Solar Panel Cost: अब सोलर पैनल लगवाना महंगा होगा! ICRA ने कहा- 20% तक बढ़ सकती है लागत

Solar Panel Cost: देश में बड़े सोलर प्रोजेक्ट लगाना आने वाले महीनों में महंगा पड़ सकता है। रेटिंग एजेंसी ICRA का कहना है कि अगले 6 से 8 महीनों में इनकी लागत करीब 20% तक बढ़ सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह चीन की जगह घरेलू सोलर सेल का इस्तेमाल है। वहीं पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से कॉपर और एल्यूमीनियम जैसी धातुएं भी महंगी हो गई हैं।

ICRA के मुताबिक, सरकार के नए नियमों के बाद डेवलपर्स को अब घरेलू सोलर सेल खरीदने पड़ रहे हैं। ये आयातित सेल के मुकाबले काफी महंगे हैं। इसका असर सीधे मॉड्यूल और पूरे प्रोजेक्ट की लागत पर पड़ रहा है।

घरेलू सोलर सेल क्यों बढ़ा रहे हैं खर्च?

ICRA का कहना है कि घरेलू सोलर सेल की कीमत आयातित सेल से 6-7 सेंट प्रति वॉट यानी करीब 5-6 रुपये प्रति वॉट ज्यादा है।

एजेंसी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट गिरीशकुमार कदम के मुताबिक, घरेलू सेल से बने मॉड्यूल की लैंडेड कॉस्ट करीब 22.5 सेंट प्रति वॉट (करीब 19 रुपये) है। वहीं आयातित सेल वाले मॉड्यूल की लागत करीब 16 सेंट प्रति वॉट (करीब 13.5 रुपये) पड़ती है। उनका कहना है कि अगले कुछ महीनों में दिखने वाली लागत बढ़ोतरी का सबसे बड़ा हिस्सा इसी बदलाव से आएगा।

सरकार के नए नियम का क्या असर है?

सरकार ने 1 जून 2026 से नया नियम लागू किया है। इसके तहत सोलर प्रोजेक्ट्स में अब सिर्फ ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) में शामिल कंपनियों के घरेलू सोलर सेल ही इस्तेमाल किए जाएंगे।

हालांकि कुछ ओपन एक्सेस और नेट मीटरिंग प्रोजेक्ट्स को 31 दिसंबर 2026 तक की राहत दी गई है।

पश्चिम एशिया का असर भी दिख रहा

ICRA का कहना है कि सिर्फ घरेलू सेल ही वजह नहीं हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इसकी वजह से कॉपर और एल्यूमीनियम की कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं। इससे प्रोजेक्ट की कुल लागत और बढ़ सकती है।

फिर भी सेक्टर पर भरोसा कायम

लागत बढ़ने के बावजूद ICRA ने रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर पर ‘Stable’ आउटलुक बरकरार रखा है।

एजेंसी का अनुमान है कि बड़े हाइड्रो समेत रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी भारत के बिजली उत्पादन में 2024-25 के 22% से बढ़कर 2029-30 तक 35% से ज्यादा हो सकती है। 30 जून 2026 तक देश में 150 गीगावॉट से ज्यादा रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स निर्माणाधीन थे।

चुनौतियां अभी भी बाकी हैं

ICRA का कहना है कि जमीन अधिग्रहण, ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, PPA और PSA साइन होने में देरी, महंगे उपकरण और सप्लाई चेन की दिक्कतें अब भी बनी हुई हैं। बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती है।

इसके बावजूद FY26 में रिन्यूएबल सेक्टर में 72 रेटिंग अपग्रेड और 21 डाउनग्रेड हुए। वहीं FY27 की पहली तिमाही में 4 अपग्रेड हुए और कोई डाउनग्रेड नहीं हुआ।

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Aluminium Prices: स्क्रैप सप्लाई बढ़ने से गिरेगी एल्युमिनियम की कीमतें, InCred का अनुमान $2,400–2,700 तक जा सकता है भाव

Aluminium Prices: ज्यादातर एनालिस्ट को उम्मीद है कि लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर एल्युमिनियम की कीमतें लगभग $3,200–3,300 प्रति टन रहेगी। लेकिन InCred रिसर्च सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर और हेड सतीश कुमार को उम्मीद है कि कीमतें गिरकर $2,400–2,700 प्रति टन पर आ जाएंगी।

CNBC TV18 से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि हाल की तेजी ज्यादातर प्राइमरी एल्युमिनियम मार्केट की वजह से आई है, लेकिन रीसायकल किए गए मेटल या स्क्रैप की बढ़ती उपलब्धता से कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि “कुल एल्युमिनियम सप्लाई में स्क्रैप का हिस्सा लगभग 32 से 33% होता है और इसलिए यह बहुत जरूरी भूमिका निभाता है।” “जब भी एल्युमिनियम की कीमतें बढ़ेंगी, तो आप देखेंगे कि 6 महीने बाद मार्केट में स्क्रैप की बाढ़ आ जाएगी, और यह असल में एक बैलेंस बनाने वाले फैक्टर का काम करता है।”

उन्हें उम्मीद है कि रिसाइकल किया गया एल्युमीनियम, नवीन फ्लोरीन का एक बड़ा हिस्सा पूरा करेगा, जिससे नई कैपेसिटी की जरूरत कम हो जाएगी। उन्होंने बताया कि चीन ने पहले ही अपनी प्राइमरी एल्युमीनियम कैपेसिटी 45 ​​मिलियन टन पर लिमिट कर दी है, जबकि वह घरेलू रीसाइक्लिंग और इंपोर्ट के जरिए स्क्रैप का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

उनका अनुमान है कि अकेले प्राइमरी एल्युमीनियम का मार्केट थोड़ा कमजोर रहेगा, जिसकी डिमांड लगभग 75 मिलियन टन सप्लाई से ज्यादा होगी। लेकिन एक बार रीसायकल किया गया स्क्रैप जुड़ने के बाद दुनिया भर में एल्युमीनियम की कुल डिमांड और सप्लाई बढ़कर लगभग 105–107 मिलियन टन हो जाती है, जिससे पूरा मार्केट मेटल की कमी के बजाय मोटे तौर पर बैलेंस्ड हो जाता है।

कुमार ने कहा, “प्राइमरी मेटल ठीक लग रहा है। मार्केट में कमी है, लेकिन अगर हम स्क्रैप को भी ध्यान में रखें तो मुझे यह एक बैलेंस्ड सिनेरियो जैसा लग रहा है।”

एल्युमीनियम की कीमतों में तेज करेक्शन से प्रोड्यूसर्स की कमाई पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कंपनियों की वैल्यूएशन अभी इस उम्मीद में की जा रही है कि एल्युमीनियम की कीमतें $3,500 प्रति टन के आसपास रहेंगी। अगर कीमतें उनके टारगेट के करीब आती हैं तो कमाई का अनुमान और वैल्यूएशन दबाव में आ सकते हैं, हालांकि उन्होंने अपनी ऑफिशियल कवरेज वाली कंपनियों पर कोई कमेंट नहीं किया।

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