संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 मेंबर सीक्रेट वोटिंग के जरिए इन उम्मीदवारों के समर्थन का अंदाजा लगा रहे हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। आज शुक्रवार को दूसरे दौर का अनौपचारिक मतदान होगा। इसके बाद भी कई अनौपचारिक पोल हो सकते हैं, जिनमें धीरे-धीरे उम्मीदवारों की संख्या कम होगी। अक्टूबर में औपचारिक चुनाव हो सकते हैं। UN चीफ कैसे चुना जाता है? संयुक्त राष्ट्र का महासचिव सीधे जनता या सभी देशों के वोट से नहीं चुना जाता। पहले सुरक्षा परिषद उम्मीदवारों पर विचार करती है और गुप्त मतदान के जरिए यह पता लगाती है कि किस उम्मीदवार को कितना समर्थन मिल रहा है। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ने के लिए कम से कम 9 वोट मिलने जरूरी हैं। लेकिन 9 वोट हासिल करना ही काफी नहीं है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस में से किसी एक का वीटो भी उम्मीदवार के खिलाफ नहीं होना चाहिए। इसके बाद सुरक्षा परिषद जिस उम्मीदवार पर सहमत होती है, उसका नाम संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजा जाता है। महासभा की मंजूरी के बाद वह संयुक्त राष्ट्र का नया महासचिव बनता है। गुटेरेस का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए उससे पहले नए महासचिव के चयन की प्रक्रिया पूरी करने की तैयारी है। इस रेस में शामिल 8 उम्मीदवारों का बैकग्राउंड अलग-अलग है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति, वरिष्ठ राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के बड़े पदों पर काम कर चुके लोग शामिल हैं। जानते हैं कौन-कौन इस दौड़ में है और किसकी क्या दावेदारी है। 1. रेबेका ग्रिन्सपैन- कोस्टा रिका 70 साल की रेबेका ग्रिन्सपैन फिलहाल इस रेस में सबसे आगे चल रही हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में उन्हें सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। ग्रिन्सपैन कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति हैं और संयुक्त राष्ट्र के व्यापार एवं विकास संगठन की प्रमुख हैं। उन्होंने महासचिव पद के लिए प्रचार करने के लिए अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों से छुट्टी ली है। अगर ग्रिन्सपैन चुनी जाती हैं तो वह संयुक्त राष्ट्र की पहली महिला और पहली यहूदी महासचिव होंगी। उनके माता-पिता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप से भागे यहूदी शरणार्थी थे। विवाद: UNDP में काम करने के दौरान महंगे निजी विमान के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे थे। दुबई से ले जाने के लिए UN का चार्टर्ड विमान इस्तेमाल किया, जिसका खर्च करीब 40 हजार डॉलर था। 2. मिशेल बाचेलेट- चिली 74 साल की मिशेल बाचेलेट चिली की समाजवादी नेता हैं। वह 2006 में चिली की पहली महिला राष्ट्रपति बनी थीं। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के रूप में काम किया। मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए बाचेलेट ने चीन के शिनजियांग में उइगर मुसलमानों की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की थी। इसे लेकर चीन ने उनकी आलोचना की थी। बाचेलेट को मेक्सिको और ब्राजील का समर्थन मिला है। हालांकि, दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जोस एंतोनियो कास्ट के सत्ता में आने के बाद चिली ने उनका समर्थन वापस ले लिया। अमेरिका भी उनके गर्भपात के अधिकारों से जुड़े रुख को लेकर उनकी आलोचना करता रहा है। विवाद: बाचेलेट ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए भारत के कश्मीर और नागरिकता से जुड़े मामलों पर सवाल उठाए थे। 2019 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में संचार पर रोक और नेताओं की हिरासत पर चिंता जताई थी। भारत ने उनके बयान को गलत और अनुचित बताते हुए खारिज कर दिया था। 3. मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा- इक्वाडोर 61 साल की मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। एस्पिनोसा का कहना है कि दुनिया की साझा समस्याओं से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सबसे अहम वैश्विक मंच है। हालांकि, वह संगठन में बड़े सुधार की भी वकालत करती हैं। उनकी उम्मीदवारी को एंटीगुआ और बारबुडा का समर्थन मिला है, लेकिन उनके अपने देश इक्वाडोर ने उनका समर्थन नहीं किया है। विवाद: एस्पिनोसा के राजनीतिक करियर में विवाद भी रहे हैं। 2019 में इक्वाडोर की संसद में उन्हें पद से हटाने की कोशिश हुई थी। उन पर विदेश मंत्री रहते हुए जूलियन असांजे को नागरिकता देने और कोलंबिया सीमा पर सुरक्षा संकट से ठीक से न निपटने के आरोप लगे थे। हालांकि, उन्हें हटाने के लिए जरूरी वोट नहीं मिले और वह पद पर बनी रहीं। 4. राफेल मारियानो ग्रॉसी- अर्जेंटीना 65 साल के राफेल मारियानो ग्रॉसी अर्जेंटीना के करियर राजनयिक हैं। वह 2019 से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के (IAEA) प्रमुख हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूक्रेन के जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र को लेकर ग्रॉसी पिछले कुछ सालों से चर्चा में रहे हैं। महासचिव पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्होंने IAEA चीफ का पद नहीं छोड़ा है। उनका कहना है कि पद छोड़ना अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा। ग्रॉसी चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया में होने वाले बड़े संकटों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए और संगठन में जरूरी बदलाव किए जाएं। विवाद: ईरान इन पर पक्षपात करने का आरोप लगाता रहा है। 2025 में IAEA की रिपोर्ट के बाद ईरान ने कहा था कि इससे उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला। ग्रॉसी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि रिपोर्ट जांच के आधार पर तैयार की गई थी। 5. कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट- गुयाना 52 साल की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट गुयाना की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह गुयाना के आदिवासी समुदाय से आती हैं और सिर्फ 27 साल की उम्र में मंत्री बनी थीं फिलहाल वह संयुक्त राष्ट्र में अपने देश की राजदूत हैं। उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया में अपनी विश्वसनीयता फिर से स्थापित करने की जरूरत है। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं 6. इवोन ए-बाकी- इक्वाडोर 75 साल की इवोन ए-बाकी इक्वाडोर की राजनयिक और नेता हैं। वह अमेरिका में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। इस दौरान उनके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे संबंध रहे। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव टोंगा ने रखा है। खाड़ी देशों से भी उनके अच्छे रिश्ते हैं। वह कतर में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। विवाद: डोनाल्ड ट्रम्प से पुरानी दोस्ती है। 2004 में इक्वाडोर में मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता कराने में भी उनकी भूमिका थी, तब ट्रम्प इस प्रतियोगिता के मालिक थे। विरोधी आरोप लगाते हैं कि ट्रम्प से उनके निजी संबंधों का इस्तेमाल इक्वाडोर-अमेरिका संबंधों में कितना किया जा रहा है। 7. मैकी साल- सेनेगल 64 वर्षीय मैकी साल सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति हैं। वह अफ्रीकी संघ के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं। मैकी अपने अभियान में शांति और विकास को सबसे जरूरी मुद्दा बता रहे हैं। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव बुरुंडी ने रखा था और जुलाई में सेनेगल ने भी उनका समर्थन कर दिया। विवाद: राष्ट्रपति रहते हुए 2021 से 2024 के बीच सेनेगल में कई हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों को संभालने के उनके तरीके पर सवाल उठे थे। इस दौरान कई लोगों की मौत हुई थी। 8. ओलारा ओटुन्नु- युगांडा 75 साल के ओलारा ओटुन्नु संयुक्त राष्ट्र में युगांडा के राजदूत भी रह चुके हैं। वह कुछ समय के लिए अपने देश के विदेश मंत्री भी रहे। 2011 में उन्होंने युगांडा पीपुल्स कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था। हालांकि, वह लंबे समय से सत्ता में मौजूद राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी से चुनाव हार गए। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं पहले दौर की वोटिंग में ग्रिन्सपैन को 10 वोट पहले दौर की अनौपचारिक वोटिंग यानी पहला स्ट्रॉ पोल 30 जुलाई 2026 को हुआ था। इसमें कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। तब रेस में 7 उम्मीदवार थे। इवोन ए-बाकी इस वोटिंग में शामिल नहीं थीं। वह 18 अगस्त को आठवीं उम्मीदवार बनीं।

यूपी–जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 के तहत जापानी प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की महिला सुरक्षा के लिए संचालित वीमेन पावर लाइन 1090 का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने यहां महिलाओं की सुरक्षा, शिकायतों पर त्वरित सहायता, काउंसलिंग और जागरूकता से जुड़ी व्यवस्थाओं को समझा। इस दौरान उत्तर प्रदेश के अधिकारियों और जापानी प्रतिनिधिमंडल के बीच महिला सुरक्षा, स्कूली स्तर पर जागरूकता, बच्चों को सुरक्षा संबंधी जानकारी देने और महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने के तरीकों पर विस्तार से अनुभव साझा किए गए।
दौरे के दौरान जापानी प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि वीमेन पावर लाइन 1090 महिलाओं को कठिन, भय या उत्पीड़न की स्थिति में सहायता उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में कार्य करती है। प्रतिनिधिमंडल ने यह समझने में रुचि दिखाई कि किसी महिला की ओर से सहायता के लिए संपर्क किए जाने के बाद उसकी समस्या को किस तरह समझा जाता है और कैसे उस तक उचित सहायता पहुंचाई जाती है।
शिकायत से काउंसलिंग तक की प्रक्रिया समझी
जापानी प्रतिनिधिमंडल ने 1090 की कार्यप्रणाली को करीब से समझते हुए कॉल रिसीव करने से लेकर महिला की समस्या को समझने, आवश्यक काउंसलिंग उपलब्ध कराने और जरूरत के अनुसार संबंधित सहायता तंत्र से जोड़ने की प्रक्रिया की जानकारी ली। अधिकारियों ने बताया कि ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं की बात ध्यानपूर्वक सुनना और उन्हें सहज एवं सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेष रूप से काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग को लेकर चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि कई बार महिलाएं डर, तनाव या झिझक के कारण अपनी बात खुलकर नहीं रख पातीं। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित कर्मी संवेदनशीलता के साथ उनकी बात सुनते हैं, उनकी चिंताओं को समझते हैं और उन्हें उपयुक्त सहायता एवं मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की दिशा में काम करते हैं।
स्कूलों में बचपन से सुरक्षा जागरूकता पर जोर
बैठक के दौरान महिला सुरक्षा को केवल शिकायत निवारण तक सीमित न रखते हुए प्रीवेंटिव अवेयरनेस पर भी चर्चा हुई। जापानी प्रतिनिधिमंडल और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने स्कूलों में विद्यार्थियों को कम उम्र से ही सुरक्षा, अधिकारों और जरूरत पड़ने पर सहायता लेने के तरीकों के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता पर विचार साझा किए। बच्चों में पांच वर्ष की आयु के बाद सुरक्षा संबंधी जागरूकता विकसित करने के तरीकों पर भी चर्चा हुई। इसमें बच्चों को अपनी सुरक्षा, संवाद करने और किसी कठिन परिस्थिति में भरोसेमंद व्यक्ति से मदद मांगने के बारे में सहज तरीके से जानकारी देने के दृष्टिकोण पर विचार किया गया।
जापान और यूपी के अनुभवों पर हुआ संवाद
जापानी प्रतिनिधिमंडल ने जापान में महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों के बारे में अपने अनुभव साझा किए। वहीं उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने प्रदेश में संचालित महिला सुरक्षा और सहायता तंत्र की जानकारी दी। दोनों पक्षों ने माना कि जापान और उत्तर प्रदेश की सामाजिक एवं संस्थागत परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए किसी भी मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समझना और लागू करना आवश्यक है। इसके बावजूद महिला सुरक्षा, बच्चों में जागरूकता, प्रभावी संवाद, काउंसलिंग और महिलाओं को सहायता उपलब्ध कराने जैसे क्षेत्रों में अनुभवों का आदान-प्रदान दोनों पक्षों के लिए उपयोगी हो सकता है।
सुरक्षा से आत्मविश्वास और सशक्तीकरण तक
चर्चा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि महिला सुरक्षा का उद्देश्य केवल किसी घटना के बाद सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना विकसित करना भी है। जब महिलाएं यह महसूस करती हैं कि कठिन परिस्थिति में उन्हें समय पर सहायता मिल सकती है, तो वे अपनी समस्याओं को सामने रखने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में अधिक सहज महसूस करती हैं। प्रतिनिधिमंडल ने माना कि महिला सुरक्षा, जागरूकता, काउंसलिंग और सहायता सेवाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इन व्यवस्थाओं को मजबूत करने से महिलाओं की सामाजिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलता है।
अनुभवों के आदान-प्रदान से सहयोग की नई संभावनाएं
यूपी–जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 के तहत हुआ यह दौरा भारत-जापान संबंधों के सामाजिक आयाम को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण जैसे विषयों पर दोनों पक्षों के बीच अनुभव साझा होने से भविष्य में जागरूकता, काउंसलिंग, बच्चों की सुरक्षा शिक्षा और महिला सहायता सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएं बन सकती हैं। जापानी प्रतिनिधिमंडल ने वीमेन पावर लाइन 1090 की व्यवस्था को समझते हुए उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए विकसित किए गए संस्थागत तंत्र की जानकारी हासिल की। वहीं इस संवाद से उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को जापान में अपनाई जा रही महिला सुरक्षा और जागरूकता की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझने का अवसर मिला।
Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व इस साल 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। लेकिन इस साल रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण लगने से एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण से क्या राखी का त्योहार प्रभावित होगा? इससे राखी बांधने के मुहूर्त पर क्या असर होगा? और सूतक काल कब से कब तक रहेगा?
बता दें, इस साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में घटित होगा। इस दौरान चंद्रमा कुंभ राशि में संचार करेंगे, जहां पहले से ही छाया ग्रह राहु विराजमान हैं और केतु की भी दृष्टि बनी रहेगी। साथ ही सूर्य भी केतु से पीड़ित रहेंगे क्योंकि सिंह राशि में सूर्य और केतु की युति बन रही है। यह चंद्र ग्रहण 3 घंटे और 18 मिनट तक चलेगा। आइए जानें चंद्र ग्रहण के साये में कैसे मनेगा राखी का पर्व?
चंद्रग्रहण 2026 तारीख और समय
भारतीय समय के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन लगने वाले चंद्र ग्रहण की शुरुआत सुबह 8 बजकर 4 मिनट से होगी। चंद्र ग्रहण का मध्य काल 9 बजकर 43 मिनट पर होगा और समापन 11 बजकर 22 मिनट पर होगा। चंद्रग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 18 मिनट की रहने वाली है। चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई देने वाला नहीं है इसलिए सूतक काल मान्य नहीं होगा।
28 अगस्त को होगा चंद्र ग्रहण
28 अगस्त को लगने वाला चंद्र ग्रहण आंशिक होगा। इस दौरान चंद्रमा का बड़ा भाग पृथ्वी की छाया में ढक जाएगा, जिससे चंद्रमा गहरे लाल या तांबे के रंग जैसा नजर आने लगेगा, इसी वजह से इसे ब्लड मून भी कहा जाएगा। यह ग्रहण दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (पाकिस्तान, अफगानिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र समेत सऊदी अरब, शारजाह, ईराक, ईरान आदि), अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पूरी तरह दिखाई देने वाला है।
भारत में नहीं दिखेगा चंद्र ग्रहण
28 अगस्त को रक्षा बंधन के दिन लगने वाला साल का अंतिम चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और रक्षाबंधन के पर्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ना ही राखी बांधने का मुहूर्त बदलेगा। आप बिना किसी बाधा के त्योहार मना सकते हैं।
भद्रा मुक्त रहेगा रक्षा बंधन का पर्व
इस बार रक्षाबंधन पर सबसे अच्छी बात यह है कि भद्राकाल नहीं है। भद्रा रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व यानी 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे से रात्रि 9:32 बजे तक रहेगी। इसलिए 28 अगस्त को सूर्योदय के बाद बिना किसी बाधा के पूरे दिन राखी बांधी जा सकती है।
Chandra Grahan 2026: साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को लगने जा रहा है। हालांकि यह आंशिक चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इस वजह से देश में इसकी वजह से पारंपरिक तौर पर लगने वाला सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसके बावजूद हिंदू ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण काल को आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक इस चंद्र ग्रहण का असर अलग-अलग राशियों पर देखने को मिल सकता है, लेकिन 4 विशेष राशियों वृषभ, कर्क, सिंह और वृश्चिक को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
चंद्र ग्रहण का समय और भारत में स्थिति
ग्रहण की तारीख : 28 अगस्त 2026
प्रारंभ समय : सुबह 8:04 बजे
चरम काल : सुबह 9:43 बजे
समापन समय : सुबह 11:22 बजे
इन 4 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान
वृषभ राशि : वृषभ राशि के जातकों को इस चंद्र ग्रहण के दौरान अपनी बोली और वित्तीय मामलों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है। वाद-विवाद से बचें, अपने गुस्से पर नियंत्रण रखें और किसी को भी पैसा उधार देने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। जल्दबाजी में लिया गया कोई भी फैसला आपके रिश्तों में खटास ला सकता है या आर्थिक परेशानी खड़ी कर सकता है।
कर्क राशि : कर्क राशि का स्वामी स्वयं चंद्रमा है, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण का प्रभाव इस राशि पर अधिक माना जाता है। इस अवधि में कर्क राशि के लोगों को तनाव से बचने, अनावश्यक चिंताओं से दूर रहने, परिवार के सदस्यों के साथ धैर्यपूर्वक बातचीत करने और पर्याप्त आराम करने की सलाह दी जाती है।
सिंह राशि : सिंह राशि का स्वामी सूर्य है, जिसका चंद्रमा के साथ महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संबंध होता है। ग्रहण काल के दौरान सिंह राशि के जातकों को अपने वर्कप्लेस पर व्यवहार ठीक बनाए रखना चाहिए। अपने सीनियर्स के साथ बेवजह की बहस से बचें और कोई भी महत्वपूर्ण बयान या निर्णय लेने से पहले गहराई से विचार करें।
वृश्चिक राशि : वैदिक ज्योतिष में वृश्चिक राशि को चंद्रमा की नीच राशि से जोड़ा जाता है। इसलिए ज्योतिषियों ने वृश्चिक राशि के जातकों को वित्त, पारिवारिक मामलों और भरोसे के संदर्भ में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। पैसों से जुड़े बड़े फैसले लेने से बचें और किसी भी व्यक्ति पर अंधाधुंध भरोसा न करें।
चंद्र ग्रहण के दौरान करें ये ज्योतिषीय उपाय
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कमजोर चंद्रमा को मजबूत करने और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे उपाय हैं जो फलदायी माने जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना करने से चंद्रमा के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। अपनी माता का आदर-सत्कार करें और उनका आशीर्वाद लें। दूध, चावल या अन्य सफेद चीजों का दान करना शुभ माना जाता है। मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए चंद्रमा से जुड़े मंत्रों का जाप और ध्यान करें।
आपको बता दें कि 28 अगस्त को होने वाला यह चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है जबकि इसके आध्यात्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन परंपराओं को मानने वाले लोगों के लिए इस दौरान शांत रहना, जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना और सकारात्मक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना लाभदायक माना जाता है।
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Sugar Price Rise: देश में त्योहारों के सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतें रॉकेट हुई जा रही हैं। 20 जुलाई को चीनी का भाव 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम था जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। चीनी की कीमतों को लेकर पैनिक की स्थिति न आए, इसके लिए अब सरकार ने इसे लेकर डिटेल में जानकारी जारी की है। इसमें चीनी की बढ़ती कीमतों की असल वजहें और इसे कंट्रोल करने के उपायों के बारे में बताया गया है। आपको बता दें कि सरकार ने एक दशक के बाद पहली बार चीनी के आयात का भी फैसला लिया है, जिसे इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी रिलीज के मुताबिक सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और लोगों को उचिद दर पर चीनी उपलब्ध कराने के लिए तमाम कदम उठाए जा रहे हैं।
क्या एथेनॉल की वजह से बढ़ीं कीमतें? सरकार ने खारिज किया दावा
सरकार ने उन दावों को पूरी तरह से गलत बताया है जिनमें चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को माना जा रहा था। सरकार का दावा है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है। देश में बनाए जा रहे एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाजों, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है।
फिर चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?
सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी किसी एक वजह से नहीं हो रही है। इसके पीछे कई वजहें एक साथ जिम्मेदार हैं। सरकार ने बताया है कि शुरुआती अनुमानों की तुलना में घरेलू उत्पादन कम रहा है। त्योहारों का सीजन नजदीक आने से बाजार में मांग बढ़ी है। इसके अलावा मौसम की मार की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा है। चौथी वजह इंटरनेशनल बाजार में चीनी सप्लाई में कमी को बताया गया है। पांचवीं वजह में सरकार ने माना है कि कुछ तबकों द्वारा चीनी की जमाखोरी भी की गई है।
शुरुआती अनुमानों से कम रहा चीनी का उत्पादन
चालू पेराई सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों द्वारा शुरुआत में इसके 343 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान लगाया गया था। उत्पादन में इस गिरावट की मुख्य वजह गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का लगना और भारी बारिश से हुए जलजमाव को बताया जा रहा है। हालांकि उत्पादन अनुमान से कम रहने के बावजूद अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
दुनिया भर में बढ़ रहे हैं चीनी के दाम
चीनी की किल्लत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि फिलहाल यह एक वैश्विक समस्या है। वर्ष 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा लगभग 33 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। मौसम की विपरीत परिस्थितियों ने इसे ग्लोबली प्रभावित किया है। इंटरनेशनल बाजार में चीनी की कीमतें 30 जून को $474 प्रति टन थीं, जो 20 अगस्त 2026 तक 16% से अधिक बढ़कर $552 प्रति टन पर पहुंच गईं।
एथेनॉल प्रोग्राम से किसानों और मिलों को हुआ फायदा
भारत में आमतौर पर सालाना 320-340 लाख मीट्रिक टम चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280-290 लाख मीट्रिक के आसपास रहती है। सरप्लस उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त स्टॉक के कारण चीनी मिलों के फंड फंस जाते थे जिससे किसानों के गन्ने के भुगतान में देरी होती थी। ऐसे में एक्स्ट्रा चीनी को एथेनॉल में बदलने की पॉलिसी फायदा मिला है। इससे मिलों की फाइनेंशियल स्थिति में भी सुधार आया है। 20 अगस्त तक, 2025-26 चीनी सीजन के गन्ने के 97% बकाए का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।
इसकी वजह से मिलों की सरकारी मदद पर निर्भरता भी घटी है। 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को लगभग ₹14600 करोड़ की सब्सिडी दी गई थी जबकि 2021-22 के बाद से ऐसी किसी सब्सिडी की घोषणा नहीं की गई है। साथ ही, लंबी अवधि में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रही हैं और अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच इनमें सालाना सिर्फ 3% की ही वृद्धि हुई है।
जमाखोरी पर नकेल और त्योहारों से पहले सरकार के 5 बड़े फैसले
बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी पर रोक लगाने तथा आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। देशभर में चीनी व्यापारियों/डीलेरों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है। 1 सितंबर से बल्क कंज्यूमर्स को अपनी 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। जमाखोरी और आर्टिफिशियल किल्लत को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की संयुक्त टीमें मिलों में चीनी के स्टॉक का फिजिकल वेरिफिकेशन कर रही हैं। एहतियाती तौर पर घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति देने का फैसला लिया है।
इसके अलावा राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि इससे त्योहारों के दौरान बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी।
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El Nino Impact on India: प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो का प्रभाव भारत की फूड इकॉनमी के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। जलवायु की यह स्थिति खेती की पैदावार पर असर डाल सकती है जिससे फूड सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा। ऐसा हुआ तो खाने-पीने के सामान पर महंगाई का असर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि भारत सरकार ने इस वित्त वर्ष में खरीफ की फसल को कम नुकसान का अनुमान दिया है पर भारत के विकास आउटलुक में पहले से ही महंगाई के जोखिम ने अपनी जगह बना रखी है।
रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि वित्त वर्ष 2026-27 में फूड और फ्यूल इंफ्लेशन भारत के आथिर्क विकास पर असर डाल सकते हैं। एजेंसी ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 फीसदी से कम है। Ind-Ra के मुताबिक FY27 में रिटेल इंफ्लेशन औसतन 4.9 प्रतिशत रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष में यह सिर्फ 2 फीसदी था। अल नीनो की वजह से फूड इंफ्लेशन बढ़ने के जोखिम को आर्थिक विकास में रुकावट डालने वाले प्रमुख कारकों में से एक माना गया है।
कृषि क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर और खरीफ की स्थिति
वैसे अल नीनो के खतरे के बावजूद मौजूदा खेती की तस्वीर बहुत अधिक चिंताजनक नजर नहीं आ रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्पष्ट किया था कि इस साल के खरीफ उत्पादन पर अल नीनो का कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ इलाकों को छोड़कर अल नीनो का बड़ा असर नहीं दिख रहा है और स्थिति कुल मिलाकर अच्छी बनी हुई है। अधिकांश हिस्सों में फसलों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बारिश हुई है।
देश के कृषि क्षेत्र ने कुछ इलाकों में कम बारिश के बावजूद व्यापक नुकसान से बचाव किया है। 14 अगस्त तक 1016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी, जो इस अवधि तक सामान्य रूप से कवर होने वाले औसत क्षेत्र का 92 प्रतिशत है। यह रकबा पिछले साल के स्तर से सिर्फ 2 फीसदी ही कम है। कृषि मंत्री के मुताबिक बुआई का अंतर काफी कम हुआ है और संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर लगभग 100 रह गई है।
हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति असमान बनी हुई है। कर्नाटक और तेलंगाना में जल संकट का सामना करना पड़ा है जबकि पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बारिश की कमी अधिक देखी गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 12 अगस्त तक कुल मानसूनी घाटा 12 प्रतिशत था। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में 26 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। आपको बता दें कि अल नीनो का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसमें कुछ हिस्से सूखे रह जाते हैं जबकि अन्य हिस्सों में सामान्य या अधिक बारिश होती है।
खाद्य कीमतों और अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का प्रभाव
अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के गर्म होने से होने वाला एक मौसमी बदलाव है। ये वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय परिसंचरण, बारिश और तापमान को बदल देता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर मानसून और कृषि पर देखा जाता है। कमजोर या असमान मानसून उन फसलों की उपज को घटा सकता है जो सिंचाई के बिना पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। उत्पादन में गिरावट से आपूर्ति कम होती है, जिससे थोक और खुदरा कीमतें बढ़ने लगती हैं।
फसल की यह कमी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती बल्कि पूरी फूड सप्लाई चेन (प्रॉक्यूरमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल) पर भी असल डालती है। मुख्य फसलों की कम उपलब्धता से आयात की मांग बढ़ती है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ पड़ता है और देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ता है। Ind-Ra के मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल नीनो की वजह से पैदा हुई महंगाई कच्चे तेल की कम कीमतों से भारत को मिलने वाले फायदे को भी खत्म कर सकती है।
जब अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां या अन्य फसलें कम पैदा होती हैं, तो बाजार में उनकी उपलब्धता घट जाती है। मांग समान रहने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके सीधे असर से खरीद लागत बढ़ जाती है। आखिरकार यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचती है जिससे घरेलू बजट बिगड़ता है। सरकार को भी कीमतें नियंत्रित करने के लिए अपने स्टॉक से अनाज छोड़ने, आयात बढ़ाने या निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। लगातार खाद्य मुद्रास्फीति बने रहने से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश भी कम हो जाती है।
दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो का खतरा
मौजूदा अल नीनो एक बड़े वैश्विक जलवायु संकट का रूप ले रहा है। क्लाइमेट ब्रिंक डैशबोर्ड के मुताबिक प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 30 साल के औसत से लगभग 2.6°C अधिक हो चुका है। पूर्वानुमानों के अनुसार नवंबर तक यह अंतर 3.9°C तक पहुंच सकता है। ऐसा हुआ तो ये 2015 के शक्तिशाली अल नीनो के करीब 3°C के रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) का अनुमान है कि 69 प्रतिशत संभावना है कि यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बन जाएगा। इस वजह से दुनिया के कुछ हिस्से अत्यधिक गर्म और सूखे हो रहे हैं जबकि अन्य इलाकों में मूसलाधार बारिश और बाढ़ आ रही है। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में लंबे सूखे के कारण भीषण जंगलों की आग देखी गई है।
जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह अल नीनो वर्ष 2027 में वैश्विक तापमान में करीब 0.3°C और बढ़ा सकता है। इस वजह से ग्लोबल टेंप्रेचर औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.76°C ऊपर पहुंच सकता है, जिससे 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है।
मैन मेड ग्लोबल वार्मिंग भी अल नीनो के असर को और घातक बना रही है। गर्म हवा अधिक नमी सोखती है जिससे अति-बारिश की तीव्रता बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ उच्च तापमान मिट्टी की नमी सुखाकर सूखे को और भीषण बना देता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कोरल डेटा बताते हैं कि पिछली एक सदी में अल नीनो की तीव्रता में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत के लिए तात्कालिक निष्कर्ष यही है कि भले ही कृषि क्षति अभी व्यापक न हुई हो, लेकिन मानसून के घाटे और अल नीनो के मजबूत होने से खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर जोखिम लगातार मंडरा रहा है।
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Samsung ने आखिरकार अपने फोल्डेबल स्मार्टफोन में Ultra बैज पेश कर दिया है। कंपनी का नया Galaxy Z Fold 8 Ultra अब तक का सबसे ज्यादा क्षमता वाला Fold मॉडल है। डिस्प्ले, कैमरा और बैटरी के मामले में इसे पिछले सभी Fold स्मार्टफोन से आगे ले जाया गया है। हालांकि, ₹1,99,999 की शुरुआती कीमत इसे लग्जरी स्मार्टफोन कैटेगरी में खड़ा करती है। ऐसे में 2026 में बड़ा सवाल यही है कि क्या एक फोल्डेबल फोन पर इतना पैसा खर्च करना वाकई सही फैसला है?
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8-इंच का बड़ा और शानदार डिस्प्ले
Galaxy Z Fold 8 Ultra की सबसे बड़ी खूबियों में इसका 8-इंच QXGA+ Dynamic AMOLED 2X इनर डिस्प्ले शामिल है। इसके साथ 6.5-इंच का कवर डिस्प्ले मिलता है। बड़ी स्क्रीन के बावजूद फोन को खोलने पर इसकी मोटाई सिर्फ 4.1mm है और वजन 215 ग्राम है, जो Fold 7 के बराबर है। डिस्प्ले की पीक ब्राइटनेस अब 3,000 निट्स तक पहुंच गई है। इसमें एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग भी दी गई है, जिससे तेज धूप में भी स्क्रीन को देखना आसान रहता है। टेक यूजर्स के लिए यह खासतौर पर उपयोगी है, क्योंकि बड़ी इनर स्क्रीन पर वीडियो देखने, डॉक्यूमेंट पढ़ने और मल्टीटास्किंग का अनुभव बेहतर होता है।
Snapdragon 8 Elite Gen 5 for Galaxy से लैस
फोन में Snapdragon 8 Elite Gen 5 for Galaxy चिपसेट दिया गया है। Samsung के मुताबिक, Fold 7 की तुलना में CPU, GPU और NPU परफॉर्मेंस में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में ऐप्स तेजी से खुलते हैं और हैवी गेम्स भी आसानी से चलते हैं। हालांकि, इस प्रोसेसर का सबसे बड़ा फायदा मल्टीटास्किंग में दिखाई देता है। बड़ी स्क्रीन पर दो फुल-साइज ऐप्स को एक साथ चलाया जा सकता है और दोनों के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।
200MP कैमरा और ज्यादा दमदार अल्ट्रा-वाइड सेंसर
कैमरा सेटअप में भी Samsung ने बड़ा अपग्रेड किया है। फोन के रियर पैनल पर:
- 200MP प्राइमरी कैमरा
- 50MP अल्ट्रा-वाइड कैमरा
- 10MP टेलीफोटो कैमरा
- 3x ऑप्टिकल जूम मिलता है।
खास बात यह है कि अल्ट्रा-वाइड कैमरा Fold 7 के 12MP सेंसर से सीधे 50MP पर पहुंच गया है। दिन की रोशनी में तस्वीरों में अच्छी डिटेल और आकर्षक कलर मिलते हैं। अपग्रेड किया गया अल्ट्रा-वाइड कैमरा भी पिछली Fold सीरीज की तुलना में ज्यादा बेहतर और भरोसेमंद कैमरा अनुभव देता है।
5,000mAh बैटरी से बढ़ी बैटरी लाइफ
Galaxy Z Fold 8 Ultra में अब 5,000mAh बैटरी दी गई है, जबकि Fold 7 में 4,400mAh की बैटरी थी। Samsung के अनुसार, यह फोन 27 घंटे तक वीडियो प्लेबैक दे सकता है। इसके साथ 45W वायर्ड चार्जिंग और वायरलेस चार्जिंग का सपोर्ट मिलता है। बड़ी इनर स्क्रीन का लंबे समय तक इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के लिए ज्यादा बैटरी क्षमता निश्चित तौर पर राहत दे सकती है।
कीमत ₹2 लाख से शुरू, S Pen की कमी खलेगी
Galaxy Z Fold 8 Ultra की कीमत स्टोरेज के हिसाब से ₹1,99,999 से ₹2,59,999 तक जाती है। यानी यह फोन साफ तौर पर प्रीमियम से आगे निकलकर लग्जरी स्मार्टफोन कैटेगरी में पहुंच जाता है। हालांकि, इतनी कीमत के बावजूद इसमें S Pen सपोर्ट नहीं दिया गया है। प्रोडक्टिविटी पर फोकस करने वाले फोल्डेबल फोन में यह एक बड़ी कमी मानी जा सकती है।
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क्या Fold 7 यूजर्स को अपग्रेड करना चाहिए?
अगर बजट आपके लिए बड़ी चिंता नहीं है और आपको सबसे ज्यादा क्षमता वाला Android फोल्डेबल चाहिए, तो Galaxy Z Fold 8 Ultra फिलहाल बेहद आकर्षक विकल्प है। लेकिन Fold 7 इस्तेमाल करने वालों के लिए अपग्रेड जरूरी नहीं लगता, क्योंकि बदलाव ज्यादा evolutionary हैं, revolutionary नहीं। वहीं, स्टैंडर्ड Galaxy Z Fold 8 Ultra से ₹20,000 सस्ता और हल्का है। इसलिए जो यूजर ज्यादा पोर्टेबिलिटी को प्राथमिकता देते हैं और हर स्पेसिफिकेशन में सबसे ऊपर जाने की जरूरत नहीं समझते, उनके लिए Fold 8 ज्यादा व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेपी मॉर्गन की हालिया इंडिया स्ट्रैटेजी रिपोर्ट में निफ्टी के लिए 27,000 का बेस-केस टारगेट बरकरार रखा गया है। ब्रोकरेज का कहना है के बेहतर होते अर्निंग आउटलुक और घरेलू मांग में मजबूती को वजह से निफ्टी को सपोर्ट मिलेगा। जेपी मॉर्गन को उम्मीद है कि साल 2026 में MSCI इंडिया की अर्निंग्स 11 फीसदी और साल 2027 में 13 फीसदी बढ़त देखने को मिल सकती है। इसका निफ्टी के लिए’बुल-केस’टारगेट 30,000 के लेवल का है। जबकि ‘बेयर-केस’टारगेट 20,500 के लेवल का है।
ANI के मुताबिक जेपी मॉर्गन ने कहा है कि उसका झुकाव मुख्य रूप से तेज ग्रोथ वाले घरेलू साइक्लिकल शेयरों की ओर है। निफ्टी-50 के लिए जेपी मॉर्गन के बेस/बुल/बेयर केस टारगेट 27,000/30,000/20,500 के हैं।
इस ब्रोकरेज फर्म का कहना है वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही का अर्निंग्स सीजन उम्मीद से बेहतर रहा। पहली तिमाही में MSCI इंडिया कंपनियों का रेवेन्यू सालाना आधार पर 19 फीसदी बढ़ा,जबकि टैक्स के बाद मुनाफा 16 फीसदी बढ़ा। अर्निंग्स भी उम्मीद से बेहतर रही। लगभग 58 प्रतिशत MSCI इंडिया कंपनियों की अर्निंग्स उम्मीद से बेहतर रहीं,जबकि 24 प्रतिशत कंपनियां अनुमानों पर खरी नहीं उतर पाईं।
मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों के मुनाफे में मजबूत बढ़त
मार्केट-कैप के हिसाब से छोटी कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर रहा। जेपी मॉर्गन के अनुसार एनर्जी सेक्टर को छोड़कर देखें तो मिडकैप 100 कंपनियों का टैक्स के बाद का मुनाफा (PAT) सालाना आधार पर 42 फीसदी बढ़ा है। जबकि, निफ्टी स्मॉलकैप 100 कंपनियों का PAT 39 फीसदी बढ़ा है। इस तिमाही में मटीरियल्स,यूटिलिटीज,इंडस्ट्रियल्स और कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी सेक्टर में ज्यादा ग्रोथ देखने को मिली। ग्लोबल परेशानियों के बावजूद,मजबूत घरेलू मांग के चलते भारतीय कंपनियों को सहारा मिला।
पावर,ऑटो और डिफेंस सेक्टर में दिख रहा दम
जेपी मॉर्गन की राय है कि आगे बिजली की मांग,कैपिटल एक्सपेंडिचर और ग्रिड साइकल से जुड़े शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा डिफेंस, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर स्टेपल्स जैसे सेक्टरों में तेजी आ सकती है।
पहली तिमाही में भारत में बिजली की पीक डिमांड लगभग 271 GW तक पहुंच गई। ऑटोमोबाइल सेक्टर में कंपनियों को वॉल्यूम में बढ़त और एक्सपोर्ट से फायदा हुआ जबकि कंज्यूमर स्टेपल्स में वॉल्यूम-आधारित रिकवरी के संकेत दिखे। आगे भी इनमें मजबूती काय रह सकती है।
ANI के मुताबिक जेपी मॉर्गन का भारत के इक्विटी को लेकर नजरिया मजबूत अर्निंग और घरेलू मांग की उम्मीदों पर टिका हुआ है। वहीं, जियोपॉलिटिकल घटनाएं और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं जोखिम पैदा कर सकती हैं।
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सरकार को उम्मीद है कि एपल और गूगल जैसी दुनिया की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनियां भारत को अपना बड़ा प्रोडक्शन हब बना सकती हैं। एपल आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी भारत में बनाना शुरू कर सकती है। गूगल एक्सपोर्ट्स के लिए भारत में उन प्रोडक्ट्स का उत्पादन शुरू कर सकती है, जिनका भी वह चीन में उत्पादन कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने यह उम्मीद जताई है। 21 अगस्त को मनीकंट्रोल के एक सवाल के जवाब में उन्होंने ये बातें कहीं।
एपल भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी बनाएगी
गूगल के अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन से हटाने की खबरों पर वैष्णव ने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि गूगल उन प्रोडक्ट्स के एक बड़े हिस्से का उत्पादन भारत में कर सकती है, जिनका वह एक्सपोर्ट करती है। उन्होंने कहा कि सरकार भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए एपल से भी बात कर रही है। उम्मीद है कि वह भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स का भी उत्पादन करेगी।
गूगल ने भारत में पिक्सल स्मार्टफोन के उत्पादन के प्लान के बारे में बताया था
एपल और गूगल भारत में अपने हार्डवेयर के उत्पादन का विस्तार करना चाहती हैं। गूगल ने अक्तूबर 2023 में कहा था कि वह इंडिया में पिक्सल स्मार्टफोन की मैन्युफैक्चरिंग करेगी। उसका प्लान पिक्सल 8 से इसकी शुरुआत करने का था। इसके लिए वह पार्टनरशिप के लिए भारतीय और विदेशी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों से बातचीत कर रही थी।
डिक्सन टेक्नोलॉजीज गूगल पिक्सल की एसेंबलिंग करती है
Dixon Technologies उन कंपनियों में शामिल है, जो भारत में Google Pixel स्मार्टफोन की एसेंबलिंग करती हैं। गूगल ने 2025 में भारत में पिक्सल रेंज के स्मार्टफोन का उत्पादन बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी। उसका प्लान एक्सपोर्ट्स के लिए इंडिया में अपने स्मार्टफोन का उत्पादन करने का था।
गूगल चीन की जगह भारत में बनाएगी फोन, वॉचेज और इयरबड्स
इस हफ्ते आईं खबरों में बताया गया कि गूगल 2027 से चीन में पिक्सल फोन, वॉचेज और वायरलेस इयरबड्स का उत्पादन बंद करना चाहती है। उसका प्लान चीन की जगह इंडिया और वियतनाम में इन उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग करने का है। गूगल ने सार्वजनिक रूप से इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है।
एपल भारत में 2017 से ही आईफोन की एसेंबलिंग कर रही है
एपल पहले से इंडिया में काफी ज्यादा उत्पादन कर रही है। उसने 2017 में भारत में अपने आईफोन की एसेंबलिंग शुरू कर दी थी। तब से उन्हें Foxconn और टाटा ग्रुप सहित कई सप्लायर्स के जरिए इंडिया में अपना प्रोडक्शन बेस बढ़ाया है। काउंटरप्वाइंट रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, 2026 में एपल के आईफोन के कुल उत्पादन में इंडिया की हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी रह सकती है। एपल ने अपने आईफोन के लिए इंडिया को एक एक्सपोर्ट बेस बनाया है।

अगले महीने अफ़गानिस्तान और भारत के बीच होने वाली तीन मैचों की T 20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज़ की तारीखों में बदलाव की कोशिश हो रही है। मैचों को रीशेड्यूल करने का कोई औपचारिक फ़ैसला अभी तक नहीं लिया गया है, लेकिन अफ़गानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (ACB) और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के बीच बातचीत चल रही है। एसीबी शेड्यूल को कुछ दिन पहले करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें 14 सितंबर (गणेश चतुर्थी के दिन) को एक मैच कराने की संभावना भी शामिल है।
ये तीन मैच मूल रूप से 13, 15 और 17 सितंबर को होने थे, लेकिन पता चला है कि बीसीसीआई को इन्हें 11, 13 और 14 सितंबर को कराने का अनुरोध मिला है, ताकि उन तारीखों के आस-पास भारत में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का ध्यान रखा जा सके। माना जा रहा है कि एसीबी ने बीसीसीआई को यह प्रस्ताव देते समय अपने स्टेकहोल्डर्स के अनुरोध का भी हवाला दिया है।
माना जा रहा है कि उन्होंने तर्क दिया है कि बदले हुए शेड्यूल पर मैच कराने से – जिसमें त्योहार के दिन का मैच भी शामिल है – व्यूअरशिप और स्टेडियम में दर्शकों की संख्या पर सकारात्मक असर पड़ेगा। नई दिल्ली का अरुण जेटली स्टेडियम तीनों मैचों की मेज़बानी करेगा। यह एक अभूतपूर्व सीरीज़ है – पहली बार अफ़गानिस्तान भारत में ही भारत की मेज़बानी करेगा (हालांकि मैच भारत में ही हो रहे हैं)।
BIG UPDATE ON INDIA vs AFGHANISTAN T20I SERIES!
As per Cricbuzz, the 3-match T20I series is set to be rescheduled, with the Afghanistan Cricket Board proposing September 11, 13 & 14 as the new dates.
The reason? ACB reportedly wants the matches to be played… pic.twitter.com/iUVeLTUEQW
— CricInformer (@CricInformer) August 21, 2026
एसीबी अधिकारियों और सीरीज़ से जुड़े स्टेकहोल्डर्स का मानना है कि बीसीसीआई इस अनुरोध को मान सकता है। बांग्लादेश के ख़िलाफ़ सीरीज़ के रद्द होने की संभावना के कारण, श्रीलंका में टेस्ट सीरीज़ (27 अगस्त) के समापन और एशियाई खेलों (24 सितंबर) की शुरुआत के बीच भारतीय टीम के पास खाली समय है। दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए), जो इन मैचों की मेज़बानी करेगा, ने कहा कि उसे किसी भी बदले हुए प्लान के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
जून में, भारत ने अफ़गानिस्तान के साथ एक टेस्ट और तीन मैचों की वनडे सीरीज़ खेली थी। आने वाली टी 20 सीरीज़ से दोनों टीमों के बीच तीनों फ़ॉर्मेट में मुकाबले पूरे हो जाएंगे। बीसीसीआई सेक्रेटरी देवजीत सैकिया ने पिछली तारीखों की घोषणा करते हुए कहा था, “हमने हाल ही में जून में अफ़गानिस्तान के साथ टेस्ट और वनडे सीरीज़ खेली थी, और इस टी 20 सीरीज़ के साथ ही दोनों टीमें तीनों फ़ॉर्मेट में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खेल चुकी होंगी।”



