अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को ‘अमेरिकी इलाका’ बताया है। ट्रम्प इससे पहले 18 अगस्त को भी कह चुके हैं कि अमेरिका जल्द होर्मुज को अपने इलाके के तौर पर घोषित कर सकता है। वहीं ईरान ने ट्रम्प के दावे को खारिज किया है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने कहा कि अमेरिका ने बातचीत, कूटनीति और अपने हस्ताक्षर तक के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि अब ईरान को अमेरिका के साथ अपने बातचीत के तरीके में बदलाव करना होगा। रेजाई ने कहा कि होर्मुज अभी बंद है और अमेरिका के अपना रवैया सुधारने तक नहीं खुलेगा। उन्होंने कहा कि इस बार अमेरिका को पहले अपनी जिम्मेदारियां और किए गए वादे पूरे करने होंगे। होर्मुज स्ट्रेट पर किसका अधिकार है? होर्मुज स्ट्रेट का उत्तरी हिस्सा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी हिस्सा ओमान के मुसंदम क्षेत्र से लगता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले जहाज इसी रास्ते से अरब सागर और फिर हिंद महासागर की ओर जाते हैं। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि कई देशों के लिए अहम समुद्री मार्ग है। अमेरिका यहां अपने युद्धपोत और नौसैनिक बल तैनात रखता है ताकि समुद्री व्यापार और अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। खाड़ी देशों से दुनिया को भेजे जाने वाले करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट से होती है। फरवरी में अमेरिका-ईरान जंग शुरू होने से पहले हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस रास्ते से होकर गुजरता था। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की एनर्जी सप्लाई काफी हद तक इसी रास्ते पर निर्भर है। रेजाई बोले- ट्रम्प के हमले से परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ सकती है रेजाई ने कहा कि ट्रम्प के ईरान पर हमले से दुनिया में परमाणु हथियारों को लेकर डर और बढ़ गया है। उनका कहना है कि अब दूसरे देशों को भी लग सकता है कि बिना परमाणु हथियार के वे सुरक्षित नहीं हैं। रेजाई ने कहा कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य है और अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक अपने परमाणु कार्यक्रम की जांच भी कराता रहा है। इसके बावजूद अमेरिका ने उस पर हमला किया। उन्होंने कहा कि इससे दुनिया के दूसरे देशों में परमाणु हथियार हासिल करने की इच्छा बढ़ सकती है। रेजाई के मुताबिक, अमेरिका की कार्रवाई ने परमाणु सुरक्षा मजबूत करने के बजाय उल्टा खतरा बढ़ा दिया है। ईरानी राष्ट्रपति बोले- युद्ध नहीं बातचीत से समाधान चाहते हैं ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा कि ईरान युद्ध नहीं चाहता। वह बातचीत के जरिए समस्या का हल निकालना चाहता है। पजशकियान ने कहा कि ईरान किसी के दबाव में नहीं आएगा, लेकिन ताकत और समझदारी से बातचीत कर समाधान निकाला जा सकता है। अमेरिका और इजराइल के साथ तनाव के बीच हुए समझौते में ईरान ने एक भी शर्त नहीं छोड़ी है। उनके मुताबिक, ईरान की सुरक्षा परिषद में सभी पक्षों ने इस समझौते को सही रास्ता माना था। ——————————- होर्मुज से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- होर्मुज पर जल्द अमेरिका का फुल कंट्रोल होगा:ईरान की नेवी और एयरफोर्स खत्म, उसके पास सिर्फ कुछ मिसाइल और ड्रोन बचे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिका जल्द ही होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह कंट्रोल कर लेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों में ईरान की नेवी, एयरफोर्स और मिलिट्री लीडरशिप को बहुत नुकसान हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
ओडिशा के पारादीप तट से करीब 240 समुद्री मील दूर बंगाल की खाड़ी में शनिवार को MV Ocean Winner नाम का एक मालवाहक जहाज डूब गया। पनामा के झंडे वाले इस जहाज पर 24 क्रू सदस्य सवार थे। पीटीआई के मुताबिक, इनमें ज्यादातर चीनी नागरिक थे। जहाज ओडिशा से लौह अयस्क लेकर सिंगापुर जा रहा था। यह शुक्रवार को ओडिशा तट से रवाना हुआ था। जहाज के डूबने की वजह अभी पता नहीं चल पाई है। इंडियन कोस्ट गार्ड और नेवी का रेस्क्यू ऑपरेशन हादसे की जानकारी मिलते ही इंडियन कोस्ट गार्ड और इंडियन नेवी ने क्रू सदस्यों की तलाश और बचाव अभियान शुरू कर दिया। आसपास मौजूद दूसरे जहाजों को भी अलर्ट किया गया है और रेस्क्यू में मदद करने को कहा गया है। हादसे के समय बंगाल की खाड़ी में मौसम भी पूरी तरह सामान्य नहीं था। मौसम विभाग ने उत्तर बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना जताई थी। इससे समुद्र में मौसम खराब हो सकता है। हालांकि, जहाज इसी वजह से डूबा, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… 21 भारतीयों वाले जहाज पर ईरानी हमले का VIDEO: होर्मुज में IRGC बोट्स ने फायरिंग की होर्मुज स्ट्रेट में 21 भारतीय नाविकों वाले एक कंटेनर जहाज पर ईरानी नौकाओं ने फायरिंग की थी। यह घटना 22 अप्रैल को हुई थी। भारतीय नाविकों के संगठन (FSUI) ने अब इस घटना का वीडियो जारी किया है। पूरी खबर पढ़ें…

भारतीय बैडमिंटन फ़ैन्स का दिल जीतने वाले एक ऐतिहासिक सफ़र में, बिना सीडिंग वाली ट्रीसा जॉली और गायत्री गोपीचंद की जोड़ी ने 2026 बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल के साथ अपना शानदार सफ़र खत्म किया। शनिवार को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एरिना में खेले गए सेमीफ़ाइनल में उन्हें चीन की वर्ल्ड नंबर 1 और टॉप सीडेड जोड़ी लियू शेंग शू और टैन निंग से हार का सामना करना पड़ा।
भारतीय जोड़ी ने ज़बरदस्त टक्कर दी और पहला गेम 21-18 से जीता, लेकिन चीन की टॉप सीडेड जोड़ी ने वापसी करते हुए अगले दो गेम 21-13, 21-8 से जीत लिए। हार के बावजूद, ट्रीसा और गायत्री ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में महिला डबल्स मेडल के लिए भारत के 15 साल के इंतज़ार को खत्म किया; इससे पहले 2011 में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था।
HISTORY at HOME
Treesa/Gayatri bags bronze in the women's doubles category for India after a wait of long years.
India continues to maintain its streak at home soil #SmashForIndia #bwfworldchampionships #newdelhi2026 #delhishormacha pic.twitter.com/2V8AhiOjEe
— BAI Media (@BAI_Media) August 22, 2026
इस ऐतिहासिक सफ़र की शुरुआत क्वार्टरफ़ाइनल में एक शानदार जीत के साथ हुई, जहाँ भारतीय जोड़ी ने चीन की चौथी सीडेड जोड़ी जिया यी फ़ान और झांग शू शियान को तीन गेम के रोमांचक मुक़ाबले में हराकर मेडल पक्का किया। भारतीय जोड़ी पहला गेम 16-21 से हार गई थी, लेकिन फिर ज़बरदस्त वापसी करते हुए दूसरा गेम 21-15 से जीता। उन्होंने इसी लय को निर्णायक गेम में भी बनाए रखा और 21-13 की शानदार जीत के साथ मैच अपने नाम किया।
भारतीय जोड़ी ने अपने सफ़र की शुरुआत राउंड ऑफ़ 64 में स्पेन की पाउला लोपेज़ और लूसिया रोड्रिग्ज़ पर 21-9, 21-13 से शानदार जीत के साथ की थी। इसके बाद उन्होंने राउंड ऑफ़ 32 में अमेरिका की 16वीं सीड वाली जोड़ी लॉरेन लैम और एलिसन ली को 21-15, 21-12 से हराकर शानदार जीत हासिल की। राउंड ऑफ़ 16 में, उन्होंने जापान की सातवीं सीड वाली जोड़ी रिन इवानागा और की नाकानिशी को 21-16, 21-12 से हराकर चौंका दिया और 2015 के बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप के क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला डबल्स जोड़ी बन गईं।
इससे पहले शुक्रवार को भारत की मेडल संख्या और बढ़ सकती थी, लेकिन सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की पुरुष डबल्स जोड़ी भी चीन की तीसरी सीड वाली जोड़ी लियांग वेइकेन्ग और वांग चांग के ख़िलाफ़ क्वार्टर फ़ाइनल मुक़ाबला हार गई, जिससे उनका सफ़र बिना किसी मेडल के ख़त्म हो गया। इस हार का मतलब था कि इस साल की वर्ल्ड चैंपियनशिप में डबल्स इवेंट्स से भारत के लिए सिर्फ़ ट्रीसा और गायत्री का ब्रॉन्ज़ मेडल ही हासिल हुआ, जबकि सिंगल्स स्टार पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, उन्नति हुड्डा और आयुष शेट्टी भी टूर्नामेंट में पहले ही बाहर हो चुके थे।

Ayodhya Rakhi Mata Shanta: अयोध्या में भगवान श्रीराम की बड़ी बहन माता शांता की ओर से श्रृंगी ऋषि सेवा संस्थान के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित देश के कई विशिष्ट दिग्गजों को विशेष राखियां भेजी गई हैं। इन राखियों को केले के तने, रेशमी धागे और भागलपुर की कला का उपयोग करके तैयार किया गया है।
राखी की मुख्य विशेषताएं
- विशिष्ट जनों को प्रेषित : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथसिंह, यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और सीएम योगी आदित्यनाथ को यह रक्षा सूत्र भेजा गया है।
- वैदिक मंत्रोच्चार: साकेत भवन के महंत सीताराम दास ने इन सभी राखियों को वैदिक मंत्रों के साथ अभिमंत्रित किया है।
- खास सामग्री : इस बार की राखियां मुख्य रूप से केले के तने के धागे, रेशम, मखाने और भागलपुरी पेंटिंग की कला का उपयोग करके बनाई गई हैं, जिन्हें मधुबनी की अंजलि सिंह के सहयोग से तैयार किया गया है।
- भगवान राम को अर्पण : देश के प्रमुख नेताओं और गणमान्य लोगों तक रक्षा सूत्र पहुंचाने के बाद, माता शांता की ओर से भेजी गई यह पावन राखी अयोध्या में भगवान श्रीरामलला को भी अर्पित की गईं।
क्या है धार्मिक मान्यता?
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता शांता राजा दशरथ की पुत्री और भगवान श्रीराम की बड़ी बहन थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ था। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का निर्वाह करते हुए हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर माता शांता के धाम/आश्रम की तरफ से यह रक्षा सूत्र भेजने की परंपरा निभाई जाती है।
श्रृंगी ऋषि सेवा संस्थान के अध्यक्ष सुभाष सिंह ने बताया कि साकेत भवन के महंत सीताराम दास ने पूर्ण विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ इन विशेष राखियों को अभिमंत्रित किया है। प्राचीन परंपरा और भ्रातृ-स्नेह को जीवंत रखने के लिए संस्थान हर वर्ष यह रक्षा सूत्र भेजता है।

CM Yogi Adityanath: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को आश्वस्त किया कि राज्य में चीनी की कोई कमी नहीं है, इसलिए आम नागरिक कतई परेशान न हों। प्रदेश की चीनी मिलों में वर्तमान में 179.38 लाख क्विंटल चीनी का भंडार उपलब्ध है। चीनी मिलों ने दो महीने (जून-जुलाई) में 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है। सीएम योगी ने निर्देश दिया कि आवश्यकता पड़ने पर चीनी मिलें 15 अक्टूबर से संचालित की जाएं।
15 अक्टूबर से संचालित की जाए चीनी मिलें
मुख्यमंत्री ने समीक्षा बैठक में कहा कि सहकारी चीनी मिलों में 23.60 लाख क्विंटल, निगम की चीनी मिलों में 5.28 लाख क्विंटल और निजी चीनी मिलों में 150.50 लाख क्विंटल (कुल 179.38 लाख क्विंटल) चीनी प्रदेश में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त जून व जुलाई में चीनी मिलों ने 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है, इसमें से अधिकांश चीनी अभी भी खुले बाजार में उपलब्ध है। आवश्यकता पड़ने पर 15 अक्टूबर से चीनी मिलों को संचालित किया जाए।
भ्रम फैलाने व कालाबाजारी करने वालों पर करें कार्रवाई
सीएम योगी ने आमजन से अपील की कि चीनी की कमी बताकर भ्रम फैलाने वालों से सावधान रहें। मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि चीनी की कालाबाजारी और भ्रम फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। उन्होंने भारत सरकार के निर्देश के क्रम में कहा कि कोई भी डीलर 30 दिन से अधिक चीनी स्टॉक का भंडारण नहीं करेगा और वे एक समय में 400 टन से ज्यादा स्टॉक भी नहीं रख सकते। बल्क कंज्यूमर्स (10 मीट्रिक टन प्रतिमाह खपत) भी 15 दिन से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकते। चीनी मिलें भी अपने मासिक कोटे के अंतर्गत विक्रित चीनी को विक्रय की तिथि से 7 दिन से अधिक अवधि तक गोदाम में नहीं रोकेंगी।
सीएम ने दिया निर्देश- भौतिक सत्यापन कराएं जिलाधिकारी
मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि जनपद की समस्त पंजीकृत चीनी मिलों, थोक एवं फुटकर विक्रेताओं के गोदामों का भौतिक सत्यापन कराते हुए उपलब्ध स्टॉक की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट प्राप्त करें। निर्धारित सीमा से अधिक स्टॉक धारित करने अथवा जमाखोरी पर कठोर कार्रवाई की जाए। जनपद में चीनी की उपलब्धता एवं मूल्य पर सतत निगरानी रखते हुए किसी भी प्रकार की कृत्रिम कमी अथवा मूल्यवृद्धि की स्थिति में तत्काल शासन को अवगत कराएं।
48 लाख किसानों को किया गया 32,554 करोड़ का भुगतान
बैठक में मुख्यमंत्री जी को अवगत कराया गया कि पेराई सत्र 2026-27 के लिए 28.14 लाख हेक्टेयर गन्ना क्षेत्रफल संभावित है। इससे 90 लाख टन चीनी उत्पादन की संभावना है। उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह अनुमानित चीनी खपत लगभग 4 लाख टन है। पेराई सत्र 2025-26 में 48 लाख किसानों को 32,554 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी किया गया है।
UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे हैं। वहीं दूसरे पायदान पर कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन हैं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को तरजीह मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी UN महासचिव पद के दावेदार रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें UN महासचिव पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। थरूर 1978 से UN में काम कर रहे थे। भारत ने उनके लंबे UN अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ को उनकी ताकत बताया। साथ ही, भारत ने कहा कि अब अगला महासचिव एशिया से होना चाहिए। भारत ने दुनियाभर में थरूर के लिए समर्थन जुटाया। मनमोहन सिंह ने कई देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने खुद भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात की। हालांकि, वे महासचिव नहीं बन सके। अनौपचारिक वोटिंग में थरूर दूसरे नंबर पर रहे, जबकि दक्षिण कोरिया के बान की-मून लगातार सबसे आगे रहे। —————— यह खबर भी पढ़ें… संयुक्त राष्ट्र में इजराइली राजदूत ने UN अफसर को फटकारा:यौन हिंसा से जुड़ी रिपोर्ट में इजराइल का नाम आने से नाराज थे संयुक्त राष्ट्र (UN) में शुक्रवार को एक बैठक के दौरान इजराइल के राजदूत डैनी डैनन और UN महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन के बीच तीखी बहस हो गई। पूरी खबर पढ़ें…
UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। वहीं कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन दूसरे नंबर पर रहीं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगले महासचिव को चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी वोटिंग की प्रक्रिया अनौपचारिक वोटिंग में UNSC के 15 सदस्य हर उम्मीदवार के लिए अपनी राय देते हैं। इसमें तीन विकल्प होते हैं: 1. समर्थन
2. विरोध
3. कोई राय नहीं इसका मतलब यह है कि हर देश को उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में ही वोट देना जरूरी नहीं है। वह ‘कोई राय नहीं’ भी चुन सकता है। जैसे 30 जुलाई की पहली अनौपचारिक वोटिंग में रेबेका ग्रिन्सपैन को सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। उन्हें 10 देशों का समर्थन, 1 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी थी। 21 अगस्त की अनौपचारिक वोटिंग में कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। उन्हें 8 देशों का समर्थन, 3 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी। हालांकि इन वोटिंग के ये आंकड़े अंतिम चुनाव के नतीजे नहीं होते। इनका मकसद सिर्फ यह पता लगाना होता है कि कौन उम्मीदवार सबसे मजबूत स्थिति में है और किसके नाम पर UNSC में सहमति बन सकती है। विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को प्रायोरिटी मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ में शामिल रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें भारत की ओर से उम्मीदवार बनाया था। उस समय थरूर का सबसे बड़ा मजबूत पक्ष उनका लंबा संयुक्त राष्ट्र अनुभव था। वे 1978 से संयुक्त राष्ट्र में काम कर रहे थे। भारत ने उनकी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और संयुक्त राष्ट्र में लंबे अनुभव को देखते हुए उनकी उम्मीदवारी रखी थी। भारत का यह भी तर्क था कि अब महासचिव का पद एशिया को मिलना चाहिए। थरूर के समर्थन में भारत ने कई देशों से संपर्क किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दूसरे देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात कर समर्थन जुटाया। अमेरिका के विरोध की वजह से हारे थरूर 2006 में हुई अनौपचारिक वोटिंग के हर दौर में थरूर दक्षिण कोरिया के बान की-मून के बाद दूसरे नंबर पर रहे। पहली वोटिंग में बान की-मून को 12 और थरूर को 10 वोट मिले थे। थरूर के मुताबिक, इन 10 वोटों में चीन का वोट भी शामिल था। बाद की वोटिंग में चीन ने उनके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल नहीं किया। आखिरी वोटिंग में थरूर को 10 देशों का समर्थन मिला, जबकि 3 देशों ने उनके खिलाफ वोट दिया। इनमें अमेरिका भी शामिल था। अमेरिका UNSC के पांच स्थायी सदस्यों में से एक है और उसके पास वीटो पावर है। आखिरकार बान की-मून महासचिव चुने गए। थरूर ने बाद में लिखा कि उनकी उम्मीदवारी को रोकने में अमेरिका की भूमिका थी। उनके मुताबिक, अमेरिका बान की-मून के समर्थन में था और उसने दूसरे सुरक्षा परिषद सदस्यों के बीच भी उनके पक्ष में समर्थन जुटाया। थरूर के अनुसार, अमेरिका के रुख के पीछे दक्षिण कोरिया के साथ उसके रिश्ते और उस समय कोफी अन्नान के साथ अमेरिकी रिश्तों में आई खटास जैसे कारण भी थे। —————— यह खबर भी पढ़ें… UN में चीफ गुटेरेस की जगह किसे मिलेगी:आज दूसरे दौर की वोटिंग, रेस में 8 दावेदार, कोस्टा रिका की ग्रिन्सपैन सबसे आगे संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। पूरी खबर पढ़ें…
लुधियाना में तिब्बती युवाओं ने चीन की कम्युनिस्ट सरकार और उसकी विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ आज शांतिपूर्ण रोष मार्च निकाला। तिब्बती युवा कांग्रेस के नेतृत्व में डिवीजन नंबर 3 से सुंदर नगर तक निकाले गए मार्च में 500 से अधिक तिब्बती नागरिकों ने हिस्सा लिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने चीन की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने चीन की तिब्बत नीति के विरोध में भी नारेबाजी की। “तिब्बत एक राष्ट्र था, तिब्बत एक राष्ट्र है और जल्द ही तिब्बत आजाद होगा” जैसे नारे लगाए गए। मार्च को लुधियाना के स्थानीय होजरी व्यापारियों का भी समर्थन मिला। यह प्रदर्शन तिब्बती युवा कांग्रेस की ओर से शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय चेन प्रोटेस्ट का हिस्सा है। संगठन के अनुसार, यह आंदोलन शहीद लोबगा रांगजेन के बलिदान की याद में किया जा रहा है। संगठन का दावा है कि उन्होंने तिब्बत की स्थिति और तिब्बती लोगों के संघर्ष की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने आत्मदाह किया था। कैंडल मार्च और रैलियां आयोजित तिब्बती युवा कांग्रेस ने कहा कि धर्मशाला से शुरू हुई यह मुहिम अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी है। इसके तहत भूख हड़ताल, कैंडल मार्च और रैलियां आयोजित की जा रही हैं। संगठन का कहना है कि चीन के खिलाफ ठोस कार्रवाई होने तक यह अभियान जारी रखा जाएगा। एथनिक यूनिटी लॉ का विरोध, UN प्रवक्ता के बयान पर भी निशाना प्रदर्शनकारियों ने 1 जुलाई को चीन की ओर से लागू किए गए कथित एथनिक यूनिटी लॉ (Ethnic Unity Law) का विरोध किया। तिब्बती युवा कांग्रेस का आरोप है कि इस कानून के जरिए तिब्बत समेत अन्य क्षेत्रों की अलग सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। संगठन ने चीन पर कॉलोनियल बोर्डिंग स्कूलों के जरिए बच्चों को उनके समुदायों से अलग करने और उनकी पहचान पर प्रभाव डालने का भी आरोप लगाया। तिब्बती युवा कांग्रेस ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक के उस कथित बयान की भी आलोचना की, जिसमें तिब्बत को चीन की अल्पसंख्यक आबादी का हिस्सा बताया गया था। संगठन ने इसे ऐतिहासिक रूप से गलत बताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जिसे वह चीन के कब्जे को वैध ठहराने वाला मानता है।
संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 मेंबर सीक्रेट वोटिंग के जरिए इन उम्मीदवारों के समर्थन का अंदाजा लगा रहे हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। आज शुक्रवार को दूसरे दौर का अनौपचारिक मतदान होगा। इसके बाद भी कई अनौपचारिक पोल हो सकते हैं, जिनमें धीरे-धीरे उम्मीदवारों की संख्या कम होगी। अक्टूबर में औपचारिक चुनाव हो सकते हैं। UN चीफ कैसे चुना जाता है? संयुक्त राष्ट्र का महासचिव सीधे जनता या सभी देशों के वोट से नहीं चुना जाता। पहले सुरक्षा परिषद उम्मीदवारों पर विचार करती है और गुप्त मतदान के जरिए यह पता लगाती है कि किस उम्मीदवार को कितना समर्थन मिल रहा है। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ने के लिए कम से कम 9 वोट मिलने जरूरी हैं। लेकिन 9 वोट हासिल करना ही काफी नहीं है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस में से किसी एक का वीटो भी उम्मीदवार के खिलाफ नहीं होना चाहिए। इसके बाद सुरक्षा परिषद जिस उम्मीदवार पर सहमत होती है, उसका नाम संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजा जाता है। महासभा की मंजूरी के बाद वह संयुक्त राष्ट्र का नया महासचिव बनता है। गुटेरेस का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए उससे पहले नए महासचिव के चयन की प्रक्रिया पूरी करने की तैयारी है। इस रेस में शामिल 8 उम्मीदवारों का बैकग्राउंड अलग-अलग है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति, वरिष्ठ राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के बड़े पदों पर काम कर चुके लोग शामिल हैं। जानते हैं कौन-कौन इस दौड़ में है और किसकी क्या दावेदारी है। 1. रेबेका ग्रिन्सपैन- कोस्टा रिका 70 साल की रेबेका ग्रिन्सपैन फिलहाल इस रेस में सबसे आगे चल रही हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में उन्हें सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। ग्रिन्सपैन कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति हैं और संयुक्त राष्ट्र के व्यापार एवं विकास संगठन की प्रमुख हैं। उन्होंने महासचिव पद के लिए प्रचार करने के लिए अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों से छुट्टी ली है। अगर ग्रिन्सपैन चुनी जाती हैं तो वह संयुक्त राष्ट्र की पहली महिला और पहली यहूदी महासचिव होंगी। उनके माता-पिता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप से भागे यहूदी शरणार्थी थे। विवाद: UNDP में काम करने के दौरान महंगे निजी विमान के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे थे। दुबई से ले जाने के लिए UN का चार्टर्ड विमान इस्तेमाल किया, जिसका खर्च करीब 40 हजार डॉलर था। 2. मिशेल बाचेलेट- चिली 74 साल की मिशेल बाचेलेट चिली की समाजवादी नेता हैं। वह 2006 में चिली की पहली महिला राष्ट्रपति बनी थीं। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के रूप में काम किया। मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए बाचेलेट ने चीन के शिनजियांग में उइगर मुसलमानों की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की थी। इसे लेकर चीन ने उनकी आलोचना की थी। बाचेलेट को मेक्सिको और ब्राजील का समर्थन मिला है। हालांकि, दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जोस एंतोनियो कास्ट के सत्ता में आने के बाद चिली ने उनका समर्थन वापस ले लिया। अमेरिका भी उनके गर्भपात के अधिकारों से जुड़े रुख को लेकर उनकी आलोचना करता रहा है। विवाद: बाचेलेट ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए भारत के कश्मीर और नागरिकता से जुड़े मामलों पर सवाल उठाए थे। 2019 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में संचार पर रोक और नेताओं की हिरासत पर चिंता जताई थी। भारत ने उनके बयान को गलत और अनुचित बताते हुए खारिज कर दिया था। 3. मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा- इक्वाडोर 61 साल की मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। एस्पिनोसा का कहना है कि दुनिया की साझा समस्याओं से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सबसे अहम वैश्विक मंच है। हालांकि, वह संगठन में बड़े सुधार की भी वकालत करती हैं। उनकी उम्मीदवारी को एंटीगुआ और बारबुडा का समर्थन मिला है, लेकिन उनके अपने देश इक्वाडोर ने उनका समर्थन नहीं किया है। विवाद: एस्पिनोसा के राजनीतिक करियर में विवाद भी रहे हैं। 2019 में इक्वाडोर की संसद में उन्हें पद से हटाने की कोशिश हुई थी। उन पर विदेश मंत्री रहते हुए जूलियन असांजे को नागरिकता देने और कोलंबिया सीमा पर सुरक्षा संकट से ठीक से न निपटने के आरोप लगे थे। हालांकि, उन्हें हटाने के लिए जरूरी वोट नहीं मिले और वह पद पर बनी रहीं। 4. राफेल मारियानो ग्रॉसी- अर्जेंटीना 65 साल के राफेल मारियानो ग्रॉसी अर्जेंटीना के करियर राजनयिक हैं। वह 2019 से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के (IAEA) प्रमुख हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूक्रेन के जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र को लेकर ग्रॉसी पिछले कुछ सालों से चर्चा में रहे हैं। महासचिव पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्होंने IAEA चीफ का पद नहीं छोड़ा है। उनका कहना है कि पद छोड़ना अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा। ग्रॉसी चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया में होने वाले बड़े संकटों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए और संगठन में जरूरी बदलाव किए जाएं। विवाद: ईरान इन पर पक्षपात करने का आरोप लगाता रहा है। 2025 में IAEA की रिपोर्ट के बाद ईरान ने कहा था कि इससे उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला। ग्रॉसी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि रिपोर्ट जांच के आधार पर तैयार की गई थी। 5. कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट- गुयाना 52 साल की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट गुयाना की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह गुयाना के आदिवासी समुदाय से आती हैं और सिर्फ 27 साल की उम्र में मंत्री बनी थीं फिलहाल वह संयुक्त राष्ट्र में अपने देश की राजदूत हैं। उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया में अपनी विश्वसनीयता फिर से स्थापित करने की जरूरत है। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं 6. इवोन ए-बाकी- इक्वाडोर 75 साल की इवोन ए-बाकी इक्वाडोर की राजनयिक और नेता हैं। वह अमेरिका में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। इस दौरान उनके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे संबंध रहे। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव टोंगा ने रखा है। खाड़ी देशों से भी उनके अच्छे रिश्ते हैं। वह कतर में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। विवाद: डोनाल्ड ट्रम्प से पुरानी दोस्ती है। 2004 में इक्वाडोर में मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता कराने में भी उनकी भूमिका थी, तब ट्रम्प इस प्रतियोगिता के मालिक थे। विरोधी आरोप लगाते हैं कि ट्रम्प से उनके निजी संबंधों का इस्तेमाल इक्वाडोर-अमेरिका संबंधों में कितना किया जा रहा है। 7. मैकी साल- सेनेगल 64 वर्षीय मैकी साल सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति हैं। वह अफ्रीकी संघ के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं। मैकी अपने अभियान में शांति और विकास को सबसे जरूरी मुद्दा बता रहे हैं। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव बुरुंडी ने रखा था और जुलाई में सेनेगल ने भी उनका समर्थन कर दिया। विवाद: राष्ट्रपति रहते हुए 2021 से 2024 के बीच सेनेगल में कई हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों को संभालने के उनके तरीके पर सवाल उठे थे। इस दौरान कई लोगों की मौत हुई थी। 8. ओलारा ओटुन्नु- युगांडा 75 साल के ओलारा ओटुन्नु संयुक्त राष्ट्र में युगांडा के राजदूत भी रह चुके हैं। वह कुछ समय के लिए अपने देश के विदेश मंत्री भी रहे। 2011 में उन्होंने युगांडा पीपुल्स कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था। हालांकि, वह लंबे समय से सत्ता में मौजूद राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी से चुनाव हार गए। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं पहले दौर की वोटिंग में ग्रिन्सपैन को 10 वोट पहले दौर की अनौपचारिक वोटिंग यानी पहला स्ट्रॉ पोल 30 जुलाई 2026 को हुआ था। इसमें कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। तब रेस में 7 उम्मीदवार थे। इवोन ए-बाकी इस वोटिंग में शामिल नहीं थीं। वह 18 अगस्त को आठवीं उम्मीदवार बनीं।
MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।
नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।
इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।
यह राज्यों का विषय है
सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।
विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।
पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।
किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?
2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।
किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?
पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।
विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?
विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।
सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:
- निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
- कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
- सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
- विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
- राज्य की राजधानी में आवास
- विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
- टेलीफोन और संचार भत्ता
- वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
- कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
- विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
- हरियाणा में आवास और कार सुविधा
- कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।
हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।
इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।
ओडिशा का विधायक विकास कोष
एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।
ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।
हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।
विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?
इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:
- आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
- उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
- अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
- कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।
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