Redmi Note 17 सीरीज की ग्लोबल लॉन्च डेट कन्फर्म, 10,000mAh बैटरी समेत इन फीचर्स का हुआ खुलासा

Xiaomi के सब-ब्रांड Redmi ने ऐलान किया है कि Redmi Note 17 सीरीज जल्द ही ग्लोबल मार्केट में दस्तक देने वाली है। कंपनी ने सोमवार को इसकी लॉन्च डेट की जानकारी दी। बता दें कि इस सीरीज के फोन जुलाई में चीन में लॉन्च किए गए थे, और ब्रांड ने Redmi Note 17 के 5G और 4G वेरिएंट भी ग्लोबल लेवल पर पेश किए थे। उम्मीद है कि ग्लोबल लाइनअप में तीन मॉडल होंगे — Redmi Note 17, Note 17 Pro और एक नया Note 17 Pro Max। इनमें से आखिरी वाले (Pro Max) के कई स्पेसिफिकेशन भी अब सामने आ गए हैं।

Redmi Note 17 सीरीज की लॉन्च डेट

Xiaomi ने X पर एक पोस्ट में घोषणा की कि Redmi Note 17 सीरीज को 27 अगस्त को ग्लोबल लेवल पर लॉन्च किया जाएगा। Xiaomi की ग्लोबल वेबसाइट पर एक नई माइक्रोसाइट से Redmi Note 17 Pro Max नाम के एक नए मॉडल के जल्द लॉन्च होने की पुष्टि होती है। डिजाइन की बात करें तो, इस लाइनअप में फोटोक्रोमिक टेक्नोलॉजी होगी। Redmi का कहना है कि इसमें एक नया ‘क्लाउड ब्लश’ एलिमेंट है जो सूरज की रोशनी के साथ रिएक्ट कर सकता है।

आने वाली Redmi Note 17 सीरीज में 6.83 इंच का CrystalRes AMOLED डिस्प्ले मिलेगा, जो 1.5K रेजोल्यूशन के साथ आएगा। फोन में Snapdragon 6 Gen 5 चिपसेट दिया जाएगा। इसके साथ 24GB तक रैम मिलेगी, जिसमें वर्चुअल रैम का सपोर्ट भी शामिल होगा। Redmi का दावा है कि फोन 72 महीने तक स्मूद परफॉर्मेंस बनाए रखेगा।

माइक्रोसाइट से धूल और पानी से बचाव के लिए IP66 + IP68 + IP69 + IP69K रेटिंग्स का भी पता चलता है। Xiaomi के सब-ब्रांड का कहना है कि उनके फोन SGS और TÜV SÜD दोनों से सर्टिफाइड हैं।

कैमरे की बात करें तो अभी इसके बारे में पूरी जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन कंपनी ने कन्फर्म किया है कि Note 17 सीरीज में AI-पावर्ड पोर्ट्रेट एन्हांसमेंट फीचर होगा। ब्रांड द्वारा शेयर किए गए कैमरा सैंपल में f/1.5 अपर्चर, 26mm फोकल लेंथ, 1/60-सेकंड शटर स्पीड और ISO 125 की जानकारी मिलती है।

हालांकि, सबसे खास बात इसकी बैटरी क्षमता है, जो 10,000mAh की है। जानकारी से पता चलता है कि यह Redmi 17 Pro Max के लिए है, जो 100W फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करेगा, हालांकि Xiaomi ने कन्फर्म किया है कि वे बॉक्स में पावर एडॉप्टर नहीं देंगे। Redmi Note 17 सीरीज खरीदने पर ग्राहकों को बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 2 महीने का YouTube Premium, तीन महीने का Spotify Premium, छह महीने का Google One प्लान, 24 महीने के अंदर एक बार फ्री स्क्रीन रिप्लेसमेंट और 36 महीने के अंदर एक बार फ्री बैटरी सर्विस मिलेगी।

पिछली रिपोर्ट्स के अनुसार, Redmi Note 17 सीरीज भारत में 18 या 20 सितंबर को लॉन्च हो सकती है। लीक से यह भी पता चलता है कि Redmi Note 17 Pro Max में 50MP (f/1.8) का प्राइमरी रियर कैमरा हो सकता है, साथ ही 8MP का अल्ट्रा-वाइड-एंगल लेंस और सेल्फी व वीडियो कॉल के लिए 32MP का फ्रंट कैमरा भी हो सकता है। हालांकि, पहले सामने आई जानकारी में फोन में 9,210mAh बैटरी होने की बात कही गई थी।

लेकिन अब ग्लोबल लॉन्च डेट कन्फर्म होने के बाद, हम उम्मीद कर सकते हैं कि Redmi Note 17 सीरीज के लॉन्च से पहले के दिनों में और भी जानकारी सामने आएगी।

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ईरान-अमेरिका के बीच 60 दिन की डेडलाइन खत्म:फिर ट्रम्प ने हमले का आदेश क्यों नहीं दिया; दुश्मन को 3 तरफ से घेरने की स्ट्रैटजी

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच युद्ध रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद का समाधान निकालना था। डेडलाइन खत्म होने के बावजूद न तो कोई फाइनल समझौता हुआ, न ही अमेरिका ने ईरान पर बड़ा हमला शुरू किया। 60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका फिर बड़ा हमला कर सकता है। समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिखा। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम पहले के मुकाबले हल्का रुख अपना रहे हैं।” वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है। 1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना। 2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना। 3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना। ट्रम्प के इस बयान का मतलब अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत से समझौते की कोशिश भी कर रहा है। ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं? ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है। ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी। यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जंग को जिम्मेदार ठहरा सकती है। जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा। ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी? ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया। अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है। ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं। इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे। यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है। युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं। दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई। अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है। अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है। इन ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास निगरानी और हमलों के लिए किया गया था। कम ऊंचाई और धीमी गति के कारण ये ईरानी बलों और ईरान समर्थित समूहों के निशाने पर रहे। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 185 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 वायुसेना और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। मई में अमेरिकी वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डेविड टैबर ने सीनेट को बताया था कि वायुसेना के पास करीब 135 रीपर ड्रोन बचे हैं। पेंटागन पहले से ही रीपर ड्रोन को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह कम कीमत वाले नए हथियारबंद ड्रोन लाने की योजना पर काम कर रहा है। लंबी दूरी की मिसाइलों की कीमत भी 10 लाख डॉलर से ज्यादा होती है। इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी किया गया है। अगर अमेरिका के पास इन हथियारों का भंडार कम होता है तो भविष्य में ईरान पर बड़े हमले या रूस और चीन जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में मौजूद अपने सैन्य भंडार से इन हथियारों की फिर से आपूर्ति कर सकता है। ईरान की मांगें क्या हैं? अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को समझौते के लिए तैयार करना चाहता है। लेकिन ईरान भी अपने पास मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज खोलने के लिए 6 मांगें रखी हैं। यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अपनी पकड़ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश होते हुए भी समझौते की राह आसान नहीं है।
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ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। पूरी खबर यहां पढ़ें…

नंबर 1 बैडमिंटन खिलाड़ी को हराकर आयुष शेट्टी ने किया बड़ा उलटफेर (Video Highlights)

भारत के आयुष शेट्टी ने सोमवार को बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 के शुरुआती दौर के रोमांचक मुकाबले में चीन के दुनिया के नंबर 1 खिलाड़ी शी यू की को हराकर तहलका मचा दिया जबकि महिला वर्ग में पीवी सिंधु ने आसान जीत हासिल की।रैंकिंग में 22वें स्थान पर मौजूद 21 वर्षीय भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपने डेब्यू मैच में 30 वर्षीय चीनी टॉप सीड खिलाड़ी के खिलाफ संयम बनाए रखा और 21-14, 13-21, 21-19 से शानदार जीत हासिल की।

आयुष इस मैच से पहले शी यू की के खिलाफ 0-3 के हेड-टू-हेड रिकॉर्ड के साथ उतरे थे, लेकिन उनमें से दो मुकाबले काफी कड़े रहे थे। पिछले साल इंडोनेशिया मास्टर्स में, शी यू की ने भारतीय खिलाड़ी को 21-19, 21-19 से हराया था, जबकि इस साल की शुरुआत में मलेशिया ओपन के राउंड ऑफ़ 16 में आयुष को हराने के लिए उन्हें तीन गेम और एक घंटा 10 मिनट का समय लगा था। हालांकि, उनकी सबसे हालिया भिड़ंत एकतरफा रही थी। अप्रैल में निंगबो में बैडमिंटन एशिया चैंपियनशिप के फाइनल में शी यू की ने आयुष को 21-8, 21-10 से हराया था।

नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन के खिलाफ, आयुष ने दिखाया कि अप्रैल की उस हार के बाद से उनमें काफी सुधार हुआ है। भारतीय खिलाड़ी ने मजबूत शुरुआत की और 8-3 की बढ़त बना ली। उन्होंने अपनी बढ़त को 13-6 तक पहुंचाया और फिर संयम बनाए रखते हुए पहला गेम 21-14 से जीत लिया।

दूसरे गेम में शी यू की ने वापसी की; दोनों खिलाड़ी 8-8 की बराबरी पर थे, जिसके बाद चीनी शटलर ने धीरे-धीरे गेम पर पकड़ बना ली। शी यू की 15-10 से पांच अंक आगे हो गए और फिर बढ़त को 17-13 तक पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने लगातार चार अंक जीतकर मैच को निर्णायक गेम तक पहुंचा दिया। आखिरी गेम में स्कोर 3-3 से बराबर था, लेकिन फिर आयुष ने लगातार तीन पॉइंट जीतकर बढ़त बना ली और इंटरवल तक 11-5 से आगे हो गए। इसके बाद, शी यू की की वापसी की कोशिशों के बावजूद आयुष ने अपना संयम बनाए रखा और दुनिया के नंबर 1 बैडमिंटन खिलाड़ी के खिलाफ शानदार जीत हासिल की।

वहीं, पीवी सिंधु ने आयरलैंड की सोफिया नोबल के खिलाफ सीधे गेम में जीत के साथ अपने महिला सिंगल्स अभियान की शुरुआत की। दो बार की ओलंपिक मेडलिस्ट और पांच बार की वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडलिस्ट, नौवीं वरीयता प्राप्त भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ने दुनिया की 141वें नंबर की खिलाड़ी को 29 मिनट में 21-7, 21-13 से हराया। 2019 की वर्ल्ड चैंपियन सिंधु का अगला मुकाबला राउंड ऑफ़ 32 में कनाडा की वेन यू झांग से होगा।

इस भारतीय खिलाड़ी के नाम दो ब्रॉन्ज मेडल, दो सिल्वर मेडल और एक गोल्ड मेडल (जो उन्होंने 2019 में जीता था) दर्ज हैं। इस बड़े इवेंट में सेमीफाइनल में पहुंचने पर उनका कम से कम ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो जाएगा और वह वर्ल्ड चैंपियनशिप के इतिहास में छह मेडल जीतने वाली पहली खिलाड़ी बन जाएंगी। केवल दो अन्य खिलाड़ियों ने पांच वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीते हैं — चीन के लिन डैन, जिनके नाम पांच मेन्स सिंगल्स गोल्ड हैं, और उनके देश के झाओ युनलेई, जिन्होंने तीन मिक्स्ड डबल्स और दो विमेंस डबल्स खिताब जीते हैं। सिंधु ने शुरू से ही अपनी कमज़ोर मानी जा रही प्रतिद्वंद्वी पर दबदबा बनाए रखा और 29 मिनट में आसानी से मैच जीत लिया।

इससे पहले दिन में, ट्रेसा जॉली और गायत्री गोपीचंद ने स्पेन की पाउला लोपेज़ और लूसिया रोड्रिग्ज़ के खिलाफ 21-9, 21-13 की शानदार जीत के साथ महिला डबल्स के दूसरे राउंड में जगह बनाई। भारतीय जोड़ी को राउंड ऑफ़ 64 के अपने मैच में जीत हासिल करने में सिर्फ़ 33 मिनट लगे। कॉमनवेल्थ गेम्स मेडलिस्ट जोड़ी का अगला मुकाबला राउंड ऑफ़ 32 में अमेरिका की लॉरेन लैम और एलिसन क्विन ली (16वीं वरीयता प्राप्त) से होगा।

एमआर अर्जुन और हरिहरन अमसाकरुणन पुरुष डबल्स में आगे बढ़े, क्योंकि उनके आयरिश प्रतिद्वंद्वी स्कॉट गिल्डिया और पॉल रेनॉल्ड्स शुरुआती राउंड के मैच के दौरान चोट के कारण हट गए। दुनिया में 24वें नंबर की भारतीय जोड़ी ने पहला गेम 21-16 से जीता था और दूसरे गेम में 6-4 से आगे चल रही थी, तभी दुनिया के 102वें नंबर की आयरिश जोड़ी आगे नहीं खेल पाई। इस नतीजे के साथ भारतीय जोड़ी राउंड ऑफ़ 32 में पहुंच गई है, जहां उनका मुकाबला 15वीं वरीयता प्राप्त रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया की जोड़ी कांग मिन ह्युक और की डोंग जू से होगा।

पुरुष डबल्स की स्टार जोड़ी सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी, जो पांचवीं वरीयता प्राप्त हैं, को दूसरे दौर में सीधे प्रवेश मिला है, जहां उनका सामना स्कॉटलैंड के अलेक्जेंडर डन और एडम प्रिंगल से होगा।

ब्रिक्स से दूरी बांग्लादेश को पड़ेगी भारी, तारिक रहमान के सम्मेलन में शामिल होने पर संशय

ब्रिक्स से दूरी बांग्लादेश को पड़ेगी भारी, तारिक रहमान के सम्मेलन में शामिल होने पर संशय

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अवसरों को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना। विकासशील देशों के लिए बड़े बहुपक्षीय मंच केवल औपचारिक सम्मेलन नहीं होते, बल्कि वे निवेश,व्यापार, तकनीक,ऊर्जा और वैश्विक राजनीतिक स्वीकार्यता के नए रास्ते खोलते हैं। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इस वास्तविकता को अच्छी तरह समझती थी। उन्होंने भारत, चीन, रूस, अमेरिका, जापान और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश की आर्थिक जरूरतों तथा विकास की संभावनाओं को प्रमुखता दी।

 

भारत की ओर से प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाना महत्वपूर्ण था। यह केवल भारत की ओर से दिया गया निमंत्रण नहीं था,बल्कि बांग्लादेश के लिए वैश्विक दक्षिण की बदलती आर्थिक और राजनीतिक संरचना से जुड़ने का अवसर था। इस मंच पर उपस्थित होकर तारिक रहमान भारत के साथ सीधे संवाद कर सकते थे, चीन और रूस सहित प्रमुख उभरती शक्तियों के नेताओं से संपर्क बढ़ा सकते थे तथा बांग्लादेश के लिए निवेश, व्यापार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर तलाश सकते थे।


यदि तारिक रहमान इस अवसर से दूर रहते है,तो इसका नुकसान केवल एक भारत यात्रा छूटने तक सीमित नहीं रहेगा। सबसे पहला नुकसान उनकी व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि को हो सकता है। सत्ता संभालने के बाद किसी प्रधानमंत्री की पहली प्राथमिकता यह होती है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपनी सरकार की दिशा और प्राथमिकताओं का भरोसा दिलाए। ब्रिक्स जैसा मंच उन्हें यह अवसर देता कि वे बांग्लादेश की नई सरकार को एक व्यावहारिक, आर्थिक विकास केंद्रित और बहुध्रुवीय विदेश नीति वाली सरकार के रूप में प्रस्तुत करते। भारत की राजधानी में विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों के बीच उनकी मौजूदगी उनके लिए एक महत्वपूर्ण वैश्विक परिचय बन सकती है। तारिक रहमान यदि दिल्ली आते तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत के जरिए मतभेदों को व्यापक द्विपक्षीय एजेंडे से अलग रखने की कोशिश कर सकते थे। इससे यह संदेश जाता कि शेख हसीना का विवाद अपनी जगह है, लेकिन बांग्लादेश और भारत के राष्ट्रीय हित उससे कहीं बड़े हैं।


ब्रिक्स का मंच विकासशील देशों के लिए आर्थिक सहयोग और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अधिक प्रभाव की संभावनाओं से जुड़ा है। बांग्लादेश जैसे देश के लिए ऐसे मंच पर अपनी निवेश जरूरतों, औद्योगिक क्षमता, निर्यात संभावनाओं और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को प्रस्तुत करना उपयोगी हो सकता है। तारिक रहमान वहां भारत के साथ ही चीन, रूस, खाड़ी देशों और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों से बातचीत कर सकते थे। किसी औपचारिक समझौते के बिना भी ऐसे संपर्क भविष्य के निवेश और व्यापार के लिए रास्ते खोलते हैं।


अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नेताओं की व्यक्तिगत संपर्क भी राष्ट्रीय शक्ति का हिस्सा होती है। किसी शिखर सम्मेलन में एक नेता की उपस्थिति अनेक द्विपक्षीय मुलाकातों,अनौपचारिक संवादों और भविष्य के संपर्कों का आधार बनती है। तारिक रहमान के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि उनकी सरकार अभी अपनी विदेश नीति की नई पहचान बना रही है। ब्रिक्स में भागीदारी उन्हें यह दिखाने का अवसर देती कि बांग्लादेश किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर नहीं है और वह भारत,चीन,रूस,पश्चिमी देशों तथा खाड़ी की शक्तियों के साथ संतुलित संबंध चाहता है।


बंगलादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का मुद्दा बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है,लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में किसी एक नेता के भविष्य को पूरे द्विपक्षीय संबंधों की कसौटी बना देना दीर्घकाल में विकल्पों को सीमित कर सकता है। तारिक रहमान के लिए ब्रिक्स का मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे वे पाकिस्तान के साथ बढ़ते संबंधों को संतुलित करने का संदेश दे सकते थे। पाकिस्तान से संबंध मजबूत करना बांग्लादेश का संप्रभु अधिकार है,लेकिन भारत के साथ दूरी बनाकर पाकिस्तान के करीब जाना दक्षिण एशिया में अनावश्यक रणनीतिक ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है। दिल्ली आकर तारिक रहमान यह स्पष्ट कर सकते थे कि ढाका की विदेश नीति किसी एक देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि बांग्लादेश के आर्थिक और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।


यहां शेख हसीना की विदेश नीति का अनुभव भी प्रासंगिक है। उनके शासनकाल की आलोचना के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों को बांग्लादेश के आर्थिक हितों से जोड़ने का प्रयास किया। भारत के साथ निकटता के साथ उन्होंने चीन, जापान, रूस, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ भी संबंध बनाए रखे। उनका उद्देश्य यह था कि बांग्लादेश किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहे और अलग-अलग देशों से अपने विकास के लिए अवसर प्राप्त करे।


बहरहाल तारिक रहमान यदि ब्रिक्स से दूर रहते है तो वे एक ऐसे मंच का उपयोग नहीं कर पाएंगे जहां वे अपनी सरकार की वैश्विक छवि गढ़ सकते थे, भारत के साथ सीधे संवाद कर सकते थे,निवेश के अवसर तलाश सकते थे और बांग्लादेश को वैश्विक दक्षिण की उभरती आर्थिक व्यवस्था में अधिक प्रभावी स्थान दिलाने की कोशिश कर सकते थे।
(लेखक विदेश नीति के जानकार है और लेख में छपे विचार उनके व्यक्तिगत हैं) 

शी जिनपिंग ने तियानमेन प्रदर्शन कुचलने को सही ठहराया:बोले- कम्युनिस्ट पार्टी का फैसला सही था; 36 साल पहले टैंक लेकर उतरी थी चीनी सेना

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 1989 के तियानमेन प्रदर्शन को रोकने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की गई कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की भी तारीफ की। शी ने कहा कि उस समय जियांग ने पार्टी के फैसले का साथ दिया और शंघाई में हालात को काबू में रखने में अहम भूमिका निभाई। शी ने यह बात सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने चीन के सामने मौजूद चुनौतियों का भी जिक्र किया। शी ने लोगों से मुश्किल वक्त में हार न मानने और हर चुनौती का डटकर सामना करने की अपील की। जिनपिंग ने कहा कि चीन के सामने चाहे कितनी भी बड़ी चुनौती आए, वह पीछे नहीं हटेगा। 1989 में तियानमेन स्क्वायर पर क्या हुआ था? 1989 में चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर पर लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए थे। कई हफ्तों तक चले इन प्रदर्शनों में हजारों छात्र और आम नागरिक शामिल हुए थे। इसके बाद चीनी सेना ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया और प्रदर्शन को कुचल दिया। कार्रवाई में सेना और टैंकों का इस्तेमाल किया गया था। इस घटना में कितने लोगों की मौत हुई, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। चीन की सरकार ने 200 से ज्यादा लोगों की मौत की बात कही थी। वहीं, अलग-अलग विदेशी स्रोतों और अनुमानों में मृतकों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक बताई गई है। तियानमेन की यह घटना आज भी चीन में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इस घटना से जुड़ी चर्चा और जानकारी के प्रसार पर चीन में कड़े प्रतिबंध हैं। तियानमेन के बाद जियांग जेमिन बने चीन के टॉप लीडर तियानमेन प्रदर्शन कुचले जाने के कुछ समय बाद जियांग जेमिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे। उनसे पहले इस पद पर झाओ जियांग थे। झाओ जियांग को प्रदर्शनकारियों के प्रति नरम रुख रखने वाला माना गया था। इसी वजह से उन्हें पद से हटा दिया गया था। इसके बाद जियांग जेमिन तेजी से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में पहुंचे। 1993 तक जियांग चीन के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल हो चुके थे। वे 1993 से 2002 तक चीन के राष्ट्रपति रहे। 30 नवंबर 2022 को 96 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। जियांग ने चीन की इकोनॉमी दुनिया के लिए खोली जियांग जेमिन के शासनकाल में चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। इस दौरान चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए और खोला। अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में भी सुधार हुआ। 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना। उस समय अमेरिका ने भी चीन के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने का समर्थन किया था। इसके बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका और मजबूत हुई। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के रिश्ते काफी बदल गए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर कई बार तनाव बढ़ा है। इसके अलावा ताइवान, तकनीक और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी दोनों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक टकराव बढ़ा है। जिनपिंग ने चीन की उपलब्धियों का जिक्र किया शी ने अपने भाषण में चीन की उपलब्धियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन के लोगों का जीवन लगातार बेहतर हो रहा है। हालांकि, हाल के आर्थिक आंकड़े चीन की आर्थिक विकास दर में धीमापन दिखा रहे हैं। इसके बावजूद शी ने चीन के भविष्य को लेकर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान की संभावनाएं उज्ज्वल हैं। उनके मुताबिक, कई पीढ़ियों से चीन जिस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा है, वह धीरे-धीरे हकीकत बन रहा है। जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में चीन के शीर्ष नेता मौजूद रहे। चीन की सबसे ताकतवर पोलित ब्यूरो स्थायी समिति के सभी सात सदस्य कार्यक्रम में शामिल हुए।

विश्वकप में क्या खुलेगा चक दे गर्ल्स का खाता? कल सामने होगी द.अफ्रीका

चीन के साथ कड़े मुकाबले में 2-2 से ड्रॉ खेलने के बाद अपनी पहली जीत की उम्मीद में भारतीय महिला टीम कल FIH वर्ल्ड कप हॉकी टूर्नामेंट में अपने दूसरे पूल डी मैच में दक्षिण अफ्रीका का सामना करेगी। भारत ने चीन के खिलाफ अच्छी शुरुआत की, जिसमें नवनीत और दीपिका ने गोल करके अपनी शानदार फॉर्म जारी रखी।

चीन ने दो बार वापसी करते हुए बराबरी की, लेकिन भारत की अनुशासित रक्षापंक्ति और लड़ने के जज्बे ने उन्हें टूर्नामेंट की प्रमुख टीमों में से एक के खिलाफ एक अहम अंक दिलाने में मदद की। इस नतीजे से दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ होने वाले मैच से पहले भारत का आत्मविश्वास बढ़ेगा, साथ ही यह भी पता चलेगा कि अपनी सकारात्मक लय को तीन अंक में बदलना कितना जरूरी है।

वहीं, दक्षिण अफ्रीका अपने पहले मैच में इंग्लैंड से 4-0 से हारने के बाद वापसी करने के लिए उत्सुक होगा। इंग्लैंड अभी पूल में सबसे आगे है, जबकि भारत और चीन पहले दिन ड्रॉ खेलने के बाद अंक के मामले में दूसरे स्थान पर हैं। टूर्नामेंट के पहले चरण से हर पूल की शीर्ष दो टीमें आगे बढ़ेंगी और सेमीफाइनल की दौड़ में बनी रहेंगी, इसलिए हर अंक बहुत अहम हो जाता है।

इसलिए भारत इस मुकाबले में यह जानते हुए उतरेगा कि जीत से उनके क्वालिफिकेशन की उम्मीदों को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वे चीन के खिलाफ दिखाई गई तीव्रता और संयम को बनाए रखें और साथ ही अटैकिंग थर्ड में और अधिक सटीक खेलें।

टूर्नामेंट की शुरुआत में नवनीत और दीपिका की फॉर्म आत्मविश्वास का बड़ा स्रोत होगी, जबकि दबाव झेलने की टीम की क्षमता का फिर से परीक्षण किया जाएगा। दूसरी ओर, दक्षिण अफ्रीका अपनी शुरुआती हार के बाद मजबूत वापसी करने के लिए पूरी तरह तैयार होगा। भारत को एक ऐसी टीम से कड़े मुकाबले की उम्मीद करनी चाहिए जिसके पास दांव पर लगाने के लिए बहुत कुछ है।

भारतीय टीम चीन के खिलाफ दिखाए गए भरोसे और जीतने की जबरदस्त इच्छाशक्ति से आत्मविश्वास हासिल करेगी। अब, इस विश्व कप में अपनी पहली जीत पर नजर रखते हुए, भारत उसी आधार को आगे बढ़ाना चाहेगा, तीन अहम अंक हासिल करना चाहेगा और कड़े मुकाबले वाले पूल डी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगा।

मैच का समय – शाम 6.30 बजे

कहां देखें- स्टार सिलेक्ट या फिर जियो हॉटस्टार पर

महिला हॉकी विश्वकप में 2 गोल करके भारतीय टीम ने चीन को बराबरी पर रोका

Wome Asian Hockey

भारत ने प्रबल दावेदार चीन के साथ हॉकी महिला विश्व कप मुकाबले में रविवार को दो बार बढ़त बनाने के बाद 2-2 का ड्रा खेला।भारत इस परिणाम से कॉन्फिडेंस लेगा। चीन फेवरेट के तौर पर आया था, लेकिन दोनों टीमों में से भारत ज़्यादा खुश होगा।

उन्होंने नवनीत की आठवें मिनट में शानदार फिनिश की वजह से लीड ली और फिर दीपिका ने 25वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर से स्कोर 2-1 कर दिया। चीन ने दोनों गोल किए, झांग यिंग ने शिल्पी के फाउल के बाद 15वें मिनट में पेनल्टी स्ट्रोक को गोल में बदला और फिर मा निंग ने तीसरे क्वार्टर में 39वें मिनट में पेनल्टी कॉर्नर पर गोल करके स्कोर 2-2 कर दिया।

चीन ने आखिरी क्वार्टर में ज़ोर लगाया, भारत ने प्रेशर झेलते हुए एक पॉइंट हासिल किया।इंग्लैंड दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपनी पिछली जीत के बाद ग्रुप में सबसे आगे है। चीन और भारत ने इस गेम से एक-एक पॉइंट हासिल किया।ग्रुप से दूसरे राउंड में सिर्फ़ दो टीमें ही आगे बढ़ी हैं, इसलिए चीन और भारत दोनों अपने अगले गेम में पॉइंट गंवाने का रिस्क नहीं उठा सकते।

Amber Enterprises: ओप्पो, वनप्लस और रियलमी के फोन बनाएगी कंपनी, अगले साल से प्रोडक्शन शुरू होगा

Amber Enterprises: इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Amber Enterprises India अगले साल से चीन की स्मार्टफोन कंपनियों Oppo, OnePlus और Realme के लिए भारत में फोन बनाना शुरू करेगी। कंपनी ने कहा है कि ट्रायल प्रोडक्शन वित्त वर्ष 2027 की चौथी तिमाही में शुरू होगा। वहीं, कमर्शियल प्रोडक्शन FY28 की पहली तिमाही यानी मार्च 2027 के बाद शुरू होने की उम्मीद है।

पहले साल 80 लाख का टारगेट

एंबर एंटरप्राइजेज के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और CEO जसबीर सिंह ने बताया कि पहले साल करीब 80 लाख स्मार्टफोन बनाने का लक्ष्य है। दूसरे साल इसे बढ़ाकर 1.5 से 1.6 करोड़ यूनिट तक पहुंचाने की योजना है। कंपनी ने अपने मोबाइल कारोबार के लिए नया COO भी नियुक्त किया है।

कंपनी ने Oppo Mobiles India के साथ मैन्युफैक्चरिंग सहयोग समझौता किया है। इसके तहत कंपनी Oppo, OnePlus और Realme तीनों ब्रांड के स्मार्टफोन बनाएगी।

चीन की कंपनियां अपना मॉडल बदल रहीं

ये कदम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि चीन की स्मार्टफोन कंपनियां भारत में खुद फैक्ट्री चलाने की बजाय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अपनाने लगी हैं। अभी Oppo के कुछ फोन Vivo की नोएडा फैक्ट्री में भी बनते हैं। वहीं, Vivo अपनी फैक्ट्री को Dixon Technologies के साथ जॉइंट वेंचर में ट्रांसफर करने की प्रक्रिया में है।

भारतीय बाजार में मजबूत पकड़

Counterpoint Research के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में Vivo की भारतीय स्मार्टफोन बाजार में 17.8% हिस्सेदारी रही। Samsung 17.6% के साथ दूसरे नंबर पर रहा, जबकि Oppo की हिस्सेदारी 13.6% रही। अगर Vivo, iQOO, Oppo, Realme और OnePlus को मिलाकर देखें, तो इन ब्रांड्स की संयुक्त हिस्सेदारी 45.6% रही।

PCB कारोबार में दबाव

एंबर एंटरप्राइजेज ने बताया कि उसके PCB कारोबार में फिलहाल मार्जिन पर दबाव है। इसकी वजह Copper-Clad Laminate (CCL) की बढ़ती कीमतें हैं। हालांकि, कंपनी धीरे-धीरे इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों तक पहुंचा रही है।

Amber Enterprises की योजना 2029-30 तक अपना CCL प्लांट लगाने की भी है। इससे भविष्य में कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

एंबर एंटरप्राइजेज के शेयरों का हाल

एंबर एंटरप्राइजेज का शेयर पिछले कारोबारी सत्र में 0.68% बढ़कर 7,224 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 महीने में स्टॉक 9.89% गिरा है। वहीं, 1 साल में यह 2.88% टूटा है। हालांकि, बीते 5 साल में इसने 158% का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। कंपनी का मार्केट कैप 24.48 हजार करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कौन है दुनिया का सबसे पुराना देश? भारत, मिस्र, चीन समेत इन देशों इतिहास है हजारों साल पुराना

दुनिया भर में 200 से ज्यादा देश मौजूद हैं। वहीं दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका इतिहास हजारों साल पुराना है। ये देश हजारों सालों से पुरानी सभ्यताओं, संस्कृति और परंपराओं को आज भी बनाए हुए है। मिस्र, भारत और चीन जैसे देशों से लेकर सैन मैरिनो तक, कई देशों ने सदियों के बदलाव के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाए रखी है। क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया के सबसे पुराने देश कौन-कौन है। आइए जानते हैं दुनिया के कुछ सबसे पुराने देशों के बारे में, जिनका इतिहास आज भी लोगों को हैरान करता है।

दुनिया का सबसे पुराना देश कौन सा है, इसका कोई एक तय जवाब नहीं है। किसी देश की उम्र उसकी प्राचीन सभ्यता, राज्य के गठन या लंबे राजनीतिक इतिहास के आधार पर तय की जा सकती है। इसलिए कई देशों को दुनिया के सबसे पुराने देशों में गिना जाता है।

मिस्र (लगभग 3100 ईसा पूर्व): मिस्र का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसे दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में गिना जाता है। नील नदी के किनारे विकसित मिस्र की सभ्यता अपनी भव्य वास्तुकला और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहां के पिरामिड और प्राचीन मंदिर आज भी इसके समृद्ध इतिहास की गवाही देते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, करीब 3100 ईसा पूर्व राजा नार्मर के शासन में ऊपरी और निचले मिस्र का एकीकरण हुआ था, जिसे प्राचीन मिस्र के शुरुआती राजवंशीय दौर की शुरुआत माना जाता है।

भारत (लगभग 3300 ईसा पूर्व): भारत को दुनिया के सबसे पुराने देशों में से एक माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती हैं। करीब 3300 ईसा पूर्व के आसपास विकसित हुई सिंधु घाटी सभ्यता को दुनिया की शुरुआती शहरी सभ्यताओं में गिना जाता है। इसके बाद भारत में वैदिक काल के साथ कई राजवंशों और साम्राज्यों का विकास हुआ। प्राचीन भारत ने गणित, विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और साहित्य जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भी देश की कई पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराएं लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।

चीन (लगभग 2070 ईसा पूर्व): चीन का इतिहास दुनिया के सबसे पुराने इतिहासों में शामिल है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, शिया राजवंश की शुरुआत करीब 2070 ईसा पूर्व हुई थी। अलग-अलग राजवंशों ने चीन की संस्कृति और तकनीक को आगे बढ़ाया। कागज, छपाई, बारूद और कंपास जैसे आविष्कारों के लिए भी चीन प्रसिद्ध है।

जॉर्जिया (लगभग 1500 ईसा पूर्व): जॉर्जिया का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसका संबंध कोल्चिस व आइबेरिया जैसे प्राचीन राज्यों से माना जाता है। कई साम्राज्यों के प्रभाव के बावजूद जॉर्जिया ने अपनी संस्कृति और पहचान को बनाए रखा है।

इथियोपिया (लगभग 980 ईसा पूर्व): इथियोपिया का इतिहास अफ्रीका के सबसे पुराने और समृद्ध इतिहासों में शामिल है। यहां कई प्राचीन राज्य और संस्कृतियां विकसित हुईं। यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के दौर में भी इसने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी, हालांकि 1936 से 1941 तक इटली ने यहां कब्जा किया था।

ग्रीस (लगभग 800 ईसा पूर्व): ग्रीस का प्राचीन इतिहास दुनिया की सबसे प्रभावशाली सभ्यताओं में गिना जाता है। दर्शन, विज्ञान, कला और राजनीति में इसके योगदान का असर आज भी दिखता है। सुकरात, प्लेटो और अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने दुनिया की सोच को प्रभावित किया।

ईरान (लगभग 550 ईसा पूर्व): ईरान का इतिहास प्राचीन फारस से जुड़ा है। करीब छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस द ग्रेट ने अकेमेनिड साम्राज्य की नींव रखी, जो पश्चिम एशिया की बड़ी शक्तियों में शामिल था।

जापान (परंपरागत रूप से 660 ईसा पूर्व): जापान के इतिहास में 660 ईसा पूर्व का समय काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इसी समय सम्राट जिम्मू ने जापान की गद्दी संभाली थी। लेकिन, इतिहासकार इस तारीख को प्रमाणित नहीं मानते। जापान आज भी अपनी पुरानी संस्कृति और आधुनिक तकनीक के मेल के लिए जाना जाता है।

आर्मेनिया (पारंपरिक रूप से 2492 ईसा पूर्व): आर्मेनिया का इतिहास और संस्कृति काफी पुरानी है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, आर्मेनियाई लोगों का संबंध हायक नामक पूर्वज से जोड़ा जाता है। यह क्षेत्र कई प्राचीन राज्यों का केंद्र रहा है। करीब 301 ईस्वी में आर्मेनिया ने ईसाई धर्म को राजकीय धर्म बनाया था।

सैन मैरिनो (301 ईस्वी): इटली से घिरा सैन मैरिनो दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक है। मान्यता है कि सेंट मैरिनस ने 301 ईस्वी में इसकी स्थापना की थी। आज भी यह अपनी पुरानी राजनीतिक पहचान बनाए हुए है।

समय के साथ दुनिया में कई बड़े साम्राज्य आए और उनका अंत भी हुआ, लेकिन कुछ देशों ने अपनी पुरानी संस्कृति और विरासत को आज तक संभालकर रखा है। भारत, मिस्र और ग्रीस इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इन देशों का लंबा इतिहास उनकी समृद्ध सभ्यता और परंपराओं की खास पहचान को दर्शाता है

Suryapath Tiranga 2026: सूरज की चाल के साथ पूरी दुनिया में फहरा तिरंगा! जानें क्या है ‘सूर्यपथ तिरंगा’ रिले

Suryapath Tiranga: स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर एक अनोखा वैश्विक जश्न देखने को मिला, जिसमें तिरंगा सूरज की उगती किरणों के रास्ते के साथ पूरी दुनिया में यात्रा करते हुए नजर आया। संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इस वैश्विक आयोजन की पूरी जानकारी साझा की गई है, जिसे सूर्यपथ तिरंगा नाम दिया गया है। यह विशेष पहल हर घर तिरंगा 2026 अभियान के तहत आयोजित की गई थी।

फिजी से शुरू हुई सूर्यपथ तिरंगा की वैश्विक यात्रा

संस्कृति मंत्रालय के बयान के मुताबिक सूर्यपथ तिरंगा की इस अनूठी यात्रा की शुरुआत भारतीय समयानुसार (IST) रात 1:30 बजे फिजी से हुई, जहां रिले के पहले प्वाइंट पर तिरंगा फहराया गया। फिजी के बाद यह प्रतीकात्मक यात्रा सूरज की चाल के साथ पश्चिम की ओर बढ़ी और न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया गणराज्य, चीन, इंडोनेशिया, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड और म्यांमार से होते हुए आगे बढ़ी। दुनिया भर में स्थित भारतीय मिशनों और पोस्ट्स पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया जिससे समय क्षेत्रों और महाद्वीपों के पार तिरंगे की एक निरंतर दृश्य रिले तैयार हुई।

सुबह 8:00 बजे तक यह यात्रा बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव तक पहुंच चुकी थी, जो पूरे क्षेत्र में भारत के गौरव और एकता का संदेश ले जा रही थी। इसके बाद यह रिले पश्चिम की ओर बढ़ते हुए उज्बेकिस्तान और ओमान से गुजरी, सुबह 9:45 बजे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे कतर तक जा पहुंची। मात्र नौ घंटों में तिरंगे ने प्रशांत महासागर में दिन के सबसे पहले उजाले से लेकर पश्चिम एशिया तक की प्रतीकात्मक यात्रा पूरी की, जिसके जरिए 21 देशों और मिशनों/पोस्ट्स को एक साझा राष्ट्रीय प्रतीक से जोड़ा गया। ‘सूर्यपथ तिरंगा’ ने उगते सूरज को देशभक्ति के एक वैश्विक रिले में बदल दिया।

अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक फैला तिरंगे का कारवां

संस्कृति मंत्रालय की विज्ञप्ति के अनुसार, भारतीय समयानुसार सुबह 10:45 बजे के बाद ‘सूर्यपथ तिरंगा’ की पश्चिम की ओर यात्रा लगातार जारी रही। यह सफर कुवैत, सऊदी अरब, इथियोपिया, रूस, केन्या, इजराइल, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका से होकर गुजरा। हर एक झंडा फहराने के साथ तिरंगा नए टाइम जोन और भूगोल को पार करता हुआ पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरेशिया तक पहुंच गया। दोपहर 12:30 बजे तक यह रिले प्रिटोरिया पहुंच चुकी थी।

इसके बाद यात्रा ने यूरोप में प्रवेश किया, जहां लातविया से लेकर जर्मनी, इटली, बेल्जियम, नीदरलैंड, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन, मोरक्को और आइसलैंड तक लगातार तिरंगा फहराया गया। दोपहर 12:45 बजे रीगा से शुरू होकर दोपहर 3:00 बजे रेकजाविक तक इस रिले ने पूरे यूरोप में जश्न की एक अद्भुत श्रृंखला बना दी। जैसे-जैसे ‘सूर्यपथ तिरंगा’ और पश्चिम की ओर बढ़ा, यह यात्रा अटलांटिक पार करते हुए अमेरिका की तरफ बढ़ गई।

क्या है सूर्यपथ तिरंगा का उद्देश्य?

हर घर तिरंगा 2026 के तहत इस विशेष पहल पर बात करते हुए संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि सूर्यपथ तिरंगा हमारे देश के शक्तिशाली प्रतीक तिरंगे के जरिए भारत की भावना को पूरी दुनिया तक पहुंचाता है। उन्होंने कहा कि उगते सूरज के पथ का अनुसरण करते हुए यह अनूठी रिले हमारे मिशनों और भारतीय प्रवासियों को भारत की एकता, विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों के साझा जश्न में पिरोती है। यह दुनिया भर के भारतीयों के लिए एक आमंत्रण है कि वे एक साथ आएं और भारत की चिरस्थायी भावना को दुनिया के साथ साझा करें। कुल मिलाकर 40 से अधिक देशों में भारतीय नागरिकों और भारत के मित्रों को जोड़ने वाली इस ग्लोबल तिरंगा रिले ने यह साबित कर दिया कि सूरज जहां भी उगता है, वहां तिरंगे की भावना साथ चलती है।