सरकार के पास संख्या अब भी नहीं है

इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी की जा रही है। सरकार के जानकार सूत्रों की कहना है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट ने विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन बिल पास कराने के सरकार के प्रयास को धीमा कर दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आई रिपोर्ट के बाद से लगातार विपक्ष हमलावर है। विपक्ष की पार्टियों के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन भी चल रहा है। सरकार के प्रबंधकों का मानना है कि इससे राजनीतिक माहौल में गर्मी बनी हुई है।

ऐसे समय में चुनाव से जुड़ा हुआ कोई भी सुधार करने की कोशिश समस्या पैदा कर सकती है। सरकार और भाजपा के संसदीय प्रबंधकों को यह भी लग रहा है कि इस समय कोई भी पार्टी सरकार का साथ देने से हिचकेगी। तभी सवाल है कि अचानक सरकार ने यह विचार कैसे शुरू कर दिया कि इसी महीने यानी बचे हुए 12 दिन में संसद का विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन करा लिया जाए और परिसीमन बिल भी पास हो जाए?

ध्यान रहे परिसीमन से जुड़े दो बिल हैं, एक राज्यों के लिए और एक केंद्र शासित प्रदेशों के लिए। इनको साधारण बहुमत से पास किया जा सकता है। लेकिन महिला आरक्षण कानून में बदलाव संविधान संशोधन के जरिए होगा, जिसके लिए दोनों सदनों में अलग अलग दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। वास्तविक स्थिति यह है कि अब भी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण ही 16 से 18 अप्रैल के विशेष सत्र में यह बिल पास नहीं हो पाया था।

पिछले कई दशक में पहली बार ऐसा हुआ था कि सरकार का बिल गिर गया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात थी। कहा जा रहा है कि उसके बाद दोनों ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया है। इसी वजह से संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। पिछले 65 दिन से सत्रावसान नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए किया गया है कि सात दिन के अंदर नोटिस देकर फिर सत्र बुला लिया जाए।

जब से दूसरे विशेष सत्र की चर्चा शुरू हुई है तब से भाजपा के नेता भी परेशान हैं। उनको लग रहा है कि इस बार भी संख्या पूरी नहीं हो पाएगी। इसका कारण यह है कि सरकार को लोकसभा में हर हाल में 360 सांसदों की जरुरत है। इस समय विपक्ष के साथ 178 सांसद लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं ने 30 सितंबिर की ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में शामिल पार्टियों और उनके सांसदों की यह संख्या बताई है। विपक्ष की यह ताकत स़ड़कों पर भी दिख रही है। राज्यसभा में जरूर विपक्ष के साथ सिर्फ 62 सांसद हैं।

लेकिन लोकसभा में 178 सांसद हैं। इनके अलावा कई और पार्टियां हैं, जो विपक्ष के साथ नहीं हैं लेकिन सरकार के साथ भी नहीं हैं। जगन मोहन रेड्डी अब खुल कर भाजपा का विरोध कर रहे हैं। के चंद्रशेखर राव की पार्टी सरकार के खिलाफ है। अरविंद केजरीवाल और ओवैसी की पार्टी सरकार के खिलाफ है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटने के बाद भी एनडीए के पास 318 ही सांसद हैं, जबकि ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास 178 सांसद हैं। डीएमके सहित तटस्थ सांसदों की संख्या इस समय 45 है। इनमें से कम से कम 40 लोग सरकार को वोट करें तभी दो तिहाई बहुमत पूरा होगा। इसकी संभावना बहुत कम दिख रही है।

सरकार बुला सकती संसद का विशेष सत्र

नई दिल्ली। केंद्र सरकार एक बार फिर संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। सरकार ने इस साल 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया था, जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधयेक पेश किए गए थे। हालांकि सरकार उसे पास कराने में कामयाब नहीं हुई थी। अब बताया जा रहा है कि इसी महीने एक बार फिर सरकार संसद का विशेष सत्र बुला सकती है।

इस सत्र में नारी शक्ति वंदन कानून को बदलने के लिए 131वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। इसके अलावा परिसीमन से जुड़े दो बिल पेश किए जाएंगे। ये ही तीनों बिल अप्रैल के विशेष सत्र में भी पेश किया गया था। चूंकि 131वां संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए सरकार को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। इसलिए पिछली बार बिल पास नहीं हो पाया था। उसके बाद से तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना में टूट हुई है, जबकि कांग्रेस औऱ डीएमके अलग अलग हो गए हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार ने जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटा लिया है। गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हुआ था, लेकिन इसका अब तक सत्रावसान नहीं किया गया है। इसलिए विशेष सत्र बुलाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी की जरुरत नहीं है। सरकार एक हफ्ते पहले सूचना देकर विशेष सत्र आहूत कर सकती है।

बहरहाल, दो तिहाई बहुमत जुटा लेने के दावे के बरक्स वास्तविक स्थिति देखें तो अब भी सरकार इससे दूर है। इस समय लोकसभा की दो सीटें खाली हैं यानी 541 सांसद हैं। इनमें से एनडीए के 318 सांसद हैं। बिल को पास कराने के लिए 360 वोट चाहिए। अगर डीएमके के 22 सांसद बिल का समर्थन करते हैं तो बिल के समर्थन में 340 सांसद हो जाएंगे। इसके बाद भी भाजपा को लगभग 20 सांसदों की जरूरत है। ऐसे ही राज्यसभा में एनडीए के 153 सांसद हैं। वहां बिल पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए। वहां भी एनडीए को नौ सांसदों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि वहां संख्या जुटा लेना ज्यादा आसान है।

खड़गे ने पीएम को चेताया

कांग्रेस

नई दिल्ली। संसद का विशेष सत्र बुला पर नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन करने और परिसीमन बिल पास कराने की खबरों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर चेतावनी दी है। उन्होंने 13 अगस्त को खत्म हुए मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं करने पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि सरकार किसी भी विधेयक को जोर जबरदस्ती पास कराने का प्रयास न करे।

खड़गे ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग भी की है। खड़गे ने परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार को आगाह किया है। उन्होंने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री से कहा है कि संसद में परिसीमन प्रस्तावों को अंतिम रूप देने से पहले सभी पार्टियों से विचार विमर्श करने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा है कि विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव पर हर तरह से चर्चा करना चाहता है।

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खड़गे ने प्रधानमंत्री को चेतावनी दी है सरकार किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को जबरन पास न कराए। खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि कहा कि मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। इसके बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। कांग्रेस महासचिव औऱ संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कांग्रेस अध्यक्ष का पत्र साझा करते हुए लिखा है कि खड़गे जी ने अभी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हुई अभूतपूर्व देरी और मोदी सरकार की संभावित योजनाओं के बारे में बात की है।

टुकड़ों टुकड़ों में ‘कामराज प्लान’

पिछले कई महीनों से इस बात की चर्चा चल रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार में फेरबदल करने वाले हैं। जून के महीने में यह चर्चा सबसे तेज थी, जब उनकी सरकार के दो साल पूरे हो रहे थे। जब उस समय बदलाव नहीं हुआ तो कहा गया कि संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले होगा। उसके बाद मोदी के जन्मदिन से लेकर उनके सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे होने के मौके को भी मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए मार्क किया गया। इस बीच उनकी सरकार में लगातार वैकेंसी क्रिएट होती रही। मंत्रियों के इस्तीफे होते रहे। अभी एक और वैकेंसी हो गई है। सूचना व प्रसारण और संसदीय कार्य राज्यमंत्री एल मुरुगन ने इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के कारण इस्तीफा हुआ था और धर्मेंद्र प्रधान का कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की वजह से इस्तीफा हुआ था। यानी चार मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं।

इनके अलावा तीन मंत्री दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पीयूष गोयल मंत्री होने के साथ साथ पार्टी के कोषाध्यक्ष बना दिए गए हैं। दो अन्य मंत्रियों पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को क्रमशः उत्तर प्रदेश और दिल्ली का अध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में चार महीने में विधानसभा चुनाव हैं। दो और मंत्रियों को इस बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा नहीं भेजा गया है। हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। अगर इन दो मंत्रियों का भी इस्तीफा होता है तो छह मंत्री पद खाली होंगे। दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे तीनों या कम से कम दो मंत्रियों का इस्तीफा होगा। इस तरह आठ या नौ वैकेंसी क्रिएट हो रही है। पहले से ही कई मंत्रियों के पास एक से ज्यादा मंत्रालय हैं।

इस बीच यह भी चर्चा हो रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कामराज प्लान’ पर काम कर रहे हैं। ध्यान रहे के कामराज ने नेहरू मंत्रिमंडल को नया रूप देने के लिए एक योजना बनाई थी। इस योजना के तहत बड़ी संख्या में मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया था। इस योजना का मकसद कुछ मंत्रियों को सरकार से हटाना था। तभी नेहरू की पसंद के मंत्रियों ने भी इस्तीफा दिया था और बाद में उनको फिर से मंत्री बना लिया गया था। लेकिन ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ‘कामराज प्लान’ कारगर नहीं हो रहा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों से इस्तीफा देने को कहा गया है। हालांकि यह तय नहीं है कि सीधे प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के स्तर से इस्तीफे को कहा गया लेकिन यह खबर है कि मंत्रियों ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। वरिष्ठ मंत्री और नेता यह मानने को तैयार नहीं है कि मंत्रिमंडल को नया रूप देने के लिए उनका इस्तीफा चाहिए। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री तो खुद ही 76 साल के हो गए हैं। अगर वे रह सकते हैं तो उनसे कम उम्र के मंत्रियों को क्यों हटाया जाना चाहिए। तभी ऐसा लग रहा है कि ‘कामराज प्लान’ अटक गया है और इसलिए मजबूरी में ऐसे नेताओं के इस्तीफे हो रहे हैं, जिनका कोई बड़ा राजनीतिक असर नहीं है। कुरियन केरल के ईसाई हैं तो बिट्टू कांग्रेस से भाजपा में आए थे और मुरुगन तमिलनाडु के हैं, जहां भाजपा का कुछ दांव पर नहीं है। असली बात तो तब होगी, जब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आदि का इस्तीफा हो।

भाजपा जुटा लेगी दो तिहाई बहुमत

महिला आरक्षण कानून यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन और परिसीमन बिल पास कराने के लिए भारतीय जनता पार्टी दो तिहाई बहुमत की तलाश में लगी है। इस साल अप्रैल में हुए संसद के विशेष सत्र में सरकार के तीन बिल पास नहीं होने के बाद से ही इसकी कोशिश हो रही है। संसद के मानसून सत्र का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है तो उसके पीछे भी यही कारण बताया जा रहा है। सवाल है कि क्या भाजपा अगले कुछ दिन में दो तिहाई बहुमत जुटा लेगी ताकि वह संविधान संशोधन के विधेयक पास करा सके? यह सवाल इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग के खिलाफ लगातार चल रहे प्रदर्शन और देश बन रहे माहौल के कारण भाजपा के लिए नई पार्टियों का समर्थन हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। पहले जो काम आसान दिख रहा था उसमें भी नई पेचीदगियां पैदा हो गई हैं। एक तरफ कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है तो दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी है, जिसको आम आदमी पार्टी का समर्थन मिल रहा है। इनके लगातार प्रदर्शनों से सरकार विरोधी माहौल बन रहा है।

भाजपा के एक जानकार नेता के मुताबिक इन पार्टियों के विरोध प्रदर्शनों के बीच भी दो तिहाई बहुमत जुटाना संभव हो जाएगा क्योंकि कांग्रेस से नाराज पार्टियां  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार का साथ देने को तैयार हैं। इसमें भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके से है। गौरतलब है कि डीएमके ने मंगलवार, छह अक्टूबर को हुए प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया। बीजू जनता दल का भी कांग्रेस से विरोध है लेकिन उसके नेता प्रदर्शन में शामिल हुए। डीएमके ने कांग्रेस से दूरी बढ़ाई है तो भाजपा को लग रहा है कि डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन उसको मिल जाएगा। अगर ये 22 सांसद सीधे तौर पर सरकार के विधेयक का समर्थन नहीं करेंगे तो सदन से गैरहाजिर रह कर भी सरकार की मदद कर सकते हैं। वैसे भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के ‘इंडिया’ ब्लॉक में शामिल होने के बाद डीएमके के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं।

इस बीच भाजपा का हिसाब किताब इस बात से मजबूत होता दिख रहा है कि तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी दोनों में टूट हो गई है। तभी ममता बनर्जी को साथ लेकर जिस ‘इंडिया’ ब्लॉक की ताकत पहले 233 सीट की थी वह घट कर 178 सीट की रह गई है। विपक्षी गठबंधन की ओर से ही यह आंकड़ा दिया गया है कि 19 पार्टियों के 178 लोकसभा सांसद और 62 राज्यसभा सांसद चुनाव आयोग का विरोध कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक की ताकत में 47 सांसदों की कमी आई है। अगर यह संख्या भाजपा के साथ जुड़ जाती है तो संसद में दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा पूरा करने में उसे समस्या नहीं आएगी। कुछ अन्य सांसदों को गैरहाजिर करा कर भाजपा यह काम कर सकती है।

संसद के सत्रावसान में देरी का नया रिकॉर्ड

भाजपा संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की तलाश कर रही है। इस बीच संसद के दोनों सदनों के सत्रावसान का नया रिकॉर्ड बन गया है। ऐसा लग रहा है जिस तरह से क्रिकेट में विराट कोहली सारे रिकॉर्ड तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, यहां तक कि सबसे ज्यादा बार जीरो पर आउट होने के रिकॉर्ड के भी नजदीक पहुंच गए हैं, वैसे ही भाजपा भी अच्छे, बुरे सारे रिकॉर्ड तोड़ देना चाहती है। उसने संसद के दोनों सदनों के सत्रावसान में देरी का रिकॉर्ड़ तोड़ दिया है।

इससे पहले राजीव गांधी की सरकार के समय 1989 में संसद के दोनों सदनों का 53 दिन तक सत्रावसान नहीं हुआ था। अभी मानसून सत्र अनिश्चितकाल तक स्थगित हुए 55 दिन हो गए हैं और सत्रावसान नहीं हुआ है। हालांकि एक सदन के सत्रावसान में देरी का रिकॉर्ड अब भी कांग्रेस के नाम ही है। 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार के समय लोकसभा का सत्रावसान 86 दिन तक नहीं किया गया था। उससे पहले का रिकॉर्ड राजीव गांधी की सरकार के नाम था। 1987 में 75 दिन तक लोकसभा का सत्रावसान नहीं हुआ था। देखना है कि भाजपा वह रिकॉर्ड तोड़ पाती है या नहीं। गौरतलब है कि संसद के शीतकालीन सत्र का भी समय नजदीक आता जा रहा है। हालांकि कहा जा रहा है कि इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है।

मोदी मंत्रिमंडल में वैकेंसी बढ़ रही है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कब अपनी सरकार में फेरबदल करेंगे इसका सस्पेंस बढ़ता जा रहा है। लेकिन जब भी संगठन में बदलाव हो रहा है या राज्यसभा के चुनाव हो रहे हैं तो सरकार में नई वैकेंसी बन जा रही है। तीन मंत्रियों के इस्तीफे हुए हैं, तीन मंत्री संगठन में गए हैं और दो मंत्रियों की राज्यसभा रिन्यू नहीं हुई है। इस तरह आठ वैकेंसी बन गई है। हालांकि इस वैकेंसी को भरने की जल्दी प्रधानमंत्री को नहीं दिख रही है। इस बार उत्तर प्रदेश की आठ सीटों के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया तो मोदी सरकार में दो और वैकेंसी बनने का रास्ता साफ हुआ। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को टिकट नहीं दी। हालांकि अभी दोनों का कार्यकाल समाप्त नहीं हुआ है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी छह महीने तक दोनों मंत्री बनी रह सकते हैं। लेकिन उसके बाद भी राज्यसभा या लोकसभा की कोई वैकेंसी नहीं है, जहां से इन दोनों को संसद पहुंचाया जाएगा। इसलिए इस्तीफा तो होना है। सिर्फ समय की बात है कि कब इस्तीफा होता है।

इससे पहले भाजपा ने संगठन में फेरबदल किया तो उससे भी वैकेंसी क्रिएट हुई। नितिन नबीन की टीम में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। वे दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। हालांकि जानकार सूत्रों का कहना है कि उनके लिए अपवाद बनाया जा सकता है। यानी वे सरकार और संगठन दोनों जगह रह सकते हैं। लेकिन यह छूट शायद हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी को नहीं मिले। कुछ समय पहले हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि यह किसी को समझ में नहीं आया कि वीरेंद्र सचदेवा को क्यों हटाया गया। राज्य में कोई चुनाव भी नहीं था। फिर भी एक पंजाबी को हटा कर दूसरा पंजाबी अध्यक्ष बनाया गया। मल्होत्रा सरकार में मंत्री बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में चुनाव था और सामाजिक समीकरण के हिसाब से जाट नेता भूपेंद्र सिंह को हटा कर पिछड़ी जाति से आने वाले पंकज चौधरी को अध्यक्ष बनाया गया। वे भी केंद्र में मंत्री बने हुए हैं।

इससे पहले अप्रैल में जब राज्यसभा के दोवार्षिक चुनाव हुए तब रिटायर हो रहे दो सदस्यों को दोबारा टिकट नहीं मिली। पंजाब के रवनीत सिंह बिट्टू राजस्थान से राज्यसभा गए थे। उनका कार्यकाल खत्म हुआ तो उनको पंजाब भेजा गया है। बताया जा रहा है कि वे वहां से विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह केरल के रहने वाले जॉर्ज कुरियन को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया था। लेकिन उनका भी कार्यकाल रिन्यू नहीं हुआ। बाद में दोनों ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। इस तरह तीन मंत्रियों को इस्तीफे हो चुके हैं। पीयूष गोयल, पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा संगठन में जिम्मेदारी निभा रहे हैं। और अब हरदीप सिंह पुरी व बीएल वर्मा का कार्यकाल रिन्यू नहीं हुआ है। इस तरह मोदी सरकार में आठ वैकेंसी बन गई है। अब अगर मोदी अपनी सरकार से किसी को नहीं भी हटाते हैं तो आठ से 10 लोगों को मंत्री बना सकते हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि अभी मंत्रिपरिषद में तुरंत बदलाव होता नहीं दिख रहा है। महिला  आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन के बारे में कोई फैसला होने के बाद ही मंत्रिमंडल का विस्तार होगा। ध्यान रहे सरकार ने अभी तक संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया है। कहा जा रहा है दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए बातचीत चल रही है।

सत्रावसान में देरी का एक रिकॉर्ड तो टूटा

संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए। सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था। लेकिन अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। संसद स्थघित हुए 47 दिन हो गए हैं। आमतौर पर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित होने के एक हफ्ते में सत्रावसान कर दिया जाता है। उसके बाद जब भी सत्र आहूत करना होता है तो राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति तय करती है और राष्ट्रपति से सत्र बुलाने का अनुरोध करती है। अगर सत्रावसान नहीं होता है तो सरकार जब चाहे फिर सत्र चालू कर सकती है। तभी हैरानी की बात है कि अगर सत्रावसान हो भी जाता है तो सरकार को नया सत्र बुलाने में कोई परेशानी नहीं होगी। फिर भी सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। पहले कहा जा रहा था कि सरकार दो तिहाई बहुमत जुटाने में लगी है इसलिए सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। उसे महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पास कराना है।

लेकिन अगर बहुमत का जुगाड़ नहीं हो पा रहा है तो सत्र का सत्रावसान कर दिया जाए, जब जुगाड़ हो जाएगा तो सरकार आराम से सत्र बुला सकती है। वैसे भी अब दो महीने से कम समय में संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होगा। तभी यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्यों सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। क्या नरेंद्र मोदी की सरकार इस मामले में भी कांग्रेस की सरकारों का रिकॉर्ड तोड़ना चाहती है? गौरतलब है कि कांग्रेस की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने 12 मई से 27 जुलाई 1987 तक सत्रावसान नहीं किया था। इसके बाद 1989 में एक मौका आया था जब 61 दिन तक सत्रावसान नहीं हुआ था। तीसरा सबसे ज्यादा दिन तक सत्रावसान नहीं करने का रिकॉर्ड पंडित नेहरू का था। 22 दिसंबर 1950 से पांच फरवरी 1951 तक सत्रावसान नहीं हुआ था। नरेंद्र मोदी की सरकार ने उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। क्या अब राजीव गांधी की सरकार के समय बना दोनों रिकॉर्ड तोड़ना है?

सिर्फ जाति समीकरण कितना काम आएगा!

उत्तर प्रदेश का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायने में बहुत खास होने वाला है। आजादी के बाद से आज तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार इतने दिन तक पद पर नहीं रहा। जब लगातार कांग्रेस की सरकार बनती थी तब भी मुख्यमंत्री बदलते रहते थे। दूसरी खास बात यह है कि 1990 में कांग्रेस का वर्चस्व खत्म होने के बाद पिछले 36 साल में पहली बार किसी एक पार्टी का 10 साल तक राज रहा है। अगले साल फरवरी में एक पार्टी और एक व्यक्ति के 10 साल के राज के बाद चुनाव होगा। सो, भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है। वैसे तो भाजपा ने सत्ता में रहते हुए सत्ता विरोधी माहौल यानी एंटी इन्कम्बैंसी की गुत्थी काफी हद तक सुलझा ली है। उसकी सरकारों के बार बार सत्ता में लौटने की संभावना दूसरी पार्टियों से ज्यादा होती है। यह भी कह सकते हैं कि भाजपा ने प्रो इन्कम्बैंसी को साध लिया है।

उत्तर प्रदेश का चुनाव इस मायने में भी बहुत खास होने वाला है कि पहली बार मुलायम सिंह का परिवार इतने समय तक सत्ता से बाहर रहा है। 2017 से पहले उनकी पार्टी थोड़े थोड़े अंतराल पर किसी न किसी फॉर्मूले से सरकार में आ जाती थी। कभी बसपा से तालमेल करके तो कभी लोकतांत्रिक कांग्रेस, रालोद या बसपा के बागियों के सहारे तो कभी अकेले। असल में उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला था। 1990 से लेकर 2007 तक 17 वर्षों में कई बार सपा की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो पांच साल के बाद सपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आई और अखिलेश यादव सीएम बने। लेकिन 2017 के बाद से सपा लगातार विपक्ष में है। एक और खास बात यह है कि लंबे अरसे के बाद उत्तर प्रदेश में बिल्कुल आमने सामने का विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछली बार यानी 2022 का विधानसभा चुनाव भी भाजपा और सपा के बीच ही था लेकिन तब तक मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक ताकत थी। उसके 10 सांसद थे और लगभग 20 फीसदी वोट था। लेकिन अब वह शून्य सांसद, शून्य विधायक और लगभग नौ फीसदी वोट वाली पार्टी है, जिसमें बहुत अंतर्कलह है। पिछले चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। इस बार बसपा पहले ही मुकाबले से बाहर है और यह लगभग तय लग रहा है कि कांग्रेस और सपा मिल कर लड़ेंगे। सो, भाजपा का पांच पार्टियों का गठबंधन सपा के गठबंधन से लड़ेगा।

कम से कम अभी दोनों पार्टियों की जो चुनावी तैयारी दिख रही है वह अपना अपना सामाजिक समीकरण साधने की है। दोनों गठबंधन अपने हिसाब से जातियों का गणित ठीक करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वैसे तो हर भाषण में बाबर, औरंगजेब, सालार मसूद गाजी आदि का नाम लेते हैं, पोस्टर में आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें लगाई जाती हैं और 80-20 की राजनीति की बात की जाती है। माफिया को पूरी तरह से खत्म कर देने के नैरेटिव से कानून व्यवस्था सुधरने की धारणा तो बनाई जाती है, साथ ही अतीक और मुख्तार के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मैसेजिंग भी बोती है।

इसके साथ ही भाजपा जातियों का प्रबंधन भी कर रही है। वह इस भरोसे में है कि उसके पास सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है, जो राजभर वोट लाएगी। निषाद पार्टी है, जिसके सहारे मल्लाह वोट मिलेंगे। अपना दल है, जिससे कुर्मी वोट सुनिश्चित है और रालोद है, जिसके सहारे जाट पूरी तरह से एकजुट रहेंगे। सामान्य वर्ग की जातियों यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ का वोट भाजपा पहले से पक्का मान रही है। उसको लग रहा है कि इनमें से अगर किसी जाति में कोई नाराजगी है तो वह रूठने जैसा है और चुनाव तक उसके मान जाने की संभावना सौ फीसदी है। इस तरह हिंदुत्व के अंदर जातियों का परफेक्ट समीकरण भाजपा बना हुआ मान रही है।

दूसरी ओर अखिलेश यादव की उम्मीदें लोकसभा चुनाव के बाद कई गुना बढ़ गई हैं। उनको लग रहा है कि पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का उनका फॉर्मूला कामयाब होगा। असल में उनके पास माई समीकरण यानी मुस्लिम और यादव का लगभग 30 फीसदी वोट है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होकर मुख्य मुकाबले से बाहर होने और कांग्रेस के सपा के साथ आऩे से मुस्लिम वोट में बिखराव की संभावना समाप्त हो गई है। लेकिन यह 30 फीसदी वोट सपा को कहीं नहीं पहुंचाएगा। तभी अखिलेश गैर यादव पिछड़ा और गैर जाटव दलित को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे है। इसमें कोई बुराई नहीं है। भारत में चुनाव जीतने के लिए जातियों का समीकरण बहुत अहम होता है। लेकिन सिर्फ इस आधार पर कोई भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती है।

समाजवादी पार्टी की इस रणनीति में समस्या इसलिए है क्योंकि उसे 10 साल से सत्ता में बैठी भाजपा को हराना है। सरकार चला रही किसी भी पार्टी को सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं हराया जा सकता है। आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई भी सरकार तभी हारी है, जब उसके खिलाफ कोई बहुत मजबूत और प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर हो। अगर सरकार के खिलाफ थोड़ी बहुत नाराजगी है या थोड़ी बहुत शिकायतें हैं तो उनके दम पर उस सरकार को नहीं हराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टी अपने जातीय समीकरण के दम पर ज्यादा से ज्यादा मजबूत विपक्ष का दर्जा बचाए रख पाएंगी। जैसा बिहार में राजद के साथ हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि जो सत्ता में बैठा है या लगातार चुनाव जीत रहा है उसका एक मजबूत सामाजिक समीकरण बना होता है और वह ऐसा लाभार्थी वर्ग तैयार करता है, जो हर हाल में उसे वोट करता है। यह विपक्ष का एक डिसएडवांटेज है।

सो, अखिलेश यादव को कांग्रेस से तालमेल करने और जातीय समीकरण साधने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर तैयार करने का प्रयास करना चाहिए था। हालांकि अगर सरकार के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा नहीं है तो सिर्फ प्रयास करने से सत्ता विरोधी लहर नहीं पैदा होगी। सत्ता विरोधी लहर दो तरह से बनती है। पहली, सरकार के कामकाज से नाराज होकर स्वाभाविक रूप से या फिर विपक्षी पार्टी के निरंतर प्रयास से। सरकार से नाराज होने की पर्याप्त वजह होने के बावजूद विपक्ष के निरंतर प्रयास की कमी से उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर नहीं बन सकी है। कम से कम अभी सतह के ऊपर ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है। जबकि ऐसा होना चाहिए था। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ युवाओं में नाराजगी है। समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव ने इसके खिलाफ जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया। लेकिन सपा इस नाराजगी को एक दिशा देने के लिए जरूरी निरंतरता के साथ काम नहीं कर सकी। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला है। संसद के मानसून सत्र में सपा ने इसे लेकर खूब राजनीति की लेकिन सत्र समाप्त होने के बाद सपा की ओर से इस मुद्दे पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है।

महंगाई वैसे तो पिछले 10 साल से लगातार बढ़ रही है लेकिन रूस व यूक्रेन युद्ध और इस साल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका के हमले की वजह से जिस तरह आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है उससे महंगाई में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। इसे हर आम और खास व्यक्ति महसूस कर रहा है। परंतु मुख्य विपक्षी पार्टी महंगाई को मुद्दा नहीं बना पाई है। रोजगार और लोगों की आर्थिक समस्याओं पर भी विपक्ष का फोकस कम ही रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले ‘संविधान खतरे में है’ और ‘आरक्षण समाप्त हो जाएगा’ का नैरेटिव जन जन तक पहुंच गया था। उसका भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन वह नैरेटिव विधानसभा चुनाव में नहीं चल सकता है क्योंकि मतदाता इतना तो समझता है कि राज्य की सरकार संविधान नहीं बदल सकती है और न आरक्षण खत्म कर सकती है। तभी विपक्ष के पास कोई ग्रैंड नैरेटिव नहीं है और न सरकार के खिलाफ बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर है। तभी सिर्फ जातीय समीकरण साधने से चुनाव जीतना मुश्किल होगा। हालांकि अभी पांच महीने का समय है और राजनीति में पांच महीने को अनंतकाल माना जाता है।

वंदे मातरम पर कोर्ट ने मांगा जवाब

नई दिल्ली। वंदे मातरम के सम्मान को लेकर केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारण से वंदे मातरम नहीं गाता है तो उस व्यक्ति के ऊपर आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की और केंद्र सरकार से इस पर जवाब भी मांगा है।

इस मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विचार करने की सहमति दी कि वंदे मातरम नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। हालांकि कोर्ट ने यह तय करने से इनकार कर दिया कि राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक होगा। गौरतलब है कि संसद के मानसून सत्र में पास किए गए कानून के मुताबिक छह अंतरे गाने की अनिवार्यता की गई है और वंदे मातरम के गायन को रोकने या गायन में जान बूझकर बाधा डालने को अपराध बनाया गया है।

बहरहाल, इस मामले को लेकर गायक टीएम कृष्णा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि वंदे मातरम के अंतिम चार अंतरे हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान करते हैं। उनका कहना है कि इन अंतरों का गायन अनिवार्य बनाना देश के धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है। गौरतलब है कि वंदे मातरम को कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन बिल 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पास हुआ था। इसके बाद छह अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बन गया।

टीम कृष्णा की अपील पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि वंदे मातरम से जुड़े कानून की व्याख्या करते समय 1986 के ‘बिजो इमैनुअल’ फैसले में तय सिद्धांतों को लागू किया जाएगा। गौरतलब है कि, 1986 के बिजो इमैनुअल बनाम केरल सरकार मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने के आधार पर उन्हें सजा नहीं दी जा सकती।