NEET विवाद, CJP प्रमुख अभिजीत दिपके ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी, छात्रों के उत्पीड़न का लगाया आरोप

abhijeet dipke at jantar mantar

NEET विवाद को लेकर जारी आंदोलन के बीच Cockroach Janta Party (CJP) के प्रमुख अभिजीत दिपके ने मंगलवार को एक बार फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा प्रदर्शन कर रहे छात्रों को परेशान किया जा रहा है। दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अगर छात्रों के खिलाफ कथित कार्रवाई जारी रही तो उनकी पार्टी जल्द ही एक बड़ा और शांतिपूर्ण आंदोलन आयोजित करेगी। उन्होंने सरकार पर प्रदर्शन में शामिल छात्रों को निशाना बनाने का भी आरोप लगाया।

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छात्रों के उत्पीड़न पर बड़े प्रदर्शन की चेतावनी

 

अभिजीत दिपके ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पुलिस द्वारा छात्रों को परेशान करने की कार्रवाई जारी रहती है तो Cockroach Janta Party जल्द ही बड़े स्तर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेगी। उन्होंने सरकार से छात्रों को निशाना बनाना और कथित उत्पीड़न बंद करने की मांग की।

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आंदोलन खत्म नहीं हुआ, CJP ने जारी रखने की बात कही

 

हालांकि केंद्र सरकार द्वारा संगठन की प्रमुख मांगों में से एक को स्वीकार किए जाने के बाद प्रदर्शन समाप्त कर दिया गया था, लेकिन CJP नेताओं का कहना है कि उनका अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। अभिजीत दिपके ने कहा कि आंदोलन वापस लेने का मतलब यह नहीं है कि लड़ाई समाप्त हो गई है। उन्होंने कहा कि CJP को अभी 'लंबा रास्ता तय करना है' और प्रदर्शन का समापन केवल शुरुआत है।

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NEET विवाद में मृत छात्रों के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग

 

CJP प्रमुख ने परीक्षा विवाद के दौरान कथित रूप से आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग भी की है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि प्रभावित परिवारों को नियमों के अनुसार अधिकतम संभव सहायता प्रदान की जाएगी।

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शिक्षा सुधारों को लेकर अभियान जारी रखेगी CJP

CJP नेताओं ने संकेत दिए हैं कि संगठन शिक्षा व्यवस्था में सुधार और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर अपना अभियान जारी रखेगा।  CJP प्रवक्ता सौरव दास ने समाचार कहा कि संगठन युवाओं से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाता रहेगा और शिक्षा एवं प्रशासनिक सुधारों के लिए प्रयास जारी रखेगा।

India’s Toy Industry: भारत के खिलौनों की दुनिया में बढ़ी धाक, 7 साल में 89% बढ़ा एक्सपोर्ट, जानें ये सक्सेस स्टोरी

Toy Industry updates: वैश्विक बाजार में भारतीय खिलौनों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले सात वर्षों में डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग और सरकार की प्रोत्साहन नीतियों के बल पर भारत के खिलौना उद्योग का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। वर्ष 2018-19 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत से खिलौनों के निर्यात में 89.1 प्रतिशत का बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। वहीं दूसरी तरफ विदेशी खिलौनों पर निर्भरता कम हुई है और आयात में 37.5 फीसदी की भारी कमी देखने को मिली है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने आज लोकसभा में एक लिखित जवाब के जरिए इस सफलता का ब्योरा साझा किया। भारत अब खिलौने आयात करने वाले देश से उभरकर एक शुद्ध निर्यातक बन चुका है और अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स तथा जर्मनी जैसे विकसित देशों को भारतीय खिलौने निर्यात किए जा रहे हैं।

सात वर्षों में बदला व्यापार का संतुलन

ट्रेडस्टैट आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 में भारत दुनिया भर से 371.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर के खिलौने आयात करता था। हालांकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा घटकर 232.3 मिलियन डॉलर पर आ गया। वर्ष 2018-19 में भारत का खिलौना निर्यात 203.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2025-26 में 89.1 फीसदी बढ़कर 384.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। यह बदलाव इस बात को दिखा रहा है कि देश में टॉय मैन्युफैक्चरिंग की क्षमताओं में तेजी से इजाफा हुआ है।

खिलौनों की गुणवत्ता और सुरक्षा में बड़ा सुधार

वर्ष 2018-19 में भारत आने वाले आयातित खिलौनों का एक बड़ा हिस्सा घटिया, असुरक्षित और नकली होता था। वर्ष 2019 में आयोजित एक मिस्ट्री शॉपिंग सर्वे के दौरान पाया गया था कि भारतीय बाजार में बिकने वाले सिर्फ 33 फीसदी खिलौने ही भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते थे। इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाए। इसी का नतीजा है कि साल 2025 में बीआईएस द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि अब देश में उपलब्ध 95 प्रतिशत खिलौने निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं।

टॉय बिज़ इंटरनेशनल 2026 में दिखा भारतीय ब्रांड्स का जलवा

टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा 4 से 7 जुलाई 2026 के दौरान नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 17वीं टॉय बिज़ इंटरनेशनल B2B प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस विशाल आयोजन में 400 भारतीय खिलौना ब्रांड्स, 40 से अधिक देशों के 100 अंतरराष्ट्रीय खरीदार और लगभग 30000 बिजनेस विजिटर्स शामिल हुए। इस प्रदर्शनी ने भारतीय निर्माताओं को वैश्विक खरीदारों, थोक विक्रेताओं, वितरकों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करने का एक बड़ा मंच प्रदान किया। आपको बता दें कि अभी केंद्र सरकार की कोई अलग से खिलौना नीति नहीं है, लेकिन अलग अलग मंत्रालयों के संयुक्त प्रयासों से इस उद्योग को जबरदस्त गति मिली है।

सरकारी नीतियों और पहलों का मिला फायदा

खिलौना उद्योग की इस सफलता के पीछे सरकार की खास रणनीति रही है। 14 मंत्रालयों और विभागों के समन्वय से 21 एक्शन पॉइंट्स वाली राष्ट्रीय खिलौना कार्य योजना (NAPT) लागू की गई, जिसमें भारतीय संस्कृति व इतिहास पर आधारित खिलौनों के डिजाइन और स्वदेशी क्लस्टरों को प्राथमिकता दी गई। इसके साथ ही फरवरी 2020 में बेसिक कस्टम ड्यूटी को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत और 2023 में 70 प्रतिशत किया गया जबकि बजट 2025-26 में इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के कलपुर्जों पर शुल्क 20 प्रतिशत संशोधित किया गया। 25 फरवरी 2020 को गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) जारी कर 1 जनवरी 2021 से लागू किया गया जिसके तहत बीआईएस ने घरेलू निर्माताओं को 1800 से अधिक और विदेशी निर्माताओं को 50 से अधिक लाइसेंस जारी किए हैं।

नई शिक्षा नीति, क्लस्टर विकास और निर्यात प्रोत्साहन

नई शिक्षा नीति 2020 के तहत एनसीईआरटी ने ‘टॉय बेस्ड पेडागोजी’ पर हैंडबुक जारी की, जिसने पढ़ाई में स्वदेशी खिलौनों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। एमएसएमई मंत्रालय ने स्फूर्ति योजना के तहत 18 खिलौना क्लस्टरों को मंजूरी दी और कपड़ा मंत्रालय 40 क्लस्टरों को डिजाइनिंग व टूलिंग सहायता प्रदान कर रहा है। इसके अलावा डीपीआईआईटी द्वारा 700 से अधिक खिलौना स्टार्टअप्स को मान्यता दी गई है और RoDTEP योजना के जरिए 2200 से अधिक निर्यातकों को वित्तीय सहायता मिली है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ओमान, न्यूजीलैंड और यूके के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों से भारतीय खिलौनों को वैश्विक बाजारों में शून्य-शुल्क पहुंच मिली है। इसने भारत को खिलौना निर्माण का वैश्विक केंद्र बना दिया है।

PUC Validity: अब हर साल PUC बनवाने का झंझट खत्म, BS-VI गाड़ियों का 3 साल तक वैध रहेगा सर्टिफिकेट!

Vehicle PUC Certificate New Rules: देश में करोड़ों कार-बाइक मालिकों के लिए एक राहत भरी खबर है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय गाड़ियों के प्रदूषण सर्टिफिकेट को लेकर एक बड़ा बदलाव करने जा रहा है। सरकार के नए प्रस्ताव के तहत BS-VI (BS-6) निजी वाहनों का पीयूसी सर्टिफिकेट अब 3 साल तक के लिए मान्य हो सकता है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन (संशोधन) नियमावली, 2026 का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। सरकार ने इस नए प्रस्ताव पर आम जनता और हितधारकों से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं।

वाहनों की श्रेणी के हिसाब से PUC की नई वैधता

गैजेट नोटिफिकेशन के अनुसार, वाहनों के एमिशन नॉर्म्स और उनके इस्तेमाल (कमर्शियल या प्राइवेट) के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) की वैधता इस प्रकार तय की जाएगी:

A. BS-VI (BS-6) निजी वाहन

शुरुआती 6 साल तक: प्रथम पंजीकरण की तारीख से पहले 6 साल तक 3 साल की वैधता मिलेगी।

6 से 10 साल पुराने वाहन: 6 साल से अधिक लेकिन 10 साल तक पुराने होने पर 1 साल की वैधता मिलेगी।

10 साल से पुराने वाहन: 10 वर्ष से अधिक पुराने होने पर 6 महीने की वैधता रहेगी।

B. BS-VI (BS-6) कमर्शियल वाहन

शुरुआती 6 साल तक: प्रथम पंजीकरण की तारीख से पहले 6 साल तक 2 साल की वैधता मिलेगी।

6 से 10 साल पुराने वाहन: 1 साल की वैधता मिलेगी।

10 साल से पुराने वाहन: 6 महीने की वैधता रहेगी।

C. अन्य BS स्टेज वाले वाहन

BS-I, BS-II और BS-III वाहन: इन गाड़ियों के लिए पीयूसी की वैधता 3 महीने रहेगी।

BS-IV (BS-4) वाहन: बीएस-4 उत्सर्जन मानकों वाली सभी गाड़ियों के लिए पीयूसी की वैधता 6 महीने होगी।

रिन्यूअल के लिए बनाए गए खास नियम

ड्राफ्ट में पीयूसी सर्टिफिकेट के नवीनीकरण को लेकर भी स्पष्टता दी गई है। अगर कोई वाहन मालिक अपने पीयूसी समाप्त होने की तारीख से 15 दिन पहले ही नया सर्टिफिकेट बनवा लेता है, तो नया सर्टिफिकेट पुरानी समाप्ति तिथि से ही प्रभावी माना जाएगा। अन्य सभी मामलों में, नया सर्टिफिकेट उसकी जारी होने या नवीनीकरण की तारीख से लागू होगा।

30 दिनों में मांगे गए सुझाव और आपत्तियां

सरकार द्वारा 22 जुलाई 2026 को हस्ताक्षरित और 24 जुलाई 2026 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर 30 दिनों का समय दिया गया है। आम जनता या कोई भी हितधारक अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल आईडी comments-morth@gov.in पर भेज सकते हैं। 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद प्राप्त सुझावों पर विचार करके केंद्र सरकार अंतिम नियम लागू करेगी।

धर्मेंद्र प्रधान को बचाने की हुई थी आखिरी कोशिश! शिक्षा मंत्रालय बदलने का ऑफर ठुकराया, इस्तीफे पर अड़ा रहा CJP

Dharmendra Pradhan Resignation: पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले केंद्र सरकार ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने उन्हें शिक्षा मंत्रालय से हटाकर किसी दूसरे मंत्रालय की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव तैयार किया था। लेकिन आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। संगठन का साफ कहना था कि धर्मेंद्र प्रधान का सिर्फ मंत्रालय बदलना नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा ही स्वीकार होगा।

बताया गया है कि 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले पिछले कई सप्ताह से NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के अभियान में बदल गया। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधान के पद छोड़ने से पहले केंद्र ने एक समझौता करने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार CJP के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को मनाने में नाकाम रही।

सरकार ने निकाला था बीच का रास्ता

The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने विवाद को शांत करने के लिए एक समझौते का रास्ता तलाशने की कोशिश की। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने CJP के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी कि यदि धर्मेंद्र प्रधान से शिक्षा मंत्रालय लेकर उन्हें किसी अन्य मंत्रालय में भेज दिया जाए तो क्या आंदोलन समाप्त किया जा सकता है।

हालांकि आंदोलनकारी नेताओं ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी मुख्य मांग धर्मेंद्र प्रधान का पूर्ण इस्तीफा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच प्रभावी संवाद समय पर स्थापित नहीं हो सका, जिससे दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर और अधिक अड़ गए। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच लगातार बातचीत का जरिया न बन पाने की वजह से गतिरोध बना रहा। फिर दोनों पक्षों का रुख और कड़ा हो गया।

NEET विवाद से शुरू हुआ था आंदोलन

यह आंदोलन NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों के बाद शुरू हुआ था। बाद में यह सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। बल्कि भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग को लेकर व्यापक अभियान बन गया। CJP नेताओं ने इसे केवल एक मंत्री के खिलाफ विरोध नहीं। बल्कि परीक्षा प्रणाली में कथित खामियों और जवाबदेही की कमी के खिलाफ आंदोलन बताया।

बीजेपी के भीतर भी बढ़ी थी चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, इस्तीफे से करीब 48 घंटे पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार के भीतर भी यह महसूस किया जाने लगा था कि बढ़ते जनाक्रोश और संसद में लगातार हो रहे हंगामे के बीच धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री बने रहना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता जा रहा है। सरकार ने बैक-चैनल बातचीत के जरिए संकट टालने की कोशिश की। लेकिन जंतर-मंतर पर बैठे आंदोलनकारी किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं हुए।

खबरों के मुताबिक, सरकार ने पर्दे के पीछे से बातचीत करके और प्रधान को कैबिनेट से हटाने के बजाय कुछ रियायतें देकर संकट को कम करने की कोशिश की थी। हालांकि, CJP का कहना था कि आंदोलन की मुख्य मांग तभी पूरी होगी जब वे इस्तीफा देंगे। सोशल मीडिया पर मजबूत लामबंदी और पहली बार वोट देने वालों एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के बीच अपील के कारण इस विरोध प्रदर्शन को असामान्य राजनीतिक महत्व भी मिला।

आखिरकार देना पड़ा इस्तीफा

करीब पांच सप्ताह तक चले आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद CJP ने इसे छात्रों की जीत बताते हुए अपना आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार ने प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। ओडिशा के वरिष्ठ BJP नेता प्रधान ने पेट्रोलियम, स्टील और शिक्षा जैसे कई अहम मंत्रालय संभाले थे। लेकिन लगभग पांच सप्ताह के विरोध प्रदर्शन के बाद उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी।

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Plastic currency notes : 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोटों पर सरकार की मुहर, ट्रायल के लिए RBI के प्रस्ताव को मिली मंजूरी, क्या बंद हो जाएंगे पुराने नोट

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केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 10 रुपए और 20 रुपए मूल्यवर्ग के पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा कागज के नोटों को पूरी तरह प्लास्टिक नोटों से बदलने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

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हाल ही में खबर आई थी कि RBI की नोट छापने वाली इकाई भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने सुरक्षा फीचर्स वाले पॉलिमर सब्सट्रेट शीट्स की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से रुचि पत्र (EOI) आमंत्रित किए हैं। हालांकि टेंडर में यह नहीं बताया गया है कि ये नोट किस मूल्यवर्ग में और कब से नियमित रूप से जारी किए जाएंगे।

लोकसभा में सोमवार को एक सवाल के लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि RBI के केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश पर 10 रुपए और 20 रुपए के एक-एक अरब (100 करोड़) पॉलिमर नोटों को फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव दिया गया था। ट्रायल सफल रहने के बाद इन्हें नियमित रूप से जारी करने की योजना है। इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है।

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मंत्री ने बताया कि RBI के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि पॉलिमर बैंक नोटों की उम्र कागज के नोटों की तुलना में काफी अधिक होती है। ये अधिक टिकाऊ होते हैं और लंबे समय तक उपयोग में रह सकते हैं। डिजिटल भुगतान पर संभावित असर को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में पंकज चौधरी ने कहा कि पॉलिमर नोटों की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।

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इनके नियमित रूप से जारी होने के बाद ही डिजिटल लेनदेन पर इनके प्रभाव का सही आकलन किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि नकद और डिजिटल भुगतान दोनों आम जनता के लिए एक-दूसरे के पूरक माध्यम हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉलिमर नोट मौजूदा कागज आधारित नोटों के साथ ही चलेंगे। फिलहाल कागज के नोटों को पूरी तरह हटाकर केवल प्लास्टिक नोट जारी करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

 

Plastic Currency: ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोटों को केंद्र सरकार से मिली मंजूरी, जल्द मार्केट में होगी एंट्री

₹10 and ₹20 Polymer Banknotes Trial: केंद्र सरकार ने 27 जुलाई 2026 को संसद में जानकारी दी कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के पॉलीमर बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। वित्त मंत्रालय ने संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया कि आरबीआई का उद्देश्य कागज के नोटों के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ पॉलीमर नोटों की उपयोगिता और जीवनकाल को परखना है।

100-100 करोड़ पीस पॉलीमर नोटों का होगा परीक्षण

वित्त मंत्रालय के अनुसार, आरबीआई ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश के बाद ₹10 और ₹20 के 1-1 अरब पीस पॉलीमर नोट जारी कर ट्रायल करने का प्रस्ताव रखा था।अगर यह फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो इसके बाद इन दोनों मूल्यवर्गों में पॉलीमर बैंक नोटों का नियमित रूप से जारी किया जाना शुरू कर दिया जाएगा। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि पॉलीमर नोटों की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।

क्यों पड़े पॉलीमर नोटों की जरूरत?

कागज के नोटों की तुलना में पॉलीमर नोटों के कई फायदे होते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, पॉलीमर यानी प्लास्टिक से बने नोट कागज वाले नोटों की तुलना में काफी लंबे समय तक चलते हैं। ये नोट पानी से खराब नहीं होते, आसानी से फटते नहीं हैं और पसीने या गंदगी से जल्दी मैले नहीं होते। ₹10 और ₹20 जैसे छोटे नोटों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है, इसलिए कागज के नोट जल्दी खराब हो जाते हैं।

क्या बंद हो जाएंगे पुराने कागज वाले नोट?

सरकार ने इस बात पर पूरी स्थिति साफ कर दी है। आरबीआई इन नए पॉलीमर नोटों को मौजूदा कागज के नोटों के साथ ही सर्कुलेशन में लाएगा। कागज की करेंसी को पूरी तरह बंद करने या उसे पॉलीमर नोटों से बदलने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।

डिजिटल पेमेंट पर क्या पड़ेगा असर?

यह पूछे जाने पर कि क्या प्लास्टिक नोट आने से यूपीआई और डिजिटल भुगतानों पर असर पड़ेगा, वित्त मंत्रालय ने कहा, इसका कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं, इसका सही आकलन पॉलीमर नोटों के नियमित रूप से जारी होने के बाद ही किया जा सकेगा। सरकार का मानना है कि कागजी/पॉलीमर बैंक नोट और डिजिटल पेमेंट सिस्टम एक-दूसरे के पूरक हैं और जनता की सुविधा के लिए दोनों विकल्प मौजूद रहेंगे।

शिक्षामंत्री का इस्तीफा: किसी की जीत नहीं, सिर्फ राष्ट्रहित है

A picture of students protesting at Jantar Mantar against the education system and the NEET-UG exam

क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं,

कर्तव्य पथ पर जो मिला, यह भी सही वह भी सही। — अटल बिहारी वाजपेयी

 

राजनीति में पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन जब बात देश के भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और करोड़ों विद्यार्थियों के हित की आती है, तब केवल और केवल राष्ट्र प्रथम का विचार ही सर्वोपरि रहता है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में हुआ नेतृत्व परिवर्तन केवल एक सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह परिपक्व राजनीति, नैतिक उच्चता और देश को अस्थिर करने व अराजकता फैलाने का प्रयास करने वाली ताकतों को दिया गया मजबूत और करारा संदेश है।

 

पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का अपने पद से इस्तीफा देना यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या कुर्सी से कहीं ऊपर देश और युवाओं का भविष्य है, जैसा कि उन्होंने प्रधानमंत्री को स्वयं लिखे पत्र में भी उल्लेख किया है। जब जंतर-मंतर पर विभिन्न आंदोलनों और उपद्रवों की आड़ में देश को उद्वेलित करने और असंतोष फैलाने की साजिश रची जा रही थी, तब उन्होंने देश की युवाशक्ति के भविष्य को भ्रम और अनिश्चितता से बचाने के लिए नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार की।

 

उन्होंने पहले ही दिन से परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए सीबीआई जांच सौंपी और कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट मोड जैसी व्यवस्थाएं लागू की। जब यह साफ दिखने लगा कि विरोध-प्रदर्शनों की आड़ में देशविरोधी और असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ने का एजेंडा चला रहे हैं, तब उन्होंने पद त्याग कर विरोधियों की पूरी साजिश को एक झटके में नाकाम कर दिया। उनके इस कदम से सिद्ध हुआ कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के लिए पद नहीं, बल्कि देश और विद्यार्थियों का हित ही सर्वोपरि है।

 

यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान जी पहले भी इस्तीफा दे सकते थे? लेकिन जैसे ही पेपर लीक का विषय सामने आया, उन्होंने जिम्मेदारियों से भागने के बजाय नीट-यूजी की परीक्षा का पुनः आयोजन पूर्ण पारदर्शिता के साथ करवाया।

उन्होंने नीट का परिणाम आने और पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता से संपन्न होने के बाद ही अपना इस्तीफा सौंपा। यदि वे विवाद के शुरुआती दौर में इस्तीफा दे देते, जब पूरा विपक्ष और असामाजिक तत्व चील की तरह नज़रें गड़ाए बैठे थे, तो इस महत्वपूर्ण परीक्षा प्रक्रिया में प्रशासनिक गतिरोध पैदा हो सकता था। अतः पूरी प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक संपन्न कराने के उपरांत ही इस्तीफा सौंपना अत्यंत व्यावहारिक, रणनीतिक और सही कदम था।

 

राष्ट्रपति ने धर्मेंद्र प्रधान के बाद अब शिक्षा मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी प्रहलाद जोशी को सौंपी है। वे एक बहुत ही अनुशासित, दृढ़ और परिणाम-उन्मुख नेता माने जाते हैं। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत कर्नाटक के हुबली स्थित ईदगाह मैदान में राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराने के प्रखर राष्ट्रवादी संकल्प से हुई थी।

केंद्रीय संसदीय कार्य, कोयला व खान मंत्री के रूप में उन्होंने कई कठिन विधायकी कार्यों और संकटपूर्ण परिस्थितियों का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया है। वे अपने सख्त अनुशासन, प्रशासनिक पकड़ और स्पष्ट दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन और शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों को बिना किसी गतिरोध के आगे बढ़ाने में वे पूरी तरह सक्षम हैं। 

 

एक घोर राष्ट्रवादी और दृढ़ नेतृत्व के हाथों में शिक्षा मंत्रालय आने से देश की शिक्षा प्रणाली और अधिक सशक्त होने की आशा है। फिर भी इन सबके बीच जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में जारी विरोध-प्रदर्शनों के पीछे की मंशा अब पूरी तरह जनता के सामने आ चुकी है।

आंदोलन के नाम पर अनशन, उग्र और अश्लील नारों तथा सनातन धर्म एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लेने का प्रयास किया गया। सोनम वांगचुक जैसे चेहरों की भूख हड़ताल को आगे रखकर व्यवस्था पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन देश के जागरूक नागरिकों ने इस विघटनकारी सोच को अच्छी तरह समझ लिया है।

 

इस पूरे घटनाक्रम ने तथाकथित छात्र नेताओं और आंदोलनकारियों के दोहरे मापदंडों की भी पोल खोल दी है। जो खुद को छात्रों का रहनुमा बताते फिर रहे हैं, वे गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे पंजाब, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना में हुए पेपर लीक मामलों पर पूरी तरह खामोश बैठे हैं और मीडिया के सवालों से कतराते दिख रहे हैं।

लेकिन इन छात्र संगठनों और प्रवक्ताओं द्वारा वहां के शिक्षा मंत्रियों से इस्तीफे की मांग क्यों नहीं की जा रही? यह चुप्पी साबित करती है कि यह आंदोलन छात्रों के हित में नहीं, बल्कि केवल भाजपा से राजनीतिक द्वेष के तहत विपक्ष द्वारा प्रेरित था।

 

वहीं सरकार ने इस पूरे एजेंडे के जवाब में एक साथ कई बड़े रणनीतिक लक्ष्य साध लिए हैं। आंदोलन की आड़ में संसद का काम रोकने और देश का माहौल खराब करने का लक्ष्य पूरी तरह विफल हो गया है।

विपक्षी पार्टियों की पोल खुली है कि उनके लिए देश से पहले पार्टी है। वहीं हिंसक गतिविधियों और उपद्रव में लिप्त तत्वों की पहचान हो चुकी है, जिससे अब कानून के अनुसार उन पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। साथ ही, विपक्षी राज्यों में भी पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर वहां की सरकारों को घेरने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

 

कहते हैं अधर्म और षड्यंत्र रचने वाली शक्तियों को लगता है कि वे कुछ समय के लिए भ्रम फैला सकती हैं, लेकिन इतिहास साक्षी है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने भी धर्म की स्थापना के लिए चुनौतियों का सामना किया और अंततः रावण तथा कंस जैसी ताकतों का समूल नाश हुआ।

सनातन संस्कृति और देश को अस्थिर करने वाले अपने ही जाल में उलझकर रह गए हैं। उनका देश को नेपाल और बांग्लादेश बनाने के मंसूबे पर पानी फिर गया है। सत्य और धर्म की राह में सामयिक चुनौतियां अवश्य आती हैं, किंतु जीत राष्ट्रहित की ही होती है। एक बार फिर सिद्ध हो चुका है कि भारत की नीतियां किसी दबाव या षड्यंत्र से तय नहीं होंगी, वे केवल और केवल राष्ट्रहित से ही संचालित होंगी।

PoK में आज विधानसभा चुनाव का पहला चरण:45 में से 13 सीटों पर मतदान; विरोध प्रदर्शन की वजह से तीन चरणों में चुनाव होगा

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सोमवार को विधानसभा चुनाव का पहला चरण हैं। पाकिस्तानी चुनाव आयोग के मुताबिक, मौजूदा सुरक्षा हालात और विरोध प्रदर्शनों के देखते हुए यह चुनाव तीन चरणों में होंगे। पहला 27 जुलाई, दूसरा 2 अगस्त और तीसरा 10 अगस्त को मतदान कराया जाएगा। चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर मतदान होगा। दो अगस्त को मुजफ्फराबाद डिवीजन की 9 सीटों और पाकिस्तान में रहने वाले शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। अंतिम चरण में 10 अगस्त को पूंछ डिवीजन की 11 सीटों पर मतदान होगा। PoK में कई महीनों से चल रहा है विरोध प्रदर्शन PoK में पिछले कई महीनों से महंगाई, बिजली के बढ़े हुए बिल, सरकारी नीतियों और राजनीतिक दखल के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों की अगुआई जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) कर रही है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में कई लोगों की मौत हुई है। महंगाई के विरोध से शुरू हुआ ये आंदोलन, अब पाकिस्तान सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने कई जगह बल प्रयोग किया, रास्ते बंद किए और संचार सेवाएं रोक दीं। उनका कहना है कि इससे खाने-पीने की चीजों और दवाइयों की भी कमी हो गई। कई प्रदर्शनकारी पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी हटाने और क्षेत्र की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहे हैं। 12 शरणार्थी सीटों पर सबसे ज्यादा विवाद विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी वजह विधानसभा की 12 शरणार्थी सीटें भी हैं। ये सीटें पाकिस्तान में रहने वाले उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जो दशकों पहले कश्मीर से वहां गए थे। JKJAAC और कई स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की सरकार चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। इससे स्थानीय लोगों की राय कमजोर पड़ जाती है और केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, इस बार के चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब लोगों का बड़ा वर्ग पाकिस्तान सरकार की नीतियों से नाराज है। इसी वजह से चुनाव की निष्पक्षता और उसके नतीजों पर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं, PoK के चुनाव आयुक्त गुलाम मुस्तफा मुगल ने बताया कि मतदान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बल और सेना तैनात रहेगी। क्या चुनाव से खत्म होगी नाराजगी? एक्सपर्ट्स का मानना है कि मतदान तो हो जाएगा और वोटिंग भी हो सकती है, लेकिन इससे लोगों की मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा। महंगाई, बिजली, राजनीतिक अधिकार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और पाकिस्तान की भूमिका जैसे मुद्दे अभी भी बने हुए हैं। ऐसे में चुनाव के बाद भी PoK में राजनीतिक तनाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है। भारत ने चुनाव पर विरोध दर्ज कराया भारत लगातार कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश, जिनमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल हैं, भारत के अभिन्न हिस्से हैं। भारत ने PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान में होने वाले चुनावों पर पहले भी कई बार पाकिस्तान के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है और इन क्षेत्रों की तथाकथित विधानसभाओं को मान्यता नहीं दी है। मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हालात पर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने भी हिंसा में हुई मौतों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से PoK में मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की अपील की है। नवाज शरीफ ने PoK का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जताई चुनावी माहौल के बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) प्रमुख नवाज शरीफ ने मुजफ्फराबाद की चुनावी रैली में कहा कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे ताकि वे खुद इलाके के विकास की निगरानी कर सकें। नवाज शरीफ ने कहा कि PoK उनके लिए पंजाब जितना ही प्रिय है और उनके पूर्वज कश्मीर से आए थे। उन्होंने कहा कि यह उनका दूसरा घर है। इस चुनाव में PML-N का मुकाबला पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) से है। खास बात यह है कि PPP इस समय केंद्र सरकार में PML-N की सहयोगी भी है। 2021 में इमरान खान की पार्टी ने बनाई थी सरकार PoK में विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है। इससे पहले 2021 में PoK विधानसभा चुनाव में इमरान खान की पार्टी (PTI) ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने। हालांकि अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार गिर गई। मई 2022 में सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद PTI ने ही सरदार तनवीर इलियास को नया प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन अप्रैल 2023 में PoK की उच्च अदालत ने उन्हें अदालत की अवमानना के मामले में अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद उनका पद चला गया और एक बार फिर नया प्रधानमंत्री चुनना पड़ा। इसके बाद PTI के ही चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने इमरान खान और PTI से दूरी बना ली और खुद को स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित किया। चौधरी अनवरुल हक को भी नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटा दिया गया था, और अब वहां पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के फैसल मुमताज राठौर नए प्रधानमंत्री हैं।

‘ हाई पावर टास्क फोर्स बनेगी …’, परीक्षा रिफॉर्म पर PM मोदी का बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीट पेपर लीक के बाद परीक्षा सुधारों के लिया बड़ा फैसला किया है। पीएम मोदी ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि केंद्र सरकार छात्रों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार ठोस कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, वे जेल भेजे जा चुके हैं और ऐसे मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट भी बनाई गई हैं। उन्होंने बताया कि नंदन नीलेकणी की अगुवाई में हाई पावर टास्क फोर्स बनेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि सरकार संसद में एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है, जिसमें परीक्षा से जुड़े अपराधों के खिलाफ कड़े कानूनी प्रावधान होंगे। उन्होंने कहा कि सिर्फ दोषियों पर कार्रवाई करना ही काफी नहीं है, बल्कि भविष्य की परीक्षा व्यवस्था को भी पूरी तरह पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली में आधुनिक तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाएगा। इसी उद्देश्य से सरकार ने देश के जाने-माने तकनीकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक हाई पावर टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया है। यह समिति परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव देगी और उसकी रिपोर्ट के आधार पर जल्द ही जरूरी कदम उठाए जाएंगे, ताकि आने वाली सभी परीक्षाएं निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकें।

कौन हैं नंदन निलेकणि

नंदन निलेकणि टेक्नोलॉजी क्षेत्र के दिग्गज उद्यमी हैं। उन्हें इन्फोसिस के सह-संस्थापक और आधार कार्ड के जनक के रूप में जाना जाता है। वो 2002 से 2007 तक इन्फोसिस के CEO और MD रहे। बाद में 2017 में कंपनी के चेयरमैन के रूप में भी लौटे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2009 में नंदन नीलेकणि को UIDAI प्रोजेक्ट का चेयरमैन बनने के लिए आमंत्रित किया। नंदन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। UIDAI को ‘डिजिटल इंडिया’ को आकार देने में एक अहम कदम माना जाता है। आज, आधार को दुनिया भर में सबसे बड़े बायोमेट्रिक सिस्टम के तौर पर पहचाना जाता है।