MF Investment : वाइजइन्वेस्ट के CEO हेमंत रुस्तगी से जाने बाजार में निवेश के मंत्र, क्या हैं स्टेप-अप SIP के फायदे

MF Investment : महंगाई के दौर में सिर्फ बचत नहीं,बल्कि स्मार्ट निवेश भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में स्टेप-अप SIP आपकी बढ़ती आय के साथ निवेश बढ़ाकर लंबी अवधि में बड़ा फंड बनाने में मदद कर सकती है। लेकिन सवाल सिर्फ निवेश बढ़ाने का नहीं,बल्कि बाजार की गिरावट में उस निवेश को बनाए रखने का भी है। तो अतिरिक्त रकम कहां लगानी चाहिए? क्या हर ट्रेंडिंग फंड सही विकल्प है? और बाजार की अस्थिरता में गोल-बेस्ड निवेश कैसे आपकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है? आज यहा इन्हीं अहम सवालों के जवाब जानेंगे वाइजइन्वेस्ट के CEO हेमंत रुस्तगी (Hemant Rustagi) से

क्या है स्टेप-अप SIP?

इसमें हर साल SIP की रकम तय परसेंट या तय रकम से बढ़ाई जाती है। हमें इसमें बढ़ती आय के हिसाब से निवेश बढ़ाने की सुविधा मिलती है। छोटी राशि से निवेश की शुरुआत करना आसान होता है। कंपाउंडिंग का लाभ समय के साथ अधिक मिलता है। इससे लंबी अवधि में बड़ा निवेश फंड तैयार करने में मदद मिलती है।

कैसे बढ़ता है रिटर्न ?

सामान्य SIP में निवेश राशि पूरे समय एक जैसी रहती है। स्टेप-अप SIP में हर साल निवेश बढ़ने से ज्यादा रकम निवेश होती है। बढ़े हुए निवेश पर कंपाउंडिंग का असर और ज्यादा मिलता है। लंबी अवधि में रिटर्न सामान्य SIP से काफी ज्यादा हो सकता है।

नौकरीपेशा लोगों के लिए फायदेमंद

स्टेप-अप SIP नौकरीपेशा लोगों के लिए फायदेमंद होती है। इसमें सालाना सैलेरी बढ़ने के साथ निवेश भी बढ़ेगा। निवेश बढ़ाने का अतिरिक्त बोझ एक साथ महसूस नहीं होता। फाइनेंशियल गोल जल्दी हासिल करने में मदद मिलती है। रेग्युलर बचत और निवेश की आदत बनी रहती है। भविष्य की बढ़ती जरूरतों के अनुसार बेहतर फंड तैयार होता है।

बड़े फाइनेंशियल गोल होंगे हासिल

इससे बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बड़ा फंड तैयार होता है। यह तरीका घर खरीदने के लक्ष्य को आसान बनाता है। रिटायरमेंट के लिए मजबूत कॉर्पस बनाता है।

यह लंबी अवधि के बड़े लक्ष्यों के लिए सही निवेश रणनीति होती है।

कहां लगाएं अतिरिक्त राशि?

स्टेप-अप SIP को सही जगह लगाना निवेशकों के लिए बड़ी चुनौती है। अतिरिक्त रकम को मौजूदा SIP में बढ़ाना सही कदम होता है। नए सेक्टर,थीमैटिक फंड में अतिरिक्त निवेश में ज्यादा जोखिम होता है। ट्रेंडिंग सेक्टर,थीमैटिक और स्मॉलकैप फंड में निवेश करने में जोखिम होता है। ऐसे फंड Cyclical होते हैं और इनमें गलत समय पर निवेश मुश्किल बढ़ाएगा। रिटेल निवेशकों के लिए इन फंडों पर नजर रखना आसान नहीं होता। जब SIP काफी बढ़ जाए,तब पोर्टफोलियो में मिडकैप या स्मॉलकैप फंड जोड़ें। सही एलोकेशन में आवंटन सेलंबे समय में बेहतर रिटर्न संभव है।

बाजार की अस्थिरता से कैसे निपटें?

बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य बात है, इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहें। गिरावट में डरने की बजाय अनुशासित निवेश बरकरार रखें। गिरावट में लंबी अवधि का नजरिया हमेशा काम आता है। अस्थिर बाजार में SIP से लंबे समय में अच्छे रिटर्न मिलते हैं। गोल बेस्ड निवेश गिरावट में निवेशक को इमोशनल फैसले लेने से रोकता है। यदि पैसा 20–25 साल बाद चाहिए तो आज की गिरावट से क्यों डरना। साफ समय-सीमा से निवेशक का बाजार पर भरोसा बना रहता है। बाजार में जल्दबाजी में डेट या हाइब्रिड फंड में शिफ्ट होने से बचें। इससे लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन पर असर पड़ सकता है।

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

EPFO Pension Calculation: 10 साल की नौकरी के बाद हर महीने कितनी मिलेगी पेंशन? ₹10,000 और ₹20,000 की सैलरी पर समझें पूरा गणित

EPFO EPS 2026 Pension Calculator: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सदस्यों के लिए श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने पिछले दिनों नई कर्मचारी पेंशन योजना (EPS 2026) को नोटिफाई कर दिया। इसके बाद से पेंशन कैलकुलेशन को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। करीब 6 करोड़ ईपीएफओ सदस्यों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग सैलरी ब्रैकेट के हिसाब से रिटायरमेंट के बाद हर महीने कितनी गारंटीड पेंशन मिलेगी?

राहत की बात यह है कि नई EPS 2026 में भी मंथली पेंशन निकालने का पुराना फॉर्मूला और न्यूनतम 10 साल की सेवा का नियम पहले जैसा ही बरकरार रखा गया है। आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि अगर आपकी पेंशन योग्य सैलरी ₹10,000 या ₹20,000 है, तो 10 साल की नौकरी के बाद आपको हर महीने कितनी पेंशन मिलेगी।

पेंशन पाने का बेसिक नियम: 10 साल की सर्विस जरूरी

ईपीएफओ के नियमों के मुताबिक, हर महीने रेगुलर पेंशन पाने के लिए कर्मचारी को कम से कम 10 साल की पेंशन योग्य नौकरी पूरी करना अनिवार्य है। 58 साल की उम्र पूरी होने पर मासिक पेंशन मिलनी शुरू होती है। हालांकि, 50 साल की उम्र के बाद कुछ कटौती के साथ अर्ली पेंशन का विकल्प भी मिलता है।

10 साल से कम नौकरी पर क्या होगा?

अगर आपकी कुल सर्विस 10 साल से कम है, तो आपको मंथली पेंशन नहीं मिलेगी। ऐसे में आप या तो स्कीम सर्टिफिकेट लेकर अगली नौकरी में सर्विस जोड़ सकते हैं, या फिर ईपीएस का पूरा पैसा एकमुश्त निकाल सकते हैं।

कैसे होती है पेंशन की गणना?

EPFO एक तय फॉर्मूले के आधार पर आपकी मासिक पेंशन तय करता है:

मासिक पेंशन= पेंशन योग्य वेतन×पेंशन योग्य सेवा/70

पेंशन योग्य वेतन: इसका मतलब आपके आखिरी 60 महीनों के औसत मूल वेतन और महंगाई भत्ते (DA) से है।

अधिकतम सीमा (Wage Ceiling): सामान्य तौर पर ईपीएस के लिए अधिकतम पेंशन योग्य सैलरी की सीमा ₹15,000 तय है, लेकिन कई मामलों में यह वास्तविक सैलरी या तय मानक (जैसे- ₹10,000 या ₹20,000) के आधार पर कैलकुलेट की जाती है।

कैलकुलेशन 1: अगर आपकी पेंशन योग्य सैलरी ₹10,000 है

अगर आपकी औसत बेसिक सैलरी और डीए ₹10,000 है, तो नौकरी के वर्षों के हिसाब से आपकी पेंशन इस प्रकार बनेगी:

10 साल की नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (10,000×10)÷70=₹1,428

मासिक पेंशन: आपको हर महीने करीब ₹1,428 की पेंशन मिलेगी।

20 साल की नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (10,000×20)÷70=₹2,857

मासिक पेंशन: यह बढ़कर करीब ₹2,857 प्रति माह हो जाएगी।

35 साल की अधिकतम नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (10,000×35)÷70=₹5,000

मासिक पेंशन: आपको अधिकतम ₹5,000 प्रति माह की पेंशन मिल सकती है।

कैलकुलेशन 2: अगर आपकी पेंशन योग्य सैलरी ₹20,000 है

अगर आपकी वास्तविक सैलरी ₹20,000 है और आपका कंट्रीब्यूशन सीलिंग लिमिट से ऊपर वास्तविक वेतन पर है, तो कैलकुलेशन इस प्रकार होगी:

10 साल की नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (20,000×10)÷70=₹2,857

मासिक पेंशन: आपको हर महीने करीब ₹2,857 की गारंटेड पेंशन मिलेगी।

20 साल की नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (20,000×20)÷70=₹5,714

मासिक पेंशन: यह राशि बढ़कर करीब ₹5,714 प्रति माह हो जाएगी।

35 साल की अधिकतम नौकरी पर:

कैलकुलेशन: (20,000×35)÷70=₹10,000

मासिक पेंशन: आपको लाइफटाइम ₹10,000 प्रति माह की ठीक-ठाक पेंशन मिल सकती है।

अगर आपकी सैलरी ₹10,000 या ₹20,000 है, तो 10 साल बाद हर महीने कितनी रकम मिलेगी?

न्यूनतम पेंशन का सुरक्षा कवच

ईपीएस के तहत वर्तमान में न्यूनतम पेंशन ₹1,000 प्रति माह तय की गई है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी कर्मचारी की 10 साल की नौकरी के बाद ईपीएफओ के फॉर्मूले से पेंशन ₹1,000 से कम यानी मान लीजिए ₹80) बनती है, तो भी सरकार उसे बढ़ाकर न्यूनतम ₹1,000 प्रति माह देना सुनिश्चित करेगी।

हालांकि, देश भर के पेंशनभोगी लंबे समय से इस ₹1,000 की न्यूनतम सीमा को बढ़ाकर ₹5,000 से ₹7,500 करने की मांग कर रहे हैं, जिस पर सरकार की ओर से अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।

टैक्सपेयर्स और नौकरी बदलने वालों के लिए जरूरी सलाह

अगर आप करियर के दौरान अपनी नौकरी बदल रहे हैं, तो कभी भी पुराने ईपीएफ (EPF) और ईपीएस (EPS) के पैसे को एकमुश्त निकालने की गलती न करें। हमेशा अपने UAN के जरिए अपने पुराने पीएफ अकाउंट को नई कंपनी में ट्रांसफर कराएं। ऐसा करने से आपकी पेंशन योग्य सेवा लगातार जुड़ती रहती है और बिना किसी रुकावट के आपकी 10 साल की पात्रता आसानी से पूरी हो जाती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Market Outlook : अच्छी बढ़त के साथ बंद हुए भारतीय इक्विटी इंडेक्स, जानिए 20 जुलाई को कैसी रह सकती है इनकी चाल

Market Outlook : 17 जुलाई को भारतीय इक्विटी इंडेक्स मजबूती के साथ बंद हुए और निफ्टी 24,300 के ऊपर रहा। कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 964.58 अंक या 1.25 प्रतिशत बढ़कर 78,151.45 पर और निफ्टी 261.55 अंक या 1.09 प्रतिशत बढ़कर 24,334.30 पर बंद हुआ। लगभग 1632 शेयरों में बढ़त हुई, 2419 शेयरों में गिरावट आई और 175 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

निफ्टी में सबसे ज़्यादा बढ़त वाले शेयरों में कोटक महिंद्रा बैंक,टेक महिंद्रा,TCS,जियो फाइनेंशियल और रिलायंस इंडस्ट्रीज शामिल रहे। जबकि गिरावट वाले शेयरों में हिंडाल्को,डॉ. रेड्डीज़ लैब्स,विप्रो,सन फार्मा और मैक्स हेल्थकेयर शामिल रहे। सेक्टरों की बात करें तो निफ्टी प्राइवेट बैंक सबसे ज्यादा बढ़त वाला सेक्टर रहा। इसमें 2 प्रतिशत की तेजी आई। इसके बाद निफ्टी बैंक रहा,जिसमें 1.6 प्रतिशत की बढ़त हुई। निफ्टी IT में 1.7 प्रतिशत की तेजी आई।

दूसरे बढ़त वाले सेक्टरों में निफ्टी ऑटो और निफ्टी रियल्टी में 1.3-1.3 प्रतिशत की बढ़त हुई। जबकि निफ्टी ऑयल एंड गैस में 1 प्रतिशत और निफ्टी FMCG में 0.7 प्रतिशत की बढ़त हुई। दूसरी ओर निफ्टी फार्मा में 1.4 प्रतिशत और मेटल में 0.4 प्रतिशत की गिरावट आई। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.4 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.2 प्रतिशत की गिरावट आई।

आगे कैसी रह सकती है बाजार की चाल

बाजार जानकारों का कहना है कि घरेलू बाजार के लिए पहली तिमाही के नतीजे मेन ट्रिगर होंगे,जिससे अलग-अलग सेक्टर और शेयरों में हलचल दिखेगी। हालांकि,मिडिल ईस्ट में हो रही घटनाएं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी अहम डिसाइडिंग फैक्टर बने रहेंगे। इनसे ब्याज दरों,कंपनियों की अर्निंग, महंगाई और देश के मैक्रोइकॉनॉमिक आउटलुक के अनुमानों पर असर पड़ने की संभावना है।

टाटा म्यूचुअल फंड को उम्मीद है कि बेहतर होते मैक्रोइकॉनॉमिक माहौल के दम पर FY27 में निफ्टी की अर्निंग्स में 15-17% की बढ़ोतरी होगी। इसका कहना है कि निफ्टी का वैल्यूएशन अपने लान्ग टर्म एवरेज से नीचे आ गया है,जो अगले 12-18 महीनों में इक्विटी रिटर्न के लिए एक अच्छा माहौल बनाता है। भारत का लॉन्ग-टर्म इक्विटी आउटलुक, बेहतर होते इन्वेस्टमेंट साइकल,क्रेडिट ग्रोथ,मैन्युफैक्चरिंग को मिल रहे सपोर्ट,रियल एस्टेट में रिकवरी और मज़बूत बैंकिंग फंडामेंटल्स की वजह से अच्छा बना हुआ है। FII की लगातार बिकवाली के बावजूद,घरेलू संस्थागत निवेशकों का मज़बूत निवेश भारतीय इक्विटी को सपोर्ट कर रहा है।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के हेड ऑफ रिसर्च विनोद नायर का कहना है कि मार्केट की चाल में बदलाव दिख रहा है, जिसमें IT और बैंकिंग सेक्टर की अगुवाई में लार्ज-कैप शेयरों की ओर जबरदस्त रुझान है। बिजनेस अपडेट्स और Q1 की कमाई की उम्मीदों को लेकर अच्छे माहौल से इसे सपोर्ट मिल रहा है। यह ट्रेंड मुख्य रूप से घरेलू संस्थागत निवेशकों की वजह से दिख रहा है,जो महंगे मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों से निकलकर बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल और आकर्षक वैल्यूएशन वाले लार्ज-कैप शेयरों में निवेश कर रहे हैं।

साथ ही,FY27 की दूसरी छमाही (H2) में घरेलू मांग अच्छी रहने की उम्मीद में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में भी खरीदारी का रुझान दिख रहा है। कुल मिलाकर भारत के लिए बेहतर होते आउटलुक के बीच चुनिंदा शेयरों में प्रॉफिट बुकिंग और खरीदारी के साथ ब्रॉडर मार्केट का रुख पॉजिटिव बना हुआ है।

LKP सिक्योरिटीज में सीनियर टेक्निकल एनालिस्ट रूपक डे का कहना है कि इंडेक्स पांच दिन के कंसोलिडेशन फेज से बाहर निकल गया है। यह ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स के बढ़ते भरोसे का संकेत है। बाजार का ओवरऑल ट्रेंड पॉजिटिव बना हुआ है क्योंकि इंडेक्स अपने अहम मूविंग एवरेज से ऊपर ट्रेड कर रहा है। इसके अलावा,RSI बुलिश क्रॉसओवर में आ गया है,जिससे पॉजिटिव मोमेंटम और मजबूत हुआ है। आने वाले समय में निफ्टी के मजबूत बने रहने और 24,800 के लेवल की ओर बढ़ने की संभावना है। नीचे की तरफ निफ्टी के लिए तत्काल सपोर्ट 24,200 पर है। अगर यह इस लेवल से नीचे गिरता है तो कंसोलिडेशन का दौर शुरू हो सकता है।

बोनान्जा में रिसर्च एनालिस्ट अभिनव तिवारी का कहना है कि आगे बाजार रिलायंस इंडस्ट्रीज,HDFC बैंक और ICICI बैंक के Q1FY27 नतीजों पर बारीकी से नजर रखेगा। इनसे बाजार की निकट भविष्य की दिशा तय होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर,बाजार के स्टॉक-स्पेसिफ़क रहने की संभावना है। अच्छी कमाई करने वाली कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है।

 

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Silver outlook: ₹5000 सस्ती हुई चांदी, क्या कीमतों में आने वाली है और बड़ी गिरावट, जानें क्या कहते है बाजार जानकार

Silver Outlook: घरेलू और इंटरनेशनल दोनों ही बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिल रही है। घरेलू बाजार में सोना जहां 4 महीनें के निचले स्तरों पर पहुंचा है। वहीं चांदी $56 के नीचे फिसली है। शुक्रवार को फ्यूचर ट्रेड में चांदी की कीमतें 1,258 रुपये गिरकर 2,14,755 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर, सितंबर डिलीवरी वाले चांदी के कॉन्ट्रैक्ट 1,258 रुपये या 0.58 प्रतिशत गिरकर 2,14,755 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गए, जिसमें 1,563 लॉट का कारोबार हुआ।

वहीं COMEX पर चांदी की कीमतें 0.63% गिरकर $55.83 प्रति ट्रॉय औंस पर कारोबार कर रही हैं। चांदी एक इंडस्ट्रियल मेटल है और ग्लोबल टेक शेयरों में आई गिरावट का इस पर असर देखा जा रहा है। भारत में चांदी की कीमत में आज 2.3% की बड़ी गिरावट आई है और यह 2,15,000 प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गया है। कल चांदी की कीमत प्रति किलो 2.20 लाख रुपये थी। यानी कि कल के मुकाबले आज चांदी में 5000 रुपये की गिरावट आई है।

मजबूत डॉलर कर रहा परेशान

इस बीच, शुक्रवार को डॉलर इंडेक्स बढ़कर 100.78 हो गया, जिससे विदेशी करेंसी में खरीदारों के लिए बुलियन महंगा हो गया। कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के करीब ट्रेड करती रहीं।

यूएस- ईरान तनाव और क्रूड बढ़ा रही चिंता

सोने और चांदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती US-ईरान तनाव है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और महंगाई का डर फिर से बढ़ गया है, जिससे आने वाले समय में US फेडरल रिजर्व द्वारा रेट बढ़ाने का डर बढ़ गया है।

US फेडरल रिजर्व के चेयर वार्श ने 14 जुलाई और 15 जुलाई को US हाउस फाइनेंशियल सर्विसेज कमेटी और सीनेट बैंकिंग कमेटी के सामने अपनी पहली गवाही में दोहराया कि कीमतों में स्थिरता सेंट्रल बैंक का मुख्य मकसद है। उन्होंने जून की उम्मीद से कम रीडिंग को सिर्फ़ एक डेटा पॉइंट बताकर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 63 महीनों से महंगाई फेडरल रिजर्व के 2 फीसदी के टारगेट से ऊपर रही है।

फेड गवर्नर वॉलर ने बढ़े हुए कोर CPI का हवाला देते हुए मंगलवार को कहा था कि सेंट्रल बैंक को रेट बढ़ाने की ज़रूरत है क्योंकि महंगाई अभी भी ज़्यादा है। वहीं न्यूयॉर्क फेड के प्रेसिडेंट जॉन विलियम्स ने बुधवार को कहा कि महंगाई अभी भी ज़्यादा है, लेकिन उनका मानना ​​है कि यह अपने पीक पर पहुच गई है और 2028 तक बैंक के टारगेट को पूरा कर लेगी। उन्होंने आगे कहा कि अभी के रेट सही जगह पर हैं।

क्या आगे कीमतों में दिखेगा दबाव

Kedia Advisory के डायरेक्टर अजय केडिया ने कहा कि आनेवाले 10-12 दिन सोने -चांदी की कीमतों के लिए काफी अहम होंगे। क्योंकि बाजार उम्मीद लगा रहा है कि सितंबर होने वाली फेड मीटिंग में ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो सकती है। चांदी  में टेक्निकली $50 प्रति औंस का सपोर्ट दिख रहा है। मेरा मानना है कि $53- 54 प्रति औंस एक सेफ जोन है। जिसके चलते एग्रेसिव होकर बिकवाली की राय नहीं होगी। हमारी सलाह है कि अगस्त में चांदी में एक्यूमुलेशन के लिए थोड़ा इंतजार करना चाहिए।हालांकि कच्चा तेल, जियोपॉलिटिकल टेंशन और महंगाई की चिंता चांदी के लिए थोड़ी क्रिटिकल हो सकती है।

इंडसइंड सिक्योरिटीज के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट जिगर त्रिवेदी ने कहा, “मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से तेल की कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे महंगाई का दबाव और ब्याज दरों की चिंताएं सबसे ऊपर हैं, इसलिए सोना गिर रहा है।”

त्रिवेदी ने बताया, “US ने इस हफ़्ते ईरान पर कई हमले किए, जबकि ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि US देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकता है। ईरान ने पड़ोसी देशों में US के ठिकानों पर हमले करके जवाब दिया, जिससे तनाव और बढ़ने और इलाके से एनर्जी सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट की आशंका बढ़ गई।

पृथ्वीफिनमार्ट कमोडिटी रिसर्च के मनोज कुमार जैन को उम्मीद है कि आज सोने और चांदी की कीमतें ऊपर-नीचे रहेंगी। उनका कहना है कि आज के MCX पर सोने को $3,955 और $3,910 पर सपोर्ट है, जबकि रेजिस्टेंस $4,034 और $4,080 प्रति ट्रॉय औंस पर है, और चांदी को $55.50 और $54.40 पर सपोर्ट है, जबकि रेजिस्टेंस $57.50 और $58.80 प्रति ट्रॉय औंस पर है।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Dollar Vs INR : रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, एक्सपर्ट्स से जानें आगे कैसी रह सकती है इसकी चाल

Dollar Vs Rupee : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। जानकारों का मानना ​​है कि इस गिरावट की वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें,विदेशी निवेश में कमी,डॉलर की मजबूत मांग और अर्थव्यवस्था में स्ट्रक्चरल असंतुलन जैसे कई कारण हैं। 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, आज शुक्रवार को यह 96.30 के आसपास कारोबार कर रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर से सिर्फ 0.55 प्रतिशत दूर दिख रहा है।

रुपए की हालिया गिरावट ने 5 जून के बाद हुई करेंसी की रिकवरी को खत्म कर दिया है,जिससे रुपया इस महीने एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गया है।

तेल की कीमतों में उछाल से अर्थव्यवस्था की स्ट्रक्चरल कमजोरियां सामने आईं

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के कोर एनालिटिकल ग्रुप के डायरेक्टर सौम्यजीत नियोगी का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये के कमजोर होने में एक ट्रिगर का काम किया है,लेकिन यह इसकी मुख्य वजह नहीं है। नियोगी के मुताबिक,मज़बूत अमेरिकी डॉलर,टैरिफ की वजह से एक्सपोर्ट में आ रही मुश्किलें, चीन की आक्रामक डंपिंग और कमजोर ग्लोबल आउटलुक, इन सभी का असर रुपये पर पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि करीब एक दशक तक भारत को कच्चे तेल की कम कीमतों का फायदा मिला,जिससे इन दबावों को झेलने में मदद मिली। लेकिन,हाल ही में तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने यह सहारा छीन लिया और अर्थव्यवस्था को कई मौजूदा ढ़ाचागत कमजेरियां उभर कर सामने आ गईं।

बंधन AMC के सीनियर इकोनॉमिस्ट श्रीजीत बालासुब्रमण्यन का कहना है कि रुपए में हाल में आई गिरावट को भारत के स्ट्रक्चरल करंट अकाउंट डेफिसिट के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। असल में भारत करंट अकाउंट डेफिसिट वाला देश है। हम एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई कि तुलना में इंपोर्ट पर ज्यादा खर्च करते हैं,और जब हमें बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में सरप्लस मिलता भी है,तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कैपिटल इनफ्लो करंट अकाउंट डेफिसिट से ज़्यादा होता है। उन्होंने आगे कहा कि ढ़ाचागत रूप से,पिछले 10-15 सालों में रुपये की कीमत में सालाना लगभग 3-4 प्रतिशत की गिरावट आई है।

डॉलर की आवक में कमजोरी, इसकी निकासी की भरपाई करने में रही नाकाम

RBI के 5 जून के उपायों ने (जिनमें फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट बैंक (FCNR-B) डिपॉजिट के लिए इंसेंटिव भी शामिल थे) शुरुआत में बाजार का मूड बेहतर किया था। हालांकि,डॉलर की आवक उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। यह उम्मीद से कम ही रही।

आरित्या ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड में रिसर्च हेड गौरव अरोड़ा ने बताया कि इस साल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से 36 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाली है,जो पिछले साल की निकासी से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल कैपिटल तेजी से AI और सेमीकंडक्टर-आधारित बाज़ारों,जैसे कि अमेरिका,ताइवान और दक्षिण कोरिया की ओर शिफ्ट हो रहा है।

गौरव अरोड़ा ने जून में भारत के 30.43 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की ओर भी इशारा किया। यह घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल,इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात के कारण हुआ। साथ ही इसमें अमेरिकी डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर कोई खास जल्दबाजी न दिखाने का भी असर रहा।

बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब तक FCNR(B) के तहत केवल 5-6 अरब डॉलर का ही विदेशी निवेश आया है,जो शुरुआती अनुमानों से काफी कम है। इससे रुपये को मिलने वाला शॉर्ट टर्म सपोर्ट कम हो गया है।

डॉलर की बढ़ती मांग ने बनाया दबाव

फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स LLP में ट्रेजरी हेड और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली ने कहा कि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से रुपये पर दबाव बना हुआ है। उन्होंने कहा कि डॉलर की मांग बढ़ने के मुख्य कारणों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के अलावा,रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाने को लेकर बनी नई चिंताएं,विदेशी पोर्टफोलियो से पैसे की निकासी,रक्षा भुगतान,सरकारी कर्ज की अदायगी और विदेशों में कंपनियों के अधिग्रहण भी शामिल हैं।

भंसाली ने आगे कहा कि करेंसी में डॉलर का इनफ्लो बहुत कम है,जबकि एक्सपोर्टर अपनी डॉलर की कमाई को रोककर रख रहे हैं और इंपोर्टर तत्काल पेमेंट के लिए डॉलर खरीद रहे हैं और रुपया मजबूत होने पर फ़ॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बुक कर रहे हैं। इससे रुपए पर दबाव बना हुआ है। इसके अलावा भारत में महंगाई बढ़ने लगी है,जबकि अमेरिका में महंगाई कम हुई है। इससे रुपये को पहले जो वैल्यूएशन का फायदा मिल रहा था,वह अब खत्म हो गया है।

उधर बालासुब्रमण्यन ने कहा कि मार्केट की स्थिति ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि जब मार्केट को उम्मीद होती है कि रुपया कमजोर होगा तो एक्सपोर्टर कम हेजिंग करते हैं क्योंकि कमजोर करेंसी से उन्हें फायदा होता है। जबकि दूसरी तरफ इम्पोर्टर ज्यादा आक्रामक तरीके से हेजिंग करते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और एक ऐसा चक्र बन जाता है जो रुपये पर और दबाव डालता है।

आगे का आउटलुक

जानकारों का मानना ​​है कि नियर टर्म दबाव के बावजूद आने वाले महीनों में FCNR(B) के तहत आने वाले फंड में बढ़ोतरी से रुपये को सहारा मिलेगा। बालासुब्रमण्यन को उम्मीद है कि ज्यादातर फंड अगस्त और सितंबर के दौरान आएगा,जिससे भारत को सितंबर तिमाही में बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स में सरप्लस हासिल करने में मदद मिलेगी।

नियोगी ने कहा कि अगर जियोपॉलिटिकल तनाव कम होते हैं तो FCNR(B) और दूसरे कैपिटल फ्लो की वजह से रुपये में मजबूती आ सकती है और यह साल के बाकी समय में औसतन 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे आ सकता है।

द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर और मार्केट स्ट्रैटेजी हेड,अक्षय चिंचालकर ने कहा कि रुपये के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.96 से सुधरकर 94.14 पर आने से बाजार की घबराहट तो कम हुई है,लेकिन इससे मेन ट्रेंड में कोई बदलाव नहीं आया है। डेली,वीकली और मंथली चार्ट पर टेक्निकल सेटअप मजबूती से डॉलर के पक्ष में बना हुआ है और एक साल तक एक ही दायरे में रहने के बाद डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर बढ़ना (अपसाइड ब्रेकआउट) एक बहुत बड़ा सपोर्ट साबित हो रहा है।

चिंचालकर के मुताबिक डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के आस-पास अपने पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर को फिर से छू सकता है। गिरावट का यह ट्रेंड तभी खत्म होगा जब रुपया 94.96 के स्तर से ऊपर मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि अगर रुपया 97 के आसपास कोई सपोर्ट नहीं बना पाता है तो इसका अगला टारगेट 98 के आसपास हो सकता है। अगर रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से नीचे गिरता है तो यह 98.70 के स्तर तक जा सकता है।

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Gold Rates Today: इस हफ्ते गोल्ड 3 फीसदी फिसला, क्रूड में उछाल ने बढ़ाया दबाव

Gold Rates Today: गोल्ड में 17 जुलाई को रिकवरी दिखी। हालांकि, इस हफ्ते गोल्ड में बड़ी गिरावट दिख रही है। 16 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड का प्राइस 4000 डॉलर से नीचे चला गया था। शुक्रवार को स्पॉट गोल्ड 0.8 फीसदी चढ़कर 4,002.39 डॉलर प्रति औंस था। यूएस फ्यूचर्स भी (अगस्त डिलीवरी) 0.4 फीसदी चढ़कर 4,006.10 डॉलर प्रति औंस था। इधर, भारत में भी गोल्ड फ्यूचर्स में तेजी दिखी। कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स पर गोल्ड फ्यूचर्स 0.13 फीसदी यानी 180 रुपये चढ़कर 1,40,528 रुपये प्रति 10 ग्राम पर चल रहा था।

1 जून के बाद यह गोल्ड के लिए सबसे खराब हफ्ता

गोल्ड के लिए यह हफ्ता खराब दिख रहा है। सोना इस हफ्ते अब तक 3 फीसदी गिर चुका है। 1 जून के बाद एक हफ्ते में सोने की कीमतों में यह सबसे बड़ी गिरावट है। गोल्ड की कीमतों पर अमेरिका-ईरान की लड़ाई का असर पड़ा है। इस लड़ाई की वजह से क्रूड की कीमतों में फिर से उछाल आया है। इससे अमेरिका में फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट बढ़ाने की संभावना बढ़ी है।

कीमतें 4000 डॉलर से नीचे जाने पर दिखी खरीदारी

केसीएम ट्रेड में चीफ मार्केट एनालिस्ट टिम वाटरर ने कहा, “गोल्ड की कीमतें 4,000 डॉलर से नीचे फिसलने के बाद इसमें खरीदारी दिखी है। इससे कीमतों में रिकवरी है। हालांकि, मध्यपूर्व में अभी तनाव बना हुआ है। इनफ्लेशन और यील्ड की चिंता से गोल्ड की कीमतें ऊपर नहीं जा पा रही हैं।” बीते कुछ हफ्तों में सोने पर लगातार दबाव दिखा है।

जुलाई के इनफ्लेशन डेटा पर दिखेगा महंगे क्रूड का असर

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका में जुलाई के इनफ्लेशन के डेटा में महंगे क्रूड का असर दिख सकती है। इनफ्लेशन में उछाल आने पर अमेरिकी केंद्रीय बैक सितंबर में इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। फेड के नए चेयरमैन केविन वार्श पहले ही आक्रामक मॉनेटरी पॉलिसी के संकेत दे चुके हैं। फेड की कोशिश महंगाई को काबू में करने की होगी।

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गोल्ड ऑल-टाइम हाई से 30 फीसदी फिसल चुका है

इस साल जनवरी के आखिर में सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। उसके बाद कीमतों में तेज गिरावट आई। 28 फरवरी को अमेरिका-ईरान की लड़ाई शुरू होने के बाद गोल्ड पर दबाव और बढ़ गया। गोल्ड अपने पीक से 30 फीसदी गिर चुका है। 2025 गोल्ड के लिए बहुत अच्छा साल था। पिछले साल गोल्ड में 70 फीसदी तेजी दिखी थी। इससे गोल्ड और गोल्ड ईटीएफ में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी थी।

Gold Silver Price Today: चांदी 4 दिन में ₹12500 सस्ती हुई, सोना लगातार दूसरे दिन सपाट

Gold Silver Price Today: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गुरुवार को सोने की कीमत लगातार दूसरे दिन स्थिर रही। 24 कैरेट वाला सोना ₹1,46,300 प्रति 10 ग्राम पर कारोबार करता रहा। वहीं, चांदी ₹1,500 टूटकर ₹2,24,500 प्रति किलोग्राम पर आ गई। यह स्तर दो हफ्ते से ज्यादा समय का निचला स्तर है।

4 दिन में ₹12,500 टूटी चांदी

चांदी में लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की गई। 10 जुलाई को चांदी ₹2,37,000 प्रति किलो पर थी, जो अब घटकर ₹2,24,500 प्रति किलो रह गई है। यानी सिर्फ चार कारोबारी सत्र में चांदी ₹12,500 या 5.3% टूट चुकी है।

सोना सीमित दायरे में क्यों?

HDFC Securities के सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट सौमिल गांधी के मुताबिक, अमेरिका में महंगाई के आंकड़े उम्मीद से कम रहे। वहीं, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है। इन दोनों वजहों का असर एक-दूसरे को संतुलित करता रहा। इसलिए सोना लगातार दूसरे दिन सीमित दायरे में कारोबार करता रहा।

चांदी पर क्यों बना दबाव?

Augmont की रिसर्च हेड रेनिशा चैनानी के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की आशंका बढ़ी है। इससे अमेरिकी केंद्रीय बैंक (Federal Reserve) के ब्याज दरें ऊंची रखने की संभावना बनी हुई है। इसी कारण चांदी में मुनाफावसूली और कमजोर औद्योगिक मांग का दबाव देखा गया।

अंतरराष्ट्रीय बाजार का हाल

वैश्विक बाजार में स्पॉट गोल्ड करीब 61 डॉलर यानी 1.68% गिरकर 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गया। वहीं, स्पॉट सिल्वर करीब 3% गिरकर 56 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

आगे किस पर रहेगी बाजार की नजर?

Mirae Asset Sharekhan के कमोडिटी प्रमुख प्रवीण सिंह के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी भी बना हुआ है। हालांकि, ईरान की ओर से बातचीत की संभावना जताए जाने के बाद सोने में गिरावट सीमित रही।

वहीं, Lemonn Markets Desk के रिसर्च एनालिस्ट गौरव गर्ग का कहना है कि अब निवेशकों की नजर अमेरिका के रिटेल सेल्स और जॉबलेस क्लेम्स के आंकड़ों पर रहेगी। इनसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और फेड की ब्याज दरों की अगली दिशा का संकेत मिल सकता है।

MCX पर गोल्ड का हाल

LKP Securities के वीपी रिसर्च एनालिस्ट (कमोडिटी और करेंसी) जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, सोने की कीमतों पर अभी दबाव बना हुआ है। MCX पर गोल्ड करीब ₹950 गिरकर ₹1,40,900 पर पहुंच गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार COMEX में सोना करीब 60 डॉलर टूटकर 4000 डॉलर प्रति औंस के नीचे कारोबार कर रहा है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। हाल में अमेरिका के महंगाई के आंकड़े नरम रहे, क्योंकि मई-जून में ऊर्जा की कीमतें कम थीं। लेकिन अगर कच्चा तेल महंगा बना रहता है, तो महंगाई फिर बढ़ सकती है। इसका असर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों के फैसले पर भी पड़ सकता है।

जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, निवेशकों की नजर अब भू-राजनीतिक घटनाक्रम और कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगी। तकनीकी रूप से MCX Gold के ₹1,40,000 से ₹1,43,000 प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार करने की संभावना है। साथ ही, बाजार में उतार-चढ़ाव भी बना रह सकता है।

Gold Silver Prices Today: गोल्ड 4000 डॉलर से नीचे फिसला, चांदी में भी बड़ी गिरावट

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Gold Silver Prices Today: गोल्ड 4000 डॉलर से नीचे फिसला, चांदी में भी बड़ी गिरावट

अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड और सिल्वर में बड़ी गिरावट दिखी। सोना 4000 डॉलर से नीचे फिसल गया। चांदी में भी बड़ी गिरावट दिखी। इधर, भारत में भी गोल्ड फ्यूचर्स और सिल्वर फ्यूचर्स में कमजोरी दिखी। इसकी वजह क्रूड में उछाल से दुनियाभर में इनफ्लेशन बढ़ने का डर है। इनफ्लेशन को काबू में करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है।

भारत में भी गोल्ड और सिल्वर फ्यूचर्स में गिरावट

अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड 1.74 फीसदी गिरकर 3,990 डॉलर प्रति औंस चल रहा था। चांदी 3.20 फीसदी गिरकर 55.91 डॉलर प्रति औंस चल रही थी। इधर, भारत में कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स में सिल्वर फ्यूचर्स 1.78 फीसदी यानी 3,888 रुपये गिरकर 2,16,836 रुपये प्रति किलोग्राम ग्राम था। गोल्ड फ्यूचर्स 0.80 फीसदी यानी 1139 रुपये गिरकर 1,40,691 रुपये प्रति 10 ग्राम चल रहा था।

मध्यपूर्व में टेंशन बढ़ने से क्रूड में उछाल का असर

एनालिस्ट्स का कहना है कि बुलियन की कीमतों पर दबाव की वजह मध्यपूर्व में जारी लड़ाई है। इस लड़ाई की वजह से फिर से क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल है। इससे अमेरिका सहित दुनियाभर में महंगाई का खतरा बढ़ा है। महंगाई को कंट्रोल में करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर सोने की कीमतों में गिरावट देखने को मिलती है।

आगे महंगाई में आ सकता है उछाल

इंडसइंड सिक्योरिटीज में सीनियर रिसर्च एनालिस्ट जिगर त्रिवेदी ने कहा, “जून के महंगाई के डेटा में अमेरिका-ईरान के बीच फिर से लड़ाई भड़कने का असर शामिल नहीं है। इसकी वजह यह है कि पिछले महीने दोनों पक्षों में डील हुई थी जो अब टूट गई है।” अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपना रुख काफी आक्रामक कर दिया है। 15 जुलाई को उसने ईरान में मिसाइल ठिकानों के साथ ही तटवर्ती डिफेंस सिस्टम्स पर हमले किए।

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इस हफ्ते क्रूड में 11 फीसदी तेजी

अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई फिर से भड़कने से क्रूड में तेजी आई है। इस हफ्ते क्रूड 11 फीसदी चढ़ा है। इससे इनफ्लेशन को लेकर चिंता बढ़ी है। आशंका है कि दुनियाभर में लोगों को लंबे समय तक महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। इससे इंटरेस्ट रेट में इजाफा देखने को मिलेगा। गोल्ड का दशकों से इनफ्लेशन के खिलाफ हेजिंग का जरिया माना जाता है। इसलिए इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर इसका अट्रैक्शन घट जाता है।

Market Outlook : सपाट बंद हुए सेंसेक्स-निफ्टी, जानिए 17 जुलाई को कैसी रह सकती है बाजार की चाल

Market Outlook : 16 जुलाई को उतार-चढ़ाव भरे सेशन में भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स बिना किसी बड़े बदलाव के सपाट बंद हुए हैं। IT और कंज्यूमर सेंट्रिक शेयरों में बढ़त का असर बैंकिंग और रियल्टी शेयरों में कमजोरी से खत्म हो गया। कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 1.44 अंक बढ़कर 77,186.87 पर और निफ्टी 5.75 अंक या 0.02 प्रतिशत गिरकर 24,072.75 पर बंद हुआ। लगभग 1947 शेयरों में बढ़त हुई, 2119 शेयरों में गिरावट आई और 194 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अलग-अलग शेयरों में मिला-जुला असर दिखा। इंटरग्लोब एविएशन सबसे ज्यादा बढ़त वाले शेयरों में शामिल रहा, जिसमें 1.8% की तेजी आई। इसके बाद विप्रो (+1.7%), बजाज फाइनेंस (+1.6%), HCL टेक्नोलॉजीज (+1.6%) और मारुति सुजुकी (+1.4%) रहे। गिरावट वाले शेयरों में, एटरनल 2.8% गिरा, जबकि SBI लाइफ इंश्योरेंस में 2.3% की गिरावट आई। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स 0.9% गिरा, HDFC बैंक 0.8% टूटा और श्रीराम फाइनेंस में 0.8% की गिरावट आई।

सेक्टर इंडेक्स में, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला सेक्टर रहा, जिसमें 1.5% की बढ़त हुई। इसके बाद निफ्टी मीडिया (+1%), निफ्टी IT (+0.7%) और निफ्टी ऑटो (+0.4%) रहे। निफ्टी FMCG (+0.25%) भी बढ़त के साथ बंद हुआ।

गिरावट वाले सेक्टरों में, निफ्टी रियल्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, जिसमें 1% की गिरावट आई। निफ्टी PSU बैंक 0.5% गिरा, इसके बाद निफ्टी मेटल (-0.3%), निफ्टी प्राइवेट बैंक (-0.3%) और निफ्टी बैंक (-0.3%) रहे।

ब्रॉडर मार्केट का प्रदर्शन बेंचमार्क के मुकाबले कमजोर रहा। इसके चलते निफ्टी मिडकैप 100 में 0.4% की गिरावट आई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 लगभग बिना किसी बदलाव के बंद हुआ।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के हेड ऑफ़ रिसर्च, विनोद नायर का कहना है कि भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और एशियाई बाजार के कमजोर रुझानों के बीच निवेशकों के सतर्क रुख अपनाने से भारतीय शेयर बाजार में सुस्ती रही। महंगाई की चिंताओं ने फाइनेंशियल और रियल्टी सेक्टर पर दबाव डाला, वहीं कुछ पेट्रोकेमिकल्स पर इंपोर्ट ड्यूटी फिर से लागू होने और मज़बूत कमाई के दम पर केमिकल सेक्टर एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा। उधर उम्मीद से कम अमेरिकी महंगाई दर ने ब्याज दरों से जुड़ी चिंताओं को कम किया और बाजार को कुछ सहारा दिया। आगे बाजार की नजर कंपनियों के नतीजों और मैनेजमेंट की टिप्पणियों के साथ-साथ मॉनसून की प्रगति पर रहेगी। इसके अलावा ग्लोबल स्थिति और महंगाई से जुड़ी घटनाएं बाजार की चाल पर असर डालती रहेंगी।

LKP सिक्योरिटीज के टेक्निकल एनालिस्ट वत्सल भुवा का कहना है कि निफ्टी एक सीमित दायरे में ट्रेड कर रहा है, जो न्यूट्रल रुख के साथ कंसोलिडेशन का संकेत है। टेक्निकल तौर पर इंडेक्स को 23,950–24,000 के जोन में मज़बूत सपोर्ट मिलने की उम्मीद है, जबकि 24,250–24,300 का जोन तत्काल रेजिस्टेंस का काम कर सकता है। इसके बाद 24,500 के आसपास एक बड़ी रुकावट हो सकती है।

ऑप्शन चेन डेटा भी 24,000 स्ट्राइक पर सबसे ज्यादा ‘पुट राइटिंग’ का संकेत दे रहा है, जो इसे एक अहम सपोर्ट लेवल के तौर पर मजबूत करता है। मौजूदा टेक्निकल सेटअप को देखते हुए, सपोर्ट के पास गिरावट पर खरीदारी और रेजिस्टेंस के पास उछाल पर बिकवाली की रणनीति सही रहेगी।

उन्होंने आगे कहा कि बैंक निफ्टी इंडेक्स ने डेली चार्ट पर एक छोटी कैंडलस्टिक बनाई है, जो अनिश्चितता का संकेत है क्योंकि इंडेक्स कंसोलिडेशन रेंज में ट्रेड कर रहा है। RSI न्यूट्रल जोन के पास स्थिर है, जो मज़बूत डायरेक्शनल मोमेंटम की कमी का संकेत है। टेक्निकल तौर पर 56,800–57,000 का जोन तत्काल सपोर्ट का काम कर सकता है। जबकि 58,200 का लेवल अहम रेजिस्टेंस का काम कर सकता है।

जब तक कोई निर्णायक ब्रेकआउट या ब्रेकडाउन नहीं होता, तब तक रुख न्यूट्रल रहने की उम्मीद है। इस स्थिति में सपोर्ट के पास ‘बाय-ऑन-डिप्स’ और रेजिस्टेंस के पास ‘सेल-ऑन-राइज़’ की रणनीति फायदेमंद रहेगी।

SBI सिक्योरिटीज में हेड-टेक्निकल और डेरिवेटिव्स रिसर्च सुदीप शाह का कहना है कि आगे निफ्टी के लिए 23960-23930 के पास स्थित 50-डे का EMA जोन तत्काल सपोर्ट का काम करेगा । अगर यह 23930 के लेवल से नीचे जाता है और वहां बना रहता है तो और ज्यादा प्रॉफिट बुकिंग हो सकती है और इंडेक्स 23780 के लेवल तक गिर सकता है, जो अगला अहम सपोर्ट जोन बन सकता है।

ऊपर की तरफ, 24160-24200 की रेंज एक अहम रेजिस्टेंस एरिया बनी हुई है। अगर इंडेक्स इस दीवार को पार कर जाता है, तो मार्केट का सेंटीमेंट बेहतर हो सकता है और और ऊपर जाने का रास्ता खुल सकता है। तब तक, इंडेक्स में एक तय रेंज के अंदर ही ट्रेडिंग होने की संभावना है।

 

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Gold Silver Rates Today: देश और विदेश में सोने और चांदी में बड़ी गिरावट, सिल्वर फ्यूचर्स 1500 रुपये फिसला

सोने और चांदी में 16 जुलाई को देश और विदेश में गिरावट दिखी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 0.9 फीसदी गिरकर 4,024.60 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। यूएस गोल्ड फ्यूचर्स (अगस्त डिलीवरी) भी 0.6 फीसदी की कमजोरी के साथ 4,029.50 डॉलर प्रति औंस था। सिल्वर फ्यूचर्स 1.7 फीसदी गिरकर 56.78 डॉलर प्रति औंस चल रहा था। इधर, भारत में भी गोल्ड फ्यूचर्स और सिल्वर फ्यूचर्स में गिरावट दिखी।

एमसीएक्स में गोल्ड और सिल्वर फ्यूचर्स में कमजोरी

भारत में कमोडिटी एक्सचेंज MCX में दोपहर 2:30 बजे गोल्ड फ्यूचर्स 0.31 फीसदी यानी 442 रुपये की गिरावट के साथ 1,41,408 रुपये प्रति 10 ग्राम पर चल रहा था। सिल्वर फ्यूचर्स 0.71 फीसदी यानी 1,576 रुपये की कमजोरी के साथ 2,19,044 रुपये प्रति किलोग्राम चल रहा था। एक्सपर्ट्स का कहना है कि आज सोने और चांदी में कमजोरी की वजह बुलियन की कमजोर डिमांड है।

मध्यपूर्व में टेंशन बढ़ने से क्रूड में उछाल का असर

एनालिस्ट्स का कहना है कि बुलियन की कीमतों पर दबाव की वजह मध्यपूर्व में जारी लड़ाई है। इस लड़ाई की वजह से फिर से क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल है। इससे अमेरिका सहित दुनियाभर में महंगाई का खतरा बढ़ा है। महंगाई को कंट्रोल में करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर सोने की कीमतों में गिरावट देखने को मिलती है।

अगले महीने इनफ्लेशन में दिख सकता है उछाल

इंडसइंड सिक्योरिटीज में सीनियर रिसर्च एनालिस्ट जिगर त्रिवेदी ने कहा, “जून के महंगाई के डेटा में अमेरिका-ईरान के बीच फिर से लड़ाई भड़कने का असर शामिल नहीं है। इसकी वजह यह है कि पिछले महीने दोनों पक्षों में डील हुई थी जो अब टूट गई है।” अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपना रुख काफी आक्रामक कर दिया है। 15 जुलाई को उसने ईरान में मिसाइल ठिकानों के साथ ही तटवर्ती डिफेंस सिस्टम्स पर हमले किए।

इस हफ्ते क्रूड में 11 फीसदी का आया है उछाल

अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई फिर से भड़कने से क्रूड में तेजी आई है। इस हफ्ते क्रूड 11 फीसदी चढ़ा है। इससे इनफ्लेशन को लेकर चिंता बढ़ी है। आशंका है कि दुनियाभर में लोगों को लंबे समय तक महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। इससे इंटरेस्ट रेट में इजाफा देखने को मिलेगा। गोल्ड का दशकों से इनफ्लेशन के खिलाफ हेजिंग का जरिया माना जाता है। इसलिए इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर इसका अट्रैक्शन घट जाता है।

15 जुलाई को भी सोने और चांदी मे आई थी गिरावट

15 जुलाई को भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में बड़ी गिरावट आई थी। स्पॉट गोल्ड 0.6 फीसदी गिरकर 4,030.50 डॉलर प्रति औंस था। यूएस गोल्ड फ्यूचर्स (अगस्त डिलीवरी) 0.8 फीसदी गिरकर 4,036.20 प्रति औंस था। 15 जुलाई को स्पॉट सिल्वर भी 1.1 फीसदी गिरकर 57.96 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। हालांकि 14 जुलाई को सोने में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी आई थी। इसकी वजह अमेरिका के रिटेल इनफ्लेशन के डेटा थे। अमेरिका में जून में महंगाई उम्मीद से कम बढ़ी है।