बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- दान का हर पैसा दान पेटी या ऑनलाइन खाते में ही जमा हो

बांके बिहारी मंदिर के चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- दान का हर पैसा दान पेटी या ऑनलाइन खाते में ही जमा हो

shri banke bihari temple

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में दान की रकम की कथित हेराफेरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि दान का हर पैसा दान पेटी या ऑनलाइन खाते में ही जमा हो और मंदिर की आय-व्यय व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता रखी जाए। ALSO READ: तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, उत्पीड़न मामले में आत्मसमर्पण से छूट की याचिका खारिज

 

क्या है पूरा मामला? 

सुप्रीम कोर्ट ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की मैनेजमेंट कमेटी की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। मंदिर में कथित चंदा चोरी को लेकर सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने हाई पावर कमेटी की एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की। उन्होंने तस्वीरें पेश करते हुए कहा कि मामले बहुत गंभीर हैं और इसमें तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक वीडियो है। तीन लोग 'गोलक' (पारंपरिक दान पेटी) के सामने खड़े होकर भक्तों से पैसे इकट्ठा कर रहे हैं और उन्हें अपनी पॉलीथीन की थैलियों में डाल रहे हैं। ALSO READ: मध्यप्रदेश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के भंवर में खाकी, कटनी के बाद इंदौर में पुलिस कर्मियों पर केस दर्ज

 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम निर्देश देते हैं कि दान का हर पैसा दान पेटी या ऑनलाइन खाते में ही आना चाहिए। 'सेवायत' या किसी और की तरफ से इसमें कोई भी रुकावट डालने को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा। मैनेजमेंट कमेटी को मंदिर के खजाने के लिए एक पारदर्शी सिस्टम लागू करना चाहिए।

 

शीर्ष अदालत ने कहा कि सेवायतों या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से दान की इस व्यवस्था में किसी भी तरह की बाधा को 'बहुत गंभीरता से' लिया जाएगा। अदालत ने मंदिर की प्रबंधन समिति को दान की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया, जिससे किसी भी तरह की अनियमितता या गड़बड़ी को रोका जा सके।

 

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मंदिर के पैसे से संपत्ति खरीदने के प्रस्तावों को लेन-देन पूरा होने से पहले अदालत के सामने रखा जाए।

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

salary gap in germany

साहिबा खान 

जर्मनी में एक जैसे काम और एक जैसे काम के माहौल के बावजूद स्थानीय कर्मचारियों और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा अंतर पाया गया है। जर्मन श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत में यह अंतर 23.6 फीसदी था, जो काफी ज्यादा है। हालांकि साल 2020 से ही सैलरी में अंतर का यह आंकड़ा कमोबेश स्थिर बना हुआ है। ALSO READ: जर्मनी: बुजुर्गों और बीमारियों पर बढ़ते खर्च का बोझ कौन उठाए

 

जबकि जर्मनी के श्रमबल में विदेशी कर्मचारियों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है। साल 2025 के अंत तक यहां के कुल कर्मचारियों में से करीब 17 फीसदी विदेशी नागरिक थे। यह आंकड़ा पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। साल 2010 में विदेशी कर्मचारियों का अनुपात 2025 के मुकाबले आधा था।

 

वेतन की खाई और वास्तविक आंकड़े

जर्मनी के श्रम मंत्रालय के अनुसार, वहां एक फुल-टाइम काम करने वाले जर्मन नागरिक की औसत मासिक कमाई €4,396 (लगभग 4,91,500) है, जबकि विदेशी कर्मचारियों के लिए यह आंकड़ा केवल €3,358 (लगभग 3,75,500 रुपए) पर अटका हुआ है। इसका मतलब है कि औसतन विदेशी कर्मचारी हर महीने अपने जर्मन सहकर्मियों से €1,038 (लगभग 1,16,000 रुपए) कम कमाते हैं। जर्मन श्रम मंत्रालय ने यह जानकारी देश की संसद में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के एक सवाल का जवाब देते हुए सामने रखी।

 

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 में 30.6 फीसदी विदेशी कर्मचारी बेहद कम वेतन वाली नौकरियां करने को मजबूर थे, जबकि इस श्रेणी की नौकरियां करने वाले जर्मन नागरिकों का आंकड़ा महज 12.3 फीसदी था। ALSO READ: क्या सूखे की मार से जर्मनी में महंगा होगा भोजन?

 

सैलरी में अंतर के पीछे की मुख्य वजहें

जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी के प्रवक्ता रेने स्प्रिंगर ने इस अंतर को कमजोर इमिग्रेशन नीतियों का नतीजा बताया और आरोप लगाया कि इससे वेतन पर दबाव पड़ रहा है। लेकिन जर्मनी की संघीय रोजगार एजेंसी का मानना है कि इस वेतन विषमता का मुख्य कारण राजनीतिक न होकर कर्मचारियों की योग्यता, भाषा का ज्ञान और अनुभव है। इंस्टीट्यूट फॉर एम्प्लॉयमेंट रिसर्च यानी आईएबी की एक अन्य स्टडी के मुताबिक इस अंतर की अहम वजह आप्रवासियों का ऊंची सैलरी वाले सेक्टर या पदों पर जाने की पात्रता का ना होना है।

 

आंकड़े दिखाते हैं कि जर्मनी में बिना वोकेशनल ट्रेनिंग वालों की औसतन आय €3,133 (लगभग 3,50,000 रुपए) है। वहीं वोकेशनल डिग्री धारकों की €4,069 (लगभग 4,55,000 रुपए) है। जर्मनी में वोकेशनल डिग्री यानी आउसबिल्डुंग 1 से 3 साल का थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ कंपनी में काम करके सैलरी भी मिलती है। यूनिवर्सिटी स्नातकों की कमाई €6,146 (लगभग 6,87,000 रुपए) प्रति माह तक पहुंच जाती है।

 

यह समझना भी जरूरी है कि जर्मन श्रम मंत्रालय के ये आंकड़े केवल स्थानीय और विदेशी कर्मचारियों के बीच का सीधा अंतर दिखाते हैं। रिपोर्ट खुद यह स्पष्ट करती है कि ये आंकड़े इस बात को साबित या खारिज नहीं करते कि इमिग्रेशन का सैलरी पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ा है या नहीं, क्योंकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि अगर आप्रवासन नहीं होता तब सैलरी का ट्रेंड क्या रहता। ALSO READ: शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं

 

जेंडर पे गैप और दोहरी मार

जर्मनी में विदेशी महिलाएं वेतन विषमता की दोहरी मार झेलती हैं। डीस्टैटिस (जर्मन संघीय सांख्यिकी कार्यालय) के डेटा के अनुसार, जर्मनी में जेंडर पे गैप लगभग 16 फीसदी है। यानी यहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में प्रति घंटा करीब 16 फीसदी कम वेतन मिलता है। जब इस लैंगिक अंतर को विदेशी कर्मचारियों के 23.6 फीसदी वाले पे गैप के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।

 

इसके अलावा गैर-यूरोपीय देशों से आने वाली प्रवासी महिलाओं को न केवल विदेशी होने के कारण नौकरशाही, भाषा और डिग्री मान्यता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं, बल्कि वे अक्सर केयर सेक्टर, सर्विस इंडस्ट्री या पार्ट-टाइम नौकरियों जैसे कम भुगतान वाले क्षेत्रों में सिमट कर रह जाती हैं।

मध्यप्रदेश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के भंवर में खाकी, कटनी के बाद इंदौर में पुलिस कर्मियों पर केस दर्ज

मध्यप्रदेश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के भंवर में खाकी, कटनी के बाद इंदौर में पुलिस कर्मियों पर केस दर्ज

मध्यप्रदेश में कानून-व्यवस्था संभालने वाली खाकी इन दिनों सवालों के घेरे में है। पहले कटनी में सीएसपी के भष्टाचार के मामले में फंसने के बाद अब इंदौर में रिश्वत के मामले में क्राइम ब्रांच के पूर्व इंस्पेक्टर सहित चार पुलिस कर्मियों पर FIRदर्ज की गई है। दरअसल प्रदेश में  हाल के दिनों में भ्रष्टाचार और पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। कटनी में सीएसपी समेत पुलिसकर्मियों पर रिश्वत और जांच में लापरवाही के आरोप हों या इंदौर या भोपाल में पुलिस विभाग के ही कर्मचारियों का रिश्वत लेते पकड़ा जाना, इन घटनाओं ने खाकी को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। 

 

इंदौर में खाकी पर रिश्वतखोरी का आरोप- इंदौर में केस दर्ज न करने के एवज में एक लाख 20 हजार की रिश्वत मांगने के मामले में लोकायुक्त ने क्राइम ब्रांच के तत्कालीन इंस्पेक्टर सुमित श्रीवास्तव,आरक्षक विकास सेठ समेत चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। पुलिस कर्मियों पर आरोप है कि शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के बदले उससे 1.20 लाख रुपए की रिश्वत मांगी गई थी। इसमें से 50,800 रुपए यूपीआई के माध्यम से और बाकी 70 हजार रुपए नकद लेने का आरोप है। लोकायुक्त पुलिस के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके खिलाफ चल रही कार्रवाई को रोकने और मामले में राहत देने के बदले रिश्वत की मांग की गई थी। जांच में आरोप सहीं पाए जाने में पर लोकायुक्त ने मामला दर्ज कर लिया है।

 

कटनी में भ्रष्टाचार के मामले में निलंबित सीएसपी फरार- कटनी में करोड़ों की जमीनी खरीदे मामले में सीएसपी नेहा पच्चीसिया निलंबन और केस दर्ज होने के बाद से अब तक फरार चल रही है। कटनी की सीएसपी नेहा पच्चीसिया पर एक करोड़ रुपये से अधिक कीमत की जमीन को दबाव बनाकर करीब 18 लाख रुपये में खरीदने का आरोप है। पूरे मामला सामने आने के बाद मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के दखल के बाद नेहा पच्चीसिया को निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। निलंबन और FIR दर्ज होने के बाद नेहा पच्चीसिया फरार  है। 

 

इससे पहले भोपाल में खाकी के भ्रष्टाचार का एक अलग चेहरा सामने आया। पुलिस विभाग के एक कांस्टेबल और एफआरवी ड्राइवर को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। खास बात यह रही कि कार्रवाई करने वाली टीम भी पुलिस विभाग की ही थी। यानी विभाग के भीतर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की तस्वीर दिखाई दी।

 

सवाल सिर्फ रिश्वत का नहीं, सिस्टम पर भरोसे का है- प्रदेश में लगातार पुलिस अधिकारियों औऱ कर्मियों के रिश्वत के मामले में फंसने के बाद सवाल लोगों के खाकी पर भरोसे का  है। लोगों  की रक्षा करने वाली खाकी ही इस तरह दागदार होती गई तो जनता का सिस्टम पर से भरोसा ही उठ जाएगा। मध्यप्रदेश पुलिस के सामने इस चुनौती दोहरी है, एक तरफ अपराधियों पर कार्रवाई और दूसरी तरफ अपने ही तंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती। हाल के मामलों ने साफ कर दिया है कि खाकी की साख सिर्फ अपराधियों पर कार्रवाई से नहीं, बल्कि अपने भीतर के दागों पर कार्रवाई से भी तय होगी।

इंदौर क्‍यों सूखा, बचे मानसून में भी बारिश की नहीं उम्‍मीद, कमजोर सिस्‍टम ने बिगाड़ा खेल, क्‍या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक?

इंदौर क्‍यों सूखा, बचे मानसून में भी बारिश की नहीं उम्‍मीद, कमजोर सिस्‍टम ने बिगाड़ा खेल, क्‍या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक?

Indore rain

मानसून आधे से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन मध्यप्रदेश में कोटे की करीब 65 प्रतिशत ही बारिश रिकॉर्ड हुई है। इनमें भोपाल, शहडोल, रीवा और जबलपुर की तस्वीर बेहतर है, लेकिन इंदौर, उज्जैन और नर्मदापुरम में पानी कम गिरा है। इनमें भी इंदौर की हालत सबसे ज्‍यादा नाजुक है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मालवा के ऊपर सिस्‍टम इतना ताकतवर बन ही नहीं पा रहा है कि बारिश हो सके। उनका अनुमान है कि इंदौर में तो शेष मानसून में भी बारिश होने की उम्‍मीद नहीं है। इस बार इंदौर सूखा ही रहेगा।

इंदौर में सिर्फ 19 इंच बारिश : मौसम विभाग के अनुसार इंदौर जिले में इस सीजन में अब तक करीब 19.7 इंच पानी गिर चुका है, जो सामान्य औसत से थोड़ा कम है। जबकि इंदौर-उज्जैन संभाग में इस बार मानसून की रफ्तार थोड़ी धीमी रही है और अन्य जिलों (जैसे धार, झाबुआ, बड़वानी) में भी 15 से 20 इंच के बीच ही बारिश दर्ज की गई है। इंदौर में अब तक कुल 19.7 इंच बारिश रिकॉर्ड की गई है, जो कोटे की 58 प्रतिशत है। पिछले सप्ताह यहां तेज बारिश नहीं हुई। इस कारण सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। संभाग में सबसे ज्यादा बुरहानपुर में 27.2 इंच बारिश हो चुकी है। यहां कोटे की 94 प्रतिशत बारिश हो चुकी है। आलीराजपुर में सबसे कम पानी गिरा है। अगले सप्ताह तेज बारिश होने के कम आसार है।

भोपाल के मौसम वैज्ञानिक जीडी मिश्रा ने बताया कि मालवा में सिस्‍टम इतना स्‍ट्रांग नहीं बन पा रहा है कि यहां बारिश हो सके। यह सिस्‍टम मालवा में असर नहीं दिखा पा रहा है। आगे भी इंदौर, मालवा के कुछ हिस्‍सों समेत अलीराजपुर और धार जैसे जिलों में बारिश की कोई उम्‍मीद नहीं है। हालांकि मध्‍यप्रदेश में बारिश सामान्‍य है। बस मालवा के जिले कमजोर रहेंगे। यह सिर्फ इसलिए हो रहा है कि सिस्‍टम इतना ताकतवर बन ही नहीं पा रहा है।

एमपी के कम ज्‍यादा बारिश वाले जिले : मध्‍यप्रदेश के पूर्वी हिस्से- जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग में 19% तक कम बारिश हुई है। बालाघाट, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, जबलपुर, कटनी, मैहर, डिंडौरी, मंडला, मऊगंज, नरसिंहपुर, निवाड़ी, पांढुर्णा, पन्ना, रीवा, सागर, सिवनी, टीकमगढ़ में 1% से 51% तक कम बारिश हुई है।

आगर- मालवा की स्‍थिति : वहीं, पश्चिमी हिस्से के आगर-मालवा, आलीराजपुर, अशोकनगर, बैतूल, दतिया, देवास, धार, हरदा, इंदौर, झाबुआ, मुरैना, मंदसौर, नर्मदापुरम, नीमच, रायसेन, रतलाम, सीहोर, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, उज्जैन और विदिशा में औसत से 2% से 47% कम पानी गिरा है।

इन 15 जिलों में ज्यादा बारिश : IMD की माने तो अनूपपुर, सतना, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, उमरिया, बड़वानी, भिंड, भोपाल, बुरहानपुर, गुना, ग्वालियर, खंडवा, खरगोन और राजगढ़ में ही औसत से ज्यादा बारिश दर्ज की गई।

सितंबर पर टिकी बारिश की आस : मौसम चक्र के अनुसार इंदौर के लिए अगस्त और सितंबर के महीने सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि वर्षा का मुख्य कोटा इन्हीं दो महीनों में पूरा होता है। सामान्य परिस्थितियों में अगस्त के दौरान 10 से 11 इंच बारिश दर्ज की जाती है और इस दौरान लगभग 12 से 13 दिन वर्षा वाले होते हैं। इस आधार पर देखा जाए तो अगस्त में हुई बारिश औसत से काफी कम है। अब ऐसे में सितंबर महीने से लोग उम्‍मीद कर रहे हैं, हालांकि मौसम वैज्ञानिक जीडी मिश्रा का कहना है कि आगे भी इंदौर और मालवा के कुछ क्षेत्रों में बारिश की संभावना नहीं है। अब बचे मानसून में करीब 20 इंच से अधिक बारिश की सख्त जरूरत है। यदि आने वाले दिनों में मूसलाधार बारिश का दौर शुरू नहीं होता है, तो वर्षा के निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल साबित हो सकता है।

शिक्षा को लेकर क्यों सड़क पर उतरने को मजबूर है Gen-Alfa 8 साल में 84 हजार स्कूल बंद!

शिक्षा को लेकर क्यों सड़क पर उतरने को मजबूर है Gen-Alfa 8 साल में 84 हजार स्कूल बंद!

84 thousand government schools closed in India

UDISE education data: देश की सबसे युवा पीढ़ी—Gen-Alfa (जनरेशन अल्फा)—आज किताबों के साथ-साथ अपने अधिकारों और बेहतर शिक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE) के हालिया आंकड़ों ने देश की स्कूली शिक्षा प्रणाली की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने नीति-निर्माताओं से लेकर आम जनता तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

एक तरफ कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के स्कूल ठीक करो अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और डिजिटल सुविधाओं के अभाव को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है, तो दूसरी तरफ सरकारी आंकड़ों ने पुष्टि कर दी है कि पिछले आठ वर्षों में देश के शिक्षा ढांचे में बड़ा संकुचन (Contraction) आया है।

84 thousand government schools closed in India

बड़ी चिंता : वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, 3 से 17 वर्ष की आयु के लगभग 31 प्रतिशत पात्र बच्चे (करीब 11.1 करोड़) स्कूलों में नामांकित ही नहीं हैं। यह आंकड़ा 2018-19 से लगातार इसी स्तर पर बना हुआ है।

84 thousand government schools closed in India

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माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट और बजटीय आवंटन की चुनौती

छात्रों को उच्च स्तर तक स्कूल में बनाए रखना (Retention) एक बड़ी चुनौती बना हुआ है:

  • ड्रॉपआउट दर: माध्यमिक स्तर (Secondary level) पर ड्रॉपआउट दर 7% दर्ज की गई, जबकि प्राथमिक स्तर पर यह नगण्य है।
  • रिटेंशन रेट: माध्यमिक स्तर पर छात्रों को रोककर रखने की दर केवल 44% है—यानी आधे से ज्यादा छात्र माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते शिक्षा छोड़ देते हैं।

शिक्षा बजट में बजटीय कटौती

सरकारी स्कूलों की संख्या और नामांकन में गिरावट का एक बड़ा कारण सार्वजनिक खर्च (Public Expenditure) में कमी भी है:

  • स्कूल शिक्षा व साक्षरता विभाग: केंद्रीय बजट में हिस्सेदारी FY2010 के 1.9% से घटकर FY2026 में 1.4% रह गई।
  • उच्च शिक्षा विभाग: बजटीय हिस्सेदारी 1.4% से घटकर 1.0% हो गई।

आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर संकट और बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। सरकारी स्कूलों का बंद होना, घटता नामांकन, बजट में कमी और डिजिटल असमानता ऐसे मुद्दे हैं, जो Gen-Alfa के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। जब तक शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश नहीं बढ़ेगा और बुनियादी ढांचे को आधुनिक तकनीकों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक 'हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' का सपना अधूरा ही रहेगा।

गुजरात पुलिस बेड़े में शामिल होंगे 500 नए आधुनिक ‘जनरक्षक’ वाहन, गृह राज्यमंत्री हर्ष संघवी देंगे सौगात

गुजरात पुलिस बेड़े में शामिल होंगे 500 नए आधुनिक ‘जनरक्षक’ वाहन, गृह राज्यमंत्री हर्ष संघवी देंगे सौगात

Gujarat emergency response system: गुजरात सरकार द्वारा राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ और त्वरित बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। राज्य पुलिस के बेड़े में 500 नए अत्याधुनिक ‘जनरक्षक’ वाहनों को शामिल किया जा रहा है। गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी इन नए वाहनों का लोकार्पण कर पुलिस विभाग को यह सौगात देंगे। इन नए वाहनों के जुड़ने से राज्य में आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली (इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम) और अधिक सक्षम बनेगी।

24 घंटे आपातकालीन सेवा के लिए 1000 वाहन रहेंगे तैनात

500 नए जनरक्षक वाहनों के जुड़ने से अब पूरे गुजरात में 24 घंटे लगातार 1000 वाहन आपातकालीन सेवाओं, गश्त (पेट्रोलिंग) और त्वरित सहायता के लिए उपलब्ध रहेंगे। किसी भी अप्रिय घटना या आपात स्थिति के समय घटनास्थल पर जल्द से जल्द पहुंचकर नागरिकों को त्वरित सुरक्षा और सहायता प्रदान करने में ये वाहन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

एक ही प्लेटफॉर्म ‘डायल 112’ पर सभी प्रमुख हेल्पलाइन का समन्वय

राज्य में ‘डायल 112’ प्रोजेक्ट के तहत सभी प्रकार की आपातकालीन सेवाओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया गया है। इसमें पुलिस (100), एम्बुलेंस (108), फायर (101), महिला हेल्पलाइन (181), चाइल्ड हेल्पलाइन (1098), डिजास्टर हेल्पलाइन (1070) और ट्रैफिक हेल्पलाइन शामिल हैं। इसके अलावा, डिजिटल सुविधा को बढ़ाते हुए ओला, उबर, रैपिडो और भारत टैक्सी ऐप्स में भी '112 पैनिक बटन' शामिल किया गया है।

11 लाख से अधिक लोगों को त्वरित सेवा प्रदान करने की बड़ी उपलब्धि

गुजरात में अब तक डायल 112 और जनरक्षक वाहनों के माध्यम से 11.04 लाख से अधिक आपातकालीन सेवाएं सफलतापूर्वक प्रदान की जा चुकी हैं। वाहनों की संख्या बढ़ने से अब शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस का रिस्पॉन्स टाइम घटेगा और नागरिकों को पहले की तुलना में अधिक तेज़, कुशल और सुरक्षित सेवाएं मिलेंगी।

3400 किस वाली कार की रील हुई वायरल, 55 लाख व्यूज के बाद पुलिस ने काटा 5500 रुपये का चालान

3400 किस वाली कार की रील हुई वायरल, 55 लाख व्यूज के बाद पुलिस ने काटा 5500 रुपये का चालान

kiss car

सोशल मीडिया पर वायरल होने और ज्यादा से ज्यादा व्यूज पाने का जुनून एक युवक को भारी पड़ गया। ग्वालियर में एक युवक ने अपनी कार को ही ‘किसिंग कार’ बना दिया। कार की पूरी बॉडी पर उसकी महिला मित्र ने लिपस्टिक से करीब 3400 होठों के निशान बनाए। इसके बाद युवक ने कार का वीडियो बनाकर इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया। वीडियो वायरल हुआ तो मामला पुलिस तक पहुंच गया और यातायात पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कार को जब्त कर 5500 रुपये का चालान काट दिया। ALSO READ: कूड़े में फेंकी गई थीं एक्सपायरी चॉकलेट-टॉफियां, उठाने के लिए टूट पड़े लोग; वीडियो वायरल

 

3400 किस वाली कार का वीडियो हुआ वायरल

यातायात पुलिस के मुताबिक, करीब दो दिन पहले एमपी 07 सीसी 9452 नंबर वाली कार का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। वीडियो में कार सड़क पर तेज रफ्तार से दौड़ती दिखाई दे रही थी। खास बात यह थी कि कार की पूरी बॉडी पर लाल रंग की लिपस्टिक से बने सैकड़ों होठों के निशान नजर आ रहे थे।

 

वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने कार की पहचान शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने कार को थाटीपुर इलाके से बरामद कर लिया और उसे यातायात थाने ले आई।
 

पुलिस ने काटा 5500 रुपये का चालान

कार मालिक को थाने बुलाकर पुलिस ने वायरल वीडियो के बारे में पूछताछ की। युवक ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पुलिस से माफी मांगी और आगे ऐसी गलती नहीं दोहराने की बात कही।

 

इसके बाद मोटर व्हीकल एक्ट के विभिन्न प्रावधानों के तहत कार का 5500 रुपये का चालान किया गया। पुलिस के सामने कार की बॉडी पर लगे लिपस्टिक के निशानों को पानी से साफ भी कराया गया।

 

यातायात थाना प्रभारी अभिषेक रघुवंशी ने बताया कि वायरल वीडियो में कार तेज रफ्तार में चलती दिखाई दे रही थी। वीडियो के आधार पर वाहन की पहचान कर कार्रवाई की गई। ALSO READ: मौत के बाद खुला भिखारी महिला का राज! 30 से ज्यादा बोरियों में मिले नोट-सिक्के, निकले 8.40 लाख रुपये

 

साढ़े तीन घंटे में बनाए गए थे 3400 निशान

पूछताछ में कार मालिक आदित्य सिकरवार ने बताया कि वह इंस्टाग्राम के लिए रील बनाता है और कार के इस अनोखे वीडियो को वायरल करने की उम्मीद थी। उसके मुताबिक, वीडियो को एक दिन में करीब 55 लाख व्यूज भी मिल गए।

 

आदित्य ने पुलिस को बताया कि कार पर लिपस्टिक के निशान उसने खुद नहीं बनाए थे। कार खड़ी होने के दौरान उसकी एक महिला मित्र ने पूरी बॉडी पर किस किए थे। करीब 3400 निशान बनाने में लगभग साढ़े तीन घंटे लगे।

 

इसके बाद कार का वीडियो बनाकर इंस्टाग्राम पर अपलोड किया गया। उसका मकसद एक अलग तरह की रील तैयार करके सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था।

 

वायरल रील के चक्कर में नियम न तोड़ें

इस मामले के सामने आने के बाद यातायात पुलिस ने लोगों को सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए सड़क पर तेज रफ्तार से वाहन चलाने या यातायात नियमों की अनदेखी नहीं करने की चेतावनी दी है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड की लोकप्रियता के लिए सड़क पर लापरवाही करना न केवल कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है, बल्कि सड़क पर दूसरे लोगों की सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है।

LIVE: दिल्ली में झमाझम, भारी बारिश का रेड अलर्ट

LIVE: दिल्ली में झमाझम, भारी बारिश का रेड अलर्ट

delhi rain

Latest News Today Live Updates in Hindi : दिल्ली में भारी बारिश से राजधानी के कई हिस्सों में जलभराव की स्थिति बन गई। मौसम विभाग ने आज यहां भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया। पल पल की जानकारी। 

-भारी बारिश से राजधानी दिल्ली के कई हिस्सों में जलभराव की स्थिति बन गई। मौसम विभाग ने भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया।
-मौसम विभाग के अनुसार बंगाल की खाड़ी से गैंगटिक वेस्ट बंगाल से मॉनसून का एक सिस्टम बना है। वहीं, उत्तर भारत में कम दबाव का क्षेत्र बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर समेत अन्य स्थानें में आंधी के साथ तेज बारिश हुई।

राम रहीम को फिर मिली 21 दिन की पैरोल, 7 साल में 17वीं बार आया जेल से बाहर

राम रहीम को फिर मिली 21 दिन की पैरोल, 7 साल में 17वीं बार आया जेल से बाहर

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डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 21 दिन की पैरोल मिल गई है। यौन शोषण के मामले में रोहतक की सुनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहे राम रहीम को 17वीं बार पैरोल पर रिहा किया गया है। वह जेल से बाहर निकलकर सीधे सिरसा जाएगा। ALSO READ: बलात्कारी बाबा, बार-बार पैरोल, क्या भारत में कानून सिर्फ आम लोगों के लिए है?

 

2 साध्वियों से दुष्कर्म मामले में 20 साल की सजा

गुरमीत राम रहीम को 25 अगस्त 2017 को पंचकूला स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने 2 साध्वियों से दुष्कर्म के मामले में दोषी करार दिया था। इसके तीन दिन बाद 28 अगस्त 2017 को अदालत ने दोनों मामलों में 10-10 साल की सजा सुनाई थी। इस तरह उसे कुल 20 साल की कारावास की सजा मिली। राम रहीम इसके अलावा एक पूर्व डेरा प्रबंधक और एक पत्रकार की हत्या के मामलों में भी दोषी ठहराया गया था। हालांकि बाद में उच्च न्यायालय ने इन दोनों मामलों में उसे बरी कर दिया।
 

पैरोल मिलने की अनिवार्य शर्तें

पैरोल मिलने की सबसे बड़ी शर्त जेल के अंदर कैदी का आचरण है। यह भी देखा जाता है कि क्या उसने जेल के नियमों का पालन किया? राम रहीम को अक्सर उसके अच्छे व्यवहार के आधार पर ही पैरोल की रिपोर्ट मिलती है। आमतौर पर पैरोल तभी मिलती है जब कैदी अपनी सजा का एक निश्चित हिस्सा (जैसे 1 या 3 साल) काट चुका हो। स्थानीय पुलिस और प्रशासन से रिपोर्ट ली जाती है कि क्या उस कैदी के बाहर आने से इलाके में 'लॉ एंड ऑर्डर' (कानून-व्यवस्था) बिगड़ने का खतरा तो नहीं है। कैदी को भारी सुरक्षा राशि (Bail Bond) जमा करनी पड़ती है और दो 'जमानतदारों' की गारंटी देनी होती है कि वह समय पर वापस आएगा। 

 

गुरमीत राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलने को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने पहले भी इस पर आपत्ति जताई है। वहीं, प्रशासन का कहना है कि पैरोल नियमों के तहत दी जाती है। 

 

कब कब जेल से बाहर आया राम रहीम?

2020 (अक्टूबर) : 1 दिन

2021 (मई) : 1 दिन

2022 (फरवरी) : 21 दिन

2022 (जून) : 30 दिन

2022 (अक्टूबर) : 40 दिन

2023 (जनवरी) : 40 दिन

2023 (जुलाई) : 30 दिन

2023 (नवंबर) : 21 दिन

2024 (जनवरी) : 50 दिन

2024 (अगस्त) : 21 दिन

2024 (अक्टूबर) : 20 दिन

2025 (जनवरी) : 21 दिन

2025 (मई) : 20 दिन

2025 (सितंबर) : 21 दिन

2026 (फरवरी) : 20 दिन

2026 (मई) : 30 दिन

2026 (अगस्त) : 21 दिन

H-1B वीजा पर US का नया प्लान, भारत पर क्या होगा असर?

H-1B वीजा पर US का नया प्लान, भारत पर क्या होगा असर?

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार ने अत्यधिक कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए नए H-1B वीजा आवेदन पर 1 लाख डॉलर से अधिक की फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी Department of Homeland Security (DHS) की ओर से जारी प्रस्ताव के तहत यह फीस बढ़ाकर 1,03,265 डॉलर की जा सकती है। सोमवार को Federal Register में प्रकाशित नोटिस के मुताबिक, यह फीस उन सभी H-1B वीजा कैप-सब्जेक्ट आवेदनों पर लागू होगी, जिनमें एडवांस्ड डिग्री यानी उच्च शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध छूट वाली श्रेणी भी शामिल है।

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H-1B फीस बढ़ाने का नया प्रस्ताव

 

DHS का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब H-1B वीजा फीस को लेकर अमेरिकी अदालतों में कानूनी विवाद चल रहा है। करीब एक महीने पहले एक संघीय अपीलीय अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें जिला जज के उस आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसने ट्रंप प्रशासन की 1 लाख डॉलर H-1B फीस लगाने की योजना को पलट दिया था।

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सितंबर 2025 में ट्रंप ने एक व्यापक घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत H-1B वीजा पर सालाना 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का प्रावधान किया गया था। इसी दौरान अमीर लोगों के लिए अमेरिकी नागरिकता की राह के तौर पर 10 लाख डॉलर के ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा की योजना भी पेश की गई थी।

 

हालांकि, बाद में एक संघीय अदालत ने 1 लाख डॉलर की H-1B फीस को रद्द कर दिया था। वहीं, ‘गोल्ड कार्ड’ कार्यक्रम एक अलग पहल है।

 

भारतीय प्रोफेशनल्स पर सबसे ज्यादा असर की आशंका

नई प्रस्तावित फीस का सबसे ज्यादा असर भारतीय प्रोफेशनल्स पर पड़ने की आशंका है। इसकी वजह यह है कि H-1B वीजा धारकों में भारतीय नागरिकों की संख्या काफी बड़ी है। H-1B वीजा मुख्य रूप से ऐसे विशेषज्ञ पेशों (Specialty Occupations) के लिए जारी किया जाता है, जिनमें आमतौर पर कम से कम स्नातक डिग्री या उसके समकक्ष योग्यता की आवश्यकता होती है।

 

यह वीजा लंबे समय से अमेरिका की टेक्नोलॉजी कंपनियों और IT सर्विसेज कंपनियों के लिए विदेशी कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करने का प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि कुछ कंपनियां H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम लागत वाले विदेशी श्रमिकों तक पहुंच बनाने के लिए करती हैं।

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H-1B वीजा के लिए होता है लॉटरी सिस्टम

 

परंपरागत रूप से जब H-1B वीजा के लिए आवेदन वार्षिक सीमा से अधिक हो जाते थे, तो कैप-सब्जेक्ट वीजा आवेदनों का चयन लॉटरी सिस्टम के जरिए किया जाता था। हालांकि, हाल के वर्षों में H-1B वीजा चयन प्रक्रिया में कई बदलाव किए गए हैं।

 

Amazon, Infosys और TCS समेत ये कंपनियां बड़ी नियोक्ता

H-1B कार्यक्रम के तहत Amazon लगातार सबसे बड़े नियोक्ताओं में शामिल रही है। इसके अलावा Cognizant, Infosys, Tata Consultancy Services (TCS), Microsoft और Google जैसी कंपनियां भी H-1B वीजा के प्रमुख नियोक्ताओं में शामिल हैं। अमेरिका का California राज्य भी H-1B मंजूरियों के मामले में प्रमुख राज्यों में बना हुआ है। इसकी बड़ी वजह राज्य में टेक्नोलॉजी कंपनियों की भारी मौजूदगी है।

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नए प्रस्ताव को अंतिम रूप मिलने पर अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे विदेशी कुशल कर्मचारियों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों की लागत में बड़ा इजाफा हो सकता है। भारतीय IT प्रोफेशनल्स और अमेरिकी टेक कंपनियां इस प्रस्ताव से सबसे ज्यादा प्रभावित पक्षों में शामिल हो सकती हैं।