नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन 2027 में पिता बनेंगे। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। जेटेन के पार्टनर निकोलस कीनन अर्जेंटीना के हॉकी खिलाड़ी हैं। जेटेन और उनके पार्टनर कीनन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा, हमारी जिंदगी में एक बहुत खास मेहमान आने वाला है। नन्हे बच्चे, 2027 में तुमसे मुलाकात होगी। डच मीडिया के मुताबिक बच्चे के जन्म के लिए सरोगेसी की मदद ली गई है। उनकी दो महिला दोस्तों ने इस प्रक्रिया में मदद की। एक ने अंडाणु दान किया, जबकि दूसरी बच्चे को जन्म देंगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेटेन ऐसे पहले डच प्रधानमंत्री होंगे, जिनके कार्यकाल में उनके बच्चे का जन्म होगा। टिकटॉक वीडियो से शुरू हुई कहानी, सुपरमार्केट में मिले साल 2021 में, जेटन और उनके एक साथी डच नेता के बीच का एक ब्रोमांस वाला ट्रेडिंग वीडियो टिकटॉक पर बहुत वायरल हुआ था। इसमें दोनों नेता एक दूसरे के साथ मस्ती करते, हंसते और डांस करते दिखे थे। वीडियो वायरल होने के बाद रॉब जेटन युवाओं के बीच मशहूर हो गए। साल 2022 में कीनन ने एक सुपरमार्केट में जेटेन को देखा और उन्हें वायरल वीडियो की वजह से पहचान गए। इस दौरान दोनों की बातचीत शुरू हुई। कीनन ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि जेटेन ने उन्हें इंस्टाग्राम पर मैसेज भेजकर बातचीत शुरू की थी। शुरुआत में दोनों का रिश्ता निजी रहा लेकिन अगस्त 2023 में दोनों ने अपने रिश्ते को सार्वजनिक कर दिया। नवंबर 2024 में दोनों ने सगाई की घोषणा की। दोनों की शादी जून 2026 में होनी थी, लेकिन जेटेन के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसे कुछ समय के लिए टाल दिया है। नीदरलैंड समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला पहला देश नीदरलैंड दुनिया का पहला देश था, जिसने 2001 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी। जेटेन देश के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। हालांकि, वे दुनिया के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री नहीं हैं। उनसे पहले भी दूसरे देशों में खुले तौर पर समलैंगिक नेता सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। सिर्फ 39 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने जेटेन दुनिया के 8 समलैंगिक प्रधानमंत्री 1. योहाना सिगुर्दार्दोतिर – आइसलैंड (2009–2013): वे दुनिया की पहली खुले तौर पर समलैंगिक सरकार प्रमुख बनीं। वे लेस्बियन थीं। उनकी 1970 में शादी हुई थी। उनके 2 बच्चे भी हुए। 1985 में वह एक महिला पत्रकार के करीब आईं। इसके 2 साल बाद उन्होंने तलाक ले लिया। जून 2010 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलने पर दोनों ने शादी कर ली। 2. एलियो दी रूपो – बेल्जियम (2011–2014): वे बेल्जियम ही नहीं दुनिया के पहले खुले तौर पर गे प्रधानमंत्री बने। 1996 में उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन पर 16 साल के बच्चे के साथ संबंध बनाने का आरोप लगा था। तब पहली बार उनकी पहचान उजागर हुई थी। 3. जेवियर बेटेल – लक्जमबर्ग (2013–2023): बेटेल ने 2008 में पहली बार बताया था कि वे समलैंगिक हैं। PM बनने के डेढ़ साल बाद 2015 में उन्होंने अपने पुरुष पार्टनर गौथियर डेस्टने से शादी की। वे पहले ऐसे गे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पद पर रहते हुए शादी की। 4. लियो वराडकर – आयरलैंड (2017–2024): आयरलैंड में मई 2015 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए जनमत संग्रह होना था। भारतीय मूल के लियो वराडकर तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने इस जनमत संग्रह को समर्थन देने के लिए पहली बार अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 5. एना ब्रनाबिच – सर्बिया (2017–2024): वे सर्बिया की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वे लेस्बियन हैं। फरवरी 2019 में उनकी पार्टनर ने एक बेटे को जन्म दिया। ऐसे में वे पहली समलैंगिक प्रधानमंत्री बनीं, जिनकी महिला पार्टनर ने उनके कार्यकाल के दौरान बच्चे को जन्म दिया। 6. जेवियर एस्पोट – अंडोरा (2019 से): वे अंडोरा के प्रधानमंत्री हैं और खुले तौर पर समलैंगिक हैं। प्रधानमंत्री बनने के 4 साल बाद 2023 में उन्होंने अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 7. गैब्रियल अत्ताल – फ्रांस (2024): वे फ्रांस के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री बने। 2018 में जब वे मैक्रों की पार्टी के सांसद थे तब पहली बार उनके एक बचपन के दोस्त ने खुलासा किया था कि उनका संबंध एक नेता स्तेफान सेजुर्ने से है। दोस्त ने आरोप लगाया कि सेजुर्ने की वजह से अत्ताल का राजनीतिक करियर आगे बढ़ा। 8. रॉब जेटेन- नीदरलैंड (2026 से): वे नीदरलैंड के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने फरवरी 2026 में पद संभाला। 17 साल की उम्र में पहली बार एक लड़के से प्यार होने के बाद उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों के सामने अपनी पहचान का खुलासा किया था।
नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन 2027 में पिता बनेंगे। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। जेटेन के पार्टनर निकोलस कीनन अर्जेंटीना के हॉकी खिलाड़ी हैं। जेटेन और उनके पार्टनर कीनन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा, हमारी जिंदगी में एक बहुत खास मेहमान आने वाला है। नन्हे बच्चे, 2027 में तुमसे मुलाकात होगी। डच मीडिया के मुताबिक बच्चे के जन्म के लिए सरोगेसी की मदद ली गई है। उनकी दो महिला दोस्तों ने इस प्रक्रिया में मदद की। एक ने अंडाणु दान किया, जबकि दूसरी बच्चे को जन्म देंगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेटेन ऐसे पहले डच प्रधानमंत्री होंगे, जिनके कार्यकाल में उनके बच्चे का जन्म होगा। टिकटॉक वीडियो से शुरू हुई कहानी, सुपरमार्केट में मिले साल 2021 में, जेटन और उनके एक साथी डच नेता के बीच का एक ब्रोमांस वाला ट्रेडिंग वीडियो टिकटॉक पर बहुत वायरल हुआ था। इसमें दोनों नेता एक दूसरे के साथ मस्ती करते, हंसते और डांस करते दिखे थे। वीडियो वायरल होने के बाद रॉब जेटन युवाओं के बीच मशहूर हो गए। साल 2022 में कीनन ने एक सुपरमार्केट में जेटेन को देखा और उन्हें वायरल वीडियो की वजह से पहचान गए। इस दौरान दोनों की बातचीत शुरू हुई। कीनन ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि जेटेन ने उन्हें इंस्टाग्राम पर मैसेज भेजकर बातचीत शुरू की थी। शुरुआत में दोनों का रिश्ता निजी रहा लेकिन अगस्त 2023 में दोनों ने अपने रिश्ते को सार्वजनिक कर दिया। नवंबर 2024 में दोनों ने सगाई की घोषणा की। दोनों की शादी जून 2026 में होनी थी, लेकिन जेटेन के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसे कुछ समय के लिए टाल दिया है। नीदरलैंड समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाला पहला देश नीदरलैंड दुनिया का पहला देश था, जिसने 2001 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी। जेटेन देश के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। हालांकि, वे दुनिया के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री नहीं हैं। उनसे पहले भी दूसरे देशों में खुले तौर पर समलैंगिक नेता सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। सिर्फ 39 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने जेटेन दुनिया के 8 समलैंगिक प्रधानमंत्री 1. योहाना सिगुर्दार्दोतिर – आइसलैंड (2009–2013): वे दुनिया की पहली खुले तौर पर समलैंगिक सरकार प्रमुख बनीं। वे लेस्बियन थीं। उनकी 1970 में शादी हुई थी। उनके 2 बच्चे भी हुए। 1985 में वह एक महिला पत्रकार के करीब आईं। इसके 2 साल बाद उन्होंने तलाक ले लिया। जून 2010 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिलने पर दोनों ने शादी कर ली। 2. एलियो दी रूपो – बेल्जियम (2011–2014): वे बेल्जियम ही नहीं दुनिया के पहले खुले तौर पर गे प्रधानमंत्री बने। 1996 में उप-प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन पर 16 साल के बच्चे के साथ संबंध बनाने का आरोप लगा था। तब पहली बार उनकी पहचान उजागर हुई थी। 3. जेवियर बेटेल – लक्जमबर्ग (2013–2023): बेटेल ने 2008 में पहली बार बताया था कि वे समलैंगिक हैं। PM बनने के डेढ़ साल बाद 2015 में उन्होंने अपने पुरुष पार्टनर गौथियर डेस्टने से शादी की। वे पहले ऐसे गे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पद पर रहते हुए शादी की। 4. लियो वराडकर – आयरलैंड (2017–2024): आयरलैंड में मई 2015 में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के लिए जनमत संग्रह होना था। भारतीय मूल के लियो वराडकर तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने इस जनमत संग्रह को समर्थन देने के लिए पहली बार अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 5. एना ब्रनाबिच – सर्बिया (2017–2024): वे सर्बिया की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वे लेस्बियन हैं। फरवरी 2019 में उनकी पार्टनर ने एक बेटे को जन्म दिया। ऐसे में वे पहली समलैंगिक प्रधानमंत्री बनीं, जिनकी महिला पार्टनर ने उनके कार्यकाल के दौरान बच्चे को जन्म दिया। 6. जेवियर एस्पोट – अंडोरा (2019 से): वे अंडोरा के प्रधानमंत्री हैं और खुले तौर पर समलैंगिक हैं। प्रधानमंत्री बनने के 4 साल बाद 2023 में उन्होंने अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक की। 7. गैब्रियल अत्ताल – फ्रांस (2024): वे फ्रांस के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री बने। 2018 में जब वे मैक्रों की पार्टी के सांसद थे तब पहली बार उनके एक बचपन के दोस्त ने खुलासा किया था कि उनका संबंध एक नेता स्तेफान सेजुर्ने से है। दोस्त ने आरोप लगाया कि सेजुर्ने की वजह से अत्ताल का राजनीतिक करियर आगे बढ़ा। 8. रॉब जेटेन- नीदरलैंड (2026 से): वे नीदरलैंड के पहले खुले तौर पर समलैंगिक प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने फरवरी 2026 में पद संभाला। 17 साल की उम्र में पहली बार एक लड़के से प्यार होने के बाद उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों के सामने अपनी पहचान का खुलासा किया था।
Rakhi Sawant: उत्तर प्रदेश के झांसी की एक अदालत ने अभिनेत्री राखी सावंत के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। यह मामला 2010 में हुई एक आत्महत्या से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो के दौरान एक स्थानीय निवासी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। सरकारी वकील ने शनिवार को यह जानकारी दी।
जिला सरकारी वकील (अपराध) मृदुल कांत श्रीवास्तव ने बताया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अंजलि ने शुक्रवार को यह वारंट जारी किया है। क्योंकि राखी कई बार बुलाए जाने के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुईं।
राखी सावंत से जुड़ा मामला
पीटीआई के अनुसार यह मामला झांसी के हंसारी प्रेम नगर इलाके के रहने वाले लक्ष्मण अहिरवार से जुड़ा है। वकील ने बताया कि 10 नवंबर 2010 को लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली थी। आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो ‘राखी का इंसाफ’ में कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिनसे लक्ष्मण को अपमानित महसूस हुआ।
लक्ष्मण की मां सावित्री ने प्रेम नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2010 में प्रसारित शो के एक एपिसोड के दौरान राखी ने उनके बेटे के खिलाफ अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार लक्ष्मण और उनकी पत्नी अनीता (जो राजगढ़ की रहने वाली थीं) को उनके वैवाहिक विवाद के चलते शो में बुलाया गया था। पति-पत्नी के बीच झगड़े के बाद अनीता अपने मायके लौट गई थीं। श्रीवास्तव ने बताया कि इस मामले की अगली सुनवाई 1 दिसंबर को तय की गई है।
राखी सावंत चर्चा में
हाल ही में राखी सावंत, गोविंदा और सुनीता आहूजा की शादी को लेकर की गई अपनी टिप्पणियों की वजह से चर्चा में थीं। उन्होंने गोविंदा के अपनी को-स्टार कोमल रानी स्वर्णकार के साथ कथित संबंधों पर भी प्रतिक्रिया दी। इस महीने की शुरुआत में पैपराजी से बात करते हुए राखी ने कहा कि वह गोविंदा से इसलिए नाराज हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को नजरअंदाज किया है। उन्होंने कहा- “गोविंदा जी पूरा देश आपसे नाराज है। जिस महिला ने आपसे शादी की आपके दो बच्चों को जन्म दिया और जो 40 सालों से आपके साथ रही आपने उसे छोड़ दिया। यह कोमल कौन है?”
इसके बाद राखी ने दावा किया कि कोमल उनके बारे में बुरा-भला कह रही हैं और उन्होंने कोमल को चेतावनी दी कि वह उनके सामने न आएं। उन्होंने हिंदी में कहा- “वह मेरी बुराई कर रही है और बाकी सेलिब्रिटीज के बारे में भी बकवास कर रही है। चिची भैया ने ही उसे इतनी छूट दी है। सुन लो मुझसे पंगा मत लेना। मैं सुनीता नहीं हूं, मैं तुम्हारी धज्जियां उड़ा दूंगी।” राखी ने कोमल को “पति चोर” भी कहा।
इससे पहले राखी के साथ फोन पर बातचीत के दौरान सुनीता ने आरोप लगाया था कि गोविंदा और कोमल शादी करने की योजना बना रहे हैं। सुनीता का दावा था कि इसी वजह से उन्होंने कोर्ट जाकर अपनी तलाक की अर्जी वापस ले ली थी। हालांकि बाद में गोविंदा के मैनेजर शशि सिन्हा ने दूसरी शादी के इन दावों को पूरी तरह से गलत बताते हुए खारिज कर दिया।

एसआईआर और परिसीमन के बाद भाजपा के चुनाव जीतने के भरोसे का एक आधार महिला आरक्षण की तैयारियां हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण का दांव 2034 के चुनाव के लिए रखा था। तभी 2023 में महिला आऱक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून को पास करते समय उसमें जनगणना और परिसीमन की शर्त जोड़ दी गई। लेकिन 2024 के चुनाव नतीजों के बाद अब सरकार को बेचैनी है कि परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों 2024 के चुनाव में ही लागू किया जाएगा। अगर परिसीमन का फैसला होता है और सीटों की संख्या बढ़ा कर साढ़े आठ सौ की जाती है तो उसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 33 फीसदी आरक्षण के अलावा भी अनारक्षित सीटों पर महिलाओं को टिकट मिलेगी। सो, महिला सदस्यों की संख्या 40 फीसदी तक जा सकती है।
पिछले एक दशक से ज्यादा समय के अपने शासन में नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को एक अलग और स्वतंत्र वोट समूह के रूप में तैयार करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए कई काम किए हैं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पिछले दो दशक में महिलाओं की स्वतंत्र कांस्टीट्यूएंसी विकसित हुई है। अलग अलग राज्यों के नेताओं ने भी इसके लिए काम किया। बिहार में नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल आदि की मिसाल दी जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को अपने साथ जोडऩे के लिए काम किए। शौचालय की योजना से लेकर लखपति दीदी तक कई योजनाएं चलाई गईं।
लोकसभा और राज्यों के चुनाव के बाद पोस्ट इलेक्शन डेटा एनालिसिस में सीएसडीएस और अन्य एजेंसियों ने महिला वोट का जो आकलन किया है उसका निष्कर्ष यह है कि महिलाएं मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को अपेक्षाकृत थोड़ा ज्यादा वोट करती हैं। महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत भी हर चुनाव के साथ बढ़ रहा है। यह भी माना जा रहा है कि महिलाएं जाति के बंधन से निकल कर वोट कर रही हैं। तीन तलाक को अवैध करने के फैसले के बाद यह भी दावा किया जाता है कि मुस्लिम महिलाओं के भी कुछ वोट भाजपा को मिलते हैं।
अब भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लग रहा है कि अगर इस समय लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया जाए तो कम से कम एक चुनाव में तो महिलाओं का वोट थोक में हासिल किया जा सकता है। हालांकि यह भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार की सदिच्छा है, जो हो सकता है कि पूरी नहीं भी हो। कई बार इस तरह के दांव उलटा पड़ जाते हैं। कांग्रेस जब केंद्र में थी तब उसने 2014 के चुनाव से ठीक पहले आंध्र प्रदेश का विभाजन यह सोच कर किया था कि इससे 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी खत्म होगी और अगर आंध्र में नहीं तो नए राज्य तेलंगाना में तो कांग्रेस जरूर जीत जाएगी। लेकिन अगले दो चुनाव तक वह तेलंगाना तो नहीं ही जीती, आंध्र प्रदेश से साफ अलग हो गई। तीन चुनाव से आंध्र में कांग्रेस का खाता नहीं खुल रहा है।
बहरहाल, भाजपा और नरेंद्र मोदी एसआईआर के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में हैं। इससे भरोसा बना है कि 2029 हर हाल में जीतेंगे। विपक्ष महिला आरक्षण के समर्थन में है। लेकिन उसकी कई पार्टियां आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि अगर महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण नहीं मिला तो संभव है कि लोकसभा और विधानसभाओं में इन जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व कम हो। अगर यह मुद्दा बनता है तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। वैसे भाजपा अब कांग्रेस व अन्य प्रादेशिक पार्टियों से ज्यादा जातीय मामलों की चैंपियन बन गई है। हिदुत्व से ज्यादा भाजपा नेता अब जाति की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी को ओबीसी और एससी, एसटी का नया मसीहा बनाया जा रहा है।

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा।
यदि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव को पांच महीने पुरानी सुवेंदु अधिकारी सरकार की परीक्षा मानें तो कह सकते हैं कि सुवेंदु शत प्रतिशत अंक के साथ उतीर्ण हुए हैं। नंदीग्राम सीट जीतने का जो रिकॉर्ड उन्होंने खुद बनाया था वह रिकॉर्ड उनकी उम्मीदवार हसीरानी रथ ने तोड़ दिया। इस रिकॉर्ड का टूटना सुवेंदु अधिकारी की अपनी उपलब्धि में शुमार होगा। सुवेंदु ने 2016 के चुनाव में एक रिकॉड बनाया था, जब उन्होंने सीपीआई के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार से ज्यादा वोट से हराया था। उसके 10 साल बाद 2026 के उपचुनाव में उनकी चुनी हुई उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मिलन प्रधान को एक लाख 22 हजार से ज्यादा वोट से हराया। यह निजी तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर सिर्फ नंदीग्राम की जनता की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता की स्वीकृति की मुहर है।
नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह चुनाव परिणाम दशकों से स्थापित कई राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं को तोड़ने वाला है।
रेजिनगर विधानसभा सीट मुर्शिदाबाद जिले में आती है, जहां पूरे जिले में औसत मुस्लिम आबादी 55 से 60 फीसदी के करीब है। उसमें भी रेजिनगर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 70 फीसदी है। मुर्शिदाबाद जिले के ही बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी है। बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने एजेयूपी नाम से पार्टी का गठन किया और दो सीटों से चुनाव लड़े। तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद वे दोनों सीटों से जीते। रेजिनगर सीट पर हुमायूं कबीर 58 हजार से ज्यादा वोट से जीते थे। लेकिन उनके इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद 75 हजार से ज्यादा वोट से हारे। हुमायूं कबीर जितने वोट से जीते थे उतना वोट भी उनके बेटे को नहीं मिला। रेजिनगर सीट के चुनाव परिणाम की एक विशेष बात यह भी रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्री पार्टियों यानी कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथी तीनों को मिला कर सिर्फ 13 हजार वोट मिले। लगातार 15 साल पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक रबीउल आलम चौधरी को सिर्फ 3,797 वोट मिले।
जिस विधानसभा सीट पर 70 फीसदी मुस्लिम आबादी हो उस सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को 63 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। अगर तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि सभी 30 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया तब भी कम से कम 33 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिले हैं। हर तीन में से एक मुस्लिम मतदाता ने भाजपा को वोट किया है। यह बहुत बड़ा और पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम इसलिए है क्योंकि पांच महीने पहले के चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले थे। पांच महीने के अंदर 36 फीसदी वोट का स्विंग अभूतपूर्व है। यह मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार में आए एक बड़े बदलाव का संकेत है।
इस चुनाव परिणाम के अलग अलग आयामों को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहला और स्पष्ट आय़ाम यह है कि सुवेंदु अधिकारी ने अपने पांच महीने के छोटे से कार्यकाल में जो काम किया है उससे उन्होंने समाज के सभी वर्गों का भरोसा जीता है। इसमें समान रूप से मुस्लिम भी शामिल हैं। आंकड़े इसकी कहानी खुद बता रहे हैं। रेजिनगर में भाजपा के उम्मीदवार को जितना वोट हिंदुओं का मिला है उससे ज्यादा वोट मुसलमानों का मिला है। यह किसी भय या दबाव का नतीजा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मुसलमानों ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व को स्वीकार किया है। यह उनके व्यक्तित्व का कमाल है कि उन्होंने मुस्लिमों का आह्वान किया और दोस्ती का मौका दिया तो मुस्लिम समाज ने इसे दिल खोल कर स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा के प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ दिया। सुवेंदु अधिकारी उनको यह भरोसा दिलाने में सफल रहे हैं कि उनका हिंदुत्व किसी दूसरे धर्म को मानने वाले को नुकसान पहुंचाने या प्रताड़ित करने वाला नहीं है। उनका हिंदुत्व समावेशी है। मुसलमानों के मन में यह भरोसा इसलिए भी बना क्योंकि सुवेंदु सरकार ने सरकार की समस्त लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जारी रखा, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।
ऐसे ही कानून व्यवस्था बहाल करने और राज्य में हिंसा, वसूली, तोलाबाजी, कट-मनी आदि की संस्कृति को समाप्त करने के लिए भी सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो काम किया वह किसी जाति या धर्म को ध्यान में रख कर नहीं किया। असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हुई, जिससे समाज में शांति बहाल हुई है। समाज में शांति बहाली का लाभ हर धर्म व जाति के लोगों को मिलता है। दशकों तक लेफ्ट और फिर डेढ़ दशक तक तृणमूल कांग्रेस के शासन में अराजकता, हिंसा और लूट से हर जाति व धर्म के लोग त्रस्त थे। उनको लेफ्ट व तृणमूल शासन में हुए शोषण का अहसास हुआ है। तभी उनके लिए सुवेंदु का शासन ताजा हवा के झोंके की तरह है। कह सकते हैं कि सरकार ने पांच महीने की छोटी सी अवधि में जिस तरह से शांति और सौहार्द्र स्थापित किया है उसी का परिणाम है कि भाजपा रेजिनगर जैसी सीट पर जीती और नंदीग्राम में जीत का रिकॉर्ड स्थापित किया।
यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि रेजिनगर जैसी ही सामाजिक संरचना वाली असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी जीती है। नगांव में लगभग 60 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद इस सीट पर भाजपा के देबाशीष शर्मा डेढ़ लाख वोट से चुनाव जीते। असम में मुसलमानों के मसीहा माने जाने वाले जमात और एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल खुद उस सीट पर चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद 40 फीसदी हिंदू आबादी वाली सीट पर भाजपा उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु को सवा लाख से भी कम वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहीं। नगांव सीट की जीत भी समावेशी और लोक कल्याण की राजनीति की जीत है। यह भी मुस्लिम मतदाताओं के बदलते व्यवहार का संकेत है। ध्यान रहे जब बदरूद्दीन अजमल ने पार्टी बनाई थी, तब राज्य के बड़े हिस्से में मुस्लिम कांग्रेस को छोड़ कर उनके साथ गए थे। पिछले दो चुनावों में दिखा कि मुस्लिम अजमल को छोड़ कर कांग्रेस की ओर लौटे। लेकिन इस साल मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजों से सबक लेकर मुस्लिम मतदाता अब अपनी नई पोजिशनिंग करते दिख रहे हैं। कुछ मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ की बाइनरी से निकल कर भाजपा को भी एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। यह दोनों की राजनीति के लिए चिंता की बात होगी।
अगर रेजिनगर व नंदीग्राम विधानसभा और नगांव लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों के व्यापक असर की बात करें तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसका एक बड़ा संदेश है। इससे यह धारणा निर्णायक रूप से टूटी है कि मुस्लिम किसी हाल में भाजपा को वोट दे ही नहीं सकता है। अगर सरकार समावेशी हो, लोक कल्याणकारी हो और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली हो तो मुस्लिम भी उसको वोट कर सकते हैं। वैसे भी तीन तलाक समाप्त होने और उसे अवैध बनाए जाने के बाद से मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का समर्थन करता है और उनकी पार्टी को वोट करता है। चुनाव बाद जुटाए गए कई राज्यों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन इस तरह का बदलाव अगर मुस्लिम मतदाताओं के व्यवहार में दिखता है तो उससे सामाजिक व राजनीतिक विभाजन कम होगा। भारत का समाज भी समावेशी बनेगा और तुष्टिकरण की राजनीति भी समाप्त होगी।
जहां तक विपक्ष की बात है तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस और उसकी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के लिए इन नतीजों में दो बड़े संकेत छिपे हैं। पहला, मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति नफरत का भाव भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद मुसलमान पूर्वाग्रह छोड़ कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। दूसरा, तुष्टिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियों से मुसलमानों का मोहभंग हो रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल और असम जैसी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम अब पारंपरिक सेकुलर पार्टियों की बजाय मुस्लिम नेताओं वाली पार्टियों की ओर देख रहे हैं। तभी नगांव में बदरूद्दीन अजमल और रेजिनगर में गुलाम नबी आजाद दूसरे स्थान पर रहे। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकराया। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)
Nana Patekar Wife: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को 75 साल की उम्र में निधन हो गया। खबरों के मुताबिक गोवा में अपने घर पर उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाए। एक्टर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है। बचपन में उनकी एक छोटी बहन उन्हें प्यार से ‘नाना’ बुलाती थी। बाद में यही नाम उनकी पहचान का जरिया बना। उनके पासपोर्ट और आधार कार्ड पर भी ‘नाना पाटेकर’ ही लिखा गया है।
नाना अपनी दमदार एक्टिंग और स्क्रीन पर अपनी खास मौजूदगी के लिए तो मशहूर थे ही, लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ भी हमेशा चर्चा का विषय रही। उनके रिश्तों में एक रिश्ता जो अक्सर चर्चा में रहा… वह था नीलकंती पाटेकर के साथ उनकी शादी। कहा जाता है कि वे बिना तलाक लिए ही करीब 35 साल तक उनसे अलग रहे।
नाना पाटेकर की पत्नी नीलकंती पाटेकर कौन हैं?
नाना पाटेकर की पत्नी नीलकंती पाटेकर हैं। दोनों की पहली मुलाकात थिएटर के दिनों में हुई थी। साथ काम करते-करते उनकी दोस्ती धीरे-धीरे एक रिश्ते में बदल गई। नाना और नीलकंती की शादी 1978 में हुई थी। शादी का कुल खर्च 750 रुपए आया था। कपल के दो बेटे हुए – दुर्वासा पाटेकर और मल्हार पाटेकर।
शुरुआत में नीलकंती बैक में अधिकारी हुआ करती थीं। लेकिन फिर पूरी तरह से एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से जुड़ गईं। उन्होंने छह साल की उम्र में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर एक्टिंग शुरू की थी और बाद में मराठी सिनेमा में काम किया। उन्होंने एक राइटर के तौर पर भी काम किया है और अपने काम के लिए नेशनल अवॉर्ड भी जीता है। लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद उन्होंने विक्की कौशल की फिल्म ‘छावा’ से पर्दे पर वापसी की थी।
नाना पाटेकर और नीलकंती के बड़े बेटे का हुआ जब निधन
नाना और नीलकंती की निजी जिंदगी में भी एक बहुत मुश्किल दौर आया था, जब उनके बड़े बेटे दुर्वासा की मौत ढाई साल की उम्र में हो गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक दुर्वासा को जन्म से ही सेहत से जुड़ी परेशानियां थीं। बाद में उनके छोटे बेटे मल्हार पाटेकर ने फिल्म इंडस्ट्री में कैमरे के पीछे काम करना शुरू किया। उन्होंने राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया और नाना साहब प्रोडक्शन हाउस से भी जुड़े रहे हैं। अपने पिता के उलट मल्हार ज्यादातर लाइमलाइट से दूर रहे हैं और अपनी निजी जिदगी को निजी ही रखते हैं।
नाना पाटेकर और उनकी पत्नी 35 साल तक रहे अलग
कानूनी तौर पर कभी तलाक न लेने के बावजूद नाना और नीलकंती लगभग 35 साल तक अलग-अलग रहे। नाना ने ‘द लल्लनटॉप’ के साथ एक इंटरव्यू में अपनी शादी के बारे में बात की थी। उनके अनुसार उनके व्यक्तित्व और सोचने के तरीकों में अंतर के कारण उनके लिए एक साथ रहना मुश्किल हो गया था। आखिरकार दोनों ने आपसी सहमति से अलग-अलग जीवन जीने का फैसला किया।
अलग होने के बावजूद नाना नीलकंती का सम्मान करते रहे और दोनों ने कभी भी तलाक के जरिए अपनी शादी को औपचारिक रूप से खत्म नहीं किया। पारंपरिक मानकों के हिसाब से उनका रिश्ता असामान्य था, लेकिन नाना की बातों से पता चलता है कि अलग रहने का फैसला इस समझ के साथ लिया गया था कि उनके व्यक्तित्व इतने अलग थे कि वे एक ही घर में नहीं रह सकते थे।
भले ही नाना हिंदी और मराठी सिनेमा के सबसे जाने-माने अभिनेताओं में से एक थे, लेकिन उन्होंने अपनी पारिवारिक जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा लोगों की नजरों से दूर रखा। उनकी शादी, उनके बड़े बेटे का निधन और नीलकंती से उनकी लंबी दूरी कभी-कभी चर्चा का विषय बनीं, लेकिन नाना और उनके परिवार ने आम तौर पर अपने निजी रिश्तों को लेकर गोपनीयता बनाए रखी।
75 साल की उम्र में उनके निधन के बाद लोगों का ध्यान एक बार फिर सिनेमा से दूर उनके जीवन के कम सामने आए पहलुओं की ओर गया है, जिसमें नीलकंती के साथ उनकी दशकों लंबी शादी और अलग-अलग रहने के बावजूद शादीशुदा बने रहने का उनका फैसला शामिल है।
Aadhaar Name Correction: अगर आपके आधार कार्ड में नाम की स्पेलिंग गलत दर्ज हो गई है, शादी के बाद सरनेम बदलना चाहते हैं या फिर अपना नाम पूरी तरह बदलना चाहते हैं, तो अब यह प्रक्रिया नए SOP नियमों के तहत होगी। UIDAI द्वारा जारी ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ 2026 के तहत नाम में संशोधन के लिए अलग-अलग दस्तावेज और एफिडेविट की अनिवार्य शर्तें लागू कर दी गई हैं।
UIDAI का यह नया SOP 18 सितंबर 2026 से प्रभावी हो चुका है। इसके तहत आधार में नाम सुधार के लिए आवेदक को निर्धारित दस्तावेज जमा करने होंगे, जिनकी प्रामाणिकता, एफिडेविट और गजट नोटिफिकेशन की UIDAI द्वारा कड़ी जांच की जाएगी।
माइनर नेम चेंज में क्या-क्या शामिल है?
नियमों के तहत छोटे संशोधनों को माइनर बदलाव की श्रेणी में रखा गया है। इसके अंतर्गत ये संशोधन आते हैं:
- नाम के संक्षेप या इनिशियल्स का विस्तार करना।
- मिडल नेम या लास्ट नेम (सरनेम) जोड़ना या हटाना।
- शब्दों या नामों के क्रम में बदलाव करना।
- स्पेलिंग की छोटी-मोटी गलतियों को सुधारना (जहां उच्चारण/ध्वनि समान हो)।
- नाम के बीच से डॉट (.) हटाना या रैंडम कैपिटल लेटर्स की गलतियों को ठीक करना।
जैसे अगर किसी का नाम ‘Rama Prasad’ है, तो वह उसे बढ़ाकर ‘Rama Shyam Prasad’ करवा सकता है। इसे पहचान में पूर्ण बदलाव नहीं माना जाता है।
2. शादी या तलाक के बाद नाम में बदलाव
शादी के बाद सरनेम बदलना या तलाक के बाद नाम में संशोधन करने के लिए विशेष नियम तय किए गए हैं:
आवश्यक दस्तावेज: इसके लिए Annexure D का निर्धारित एफिडेविट और प्रूफ ऑफ आइडेंटिटी (पहचान पत्र) देना होगा।
शर्त: इस एफिडेविट में यह स्पष्ट करना होता है कि नाम में यह बदलाव केवल विवाह या विवाह विच्छेद के कारण है और इससे व्यक्ति की मूल पहचान नहीं बदल रही है।
3. डेटा-एंट्री गलती के कारण हुई स्पेलिंग मिस्टेक
अगर आधार बनवाते या अपडेट कराते समय आपने सही दस्तावेज दिए थे, लेकिन ऑपरेटर की गलती (डेटा-एंट्री एरर) की वजह से नाम गलत दर्ज हो गया:
वयस्कों के लिए: इसके लिए Annexure B का एफिडेविट और प्रूफ ऑफ आइडेंटिटी(PoI) या प्रूफ ऑफ रिलेशनशिप(PoR) जमा करना होगा।
नाबालिगों के लिए: Annexure C का एफिडेविट और PoI/PoR जमा करना अनिवार्य है।
भाषा में गलती: अगर आपका नाम अंग्रेजी में सही है लेकिन भाषा में गलत प्रिंट हो गया है, तो निर्धारित एफिडेविट और PoI जमा करके इसे ठीक कराया जा सकता है।
4. नाम में पूरी तरह बदलाव के लिए गजट नोटिफिकेशन
अगर आप अपना नाम पूरी तरह बदल रहे हैं या ऐसा बदलाव कर रहे हैं जिससे आपकी पुरानी पहचान बदलती है, तो इसे Major Name Change माना जाएगा।
अनिवार्य शर्त: इस श्रेणी में नाम बदलने के लिए सरकारी गजट नोटिफिकेशन जमा करना अनिवार्य है। बिना गजट नोटिफिकेशन के पूरा नाम नहीं बदला जा सकता।
महत्वपूर्ण अपडेट: UIDAI अब नाम सुधारने की सुविधा ऑनलाइन पर नहीं दे रहा है। नाम में किसी भी तरह के सुधार के लिए आवेदक को नजदीकी आधार नामांकन/अपडेट केंद्र ही जाना होगा।
आधार में नाम सुधारने का स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस
आधार में नाम अपडेट कराने के लिए आपको इन चरणों का पालन करना होगा:
कैटेगरी पहचानें: सबसे पहले तय करें कि आपका नाम सुधार माइनर है, शादी के बाद का बदलाव है, डेटा-एंट्री एरर है या फिर मेजर नेम चेंज है।
दस्तावेज जुटाएं: अपनी कैटेगरी के अनुसार निर्धारित सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स (PoI, PoR या गजट नोटिफिकेशन) तैयार करें।
एफिडेविट बनवाएं: अगर लागू हो, तो निर्धारित फॉर्मेट (Annexure B, C या D) में एफिडेविट या डिक्लेरेशन तैयार कराएं।
आधार केंद्र जाएं: अपने नजदीकी आधार नामांकन/अपडेट केंद्र पर जाएं।
आवेदन जमा करें: नाम अपडेट फॉर्म भरकर सभी जरूरी दस्तावेजों की कॉपी ऑपरेटर को सौंपें।
सत्यापन: ऑपरेटर द्वारा बायोमेट्रिक और डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी कराएं।
रसीद लें: प्रक्रिया पूरी होने पर अपडेट रिक्वेस्ट की पावती प्राप्त करें।
स्टेटस ट्रैक करें: रसीद पर दिए गए URN का उपयोग करके UIDAI के आधिकारिक पोर्टल पर अपनी रिक्वेस्ट का स्टेटस ट्रैक करें।
न्यूरालिंक की एग्जीक्यूटिव शिवॉन जिलिस ने इलॉन मस्क के साथ ब्रेकअप होने की पुष्टि की है। उन्होंने शुक्रवार को X पर पोस्ट कर बताया कि एक हफ्ते में बात प्यार से अलगाव तक पहुंच गई। उन्हें इसकी पहले से कोई वॉर्निंग नहीं मिली थी। जिलिस ने कहा- मैं इस अलगाव से दुखी हैं, लेकिन मस्क की अब भी बहुत परवाह करती हूं। मैं चाहूंगी कि वे हमेशा खुशी रहें। मुझे उम्मीद है कि हम दोनों आगे भी अच्छे दोस्त रहेंगे और अपने बच्चों की साथ में परवरिश में करेंगे। शिवॉन जिलिस का बयान ऐसे समय में आया, जब सोशल मीडिया पर लोगों ने ध्यान दिया कि मस्क ने X अकाउंट पर जिलिस को अनफॉलो कर दिया है। इसके बाद जिलिस ने X पर ही ब्रेकअप की जानकारी दी। मस्क X के मालिक हैं, जिसे पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था। मस्क 14 बच्चों के पिता, जिलिस 2021 से 2025 के बीच 3 बार मां बनीं शिवॉन जिलिस और इलॉन मस्क के 4 बच्चे हैं। इनमें जुड़वां बच्चे स्ट्राइडर और एज्योर, बेटी अर्काडिया और बेटा सेल्डन लाइकर्गस शामिल हैं। मस्क ने 2021 में जुड़वां बच्चों के जन्म की जानकारी दी थी। वहीं, अर्काडिया का जन्म 2024 में हुआ था। इसके बाद जिलिस ने 28 फरवरी 2025 को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चौथे बच्चे सेल्डन लाइकर्गस के जन्म की जानकारी दी थी। हालांकि, उन्होंने बच्चे की सटीक जन्म तारीख नहीं बताई थी। सेल्डन इलॉन मस्क का 14वां बच्चा है। मस्क ने 2 शादिया कीं, 3 गर्लफ्रेंड्स रहीं 1990 के दशक में कनाडा की क्वीन्स यूनिवर्सिटी में फिजिक्स की पढ़ाई के दौरान मस्क की मुलाकात इंग्लिश लिटरेचर की स्टूडेंट जस्टिन विल्सन से हुई। मस्क को विल्सन से एक ही नजर में प्यार हो गया। कई साल डेट करने के बाद दोनों ने जनवरी 2000 में शादी कर ली। 2 साल बाद पहले बेटे नेवाडा का जन्म हुआ, जब वह दस हफ्ते का था तो इंफेंट डेथ सिंड्रोम से उसकी मौत हो गई। 2004 में कपल ने IVF के जरिए जुड़वां बच्चों विवियन और ग्रिफिन का वेलकम किया। 2006 में तीन बच्चे काई, सैक्सन और डेमियन भी IVF से हुए। 2008 में मस्क और जस्टिन विल्सन का तलाक हो गया। 2008 में इलॉन ने ब्रिटिश स्टार तालुलाह रिले के साथ डेटिंग शुरू की। 2010 में दोनों ने शादी की। हालांकि 2012 में तलाक हो गया। 2013 में उन्होंने फिर से शादी की। दिसंबर 2014 में तालुलाह ने दूसरी बार तलाक की अर्जी दायर की, लेकिन अगले साल इसे वापस ले लिया। मार्च 2016 में तालुलाह ने तीसरी बार अर्जी दायर की और तलाक लिया। कपल का कोई बच्चा नहीं है। इलॉन ने एक्ट्रेस एम्बर हर्ड को 2016 के अंत और 2017 की शुरुआत में कई महीनों तक डेट किया। एम्बर के पूर्व पति जॉनी ने बाद में एम्बर पर इलॉन के साथ उसे धोखा देने का आरोप लगाया, जबकि वे शादीशुदा थे, लेकिन इलॉन और एम्बर दोनों ने इस संबंध से इनकार किया। वे 2017 की गर्मियों में अलग हो गए और नवंबर 2017 में इलॉन ने बताया कि वह एम्बर के साथ ‘वास्तव में प्यार में’ थे। इलॉन मस्क और सिंगर ग्रिम्स ने मेट गाला में रेड कार्पेट पर डेब्यू करने से एक महीने पहले अप्रैल 2018 में डेटिंग शुरू की थी। मई 2020 में कपल ने अपने पहले बच्चे का वेलकम किया। इसका नाम X Æ A-12 रखा। दिसंबर 2021 में सरोगेसी के जरिए बेटी एक्सा डार्क साइडरेल हुई। 2022 में दोनों अलग हो गए। पिछले साल यह भी सामने आया कि कपल का तीसरा बच्चा टेक्नो मैकेनिक्स है। बच्चे के बारे में उसकी सही जन्मतिथि सहित बहुत कम जानकारी है। फिलहाल इलॉन मस्क न्यूरालिंक एग्जीक्यूटिव शिवोन जिलिस के साथ रिश्ते में हैं। कपल ने बताया है कि उन्होंने हाल ही में तीसरे बच्चे का स्वागत किया है। इलॉन और शिवोन ने नवंबर 2021 में जुड़वां बच्चों स्ट्राइडर और एज्योर का वेलकम किया था। मस्क का मानना है कि दुनिया इस समय कम जनसंख्या के संकट का सामना कर रही है और अच्छे IQ वाले लोगों को बच्चे पैदा करने चाहिए। मस्क ने कहा था- दुनिया में कम जनसंख्या का संकट इलॉन ने 2010 में ब्रिटिश स्टार तालुलाह रिले से शादी की थी। हालांकि, 2012 में तलाक हो गया। इसके बाद उन्होंने फिर से आपस में शादी कर ली। दिसंबर 2014 में तालुलाह ने दूसरी बार तलाक की अर्जी दायर की, लेकिन अगले साल इसे वापस ले लिया। मार्च 2016 में तालुलाह ने तीसरी बार तलाक अर्जी दायर की और तलाक ले लिया। कपल का कोई बच्चा नहीं है। मस्क का मानना है कि दुनिया इस समय कम जनसंख्या के संकट का सामना कर रही है और अच्छे IQ वाले लोगों को बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने 2021 में कहा था कि अगर लोग ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करेंगे, तो हमारी सभ्यता खत्म हो जाएगी।

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है।
पंकज दुबे
सेक्स के बारे में हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह नहीं कि हम उसके बारे में कम जानते हैं। दिक्कत यह है कि हम उसके बारे में खुलकर सोचते भी कम हैं।
हमारे समाज में सेक्स या तो नैतिकता का विषय रहा है, या अपराध बोध का, या फिर चुपचाप उपभोग की जाने वाली चीज़। प्रेम पर कविता लिखी जा सकती है, विरह पर गीत बनाया जा सकता है, लेकिन इच्छा पर बात आते ही भाषा धीमी पड़ जाती है। इसलिए ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ को सिर्फ चार कामुक कहानियों की तरह देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी।
विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज की चार कहानियां दरअसल एक ही मानवीय इलाके में घूमती हैं कि ‘हम आखिर चाहते क्या हैं’? और उससे भी बड़ा सवाल कि हम जो चाहते हैं, क्या उसके बारे में अपने साथी से बात कर पाते हैं? यही वह जगह है जहां सेक्स धीरे-धीरे रिश्ते का विषय बन जाता है।
मोटवानी की कहानी में दो विवाहित स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में आई ऊब को तोड़ने के लिए एक असामान्य रास्ता सोचती हैं। कहानी में हास्य है, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर प्रश्न है, “क्या विवाह में साथ रहना अपने आप अंतरंग बने रहना भी है?”
विवाह की शुरुआत में दूसरा व्यक्ति रहस्य होता है। फिर वह परिचित होता है। फिर बहुत परिचित। और कभी-कभी इतना परिचित कि जिज्ञासा ही खत्म हो जाती है। शायद इच्छा का एक हिस्सा नवीनता नहीं, दूसरे को फिर से देखने की क्षमता है। मोटवानी की कहानी इसी खोई हुई दृष्टि को हल्के-फुल्के ढंग से पकड़ती है। खास बात यह है कि यहां स्त्री की कामना किसी पुरुष की इच्छा के जवाब में नहीं, अपने आप में मौजूद मानवीय इच्छा है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।
किरण राव इस इच्छा को और भीतर ले जाती हैं। उनकी कहानी में आकर्षण सिर्फ़ उस व्यक्ति का नहीं है जो सामने मौजूद है; उसमें उस व्यक्ति की हमारी बनाई हुई कल्पना भी शामिल है। हम किसी को देखते हैं और फिर अपने मन में उसका एक संस्करण बना लेते हैं। कभी-कभी हम इंसान से नहीं, उसके बारे में अपनी कल्पना से आकर्षित होते हैं। यानी कामना की पहली मंज़िल शरीर नहीं बल्कि कल्पना है।
शकुन बत्रा के यहां यह कल्पना विवाह के टूटने के बाद भी शरीर में बनी रहती है। रिश्ता खत्म करने का फैसला हो चुका है, लेकिन आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।यह असुविधाजनक स्थिति इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जीवन में भावनाएं अनुबंधों की तरह समाप्त नहीं होतीं। तलाक का कागज़ कह सकता है कि रिश्ता ख़त्म। शरीर शायद कहे, अभी नहीं। यहीं फ़िल्म सेक्स को एक ऐसी भाषा की तरह देखती है जो उस समय भी बोल सकती है जब शब्दों ने जवाब देना बंद कर दिया हो।
और विशाल भारद्वाज कामना को लगभग पूरी तरह मन के हवाले कर देते हैं। साहित्य, कल्पना, आवाज़ और स्मृति मिलकर एक ऐसा संसार बनाते हैं जहां इच्छा को किसी शारीरिक घटना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है। इस विचार को ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ पर रखें तो चारों कहानियां एक दिलचस्प नक्शा बनाती हैं।
कहीं इच्छा को विवाह की ऊब से मुक्ति चाहिए। कहीं वह कल्पना में अपना संसार बना रही है। कहीं रिश्ता खत्म हो चुका है, लेकिन शरीर पीछे छूट गया है।
कहीं साहित्य और कल्पना देह से पहले इच्छा को जगा रहे हैं। तो फिर सेक्स आखिर है क्या? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। कभी वह सुख है। कभी रोमांच। कभी ये पुष्टि कि मैं अभी भी आकर्षक हूं। और कभी पलायन कि कुछ देर के लिए अपनी ज़िंदगी की दूसरी सारी परेशानियां भूल सकूं। और कभी-कभी वह उस अकेलेपन के खिलाफ मनुष्य का सबसे पुराना प्रतिरोध है, जिसे शब्दों में स्वीकार करना मुश्किल होता है। यहीं ओशो का ‘ध्यान’ वाला विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि ध्यान का अर्थ पूरी तरह वर्तमान क्षण में होना है, तो अंतरंगता में भी ऐसी ही उपस्थिति की संभावना है। जब दो लोग सचमुच एक-दूसरे के साथ होते हैं, तब कुछ समय के लिए सामाजिक भूमिकाएं, चिंता, प्रदर्शन और आत्म-संदेह पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा फ़र्क़ है। सेक्स अपने आप ध्यान नहीं है। जागरूकता उसे एक अलग अनुभव बना सकती है। और जागरूकता का अर्थ है कि मैं सिर्फ़ अपनी इच्छा को नहीं देख रहा; मैं सामने वाले मनुष्य को भी देख रहा हूं।
यहीं से कामना और अंतरंगता अलग हो जाती हैं। कामना पूछती है, ‘मुझे क्या चाहिए?’ अंतरंगता पूछती है, ‘हम दोनों के बीच अभी क्या हो रहा है?’ यह फ़र्क़ विवाह के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि विवाह में सबसे बड़ा संकट हमेशा सेक्स की कमी नहीं होता। कभी-कभी संकट यह होता है कि हम अपने साथी के बारे में नई चीज़ें जानना बंद कर देते हैं। उसे देखकर हमें कुछ नया महसूस नहीं होता। उसकी चुप्पी पढ़ने की कोशिश नहीं करते। उसके बदलते शरीर को नहीं देखते। उसकी बदलती इच्छाओं के बारे में नहीं पूछते। हम व्यक्ति को उसकी भूमिका में बदल देते हैं मसलन पति, पत्नी, मां, पिता, कमाने वाला, घर संभालने वाला। और जिस दिन व्यक्ति की जगह भूमिका ले लेती है, उस दिन अंतरंगता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
यहीं ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ अपने शीर्षक से कहीं बड़ा हो जाता है। यह सिर्फ ‘लस्ट’ की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो चाहा जाना चाहता है, देखा जाना चाहता है और अपने भीतर अभी भी जीवित किसी हिस्से को महसूस करना चाहता है। चारों फ़िल्मों में कामना के रूप अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ में पहचान का प्रश्न है। क्या मैं अभी भी आकर्षक हूं? क्या कोई मुझे देखता है? क्या मेरे भीतर अभी भी कुछ ऐसा है जिसे कोई पाना चाहता है? क्या मैं अपने साथी को अब भी वैसे देख सकता हूं? और शायद सबसे कठिन सवाल कि ‘क्या मैं खुद को अब भी वैसे देख सकता हूं’?
यही वजह है कि फ़िल्म में सेक्स जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थित चीज़ें महत्वपूर्ण हैं जैसे बातचीत, जिज्ञासा, असुरक्षा, कल्पना, स्मृति और वह भावनात्मक दूरी जिसे कोई शारीरिक निकटता हमेशा भर नहीं सकती।
सभी निर्देशक इन चीज़ों को अलग-अलग सुरों में छूते हैं। मोटवानी के यहां हास्य है, किरण राव के यहां भ्रम, शकुन बत्रा के यहां रिश्ते के टूटने की बेचैनी और विशाल भारद्वाज के यहां कल्पना का सम्मोहन।
इनमें कोई एक कहानी दूसरी पर निर्णायक रूप से भारी नहीं पड़ती; असली दिलचस्पी इन चार दृष्टियों को साथ देखने में है। क्योंकि तब ‘लस्ट’ एक शारीरिक शब्द नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन जाता है। हम किस चीज़ के लिए तरस रहे हैं? और शायद इस सवाल का जवाब सेक्स से बहुत बड़ा है।
कभी हम स्पर्श के लिए तरसते हैं। कभी ध्यान के लिए। कभी स्वीकार किए जाने के लिए। कभी पुराने प्रेम में नई रोशनी के लिए। और कभी सिर्फ़ इस आश्वासन के लिए कि हमारी ज़िंदगी अभी पूरी तरह आदत नहीं बनी है।
इसलिए सेक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद उसका चरम सुख नहीं, बल्कि उसकी क्षमता है कि कुछ देर के लिए वह हमें अपनी बनाई हुई दुनिया से बाहर निकाल सके। लेकिन विडंबना देखिए कि हम सेक्स का इस्तेमाल कभी-कभी अकेलेपन से बचने के लिए करते हैं, जबकि सच्ची अंतरंगता हमें अकेलेपन के कारण से सामना कराती है।
मेरे भीतर ऐसा क्या खाली है, जिसे मैं दूसरे की देह से भरना चाहता हूं? यह सवाल आसान नहीं है। शायद इसी कारण हम इसे पूछना भी नहीं चाहते।
‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ की असली दिलचस्पी इसी असुविधा में है। यह हमें सेक्स के बारे में सोचने के बहाने रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। और ओशो को संदर्भ में रखें तो शायद यात्रा कुछ ऐसी बनती है- दमन से मुक्ति तक। कामना से जागरूकता तक। शरीर से उपस्थिति तक। और उपस्थिति से अंतरंगता तक।
क्योंकि अंततः किसी रिश्ते का सबसे कामुक हिस्सा शायद शरीर नहीं होता। वह क्षण होता है जब सामने वाला मनुष्य आपको महसूस कराता है कि मैं तुम्हें देख रहा हूं। तुम मेरे लिए अभी भी एक रहस्य हो।शायद प्रेम का भविष्य इसी छोटे-से रहस्य में छिपा है। और शायद कामना का भी। कामना के उस पार सेक्स नहीं, एक-दूसरे को फिर से खोज लेने की संभावना है।
देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)
मद्रास: हाई कोर्ट में वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान मदुरै बेंच के सामने घर और परिवार की जिम्मेदारियों से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया। इस मामले में पति-पत्नी की भूमिका और परिवार को संभालने से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा हुई।
यह मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपति का था। दोनों की शादी 2011 में हुई थी और उस समय वे पुडुचेरी के एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करते थे। 2012 में उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद पत्नी बच्चों की देखभाल के लिए अपने माता-पिता के साथ रहने लगी, जबकि पति ने कार्डियोलॉजी की आगे की पढ़ाई जारी रखी। फिर 2016 में दोनों का दूसरा बच्चा हुआ।
COVID-19 महामारी के बाद दोनों साथ रहने लगे, लेकिन कुछ समय बाद उनके बीच विवाद हो गया। पत्नी ने साथ रहने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया, जबकि पति ने तलाक की मांग की। फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों ने हाई कोर्ट में अपील की।
कोर्ट ने हाउस-हसबैंड के रोल का जिक्र कुछ इस तरह किया
सुनवाई के दौरान बेंच ने परिवार में अलग-अलग जिम्मेदारियों को लेकर बात की। कोर्ट ने कहा कि परिवार बहुत जरूरी है और घर संभालने के काम को भी कमाई जितनी अहमियत मिलनी चाहिए। साथ ही कहा कि यदि हाउसवाइफ का रोल हो सकता है तो हाउस-हसबैंड का रोल भी हो सकता है। बेंच ने यह भी कहा कि ‘होममेकर’ (Homemaker) शब्द किसी एक जेंडर को नहीं बताता है। कोर्ट ने घर के काम की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कही बात का भी जिक्र किया।
सुनवाई के दौरान पति ने बच्चों की भलाई को ध्यान में रखते हुए पत्नी को 2.5 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई। पत्नी ने भी इस समझौते को स्वीकार कर लिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से दोनों को तलाक दे दिया। कोर्ट के आदेशानुसार पति को तीन महीने के भीतर पत्नी को 1.5 करोड़ रुपये देने हैं। इसके अलावा दोनों बच्चों के नाम पर एक साल के भीतर 50-50 लाख रुपये जमा करने हैं।
कोर्ट की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के अलग-अलग रिएक्शन आए। इसके साथ ही इस मामले ने एक बार फिर यह चर्चा सामने ला दी है कि परिवार में घर और बाहर की जिम्मेदारियां पति-पत्नी दोनों की हो सकती हैं। घर संभालने के काम को भी परिवार की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए।

