Papankusha Ekadashi 2026: पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से मिलती है सभी पापों से मुक्ति, 21 या 22 अक्टूबर कब है अश्विन एकादशी व्रत

Papankusha Ekadashi 2026: हिंदू कैलेंडर में हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का विशेष स्थान है। इस दिन भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी व्रत किया जाता है। माना जाता है कि पूरे साल में आने वाले एकादशी व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और उनकी कृपा से वैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है। हर माह की तरह अश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का व्रत भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसे पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। माना जाता है कि एकादशी व्रत में विष्णु सहस्रनाम और भगवद्गीता का पाठ करने से सुख-शांति की प्राप्ति होती है। आइए जानें इस साल पापांकुशा एकादशी का व्रत 21 या 22 अक्टूबर किस दिन किया जाएगा?

कब है पापांकुशा एकादशी का व्रत?

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज ने नेटवर्क 18 को बताया कि अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन 22 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 47 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।

सभी पापों से मिलती है मुक्ति

पापांकुशा एकादशी व्रत में भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पद्म पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, इस दिन व्रत करने से मनुष्य के सभी जाने-अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत खास तौर पर उन लोगों के लिए फलदायक माना गया है जो आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति की कामना रखते हैं।

एकादशी व्रत में जरूर करें ये कार्य

  • एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद व्रत संकल्प लें।
  • पूजा में भगवान विष्णु को पीली मिठाई का भोग लगाएं। पीला रंग उनका प्रिय माना जाता है।
  • भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा करें।
  • इस दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाना भी शुभ माना जाता है।

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Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी और महानवमी कब है? ज्योतिषाचार्य से जानें तारीख, मुहूर्त औ नवरात्रि व्रत पारण का समय

Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि का पर्व अब अपने समापन की ओर आ गया है। इस पर्व में महाअष्टमी और महानवमी तिथि का विशेष महत्व है। नवरात्रि में पूरे नौ दिन व्रत करने वाले भक्त इस दिन छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं, जिसे कन्या पूजन या कंजक पूजन कहा जाता है। लेकिन इस साल शारदीय नवरात्रि में महाअष्टमी और महानवमी तिथि की तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बन रही है कि यह दोनों अहम पर्व किस तारीख को मनाए जाएंगे?

श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर, 2026 को प्रातः 8 बजकर 29 मिनट पर प्रारंभ होगी तथा 19 अक्टूबर को प्रातः 10 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी।

इसी तरह, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 19 अक्टूबर, 2026 को प्रातः 10 बजकर 53 मिनट पर प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 51 मिनट पर समाप्त होगी। सूर्योदय व्यापिनी अष्टमी 19 अक्टूबर को तथा सूर्योदय व्यापिनी नवमी 20 अक्टूबर को है।

अष्टमी और नवमी का व्रत और कन्या पूजन कब?

महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि जो श्रद्धालु अष्टमी के दिन व्रत, पूजन, साख विसर्जन एवं कन्या पूजन करना चाहते हैं, वे 19 अक्टूबर, सोमवार को ये धार्मिक कार्य कर सकते हैं। वहीं, नवमी के दिन व्रत, पूजन, साख विसर्जन एवं कन्या पूजन करने वाले श्रद्धालु 20 अक्टूबर, मंगलवार को ये अनुष्ठान कर सकते हैं।

विजयदशमी का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। शस्त्र पूजन का समय 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट के बाद करना शुभ होगा।

कन्या पूजन का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 3 से 9 वर्ष तक की कन्याओं को मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। कन्या पूजन को नवरात्रि के अनुष्ठान का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इस दिन श्रद्धालु कन्याओं का पूजन कर उन्हें भोजन कराते हैं और भेंट देकर विदा करते हैं। नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी भोजन कराने की परंपरा है। इस अवसर पर उन्हें खीर, पूड़ी, हलवा और काले चने का भोग लगाया जाता है।

कन्याओं से इन मंत्रों द्वारा करें प्रार्थना

मंत्र 1

मन्त्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्।

नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्॥

मंत्र 2

जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।

पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोऽस्तु ते॥

कन्या पूजन के नौ मंत्र

  • ॐ कुमार्यै नमः।
  • ॐ त्रिमूर्त्यै नमः।
  • ॐ कल्याण्यै नमः।
  • ॐ रोहिण्यै नमः।
  • ॐ कालिकायै नमः।
  • ॐ चण्डिकायै नमः।
  • ॐ शाम्भव्यै नमः।
  • ॐ दुर्गायै नमः।
  • ॐ सुभद्रायै नमः।

नवरात्रि व्रत का पारण

कन्या पूजन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद नवरात्रि व्रत का पारण किया जाता है। व्रत खोलने की इस प्रक्रिया को व्रत पारण कहा जाता है। श्रद्धालुओं को अपनी पारिवारिक परंपरा, धार्मिक मान्यताओं तथा पंचांग के अनुसार उचित समय पर व्रत का पारण करना चाहिए।

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चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

char dham yatra sansmaran in hindi

यात्राएँ केवल पर्यटन नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, जन-आस्था को अनुभव करने और प्रकृति के निकट पहुँचने का अवसर होती हैं। धार्मिक यात्रा मनुष्य को सांसारिक भागदौड़ से दूर कर आत्मचिंतन और ईश्वर के सान्निध्य में जाने का मार्ग दिखाती है। इसी भावना के साथ 26 सितंबर को मध्य प्रदेश के देवास से उत्तराखंड की चारधाम यात्रा प्रारंभ हुई। 15 दिनों के इस सफर ने मुझे आध्यात्मिक संतोष तो दिया, लेकिन धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की कठिनाइयों ने कई गंभीर प्रश्न भी खड़े किए।

 

माँ गंगा की आरती से हिमालय की दिव्यता तक

हरिद्वार में माँ गंगा की भव्य आरती, मंत्रोच्चार और दीपों से जगमगाती जलधारा ने मन को भावविभोर कर दिया। ऋषिकेश के आध्यात्मिक वातावरण से होते हुए यात्रा माँ यमुनोत्री पहुँची। लगभग छह से सात किलोमीटर के दुर्गम पहाड़ी मार्ग पर पैदल चढ़ाई, थकान और हल्की बारिश के बीच माँ यमुना के दर्शन हुए। इसके बाद उत्तरकाशी में श्री काशी विश्वनाथ महादेव और गंगोत्री में माँ गंगा के दर्शन किए। हिमालय की विशालता ने अनुभव कराया कि प्रकृति के सामने मनुष्य का अहंकार कितना छोटा है।

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केदारनाथ: आस्था अटूट, लेकिन व्यवस्था पर सवाल

यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव बाबा केदारनाथ धाम रहा। लगभग 20 से 22 किलोमीटर के दुर्गम मार्ग पर चढ़ाई, घोड़े-खच्चरों की आवाजाही और यात्रियों की भीड़ के बीच आगे बढ़ना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। लगभग 12 घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब दो बजे धाम पहुँचना संभव हुआ, जबकि दर्शन का सौभाग्य अगले दिन शाम लगभग छह बजे मिला। बाबा केदारनाथ के सम्मुख पहुँचते ही मन श्रद्धा से भर गया और सारी थकान मानो क्षणभर में मिट गई।

 

लेकिन घंटों की प्रतीक्षा ने सवाल भी खड़ा किया कि क्या श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?

 

देश के कोने-कोने से लोग धन, समय और शारीरिक सामर्थ्य खर्च करके अपने आराध्य तक पहुँचते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएँ और अस्वस्थ लोग भी होते हैं। कठिन यात्रा के बाद घंटों कतार में खड़े रहना और अंततः कुछ सेकंड के दर्शन पाना उनकी पीड़ा को बढ़ाता है। इस समस्या के बीच VIP संस्कृति भी चिंता का विषय है। विशेष व्यक्तियों को प्राथमिकता देने से यदि आम श्रद्धालुओं को अतिरिक्त प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह व्यवस्था उनकी आस्था और सम्मान दोनों को ठेस पहुँचाती है।

 

ईश्वर के दरबार में हर भक्त बराबर है; किसी की विशेष सुविधा आम श्रद्धालु की परेशानी का कारण नहीं बननी चाहिए। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ सरकार और प्रशासन के सामने चुनौती अवश्य हैं, लेकिन बेहतर योजना और जवाबदेही की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ना उपलब्धि हो सकती है, पर उनकी परेशानियाँ बढ़ना व्यवस्था की सफलता नहीं है।

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त्रियुगीनारायण से बद्रीनाथ तक

केदारनाथ के बाद त्रियुगीनारायण मंदिर में दर्शन का अवसर मिला। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थल पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। मंदिर की अखंड धूनी तथा भगवान विष्णु की उपस्थिति इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता बढ़ाती है। इसके बाद बद्रीनाथ धाम में भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के साथ यात्रा पूर्ण हुई। इन पवित्र स्थलों ने श्रद्धा, समर्पण और भारतीय संस्कृति की गहराई का अनुभव कराया।

 

आस्था या सोशल मीडिया का प्रदर्शन?

यात्रा के दौरान धार्मिक स्थलों पर तस्वीरें लेने और रील बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति भी दिखाई दी। अनुभव साझा करना गलत नहीं है, लेकिन जब कैमरा श्रद्धा पर हावी हो जाए, तो तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। प्रश्न यह है कि हम ईश्वर के दर्शन करने जाते हैं या दुनिया को यह दिखाने कि हम दर्शन करने गए थे? भक्ति का वास्तविक आनंद लाइक और कमेंट में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब मन बिना किसी दिखावे के अपने आराध्य के सामने झुकता है।

 

सरकार और प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश

चारधाम यात्रा में उमड़ती भीड़ सरकार और प्रशासन के लिए अवसर से अधिक जिम्मेदारी है। दर्शन व्यवस्था, यातायात, पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता, चिकित्सा और आपातकालीन सहायता को मजबूत करना अनिवार्य है। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा VIP व्यवस्था के कारण आम श्रद्धालुओं का आवागमन और दर्शन बाधित नहीं होने चाहिए।

 

श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सम्मान कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी है। सरकार को घोषणाओं से आगे बढ़कर धरातल पर सुधार दिखाना होगा। समय रहते व्यवस्थाएँ नहीं सुधारी गईं, तो बढ़ती भीड़ भविष्य में गंभीर कठिनाइयाँ पैदा कर सकती है। विकास के साथ हिमालय के नाजुक पर्यावरण की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

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आस्था का सम्मान, व्यवस्था की जवाबदेही

10 अक्टूबर को लौटते समय मन में चारधाम के दर्शन का संतोष था, लेकिन व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता भी स्पष्ट थी। सरकार को जवाबदेही निभानी होगी, प्रशासन को संवेदनशील बनना होगा और यात्रियों को अनुशासन तथा पर्यावरण संरक्षण का पालन करना होगा।

 

आस्था अटूट है, लेकिन श्रद्धालुओं की सहनशीलता को व्यवस्था की कमजोरियों का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। ईश्वर के दरबार में समानता तभी सार्थक होगी, जब प्रत्येक भक्त को समान सम्मान और यथासंभव सुविधाजनक दर्शन मिलें। क्योंकि चारधाम की यात्रा पैरों से जितनी पूरी होती है, उससे कहीं अधिक हृदय और आत्मा से पूरी होती है।

 

हर हर महादेव! जय बद्रीविशाल! जय माँ गंगे! जय माँ यमुना!

Dussehra 2026: कब मनाया जाएगा इस साल दशहरा? जानें तारीख, समय, विजय मुहूर्त और महत्व

Dussehra 2026: दशहरा का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह भगवान राम की रावण पर जीत के साथ-साथ देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत से भी जुड़ा है।इसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व इस साल मंगलवार, 20 अक्टूबर, 2026 को मनाया जाएगा। द्रिक पंचांग के अनुसार, अश्विन शुक्ल दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर, 2026 को दोपहर 2:11 बजे खत्म होगी।

दशहरा 2026 की तारीख और समय

दशहरा/विजयादशमी : मंगलवार, 20 अक्टूबर, 2026

दशमी तिथि शुरू : 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50 बजे

दशमी तिथि खत्म : 21 अक्टूबर को दोपहर 2:11 बजे

विजय मुहूर्त : शहर के हिसाब से अलग-अलग

नई दिल्ली विजय मुहूर्त : दोपहर 1:59 बजे से दोपहर 2:45 बजे

मुंबई विजय मुहूर्त : दोपहर 2:19 बजे से दोपहर 3:06 बजे

कोलकाता बंगाल विजयदशमी : बुधवार, 21 अक्टूबर

कोलकाता अपरान्ह पूजा : दोपहर 12:30 बजे से दोपहर 2:49 बजे

क्यों अलग-अलग होती है दशहरा की तारीख?

भारत के ज़्यादातर हिस्सों में, विजयदशमी 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। हालांकि, बंगाल में, बिजॉय दशमी बुधवार, 21 अक्टूबर को इलाके के दुर्गा पूजा कैलेंडर के हिसाब से मनाई जाएगी। 20 अक्टूबर और 21 अक्टूबर के बीच अंतर मुख्य रूप से क्षेत्रीय परंपराओं और स्थानीय पंचांग की गणना की वजह से है।

दशहरा 2026 पर विजय मुहूर्त क्या है?

विजय मुहूर्त को पारंपरिक रूप से दशहरा से जुड़े कुछ रीति-रिवाजों और औपचारिकताओं के लिए एक शुभ समय माना जाता है।

नई दिल्ली : 20 अक्टूबर को दोपहर 1:59 PM–2:45 PM

मुंबई : 20 अक्टूबर को दोपहर 2:19 PM–3:06 PM

कोलकाता : 20 अक्टूबर को दोपहर 1:17 PM–2:03 PM

दशहरा क्यों मनाया जाता है?

पूरे भारत में दशहरा के कई धार्मिक और सांस्कृतिक मतलब हैं।

भगवान राम की रावण पर जीत : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयदशमी भगवान राम की राक्षस राज रावण पर जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस घटना को अधर्म पर धर्म की जीत के तौर पर याद किया जाता है। इसलिए दशहरा के मौके पर पारंपरिक तौर पर मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ रावण के बड़े पुतले जलाए जाते हैं।

देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत : विजयदशमी देवी दुर्गा की महिषासुर, भैंसे जैसे राक्षस पर जीत से भी जुड़ी है। पूर्वी भारत, खासकर बंगाल, ओडिशा और असम में, यह दिन दुर्गा पूजा के खत्म होने और देवी दुर्गा की विदाई से जुड़ा है।

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Ekadashi October 2026: अक्टूबर में आएंगी इंदिरा और पापांकुशा एकादशी, जानें तारीख, मुहूर्त और पारण समय

Ekadashi October 2026: हिंदू कैलेंडर के प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल की एकादशी तिथि को एकादशी व्रत किया जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इसे श्री हरि की कृपा पाने का सबसे सरल उपाय भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे साल में आने वाली 24 एकादशी तिथियों का व्रत करने वाले भक्तों पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा होती है। उनके आशीर्वाद से व्रतियों के सभी कष्ट दूर होते हैं और उन्हें बैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है।

हर माह की तरह अश्विन माह में भी दो एकादशी व्रत किए जाते हैं इंदिरा एकादशी और पापांकुशा एकादशी। इस साल यह दोनों उपवास अक्टूबर माह में किए जाएंगे। इंदिरा एकादशी का खास महत्व है क्योंकि यह पितृ पक्ष के दौरान आती है, जब पुरखों के लिए प्रार्थना और पूजा-पाठ किए जाते हैं। यहां इंदिरा एकादशी की तारीखें, तिथि का समय और पारण की जानकारी दी गई है, साथ ही अश्विन में पापांकुशा एकादशी की तारीख भी दी गई है।

इंदिरा एकादशी 

अश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष मनाया जाता है और यह पुरखों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे रीति-रिवाजों से जुड़ा है। इंदिरा एकादशी इसी समय पड़ती है। माना जाता है कि इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है।

इंदिरा एकादशी 2026 तारीख और समय

इस साल इंदिरा एकादशी 6 अक्टूबर को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को सुबह 2:07 बजे शुरू होगी और 7 अक्टूबर को रात 12:34 बजे खत्म होगी। हिंदू त्योहारों की तारीखें आमतौर पर सूर्योदय के समय की तिथि से तय होती हैं, इसलिए व्रत 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

इंदिरा एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त

वैदिक कैलेंडर के अनुसार, अश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 अक्टूबर को सुबह 2:07 बजे शुरू होगी और 7 अक्टूबर को रात 12:34 बजे खत्म होगी। भक्त 6 अक्टूबर तक पूरे दिन व्रत रख सकते हैं और दिन में भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं।

पंचांग के अनुसार सूर्योदय सुबह 6:17 बजे और सूर्यास्त शाम 6:01 बजे होगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:39 बजे से 5:28 बजे तक रहेगा, जबकि विजय मुहूर्त दोपहर 2:06 बजे से 2:53 बजे तक रहेगा। गोधूलि बेला शाम 6:01 बजे से 6:26 बजे तक और निशिता मुहूर्त रात 11:45 बजे से 12:34 बजे तक रहेगा।

इंदिरा एकादशी 2026 पारण समय

इंदिरा एकादशी का व्रत बुधवार, 7 अक्टूबर को तोड़ा जाएगा। दिए गए समय के अनुसार, भक्त सुबह की रस्में, प्रार्थना और शास्त्रों का पाठ पूरा करने के बाद सुबह 6:17 बजे से 8:38 बजे के बीच पारण कर सकते हैं।

पापांकुशा एकादशी 2026: यह कब मनाई जाएगी?

पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष में आती है और गुरुवार, 22 अक्टूबर, 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 21 अक्टूबर को दोपहर 2:11 बजे शुरू होगी और 22 अक्टूबर को दोपहर 2:47 बजे खत्म होगी। इसलिए व्रत की तारीख 22 अक्टूबर है।

पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने वाले भक्तों के लिए, पारण 23 अक्टूबर को किया जाता है। पारण का सही समय जगह के हिसाब से अलग हो सकता है क्योंकि एकादशी मनाने और पारण समय की गणना स्थानीय सूर्योदय और तिथि के हिसाब से होती है।

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पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

Shraddh Paksha 2026

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है।

 

लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं है। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं और दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, मगर अपने ही परदादा की तस्वीर कहाँ है, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने परिवार के लिए क्या किया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हम भविष्य की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि उस अतीत को भूलते जा रहे हैं, जिसकी नींव पर हमारा वर्तमान खड़ा है।

 

यहीं से श्राद्ध पक्ष की सार्थकता आरंभ होती है। यह केवल पंचांग की कुछ तिथियां नहीं हैं; यह हमारी सामूहिक स्मृति को जगाने वाला वह अवसर है, जब वर्तमान कुछ क्षण के लिए अतीत के सामने खड़ा होता है और स्वीकार करता है कि हम अकेले नहीं हैं—हमारे अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है।

 

‘श्राद्ध’ का वास्तविक अर्थ और पितृऋण

‘श्राद्ध’ शब्द का सीधा संबंध ‘श्रद्धा’ से है। इसलिए श्राद्ध का मूल अर्थ केवल पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मण भोजन कराना ही नहीं है। ये भले ही परंपरागत विधियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में जो मूल भाव है, वह है—अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय स्मरण।

 

भारतीय सनातन परंपरा ने मृत्यु को संबंधों का पूर्ण विराम नहीं माना है। शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु स्मृति और संस्कार जीवित रहते हैं। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके कर्म परिवार की अगली पीढ़ियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में पितरों के प्रति दायित्व को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे ‘पितृऋण’ कहा जाता है।

 

हमारे माता-पिता ने हमें जीवन दिया और हमारे दादा-दादी व पूर्वजों ने परिवार को संभाला। किसी ने अभाव में जीवन जिया, किसी ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, तो किसी ने परिवार के लिए अपने सुख त्याग दिए और उन संस्कारों की परंपरा को सुरक्षित रखा जो आज हमारे हाथों में है। हम जिस जीवन को अपना कहते हैं, उसकी नींव में उन सबका योगदान है। इसलिए पितृऋण कोई ऐसा ऋण नहीं है जिसे धन देकर चुकाया जा सके। इसे चुकाने का सबसे सुंदर मार्ग है—माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, परिवार में प्रेम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देना।

 

तर्पण और परंपराओं के पीछे छिपा भाव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जल, तिल और कुश आदि के माध्यम से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है। आस्था मानती है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति व शांति प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है। लेकिन तर्पण को केवल एक बाहरी कर्मकांड मानना, उसके भीतर छिपे गहरे भाव से वंचित रहना है।

 

तर्पण की जलधारा केवल जल नहीं होती; वह स्मृति और कृतज्ञता की धारा होती है। जब कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा, परदादा या अन्य पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अतीत को प्रणाम करता है। वह मानो यह स्वीकार करता है कि उसके वर्तमान में उसका अपना श्रम जितना है, उतना ही योगदान उन लोगों का भी है जो आज उसके साथ नहीं हैं।

 

श्राद्ध परंपरा में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना तथा ब्राह्मण, अतिथि या किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का विधान है। इन परंपराओं में जीव-दया, अन्नदान, सेवा और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। पूर्वजों के नाम पर यदि किसी भूखे का पेट भर जाए या किसी जीव को अन्न मिल जाए, तो श्रद्धा का दायरा और विस्तृत हो जाता है।

 

भारतीय धार्मिक साहित्य और महाकाव्यों में पितृकर्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। चाहे महाभारत में कर्ण से जुड़ी कथा हो या रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा पिता राजा दशरथ के निमित्त किया गया श्राद्ध—ये प्रसंग भारतीय समाज में पितरों के प्रति दायित्व की गहरी भावना को दर्शाते हैं।

 

इसी श्रृंखला में ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी व्यापक स्मरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो सका, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह तिथि बनी है। यह ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करने का दिन है।

 

आधुनिक दौर में श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता

आज श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच का संवाद घटता जा रहा है। बच्चे अपने दादा-दादी के जीवन-संघर्षों से परिचित नहीं हैं और अनेक बार उन्हें अपने परदादा का नाम तक मालूम नहीं होता। ऐसे समय में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों को बचाने का माध्यम बन सकता है:

  • घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों की कहानियां सुनाएं।
  • परिवार का एक ‘वंश-वृक्ष’ (Family Tree) तैयार किया जाए।
  • पुरानी तस्वीरों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए।
  • पूर्वजों के संघर्षों, उनके व्यवसाय, सामाजिक योगदान और जीवन-मूल्यों की जानकारी नई पीढ़ी को दी जाए।
  • क्योंकि जिसे अपनी जड़ों का पता नहीं होता, उसकी पहचान की ऊंचाई भी अधूरी रह जाती है।

 

भय नहीं, कृतज्ञता का नाम है श्राद्ध

पितृदोष जैसी धार्मिक मान्यताएं भी श्राद्ध परंपरा से जुड़ी हुई हैं। अनेक श्रद्धालु पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से तर्पण, पाठ और आध्यात्मिक साधनाएं करते हैं। इन आस्थाओं का सम्मान करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि श्राद्ध का व्यापक संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सदाचार सिखाना है।

 

यदि हम पितरों की शांति की कामना करते हैं, तो केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं हो सकता। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का आदर, परिवार में प्रेम, जरूरतमंदों की सहायता, जीवों के प्रति करुणा और अपने आचरण में सत्य व संयम रखना भी पितृ-सम्मान का ही विस्तार है।

 

  • आखिर पूर्वजों को सबसे बड़ा सम्मान क्या है?
  • क्या केवल एक दिन जल अर्पित कर देना?
  • क्या केवल भोजन करा देना और दान दे देना?
  • या फिर उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना?

 

उत्तर स्पष्ट है—यदि उन्होंने परिवार को जोड़कर रखा था, तो हम भी परिवार को जोड़ें। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखा था, तो हम भी धैर्य रखें। यदि उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की थी, तो हम भी सेवा करें। और यदि उन्होंने हमें संस्कार दिए थे, तो हम उन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। यहीं पर श्राद्ध कर्मकांड से ऊपर उठकर ‘जीवन का संस्कार’ बन जाता है।

 

स्मृति की अंजलि

श्राद्ध पक्ष मृत्यु का शोक नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह अतीत में लौटने का हठ नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम किसी शून्य से पैदा नहीं हुए हैं; हमारे पीछे अनेक पीढ़ियों का श्रम, संघर्ष, त्याग और संस्कार खड़े हैं।

 

इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में जब हम पितरों को जल अर्पित करें, तो अपने भीतर भी कृतज्ञता का दीप जलाएं। जब अन्न अर्पित करें, तो सेवा का संकल्प लें। जब पूर्वजों का नाम लें, तो उनके जीवन से कोई एक श्रेष्ठ गुण अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। और जब अपने बच्चों को उनके पूर्वजों की कहानियां सुनाएं, तो उन्हें यह अहसास कराएं कि वे केवल वर्तमान के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा के उत्तराधिकारी हैं।

 

पूर्वज चले जाते हैं, उनकी स्मृतियां नहीं।

चेहरे मिट जाते हैं, संस्कार नहीं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं, विरासत नहीं।

 

इसीलिए श्राद्ध केवल पितरों को स्मरण करने का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने का पर्व है। अंततः पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल जल की एक अंजलि भर नहीं है; सच्ची श्रद्धांजलि है—एक ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कार दिखाई दें, और ऐसा परिवार बनाना जिसे देखकर हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों पर गर्व कर सके।

 

श्राद्ध की सबसे बड़ी अंजलि जल की नहीं, स्मृति की है। सबसे बड़ा तर्पण कर्मकांड का नहीं, कृतज्ञता का है; और पितरों को सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उनके अच्छे संस्कार हमारे जीवन में निरंतर सांस लेते रहें।

Kanya Sankranti 2026 Date: सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश पर होगी कन्या संक्रांति कल, सूर्य दोष और करियर में उड़ान के लिए महापुण्यकाल में करें ये 4 उपाय

Kanya Sankranti 2026 Date: ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को ग्रहों का राजा माना जाता है। ज्योतिष में सूर्य को पिता, अच्छी सेहत और करियर का कारक माना जाता है। सूर्य के राशि परिवर्तन का राशि चक्र की सभी 12 राशियों पर असर पड़ता है। यह ग्रह हर 30 दिनों में राशि परिवर्तन करता है। इस हिसाब से हर माह सूर्य का राशि परिवर्तन होता है, जिसे संक्रांति कहते हैं। सितंबर माह में सूर्य देव एक बार फिर राशि बदलने जा रहे हैं। इस बार सूर्य देव अपने मित्र बुध की राशि कन्या में प्रवेश करेंगे। इस समय अपनी उच्च राशि सिंह में गोचर कर रहे सूर्य देव जिस समय कन्या राशि में गोचर करेंगे, उस समय सूर्य की कन्या संक्रांति होगी।

कन्या संक्रांति के दिन लोग गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान के बाद अपनी क्षमता के अनुसार दान पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इससे पाप मिटते हैं और पुण्य लाभ होता है। इस दिन पितरों को जल से तर्पण देना शुभ माना जाता है। कहते हैं ऐसा करने से पितृ तृप्त होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं, जिससे जीवन में खुशहाली आती है। इस साल कन्या संक्रांति कल यानी 17 सितंबर को होगी। इस बार कन्या संक्रांति के साथ विश्वकर्मा पूजा का भी संयोग बन रहा है। कन्या संक्रांति के दिन कुछ ज्योतिष उपायों को करने से कुंडली का सूर्य दोष मिट जाता है और करियर में आने वाली रुकावटें भी दूर होती हैं।

कन्या संक्रांति 2026 तारीख

वैदिक पंचांग क अनुसार, कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश 17 सितंबर को सुबह में 7 बजकर 58 मिनट पर होगा। उस समय कन्या संक्रांति का क्षण होगा। कन्या संक्रांति के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बनेगा। इन दोनों ही शुभ योगों में किए गए कार्य सफल सिद्ध होंगे।

कन्या संक्रांति 2026 महापुण्य काल

कन्या संक्रांति का महापुण्य काल 2 घंटे 3 मिनट का होगा। महापुण्य काल सुबह में सुबह में 07 बजकर 58 मिनट से सुबह 10 बजकर 01 मिनट तक रहेगा।

वहीं कन्या संक्रांति का पुण्य काल सुबह में 07 बजकर 58 मिनट से दोपहर 02 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। इस आधार पर पुण्य काल का कुल समय 6 घंटे 33 मिनट का होगा। जो लोग किसी कारणवश महापुण्य काल में स्नान और दान न कर पाएं, वे पुण्य काल में ये काम कर सकते हैं।

कन्या संक्रांति 2026 पर करें सूर्य दोष के उपाय

कन्या संक्रांति पर अपनी कुंडली के सूर्य दोष को दूर करने के लिए महापुण्य काल में स्नान करें, पितरों को जल अर्पित करें और सूर्य देव को जल से अर्घ्य दें। इसके लिए एक लोटे में जल भरकर उसमें लाल रंग के फूल, लाल चंदन और थोड़ा सा गुड़ डालें। ओम सूर्य देवाय नम: मंत्र का जाप करते हुए भगवान भास्कर को अर्पित करें। फिर आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ और आरती करें।

कन्या संक्रांति पर सूर्य के शुभ प्रभाव की प्राप्ति के लिए सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान करें। सामर्थ्यानुसार गुड़, गेहूं, लाल चंदन, लाल रंग के वस्त्र, लाल फूल, तांबे के बर्तन आदि का दान किसी ब्राह्मण को कर सकते हैं।

सूर्य देव के बीज मंत्र ॐ घृणि: सूर्याय नम: का जाप लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से कर सकते हैं।

कन्या संक्रांति के अवसर पर अपने माता पिता और घर के वरिष्ठ लोगों की सेवा करें। पिता तुल्य किसी व्यक्ति की सेवा करके आशीर्वाद लें, आपकी उन्नति होगी।

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Anant Chaturdashi 2026 Date: कब मनाई जाएगी अनंत चतुर्दशी और इस दिन क्यों बांधा जाता है अनंत सूत्र? जानें अनंत सूत्र की गांठों का रहस्य और संबंध

Anant Chaturdashi 2026 Date: हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी का दिन विशेष स्थान रखता है। एक ओर, इस दिन 10 दिनों के गणेश उत्सव का समापन गणेश प्रतिमा विसर्जित करने के साथ होता है। दूसरी ओर, इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है। महिलाएं अपने बाएं हाथ में, जबकि पुरुष अपने दाहिने हाथ में अनंत सूत्र बांधते हैं। अनंत सूत्र केवल एक रेशमी या सूती धागा नहीं है, बल्कि धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत सूत्र धारण करने से व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता का नाश होता है, मान-सम्मान की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। यह सूती या रेशमी धागा होता है, जिसे हल्दी या कुमकुम से रंगा जाता है ताकि यह पीला या लाल हो जाए। पूजा के दौरान ‘ॐ अनंताय नमः’ का जाप करते हुए इसमें 14 गांठें बांधी जाती हैं और भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करके इसकी पूजा की जाती है। आइए जानें इस साल अनंत चतुर्दशी कब है और अनंत सूत्र में 14 गांठों का क्या रहस्य है?

कब है अनंत चतुर्दशी 2026?

अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पड़ती है। साल 2026 में यह पर्व 25 सितंबर को मनाया जाएगा। इसी दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है और श्रद्धालु अनंत सूत्र धारण करते हैं। अनंत चतुर्दशी को गणेश उत्सव के समापन से भी जोड़कर देखा जाता है।

भगवान विष्णु का प्रत्यक्ष प्रतीक है अनंत सूत्र

अनंत सूत्र स्वयं भगवान अनंत (श्री हरि विष्णु) का प्रत्यक्ष प्रतीक माना जाता है। 14 गांठों में भगवान विष्णु के 14 अवतारों और उनकी अनंत शक्तियों का वास माना गया है। यह धागा धारण करने वाले व्यक्ति को जीवन के 14 मुख्य दुखों और संकटों से सुरक्षा प्रदान करता है।

अनंत सूत्र में 14 गांठों का रहस्य

शास्त्रों के अनुसार, अनंत सूत्र में 14 गांठें भू:, भुव:, स्व:, मह:, जन:, तप:, सत्य:, अतला, वितला, सुतला, रसातल, तलातल, महातल और पाताल 14 लोकों का प्रतिनिधित्व करती हैं। धार्मिक ग्रंथों में 14 लोकों का वर्णन मिलता है। इनमें सात लोक ऊपर के माने गए हैं, जबकि सात अधोलोक यानी नीचे के लोक बताए गए हैं। अनंत डोरे की 14 गांठों को इन्हीं 14 लोकों का प्रतीक माना जाता है।

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दिवाली से पहले चमकेंगे भाग्य के सितारे मिलेगा बंपर धन लाभ, पैसा लगाने से पहले जान लें ये जरुरी नियम!

दिवाली का त्योहार आते ही घर की सजावट और खरीदारी के साथ लोग धन से जुड़े फैसलों पर भी ध्यान देने लगते हैं। इस समय गोल्ड खरीदने से लेकर नई सेविंग या इन्वेस्टमेंट शुरू करने तक कई तरह की प्लानिंग की जाती है। वहीं ज्योतिष में भी दिवाली के आसपास बनने वाले कुछ खास ग्रह संयोग और शुभ मुहूर्तों को आर्थिक मामलों से जोड़कर देखा जाता है। इस साल भी ऐसे कई योग चर्चा में हैं, जिनके बारे में ज्योतिषाचार्य इन्वेस्टमेंट और धन से जुड़े फैसलों के लिए अपनी मान्यताएं बताते हैं।

दिवाली से पहले इन्वेस्टमेंट और धन लाभ के लिए शुभ योग

इन्वेस्टमेंट के लिए शुभ है ये योग

जब बुध और शुक्र एक ही राशि में आते हैं, तो ज्योतिष में इसे लक्ष्मी-नारायण योग कहा जाता है। मान्यता है कि यह योग धन और आर्थिक मामलों के लिए अनुकूल माना जाता है। ऐसे समय में लोग निवेश, नया काम शुरू करने या बिजनेस से जुड़े फैसलों पर विचार करते हैं। शेयर मार्केट, म्यूचुअल फंड या SIP में पैसा लगाने से पहले बाजार के रिस्क और अपनी जरूरत को समझना जरूरी है।

प्रॉपर्टी में निवेश के लिए मंगल का खास संयोग

ज्योतिष में मंगल को भूमि और संपत्ति से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए मंगल के राशि परिवर्तन को कुछ ज्योतिषी जमीन, मकान या दूसरी अचल संपत्ति से जुड़े कामों के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। अगर आप घर, दुकान या जमीन खरीदने की प्लानिंग बना रहे हैं, तो इस दौरान शुभ मुहूर्त देखा जा सकता है।

धनतेरस पर खरीदारी के लिए क्यों खास है पुष्य नक्षत्र?

पुष्य नक्षत्र को ज्योतिष में शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है। जब पुष्य नक्षत्र रविवार को आता है तो इसे रवि पुष्य और गुरुवार को आने पर गुरु पुष्य कहा जाता है। इन योगों को खरीदारी और नई शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। दिवाली और धनतेरस के आसपास सोना या दूसरी चीजें खरीदने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है।

सेविंग और नई शुरुआत के लिए सिद्धि योग

ज्योतिष में इस योग को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इन योगों में शुरू किए गए अच्छे कामों में सफलता की संभावना बेहतर रहती है। दिवाली से पहले आने वाले ऐसे मुहूर्तों में लोग बैंक में जमा, नई बचत शुरू करने या लक्ष्मी पूजन जैसे धार्मिक कार्य कर सकते हैं। इन योगों को लेकर धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए इन्हें आर्थिक लाभ की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

दिवाली के समय धन और इन्वेस्टमेंट से जुड़ी कई ज्योतिषीय मान्यताएं प्रचलित हैं। शुभ योग और मुहूर्त लोगों को नई शुरुआत के लिए इंस्पायर कर सकते हैं, लेकिन फिनेंशिअल डिसीजन सोच-समझकर लेना जरूरी है। इन्वेस्टमेंट से पहले अपनी जरूरत, सेविंग और रिस्क को ध्यान में रखें, ताकि त्योहार के साथ फाइनेंशियल प्लानिंग भी सही तरीके से आगे बढ़ सके।

Disclaimer: यह जानकारी ज्योतिषीय मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों पर आधारित है। किसी भी इन्वेस्टमेंट या बड़े वित्तीय फैसले से पहले फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लें और अपनी फाइनेंशियल सिचुएशन के अनुसार ही निर्णय करें।

Pitru Paksha 2026 Niyam: पितृ पक्ष में नए कपड़े या खुद के लिए कोई चीज खरीदना क्यों है मना? जानिए इन 15 दिनों के लिए खरीदारी के नियम

Pitru Paksha 2026 Niyam: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को एक विशेष अवधि के रूप में जाना जाता है, जब हम अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना और दान करते हैं। इस अवधि को अत्यंत पवित्र और प्रभावशली माना जाता है। पितृ पक्ष की अवधि लगभग 15-16 दिनों की होती है। इस दौरान लोग नियम से तिथि अनुसार और दिवंगत परिजनों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। पितृ पक्ष की इस अवधि के दौरान कई सख्त नियमों का पालन करना जरूरी होता है। इनमें आहार से संबंधित नियम हैं, शुभ और मांगलिक कार्यों से संबंधित नियमों के साथ-साथ खरीदारी से जुड़े नियमों मानने अनिवार्य होते हैं।

पितृ पक्ष हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होगा। इसमें पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे। इस दौरान लोग निजी इस्तेमाल की चीजें और कपड़े आदि नहीं खरीदते हैं। आइए जानें इस बारे में शास्त्र क्या कहते हैं? इस अवधि में क्या खरीद सकते हैं और क्या नहीं ?

पितृपक्ष में नए कपड़े और चीजें खरीदें या नहीं?

शास्त्रों के मुताबिक, पितृपक्ष के दौरान नया सामान या नए कपड़े खरीदना पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन इस दौरान गहने, नए वस्त्र, गाड़ी, मकान-जमीन और लोहे का सामान जैसी बड़ी चीजें खरीदना अशुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि नई चीजें हमारे भीतर दिखावे की भावना ला सकती हैं, इसलिए इनसे बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी चीजें खरीदने में कोई बुराई नहीं है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों का आयोजन वर्जित माना जाता है। इस निषेध का मुख्य कारण यह है कि यह अवधि पूरी तरह से पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए समर्पित होती है। पितृपक्ष की प्रकृति अत्यंत गंभीर और संयमित होती है, जबकि मांगलिक कार्यों में उत्सव और उल्लास का माहौल रहता है। माना जाता है कि ऐसे आयोजनों से इस विशेष समय की आध्यात्मिक गंभीरता और शांति प्रभावित हो सकती है।

पितृपक्ष क्या न खरीदें?

व्यक्तिगत नए वस्त्र और आभूषण- पितृपक्ष में खुद पहनने के लिए नए फैंसी कपड़े या गहने।

पितृपक्ष में मकान, जमीन या नई गाड़ी भी नहीं खरीदनी चाहिए।

पितृपक्ष में लोहे का सामान, झाड़ू, नमक और सरसों का तेल घर लाना वर्जित माना जाता है।

Ganesh Chaturthi 2026 wishes: ‘गौरी पुत्र जब घर में आएं, भाग्य के बंद द्वार खुल जाएं’ आज गणपति के आगमन पर अपनों को भेजें से बधाई संदेश