवरों के वेरिफिकेशन और वेलफेयर फंड में योगदान से जुड़े नियमों का भी पालन करना पड़ सकता है। प्रस्तावित नियमों की अभी कानूनी जांच होनी बाकी है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार स्विगी, जोमैटो, जेप्टो, अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों को महाराष्ट्र बाइक-टैक्सी नियम, 2025 के दायरे में लाने पर विचार कर रही है। अगर ऐसा होता है तो इन कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर्स को भी कुछ नए नियमों और जरूरी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ सकता है।

इन नियमों का करना होगा पालन

रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में बाइक-टैक्सी सेवा को लेकर चर्चा के दौरान कुछ नए प्रस्ताव सामने आए। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने हर राइड से 2 प्रतिशत राशि ड्राइवरों के कल्याण के लिए बनाए गए फंड में देने का सुझाव दिया। इसके अलावा, बाइक-टैक्सी परमिट लेने वाले ड्राइवरों के लिए डोमिसाइल सर्टिफिकेट को जरूरी करने का प्रस्ताव भी रखा गया। वहीं अभी इन प्रस्तावित नियमों की कानूनी जांच होनी बाकी है, क्योंकि ये फिलहाल महाराष्ट्र के कानून और न्याय विभाग के पास हैं।

ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर ने क्या कहा

ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर प्रताप सरनाईक ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हम चाहते हैं कि ये नियम सभी डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स पर लागू हों, क्योंकि ऐसी बाइक बिना किसी रेगुलेटरी नियमों का पालन किए सड़कों पर चलती हैं। लेकिन, यह बदलाव तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक केंद्र सरकार पूरे देश के लिए कानून में बदलाव नहीं करती।”

आ सकता है दिक्कतें

प्रस्तावित नियमों को लागू करने में कानूनी दिक्कत आ सकती है। इसकी एक वजह यह है कि फूड डिलीवरी और क्विक-कॉमर्स में इस्तेमाल होने वाले कई कम पावर वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन मौजूदा केंद्रीय कानून के तहत मोटर वाहन की श्रेणी में नहीं आते। ऐसे में इन वाहनों पर नए नियम लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अभी डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियां केंद्र सरकार के नियमों के तहत काम करती हैं। इनमें उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019, ई-कॉमर्स नियम 2020 और सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 शामिल हैं।

अभी क्या है नियम

मोटर व्हीकल एक्ट के मौजूदा नियमों के अनुसार, 250 वॉट से कम पावर और 25 किलोमीटर प्रति घंटे से कम रफ्तार वाली कुछ बैटरी से चलने वाली गाड़ियों को रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस की जरूरत नहीं होती। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कानूनी जानकारों का मानना है कि इसी वजह से महाराष्ट्र के लिए इन वाहनों पर नए एग्रीगेटर जैसे नियम लागू करना आसान नहीं होगा।

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग की 18 महीने की डेडलाइन कब खत्म हो रही है? जानिए सरकार ने इस बारे क्या कहा

8th Pay Commission: केंद्र सरकार के लाखों एंप्लॉयीज और पेंशनर्स को 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार है। इस बीच, आयोग की 18 महीने की डेडलाइन को लेकर चल रही चर्चा पर सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। गौरतलब है कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज की सैलरी में बदलाव करेगी।

नवंबर 2025 में हुआ था आयोग का गठन

आठवें वेतन आयोग का गठन 3 नवंबर, 2025 को हुआ था। इसे 18 महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। इस हिसाब से आयोग को मई 2027 तक अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपनी होगी। इस बीच, सरकार ने कहा है कि उसे आयोग से अभी कोई रिपोर्ट नहीं मिली है और आयोग ने तय समय से पहले रिपोर्ट सौंपने के बारे में भी कुछ नहीं कहा है।

18 महीने के अंदर आयोग सौंपेगा अपनी रिपोर्ट

संसद के मानसून सत्र के दौरान वित्त मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में कहा कि आठवां वेतन आयोग गठन के 18 महीनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। उसने यह भी कहा कि उसने अब तक अपनी सिफारिशें नहीं सौंपी है। सरकार ने यह भी कहा कि आयोग को कामकाज की प्रगति के बारे में सरकार को नियमित रूप से बताने की जरूरत नहीं है।

अलग-अलग शहरों में आयोग एंप्लॉयीज यूनियंस से मिल रहा

अभी आयोग एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों, एंप्लॉयीज यूनियंस, पेंशनर्स के प्रतिनिधिमंडल और मामले से जुड़े दूसरे पक्षों से बातचीत कर रहा है। कोलकाता और दिल्ली सहित कई शहरों में आयोग एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों से चर्चा कर चुका है। यह आने वाले दिनों में जयपुर, चेन्नई, पुद्दुचेरी और चंडीगढ़ में एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों से बातचीत करेगा।

आयोग को एंप्लॉयीज के वेतन सहित इन मसलों पर देनी है रिपोर्ट

आठवें वेतन आयोग को पे स्केल के रिवीजन, डियरनेस अलाउन्स, पेंशन, फैमिली पेंशन और नौकरी से संबंधित दूसरी शर्तों के बारे में अपनी सिफारिशें सौंपनी है। सरकार ने अभी यह संकेत नहीं दिया है कि आयोग की सिफारिशों का केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर कितना असर पड़ेगा।

आयोग की सिफारिशों का असर करीब 70 एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर पड़ेगा

एक अनुमान के मुताबिक, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का असर केंद्र सरकार के करीब 70 लाख एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर पड़ेगा। 1 मार्च, 2026 को केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज की संख्या 35.77 लाख थी। 31 दिसंबर, 2025 को पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स की संख्या 33.76 लाख थी।

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अगल साल के अंत तक लागू हो सकती हैं वेतन आयोग की सिफारिशें 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आयोग अगले साल मई तक अपनी फाइनल सिफारिशें सरकार को सौंप देता है तो यह अगले साल के अंत तक लागू हो सकता है। सरकार आयोग की सिफारिशें मिलने के बाद उस पर व्यापक विचार करेगी। उसके बाद सिफारिशों को लागू करने के बारे में फैसला लेगी।

हल्द्वानी ‘शुद्धिकरण’ विवाद पर संसद में सियासी बवाल! खड़गे ने BJP पर लगाया ‘छुआछूत’ का आरोप, नड्डा ने किया पलटवार

Haldwani Shuddhikaran Row: हल्द्वानी के रामलीला मैदान में आठ अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद हुए ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान को लेकर गुरुवार (13 अगस्त) को भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस के बीच राजनीतिक घमासान शुरू हो गया। गुरुवार को राज्यसभा में ‘शुद्धिकरण’ रस्म को लेकर राजनीतिक टकराव हुआ। खड़गे ने उच्च सदन में यह मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि उनके दौरे के बाद उस जगह पर शुद्धिकरण की रस्म निभाई गई। उन्होंने सवाल किया कि क्या ऐसा काम लोकतंत्र के अनुकूल है।

मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “…मैं हल्द्वानी में था, जहां मैंने रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया। वहां लाखों लोग मौजूद थे। उस समय मैंने किसी समुदाय या धर्म का नाम नहीं लिया, मैंने केवल सरकार से जुड़े मुद्दों को दोहराया। लेकिन मेरे भाषण के बाद, बीजेपी के लोगों ने उस मंच को ‘शुद्ध’ करने के लिए वहाँ हवन किया… क्या लोकतंत्र में ऐसा होता है? आप संविधान की रक्षा कैसे कर रहे हैं? मैं विपक्ष का नेता (LoP) हूं…।”

उन्होंने इस घटना को संविधान का अपमान करार देते हुए कहा कि वह इसे एक राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठाना चाहते हैं। खड़गे ने कहा, “यह संविधान का अपमान है।” कांग्रेस प्रमुख ने यह भी कहा कि उन्होंने संसद में कई साल बिताए हैं। उन्होंने उस हरकत पर आपत्ति जताई जिसे उन्होंने अपने प्रति ‘छुआछूत’ का व्यवहार बताया।

उन्होंने आगे कहा, “मैं इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। मैं बरसों से इस सदन का सदस्य रहा हूं। मैं अनुसूचित जाति से आता हूं और दलित हूं… मैंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि मेरी मदद करो या मेरी रक्षा करो। मुझमें लड़ने की ताकत है और मैं लड़ता भी हूं। लेकिन आप मेरे साथ छुआछूत जैसा व्यवहार करते हैं, ‘शुद्धिकरण’ करते हैं और मेरा अपमान करते हैं।”

नड्डा ने BJP का संबंध होने से इनकार किया

वहीं, खड़गे के आरोपों पर BJP के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने इस घटना को बेहद दुखद बताया। लेकिन खड़गे के इस दावे को खारिज कर दिया कि इसके पीछे BJP कार्यकर्ता थे। नड्डा ने कहा कि इसमें शामिल लोग BJP के सदस्य नहीं थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि पार्टी ऐसे व्यवहार का समर्थन नहीं करती है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि इस मामले की जांच की जाएगी।

उन्होंने कहा, “खड़गे जी ने जो कहा वह वाकई दुखद है… न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के लिए बल्कि हम सभी के लिए… बीजेपी ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती। लेकिन हम इसकी जांच करेंगे। मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि वहां जो कुछ भी हुआ, उसकी निश्चित रूप से जांच की जाएगी। लेकिन मैं यह साफ करना चाहता हूं कि बीजेपी ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती। मैं इसकी निंदा करता हूं। राष्ट्रीय अध्यक्ष इस मामले को देखेंगे। यह हम सभी के लिए बहुत खेद की बात है कि आपकी भावनाएं आहत हुईं।”

नड्डा ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि पार्टी के शामिल होने से इनकार करने और जांच का वादा करने के बाद भी खड़गे BJP को ही जिम्मेदार ठहराते रहे। नड्डा ने कहा, “मैंने पहले ही कहा है कि BJP ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती। यह हम सबके लिए, पूरे देश के लिए अफसोस की बात है। हम इसकी जांच करेंगे। लेकिन अगर खड़गे साहब कहते हैं कि आप ऐसा करते हैं, तो यह सही नहीं है।”

राज्यसभा सभापति ने भी घटना की निंदा की

बहस के दौरान राज्यसभा सभापति ने दखल देते हुए कहा कि खड़गे का कथित अपमान सदन में मौजूद हर व्यक्ति का अपमान माना जाएगा। सभापति ने कहा, “अगर खड़गे जी का अपमान होता है, तो सबका अपमान होता है।” सभापति ने यह भी कहा कि राजनीतिक जुड़ाव से ऊपर उठकर इस घटना की निंदा की जानी चाहिए। साथ ही जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उन्हें सजा दी जानी चाहिए। सभापति ने आगे कहा कि इस हरकत के पीछे जो लोग हैं, उन्हें पकड़ा जाना चाहिए और सजा मिलनी चाहिए।

हल्द्वानी में क्या हुआ था?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में खड़गे की रैली के बाद कथित तौर पर ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान किया गया। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने आरोप लगाया कि जिस ‘श्री राम सेना’ संगठन ने यह ‘शुद्धिकरण’ किया। वह BJP से जुड़ा है। हालांकि, BJP ने इस आरोप का खंडन किया।

गोदियाल ने दावा किया कि यह अनुष्ठान इसलिए किया गया क्योंकि खरगे दलित समुदाय से आते हैं। उन्होंने BJP पर जाति के नाम पर समाज में बंटवारा करने का आरोप लगाया। इस अनुष्ठान को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए गोदियाल ने दावा किया कि इससे कांग्रेस और BJP की विचारधारा में बुनियादी अंतर स्पष्ट होता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने दक्षिणपंथी संगठन के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की।

बीजेपी का ‘श्री राम सेना’ से किनारा

वहीं, BJP ने ‘श्री राम सेना’ से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया और कांग्रेस पर राजनीतिक फायदे के लिए पार्टी की छवि खराब करने का आरोप लगाया। बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री खजान दास ने दावा किया कि रामलीला मैदान में खड़गे की रैली के दौरान कुछ ऐसे नारे लगाए गए जिनसे सनातन समुदाय की भावनाएं आहत हुईं। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान धार्मिक महत्व की जगह है। वहां किसी दूसरे धर्म से जुड़े नारे लगाने से लोग नाराज हुए।

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