चीन बोला-जापान के पास 5500 परमाणु बम बनाने जितना प्लूटोनियम:राजदूत ने कहा- चाहे तो कभी भी परमाणु हथियार बना सकता है

चीन ने जापान की परमाणु क्षमता को लेकर चिंता जताई है। रूस में चीन के राजदूत झांग हानहुई ने दावा किया कि जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम है। उनके मुताबिक, इतनी मात्रा से सैद्धांतिक तौर पर करीब 5,500 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। झांग ने रूसी सरकारी समाचार एजेंसी तास से बातचीत में कहा कि जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके उसमें से प्लूटोनियम निकालने की तकनीक भी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि जापान के पास 5,500 परमाणु हथियार हैं। यह चीन की ओर से प्लूटोनियम की मात्रा के आधार पर लगाया गया सैद्धांतिक अनुमान है। जापान ने परमाणु हथियार रखने या बनाने की नीति नहीं अपनाई है। प्लूटोनियम क्या होता है और जापान के पास इतना कैसे आया? प्लूटोनियम एक रेडियोऐक्टिव तत्व है। यह परमाणु रिएक्टर में यूरेनियम के इस्तेमाल के दौरान बनता है। इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके इसमें से प्लूटोनियम अलग किया जा सकता है। जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करने की तकनीक है। वह परमाणु ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किए गए ईंधन को दोबारा संसाधित करके उसमें से प्लूटोनियम निकालता रहा है। इसी वजह से कई दशकों में जापान के पास प्लूटोनियम का बड़ा भंडार जमा हुआ है। जापान के पास कुल कितना प्लूटोनियम है? झांग हानहुई के मुताबिक, 2024 के अंत तक जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम था। इसके अलावा करीब 191 टन ऐसा प्लूटोनियम भी बताया गया है, जो अभी इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन से अलग नहीं किया गया है। दोनों आंकड़ों में अंतर समझना जरूरी है। 44.4 टन वह प्लूटोनियम है जिसे ईंधन से अलग किया जा चुका है, जबकि 191 टन अभी ईंधन में मौजूद बताया गया है। चीन का 5,500 परमाणु हथियारों वाला दावा 44.4 टन अलग किए गए प्लूटोनियम की मात्रा पर आधारित है। इसे जापान के पास मौजूद तैयार परमाणु हथियारों की संख्या नहीं माना जा सकता। चीन जापान को लेकर चिंतित क्यों है? चीन के राजदूत ने कहा कि जापान परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT का मेंबर है और उसके पास परमाणु हथियार नहीं हैं। लेकिन जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके प्लूटोनियम निकालने की तकनीक है। झांग के मुताबिक, अगर जापान कभी परमाणु हथियार बनाने का फैसला करता है और उसके पास इसके लिए जरूरी क्षमता होती है, तो उसके लिए परमाणु हथियार बनाने की संभावना सिर्फ कल्पना नहीं रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर टोक्यो परमाणु हथियार बनाने का फैसला करता है तो इससे पूर्वोत्तर एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है और इलाके में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, ये चीनी राजदूत के दावे और आशंकाएं हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि जापान परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रहा है। जापान की परमाणु नीति क्या है? जापान की परमाणु नीति उसके तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों पर आधारित है। इनकी घोषणा 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ईसाकु सातो ने की थी। बाद में 1971 में जापानी संसद ने इन्हें अपनाया। इन सिद्धांतों के तहत जापान ने तय किया है कि वह: इन सिद्धांतों के पीछे हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों का गहरा असर भी माना जाता है। जापान में परमाणु हथियारों को लेकर लंबे समय से विरोध रहा है। ये तीन सिद्धांत कानून नहीं हैं, लेकिन कई दशकों से जापान की सुरक्षा और परमाणु नीति का अहम हिस्सा बने हुए हैं। प्लूटोनियम होने का मतलब परमाणु हथियार होना नहीं जापान के पास बड़ी मात्रा में प्लूटोनियम होने और उसके पास परमाणु हथियार होने में बड़ा अंतर है। प्लूटोनियम एक ऐसा पदार्थ है जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी होता है। किसी देश के पास इसका भंडार होने से यह साबित नहीं होता कि वह परमाणु हथियार बना रहा है। इसी तरह, चीन का 5,500 हथियारों वाला आंकड़ा भी जापान के पास मौजूद परमाणु हथियारों की संख्या नहीं है। यह 44.4 टन अलग किए गए प्लूटोनियम की मात्रा के आधार पर लगाया गया सैद्धांतिक अनुमान है। इसलिए फिलहाल जापान को परमाणु हथियार संपन्न देश कहना सही नहीं होगा। चीन की चिंता मुख्य रूप से जापान के पास मौजूद प्लूटोनियम और भविष्य में उससे परमाणु हथियार बनाने की संभावित क्षमता को लेकर है। —————————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने समझौते का मौका गंवा दिया है। अब उसे आर्थिक तौर पर अलग-थलग किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

Stock To Buy: सिक्योरिटी सर्विलांस प्रोडक्ट बनाने वाली इस कंपनी में 53% की तेजी मुमकिन, इस साल अब तक 125% चढ़ा, क्या है आपके पास

Stock To Buy: CP Plus की पैरेंट कंपनी, आदित्य इन्फोटेक (Aditya Infotech) के शेयर गुरुवार, 20 अगस्त को 4.9% बढ़कर ₹3,464 पर पहुंच गए। स्टॉक में तेजी मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज द्वारा इस स्टॉक पर कवरेज शुरू करने के बाद आई है। मोतीलाल ओसवाल ने आदित्य इन्फोटेक के लिए “Buy” (खरीदने की सलाह) की सलाह दी है और इसके लिए ₹4,200 का प्राइस टारगेट तय किया है, जो बुधवार के क्लोजिंग लेवल से 27% की तेजी दिखाता है।

ब्रोकरेज फर्म ने कंपनी के ‘बुल केस’ (सबसे अच्छे हालात) रन के अनुसार, स्टॉक ₹5,066 तक जा सकता है, जिसका मतलब है कि इसमें 53% तक की बढ़ोतरी की संभावना है।

मोतीलाल ओसवाल का कहना है कि आदित्य इन्फोटेक भारत के वीडियो सर्विलांस मार्केट में होने वाली ग्रोथ का फायदा उठाने के लिए अच्छी स्थिति में है। इस मार्केट में कंपनी की हिस्सेदारी 44% से ज़्यादा है।

ब्रोकरेज को उम्मीद है कि भारत का सर्विलांस मार्केट फाइनेंशियल ईयर 2025 में ₹106 अरब से बढ़कर फाइनेंशियल ईयर 2030 तक ₹227 अरब से ज़्यादा हो जाएगा। उन्हें यह भी उम्मीद है कि आदित्य इन्फोटेक का रेवेन्यू FY26 और FY28 के बीच 44% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा, जो इंडस्ट्री की अनुमानित 16%-18% ग्रोथ से काफी ज़्यादा है।

मोतीलाल ओसवाल के अनुसार, स्टैंडर्डाइजेशन टेस्टिंग एंड क्वालिटी सर्टिफिकेशन (STQC) के नियम कॉम्पिटिशन को कम कर सकते हैं और कंपनी को फाइनेंशियल ईयर 2028 तक अपनी मार्केट हिस्सेदारी 58% से ज़्यादा बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

ब्रोकरेज को उम्मीद है कि कंपनी FY26-FY28 के दौरान रेवेन्यू, EBITDA और टैक्स के बाद प्रॉफिट में क्रमशः 44%, 58% और 64% की ग्रोथ हासिल करेगी। उन्होंने कॉस्ट एफिशिएंसी और मार्जिन बढ़ाने के लिए लेंस, केबल, प्लास्टिक और मेटल कंपोनेंट्स में बैकवर्ड इंटीग्रेशन को भी एक अहम वजह बताया है।

कंपनी ने ₹1,500 करोड़ जुटाने को मंज़ूरी दी

इसके अलावा, कंपनी के बोर्ड ने 19 अगस्त को इक्विटी शेयर जारी करके ₹1,500 करोड़ तक जुटाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। फंड जुटाने का काम एक या उससे ज़्यादा मंज़ूर तरीकों से किया जा सकता है, जैसे कि पब्लिक इश्यू या क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP), या फिर इन तरीकों का मिला-जुला इस्तेमाल।

फंड जुटाने का यह प्रस्ताव शेयरहोल्डर्स और दूसरी रेगुलेटरी मंज़ूरी पर निर्भर है। कंपनी पोस्टल बैलेट के ज़रिए शेयरहोल्डर्स की मंज़ूरी लेगी और उसने इस प्रस्तावित इश्यू से जुड़े मामलों को देखने के लिए एक बोर्ड कमिटी भी बनाई है।

19 अगस्त की एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक, कंपनी ने मुंबई में 24 से 26 अगस्त और सिंगापुर में 1 से 3 सितंबर के बीच इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के साथ वन-ऑन-वन ​​और ग्रुप मीटिंग्स भी तय की हैं।

मार्जिन गाइडेंस

जून तिमाही के नतीजों के बाद, आदित्य इन्फोटेक ने FY27 के लिए अपने EBITDA मार्जिन गाइडेंस (14-15%) को फिर से दोहराया है, जबकि Q1FY27 में EBITDA मार्जिन 14.5% था। मैनेजमेंट ने संकेत दिया है कि वे FY27 की पहली छमाही के बाद आउटलुक का फिर से आकलन करेंगे, साथ ही वे तय गाइडेंस से बेहतर परफॉर्मेंस का इंटरनल टारगेट भी बनाए रखेंगे।

शेयर पर एनालिस्ट की राय

IIFL इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ भी आदित्य इन्फोटेक को लेकर पॉजिटिव है। सीनियर वाइस प्रेसिडेंट-रिसर्च रेनू बैद पुगलिया का कहना है कि कंपनी ने भारत के IP कैमरा मार्केट में मज़बूत जगह बनाई है। उन्होंने कैमरा वैल्यू चेन के बड़े हिस्से के लोकलाइज़ेशन (स्थानीय स्तर पर उत्पादन) पर ज़ोर दिया और कहा कि कंपनी को घरेलू प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले 18-24 महीने की बढ़त हासिल है, जिसका इस्तेमाल वह एंटरप्राइज़ और सरकारी ग्राहकों के लिए प्रीमियम प्रोडक्ट्स में विस्तार करने के लिए कर रही है।

उन्हें उम्मीद है कि आदित्य इन्फोटेक 40-45% रेवेन्यू CAGR हासिल करेगी, जिसमें मार्जिन 14.5-15% के आसपास रहेगा, जिससे अगले दो सालों में कमाई में 45-50% की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने सरकारी सर्टिफिकेशन की नई ज़रूरतों के बाद चीनी कंपनियों के बाहर निकलने को भी कंपनी के ग्रोथ आउटलुक के लिए एक मददगार कारक बताया।

यह स्टॉक “कंसेंसस बाय” (सबकी सहमति से खरीदने लायक) की श्रेणी में है, क्योंकि इस स्टॉक को ट्रैक करने वाले सभी सात एनालिस्ट इसे लेकर बुलिश (तेज़ी की उम्मीद रखने वाले) हैं।

गुरुवार को आदित्य इन्फोटेक के शेयर 4.71% बढ़कर ₹3,459.2 पर ट्रेड कर रहे हैं। इस साल अब तक स्टॉक में 125% की बढ़ोतरी हो चुकी है।

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पीवी सिंधु और आयुष शेट्टी जीते लेकिन यह स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी हुआ बाहर

इंदिरा गांधी स्टेडियम में बुधवार को बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 के तीसरे दिन, मेज़बान खिलाड़ियों के लिए मिले-जुले नतीजे रहे। पूर्व चैंपियन पीवी सिंधु और बड़े खिलाड़ियों को हराने वाले आयुष शेट्टी ने अपने दूसरे राउंड के प्रतिद्वंद्वियों को आसानी से हरा दिया।

नौवीं वरीयता प्राप्त सिंधु ने महिला सिंगल्स के दूसरे राउंड में कनाडा की झांग वेन यू को 21-16, 21-17 से हराया, जबकि आयुष ने श्रीलंका के डुमिंडु अबेविक्रमा को 21-8, 21-10 से हराने में सिर्फ़ 26 मिनट लिए और पुरुष सिंगल्स के प्री-क्वार्टर फ़ाइनल में जगह बनाई।

राउंड ऑफ़ 16 में, सिंधु का मुक़ाबला चीन की तीसरी वरीयता प्राप्त वांग ज़ी यी से होगा, जिन्होंने दिन की शुरुआत में मलेशिया की कारुओथेवन लेतशाना को 21-16, 21-9 से हराया था। आयुष का प्री-क्वार्टर फ़ाइनल मुक़ाबला इंडोनेशिया के 11वीं वरीयता प्राप्त अल्वी फरहान से होगा। 2023 के वर्ल्ड जूनियर चैंपियन ने फ़िनलैंड के जोआकिम ओल्डोर्फ़ के ख़िलाफ़ अपना दूसरे राउंड का मैच 21-12, 21-9 से आसानी से जीत लिया।

PV Sindhu

वर्ल्ड चैंपियनशिप में दो बार ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाले सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी भी बिना कोर्ट पर उतरे ही राउंड ऑफ़ 16 में पहुँच गए, क्योंकि अलेक्जेंडर डन की चोट के कारण उनके स्कॉटिश प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें वॉकओवर दे दिया।

जहाँ सिंधु और आयुष को अपने दूसरे राउंड के मुक़ाबलों में कोई परेशानी नहीं हुई, वहीं लक्ष्य और उन्नति को निराशा हाथ लगी। 14वीं सीड वाले लक्ष्य को अमेरिका के 18 साल के गैरेट टैन ने एक घंटे 13 मिनट तक चले कड़े मुकाबले में 19-21, 21-19, 21-17 से हराया। वहीं, उन्नति कनाडा की 13वीं सीड मिशेल ली के खिलाफ दो मैच पॉइंट का फायदा नहीं उठा सकीं और अपने वर्ल्ड चैंपियनशिप डेब्यू में 11-21, 21-9, 23-21 से हार गईं।

लक्ष्य ने टैन के खिलाफ पहला गेम तो जीत लिया, लेकिन अमेरिकी खिलाड़ी ने अपने ज़बरदस्त स्मैश से घरेलू खिलाड़ी को कड़ी टक्कर दी। लक्ष्य ने दूसरे गेम में वापसी करते हुए चार गेम पॉइंट बचाए, लेकिन मैच को निर्णायक गेम (डिसाइडर) में जाने से नहीं रोक सके। तीसरे और आखिरी गेम में भी लक्ष्य 4-11 से पीछे थे, लेकिन उन्होंने वापसी करते हुए स्कोर 16-17 तक पहुँचाया; हालाँकि, कुछ गलतियों और आक्रामक खेल दिखा रहे टैन ने उनकी वापसी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

इससे पहले, उन्नति उलटफेर करने के करीब पहुँच गई थीं क्योंकि उन्होंने ली के खिलाफ दो मैच पॉइंट हासिल कर लिए थे। लेकिन दोनों ही मौकों पर उनके शॉट साइड में बाहर चले गए और ली ने मौके का फायदा उठाते हुए ‘डाउन-द-लाइन’ स्मैश के साथ मैच जीत लिया।

अमेरिका गल्फ देशों से सैनिकों को कम कर सकता है:ईरान जंग के चलते फैसला, यहां 20 सैन्य ठिकानों पर 40 हजार सैनिक तैनात

ईरान के साथ युद्ध के बाद अमेरिका फारस की खाड़ी (गल्फ) में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने पर विचार कर रहा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन समीक्षा कर रहा है कि क्या अब गल्फ देशों में पहले जितने अमेरिकी सैनिक रखने की जरूरत है। इसकी बड़ी वजह युद्ध में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुआ भारी नुकसान है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान 200 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सुविधाएं क्षतिग्रस्त या तबाह हुई हैं। फिलहाल अमेरिका जॉर्डन से लेकर ओमान तक फैले करीब 20 सैन्य ठिकानों पर लगभग 40 हजार सैनिक तैनात रखता है। हालांकि, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। पेंटागन, ज्वाइंट स्टाफ और अमेरिकी सेंट्रल कमांड मिलकर यह आकलन कर रहे हैं कि युद्ध के बाद मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य तैनाती कैसी होनी चाहिए। गल्फ में अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य ठिकाने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है। वहीं कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और दूसरे गल्फ देशों में अमेरिका के बड़े सैन्य ठिकाने हैं। अमेरिका कई दशकों से इन सैन्य ठिकानों के जरिए मिडिल ईस्ट में अपने सैन्य अभियान चलाता रहा है और क्षेत्र के सहयोगी देशों की सुरक्षा में मदद करता रहा है। ईरानी हमलों के बाद बदली रणनीति ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने मिसाइल और ड्रोन हमलों की जद में आए। मार्च में कुवैत के एक सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध में 200 से ज्यादा अमेरिकी मिलिट्री फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा। इस दौरान कुल 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। ईरान के हमलों से बचाव के लिए अमेरिकी सेना को 1000 से ज्यादा एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ीं। इससे पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम के मिसाइल भंडार पर दबाव बढ़ गया। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि भविष्य में ऐसे हमलों का खतरा कम करने के लिए सैनिकों और सैन्य उपकरणों की तैनाती पर दोबारा विचार करना जरूरी है। सैनिकों को दूसरी जगह भेजने पर विचार पेंटागन में इस समय कई प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है। इनमें गल्फ देशों से कुछ सैनिकों और सैन्य उपकरणों को जॉर्डन, इजराइल या सऊदी अरब के रेड सी (लाल सागर) तट के करीब तैनात करने का सुझाव दिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि ये इलाके ईरान की सीधी मिसाइल और ड्रोन पहुंच से अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सैनिकों की तैनाती को लेकर ट्रम्प सरकार के भीतर भी अलग-अलग राय है। एक पक्ष चाहता है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल घरेलू सुरक्षा तथा चीन से मुकाबले पर करे। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि गल्फ देशों और इजराइल में मजबूत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना जरूरी है, ताकि क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव कायम रहे। इजराइल में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का भी प्रस्ताव एक प्रस्ताव में कुवैत समेत कुछ गल्फ देशों से सैनिकों और सैन्य उपकरणों को इजराइल के ओवदा एयरबेस भेजने की बात भी कही गई है। हालांकि, इस प्रस्ताव का प्रशासन के भीतर विरोध भी हो रहा है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि इजराइल में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने से संवेदनशील खुफिया जानकारी की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। गल्फ देशों पर भी पड़ेगा असर अगर अमेरिका गल्फ देशों से बड़ी संख्या में अपने सैनिक हटाता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर वहां के सिक्योरिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा। साथ ही, पूरे मिडिल ईस्ट के सुरक्षा समीकरण भी बदल सकते हैं। दशकों से सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत, बहरीन और दूसरे खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर निर्भर रहे हैं। सैनिकों की संख्या कम होने पर इन देशों को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है या नए सुरक्षा साझेदार तलाशने पड़ सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं होगा कि दोनों पक्षों के सुरक्षा संबंध खत्म हो जाएंगे। हथियारों की खरीद, खुफिया जानकारी साझा करने और सैन्य सहयोग जैसी व्यवस्थाएं पहले की तरह जारी रह सकती हैं। सितंबर तक 3.6 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान पेंटागन का अनुमान है कि सितंबर के अंत तक ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.6 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच सकता है। इस अनुमान में क्षतिग्रस्त सैन्य ठिकानों को दोबारा बनाने का खर्च शामिल नहीं है। इसलिए अमेरिका अब सिर्फ उनकी मरम्मत पर नहीं, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि सभी ठिकानों को पहले की जगह फिर से बनाया जाए या कुछ को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए। अमेरिका ने गल्फ देशों में सैन्य ठिकाने क्यों बनाए? 1. तेल और गैस की सप्लाई सुरक्षित रखने के लिए:
दुनिया के बड़े हिस्से को तेल और गैस फारस की खाड़ी से मिलती है। अमेरिका चाहता है कि इन समुद्री रास्तों में कोई बाधा न आए। 2. ईरान की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए:
1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। गल्फ में मौजूद सैन्य ठिकाने अमेरिका को ईरान की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करते हैं। 3. सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए:
सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर और बहरीन लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक साझेदार रहे हैं। अमेरिकी सैन्य ठिकाने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। 4. मिडिल ईस्ट में सैन्य अभियानों के लिए:
इराक, अफगानिस्तान और ISIS के खिलाफ अभियानों में अमेरिका ने इन्हीं सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया है। —————————– यह भी पढ़ें….. ट्रम्प का ईरान पर सबसे बड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान: बोले- जो देश मदद करेंगे, उन पर भी एक्शन लेंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

नेपाल में चीनी का रेट पहुंचा 120 रुपये किलो! समझिए दशैं-तिहार त्योहार से पहले नेपाली शुगर इंडस्ट्री क्यों दिख रही डंवाडोल

Price of sugar in Nepal: नेपाल के लोगों के लिए दशैं और तिहार जैसे बड़े हिंदू त्योहारों से पहले ही चीनी की मिठास जेब पर बहुत भारी पड़ने लगी है। नेपाल में चीनी की किल्लत रिपोर्ट की जा रही है। खुदरा बाजारों में जो चीनी अबतक 95-100 रुपये बिक रही थी, उसका रेट अब 120 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गया है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लोग अगर बढ़ी हुई कीमतें चुकाने को तैयार हैं तो भी दुकानों पर चीनी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही है। नेपाल के न्यूज पोर्टल ‘रातोपाटी’ की रिपोर्ट की मानें तो नेपाली सरकार इसे लेकर कोई ठोस कदम भी अबतक नहीं उठा पाई है।

आइए समझते हैं कि आखिर नेपाल में अचानक ये चीनी की क्राइसिस क्यों दिखने लगी है और क्या इसका भारत से भी कोई कनेक्शन है या नहीं?

तीन महीने में ही टूटा उद्योगपतियों का वादा, खाली हुए स्टॉक

‘रातोपाटी’ की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल की चीनी सप्लाई काफी हद तक पड़ोसी देश भारत पर निर्भर करती है। जब भारत ने बैशाख के अंतिम सप्ताह में चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था तब से ही नेपाली बाजार में चीनी की भारी किल्लत की आशंका पैदा हो गई थी। उस समय नेपाल शुगर इंडस्ट्री एसोसिएशन ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि देश के भीतर चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और घबराने की कोई बात नहीं है। एसोसिएशन ने यह भी कहा था कि फैक्ट्रियों के स्तर से चीनी की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी।

उद्योगपतियों के इस आश्वासन के बाद बाजार में फैला डर कुछ हद तक शांत हुआ। सरकार ने भी घरेलू उत्पादन पर भरोसा जताते हुए आयात के फैसलों को आगे बढ़ा दिया। यह वादा तीन महीने से ज्यादा नहीं टिका। अब स्थिति यह है कि जेठ के महीने में पर्याप्त स्टॉक का दावा करने वाले उद्योगपति ही अब अपने हाथ खड़े कर रहे हैं। उद्योग, वाणिज्य एवं आपूर्ति मंत्रालय के एक उच्च पदस्थ अधिकारी के मुताबिक बैठकों के दौरान उद्योगपति अब सीधे तौर पर कह रहे हैं कि उनके पास चीनी का स्टॉक समाप्त हो चुका है और अब उनके पास चीनी नहीं बची है।

आयात प्रक्रिया में देरी से पैदा हुआ डर

नेपाल के आयातकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों और देश के भीतर बढ़ती मांग के बीच तालमेल न बैठ पाने की वजह से ऐसा हो रहा है। अगर सरकार ने समय रहते चीनी आयात की अनुमति नहीं दी और कोटा प्रणाली को लेकर स्पष्ट नीतिगत फैसले नहीं किए तो त्योहारों के चरम पर बाजार में भारी किल्लत और कीमतों में प्रचंड उछाल देखने को मिल सकता है।

ग्लोबल मार्केट में फ्यूल की बढ़ती कीमतों और कमोडिटी मार्केट में आई अस्थिरता की वजह से चीनी के दाम भी डॉलर में लगातार बढ़ रहे हैं। इसका सीधा असर भारत और अन्य देशों से नेपाल आने वाली चीनी पर पड़ रहा है। व्यवसायियों ने सरकार पर आयात प्रक्रिया में ढिलाई बरतने का आरोप लगाया है। आयातकों का तर्क है कि जब भी बाजार में चीनी की कमी की अफवाहें या खबरें फैलती हैं तो उपभोक्ता और खुदरा व्यापारी जरूरत से ज्यादा चीनी खरीदकर जमा करने लगते हैं।

भारत से G2G के जरिए 10,000 क्विंटल चीनी मंगाने की तैयारी

बाजार में गहराते संकट और लगातार मिल रही शिकायतों के बीच फूड मैनेजमेंट एंड ट्रेडिंग कंपनी लिमिटेड त्योहारों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के साथ ‘G2G’ (सरकार से सरकार) माध्यम के जरिए 10000 क्विंटल चीनी आयात करने की अंतिम तैयारी में है।

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कंपनी के सूचना अधिकारी माधव मिश्रा के मुताबिक पहले चरण में 10,000 क्विंटल चीनी लाई जा रही है और यह प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। यह चीनी बहुत जल्द नेपालगंज सीमा पर पहुंच जाएगी। सरकारी स्तर पर यह व्यवस्था इसलिए की जा रही है ताकि त्योहारों के दौरान लोगों को चीनी की किल्लत का सामना न करना पड़े।

चीनी के दाम 65 रुपये किलो, 15 दिन में 15 रुपए बढ़े दाम; क्यों बढ़ रहे हैं कीमत?

चीनी के दाम 65 रुपये किलो, 15 दिन में 15 रुपए बढ़े दाम; क्यों बढ़ रहे हैं कीमत?

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खुदरा बाजार में चीनी पहली बार 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। कारोबारियों के अनुसार, पिछले 15 दिन में इसके दाम करीब 15 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं। देश में चीनी के बढ़ते दामों और त्योहारी सीजन को देखते हुए सरकार ने चीनी के स्टॉक पर शिकंजा कसा है। ALSO READ: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ईरान पर सबसे बड़ा आर्थिक हमला, इकोनॉमिक डी-डे घोषित

 

क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम?

चीनी का कम स्टॉक : चीनी का स्टॉक घट रहा है। मौजूदा सीजन के अंत में घरेलू चीनी स्टॉक काफी कम रहने की आशंका है। कम उत्पादन और पिछले सीजन में हुए निर्यात ने उपलब्धता पर दबाव बढ़ाया है।

 

गन्ने की फसल पर मौसम का असर : महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी और अनियमित मानसून से अगले सीजन के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है।

 

गन्ने से एथेनॉल उत्पादन : इस साल करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा गया। इससे बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हुई है। सरकार अब एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को सीमित करने पर विचार कर रही है।

 

त्योहारी सीजन की मांग : अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की खपत बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ रहा है। ALSO READ: वंदे मातरम् पर कांग्रेस का बड़ा फैसला, 1937 के प्रस्ताव पर कायम, पार्टी कार्यक्रमों में गाए जाएंगे सिर्फ पहले दो अंतरे

 

क्या और बढ़ेंगे दाम ?

दावा किया जा रहा है कि बाजार में मांग की तुलना में करीब आधी ही चीनी की आपूर्ति हो पा रही है। आने वाले दिनों में रक्षाबंधन, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी और दिवाली जैसे त्योहारों से मांग और बढ़ेगी। इससे चीनी के दाम में और तेजी आने की आशंका है।


सरकार ने कसा शिकंजा

भारत सरकार ने 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक चीनी इस्तेमाल करने वाले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा तय की है। सरकारी अधिसूचना के अनुसार ऐसे डीलर 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर तक लागू रहेगा। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती है। इस दौरान बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियां पहले से स्टॉक बढ़ाती हैं। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार सीमित मात्रा में ड्यूटी-फ्री चीनी आयात की अनुमति देने पर विचार कर रही है। करीब एक दशक बाद भारत में चीनी आयात का रास्ता खुल सकता है।

भारत दौरे पर आ सकते हैं चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग:12-13 सितंबर को दिल्ली में BRICS समिट; दोनों देशों में सीमा विवाद पर होगी बात

भारत में 12-13 सितंबर को 18वां BRICS सम्मेलन होने जा रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि है। वहीं, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां चल रही हैं। अगर जिनपिंग भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल बाद उनकी भारत यात्रा होगी। इससे पहले वे अक्टूबर 2019 में भारत आए थे। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, चीन की ओर से जिनपिंग के दौरे की अभी औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, दोनों देशों की एडवांस टीमों के दौरे और अन्य तैयारियों से उनके भारत आने की संभावना जताई जा रही है। जिनपिंग के दौरे से पहले भारत और चीन के बीच कई अहम मुद्दों पर बातचीत चल रही है। जिनपिंग से बातचीत में सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दा जिनपिंग के भारत दौरे की तैयारियों में LAC पर शांति और सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दों में है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं, जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर न पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले NSA अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा सकते हैं। वहां उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात हो सकती है। बातचीत में सीमा प्रबंधन, तनाव कम करने और स्थायी शांति के उपायों पर फोकस रहेगा। भारत-चीन रिश्तों में धीरे-धीरे कम हो रहा तनाव पिछले करीब दो साल में भारत और चीन के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं। व्यापार और जरूरी सामान की सप्लाई भी एजेंडे में भारत और चीन के बीच सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी बातचीत का हिस्सा हैं। भारत चीन के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। इसके अलावा रेयर अर्थ मैगनेट और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जैसे जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर भी भारत अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा व्यापार और वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने पर भी चर्चा चल रही है। 1 अगस्त से उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के शिपकी ला दर्रों से सीमा व्यापार शुरू हो चुका है। कैलाश मानसरोवर यात्रा भी बहाल है। पुतिन के साथ जिनपिंग भी आए तो अहम होगी मुलाकात BRICS सम्मेलन में पुतिन और जिनपिंग दोनों के आने से भारत के लिए यह कूटनीतिक रूप से अहम बैठक बन सकती है। सम्मेलन के दौरान मोदी-जिनपिंग की संभावित मुलाकात में LAC पर शांति, सीमा विवाद, व्यापार और दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य करने जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं। —————————– खबर अपडेट हो रही है…. ट्रम्प का ईरान पर सबसे बड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान:बोले- जो देश मदद करेंगे, उन पर भी एक्शन लेंगे; तेल तस्करी नेटवर्क निशाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने समझौते का मौका गंवा दिया, इसलिए अब उसे आर्थिक तौर पर अलग-थलग किया जाएगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Solar Panel Cost: अब सोलर पैनल लगवाना महंगा होगा! ICRA ने कहा- 20% तक बढ़ सकती है लागत

Solar Panel Cost: देश में बड़े सोलर प्रोजेक्ट लगाना आने वाले महीनों में महंगा पड़ सकता है। रेटिंग एजेंसी ICRA का कहना है कि अगले 6 से 8 महीनों में इनकी लागत करीब 20% तक बढ़ सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह चीन की जगह घरेलू सोलर सेल का इस्तेमाल है। वहीं पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से कॉपर और एल्यूमीनियम जैसी धातुएं भी महंगी हो गई हैं।

ICRA के मुताबिक, सरकार के नए नियमों के बाद डेवलपर्स को अब घरेलू सोलर सेल खरीदने पड़ रहे हैं। ये आयातित सेल के मुकाबले काफी महंगे हैं। इसका असर सीधे मॉड्यूल और पूरे प्रोजेक्ट की लागत पर पड़ रहा है।

घरेलू सोलर सेल क्यों बढ़ा रहे हैं खर्च?

ICRA का कहना है कि घरेलू सोलर सेल की कीमत आयातित सेल से 6-7 सेंट प्रति वॉट यानी करीब 5-6 रुपये प्रति वॉट ज्यादा है।

एजेंसी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट गिरीशकुमार कदम के मुताबिक, घरेलू सेल से बने मॉड्यूल की लैंडेड कॉस्ट करीब 22.5 सेंट प्रति वॉट (करीब 19 रुपये) है। वहीं आयातित सेल वाले मॉड्यूल की लागत करीब 16 सेंट प्रति वॉट (करीब 13.5 रुपये) पड़ती है। उनका कहना है कि अगले कुछ महीनों में दिखने वाली लागत बढ़ोतरी का सबसे बड़ा हिस्सा इसी बदलाव से आएगा।

सरकार के नए नियम का क्या असर है?

सरकार ने 1 जून 2026 से नया नियम लागू किया है। इसके तहत सोलर प्रोजेक्ट्स में अब सिर्फ ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) में शामिल कंपनियों के घरेलू सोलर सेल ही इस्तेमाल किए जाएंगे।

हालांकि कुछ ओपन एक्सेस और नेट मीटरिंग प्रोजेक्ट्स को 31 दिसंबर 2026 तक की राहत दी गई है।

पश्चिम एशिया का असर भी दिख रहा

ICRA का कहना है कि सिर्फ घरेलू सेल ही वजह नहीं हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इसकी वजह से कॉपर और एल्यूमीनियम की कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं। इससे प्रोजेक्ट की कुल लागत और बढ़ सकती है।

फिर भी सेक्टर पर भरोसा कायम

लागत बढ़ने के बावजूद ICRA ने रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर पर ‘Stable’ आउटलुक बरकरार रखा है।

एजेंसी का अनुमान है कि बड़े हाइड्रो समेत रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी भारत के बिजली उत्पादन में 2024-25 के 22% से बढ़कर 2029-30 तक 35% से ज्यादा हो सकती है। 30 जून 2026 तक देश में 150 गीगावॉट से ज्यादा रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स निर्माणाधीन थे।

चुनौतियां अभी भी बाकी हैं

ICRA का कहना है कि जमीन अधिग्रहण, ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, PPA और PSA साइन होने में देरी, महंगे उपकरण और सप्लाई चेन की दिक्कतें अब भी बनी हुई हैं। बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती है।

इसके बावजूद FY26 में रिन्यूएबल सेक्टर में 72 रेटिंग अपग्रेड और 21 डाउनग्रेड हुए। वहीं FY27 की पहली तिमाही में 4 अपग्रेड हुए और कोई डाउनग्रेड नहीं हुआ।

Kisan Vikas Patra: किसान विकास पत्र में पैसा डबल कितने समय में होगा?

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

मानसून का इस बार खेती पर कैसा असर! खरीफ फसलों की बुआई का गैप घटकर 2% पहुंचा पर धान दे रहा टेंशन, समझिए इसके मायने

देश में इस साल मानसूनी बारिश की शुरुआती सुस्ती के बाद अब खेती-किसानी के मोर्चे पर राहत भरी खबर सामने आ रही है। जून के महीने में बीते 12 सालों की सबसे कम बारिश (40 फीसदी घाटा) दर्ज की गई थी, लेकिन जुलाई में हुई सामान्य बारिश ने खरीफ फसलों की बुआई की रफ्तार को दोबारा पटरी पर ला दिया है। Bloomberg की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसूनी फसलों के रकबे में जून के मुकाबले बड़ा सुधार देखने को मिला है। अगर आने वाले दिनों में बारिश का यह सिलसिला यूं ही जारी रहता है तो इससे देश में खाद्यान्न की महंगाई को कंट्रोल करने में बड़ी मदद मिल सकती है।

बुआई का अंतर घटकर 2% पर आया, 101.7 मिलियन हेक्टेयर में हुई बुआई

कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक देशभर के किसानों ने 101.7 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 251 मिलियन एकड़) में मानसूनी फसलों की बुआई पूरी कर ली है। यह आंकड़ा पिछले साल की समान अवधि में हुई बुआई के मुकाबले महज 2 फीसदी कम है। जून के महीने में अल नीनो के असर की वजह से यह अंतर काफी ज्यादा था।

ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कृषि सचिव आतिश चंद्रा ने बताया कि जून के बाद से बुआई की गति में काफी सुधार देखने को मिला है। दलहन, तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुआई संतोषजनक दिख रही है। हालांकि कुछ फसलों का रकबा पिछले साल से थोड़ा कम है तो कुछ दूसरी फसलों के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी भी देखी गई है।

अगस्त और सितंबर की बारिश होगी बेहद अहम

भारत की कुल वार्षिक बारिश का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही मिलता है। यह मानसून न सिर्फ फसलों की सिंचाई के लिए बल्कि भूजल स्तर को रिचार्ज करने के लिए भी बहुत जरूरी है। जून से सितंबर तक चलने वाले इस सीजन में उगाई जाने वाली फसलें देश के कुल वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होती हैं।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 17 अगस्त तक देश में क्यूमेलेटिव बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम रही है। कृषि सचिव ने स्पष्ट किया कि फसलों की पैदावार और अंतिम उत्पादन के लिए अगस्त और सितंबर महीनों की बारिश बेहद निर्णायक साबित होगी। इसके लिए कृषि मंत्रालय लगातार राज्य सरकारों के साथ मिलकर स्थिति की निगरानी कर रहा है। आतिश चंद्रा ने कहा कि हम राज्यों से आग्रह कर रहे हैं कि वे किसानों को इस सीजन में उपलब्ध सभी भूमि पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित करें, भले ही बुआई में थोड़ी देरी ही क्यों न हो रही हो।

धान की बुआई पिछड़ी, लेकिन अभी भी उम्मीद बरकरार

खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख फसल यानी धान का रकबा अभी भी पिछले आंकड़ों से पीछे चल रहा है। ये चिंता का विषय बना हुआ है। वैसे कृषि सचिव का कहना है कि किसानों के पास अगस्त के अंत तक और कुछ राज्यों/क्षेत्रों में सितंबर के महीने तक भी धान की रोपाई करने का समय उपलब्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि अभी फसलों के अंतिम उत्पादन का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी क्योंकि राज्यों के साथ समय-समय पर समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं।

इसका सप्लाई और महंगाई पर क्या पड़ेगा असर?

अगर मानसूनी बारिश और फसलों की बुआई में यह रिकवरी नहीं होती तो देश में खाद्यान्न की सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। सप्लाई घटने से खाने के सामान की कीमतें बढ़तीं और महंगाई पर काबू पाने की सरकारी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता था। कृषि और खाद्य बाजार पर दबाव के संकेत पहले से ही दिखने लगे हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो भारत लगभग एक दशक में पहली बार चीनी के आयात शुल्क में कटौती करने पर विचार कर रहा है ताकि घरेलू स्तर पर कीमतों और आपूर्ति को संतुलित रखा जा सके।

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iQOO ने लॉन्च किया धांसू Neo 11 Ultra! 9,100mAh बैटरी और 100W चार्जिंग ने खींचा ध्यान, जानें कीमत और फीचर्स

iQOO Neo 11 Ultra: iQOO Neo 11 Ultra को मंगलवार को चीन में लॉन्च कर दिया गया है। Neo सीरीज का यह नया स्मार्टफोन तीन कलर ऑप्शन में उपलब्ध है। इसके अलावा, फोन में 9,100mAh की बड़ी बैटरी, ऑक्टा-कोर MediaTek Dimensity 9500M चिपसेट, डुअल रियर कैमरा सेटअप और IP68 और IP69 रेटिंग दी गई है। अब चलिए फोन के स्पेसिफिकेशन्स और कीमत के बारे में जानते हैं।

iQOO Neo 11 Ultra की कीमत

iQOO Neo 11 Ultra के बेस मॉडल (12GB RAM और 256GB स्टोरेज) की कीमत CNY 3,699 (लगभग 52,000 रुपये) है। जबकि 16GB + 256GB स्टोरेज वाले वेरिएंट की कीमत CNY 4,099 (लगभग 58,000 रुपये), 12GB + 512GB स्टोरेज वाले वेरिएंट की कीमत CNY 4,299 (लगभग 61,000 रुपये) और 16GB + 512GB RAM वाले वेरिएंट की कीमत CNY 4,699 (लगभग 66,000 रुपये) है।

iQOO Neo 11 Ultra फिलहाल चीन में Chi Guangbai, Riding the Wind और Shadow Black कलर में उपलब्ध है।

iQOO Neo 11 Ultra: स्पेसिफिकेशन्स

iQOO Neo 11 Ultra डुअल-सिम (नैनो) सपोर्ट करता है और Android 16 पर आधारित OriginOS 6 पर चलता है। फोन में 6.83 इंच का 2K AMOLED डिस्प्ले दिया गया है, जिसका रेजॉल्यूशन 1,440×3,200 पिक्सल, आस्पेक्ट रेशियो 20:9, रिफ्रेश रेट 144Hz  और स्क्रीन-टू-बॉडी रेशियो 94.88% है।

परफॉर्मेंस के लिए फोन में ऑक्टा-कोर MediaTek Dimensity 9500M प्रोसेसर दिया गया है, जिसे 3nm प्रोसेस पर बनाया गया है। इसमें एक कोर 4.21GHz तक, तीन कोर 3.5GHz तक और चार कोर 2.7GHz तक की स्पीड पर काम करते हैं। ग्राफिक्स के लिए ARM G1-Ultra GPU दिया गया है। फोन में 16GB तक LPDDR5X Ultra RAM और 512GB तक UFS 4.1 स्टोरेज मिलती है।

फोटोग्राफी के लिए iQOO Neo 11 Ultra में डुअल रियर कैमरा सेटअप है। इसमें OIS सपोर्ट के साथ 50MP का Sony LYT700V मेन कैमरा दिया गया है, जिसका अपर्चर f/1.88 है और यह 20x तक ऑप्टिकल जूम सपोर्ट करता है। इसके साथ 8MP का अल्ट्रा-वाइड एंगल कैमरा मिलता है, जिसका अपर्चर f/2.2 है। सेल्फी और वीडियो कॉल के लिए फोन में 16MP का फ्रंट कैमरा दिया गया है, जिसका अपर्चर f/2.45 है।

फोन को IP68 और IP69 रेटिंग मिली है, जिससे यह धूल और पानी से बचाव के मामले में काफी मजबूत बन जाता है।

iQOO Neo 11 Ultra के फीचर्स और बैटरी

iQOO Neo 11 Ultra में कई सेंसर दिए गए हैं। इनमें एक्सेलेरोमीटर, एम्बिएंट लाइट सेंसर, प्रॉक्सिमिटी सेंसर, फिजिकल जायरोस्कोप, इलेक्ट्रॉनिक कंपास, कलर-टेम्परेचर सेंसर, फ्लैशलाइट सेंसर और इंफ्रारेड रिमोट-कंट्रोल सेंसर शामिल हैं। फोन में X-axis लीनियर मोटर भी दी गई है।

बायोमेट्रिक सिक्योरिटी के लिए फोन में 3D फिंगरप्रिंट सेंसर मिलता है। इसके अलावा, यह Face Wake फेस रिकग्निशन को भी सपोर्ट करता है। कनेक्टिविटी के लिए इसमें Wi-Fi 7, Bluetooth 5.4, NFC और USB Type-C पोर्ट दिया गया है। फोन में OTG, GPS, BeiDou, GLONASS, Galileo, QZSS, NavIC और A-GPS का सपोर्ट भी मिलता है।

iQOO Neo 11 Ultra में 9,100mAh की बड़ी बैटरी दी गई है, जो 100W वायर्ड फास्ट चार्जिंग सपोर्ट करती है। इसमें OTG रिवर्स चार्जिंग का फीचर भी मिलता है। कंपनी का दावा है कि फोन सिंगल 4G SIM पर 36.5 दिनों तक स्टैंडबाय टाइम दे सकता है। वहीं, 4G VoLTE पर इससे 33.5 घंटे तक कॉलिंग की जा सकती है।

फोन का साइज करीब 163.42×75.88×8.60mm है और इसका वजन 225 ग्राम है।

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