ब्रिक्स से दूरी बांग्लादेश को पड़ेगी भारी, तारिक रहमान के सम्मेलन में शामिल होने पर संशय

ब्रिक्स से दूरी बांग्लादेश को पड़ेगी भारी, तारिक रहमान के सम्मेलन में शामिल होने पर संशय

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अवसरों को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना। विकासशील देशों के लिए बड़े बहुपक्षीय मंच केवल औपचारिक सम्मेलन नहीं होते, बल्कि वे निवेश,व्यापार, तकनीक,ऊर्जा और वैश्विक राजनीतिक स्वीकार्यता के नए रास्ते खोलते हैं। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इस वास्तविकता को अच्छी तरह समझती थी। उन्होंने भारत, चीन, रूस, अमेरिका, जापान और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश की आर्थिक जरूरतों तथा विकास की संभावनाओं को प्रमुखता दी।

 

भारत की ओर से प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाना महत्वपूर्ण था। यह केवल भारत की ओर से दिया गया निमंत्रण नहीं था,बल्कि बांग्लादेश के लिए वैश्विक दक्षिण की बदलती आर्थिक और राजनीतिक संरचना से जुड़ने का अवसर था। इस मंच पर उपस्थित होकर तारिक रहमान भारत के साथ सीधे संवाद कर सकते थे, चीन और रूस सहित प्रमुख उभरती शक्तियों के नेताओं से संपर्क बढ़ा सकते थे तथा बांग्लादेश के लिए निवेश, व्यापार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर तलाश सकते थे।


यदि तारिक रहमान इस अवसर से दूर रहते है,तो इसका नुकसान केवल एक भारत यात्रा छूटने तक सीमित नहीं रहेगा। सबसे पहला नुकसान उनकी व्यक्तिगत कूटनीतिक छवि को हो सकता है। सत्ता संभालने के बाद किसी प्रधानमंत्री की पहली प्राथमिकता यह होती है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपनी सरकार की दिशा और प्राथमिकताओं का भरोसा दिलाए। ब्रिक्स जैसा मंच उन्हें यह अवसर देता कि वे बांग्लादेश की नई सरकार को एक व्यावहारिक, आर्थिक विकास केंद्रित और बहुध्रुवीय विदेश नीति वाली सरकार के रूप में प्रस्तुत करते। भारत की राजधानी में विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों के बीच उनकी मौजूदगी उनके लिए एक महत्वपूर्ण वैश्विक परिचय बन सकती है। तारिक रहमान यदि दिल्ली आते तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बातचीत के जरिए मतभेदों को व्यापक द्विपक्षीय एजेंडे से अलग रखने की कोशिश कर सकते थे। इससे यह संदेश जाता कि शेख हसीना का विवाद अपनी जगह है, लेकिन बांग्लादेश और भारत के राष्ट्रीय हित उससे कहीं बड़े हैं।


ब्रिक्स का मंच विकासशील देशों के लिए आर्थिक सहयोग और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अधिक प्रभाव की संभावनाओं से जुड़ा है। बांग्लादेश जैसे देश के लिए ऐसे मंच पर अपनी निवेश जरूरतों, औद्योगिक क्षमता, निर्यात संभावनाओं और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को प्रस्तुत करना उपयोगी हो सकता है। तारिक रहमान वहां भारत के साथ ही चीन, रूस, खाड़ी देशों और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधियों से बातचीत कर सकते थे। किसी औपचारिक समझौते के बिना भी ऐसे संपर्क भविष्य के निवेश और व्यापार के लिए रास्ते खोलते हैं।


अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नेताओं की व्यक्तिगत संपर्क भी राष्ट्रीय शक्ति का हिस्सा होती है। किसी शिखर सम्मेलन में एक नेता की उपस्थिति अनेक द्विपक्षीय मुलाकातों,अनौपचारिक संवादों और भविष्य के संपर्कों का आधार बनती है। तारिक रहमान के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि उनकी सरकार अभी अपनी विदेश नीति की नई पहचान बना रही है। ब्रिक्स में भागीदारी उन्हें यह दिखाने का अवसर देती कि बांग्लादेश किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर नहीं है और वह भारत,चीन,रूस,पश्चिमी देशों तथा खाड़ी की शक्तियों के साथ संतुलित संबंध चाहता है।


बंगलादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का मुद्दा बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है,लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में किसी एक नेता के भविष्य को पूरे द्विपक्षीय संबंधों की कसौटी बना देना दीर्घकाल में विकल्पों को सीमित कर सकता है। तारिक रहमान के लिए ब्रिक्स का मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे वे पाकिस्तान के साथ बढ़ते संबंधों को संतुलित करने का संदेश दे सकते थे। पाकिस्तान से संबंध मजबूत करना बांग्लादेश का संप्रभु अधिकार है,लेकिन भारत के साथ दूरी बनाकर पाकिस्तान के करीब जाना दक्षिण एशिया में अनावश्यक रणनीतिक ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है। दिल्ली आकर तारिक रहमान यह स्पष्ट कर सकते थे कि ढाका की विदेश नीति किसी एक देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि बांग्लादेश के आर्थिक और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।


यहां शेख हसीना की विदेश नीति का अनुभव भी प्रासंगिक है। उनके शासनकाल की आलोचना के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों को बांग्लादेश के आर्थिक हितों से जोड़ने का प्रयास किया। भारत के साथ निकटता के साथ उन्होंने चीन, जापान, रूस, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ भी संबंध बनाए रखे। उनका उद्देश्य यह था कि बांग्लादेश किसी एक शक्ति पर निर्भर न रहे और अलग-अलग देशों से अपने विकास के लिए अवसर प्राप्त करे।


बहरहाल तारिक रहमान यदि ब्रिक्स से दूर रहते है तो वे एक ऐसे मंच का उपयोग नहीं कर पाएंगे जहां वे अपनी सरकार की वैश्विक छवि गढ़ सकते थे, भारत के साथ सीधे संवाद कर सकते थे,निवेश के अवसर तलाश सकते थे और बांग्लादेश को वैश्विक दक्षिण की उभरती आर्थिक व्यवस्था में अधिक प्रभावी स्थान दिलाने की कोशिश कर सकते थे।
(लेखक विदेश नीति के जानकार है और लेख में छपे विचार उनके व्यक्तिगत हैं) 

“मैं बॉस हूं’ वाले बयान पर ट्रंप की सफाई, बोले- मैं मजाक कर रहा था, मेरी बात को गलत समझा गया

Donald Trump: G7 नेताओं से “मैं बॉस हूं” (I’m the boss) वाली बात कहने के बाद, जब यह टिप्पणी वायरल हो गई और समिट के दौरान दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा और लोगों को इस बात पर हंसी भी आई, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सफाई देते हुए कहा, “मैं मजाक कर रहा था। मैं बॉस बनने की कोशिश नहीं कर रहा था।” ट्रंप ने यह बात The Axios Show पर एक इंटरव्यू के दौरान कही। उन्होंने बताया कि उनकी टिप्पणी का मकसद मजाक करना था, लेकिन उसे गलत संदर्भ में लिया गया।

उस पल को याद करते हुए जब शो के होस्ट ने ट्रंप से पूछा, “आप कमरे में आए और कहा, ‘मैं बॉस हूं।’ उनमें से कितने लोगों ने इस बात पर यकीन किया होगा?”

इस पर ट्रंप ने जवाब दिया कि जब वह उस कमरे में पहुंचे, जहां पहले से ही दुनिया के कई बड़े नेता बैठे थे, तो उन्होंने माहौल हल्का करने के लिए मजाक में यह बात कही थी। उनका कहना है कि इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी, लेकिन यह तेजी से वायरल हो गया।

“मैं बॉस हूं…” G7 बैठक में बोले ट्रंप 

बता दें कि बुधवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने G7 शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन बैठक में प्रवेश करते समय एक मजाकिया टिप्पणी की, जिस पर सब हंस पड़े।

जब वह तीन दिवसीय जी7 समिट के अंतिम दिन की सुबह की बैठक में पहुंचे, तो बाकी देश के नेता पहले से अपनी सीटों पर बैठे हुए थे। उसी दौरान ट्रंप ने अंदर आते हुए कहा, “मैं बॉस हूं।”

इसी हंसी-मजाक के बीच, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इस टिप्पणी को हल्के-फुल्के अंदाज में लिया। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने पूछा, “आप कैसे हैं?” ट्रंप ने जवाब दिया, “अच्छा हूं, धन्यवाद।”

G7 समिट का आयोजन कैसे होता है, और इसमें कितने देश शामिल हैं?

गौरतलब है कि G7 देश बारी-बारी से कार्यक्रमों की मेजबानी और आयोजन करते हैं। इस बार फ्रांस को पिछले साल के मेजबान कनाडा से G7 की अध्यक्षता मिली थी और 2027 में यह अमेरिका को सौंपी जाएगी।

वहीं, इस समूह का पहला शिखर सम्मेलन 1975 में फ्रांस के रैम्बौइलेट में हुआ था। इसमें छह देशों – फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका – के नेता एक साथ आए थे। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद आई सबसे बड़ी आर्थिक मंदी से उबरने की गति तेज करने के तरीकों पर विचार-विमर्श किया था। अगले साल कनाडा भी इसमें शामिल हो गया, जिससे यह G7 बन गया।

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