5 AM क्लब Vs Night Owl: IITian फाउंडर इशान 11:30 पर जगते हैं और रात 9 के बाद चलता है असल दिमाग! ये है क्रिएटिविटी का सीक्रेट

हालांकि कई स्टार्टअप फाउंडर सुबह 5 बजे अलार्म लगाने और सुबह के बिज़ी रूटीन को बहुत ज़रूरी मानते हैं, लेकिन IIT दिल्ली के पूर्व छात्र ईशान जिंदल को ऐसा शेड्यूल पसंद है जो देर से शुरू होता है और देर रात तक चलता है। 30 साल के इस एंटरप्रेन्योर का कहना है कि उनके काम के सबसे प्रोडक्टिव घंटे रात 9 बजे के बाद शुरू होते हैं, जब ज़्यादातर कर्मचारी जा चुके होते हैं और ऑफिस में काफी शांति हो जाती है।

जिंदल ने मनीकंट्रोल को बताया, “तभी मैं सबसे ज़्यादा क्रिएटिव होता हूँ।” उन्होंने बताया कि उन्हें सुबह जल्दी उठने के बजाय देर तक काम करना क्यों पसंद है। इस साल की शुरुआत में ‘शार्क टैंक इंडिया’ में आने और Shaadi.com के फाउंडर अनुपम मित्तल से 50 लाख रुपये की डील हासिल करने के बाद चर्चा में आए इस फाउंडर ने बताया कि वे आम तौर पर सुबह 11:30 बजे के आसपास उठते हैं। कई फाउंडर जो सूरज उगने के साथ अपना दिन शुरू करते हैं, उनसे अलग जिंदल ने कहा कि उनका ऑफिस रूटीन आम तौर पर दोपहर 12:30 या 1 बजे के आसपास शुरू होता है। फिर भी, ऑफिस पहुंचने से पहले ही कॉल और दूसरे कामों के ज़रिए काम अक्सर शुरू हो जाता है।

उन्होंने कहा, “मेरा शेड्यूल थोड़ा अलग है। मैं असल में अपना काम दोपहर 12:30 या 1 बजे के आसपास शुरू करता हूं।”IIT दिल्ली के ग्रेजुएट ने कहा कि उनके ऑफिस का समय आम तौर पर रात 9 बजे, 10 बजे या 10:30 बजे तक चलता है, जो काम के बोझ पर निर्भर करता है। लेकिन काम का दिन शायद ही कभी वहीं खत्म होता है।

IIT दिल्ली में बनी आदत

जिंदल अपनी देर रात तक जागने की आदत को IIT दिल्ली में अपने स्टूडेंट दिनों से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने मनीकंट्रोल को बताया, “मेरे पहले साल में, इंटरनेट रात 1 बजे बंद हो जाता था।” तब भी, इंटरनेट बंद होने से पहले छात्र अक्सर देर रात तक काम करते थे।

जब बाद में ये पाबंदियां हटा दी गईं, तो देर रात तक काम करने का समय और बढ़ गया। समय के साथ, जिंदल ने पाया कि आधी रात के बाद के शांत समय में कुछ ऐसा मिलता था जो दिन के समय नहीं मिल पाता था: बिना किसी रुकावट के पूरा ध्यान लगाकर काम करना।

उन्होंने कहा, “अगर हमें रात में दो-तीन घंटे का वह शानदार समय मिल जाए, तो हम बहुत सारे दूसरे काम भी कर सकते हैं जिन पर हम काम कर रहे हैं।” जिंदल के लिए, सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि ध्यान भटकाने वाली चीज़ें नहीं होतीं।

उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा समय है जब आप बस अपने काम पर ध्यान दे सकते हैं क्योंकि आस-पास कम लोग होते हैं।” “इसका मतलब है कि यह पूरी तरह से आपका अपना समय होता है और आप जिस चीज़ पर चाहें, उस पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।”

नींद सबसे ज़रूरी है

अक्सर देर रात तक काम करने के बावजूद, जिंदल का कहना है कि वे नींद से समझौता करने में यकीन नहीं रखते। उन्होंने कहा, “मैं अपनी नींद से कोई समझौता नहीं करता।” हर दिन एक तय समय पर जागने के लिए खुद पर ज़बरदस्ती करने के बजाय, वे अपनी सुबह की शुरुआत इस आधार पर करते हैं कि वे पिछली रात कितने बजे सोए थे। ज़्यादातर रातें वे सुबह 2 बजे से 4 बजे के बीच सोते हैं, हालांकि कभी-कभी काम की वजह से उन्हें और भी देर हो जाती है।

घड़ी देखने के बजाय परफॉर्मेंस पर ध्यान

कंपनी के फाउंडर अपनी कंपनी में भी यही सोच अपनाते हैं। कर्मचारियों के आने या जाने के समय से उन्हें आंकने के बजाय, जिंदल नतीजों पर ध्यान देना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “हमारी कंपनी में हर टीम मेंबर के साथ, हम यह कोशिश करते हैं कि काम किसी खास व्यक्ति की मौजूदगी पर निर्भर न हो।” उन्होंने आगे कहा कि उनका मकसद ऐसे सिस्टम बनाना है जहाँ लोगों का मूल्यांकन उनके काम के नतीजों और लक्ष्यों के आधार पर हो, न कि इस आधार पर कि वे डेस्क पर कितने घंटे बिताते हैं।

बोर्ड परीक्षा में कम नंबर आने के बाद भी नहीं छोड़ा सपना, लगातार मेहनत कर IIT बॉम्बे तक पहुंचा छात्र

बोर्ड परीक्षा के नतीजे अक्सर छात्रों के आत्मविश्वास को प्रभावित करते हैं। कई बार कम अंक आने पर विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि उनका भविष्य अब बेहतर नहीं हो सकता। लेकिन सच यह है कि किसी एक परीक्षा का परिणाम पूरी जिंदगी तय नहीं करता। सही दिशा, लगातार मेहनत और खुद पर भरोसा किसी भी असफलता को सफलता में बदल सकता है। ऐसे ही एक छात्र की कहानी आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। 10वीं में उम्मीद से काफी कम अंक मिलने के बाद भी उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी कमियों को पहचाना, पढ़ाई का तरीका बदला और अनुशासन के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा।

समय के साथ उसकी मेहनत रंग लाई और उसने देश की सबसे कठिन इंजीनियरिंग परीक्षाओं में शानदार प्रदर्शन कर IIT बॉम्बे तक का सफर तय किया। उसकी यह कहानी साबित करती है कि सफलता अंकों से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से मिलती है।

10वीं के नतीजे ने दिया बड़ा झटका

जैनेंद्रजीत ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंकों की उम्मीद की थी, लेकिन रिजल्ट उम्मीद से बिल्कुल अलग रहा। उसे कुल 54% अंक मिले। गणित में 41 और विज्ञान में 48 अंक आने से वह काफी निराश हुआ। रिजल्ट देखने के बाद उसे कुछ देर तक यकीन ही नहीं हुआ कि ये उसके ही नंबर हैं।

बीमारी बनी पढ़ाई में सबसे बड़ी रुकावट

बोर्ड परीक्षा से पहले जैनेंद्रजीत करीब 40 से 50 दिनों तक बेड रेस्ट पर रहा। लंबी बीमारी के कारण उसकी तैयारी प्रभावित हुई। वहीं उसके कई दोस्तों ने 90% से अधिक अंक हासिल किए, जिससे उसे अपनी कमियों का एहसास हुआ।

हार नहीं मानी, खुद को बदलने का लिया फैसला

निराश होने के बजाय उसने खुद से कहा, “यह मेरी असली पहचान नहीं है, मैं इससे बेहतर कर सकता हूं।” इसी सोच ने उसे आगे बढ़ने की ताकत दी। उसने तय किया कि अब बहाने नहीं, सिर्फ मेहनत ही उसकी पहचान बनेगी।

बदली पढ़ाई की पूरी रणनीति

11वीं में पहुंचने के बाद जैनेंद्रजीत ने पढ़ाई का तरीका पूरी तरह बदल दिया। उसने तय समय पर पढ़ाई शुरू की, सोशल मीडिया से दूरी बनाई और रोजाना करीब 10 घंटे पढ़ाई करने लगा। उसका मानना था कि सिर्फ लंबे समय तक पढ़ना काफी नहीं, बल्कि सही तरीके से पढ़ना ज्यादा जरूरी है।

क्लास से पहले ही समझ लेता था पूरा टॉपिक

उसने एक नई आदत अपनाई। क्लास में पढ़ाए जाने वाले विषय को पहले ही YouTube के जरिए समझ लेता था। इससे लेक्चर के दौरान कॉन्सेप्ट आसानी से समझ आते थे और पढ़ाई ज्यादा प्रभावी हो गई।

रोजाना बनाता था छोटे-छोटे लक्ष्य

बिना योजना के पढ़ाई करने के बजाय उसने हर दिन के छोटे-छोटे लक्ष्य तय किए। हर चैप्टर पूरा होने के बाद Previous Year Questions (PYQs) हल करता था। इससे परीक्षा का पैटर्न समझने और सवाल हल करने की क्षमता मजबूत हुई।

मेहनत ने बदली किस्मत

लगातार मेहनत और अनुशासन का नतीजा यह रहा कि जैनेंद्रजीत ने JEE Main 2023 में 99.98 पर्सेंटाइल हासिल किया। इसके बाद JEE Advanced में AIR 349 रैंक के साथ IIT बॉम्बे के प्रतिष्ठित कंप्यूटर साइंस प्रोग्राम में दाखिला मिला।

मेहनत हर चीज पर भारी पड़ती है’

अपनी सफलता पर जैनेंद्रजीत ने कहा, “अगर जिंदगी में कुछ बड़ा हासिल करना है तो बहाने नहीं, मेहनत करनी होगी। मेहनत हर चीज पर भारी पड़ती है।”

सोशल मीडिया पर मिली जमकर तारीफ

यूट्यूब पर अपनी कहानी साझा करने के बाद हजारों लोगों ने उसकी सराहना की। किसी ने लिखा, “Hard work pays off,” तो किसी ने उसकी हिम्मत और समर्पण को सलाम किया। कई छात्रों ने कहा कि उसकी कहानी उन्हें मुश्किल हालात में भी अपने लक्ष्य के लिए मेहनत करते रहने की प्रेरणा देती है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर साझा की गई यूजर-जनरेटेड सामग्री पर आधारित है। Moneycontrol ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और न ही इनका समर्थन करता है।

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जब मन कहे कुछ गलत है तो रुककर जरूर सोचिए… Zomato के फाउंडर दीपिंदर गोयल ने बताया सफलता का ये मंत्र

दीपिंदर गोयल ज़ोमैटो के फाउंडर हैं। वे रिस्क लेने की क्षमता, एंटरप्रेन्योर वाली सोच और अपनी महत्वाकांक्षा के लिए जाने जाते हैं। उनकी सफलता का सफ़र बहुत दिलचस्प है। गोयल का जन्म पंजाब में हुआ था। मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर काम करने से पहले उन्होंने IIT दिल्ली से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वे अपनी कॉर्पोरेट नौकरी कर रहे थे, तभी उन्हें ज़ोमैटो बनाने का आइडिया आया। आखिरकार, ज़ोमैटो बनाने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। उनकी लीडरशिप क्वालिटी और ‘फ़र्स्ट मूवर एडवांटेज’ (सबसे पहले शुरुआत करने का फ़ायदा) का सही इस्तेमाल करने की क्षमता ने ही उन्हें आज एक ऐसा एंटरप्रेन्योर बनाया है जिसे हम आदर्श मानते हैं।

गोयल ने अक्सर लीडरशिप, फैसला लेने और इंस्टिंक्ट (अंतर्ज्ञान) के बारे में प्रैक्टिकल बातें शेयर की हैं। एक बार उन्होंने कहा था, “अपने इंस्टिंक्ट (अंदर की आवाज़) की अहमियत समझें—जब आपको लगे कि कुछ गड़बड़ है, तो उस पर गहराई से सोचें और फ़ैसला लेने में सिर्फ़ डेटा को ही हावी न होने दें।” यह वाकई एक दमदार बात है, आइए समझते हैं कि इसका असल मतलब क्या है।

इस कोट का क्या मतलब है?

आज की कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल दुनिया में, हमें सिर्फ़ नंबर, चार्ट और ठोस सबूतों पर भरोसा करना सिखाया जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि इंट्यूशन—यानी ‘गट फ़ीलिंग’ (अंदर की आवाज़)—असल में बरसों के सबकॉन्शियस ऑब्ज़र्वेशन (अवचेतन रूप से देखी-परखी बातें), पैटर्न पहचानने और असल ज़िंदगी के अनुभवों का नतीजा होती है। यह कोट हमें याद दिलाता है कि डेटा भले ही काम का हो, लेकिन उसे आपकी अंदर की आवाज़ को पूरी तरह दबाने नहीं देना चाहिए।

इसलिए, अगली बार जब आपको करियर के किसी फ़ैसले, बिज़नेस पार्टनरशिप या ज़िंदगी के किसी बड़े फ़ैसले को लेकर ज़बरदस्त हिचकिचाहट महसूस हो, तो उसे सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ न करें क्योंकि वह कागज़ पर अच्छा लग रहा है। रुकें और सोचें कि आपका इंस्टिंक्ट क्यों चेतावनी दे रहा है। ठोस तथ्यों और इंट्यूशन के बीच तालमेल बिठाने से आप ज़्यादा समझदारी भरे और सही फ़ैसले ले पाते हैं।

आज के समय में यह कितना प्रासंगिक है?

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो मेट्रिक्स और एनालिटिक्स से चलती है, जहां लोग अक्सर इंसानी समझ और असल ज़िंदगी की बारीकियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

प्रोफ़ेशनल्स अक्सर “एनालिसिस पैरालिसिस” (बहुत ज़्यादा विश्लेषण के कारण काम न कर पाना) का सामना करते हैं और ज़रूरी फ़ैसले लेने में देरी करते हैं क्योंकि वे और डेटा का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

एल्गोरिदम और नंबर इंसानी व्यवहार, टीम कल्चर या अंदरूनी भरोसे को नहीं समझ पाते।

तेज़ी से बदलते करियर और बिज़नेस में, 100% डेटा की पक्की जानकारी का इंतज़ार करने का मतलब हो सकता है कि आप ज़रूरी मौके गँवा दें या छिपे हुए जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दें।

लोग अक्सर खराब नौकरियों, बुरे रिश्तों या नाकाम हो रहे प्रोजेक्ट्स में बने रहते हैं क्योंकि स्प्रेडशीट कहती है कि सब ठीक है, जबकि उनका मन कुछ और ही कहता है।

इस कोट (कथन) से मिलने वाली सीख

अंतर्ज्ञान कोई जादू नहीं है। यह आपके अवचेतन मन द्वारा पुराने अनुभवों को असल समय में प्रोसेस करने की प्रक्रिया है।

डेटा आपको तथ्य देता है, लेकिन अंतर्ज्ञान आपको संदर्भ और भविष्य की समझ देता है।

मेट्रिक्स पर बहुत ज़्यादा निर्भरता आपको उन बारीक जोखिमों के प्रति अंधा बना सकती है जिन्हें आंकड़े नहीं पकड़ पाते।

महान नेता अनिश्चित या अनजान स्थितियों का सामना करते समय अपनी सहज समझ (instincts) पर भरोसा करते हैं।

अपनी मज़बूत अंदरूनी भावना (gut feeling) के खिलाफ़ लिया गया फ़ैसला अक्सर बाद में पछतावे का कारण बनता है।

इस बात को मानने के लिए कुछ टिप्स

जब कोई बड़ा फ़ैसला लेना हो, तो डेटा क्या कहता है उसे लिखें, और फिर आपका मन (अंतर्मन) क्या कह रहा है, उसे भी लिखें।

अगर किसी प्रोजेक्ट या डील के आंकड़े अच्छे होने के बावजूद आपको कुछ गड़बड़ लगे, तो कोई भी पक्का फ़ैसला लेने से पहले रुकें और गहराई से जाँच-पड़ताल करें।

खुद पर भरोसा बढ़ाने के लिए रोज़मर्रा के छोटे-मोटे फ़ैसलों में भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की आदत डालें।

सोचने के लिए कुछ शांत पल निकालकर घबराहट या डर को अपनी असली अंतर्दृष्टि (intuition) से अलग करें।

साफ़ चेतावनी के संकेतों या नैतिक शंकाओं को नज़रअंदाज़ करने के लिए डेटा का बहाना न बनाएँ।

औपचारिक रिपोर्ट और मेट्रिक्स के साथ-साथ अपने निजी अनुभव और व्यावहारिक समझ (street smarts) को भी महत्व दें।

कौन हैं विनीत जोशी जिनकी शिक्षा मंत्रालय से हुई छुट्टी? NEET पेपर लीक मामले में बड़ा एक्शन

Vineet Joshi Transferred: देश भर में NEET-UG 2026 परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ जारी भारी आक्रोश और विरोध-प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग के सचिव विनीत जोशी को उनके पद से हटा दिया है। 1992 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनीत जोशी को अब पंचायती राज मंत्रालय में सचिव के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया है।

विनीत जोशी की जगह अब वरिष्ठ अधिकारी नरेश पाल गंगवार को उच्च शिक्षा विभाग के नए सचिव की कमान सौंपी गई है। आइए आपको बताते हैं कि विनीत जोशी कौन हैं?

कौन हैं विनीत जोशी?

विनीत जोशी 1992 बैच के मणिपुर कैडर के वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं। वे पेशे से इंजीनियर हैं। उन्होंने देश के शीर्ष संस्थान IIT कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में B.Tech किया है। इसके अलावा उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (IIFT), नई दिल्ली से MBA की डिग्री हासिल की है।

उच्च शिक्षा सचिव बनने से पहले विनीत जोशी मणिपुर के मुख्य सचिव जैसे सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

शिक्षा मंत्रालय में संभाले कई बड़े पद

विनीत जोशी ने केंद्र और राज्य सरकारों में विशेष रूप से शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई बेहद महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने दिसंबर 2024 में उच्च शिक्षा विभाग के सचिव के रूप में पदभार ग्रहण किया था। बाद में संजय कुमार के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था। नियमित नियुक्ति होने तक अप्रैल 2025 में उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था।

CBSE और NTA के प्रमुख भी रह चुके है

विनीत जोशी का नाम देश की प्रमुख शैक्षणिक एजेंसियों और परीक्षा प्रणालियों से गहराई से जुड़ा रहा है। वे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के अध्यक्ष के रूप में काम कर चुके हैं। अपने कार्यकाल के दौरान वे सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) प्रणाली जैसे बड़े शैक्षणिक सुधारों से जुड़े रहे।

वे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के महानिदेशक भी रह चुके हैं। NTA वही संस्था है जो देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं जैसे JEE Main, NEET और CUET का आयोजन कराती है।

NEET विवाद के बीच बड़ा प्रशासनिक फेरबदल

NEET-UG 2026 परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के आरोपों के बाद से ही शिक्षा मंत्रालय पर चौतरफा दबाव था। छात्रों और विभिन्न संगठनों के लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच केंद्र सरकार द्वारा विनीत जोशी को उच्च शिक्षा विभाग से हटाकर पंचायती राज मंत्रालय में भेजा जाना एक बड़ा प्रशासनिक कदम माना जा रहा है।

जंतर-मंतर पर दिपके का साया बने आशुतोष रांका कौन हैं? जानें IIT, LSE और मैकिन्से से आंदोलन तक का सफर

Who is Ashutosh Ranka: IIT कानपुर से इंजीनियरिंग, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई और फिर लंदन में मैकिन्से जैसी ग्लोबल कंपनी में भारी-भरकम पैकेज वाली नौकरी! आम तौर पर लोग ऐसे करियर का सपना देखते हैं, लेकिन आशुतोष रांका इस सब से आगे बढ़कर देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। NEET पेपर लीक को लेकर CJP के ‘पॉलिसी हेड’ के रूप में केंद्र सरकार से सीधी बात करने वाले आशुतोष रांका कौन हैं और कैसे एक कॉर्पोरेट कंसल्टेंट छात्रों की सबसे बड़ी आवाज बन गया, आइए आपको बताते हैं।

कौन हैं आशुतोष रांका?

आशुतोष रांका ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के आधिकारिक प्रवक्ता हैं। उन्हें इस पूरे आंदोलन का ‘पॉलिसी माइंड’ माना जा रहा है, क्योंकि वे शिक्षा सुधारों और सरकारी नीतियों के खिलाफ तार्किक और नीतिगत ड्राफ्ट तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT कानपुर से पढ़ाई की है और इसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) जैसी विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की है। CJP में शामिल होने से पहले आशुतोष रांका लंदन में दुनिया की दिग्गज कंसल्टिंग फर्म मैकिन्से एंड कंपनी (McKinsey & Company) में कंसल्टेंट के रूप में काम कर चुके हैं।

फिलहाल वो आंदोलन की नीतिगत रणनीति, शिक्षा सुधारों के ड्राफ्ट और केंद्र सरकार के साथ बातचीत में CJP का प्रतिनिधित्व कर रहे है।

कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़ आंदोलन का हिस्सा क्यों बने?

जब जून में CJP ने अपने प्रवक्ताओं के पैनल का ऐलान किया, तब आशुतोष रांका के शानदार एकेडमिक और प्रोफेशनल बैकग्राउंड को खास तौर पर हाईलाइट किया गया। IIT कानपुर, LSE और मैकिन्से जैसी ग्लोबल कंपनियों में काम करने के अनुभव के कारण उनके पास नीतियों के विश्लेषण और रणनीतिक समझ का गहरा अनुभव है। नीट परीक्षा में हुई धांधली के बाद उन्होंने अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल छात्रों की मांगों को कानूनी और नीतिगत रूप से मजबूत बनाने के लिए किया।

केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अहम भूमिका

NEET आंदोलन के तहत जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के बीच आशुतोष रांका ने सरकार के साथ बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सौरव दास के साथ आशुतोष रांका भी उस दो सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे, जिसने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात कर छात्रों की मांगों का ड्राफ्ट सौंपा। वे केवल परीक्षा रद्द करने या जांच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली में दीर्घकालिक और पारदर्शी सुधारों की रूपरेखा पर भी काम कर रहे हैं।

जंतर-मंतर पर डटे हैं CJP संस्थापक

जहां आशुतोष रांका और सौरव दास सरकार के साथ टेबल टॉक संभाल रहे हैं, वहीं CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र अभिजीत ने बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने वाले एक बयान के विरोध में इस पार्टी की नींव रखी थी।

Samsung ‘इंडिया इनोवेशन कॉन्टेस्ट’ की टॉप चार टीमों को 2 करोड़ रुपये देगी, जानिए कॉन्टेस्ट की जरूरी बातें

सैमसंग अपनी इनोवेशन और एजुकेशन प्रतियोगिता के अगले चरण में भारत में 100 टीमों का चुनाव करेगी। इस प्रतियोगिता का नाम ‘सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो’ है। इस प्रतियोगिता की टॉप 4 टीमों को 2 करोड़ रुपये का इनक्यूबेशन ग्रांट मिलेगा। यह प्रतियोगिता पूरे देश में आयोजित होगी। सैमसंग दक्षिण कोरिया की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी है।

सैमसंग ने 184 डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप आयोजित किए

Samsung ने इस साल 184 डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप आयोजित किए। इसमें जम्मू-कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर त्रिपुरा के स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज के हजारों स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिए। सैमसंग ने बताया कि डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप्स देश के 135 शहरों में आयोजित किए गए। इससे यह देश के सबसे बड़े ग्रॉसरूट इनोवेशन प्लेटफॉर्म्स में से एक बन गया है।

सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो में 100 टॉप टीमें चुनी जाएंगी

डिजाइन थिंकिंग वर्कशॉप्स अब पूरा हो चुका है। सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो अगले चरण में प्रवेश कर गया है। इसमें पार्टिसिपेंट्स की तरफ से सब्मिट किए गए आइडिया के आधार पर टॉप 100 टीमें चुनी जाएंगी। उसके बाद टीमों को मेन्टॉरशिप, एक्सपर्ट गाइडेंस जैसी सहायता दी जाएगी। यह जानकारी कंपनी ने दी है। टॉप चार टीमों को 2 करोड़ रुपये की इनक्यूबेशन ग्रांट दी जाएगी।

टॉप 4 टीमों को मेन्टॉरशिप और प्रोटोटाइप डेवलपमेंट सपोर्ट भी मिलेगा

इनक्यूबेशन ग्रांट के अलावा टॉप 4 टीमों को मेन्टॉरशिप और प्रोटोटाइप डेवलपमेंट सपोर्ट मिलेगा। यह सपोर्ट FITT-IIT देगा। सैमसंग के साऊथवेस्ट एशिया के कॉर्पोरेट वाइस प्रसिडेंट एस पी चुन ने कहा कि हम सैमसंग सॉल्व फॉर टुमॉरो के जरिए देशभर के युवाओं के माइंडसेट डेवलप करने में मदद कर रहे हैं।

देश के हर कोने से इनोवेटिव आइडिया के लिए युवाओं को प्रोत्साहन

उन्होंने कहा कि युवाओं के माइंडसेट डेवलप करने के लिए टेक्नोलॉजी के साथ थिंकिंग को प्रोत्साहित किया जाता है। इसके लिए उन्हें अपनी कम्युनिटी से जुड़ी चुनौतियों को हल करना होता है। उन्होंने कहा कि यह इस प्रोग्राम का पांचवां साल है। इसके जरिए देश के हर कोने से इनोवेटिव आइडिया के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें 14 से 22 साल की उम्र के युवा हिस्सा लेते हैं।

GATE 2027: फरवरी 2027 में होगी गेट परीक्षा, आईआईटी मद्रास ने रोबोटिक्स का पेपर किया शुरू

GATE 2027: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास ने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (GATE) 2027 के लिए परीक्षा कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। यह राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है, जिसका आयोजन 6, 7, 13, 14, 20 और 21 फरवरी, 2027 को हर दिन सुबह और दोपहर दो शिफ्ट में होगा। आईआईटी मद्रास, नेशनल कोऑर्डिनेशन बोर्ड (GATE), शिक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) और दूसरे आईआईटी के साथ मिलकर GATE 2027 का आयोजन कर रहा है। पहली बार 1983 में शुरू हुई परीक्षा का इस साल 45वां एडिशन है।

ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया अगस्त 2026 के बीच में आधिकारिक गेट 2027 पोर्टल के जरिए शुरू होने की उम्मीद है। सुरक्षा बढ़ाने और परीक्षा प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, आईआईटी मद्रास उम्मीदवारों के पंजीकरण को डिजिलॉकर और फेशियल ऑथेंटिकेशन के साथ जोड़ेगा। इससे परीक्षा केंद्र पर वेरिफिकेशन और प्रवेश आसान हो जाएगा। आईआईटी मद्रास ने बदलते एकेडमिक ट्रेंड और इंडस्ट्री की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पांच साल में पहली बार सभी टेस्ट पेपर के लिए गेट सिलेबस में बदलाव किया है।

गेट 2027 परीक्षा की संभावित तारीख ब्रांच शेड्यूलिंग

गेट के पेपर का मूल कार्यक्रम परीक्षा की तारीख करीब आने पर जारी किया जाता है, लेकिन ज्यादा वॉल्यूम वाले पेपर आम तौर पर स्टैंडर्ड शेड्यूलिंग पैटर्न को फॉलो करते हैं। अनुमान है कि इस बार पेपरों का शेड्यूल कुछ इस प्रकार रहेगा

6–7 फरवरी : कंप्यूटर साइंस (CS), मैकेनिकल इंजीनियरिंग (ME), इंस्ट्रूमेंटेशन (IN), और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (EE) का बंटवारा।

13–14 फरवरी : सिविल इंजीनियरिंग (CE), इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन (EC), केमिकल इंजीनियरिंग (CH), और प्राइमरी साइंसेज स्ट्रीम।

20–21 फरवरी : डेटा साइंस और AI (DA), नए एडिशन, और बचे हुए स्पेशलाइज्ड पेपर।

नया पेपर पेश किया गया

अपडेट के हिस्से के तौर पर, गेट 2027 से एक नया रोबोटिक्स और ऑटोमेशन (RA) पेपर का विकल्प भी छात्रों को मिलेगा। टेक्सटाइल इंजीनियरिंग और फाइबर साइंस (TF) पेपर को भी रीस्ट्रक्चर किया गया है और अब इसे इंजीनियरिंग साइंसेज (XE) के तहत एक सेक्शनल पेपर के तौर पर पेश किया जाएगा। गेट 2027 सिर्फ अंग्रेजी में ही होगा और इसमें 30 टेस्ट पेपर होंगे। परीक्षार्थियों के पास आयोजक संस्थान द्वारा तय कॉम्बिनेशन के आधार पर एक या दो पेपर देने का विकल्प होगा।

एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया

गेट 2027 में शामिल होने के लिए कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं है। जिन परीक्षार्थियों ने इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, आर्किटेक्चर, साइंस, आर्ट्स या कॉमर्स में बैचलर डिग्री पूरी कर ली है, या अभी फाइनल ईयर में हैं, वे आवेदन करने के योग्य हैं। पहले पेश किए गए बदले हुए योग्यता मानदंड के अनुसार, बीटेक कार्यक्रम के तीसरे साल के छात्रों को भी परीक्षा देने की इजाजत है।

गेट 2027 का एडमिट कार्ड जनवरी में जारी होगा

गेट 2027 एडमिट कार्ड जनवरी 2027 में GOAPS (GATE Online Application Processing System) पोर्टल के जरिए जारी होने की उम्मीद है। आवेदन प्रक्रिया को पूरा करने वाले उम्मीदवार अपनी एनरोलमेंट आईडी/ईमेल आईडी और पासवर्ड से लॉग इन करके अपने हॉल टिकट डाउनलोड कर पाएंगे।

गेट 2027 रिजल्ट की तारीख

गेट 2027 रिजल्ट 19 मार्च 2027 (शुक्रवार) को घोषित किया जाएगा। रिजल्ट घोषित होने के बाद कैंडिडेट अपनी एनरोलमेंट आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल करके GOAPS पोर्टल पर अपने स्कोरकार्ड देख पाएँगे।

गेट 2027 एग्जाम पैटर्न और क्वेश्चन पेपर

ऑफिशियल वेबसाइट एग्जाम पैटर्न के बारे में भी जानकारी देती है। कैंडिडेट इनके बारे में जानकारी पा सकते हैं:

  • एग्जाम का समय
  • सवालों का टाइप
  • मार्किंग स्कीम
  • मल्टीपल-चॉइस सवाल (MCQs)
  • मल्टीपल सेलेक्ट सवाल (MSQs)
  • न्यूमेरिकल आंसर टाइप (NAT) सवाल

पिछले सालों के क्वेश्चन पेपर भी उपलब्ध हैं ताकि परीक्षार्थी को परीक्षा फॉर्मेट समझने में मदद मिल सके।

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3500 रुपये के इन्वेस्टमेंट से खड़ा कर लिया 1.5 करोड़ का मिलेट बिजनेस! नासिक के इंजीनियर तुषार ने किया कमाल

Business idea: जीवन में कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों के दौरान ही बड़े अवसर क्रिएट करने का मौका मिलता है। ऐसा ही कुछ हुआ नासिक के एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग ग्रैजुएट के साथ। भारत समेत पूरी दुनिया जब कोरोना की महामारी से जूझ रही थी तो उसी समय इस इंजीनियर ने एक शानदार बिजनेस की शुरुआत के लिए कदम बढ़ा दिया। ये कहानी है तुषार तलवारे की जिन्होंने कोरोना लॉकडाउन के दौरान महज 3500 रुपये के शुरुआती निवेश से अपने घर से मिलेट (बाजरा/मोटा अनाज) बेचने का एक छोटा सा प्रयोग शुरू किया था।

आज उनका यह स्टार्टअप फूडोनिक नाम के एक बड़े ब्रांड में बदल चुका है। इसका सालाना रेवेन्यू 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह कंपनी आज पूरे भारत में मिलेट खाखरा, आटा, पास्ता, नूडल्स और कई तरह के हेल्दी स्नैक्स बेच रही है।

कॉलेज के रूममेट और IIT बॉम्बे के सेमिनार से मिला आइडिया

तुषार की इस एंटरप्रेन्योरशिप जर्नी की शुरुआत बेहद दिलचस्प रही। 30Stades के साथ एक इंटरव्यू में तुषार ने बताया कि जब वह नवी मुंबई में पढ़ाई कर रहे थे तब उनके एक कॉलेज रूममेट ने उन्हें उनकी फिटनेस और वेलनेस के प्रति रुचि को देखते हुए हेल्दी फूड सेक्टर में करियर तलाशने की सलाह दी थी।

तुषार की यह रुचि तब एक ठोस बिजनेस आइडिया में बदल गई जब उन्होंने पवई स्थित IIT बॉम्बे में प्रसिद्ध मिलेट रिसर्चर डॉ खादर वली के एक सेमिनार में हिस्सा लिया। इस सेशन से उन्हें मिलेट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू का पता चला और उन्होंने महसूस किया कि उस समय बाजार में मिलेट-आधारित प्रोडक्ट्स बहुत ही कम उपलब्ध थे।

इस सेक्टर को बेहतर ढंग से समझने के लिए तुषार ने कई दूसरे सेमिनार्स में हिस्सा लिया और मिलेट की खेती, इसके स्वास्थ्य लाभ व सप्लाई चेन को समझने के लिए ऑनलाइन कोर्सेज भी पूरे किए।

₹3500 का पहला ऑर्डर और लॉकडाउन में डिलीवरी की चुनौती

बड़ा निवेश करने के बजाय तुषार ने पहले इस आइडिया को छोटे स्तर पर टेस्ट करने का फैसला किया। साल 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान नासिक में अपने घर पर रहते हुए तुषार ने मात्र 3500 रुपये निवेश किए। उन्होंने डॉ खादर वली के नेटवर्क के जरिए तमिलनाडु के एक किसान से 5 अलग-अलग किस्मों के 5-5 किलो मिलेट्स खरीदे।

परिवार, दोस्तों और शुरुआती ग्राहकों से मिले सकारात्मक फीडबैक से उत्साहित होकर उन्होंने अपने अगले ऑर्डर को बढ़ाकर हर किस्म का 20-20 किलो कर दिया। लॉकडाउन के कारण जब लॉजिस्टिक्स सेवाएं पूरी तरह प्रभावित थीं तब तुषार ने ऑर्डर हासिल करने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप्स और लोगों की सिफारिशों का सहारा लिया। उस समय सिर्फ इंडिया पोस्ट की सेवाएं चालू थीं, इसलिए वे घर पर ही अपने हाथों से एक-एक किलो के पाउच पैक करते थे और डाक के जरिए पूरे देश में ग्राहकों को भेजते थे।

किफायती कीमत की वो रणनीति जो कर गई काम

मार्केट रिसर्च के दौरान तुषार ने देखा कि कई विक्रेता 5 किलो मिलेट्स के लिए करीब 1200 रुपये तक चार्ज कर रहे थे। चूंकि उनकी खरीद लागत काफी कम थी, इसलिए उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स की कीमत को किफायती रखने का फैसला किया। तुषार बताते हैं कि उतनी ही मात्रा के लिए उनकी खरीद लागत सिर्फ 400 रुपये के आसपास थी।

इसलिए उन्हें अपने पैक्स की कीमत पोस्टल चार्ज और प्रॉफिट मार्जिन मिलाकर 700 रुपये रखी। इससे ग्राहकों को काफी किफायती दाम में हेल्दी फूड मिलने लगा और तुषार को भी एक बेहतर मार्जिन मिला। यह प्राइसिंग स्ट्रेटजी पूरी तरह सफल रही और देश के अलग अलग हिस्सों से ताबड़तोड़ ऑर्डर आने शुरू हो गए।

₹1.5 लाख से ₹1.5 करोड़ तक का सफर

जैसे-जैसे मांग बढ़ी तुषार ने नासिक में ही 2000 रुपये महीने के किराए पर एक कमरा लिया और अपने काम को वहां शिफ्ट कर दिया। रेडी-टू-ईट मिलेट प्रोडक्ट्स की मांग को देखते हुए उन्होंने कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स के साथ पार्टनरशिप की और आटा, पास्ता व नूडल्स जैसे प्रोडक्ट तैयार करवाने लगे जबकि उनका खुद का ध्यान ब्रांडिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन पर रहा।

कंपनी ने भी फिर रफ्तार पकड़ी। साल 2020 में 1.5 लाख का टर्नओवर, साल 2021 में 12 लाख के टर्नओवर में बदल गया। साल 2023 में उन्होंने अपने पोर्टफोलियो में मिलेट चिवड़ा, फ्लेक्स और दूसरे स्नैक्स शामिल किए।

कारोबार के विस्तार के साथ तुषार को केंद्र सरकार की PMFME योजना (PM Formalisation of Micro Food Processing Enterprises Scheme) के तहत 10 लाख रुपये की सब्सिडी मिली। इस मदद से उन्होंने 15 अलग-अलग वैरायटी के मिलेट खाखरा बनाने के लिए अपनी खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित की।

हीरो हैं ये 8 महिलाएं: बिना किसी केमिकल के तैयार होता है खाखरा

फैक्ट्री स्थापित करना तो केवल शुरुआत थी, मिलेट खाखरा को बड़े पैमाने पर बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। शुरुआत में आटा मशीनों से चिपक जाता था और सही खाखरा नहीं बन पाता था। फूड कंसल्टेंट्स ने इसमें बाइंडर्स और एडिटिव्स मिलाने की सलाह दी लेकिन तुषार इसे 100% नेचुरल रखना चाहते थे।

महीनों की कड़ी मेहनत और 2000 किलो से अधिक मिलेट आटा इस्तेमाल करने के बाद उनकी टीम ने परफेक्ट रेसिपी तैयार की। ये खाखरे बिना किसी प्रिजर्वेटिव, एडिटिव्स या सिंथेटिक बाइंडर्स के बनाए जाते हैं और स्वाद को बरकरार रखने के लिए कंपनी अपने खुद के मसालों का मिश्रण तैयार करती है।

वर्तमान में नासिक स्थित Fudonik की इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को 8 महिलाएं संभाल रही हैं। बाजार में खाखरा लॉन्च करने से पहले कंपनी ने 6 महीने तक ग्राहकों का फीडबैक लिया और लैबोरेटरी टेस्ट भी पूरे किए।

भविष्य की योजनाएं

आज यह कंपनी इन-हाउस खाखरा और चिवड़ा बनाती है जिसके पास 2500 से अधिक रिटेल ग्राहक हैं और यह अपने B2B बिजनेस का भी तेजी से विस्तार कर रही है। अपनी आगे की योजनाओं को लेकर तुषार बताते हैं कि वे अगले साल मिलेट कुकीज भी लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं।

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Disclaimer: यह रिपोर्ट पूरी तरह से थर्ड पार्टी मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट पर आधारित है। मनीकंट्रोल ने इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है और न ही वह इनका समर्थन करता है।

5 साल तक जीरो सेल्स, अब Ather Energy बनी ₹50000 करोड़ की कंपनी, Tesla से इस सीख ने बदल दी इंडस्ट्री की तस्वीर

करीब 13 साल पहले भारतीय ऑटो इंडस्ट्री को इलेक्ट्रिकल वेईकल्स में कोई भविष्य नहीं दिख रहा था। हर वेंडर से सस्ते से सस्ता पार्ट लेकर असेंबलिंग के बाद एक इलेक्ट्रिक स्कूटर की लागत करीब ₹5 लाख पड़ती। ऑटो इंडस्ट्री के मुताबिक यह मॉडल व्यावहारिक नहीं था। इन सबके बीच तरुण मेहता और स्वप्निल जैन ने इसे अलग नजरिए से देखा और वह भी तब, जब वे अभी भी आईआईटी मद्रास से इंजीनयरिंग करके निकले थे। खास बात ये भी है कि वह टेस्ला (Tesla) की स्टडी तो कर रहे थे लेकिन कारों की नहीं बल्कि इसके फाइनेंशियल्स की। इस स्टडी की नींव पर उन्होंने एथर एनर्जी (Aether Energy) जैसी ऐसी कंपनी खड़ी कर दी जिसने पांच साल तक कोई सेल्स नहीं की और अब यह यह ₹50 हजार करोड़ की कंपनी बन चुकी है।

क्या मिला Tesla के फाइनेंशियल्स से?

तरुण टेस्ला के निवेशकों की रिसर्च रिपोर्ट की स्टडी करते थे। इसमें उन्होंने एक खास बात नोटिस की कि लिथियम-आयन सेल, मोटर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की वास्तविक लागत काफी कम थी। तरुण ने पाया कि ये महंगे इसलिए दिखाई देते थे क्योंकि इन्हें बड़े पैमाने पर बनाने और इंटीग्रेशन की प्रक्रिया अभी तैयार नहीं हुई थी।

कैसे पड़ी Aether Energy की नींव

तरुण और स्वप्निल की मुलाकात आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग डिजाइन की पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों ने साथ मिलकर कुछ रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया था। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने नौकरियां की लेकिन फिर इस्तीफा देकर बैट्री पैक पर काम करने लगे। उनके मुताबिक बैट्री पैक भारतीय इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सबसे बड़ी कमजोरी थी। 2012 के आखिरी दिनों में उन्होंने प्रोजेक्ट एसोसिएट के रूप में फिर आईआईटी मद्रास में वापसी की। वे हॉस्टल में रहते और लैब में काम करते थे। मात्र छह से सात महीनों में उन्होंने एक स्कूटर और बैट्री पैक का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया। वर्ष 2013 में एथर एनर्जी को औपचारिक रूप से IIT-M रिसर्च पार्क में इनक्यूबेट किया गया। अगले साल 2014 में उन्हें टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड और आईआईटी के एक पूर्व छात्र से ₹45 लाख की फंडिंग मिली।

दो फैसलों ने तय कर दी दिशा

एथर की नींव अक्टूबर 2013 में पड़ी थी। उसी साल दो फैसलों ने कंपनी की पूरी दिशा तय कर दी। पहला फैसला था कि कंपनी आम लोगों के लिए स्कूटर बनाएगी। उस समय भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां धीमे और कम पावर वाले होते थे जिसे मुख्य रूप से बुजुर्गों या बिना लाइसेंस के युवाओं के लिए बनाया जाता था। दूसरा फैसला था, स्कूटर के हैंडलबार पर सात इंच की टचस्क्रीन, सिम कार्ड और एक फुल सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम देना जोकि उस समय दुनिया में किसी भी दोपहिया गाड़ी पर नहीं था। देश की सड़कों, धूल, बारिश और प्रदूषण के बीच टचस्क्रीन को भरोसेमंद बनाना काफी महंगा और रिस्क वाला था। हालांकि यही दो फैसले एथर की नींव बने।

पांच साल तक जीरो सेल्स से ₹50 हजार करोड़ की कंपनी

एथर का पहला प्रोडक्ट 2018 के मध्य में आया यानी कि पहले पांच साल तक इसकी सेल्स जीरो रही। पहले पांच साल कंपनी की टीम में अधिकतर ऐसे नए ग्रेजुएट्स थे जिन्होंने कॉलेज में रेस कारें बनाई थीं। उनके लिए ग्रेजुएशन के बाद ही सैलरी के साथ गाड़ियों को बनाने का काम करना एक सपने के पूरा होने जैसा था। इससे उन्हें लंबे समय तक कंपनी से जोड़े रखना आसान रहा। हालांकि ऐसा नहीं है कि मुश्किलें नहीं आई। एक निवेशक ने तो सलाह दी थी कि कंपनी सिर्फ होंडा एक्टिवा में इलेक्ट्रिक मोटर लगाकर बेचना शुरू करे। कई ने तो अपना प्रोडक्ट या तकनीक नहीं बनाने की सलाह दी क्योंकि उनके मुताबिक भारत में ऐसे प्रोडक्ट को मार्केट नहीं है। हालांकि एथर अपने विजन पर कायम रही।

सेल्स के आंकड़े

कंपनी के बिक्री की बात करें तो साल 2022 में कंपनी ने 54,769 यूनिट्स बेचीं। 2023 में यह बढ़कर 1,11,812 और साल 2024 में 1,36,513 यूनिट्स तक पहुंच गई। अगले ही साल कंपनी की सेल्स 57% बढ़कर 2,14,985 यूनिट्स पर पहुंच गई। इस साल 2026 की पहली छमाही में ही एथर ने 1,69,020 यूनिट्स का रजिस्ट्रेशन किया, जो पिछले साल 2025 की समान अवधि की तुलना में 91% अधिक थी। ओवरऑल बात करें तो जून 2026 तक कंपनी ग्राहकों को 7 लाख से अधिक गाड़ियों की डिलीवरी कर चुकी है, जिसमें से आखिरी 2 लाख यूनिट्स केवल 8 महीनों में बेची गईं। वित्त वर्ष 2026 में कंपनी ने कुल 2,62,942 यूनिट्स बेचीं, जो सालाना आधार पर 69% अधिक थी।

बाजार में दबदबे की बात करें तो वित्त वर्ष 2026 में दोपहिया ईवी सेगमेंट में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 18.6% हो गई। कंपनी के लिए सबसे शानदार महीना अक्टूबर 2025 रहा, जब इसने 26,713 यूनिट्स बेची और 19.6% मार्केट हिस्सेदारी रही। इस दौरान इसने ओला इलेक्ट्रिक को भी पीछे छोड़ दिया था।

कंपनी के लिए सबसे दमदार गाड़ी एथर रिज्टा साबित हुई जो अप्रैल 2024 में लॉन्च हुई थी। सिर्फ 11 महाने में इसने 1 लाख सेल्स का आंकड़ा पार कर लिया। दिसंबर 2025 तक 2 लाख और अप्रैल 2026 तक लॉन्च के सिर्फ 25 महीने में 3 लाख सेल्स का रिकॉर्ड बना लिया। आज एथर की कुल मासिक बिक्री में इसकी हिस्सेदारी 76% है।

₹200 करोड़ का दांव, Ather Energy में इस कारण सरकारी फंड कर रही निवेश

सही जवाब पता थे फिर भी IIT एग्जाम में लिखे गलत उत्तर, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

भारत में IIT में दाखिला पाना लाखों छात्रों का सपना होता है, लेकिन एक युवक ने इस दौड़ से हटकर ऐसा फैसला लिया जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। जब बाकी छात्र IIT में पहुंचने के लिए पूरी मेहनत कर रहे थे, तब ऋषभ खनेजा ने जानबूझकर अपनी परीक्षा में गलत जवाब लिखे। हैरानी की बात यह थी कि उन्हें सही उत्तर पता थे। उनका यह कदम असफलता नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की दिशा खुद चुनने का प्रयास था।

परिवार और समाज की तय उम्मीदों से अलग रास्ता चुनना आसान नहीं था, लेकिन ऋषभ ने वही किया जो उन्हें सही लगा। आज उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि सफलता का मतलब सिर्फ बड़ी डिग्री या नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य और खुशी को पहचानना भी है।

IIT की रेस में शामिल था

ऋषभ खनेजा ने Humans of Bombay के साथ अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने जानबूझकर IIT प्रवेश परीक्षा में असफल होने का फैसला किया था। उनका कहना है कि यह कदम किसी डर या कमजोरी की वजह से नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि वह ऐसी जिंदगी नहीं जीना चाहते थे जो उन्हें अपनी नहीं लगती थी।

उन्होंने बताया कि परीक्षा हॉल में बैठकर वह जानते थे कि सही जवाब क्या हैं, फिर भी उन्होंने कुछ सवालों के गलत उत्तर चुने।

परिवार ने देखा था एक तय रास्ता

ऋषभ परिवार के बड़े बेटे थे और उनके लिए भविष्य का रास्ता पहले से तय माना जाता था। विज्ञान से पढ़ाई, इंजीनियरिंग, MBA और फिर कॉर्पोरेट नौकरी यह वही सफर था जिसे समाज सफलता की पहचान मानता है।

हर पारिवारिक समारोह में IIT और बड़ी नौकरी पाने वाले लोगों की कहानियां सुनाई जाती थीं। लेकिन ऋषभ के मन में एक सवाल था क्या यही रास्ता वास्तव में उन्हें खुश रखेगा?

दूसरों की सफलता देखकर उठे सवाल

ऋषभ ने महसूस किया कि जिन लोगों ने समाज के हिसाब से बड़ी उपलब्धियां हासिल की थीं, उनमें से कई लोग अंदर से खुश नहीं दिखते थे। इसी बात ने उन्हें अपनी जिंदगी और फैसलों पर सोचने के लिए मजबूर किया।

उन्होंने इंजीनियरिंग की जगह मुंबई के Mithibai College से Arts की पढ़ाई करने का फैसला किया। उस समय कई लोगों को लगा कि उन्होंने अपना करियर खराब कर लिया है।

एक क्लासरूम ने बदल दी सोच

बाद में ऋषभ Teach For India से जुड़े और मुंबई के मानखुर्द इलाके में बच्चों को पढ़ाने लगे। यही अनुभव उनकी जिंदगी का बड़ा मोड़ बना। उन्होंने बताया कि बच्चों के साथ काम करते हुए उन्हें एहसास हुआ कि असली संतुष्टि सिर्फ बड़े पद या ऑफिस की सफलता में नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने में भी मिल सकती है।

कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ी, चुना अपना रास्ता

ऋषभ ने कुछ समय कॉर्पोरेट सेक्टर में भी काम किया। अच्छी सैलरी और अच्छे माहौल के बावजूद उन्हें महसूस हुआ कि कुछ कमी रह गई है। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर तीन महीने की बाइक यात्रा की। इस सफर ने उन्हें खुद को बेहतर समझने का मौका दिया।

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आज रचनात्मक दुनिया में बना रहे पहचान

अब ऋषभ हिमाचल प्रदेश के बीड़ में रहते हैं और लेखक, फोटोग्राफर व कलाकार के रूप में काम कर रहे हैं। साथ ही वह लोगों को अपनी रचनात्मकता से दोबारा जुड़ने में मदद करते हैं।

सफलता और मंजूरी में से चुनना सबसे मुश्किल

ऋषभ का कहना है कि उनके और उनके माता-पिता के सपने अलग नहीं थे। माता-पिता भी सिर्फ उनकी खुशी चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी खुशी तक पहुंचने का रास्ता खुद तलाशना था। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सफलता का मतलब हमेशा वही रास्ता चुनना नहीं होता जिसे दुनिया सही मानती है, बल्कि वह रास्ता चुनना होता है जो व्यक्ति को अंदर से संतुष्ट करे।