वंदे भारत समेत 5 ट्रेनों में रेलवे का बड़ा बदलाव, AI से होगी सफाई की निगरानी

ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों के लिए रेलवे की ओर से अच्छी खबर है। रेलवे ने सफाई और यात्रियों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए 5 सुपरफास्ट ट्रेनों में नई तकनीक आधारित व्यवस्था शुरू की है। इसमें 2 वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनें भी शामिल हैं। इस पहल के तहत सफाई की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI का इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही, यात्रियों की शिकायतों का समाधान 2 घंटे में निकाला जाएगा।

इन 5 ट्रेनों में शुरू हुई नई व्यवस्था

नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे (NFR) ने इस पहल के तहत इन ट्रेनों को शामिल किया है।

  • कामाख्या-एसएमवीटी बेंगलुरु एक्सप्रेस
  • गुवाहाटी-कोलकाता गरीब रथ एक्सप्रेस
  • डिब्रूगढ़-मुंबई एलटीटी एक्सप्रेस
  • न्यू जलपाईगुड़ी-पटना वंदे भारत एक्सप्रेस
  • न्यू जलपाईगुड़ी-गुवाहाटी वंदे भारत एक्सप्रेस

AI तकनीक से चमकेंगे ट्रेन के कोच और टॉयलेट

इस नई तकनीक में AI आधारित सफाई जांच के साथ ऑनलाइन चेकिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके जरिए ट्रेनों में साफ-सफाई के स्तर का आकलन भी किया जाएगा। कोच की खिड़कियों की नियमित सफाई, शौचालयों के रखरखाव और कचरे के उचित प्रबंधन पर भी ध्यान दिया जाएगा। यात्रियों को समय पर चादर और अन्य सामान उपलब्ध कराने के साथ उन्हें वापस लेने की व्यवस्था भी बेहतर की जाएगी।

अब 2 घंटे में सुलझेंगी रेल यात्रियों की परेशानियां

ट्रेनों में यात्रियों की मदद के लिए विशेष टीमें तैनात रहेंगी। ये टीमें पानी की उपलब्धता पर नजर रखने, छोटी तकनीकी समस्याओं में सहायता देने और यात्रियों की शिकायतों पर कार्रवाई करने का काम करेंगी। रेलवे ने शिकायतों के समाधान के लिए 2 घंटे का लक्ष्य तय किया है। जो समस्याएं इस समय में हल नहीं हो पाएंगी, उन्हें आगे संबंधित रेलवे अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा।

ऑनलाइन सिस्टम से बढ़ेगा स्टाफ पर कंट्रोल

इस पहल में जियो-टैगिंग के जरिए सेवाओं की जांच, कर्मचारियों की निगरानी और केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली को भी शामिल किया गया है। यात्रियों से मिलने वाली वास्तविक समय प्रतिक्रिया और स्टार रेटिंग के आधार पर भी सेवाओं का आकलन किया जाएगा।

रेलवे का मकसद इन नई तकनीकों से ट्रेनों में सफाई को बेहतर करना और यात्रियों की शिकायतों पर जल्दी से जल्दी काम करना है।

Tiger Shroff Firing: एक्टर टाइगर श्रॉफ की कार पर फायरिंग का पहला वीडियो आया सामने, गोलियों की आवाज से मायानगरी में मची अफरा-तफरी

Tiger Shroff Firing: बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ को निशाना बनाकर की गई कथित फायरिंग की घटना से जुड़ा पहला वीडियो सामने आया है। मुंबई के जुहू इलाके में हुई इस फायरिंग के वीडियो में गोली चलने की आवाजें सुनाई देने और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल दिखाई दे रहा है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बाइक सवार अज्ञात हमलावरों ने टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर गोलियां चलाई थीं। सामने आए वीडियो में टोपी पहने दो संदिग्ध टाइगर श्रॉफ की ओर फायरिंग करते नजर आ रहे हैं। एक आरोपी ने सामने से, जबकि दूसरे ने भीड़ के बीच से गोली चलाई। वारदात के बाद दोनों फरार हो गए, जिनमें से एक मोटरसाइकिल के जरिए मौके से भाग निकला। इस घटना में अभिनेता को कोई चोट नहीं आई। जबकि उनके ड्राइवर और एक ऑटो रिक्शा चालक के घायल होने की खबर है।

वीडियो सामने आने के बाद पुलिस की जांच में अब हमलावरों की पहचान करने और घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने के लिए सीसीटीवी फुटेज अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, मामले में हमलावरों की पहचान और फायरिंग के पीछे की वजह की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट के अनुसार, लॉरेंस बिश्नोई गिरोह ने हमले की जिम्मेदारी ली है।

मौके पर मची अफरा-तफरी

सामने आए कथित वीडियो में फायरिंग के दौरान का तनावपूर्ण माहौल दिखाई देता है। फुटेज में गोलियों की आवाजें सुनाई देने का दावा किया गया है। घटना के दौरान लोग अचानक हुई गोलीबारी से घबराते नजर आते हैं और मौके पर अफरा-तफरी मच जाती है। वीडियो के एक हिस्से में एक व्यक्ति को ‘टाइगर भाई’ कहते हुए भी सुना जा सकता है। इस फुटेज को जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे हमलावरों की गतिविधियों और घटना के दौरान मौके पर मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया को समझने में मदद मिल सकती है।

हमले के बाद एक्टर ने खुद दौड़ाई कार

एक वायरल वीडियो में ड्राइवर को चोट लगने के बाद टाइगर खुद कार चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं। वारदात के ठीक बाद टाइगर ने बहुत सूझबूझ दिखाई। गोलीबारी की घटना के बाद वह खुद कार से बाहर नहीं निकले, बल्कि अंदर ही ड्राइवर सीट बदल ली। वह जानते थे कि कार के बाहर अभी खतरा हो सकता है, इसलिए यही जगह उन्हें सबसे सुरक्षित दिखी।

जुहू के पुष्पा पार्क के पास हुई थी फायरिंग

जानकारी के मुताबिक, रविवार शाम मुंबई के जुहू इलाके में पुष्पा पार्क के पास यह घटना हुई। आरोप है कि बाइक पर आए अज्ञात लोगों ने टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को निशाना बनाकर फायरिंग की।

घटना के समय टाइगर श्रॉफ सुरक्षित थे। हालांकि, उनके ड्राइवर और एक ऑटो रिक्शा चालक के घायल होने की सूचना सामने आई है।

घायलों की स्थिति को लेकर विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। फायरिंग की सूचना मिलने के बाद मुंबई पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। पुलिस की कई टीमें हमलावरों की पहचान करने, उनके आने-जाने के रास्ते का पता लगाने और वारदात के पीछे की वजह समझने में जुटी हैं। घटनास्थल और आसपास के इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली जा रही है।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नाम से कथित ऑडियो वायरल

फायरिंग की घटना के बाद एक कथित ऑडियो संदेश भी सामने आया। इस मैसेज में अनिल पंडित नाम से अपनी पहचान बताने वाले एक व्यक्ति और हरमन संधू ने लॉरेंस बिश्नोई गैंग की ओर से घटना की जिम्मेदारी लेने का दावा किया। संदेश में सलमान खान से जुड़े फिल्म उद्योग के लोगों को भी धमकी दिए जाने की बात कही गई है।

हालांकि, इस ऑडियो की प्रामाणिकता और फायरिंग में कथित गैंग की भूमिका की पुलिस की ओर से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि फायरिंग के पीछे व्यक्तिगत रंजिश, धमकी या कोई अन्य वजह थी। कथित ऑडियो और घटना के बीच संबंध स्थापित करने के लिए भी जांच जरूरी है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुलिस कमिश्नर से की बात

घटना के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई पुलिस कमिश्नर देवेन भारती से बातचीत की। उन्होंने मामले की गहन जांच करने और वारदात के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। वहीं, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी टाइगर श्रॉफ और उनके परिवार से मुलाकात। उन्होंने कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया और अभिनेता को सुरक्षा का आश्वासन दिया।

ये भी पढ़ें- Tiger Shroff : एक्टर टाइगर श्रॉफ पर हमला, 3 लोगों ने की फायरिंग, लॉरेंस बिश्‍नोई गैंग ने ली जिम्‍मेदारी

अब हमलावरों की पहचान पर पुलिस की नजर

फायरिंग का कथित वीडियो सामने आने के बाद पुलिस के लिए हमलावरों की पहचान करना जांच का प्रमुख हिस्सा बन गया है। सीसीटीवी फुटेज, घटनास्थल से जुटाए गए साक्ष्य और दूसरे तकनीकी इनपुट के आधार पर वारदात की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं। फिलहाल सबसे अहम सवाल यही हैं कि हमलावर कौन थे, उन्होंने टाइगर श्रॉफ की गाड़ी को ही निशाना क्यों बनाया और क्या इस घटना का कथित धमकी भरे ऑडियो से कोई संबंध है। इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही सामने आ पाएंगे।

फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जिस काम के लिए देने थे ₹4,000, AI ने 3 घंटे में कर दिया पूरा! अब फ्रेशर्स की नौकरी पर उठे सवाल

जिस काम को पूरा करने के लिए किसी कॉलेज स्टूडेंट को 7 से 10 दिन लग सकते थे, उसे AI ने महज 3 घंटे में कर दिखाया। इतना ही नहीं, इस काम के लिए मिलने वाले 4,000 रुपये भी बच गए। Anthropic के Claude AI से जुड़ा यह अनुभव रेडिट पर चर्चा का विषय बन गया है। एक यूजर की इस कहानी ने सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर AI कम समय और कम खर्च में काम करने लगे, तो करियर की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए नौकरियों के अवसर कितने बचेंगे?

स्टूडेंट को देना चाहते थे ₹4,000, AI ने कर दिया काम

रेडिट के r/TwentiesIndia फोरम पर एक यूजर ने बताया कि वह स्टॉक एनालिसिस से जुड़ा एक काम करवाना चाहता था। इसके लिए उसने एक खास तरीका तैयार किया था, जिसके आधार पर Screener पर मौजूद कंपनियों के शेयरों की जांच करनी थी। यूजर के मुताबिक, इस काम में काफी समय लग सकता था। इसलिए उसने किसी कॉलेज स्टूडेंट को यह जिम्मेदारी सौंपने और बदले में 4,000 रुपये देने का विचार किया। यह ऐसा काम था, जिसे कोई शुरुआती स्तर का व्यक्ति भी निर्देशों के आधार पर पूरा कर सकता था।

दोस्त की सलाह पर आजमाया Claude AI

यूजर ने बताया कि उसने पहले भी इस काम को ऑटोमेट करने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी प्रक्रिया में मानवीय समझ और निर्णय की जरूरत पड़ती थी। इस वजह से वह अपने आइडिया को सही तरीके से कोड में नहीं बदल पा रहा था। बाद में एक दोस्त की सलाह पर उसने दोबारा कोशिश की। रविवार को उसने Claude AI के साथ करीब तीन घंटे बिताए। इस दौरान उसने निर्देशों और लॉजिक में सुधार किया और सामने आई समस्याओं को ठीक किया। आखिरकार AI उसकी जरूरत के मुताबिक काम पूरा करने में सफल रहा। इस तरह यूजर के 4,000 रुपये बच गए। उसका कहना था कि सामान्य API कीमतों पर भी यह काम कुछ सौ रुपये में हो सकता था।

क्या फ्रेशर्स के काम AI की भेंट चढ़ जाएंगे?

इस अनुभव के बाद यूजर ने सवाल उठाया कि अगर AI छोटे और शुरुआती स्तर के काम आसानी से कर सकता है, तो एंट्री-लेवल नौकरियों का भविष्य क्या होगा? दरअसल, ऐसे काम ही अक्सर फ्रेशर्स को अनुभव हासिल करने और काम सीखने का मौका देते हैं।

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रेडिट पर लोगों ने जताई चिंता

पोस्ट पर कई यूजर्स ने कहा कि AI की मदद लेना उपयोगी है, लेकिन जहां पूरी सटीकता जरूरी हो, वहां उसके नतीजों की जांच करना भी जरूरी है। कुछ लोगों ने चिंता जताई कि कंपनियां जूनियर कर्मचारियों को जो सामान्य काम देकर ट्रेनिंग देती थीं, अब उन्हीं कामों को AI से करवा सकती हैं। हालांकि, एक उदाहरण के आधार पर सभी शुरुआती नौकरियों के खत्म होने का दावा नहीं किया जा सकता। फिर भी यह घटना बताती है कि बदलती तकनीक के दौर में युवाओं के लिए AI को समझना, नई स्किल सीखना और अपनी क्षमताओं को लगातार बेहतर बनाना पहले से ज्यादा जरूरी होता जा रहा है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

दादी की एक रेसिपी ने बदल दी किस्मत! 5 लाख लगाकर दो बहनों ने खड़ा किया 10 करोड़ का बिजनेस

अमेरिका में चुनावी प्रचार में AI का इस्तेमाल बढ़ा:न्यूयॉर्क के मेयर को महंगाई की दवा बेचते, डेमोक्रेट उम्मीदवार को 9/11 पर हंसते दिखाया

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राजनीतिक प्रचार में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। उम्मीदवारों और राजनीतिक संगठनों ने AI से बने विज्ञापनों के प्रचार पर करीब 1300 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। एक विज्ञापन में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और गवर्नर कैथी होकुल को महंगाई और अपराध का डर दूर करने वाली दवा बेचते दिखाया गया। एक दूसरे विज्ञापन में मिशिगन के डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार डॉ. अब्दुल एल-सय्यद का AI से बना वीडियो दिखाया गया। इसमें वे ‘डेथ टू अमेरिका’ और ‘9/11 हमले का जश्न मनाओ’ लिखे कार्ड देखकर हंसते नजर आए। 80% AI विज्ञापन ट्रम्प की पार्टी ही बना रही अमेरिका की वेस्लेयन यूनिवर्सिटी की जांच में 220 से ज्यादा ऐसे वीडियो की पहचान हुई है जिनमें AI का इस्तेमाल किया गया था। वेस्लेयन मीडिया प्रोजेक्ट की प्रोफेसर एरिका फ्रैंकलिन फाउलर ने कहा, कई विज्ञापनों में AI का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया कि बिना किसी जानकारी के यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि वीडियो में AI का इस्तेमाल हुआ है। इसका मकसद- विरोधियों को बदनाम करना AI से बनाए गए कुछ विज्ञापनों में राजनीतिक विरोधियों को ऐसे नेताओं के साथ दिखाया गया, जिनसे जुड़ने पर मतदाताओं के बीच विवाद हो सकता है। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसे नेता शामिल हैं। ओक्लाहोमा में ‘मेक ओक्लाहोमा ग्रेट अगेन’ नाम के एक समूह ने डेमोक्रेटिक गवर्नर उम्मीदवार को हिलेरी क्लिंटन के साथ गले मिलते दिखाया। वीडियो में दोनों को हाथ पकड़े हुए दिखाया गया, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प किनारे उदास खड़े नजर आए। स्क्रीन पर लिखा था, ‘क्लिंटन का समर्थक, ट्रम्प का विरोधी।’ चुनवी रैलियों में भीड़ के लिए भी AI का इस्तेमाल AI का इस्तेमाल चुनावी रैलियों में ज्यादा भीड़ दिखाने के लिए भी किया जा रहा है। वहीं, फ्लोरिडा के गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार जेम्स फिशबैक के एक विज्ञापन में उन्हें डेमोक्रेटिक सांसद इल्हान उमर और ईरान के नेताओं के साथ पार्टी करते दिखाया गया। वीडियो में ईरानी नेताओं को तलवारों से यहूदी धर्म के प्रतीक ‘स्टार ऑफ डेविड’ पर हमला करते दिखाया गया। राजनीतिक विज्ञापनों में AI का इस्तेमाल केवल नकली घटनाएं बनाने तक सीमित नहीं है। ओक्लाहोमा के रिपब्लिकन उम्मीदवार चिप कीटन के एक विज्ञापन की शुरुआत में उनकी पुरानी असली तस्वीर दिखाई गई। यह तस्वीर उस समय की थी, जब वे ओक्लाहोमा में पुलिस अधिकारी थे। AI की मदद से तस्वीर में उनका सिर ऊपर उठता और चेहरे पर बड़ी मुस्कान आती दिखाई गई। AI से 19 करोड़ में बनने वाले विज्ञापन 1 करोड़ में बन रहे हॉलीवुड की विज्ञापन कंपनी स्ट्रैटेजिक परसेप्शन के संस्थापक फ्रेड एन. डेविसे मुताबिक, AI विज्ञापन बनाने की लागत काफी कम कर रहा है। उन्होंने एक विज्ञापन का उदाहरण देते हुए बताया कि इसे पारंपरिक तरीके से बनाने पर करीब लगभग 19 करोड़ रुपए खर्च होते। इसमें कलाकारों, कपड़ों की व्यवस्था, खाने-पीने और कैमरा-लाइटिंग के साथ पूरे दिन की शूटिंग की जरूरत पड़ती। लेकिन AI की मदद से वही दृश्य तैयार करने पर खर्च करीब 1.8 करोड़ रुपए रह गया है। अब AI कम समय और कम खर्च में ऐसे विज्ञापन बना सकता है। कई बार दर्शकों को पता भी नहीं चलता कि वीडियो में दिखाई गई घटना असली नहीं है। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI के इस्तेमाल में ज्यादा सतर्क डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI के इस्तेमाल को लेकर रिपब्लिकन उम्मीदवारों से ज्यादा सतर्क हैं। इसकी एक वजह यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक इस तकनीक की ज्यादा आलोचना करते हैं और इस पर नियम बनाने की मांग करते हैं। वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और प्रोजेक्ट के सह-निदेशक ट्रैविस एन. रिडआउट ने कहा कि AI का इस्तेमाल करने से डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों और संगठनों की छवि को नुकसान पहुंचने का खतरा ज्यादा है, क्योंकि वे खुद इस तकनीक पर नियंत्रण के लिए नियम बनाने की मांग कर रहे हैं। —————————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने मदद रोकी तो यूक्रेन का क्या होगा:जेलेंस्की का साथ छोड़ पुतिन के साथ दिख रहे ट्रम्प; 1 सप्ताह में 4 झटके दिए रूस से करीब 5 साल से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन के सामने अब नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिस अमेरिका के हथियारों और खुफिया जानकारी के दम पर यूक्रेनी सेना रूसी हमलों का मुकाबला कर रही है, उसी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

MP incident: ग्वालियर में आधी रात को मौत बनकर दौड़ा बेकाबू ट्रक, शीतला माता मंदिर के पास 13 श्रद्धालुओं की दर्दनाक मौत,कई घायल

Gwalior incident: मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में रविवार (18 अक्टूबर) तड़के एक दर्दनाक सड़क हादसे में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई। जबकि 40 अन्य घायल हो गए। हादसा शीतला माता मंदिर के पास उस समय हुआ, जब श्रद्धालु मंदिर की ओर जा रहे थे। इसी दौरान धान से लदा एक बेकाबू ट्रक पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ते हुए श्रद्धालुओं के बीच जा घुसा और करीब 50 से अधिक लोगों को कुचल दिया। इसके बाद ट्रक मंदिर के गेट और बाहरी दीवार से टकरा गया। हादसे के बाद मौके पर चीख-पुकार मच गई।

रात करीब 1:30 बजे हुआ हादसा

हमारे सहयोगी न्यूज 18 के मुताबिक, यह दर्दनाक दुर्घटना रविवार तड़के करीब 1:30 बजे हुई। ट्रक छिनोर की तरफ से आ रहा था और उसमें धान लदा हुआ था। बताया जा रहा है कि सड़क के एक ढलान वाले हिस्से पर ट्रक चालक वाहन पर कंट्रोल खो बैठा। इस रास्ते पर भारी वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित थी।

ग्वालियर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) धर्मवीर सिंह के मुताबिक, ट्रक पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ा और अचानक अनियंत्रित होकर नीचे की ओर आ गया। रास्ते पर मौजूद श्रद्धालु उसकी चपेट में आ गए। इसके बाद ट्रक मंदिर के बाहरी गेट और दीवार से टकरा गया।

40 लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया, 13 की मौत

हादसे के बाद घायलों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। एसएसपी धर्मवीर सिंह ने बताया कि दुर्घटना के बाद कुल 40 से अधिक लोगों को अस्पताल ले जाया गया, जिनमें से 13 की मौत हो गई। अधिकारियों के मुताबिक, पांच से छह घायलों की हालत गंभीर बताई गई है। कुछ लोगों को फ्रैक्चर समेत गंभीर चोटें आई हैं, जबकि अन्य घायलों का भी उपचार जारी है। हादसे में मौके पर तैनात दो पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।

नवरात्रि के दौरान लगाई गई थी बैरिकेडिंग

ग्वालियर की कलेक्टर रुचिका चौहान ने बताया कि दुर्घटना की सूचना मिलते ही एंबुलेंस और अन्य वाहनों को मौके पर भेजा गया। उन्होंने बताया कि नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सड़क पर पुलिस चेकपॉइंट और बैरियर लगाए गए थे। इसके बावजूद प्रतिबंधित रास्ते पर ट्रक कैसे पहुंचा, इसकी जांच की जा रही है। कलेक्टर के अनुसार, यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वाहन बैरिकेडिंग पार करके अंदर कैसे आया और किस वजह से अनियंत्रित हुआ।

ट्रक की तकनीकी जांच के निर्देश

हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) की टीम को ट्रक की तकनीकी जांच के लिए भेजा गया है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि वाहन में कोई तकनीकी खराबी थी या दुर्घटना के पीछे कोई अन्य कारण जिम्मेदार था। कलेक्टर ने बताया कि घायलों की स्थिति का आकलन करने के लिए अस्पताल में मेडिकल टीमें सीटी स्कैन और एक्स-रे कर रही हैं। इन जांचों के आधार पर आगे का इलाज तय किया जा रहा है।

प्रत्यक्षदर्शी ने बताया आंखों देखा हाल

हादसे में घायल हुए एक व्यक्ति के भाई ने बताया कि दुर्घटना अचानक हुई। ट्रक काफी तेज रफ्तार से लोगों की ओर आया। प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, ट्रक जरूरत से ज्यादा लदा हुआ दिखाई दे रहा था। उसने मंदिर के पास टकराने से पहले सड़क किनारे की कुछ दुकानों तथा लोगों को भी अपनी चपेट में ले लिया। प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि हादसा रात करीब एक बजे हुआ। उसने कुछ लोगों को मौके पर ही दम तोड़ते देखा। उसके भाई को भी चोटें आई हैं। उसने कहा कि दुर्घटना के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी का माहौल था।

जांच में जुटा प्रशासन

फिलहाल, ग्वालियर प्रशासन और पुलिस हादसे के कारणों की जांच कर रहे हैं। जांच के प्रमुख पॉइंट में प्रतिबंधित सड़क पर ट्रक की एंट्री, बैरिकेडिंग पार करने की परिस्थितियां और वाहन के अनियंत्रित होने की वजह शामिल हैं। इस हादसे ने नवरात्रि जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा, यातायात नियंत्रण और भारी वाहनों की आवाजाही पर निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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अमेरिका ने मदद रोकी तो यूक्रेन का क्या होगा:जेलेंस्की का साथ छोड़ पुतिन के साथ दिख रहे ट्रम्प; 1 सप्ताह में 4 झटके दिए

रूस से करीब 5 साल से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन के सामने अब एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिस अमेरिका के हथियारों और खुफिया जानकारी के दम पर यूक्रेनी सेना रूसी हमलों का मुकाबला कर रही है, उसी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। ट्रम्प ने महज एक सप्ताह में 4 ऐसे कदम उठाए, जिनसे यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ गईं। अब सवाल है कि अगर ट्रम्प ने यूक्रेन को सैन्य मदद और खुफिया जानकारी देना बंद कर दिया, तो जेलेंस्की की सेना का क्या होगा? क्या यूक्रेन अमेरिकी मदद के बिना रूस का मुकाबला कर पाएगा? और ट्रम्प के बदले रुख से पुतिन को कितना फायदा मिल सकता है? 9 अक्टूबर: डीजल की बढ़ी कीमतों के लिए यूक्रेन युद्ध को जिम्मेदार ठहराया ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह बताया। इसके बाद उन्होंने रूसी डीजल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी राहत दी। उनका कहना था कि इससे ईंधन की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी। यह फैसला इसलिए अहम है, क्योंकि रूस तेल और गैस की बिक्री से बड़ी कमाई करता है। इस कमाई से उसे युद्ध का खर्च उठाने में भी मदद मिलती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से मॉस्को को आर्थिक फायदा हो सकता है। 10 अक्टूबर: जेलेंस्की से कहा- नया राष्ट्रपति चुनो अगले दिन ट्रम्प ने सीधे जेलेंस्की के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए। उन्होंने कहा कि यूक्रेन को नया राष्ट्रपति चुनना चाहिए, जो रूस के साथ समझौता करके युद्ध खत्म कर सके। ट्रम्प का आरोप था कि जेलेंस्की के पास युद्ध खत्म करने के कई मौके थे, लेकिन उन्होंने उनका फायदा नहीं उठाया। उनका कहना था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति को रूस के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। 11 अक्टूबर: जेलेंस्की से बात किए बिना युद्धविराम का ऐलान तीसरे दिन ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए युद्धविराम का ऐलान किया। ऊर्जा ठिकानों में बिजली संयंत्र, तेल रिफाइनरी और ईंधन से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे शामिल होते हैं। रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा ठिकानों पर हमले करते रहे हैं। इन हमलों से बिजली आपूर्ति, ईंधन की उपलब्धता और सैन्य अभियानों पर असर पड़ता है। लेकिन ट्रम्प के ऐलान के बाद विवाद खड़ा हो गया। जेलेंस्की ने कहा कि उन्हें इस समझौते की पहले से जानकारी नहीं थी। उन्होंने साफ किया कि यूक्रेन रूस के ऊर्जा ठिकानों पर हमले तभी रोकेगा, जब रूस भी यूक्रेन पर ऐसे हमले बंद करेगा। 13 अक्टूबर: स्टारलिंक सर्विस की स्पीड कम की यूक्रेन जिस इंटरनेट से अपने तेज रफ्तार ड्रोन उड़ा रहा था और रूस में हमले कर रहा था, उस पर अचानक स्पीड लॉक लगा दिया गया। पहले ये 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हमला करते थे। लॉक लगने के बाद इसकी रफ्तार 160 किमी प्रति घंटा रह गई। जैसे ही कोई ड्रोन इस रफ्तार से तेज हुआ, उस पर लगा इंटरनेट सिग्नल कट गया और ड्रोन गिरने लगा। जेलेंस्की ने इसका जिम्मेदार मस्क को बताया। बाद में मस्क ने इस पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह अमेरिकी सरकार कर रही है। अमेरिका ने मदद रोक दी तो यूक्रेन का क्या होगा? 1. मिसाइल हमलों की चेतावनी मिलने में दिक्कत: अमेरिका की खुफिया जानकारी यूक्रेन को रूसी मिसाइलों के हमलों के बारे में पहले से आगाह करने में मदद करती है। इससे सैनिकों और आम नागरिकों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचने का समय मिलता है। अमेरिकी जानकारी बंद होने पर यह व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। 2. पैट्रियट मिसाइलों की कमी: यूक्रेन पैट्रियट मिसाइलों की मदद से रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इनकी आपूर्ति रोक देता है, तो यूक्रेन के शहरों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करना और मुश्किल हो सकता है। 3. सैन्य अभियानों पर असर: अमेरिकी संचार तकनीक में रुकावट आने से ड्रोन के जरिए निगरानी और हमले करने, युद्ध के मैदान में सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखने और हमलों की योजना बनाने में मुश्किल होगी। 4. रूस पर दबाव बनाने की रणनीति कमजोर: यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ठिकानों पर हमले करके रूस की कमाई और युद्ध क्षमता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इन हमलों का विरोध करता है और रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत देता है, तो यूक्रेन की रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी मदद बंद होते ही यूक्रेन युद्ध हार जाएगा। यूक्रेन ने अपने देश में हथियारों का उत्पादन बढ़ाया है और यूरोपीय देश भी उसे सैन्य सहायता देते हैं। लेकिन अमेरिकी खुफिया जानकारी और कुछ खास हथियारों का पूरा विकल्प तैयार करना आसान नहीं होगा। ट्रम्प के फैसलों से रूस को क्या फायदा? रूस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि यूक्रेन और अमेरिका के बीच मतभेद बढ़ने से कीव पर दबाव बढ़ेगा। अगर यूक्रेन को खुफिया जानकारी और हथियार कम मिलते हैं, तो उसे रूसी हमलों का मुकाबला करने में ज्यादा मुश्किल हो सकती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से रूस को आर्थिक फायदा भी हो सकता है। वहीं, ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने का दबाव यूक्रेन की उस रणनीति को कमजोर कर सकता है, जिसके जरिए वह रूस की युद्ध क्षमता पर चोट करना चाहता है। ट्रम्प का जेलेंस्की का साथ छोड़ने की वजह क्या है? 1. युद्ध खत्म करने के लिए यूक्रेन पर दबाव: ट्रम्प चाहते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच जल्द समझौता हो। इसके लिए वे जेलेंस्की से रियायतें देने को कह रहे हैं। 2. रूस से रिश्ते सुधारने की कोशिश: ट्रम्प रूस के साथ बातचीत और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इससे यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी मदद पर असर पड़ने की आशंका है। 3. अमेरिका में तेल की कीमतें घटाना: यूक्रेन के रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों से नाराज ट्रम्प ने कहा कि इन हमलों से डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। वे रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतें कम करना चाहते हैं। 4. पुतिन से समझौते की कोशिश: ट्रम्प ने रूस से डीजल कारोबार की अनुमति देने और जेलेंस्की पर हमले रोकने का दबाव बनाने जैसे कदम उठाए हैं। इससे रूस को आर्थिक फायदा मिल सकता है, जबकि यूक्रेन की स्थिति कमजोर पड़ने की आशंका है। —————————
यह खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई:रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर
अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अमेरिका ने मदद रोकी तो यूक्रेन का क्या होगा:जेलेंस्की का साथ छोड़ पुतिन के साथ दिख रहे ट्रम्प; 1 सप्ताह में 4 झटके दिए

रूस से करीब 5 साल से युद्ध लड़ रहे यूक्रेन के सामने अब एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। जिस अमेरिका के हथियारों और खुफिया जानकारी के दम पर यूक्रेनी सेना रूसी हमलों का मुकाबला कर रही है, उसी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। ट्रम्प ने महज एक सप्ताह में 4 ऐसे कदम उठाए, जिनसे यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ गईं। अब सवाल है कि अगर ट्रम्प ने यूक्रेन को सैन्य मदद और खुफिया जानकारी देना बंद कर दिया, तो जेलेंस्की की सेना का क्या होगा? क्या यूक्रेन अमेरिकी मदद के बिना रूस का मुकाबला कर पाएगा? और ट्रम्प के बदले रुख से पुतिन को कितना फायदा मिल सकता है? 9 अक्टूबर: डीजल की बढ़ी कीमतों के लिए यूक्रेन युद्ध को जिम्मेदार ठहराया ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध को अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह बताया। इसके बाद उन्होंने रूसी डीजल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी राहत दी। उनका कहना था कि इससे ईंधन की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी। यह फैसला इसलिए अहम है, क्योंकि रूस तेल और गैस की बिक्री से बड़ी कमाई करता है। इस कमाई से उसे युद्ध का खर्च उठाने में भी मदद मिलती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से मॉस्को को आर्थिक फायदा हो सकता है। 10 अक्टूबर: जेलेंस्की से कहा- नया राष्ट्रपति चुनो अगले दिन ट्रम्प ने सीधे जेलेंस्की के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए। उन्होंने कहा कि यूक्रेन को नया राष्ट्रपति चुनना चाहिए, जो रूस के साथ समझौता करके युद्ध खत्म कर सके। ट्रम्प का आरोप था कि जेलेंस्की के पास युद्ध खत्म करने के कई मौके थे, लेकिन उन्होंने उनका फायदा नहीं उठाया। उनका कहना था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति को रूस के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। 11 अक्टूबर: जेलेंस्की से बात किए बिना युद्धविराम का ऐलान तीसरे दिन ट्रम्प ने रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने के लिए युद्धविराम का ऐलान किया। ऊर्जा ठिकानों में बिजली संयंत्र, तेल रिफाइनरी और ईंधन से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे शामिल होते हैं। रूस और यूक्रेन दोनों एक-दूसरे के ऊर्जा ठिकानों पर हमले करते रहे हैं। इन हमलों से बिजली आपूर्ति, ईंधन की उपलब्धता और सैन्य अभियानों पर असर पड़ता है। लेकिन ट्रम्प के ऐलान के बाद विवाद खड़ा हो गया। जेलेंस्की ने कहा कि उन्हें इस समझौते की पहले से जानकारी नहीं थी। उन्होंने साफ किया कि यूक्रेन रूस के ऊर्जा ठिकानों पर हमले तभी रोकेगा, जब रूस भी यूक्रेन पर ऐसे हमले बंद करेगा। 13 अक्टूबर: स्टारलिंक सर्विस की स्पीड कम की यूक्रेन जिस इंटरनेट से अपने तेज रफ्तार ड्रोन उड़ा रहा था और रूस में हमले कर रहा था, उस पर अचानक स्पीड लॉक लगा दिया गया। पहले ये 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हमला करते थे। लॉक लगने के बाद इसकी रफ्तार 160 किमी प्रति घंटा रह गई। जैसे ही कोई ड्रोन इस रफ्तार से तेज हुआ, उस पर लगा इंटरनेट सिग्नल कट गया और ड्रोन गिरने लगा। जेलेंस्की ने इसका जिम्मेदार मस्क को बताया। बाद में मस्क ने इस पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह अमेरिकी सरकार कर रही है। अमेरिका ने मदद रोक दी तो यूक्रेन का क्या होगा? 1. मिसाइल हमलों की चेतावनी मिलने में दिक्कत: अमेरिका की खुफिया जानकारी यूक्रेन को रूसी मिसाइलों के हमलों के बारे में पहले से आगाह करने में मदद करती है। इससे सैनिकों और आम नागरिकों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचने का समय मिलता है। अमेरिकी जानकारी बंद होने पर यह व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। 2. पैट्रियट मिसाइलों की कमी: यूक्रेन पैट्रियट मिसाइलों की मदद से रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इनकी आपूर्ति रोक देता है, तो यूक्रेन के शहरों और सैन्य ठिकानों की सुरक्षा करना और मुश्किल हो सकता है। 3. सैन्य अभियानों पर असर: अमेरिकी संचार तकनीक में रुकावट आने से ड्रोन के जरिए निगरानी और हमले करने, युद्ध के मैदान में सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखने और हमलों की योजना बनाने में मुश्किल होगी। 4. रूस पर दबाव बनाने की रणनीति कमजोर: यूक्रेन रूसी तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ठिकानों पर हमले करके रूस की कमाई और युद्ध क्षमता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है। अगर अमेरिका इन हमलों का विरोध करता है और रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत देता है, तो यूक्रेन की रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी मदद बंद होते ही यूक्रेन युद्ध हार जाएगा। यूक्रेन ने अपने देश में हथियारों का उत्पादन बढ़ाया है और यूरोपीय देश भी उसे सैन्य सहायता देते हैं। लेकिन अमेरिकी खुफिया जानकारी और कुछ खास हथियारों का पूरा विकल्प तैयार करना आसान नहीं होगा। ट्रम्प के फैसलों से रूस को क्या फायदा? रूस के लिए सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि यूक्रेन और अमेरिका के बीच मतभेद बढ़ने से कीव पर दबाव बढ़ेगा। अगर यूक्रेन को खुफिया जानकारी और हथियार कम मिलते हैं, तो उसे रूसी हमलों का मुकाबला करने में ज्यादा मुश्किल हो सकती है। रूसी ईंधन की बिक्री पर राहत मिलने से रूस को आर्थिक फायदा भी हो सकता है। वहीं, ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने का दबाव यूक्रेन की उस रणनीति को कमजोर कर सकता है, जिसके जरिए वह रूस की युद्ध क्षमता पर चोट करना चाहता है। ट्रम्प का जेलेंस्की का साथ छोड़ने की वजह क्या है? 1. युद्ध खत्म करने के लिए यूक्रेन पर दबाव: ट्रम्प चाहते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच जल्द समझौता हो। इसके लिए वे जेलेंस्की से रियायतें देने को कह रहे हैं। 2. रूस से रिश्ते सुधारने की कोशिश: ट्रम्प रूस के साथ बातचीत और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इससे यूक्रेन को मिलने वाली अमेरिकी मदद पर असर पड़ने की आशंका है। 3. अमेरिका में तेल की कीमतें घटाना: यूक्रेन के रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों से नाराज ट्रम्प ने कहा कि इन हमलों से डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं। वे रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतें कम करना चाहते हैं। 4. पुतिन से समझौते की कोशिश: ट्रम्प ने रूस से डीजल कारोबार की अनुमति देने और जेलेंस्की पर हमले रोकने का दबाव बनाने जैसे कदम उठाए हैं। इससे रूस को आर्थिक फायदा मिल सकता है, जबकि यूक्रेन की स्थिति कमजोर पड़ने की आशंका है। —————————
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अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

राहुल गांधी के खिलाफ महिला पत्रकार ने दर्ज कराई शिकायत, जानें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे इस पूरे मामले की असल वजह

राहुल गांधी के खिलाफ महिला पत्रकार ने दर्ज कराई शिकायत, जानें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे इस पूरे मामले की असल वजह

Rahul Gandhi Female Journalist Complaint

Rahul Gandhi Female Journalist Complaint: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष के विरोध मार्च की कवरेज कर रही एक महिला पत्रकार के साथ अभद्रता और धक्का-मुक्की का मामला अब कानूनी रूप से तूल पकड़ता जा रहा है। पत्रकार ऋचा पाराशर ने नई दिल्ली के डीसीपी कार्यालय पहुंचकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। वहीं, दूसरी ओर यह मामला कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया है।

क्या हैं महिला पत्रकार के आरोप?

पत्रकार ऋचा पाराशर ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया कि 12 अक्तूबर 2026 को जब वह इंडिया ब्लॉक के सुप्रीम कोर्ट मार्च को कवर कर रही थीं, तब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने उनका हाथ या कंधा पकड़कर पीछे की तरफ खींचा। इसके तुरंत बाद उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का दे दिया, जिससे वह सड़क पर गिर गईं और उनका मोबाइल फोन भी क्षतिग्रस्त हो गया। पत्रकार ने अपनी शिकायत में दावा किया है कि वह तीन महीने की गर्भवती हैं। अचानक गिर जाने के कारण उन्हें पेट में गंभीर दर्द उठा और शरीर पर अन्य चोटें आईं, जिसके चलते उन्हें इलाज के लिए तत्काल अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। ALSO READ: गर्भवती पत्रकार ने राहुल गांधी पर लगाए गंभीर आरोप, मेरा हाथ पकड़ा, मुझे धक्का दिया

क्या कहना है कांग्रेस का?

दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के समर्थकों ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया है। कांग्रेस का कहना है कि विरोध मार्च के दौरान किसी भी वीडियो फुटेज में यह साबित नहीं होता कि पत्रकार को राहुल गांधी या उनके सुरक्षाकर्मियों द्वारा जानबूझकर निशाना बनाया गया या धक्का दिया गया। पार्टी के अनुसार, शिकायतकर्ता द्वारा किए जा रहे दावों और उपलब्ध तथ्यों में कई तकनीकी विसंगतियां साफ नजर आती हैं। ALSO READ: राहुल गांधी के घर चाय पर चर्चा की इनसाइड स्टोरी? CJP से नेहा बोरा तक कौन किसके साथ, कौन किसके खिलाफ?

अब हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भाजपा ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने पीड़ित महिला पत्रकार की ओर से इस मुद्दे को देश की शीर्ष अदालत के समक्ष उठाया। गौरव भाटिया ने CJI जस्टिस सूर्यकांत के सामने मामले की त्वरित सुनवाई की मांग रखी। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब इस याचिका पर 26 अक्टूबर को हाईकोर्ट में सुनवाई तय की गई है।

पूरा मामला क्या है?

12 अक्तूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ विपक्षी गठबंधन (इंडिया ब्लॉक) ने दिल्ली में संसद से सुप्रीम कोर्ट की ओर विरोध मार्च निकाला था। इस मार्च की कवरेज के दौरान एक निजी चैनल की महिला पत्रकार ऋचा पाराशर के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की और अभद्रता हुई। पत्रकार का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उनका हाथ या कंधा पकड़कर खींचा और उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें जोर से धक्का दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गईं और उनका फोन टूट गया। यह मामला अब कोर्ट तक पहुंच गया है।