प्रदेश में पर्याप्त चीनी, आमजन परेशान न हों : CM योगी

प्रदेश में पर्याप्त चीनी, आमजन परेशान न हों : CM योगी

CM Yogi Adityanath: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को आश्वस्त किया कि राज्य में चीनी की कोई कमी नहीं है, इसलिए आम नागरिक कतई परेशान न हों। प्रदेश की चीनी मिलों में वर्तमान में 179.38 लाख क्विंटल चीनी का भंडार उपलब्ध है। चीनी मिलों ने दो महीने (जून-जुलाई) में 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है। सीएम योगी ने निर्देश दिया कि आवश्यकता पड़ने पर चीनी मिलें 15 अक्टूबर से संचालित की जाएं।

15 अक्टूबर से संचालित की जाए चीनी मिलें 

मुख्यमंत्री ने समीक्षा बैठक में कहा कि सहकारी चीनी मिलों में 23.60 लाख क्विंटल, निगम की चीनी मिलों में 5.28 लाख क्विंटल और निजी चीनी मिलों में 150.50 लाख क्विंटल (कुल 179.38 लाख क्विंटल) चीनी प्रदेश में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त जून व जुलाई में चीनी मिलों ने 235 लाख क्विंटल चीनी की बिक्री की है, इसमें से अधिकांश चीनी अभी भी खुले बाजार में उपलब्ध है। आवश्यकता पड़ने पर 15 अक्टूबर से चीनी मिलों को संचालित किया जाए।

भ्रम फैलाने व कालाबाजारी करने वालों पर करें कार्रवाई 

सीएम योगी ने आमजन से अपील की कि चीनी की कमी बताकर भ्रम फैलाने वालों से सावधान रहें। मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि चीनी की कालाबाजारी और भ्रम फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई करें। उन्होंने भारत सरकार के निर्देश के क्रम में कहा कि कोई भी डीलर 30 दिन से अधिक चीनी स्टॉक का भंडारण नहीं करेगा और वे एक समय में 400 टन से ज्यादा स्टॉक भी नहीं रख सकते। बल्क कंज्यूमर्स (10 मीट्रिक टन प्रतिमाह खपत) भी 15 दिन से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकते। चीनी मिलें भी अपने मासिक कोटे के अंतर्गत विक्रित चीनी को विक्रय की तिथि से 7 दिन से अधिक अवधि तक गोदाम में नहीं रोकेंगी। 

सीएम ने दिया निर्देश- भौतिक सत्यापन कराएं जिलाधिकारी

मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि जनपद की समस्त पंजीकृत चीनी मिलों, थोक एवं फुटकर विक्रेताओं के गोदामों का भौतिक सत्यापन कराते हुए उपलब्ध स्टॉक की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट प्राप्त करें। निर्धारित सीमा से अधिक स्टॉक धारित करने अथवा जमाखोरी पर कठोर कार्रवाई की जाए। जनपद में चीनी की उपलब्धता एवं मूल्य पर सतत निगरानी रखते हुए किसी भी प्रकार की कृत्रिम कमी अथवा मूल्यवृद्धि की स्थिति में तत्काल शासन को अवगत कराएं।

48 लाख किसानों को किया गया 32,554 करोड़ का भुगतान 

बैठक में मुख्यमंत्री जी को अवगत कराया गया कि पेराई सत्र 2026-27 के लिए 28.14 लाख हेक्टेयर गन्ना क्षेत्रफल संभावित है। इससे 90 लाख टन चीनी उत्पादन की संभावना है। उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह अनुमानित चीनी खपत लगभग 4 लाख टन है। पेराई सत्र 2025-26 में 48 लाख किसानों को 32,554 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी किया गया है।

UN में पहली बार महिला चीफ बन सकती है:रेस में अभी 8 दावेदार, इनमें 5 महिलाएं; गुयाना की बिर्केट सबसे आगे

UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे हैं। वहीं दूसरे पायदान पर कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन हैं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को तरजीह मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी UN महासचिव पद के दावेदार रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें UN महासचिव पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। थरूर 1978 से UN में काम कर रहे थे। भारत ने उनके लंबे UN अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ को उनकी ताकत बताया। साथ ही, भारत ने कहा कि अब अगला महासचिव एशिया से होना चाहिए। भारत ने दुनियाभर में थरूर के लिए समर्थन जुटाया। मनमोहन सिंह ने कई देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने खुद भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात की। हालांकि, वे महासचिव नहीं बन सके। अनौपचारिक वोटिंग में थरूर दूसरे नंबर पर रहे, जबकि दक्षिण कोरिया के बान की-मून लगातार सबसे आगे रहे। —————— यह खबर भी पढ़ें… संयुक्त राष्ट्र में इजराइली राजदूत ने UN अफसर को फटकारा:यौन हिंसा से जुड़ी रिपोर्ट में इजराइल का नाम आने से नाराज थे संयुक्त राष्ट्र (UN) में शुक्रवार को एक बैठक के दौरान इजराइल के राजदूत डैनी डैनन और UN महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन के बीच तीखी बहस हो गई। पूरी खबर पढ़ें…

80 साल बाद पहली बार महिला बन सकती UN चीफ:रेस में अभी 8 दावेदार, इनमें 5 महिलाएं; गुयाना की बिर्केट सबसे आगे

UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। वहीं कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन दूसरे नंबर पर रहीं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगले महासचिव को चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी वोटिंग की प्रक्रिया अनौपचारिक वोटिंग में UNSC के 15 सदस्य हर उम्मीदवार के लिए अपनी राय देते हैं। इसमें तीन विकल्प होते हैं: 1. समर्थन
2. विरोध
3. कोई राय नहीं इसका मतलब यह है कि हर देश को उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में ही वोट देना जरूरी नहीं है। वह ‘कोई राय नहीं’ भी चुन सकता है। जैसे 30 जुलाई की पहली अनौपचारिक वोटिंग में रेबेका ग्रिन्सपैन को सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। उन्हें 10 देशों का समर्थन, 1 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी थी। 21 अगस्त की अनौपचारिक वोटिंग में कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। उन्हें 8 देशों का समर्थन, 3 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी। हालांकि इन वोटिंग के ये आंकड़े अंतिम चुनाव के नतीजे नहीं होते। इनका मकसद सिर्फ यह पता लगाना होता है कि कौन उम्मीदवार सबसे मजबूत स्थिति में है और किसके नाम पर UNSC में सहमति बन सकती है। विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को प्रायोरिटी मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ में शामिल रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें भारत की ओर से उम्मीदवार बनाया था। उस समय थरूर का सबसे बड़ा मजबूत पक्ष उनका लंबा संयुक्त राष्ट्र अनुभव था। वे 1978 से संयुक्त राष्ट्र में काम कर रहे थे। भारत ने उनकी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और संयुक्त राष्ट्र में लंबे अनुभव को देखते हुए उनकी उम्मीदवारी रखी थी। भारत का यह भी तर्क था कि अब महासचिव का पद एशिया को मिलना चाहिए। थरूर के समर्थन में भारत ने कई देशों से संपर्क किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दूसरे देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात कर समर्थन जुटाया। अमेरिका के विरोध की वजह से हारे थरूर 2006 में हुई अनौपचारिक वोटिंग के हर दौर में थरूर दक्षिण कोरिया के बान की-मून के बाद दूसरे नंबर पर रहे। पहली वोटिंग में बान की-मून को 12 और थरूर को 10 वोट मिले थे। थरूर के मुताबिक, इन 10 वोटों में चीन का वोट भी शामिल था। बाद की वोटिंग में चीन ने उनके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल नहीं किया। आखिरी वोटिंग में थरूर को 10 देशों का समर्थन मिला, जबकि 3 देशों ने उनके खिलाफ वोट दिया। इनमें अमेरिका भी शामिल था। अमेरिका UNSC के पांच स्थायी सदस्यों में से एक है और उसके पास वीटो पावर है। आखिरकार बान की-मून महासचिव चुने गए। थरूर ने बाद में लिखा कि उनकी उम्मीदवारी को रोकने में अमेरिका की भूमिका थी। उनके मुताबिक, अमेरिका बान की-मून के समर्थन में था और उसने दूसरे सुरक्षा परिषद सदस्यों के बीच भी उनके पक्ष में समर्थन जुटाया। थरूर के अनुसार, अमेरिका के रुख के पीछे दक्षिण कोरिया के साथ उसके रिश्ते और उस समय कोफी अन्नान के साथ अमेरिकी रिश्तों में आई खटास जैसे कारण भी थे। —————— यह खबर भी पढ़ें… UN में चीफ गुटेरेस की जगह किसे मिलेगी:आज दूसरे दौर की वोटिंग, रेस में 8 दावेदार, कोस्टा रिका की ग्रिन्सपैन सबसे आगे संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

लुधियाना में तिब्बती युवाओं का प्रदर्शन:चीन की नीतियों के खिलाफ निकाला रोष मार्च, नारेबाजी की; होजरी व्यापारियों का समर्थन मिला

लुधियाना में तिब्बती युवाओं ने चीन की कम्युनिस्ट सरकार और उसकी विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ आज शांतिपूर्ण रोष मार्च निकाला। तिब्बती युवा कांग्रेस के नेतृत्व में डिवीजन नंबर 3 से सुंदर नगर तक निकाले गए मार्च में 500 से अधिक तिब्बती नागरिकों ने हिस्सा लिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने चीन की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने चीन की तिब्बत नीति के विरोध में भी नारेबाजी की। “तिब्बत एक राष्ट्र था, तिब्बत एक राष्ट्र है और जल्द ही तिब्बत आजाद होगा” जैसे नारे लगाए गए। मार्च को लुधियाना के स्थानीय होजरी व्यापारियों का भी समर्थन मिला। यह प्रदर्शन तिब्बती युवा कांग्रेस की ओर से शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय चेन प्रोटेस्ट का हिस्सा है। संगठन के अनुसार, यह आंदोलन शहीद लोबगा रांगजेन के बलिदान की याद में किया जा रहा है। संगठन का दावा है कि उन्होंने तिब्बत की स्थिति और तिब्बती लोगों के संघर्ष की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने आत्मदाह किया था। कैंडल मार्च और रैलियां आयोजित तिब्बती युवा कांग्रेस ने कहा कि धर्मशाला से शुरू हुई यह मुहिम अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी है। इसके तहत भूख हड़ताल, कैंडल मार्च और रैलियां आयोजित की जा रही हैं। संगठन का कहना है कि चीन के खिलाफ ठोस कार्रवाई होने तक यह अभियान जारी रखा जाएगा। एथनिक यूनिटी लॉ का विरोध, UN प्रवक्ता के बयान पर भी निशाना प्रदर्शनकारियों ने 1 जुलाई को चीन की ओर से लागू किए गए कथित एथनिक यूनिटी लॉ (Ethnic Unity Law) का विरोध किया। तिब्बती युवा कांग्रेस का आरोप है कि इस कानून के जरिए तिब्बत समेत अन्य क्षेत्रों की अलग सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। संगठन ने चीन पर कॉलोनियल बोर्डिंग स्कूलों के जरिए बच्चों को उनके समुदायों से अलग करने और उनकी पहचान पर प्रभाव डालने का भी आरोप लगाया। तिब्बती युवा कांग्रेस ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक के उस कथित बयान की भी आलोचना की, जिसमें तिब्बत को चीन की अल्पसंख्यक आबादी का हिस्सा बताया गया था। संगठन ने इसे ऐतिहासिक रूप से गलत बताते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र को ऐसी भाषा से बचना चाहिए, जिसे वह चीन के कब्जे को वैध ठहराने वाला मानता है।

UN में चीफ गुटेरेस की जगह किसे मिलेगी:आज दूसरे दौर की वोटिंग, रेस में 8 दावेदार, कोस्टा रिका की ग्रिन्सपैन सबसे आगे

संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। उनके बाद अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस पद के लिए इस समय 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 मेंबर सीक्रेट वोटिंग के जरिए इन उम्मीदवारों के समर्थन का अंदाजा लगा रहे हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। आज शुक्रवार को दूसरे दौर का अनौपचारिक मतदान होगा। इसके बाद भी कई अनौपचारिक पोल हो सकते हैं, जिनमें धीरे-धीरे उम्मीदवारों की संख्या कम होगी। अक्टूबर में औपचारिक चुनाव हो सकते हैं। UN चीफ कैसे चुना जाता है? संयुक्त राष्ट्र का महासचिव सीधे जनता या सभी देशों के वोट से नहीं चुना जाता। पहले सुरक्षा परिषद उम्मीदवारों पर विचार करती है और गुप्त मतदान के जरिए यह पता लगाती है कि किस उम्मीदवार को कितना समर्थन मिल रहा है। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। किसी उम्मीदवार को आगे बढ़ने के लिए कम से कम 9 वोट मिलने जरूरी हैं। लेकिन 9 वोट हासिल करना ही काफी नहीं है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस में से किसी एक का वीटो भी उम्मीदवार के खिलाफ नहीं होना चाहिए। इसके बाद सुरक्षा परिषद जिस उम्मीदवार पर सहमत होती है, उसका नाम संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजा जाता है। महासभा की मंजूरी के बाद वह संयुक्त राष्ट्र का नया महासचिव बनता है। गुटेरेस का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए उससे पहले नए महासचिव के चयन की प्रक्रिया पूरी करने की तैयारी है। इस रेस में शामिल 8 उम्मीदवारों का बैकग्राउंड अलग-अलग है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति, वरिष्ठ राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के बड़े पदों पर काम कर चुके लोग शामिल हैं। जानते हैं कौन-कौन इस दौड़ में है और किसकी क्या दावेदारी है। 1. रेबेका ग्रिन्सपैन- कोस्टा रिका 70 साल की रेबेका ग्रिन्सपैन फिलहाल इस रेस में सबसे आगे चल रही हैं। पिछले महीने हुए पहले अनौपचारिक मतदान में उन्हें सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। ग्रिन्सपैन कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति हैं और संयुक्त राष्ट्र के व्यापार एवं विकास संगठन की प्रमुख हैं। उन्होंने महासचिव पद के लिए प्रचार करने के लिए अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों से छुट्टी ली है। अगर ग्रिन्सपैन चुनी जाती हैं तो वह संयुक्त राष्ट्र की पहली महिला और पहली यहूदी महासचिव होंगी। उनके माता-पिता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप से भागे यहूदी शरणार्थी थे। विवाद: UNDP में काम करने के दौरान महंगे निजी विमान के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे थे। दुबई से ले जाने के लिए UN का चार्टर्ड विमान इस्तेमाल किया, जिसका खर्च करीब 40 हजार डॉलर था। 2. मिशेल बाचेलेट- चिली 74 साल की मिशेल बाचेलेट चिली की समाजवादी नेता हैं। वह 2006 में चिली की पहली महिला राष्ट्रपति बनी थीं। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के रूप में काम किया। मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए बाचेलेट ने चीन के शिनजियांग में उइगर मुसलमानों की स्थिति पर रिपोर्ट जारी की थी। इसे लेकर चीन ने उनकी आलोचना की थी। बाचेलेट को मेक्सिको और ब्राजील का समर्थन मिला है। हालांकि, दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जोस एंतोनियो कास्ट के सत्ता में आने के बाद चिली ने उनका समर्थन वापस ले लिया। अमेरिका भी उनके गर्भपात के अधिकारों से जुड़े रुख को लेकर उनकी आलोचना करता रहा है। विवाद: बाचेलेट ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख रहते हुए भारत के कश्मीर और नागरिकता से जुड़े मामलों पर सवाल उठाए थे। 2019 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में संचार पर रोक और नेताओं की हिरासत पर चिंता जताई थी। भारत ने उनके बयान को गलत और अनुचित बताते हुए खारिज कर दिया था। 3. मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा- इक्वाडोर 61 साल की मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। एस्पिनोसा का कहना है कि दुनिया की साझा समस्याओं से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सबसे अहम वैश्विक मंच है। हालांकि, वह संगठन में बड़े सुधार की भी वकालत करती हैं। उनकी उम्मीदवारी को एंटीगुआ और बारबुडा का समर्थन मिला है, लेकिन उनके अपने देश इक्वाडोर ने उनका समर्थन नहीं किया है। विवाद: एस्पिनोसा के राजनीतिक करियर में विवाद भी रहे हैं। 2019 में इक्वाडोर की संसद में उन्हें पद से हटाने की कोशिश हुई थी। उन पर विदेश मंत्री रहते हुए जूलियन असांजे को नागरिकता देने और कोलंबिया सीमा पर सुरक्षा संकट से ठीक से न निपटने के आरोप लगे थे। हालांकि, उन्हें हटाने के लिए जरूरी वोट नहीं मिले और वह पद पर बनी रहीं। 4. राफेल मारियानो ग्रॉसी- अर्जेंटीना 65 साल के राफेल मारियानो ग्रॉसी अर्जेंटीना के करियर राजनयिक हैं। वह 2019 से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के (IAEA) प्रमुख हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूक्रेन के जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र को लेकर ग्रॉसी पिछले कुछ सालों से चर्चा में रहे हैं। महासचिव पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्होंने IAEA चीफ का पद नहीं छोड़ा है। उनका कहना है कि पद छोड़ना अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने जैसा होगा। ग्रॉसी चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया में होने वाले बड़े संकटों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए और संगठन में जरूरी बदलाव किए जाएं। विवाद: ईरान इन पर पक्षपात करने का आरोप लगाता रहा है। 2025 में IAEA की रिपोर्ट के बाद ईरान ने कहा था कि इससे उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला। ग्रॉसी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि रिपोर्ट जांच के आधार पर तैयार की गई थी। 5. कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट- गुयाना 52 साल की कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट गुयाना की पूर्व विदेश मंत्री हैं। वह गुयाना के आदिवासी समुदाय से आती हैं और सिर्फ 27 साल की उम्र में मंत्री बनी थीं फिलहाल वह संयुक्त राष्ट्र में अपने देश की राजदूत हैं। उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया में अपनी विश्वसनीयता फिर से स्थापित करने की जरूरत है। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं 6. इवोन ए-बाकी- इक्वाडोर 75 साल की इवोन ए-बाकी इक्वाडोर की राजनयिक और नेता हैं। वह अमेरिका में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। इस दौरान उनके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अच्छे संबंध रहे। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव टोंगा ने रखा है। खाड़ी देशों से भी उनके अच्छे रिश्ते हैं। वह कतर में इक्वाडोर की राजदूत रह चुकी हैं। विवाद: डोनाल्ड ट्रम्प से पुरानी दोस्ती है। 2004 में इक्वाडोर में मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता कराने में भी उनकी भूमिका थी, तब ट्रम्प इस प्रतियोगिता के मालिक थे। विरोधी आरोप लगाते हैं कि ट्रम्प से उनके निजी संबंधों का इस्तेमाल इक्वाडोर-अमेरिका संबंधों में कितना किया जा रहा है। 7. मैकी साल- सेनेगल 64 वर्षीय मैकी साल सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति हैं। वह अफ्रीकी संघ के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं। मैकी अपने अभियान में शांति और विकास को सबसे जरूरी मुद्दा बता रहे हैं। उनकी उम्मीदवारी का प्रस्ताव बुरुंडी ने रखा था और जुलाई में सेनेगल ने भी उनका समर्थन कर दिया। विवाद: राष्ट्रपति रहते हुए 2021 से 2024 के बीच सेनेगल में कई हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों को संभालने के उनके तरीके पर सवाल उठे थे। इस दौरान कई लोगों की मौत हुई थी। 8. ओलारा ओटुन्नु- युगांडा 75 साल के ओलारा ओटुन्नु संयुक्त राष्ट्र में युगांडा के राजदूत भी रह चुके हैं। वह कुछ समय के लिए अपने देश के विदेश मंत्री भी रहे। 2011 में उन्होंने युगांडा पीपुल्स कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था। हालांकि, वह लंबे समय से सत्ता में मौजूद राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी से चुनाव हार गए। विवाद: कोई बड़ा विवाद नहीं पहले दौर की वोटिंग में ग्रिन्सपैन को 10 वोट पहले दौर की अनौपचारिक वोटिंग यानी पहला स्ट्रॉ पोल 30 जुलाई 2026 को हुआ था। इसमें कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन सबसे आगे रहीं। तब रेस में 7 उम्मीदवार थे। इवोन ए-बाकी इस वोटिंग में शामिल नहीं थीं। वह 18 अगस्त को आठवीं उम्मीदवार बनीं।

MLA Salary: कार, बंगला और लाखों के भत्ते! जानिए किस राज्य के विधायक कमाते हैं सबसे ज्यादा पैसा

MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।

नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।

यह राज्यों का विषय है

सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।

विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।

पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।

किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?

2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।

किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?

पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।

विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?

विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।

सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
  • कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
  • सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
  • विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
  • राज्य की राजधानी में आवास
  • विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
  • टेलीफोन और संचार भत्ता
  • वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
  • कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
  • विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
  • हरियाणा में आवास और कार सुविधा
  • कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।

हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।

इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।

ओडिशा का विधायक विकास कोष

एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।

ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।

हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?

इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:

  • आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
  • उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
  • अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
  • कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।

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क्या एथेनॉल की वजह से महंगी हुई चीनी? सरकार ने गिनाई 5 वजहें और त्योहारों से पहले लिया यह बड़ा फैसला

Sugar Price Rise: देश में त्योहारों के सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतें रॉकेट हुई जा रही हैं। 20 जुलाई को चीनी का भाव 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम था जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। चीनी की कीमतों को लेकर पैनिक की स्थिति न आए, इसके लिए अब सरकार ने इसे लेकर डिटेल में जानकारी जारी की है। इसमें चीनी की बढ़ती कीमतों की असल वजहें और इसे कंट्रोल करने के उपायों के बारे में बताया गया है। आपको बता दें कि सरकार ने एक दशक के बाद पहली बार चीनी के आयात का भी फैसला लिया है, जिसे इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी रिलीज के मुताबिक सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और लोगों को उचिद दर पर चीनी उपलब्ध कराने के लिए तमाम कदम उठाए जा रहे हैं।

क्या एथेनॉल की वजह से बढ़ीं कीमतें? सरकार ने खारिज किया दावा

सरकार ने उन दावों को पूरी तरह से गलत बताया है जिनमें चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को माना जा रहा था। सरकार का दावा है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है। देश में बनाए जा रहे एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाजों, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है।

फिर चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?

सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी किसी एक वजह से नहीं हो रही है। इसके पीछे कई वजहें एक साथ जिम्मेदार हैं। सरकार ने बताया है कि शुरुआती अनुमानों की तुलना में घरेलू उत्पादन कम रहा है। त्योहारों का सीजन नजदीक आने से बाजार में मांग बढ़ी है। इसके अलावा मौसम की मार की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा है। चौथी वजह इंटरनेशनल बाजार में चीनी सप्लाई में कमी को बताया गया है। पांचवीं वजह में सरकार ने माना है कि कुछ तबकों द्वारा चीनी की जमाखोरी भी की गई है।

शुरुआती अनुमानों से कम रहा चीनी का उत्पादन

चालू पेराई सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों द्वारा शुरुआत में इसके 343 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान लगाया गया था। उत्पादन में इस गिरावट की मुख्य वजह गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का लगना और भारी बारिश से हुए जलजमाव को बताया जा रहा है। हालांकि उत्पादन अनुमान से कम रहने के बावजूद अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

दुनिया भर में बढ़ रहे हैं चीनी के दाम

चीनी की किल्लत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि फिलहाल यह एक वैश्विक समस्या है। वर्ष 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा लगभग 33 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। मौसम की विपरीत परिस्थितियों ने इसे ग्लोबली प्रभावित किया है। इंटरनेशनल बाजार में चीनी की कीमतें 30 जून को $474 प्रति टन थीं, जो 20 अगस्त 2026 तक 16% से अधिक बढ़कर $552 प्रति टन पर पहुंच गईं।

एथेनॉल प्रोग्राम से किसानों और मिलों को हुआ फायदा

भारत में आमतौर पर सालाना 320-340 लाख मीट्रिक टम चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280-290 लाख मीट्रिक के आसपास रहती है। सरप्लस उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त स्टॉक के कारण चीनी मिलों के फंड फंस जाते थे जिससे किसानों के गन्ने के भुगतान में देरी होती थी। ऐसे में एक्स्ट्रा चीनी को एथेनॉल में बदलने की पॉलिसी फायदा मिला है। इससे मिलों की फाइनेंशियल स्थिति में भी सुधार आया है। 20 अगस्त तक, 2025-26 चीनी सीजन के गन्ने के 97% बकाए का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।

इसकी वजह से मिलों की सरकारी मदद पर निर्भरता भी घटी है। 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को लगभग ₹14600 करोड़ की सब्सिडी दी गई थी जबकि 2021-22 के बाद से ऐसी किसी सब्सिडी की घोषणा नहीं की गई है। साथ ही, लंबी अवधि में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रही हैं और अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच इनमें सालाना सिर्फ 3% की ही वृद्धि हुई है।

जमाखोरी पर नकेल और त्योहारों से पहले सरकार के 5 बड़े फैसले

बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी पर रोक लगाने तथा आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। देशभर में चीनी व्यापारियों/डीलेरों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है। 1 सितंबर से बल्क कंज्यूमर्स को अपनी 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। जमाखोरी और आर्टिफिशियल किल्लत को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की संयुक्त टीमें मिलों में चीनी के स्टॉक का फिजिकल वेरिफिकेशन कर रही हैं। एहतियाती तौर पर घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति देने का फैसला लिया है।

इसके अलावा राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि इससे त्योहारों के दौरान बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी।

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Samsung Galaxy Z Fold 8 Ultra : टेक यूजर के लिए क्या खास है?

Samsung Galaxy Z Fold 8 Ultra : टेक यूजर के लिए क्या खास है?

Samsung Galaxy Z Fold 8 Ultra

Samsung ने आखिरकार अपने फोल्डेबल स्मार्टफोन में Ultra बैज पेश कर दिया है। कंपनी का नया Galaxy Z Fold 8 Ultra अब तक का सबसे ज्यादा क्षमता वाला Fold मॉडल है। डिस्प्ले, कैमरा और बैटरी के मामले में इसे पिछले सभी Fold स्मार्टफोन से आगे ले जाया गया है। हालांकि, ₹1,99,999 की शुरुआती कीमत इसे लग्जरी स्मार्टफोन कैटेगरी में खड़ा करती है। ऐसे में 2026 में बड़ा सवाल यही है कि क्या एक फोल्डेबल फोन पर इतना पैसा खर्च करना वाकई सही फैसला है?

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8-इंच का बड़ा और शानदार डिस्प्ले

Galaxy Z Fold 8 Ultra की सबसे बड़ी खूबियों में इसका 8-इंच QXGA+ Dynamic AMOLED 2X इनर डिस्प्ले शामिल है। इसके साथ 6.5-इंच का कवर डिस्प्ले मिलता है। बड़ी स्क्रीन के बावजूद फोन को खोलने पर इसकी मोटाई सिर्फ 4.1mm है और वजन 215 ग्राम है, जो Fold 7 के बराबर है। डिस्प्ले की पीक ब्राइटनेस अब 3,000 निट्स तक पहुंच गई है। इसमें एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग भी दी गई है, जिससे तेज धूप में भी स्क्रीन को देखना आसान रहता है। टेक यूजर्स के लिए यह खासतौर पर उपयोगी है, क्योंकि बड़ी इनर स्क्रीन पर वीडियो देखने, डॉक्यूमेंट पढ़ने और मल्टीटास्किंग का अनुभव बेहतर होता है।

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Snapdragon 8 Elite Gen 5 for Galaxy से लैस

 

फोन में Snapdragon 8 Elite Gen 5 for Galaxy चिपसेट दिया गया है। Samsung के मुताबिक, Fold 7 की तुलना में CPU, GPU और NPU परफॉर्मेंस में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। रोजमर्रा के इस्तेमाल में ऐप्स तेजी से खुलते हैं और हैवी गेम्स भी आसानी से चलते हैं। हालांकि, इस प्रोसेसर का सबसे बड़ा फायदा मल्टीटास्किंग में दिखाई देता है। बड़ी स्क्रीन पर दो फुल-साइज ऐप्स को एक साथ चलाया जा सकता है और दोनों के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।

 

200MP कैमरा और ज्यादा दमदार अल्ट्रा-वाइड सेंसर

 

कैमरा सेटअप में भी Samsung ने बड़ा अपग्रेड किया है। फोन के रियर पैनल पर:

 

  • 200MP प्राइमरी कैमरा
  • 50MP अल्ट्रा-वाइड कैमरा
  • 10MP टेलीफोटो कैमरा
  • 3x ऑप्टिकल जूम मिलता है।

 

खास बात यह है कि अल्ट्रा-वाइड कैमरा Fold 7 के 12MP सेंसर से सीधे 50MP पर पहुंच गया है। दिन की रोशनी में तस्वीरों में अच्छी डिटेल और आकर्षक कलर मिलते हैं। अपग्रेड किया गया अल्ट्रा-वाइड कैमरा भी पिछली Fold सीरीज की तुलना में ज्यादा बेहतर और भरोसेमंद कैमरा अनुभव देता है।

 

5,000mAh बैटरी से बढ़ी बैटरी लाइफ

 

Galaxy Z Fold 8 Ultra में अब 5,000mAh बैटरी दी गई है, जबकि Fold 7 में 4,400mAh की बैटरी थी। Samsung के अनुसार, यह फोन 27 घंटे तक वीडियो प्लेबैक दे सकता है। इसके साथ 45W वायर्ड चार्जिंग और वायरलेस चार्जिंग का सपोर्ट मिलता है। बड़ी इनर स्क्रीन का लंबे समय तक इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के लिए ज्यादा बैटरी क्षमता निश्चित तौर पर राहत दे सकती है।

 

कीमत ₹2 लाख से शुरू, S Pen की कमी खलेगी

 

Galaxy Z Fold 8 Ultra की कीमत स्टोरेज के हिसाब से ₹1,99,999 से ₹2,59,999 तक जाती है। यानी यह फोन साफ तौर पर प्रीमियम से आगे निकलकर लग्जरी स्मार्टफोन कैटेगरी में पहुंच जाता है। हालांकि, इतनी कीमत के बावजूद इसमें S Pen सपोर्ट नहीं दिया गया है। प्रोडक्टिविटी पर फोकस करने वाले फोल्डेबल फोन में यह एक बड़ी कमी मानी जा सकती है।

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क्या Fold 7 यूजर्स को अपग्रेड करना चाहिए?

अगर बजट आपके लिए बड़ी चिंता नहीं है और आपको सबसे ज्यादा क्षमता वाला Android फोल्डेबल चाहिए, तो Galaxy Z Fold 8 Ultra फिलहाल बेहद आकर्षक विकल्प है। लेकिन Fold 7 इस्तेमाल करने वालों के लिए अपग्रेड जरूरी नहीं लगता, क्योंकि बदलाव ज्यादा evolutionary हैं, revolutionary नहीं। वहीं, स्टैंडर्ड Galaxy Z Fold 8 Ultra से ₹20,000 सस्ता और हल्का है। इसलिए जो यूजर ज्यादा पोर्टेबिलिटी को प्राथमिकता देते हैं और हर स्पेसिफिकेशन में सबसे ऊपर जाने की जरूरत नहीं समझते, उनके लिए Fold 8 ज्यादा व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।

अश्विनी वैष्णव का बड़ा बयान, कहा-भारत को उत्पादन का हब बना सकती हैं एपल और गूगल

सरकार को उम्मीद है कि एपल और गूगल जैसी दुनिया की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनियां भारत को अपना बड़ा प्रोडक्शन हब बना सकती हैं। एपल आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी भारत में बनाना शुरू कर सकती है। गूगल एक्सपोर्ट्स के लिए भारत में उन प्रोडक्ट्स का उत्पादन शुरू कर सकती है, जिनका भी वह चीन में उत्पादन कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने यह उम्मीद जताई है। 21 अगस्त को मनीकंट्रोल के एक सवाल के जवाब में उन्होंने ये बातें कहीं।

एपल भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स भी बनाएगी

गूगल के अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन से हटाने की खबरों पर वैष्णव ने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि गूगल उन प्रोडक्ट्स के एक बड़े हिस्से का उत्पादन भारत में कर सकती है, जिनका वह एक्सपोर्ट करती है। उन्होंने कहा कि सरकार भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए एपल से भी बात कर रही है। उम्मीद है कि वह भारत में आईफोन के अलावा दूसरे प्रोडक्ट्स का भी उत्पादन करेगी।

गूगल ने भारत में पिक्सल स्मार्टफोन के उत्पादन के प्लान के बारे में बताया था

एपल और गूगल भारत में अपने हार्डवेयर के उत्पादन का विस्तार करना चाहती हैं। गूगल ने अक्तूबर 2023 में कहा था कि वह इंडिया में पिक्सल स्मार्टफोन की मैन्युफैक्चरिंग करेगी। उसका प्लान पिक्सल 8 से इसकी शुरुआत करने का था। इसके लिए वह पार्टनरशिप के लिए भारतीय और विदेशी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों से बातचीत कर रही थी।

डिक्सन टेक्नोलॉजीज गूगल पिक्सल की एसेंबलिंग करती है

Dixon Technologies उन कंपनियों में शामिल है, जो भारत में Google Pixel स्मार्टफोन की एसेंबलिंग करती हैं। गूगल ने 2025 में भारत में पिक्सल रेंज के स्मार्टफोन का उत्पादन बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी। उसका प्लान एक्सपोर्ट्स के लिए इंडिया में अपने स्मार्टफोन का उत्पादन करने का था।

गूगल चीन की जगह भारत में बनाएगी फोन, वॉचेज और इयरबड्स

इस हफ्ते आईं खबरों में बताया गया कि गूगल 2027 से चीन में पिक्सल फोन, वॉचेज और वायरलेस इयरबड्स का उत्पादन बंद करना चाहती है। उसका प्लान चीन की जगह इंडिया और वियतनाम में इन उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग करने का है। गूगल ने सार्वजनिक रूप से इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है।

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एपल भारत में 2017 से ही आईफोन की एसेंबलिंग कर रही है

एपल पहले से इंडिया में काफी ज्यादा उत्पादन कर रही है। उसने 2017 में भारत में अपने आईफोन की एसेंबलिंग शुरू कर दी थी। तब से उन्हें Foxconn और टाटा ग्रुप सहित कई सप्लायर्स के जरिए इंडिया में अपना प्रोडक्शन बेस बढ़ाया है। काउंटरप्वाइंट रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, 2026 में एपल के आईफोन के कुल उत्पादन में इंडिया की हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी रह सकती है। एपल ने अपने आईफोन के लिए इंडिया को एक एक्सपोर्ट बेस बनाया है।

MCX पर सोना ₹1.61 लाख के पार, चांदी ₹2.50 लाख के करीब ,जानें आगे तेजी रहेगी जारी या फिर होगा प्रॉफिट-बुकिंग का दौर शुरू

Gold Silver Price: शुक्रवार को घरेलू फ्यूचर्स मार्केट में सोने और चांदी की कीमतों में और बढ़ोतरी हुई। इसकी वजह अंतराष्ट्रीय बाज़ार में बुलियन (सोने-चांदी) की कीमतों में तेज़ उछाल थी, जो कमज़ोर अमेरिकी डॉलर, अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों और सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन) के तौर पर इनकी लगातार मांग के कारण हुआ।

एक्सचेंज की वेबसाइट पर मौजूद ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर दोपहर 4:55 बजे सोना फ्यूचर्स ₹1,61,405 प्रति 10 ग्राम और चांदी फ्यूचर्स ₹2,46,400 प्रति किलोग्राम पर ट्रेड कर रहे थे। ये कीमतें क्रमशः 5 अक्टूबर के सोने और 4 सितंबर के चांदी फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए हैं।

यह तेज़ी तब आई है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमतें लगभग तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे यह धातु लगातार तीसरे हफ़्ते बढ़त की ओर अग्रसर है। इस साल जनवरी में, भारत में सोने की कीमत ₹1.8 लाख प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी, जबकि चांदी की कीमत ₹4.25 लाख प्रति किलोग्राम तक उछल गई थी।

सोने और चांदी की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

कमज़ोर अमेरिकी डॉलर, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में उतार-चढ़ाव, सुरक्षित निवेश के तौर पर मांग और अमेरिकी मॉनेटरी पॉलिसी (मौद्रिक नीति) को लेकर उम्मीदों ने बुलियन की कीमतों को सहारा दिया है। चॉइस ब्रोकिंग की पिंकी यादव के अनुसार, COMEX पर बढ़त के अनुरूप MCX पर कीमतें ऊंचे स्तर पर खुलीं। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बायबैक और बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज ने अस्थिरता को बढ़ावा दिया।

उन्होंने यह भी बताया कि तेल की बढ़ती कीमतों (जो ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ी हैं) ने महंगाई की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जबकि डॉलर की कमज़ोरी ने कीमती धातुओं को और सहारा दिया है।

कमज़ोर डॉलर से बुलियन को सहारा

अमेरिकी डॉलर यहां एक अहम कारक रहा है। डॉलर इंडेक्स 98.8 के आसपास बना हुआ था और साप्ताहिक गिरावट की ओर बढ़ रहा था।चूंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने और चांदी की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए डॉलर के कमज़ोर होने से अन्य करेंसी रखने वाले खरीदारों के लिए ये सस्ती हो जाती हैं, जिससे मांग बढ़ सकती है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं।

रॉयटर्स के अनुसार, गोल्डसिल्वर सेंट्रल के ब्रायन लैन ने कहा कि डॉलर की कमज़ोरी ने कीमती धातुओं को व्यापक रूप से सहारा दिया है, साथ ही यील्ड में भी उल्लेखनीय बदलाव आया है।

ट्रेजरी बायबैक से अनिश्चितता

अमेरिकी ट्रेजरी डेट मैनेजमेंट (कर्ज प्रबंधन) एक और कारक है जिस पर बाज़ार की पैनी नज़र है। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया कि सरकार ट्रेजरी सिक्योरिटीज की रीपरचेज (वापसी खरीद) को और बढ़ा सकती है। उन्होंने पहले ही अगले तिमाही में लंबी अवधि के कर्ज की बायबैक को प्रति ऑपरेशन कम से कम $4 बिलियन तक दोगुना करने की योजना का संकेत दिया था।

इस कदम से बाजार में उतार-चढ़ाव आया है और यील्ड, दरों और कर्ज की व्यापक स्थिति पर नया ध्यान केंद्रित हुआ है।

OCBC के क्रिस्टोफर वोंग ने रॉयटर्स को बताया कि अब ध्यान इस बात पर होगा कि क्या यह कदम टिकाऊ है या नहीं। अमेरिकी डेटा और 27-29 अगस्त को होने वाला जैक्सन होल सिम्पोजियम डॉलर और यील्ड की दिशा तय कर सकते हैं।

फेड की दरे अहम

सोने के आउटलुक के लिए फेड की दरों की उम्मीदें अहम बनी हुई हैं। CME फेडवॉच टूल के अनुसार, बाजार में इस बात की 67% संभावना है कि फेड अगले महीने दरों को स्थिर रखेगा, जबकि दरों में बढ़ोतरी की संभावना 33% है।

चूंकि सोने पर कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं मिलता है, इसलिए ऊंची दरों के कारण ब्याज देने वाली संपत्तियों की तुलना में इसकी अपील आमतौर पर कम हो जाती है। लेकिन पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता, साथ ही यील्ड और डॉलर में बदलाव, सोने की ‘सेफ-हेवन’ (सुरक्षित निवेश) अपील को बढ़ा सकते हैं।

जियोपॉलिटिकल टेंशन से ‘सेफ-हेवन’ की मांग में बढ़त

भू-राजनीतिक जोखिम भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं। बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ईरान पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाएगा। तेल की आपूर्ति पर इसके असर की चिंता ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिससे महंगाई की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

ऐसी अनिश्चितता निवेशकों को सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों की ओर ले जाती है। यादव ने कहा कि मजबूत निवेश मांग और चीनी केंद्रीय बैंक की लगातार खरीदारी के कारण पूंजी सुरक्षित धातुओं की ओर बढ़ी है।

केंद्रीय बैंक की खरीदारी अभी भी एक अहम आधार

केंद्रीय बैंकों की लगातार मांग सोने के लिए एक बड़ा संरचनात्मक आधार बनी हुई है, क्योंकि देश अपने रिजर्व में विविधता ला रहे हैं। यादव ने जुलाई में ग्लोबल गोल्ड ETF में आए निवेश और केंद्रीय बैंकों की जारी खरीदारी की ओर भी इशारा किया, जो ज्वैलरी और रिटेल निवेश के अलावा मांग बढ़ाने वाले अन्य कारक हैं।

चांदी की कीमतों में भी तेजी

चांदी भी इस तेजी में शामिल हो गई है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्पॉट कीमतें 1.8% बढ़कर लगभग $69.31 प्रति औंस हो गई हैं। प्लैटिनम 2.6% बढ़कर $1,875.75 और पैलेडियम 1.7% बढ़कर $1,356.59 हो गया।

चांदी पर भी सोने की तरह ही कई मैक्रो-इकोनॉमिक कारकों का असर पड़ता है – जिसमें डॉलर की कमजोरी और दरों को लेकर बदलती उम्मीदें शामिल हैं – लेकिन इसकी औद्योगिक मांग के कारण इसकी कीमतों में स्वतंत्र रूप से भी बदलाव हो सकता है। हाल की तेज़ी से MCX पर चांदी की कीमत ₹2,46,400 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई है, जिससे यह ₹2.50 लाख के स्तर के बहुत करीब आ गई है।

सोने और चांदी के लिए आगे क्या होगा?

निकट भविष्य में इनकी चाल डॉलर, ट्रेजरी यील्ड, अमेरिका से आने वाले डेटा और फेड के संकेतों पर निर्भर करेगी, जिसमें जैक्सन होल पर खास नज़र रहेगी।

भारतीय निवेशकों के लिए रुपया-डॉलर का रेट भी मायने रखता है। अगर रुपया कमज़ोर होता है, तो डॉलर में कीमत वाली चीज़ें देश में महंगी हो जाती हैं, भले ही ग्लोबल कीमतें स्थिर रहें। इस तेज़ी की वजह से भारत में फिजिकल डिमांड पर कुछ असर पड़ा है, क्योंकि ऊंची कीमतों के कारण रिटेल खरीदार पीछे हट रहे हैं, जबकि चीन में डिमांड तुलनात्मक रूप से स्थिर बनी हुई है।

MCX पर सोना ₹1,61,405 प्रति 10 ग्राम और चांदी ₹2,46,400 प्रति किलोग्राम पर है। अब सवाल यह है कि क्या ये ग्लोबल हालात तेज़ी को बनाए रख पाएंगे या फिर इससे मुनाफावसूली (प्रॉफिट-बुकिंग) का नया दौर शुरू हो जाएगा।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।