Crude Oil Price: कच्चे तेल में तूफानी तेजी, ट्रंप की धमकी के बाद 7% उछलकर 90 डॉलर के पार पहुंचा भाव

Crude Oil Price: पश्चिम एशिया में हालात एक बार फिर बिगड़ते दिख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को नई सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिकी ठिकानों पर हमले जारी रहे तो अमेरिका जोरदार जवाब देगा। इसके चलते कच्चे तेल के दामों में जोरदार तेजी आई और वो 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए।

ट्रंप बोले- ईरान पर करेंगे जोरदार हमला

ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकाने को निशाना बनाने का दावा किया है। वहीं, अमेरिका और सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित गुटों पर संयुक्त हवाई हमले किए हैं। इन घटनाओं से कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है।

Fox News से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने कहा, “हम ईरान पर जोरदार हमला करेंगे।” ट्रंप ने साफ कहा कि जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमलों का जवाब सीधे ईरान को दिया जाएगा। उनके बयान से संकेत मिला है कि दोनों देशों के बीच तनाव फिर से तेजी से बढ़ सकता है।

100 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल

बुधवार को रात 8.20 बजे तक क्रूड 7.68% चढ़कर 90.54 डॉलर प्रति बैरल पर था। DBS बैंक का अनुमान है कि आने वाले दिनों में ब्रेंट क्रूड 80 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकता है। वहीं, OPEC+ भी अक्टूबर से कुछ समय के लिए उत्पादन बढ़ाने की योजना टाल सकता है।

DBS बैंक के एनर्जी रिसर्च हेड सुव्रो सरकार का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत के संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन इससे हॉर्मुज का संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगर तनाव कम भी होता है, तब भी कच्चे तेल की कीमतों के 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जाने की संभावना फिलहाल कम दिखती है।

हूती विद्रोही वसूल सकते हैं शुल्क

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यमन का हूती समूह अब दक्षिणी लाल सागर से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों से शुल्क लेने पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने हूती विद्रोहियों से सीधे बातचीत की है। मकसद यह है कि उसके तेल टैंकरों को इस रास्ते से सुरक्षित गुजरने दिया जाए।

अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में अमेरिका का कच्चे तेल का भंडार करीब 33 लाख बैरल घटा है।

OPEC+ भी ले सकता है बड़ा फैसला

रॉयटर्स के मुताबिक, OPEC+ अक्टूबर से अगले तीन महीने तक उत्पादन बढ़ाने की योजना रोक सकता है। अगर ऐसा होता है तो बाजार में सप्लाई सीमित रह सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों को और सहारा मिल सकता है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर उत्पादन में कटौती के साथ ईरान युद्ध का संकट गहराता है, तो कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं।

Waaree Energies Q1 Results: सोलर कंपनी को ₹850 करोड़ का मुनाफा, अमेरिका में मिली बड़ी राहत

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अमेरिका ने इंसानों जैसे दिखने वाले रोबोट पर रोक लगाई:देश की सुरक्षा को खतरा बताया; चीन बोला- बेवजह हमारी कंपनियों को निशाना बनाना गलत

अमेरिका ने चीन समेत दूसरे देशों से आने वाले इंसानों जैसे दिखने वाले (ह्यूमनॉइड) और चार पैरों पर चलने वाले (क्वाड्रुपेड) रोबोट के आयात पर रोक लगा दी है। अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने इस फैसले के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर सुरक्षा से जुड़े जोखिमों का हवाला दिया है। यह प्रतिबंध उन रोबोट पर लागू होगा जो अब तक अमेरिका में नहीं पहुंचे हैं। पहले से इस्तेमाल हो रहे रोबोट इस दायरे में नहीं आएंगे। इस फैसले पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने कहा कि अमेरिका बिना किसी ठोस सबूत के चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है। चीन ने चेतावनी दी कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी जवाबी कदम उठाएगा। अमेरिका बोला- अहम सप्लाई चेन को सुरक्षित करना जरूरी FCC चेयरमैन ब्रेंडन कार ने कहा कि यह फैसला अमेरिका की अहम सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए लिया गया है। उनके मुताबिक विदेशों में बने एडवांस रोबोट अमेरिकी इन्फ्रास्ट्रक्चर, डेटा और सप्लाई नेटवर्क के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का जोखिम पैदा कर सकते हैं। FCC के इस आदेश में ह्यूमनॉइड रोबोट के अलावा रोबोट डॉग और पावर इनवर्टर शामिल हैं। पावर इन्वर्टर का इस्तेमाल सोलर और दूसरी रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम, डेटा सेंटर और कई घरेलू उपकरणों में होता है। इसलिए इस फैसले का असर ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर भी पड़ सकता है। चीन ने कहा- राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बनाया जा रहा अमेरिका के इस फैसले पर चीन ने कड़ा विरोध जताया है। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा का बहाना बनाकर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है। चीन अपनी कंपनियों के कानूनी अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए जरूरी सभी कदम उठाएगा। माओ निंग ने कहा कि ऐसी रोक लगाने से अमेरिका ज्यादा मजबूत नहीं बनेगा और न ही उसकी कंपनियां दूसरे देशों की कंपनियों से बेहतर हो जाएंगी। इसका नुकसान आखिरकार अमेरिकी कंपनियों और वहां के आम लोगों को भी उठाना पड़ेगा। दुनिया के 85% ह्यूमनॉइड रोबोट चीन के हैं चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा ह्यूमनॉइड रोबोट निर्माता है। AP के मुताबिक दुनिया में तैनात करीब 85% ह्यूमनॉइड रोबोट चीन के हैं। अमेरिकी निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि 2030 तक चीन का ह्यूमनॉइड रोबोट बाजार 15 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। टेक्नोलॉजी रिसर्च फर्म ओम्डिया के मुताबिक 2025 में दुनिया भर में करीब 15 हजार ह्यूमनॉइड रोबोट भेजे गए। इनमें चीन की दो बड़ी कंपनियां ‘यूनिट्री’ और ‘एजीआईबॉट’ ने अकेले पांच-पांच हजार से ज्यादा रोबोट की सप्लाई की। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां ‘टेस्ला’ और ‘फिगर एआई’ कुछ 100 या उससे भी कम रोबोट भेज सकीं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीनी कंपनियों ने कम लागत में बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता बहुत तेजी से विकसित की है। ऐसे में अमेरिकी बाजार बंद होने से उन्हें एक बड़े खरीदार का नुकसान जरूर होगा। हालांकि, चीन अब यूरोप जैसे बाजारों पर भी तेजी से फोकस कर रहा है, ताकि अमेरिका पर निर्भरता कम हो सके। तकनीकी सहयोग पर असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रतिबंध से अमेरिकी और चीनी तकनीकी कंपनियों के बीच सहयोग प्रभावित हो सकता है। उदाहरण के लिए, एनवीडिया (Nvidia) ने जून में एक ह्यूमनॉइड रोबोट डिजाइन पेश किया था, जिसमें चीन की यूनिट्री कंपनी के चेसिस का उपयोग किया गया था। हाल ही में पेंटागन ने यूनिट्री को उन कंपनियों की सूची में शामिल किया है, जिन पर चीनी सेना की मदद करने का आरोप है, हालांकि बीजिंग ने इन दावों को खारिज किया है।

US Tariff: भारत-चीन की बढ़ी टेंशन, 100% टैरिफ की तैयारी में अमेरिका! सीनेट में आगे बढ़ा बिल, अब आगे क्या होगा?

US Tariff: रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिकी संसद के उच्च सदन (सीनेट) ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने से जुड़े एक अहम विधेयक को आगे बढ़ा दिया है। इस फैसले के साथ ही सीनेट में इस बिल पर औपचारिक बहस और अंतिम वोटिंग का रास्ता साफ हो गया है। अगर यह ब

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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को चीन से मिला ‌₹6,000 ‌करोड़ का फंड:अमेरिका विदेशी फंडिंग पर उठा सवाल, जांच शुरू करने की मांग

अमेरिका में यूनिवर्सिटीज को मिलने वाली विदेशी फंडिंग पर सवालों के बीच नया खुलासा हुआ है। इससे यूनिवर्सिटीज और ट्रम्प प्रशासन के बीच टकराव बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। शिक्षा विभाग के पोर्टल के मुताबिक, हार्वर्ड को विदेशी स्रोतों से रिकॉर्ड 43,100 करोड़ रु. मिले हैं, जो देश में सबसे ज्यादा है। इसमें से छह हजार करोड़ चीन से आए हैं। ट्रम्प प्रशासन की वीसा नीतियों और प्रवासियों पर सख्ती के बीच अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर विदेशी नागरिकों और पैसे पर अत्यधिक निर्भरता का आरोप लग रहा है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते की बात कही जा रही है। ट्रम्प प्रशासन से जांच शुरू करने की मांग उठी है। अन्य अमेरिकी यूनिवर्सिटीज भी राडार पर यह विवाद सिर्फ हार्वर्ड तक सीमित नहीं है। अमेरिका के वॉच-लिस्ट में शामिल शीर्ष पांच चीनी कंपनियों (जैसे हुआवेई और एयर चाइना) ने देश के अलग-अलग कॉलेजों को करीब 1,140 करोड़ रु. दिए हैं। इन्हें भी राडार पर लेकर जांच हो सकती है। लैब की जासूसी और सैन्य तकनीक चोरी का खतरा अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आ रहा विदेशी पैसा सिर्फ दान नहीं, बल्कि रणनीतिक घुसपैठ का जरिया बन चुका है। फंड के इस खेल से अमेरिका के सामने कई बड़े खतरे खड़े हो गए हैं। यूनिवर्सिटी लैब्स में विदेशी फंड के जरिए गोपनीय रिसर्च और डेटा चुराए जाने की आशंका जताई जा रही है। आरोप हैं कि चीनी सेना से जुड़ी संस्थाएं फंडिंग देकर अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल अपने हथियारों को तैयार करने में कर सकती हैं। हार्वर्ड और विदेशी संस्थाओं में 7,089 वित्तीय सौदे हुए हार्वर्ड ने विदेशी संस्थाओं के साथ 7,089 अलग-अलग वित्तीय सौदे किए हैं। इस रिकॉर्ड वित्तीय सौदे के कारण हार्वर्ड अमेरिका में विदेशी फंडिंग हासिल करने वाला शीर्ष संस्थान बना है। हार्वर्ड को चीनी सैन्य विकास से जुड़ी संस्थाओं से करीब 4 करोड़ रुपए और विदेशी टैलेंट प्रोग्राम से 4 करोड़ रु. मिले हैं। ट्रम्प ने कहा था- यह यूनिवर्सिटी एक मजाक है हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के निशाने पर रहती है। पिछले साल (16 अप्रैल, 205) उन्होंने एक बयान में कहा था कि यह यूनिवर्सिटी एक मजाक है और यह सिर्फ वोक कर्मचारियों की भर्ती कर रहा है। अब हार्वर्ड को दुनिया की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी या कॉलेजों की किसी भी लिस्ट में नहीं गिना जाना चाहिए। हार्वर्ड एक मजाक है जो नफरत और मूर्खता सिखाता है। इसे अब सरकारी पैसा नहीं मिलना चाहिए। ट्रम्प ने इस बयान के एक दिन पहले ही हार्वर्ड की 18 हजार करोड़ रुपए की फंडिंग रोकी थी और उसका टैक्स फ्री दर्जा खत्म करने की बात कही थी। ————-
ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की टैक्स छूट खत्म कर सकते हैं:₹18 हजार करोड़ की फंडिंग भी रोकी; ट्रम्प यूनिवर्सिटी पर कंट्रोल चाहते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को दी गई टैक्स छूट खत्म करने की बात कही। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि यूनिवर्सिटी को दी गई टैक्ट छूट पर फिर से विचार किया जा सकता है। पूरी खबर पढ़ें…

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को चीन से मिला ‌₹6,000 ‌करोड़ का फंड:अमेरिका विदेशी फंडिंग पर उठा सवाल, जांच शुरू करने की मांग

अमेरिका में यूनिवर्सिटीज को मिलने वाली विदेशी फंडिंग पर सवालों के बीच नया खुलासा हुआ है। इससे यूनिवर्सिटीज और ट्रम्प प्रशासन के बीच टकराव बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। शिक्षा विभाग के पोर्टल के मुताबिक, हार्वर्ड को विदेशी स्रोतों से रिकॉर्ड 43,100 करोड़ रु. मिले हैं, जो देश में सबसे ज्यादा है। इसमें से छह हजार करोड़ चीन से आए हैं। ट्रम्प प्रशासन की वीसा नीतियों और प्रवासियों पर सख्ती के बीच अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर विदेशी नागरिकों और पैसे पर अत्यधिक निर्भरता का आरोप लग रहा है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते की बात कही जा रही है। ट्रम्प प्रशासन से जांच शुरू करने की मांग उठी है। अन्य अमेरिकी यूनिवर्सिटीज भी राडार पर यह विवाद सिर्फ हार्वर्ड तक सीमित नहीं है। अमेरिका के वॉच-लिस्ट में शामिल शीर्ष पांच चीनी कंपनियों (जैसे हुआवेई और एयर चाइना) ने देश के अलग-अलग कॉलेजों को करीब 1,140 करोड़ रु. दिए हैं। इन्हें भी राडार पर लेकर जांच हो सकती है। लैब की जासूसी और सैन्य तकनीक चोरी का खतरा अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आ रहा विदेशी पैसा सिर्फ दान नहीं, बल्कि रणनीतिक घुसपैठ का जरिया बन चुका है। फंड के इस खेल से अमेरिका के सामने कई बड़े खतरे खड़े हो गए हैं। यूनिवर्सिटी लैब्स में विदेशी फंड के जरिए गोपनीय रिसर्च और डेटा चुराए जाने की आशंका जताई जा रही है। आरोप हैं कि चीनी सेना से जुड़ी संस्थाएं फंडिंग देकर अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल अपने हथियारों को तैयार करने में कर सकती हैं। हार्वर्ड और विदेशी संस्थाओं में 7,089 वित्तीय सौदे हुए हार्वर्ड ने विदेशी संस्थाओं के साथ 7,089 अलग-अलग वित्तीय सौदे किए हैं। इस रिकॉर्ड वित्तीय सौदे के कारण हार्वर्ड अमेरिका में विदेशी फंडिंग हासिल करने वाला शीर्ष संस्थान बना है। हार्वर्ड को चीनी सैन्य विकास से जुड़ी संस्थाओं से करीब 4 करोड़ रुपए और विदेशी टैलेंट प्रोग्राम से 4 करोड़ रु. मिले हैं। ट्रम्प ने कहा था- यह यूनिवर्सिटी एक मजाक है हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के निशाने पर रहती है। पिछले साल (16 अप्रैल, 205) उन्होंने एक बयान में कहा था कि यह यूनिवर्सिटी एक मजाक है और यह सिर्फ वोक कर्मचारियों की भर्ती कर रहा है। अब हार्वर्ड को दुनिया की सबसे बेहतर यूनिवर्सिटी या कॉलेजों की किसी भी लिस्ट में नहीं गिना जाना चाहिए। हार्वर्ड एक मजाक है जो नफरत और मूर्खता सिखाता है। इसे अब सरकारी पैसा नहीं मिलना चाहिए। ट्रम्प ने इस बयान के एक दिन पहले ही हार्वर्ड की 18 हजार करोड़ रुपए की फंडिंग रोकी थी और उसका टैक्स फ्री दर्जा खत्म करने की बात कही थी। ————-
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Sell-off in chip stocks : चिप शेयरों में उधार लेकर की गई खरीदारी दक्षिण कोरिया पर पड़ रही भारी, जानिए भारत के लिए है कितना बड़ा खतरा

Sell-off in chip stocks : अमेरिका में चिप शेयरों में बिकवाली दक्षिण कोरिया पर भारी पड़ रही है। कॉस्पी में आज करीब 11% की भारी गिरावट दिख रही है। इस बिकवाली का एक बड़ा कारण कोस्पी में बढ़ती मार्जिन पोजिशन भी है। जब बाजार में बिकवाली बढ़ती है तो मार्जिन ट्रिगर होते हैं और ब्रोकर्स सौदे काट देते हैं। मार्जिन ट्रेडिंग की समस्या सिर्फ कोस्पी की नहीं,पूरी दुनिया में है। अमेरिका,चीन के साथ साथ भारत में भी मार्जिन पोजिशन रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। ये भारत और दुनिया भर के बाजारों के लिए कितनी बड़ी चुनौती है,इस पर खास चर्चा के लिए हमारे साथ हैं स्टॉकएज (Stockedge) के को-फाउंडर विवेक बजाज। लेकिन इसके पहले जान लेते हैं कि दुनिया के बड़े बाजारों में क्या है मार्जिन पोजिशन (लेवरेज पोजिशन) की स्थिति।

रिकॉर्ड स्तर पर लेवरेज पोजिशन

अमेरिका में लेवरेज पोजिशन 1.53 लाख करोड़ डॉलर पर है। वहीं, चीन में यह 3 लाख करोड़ यूआन, दक्षिण कोरिया में 39 अरब डॉलर और भारत में 1.38 लाख करोड़ रुपए पर है। भारत में MTF पोजिशन की बात करें तो यह FY23 में 0.25 लाख करोड़ रुपए,FY24 में 0.47 लाख करोड़ रुपए, FY 25 में 0.72 लाख करोड़ रुपए। सितंबर 2025 में 1 लाख करोड़ रुपए, दिसंबर 2025 में 1.16 लाख करोड़ रुपए और जुलाई 2026 में 1.38 लाख करोड़ रुपए थी।

मार्केट कैप में MTF पोजिशन का हिस्सा

मार्केट कैप में MTF पोजिशन के हिस्से की बात करें तो चीन में यह कुल मार्केट कैप का 2.4%, अमेरिका में कुल मार्केट कैप का 2%, दक्षिण कोरिया में कुल मार्केट कैप का 0.8% और भारत में कुल मार्केट कैप का 0.34% है।

कोस्पी की गिरावट का लेवरेज कनेक्शन

27 मई को कोरिया में सिंगल स्टॉक लेवरेज ETF लॉन्च किया गया। इस ETF में सिर्फ सैमसंग और SK Hynix शामिल हैं। AI चिप रैली में रिटेल ने अंधाधुंध पैसा लगाया। इसमें कुछ ही हफ्तों में 9.48 अरब डॉलर की खरीदारी हुई। इस ETF के 92 फीसदी होल्डर रिटेल निवेशक हैं। मई के अंत तक रिटेल मार्जिन लोन 39 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

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कोस्पी: मार्जिन कॉल और फोर्स सेलिंग

कोस्पी में सैमसंग और SK Hynix की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है। सैमसंग और SK Hynix में सबसे ज्यादा लेवरेज पोजिशन है। चिप शेयरों में बिकवाली से सैमसंग और SK Hynix में तेज बिकवाली आई। एक महीने में सैमसंग 38% और SK Hynix 42% टूट गया। तेज बिकवाली से ब्रोकर्स ने मार्जिन पोजिशन काटी।

मार्जिन ट्रेडिंग भारत के लिए चुनौती?

भारत में भी मार्जिन ट्रेडिंग या MTF तेजी से बढ़ रही है। 27 जुलाई को MTF 1.38 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए। हालांकि कुल मार्केट कैप में MTF का हिस्सा 0.34% ही है।

एक्सपर्ट की राय

स्टॉकएज (Stockedge) के को-फाउंडर विवेक बजाज ने कहा कि सालों से मार्जिन ट्रेडिंग चलती आ रही है। यह अमेरिका की उपज है। अमेरिकी लीवरेज पसंद करते है। वे हर तरह के इंस्ट्रूमेंट में लीवरेज क्रिएट करते हैं। वहां पर भी यह काफी बड़ा होता जा रहा है। टिपिकली जब भी किसी एसेट में बबल बनता है तो वह पूरे बाजार में बबल बनाने में अहम भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए जैसे 2008 में रियल एस्टेट बबल बना उसमें रियल एस्टेट लीवरेज बाजार में बबल बनने का कारण बना। जब बबल फटता है तो जहां भी लीवरेज होता है वहां असर पड़ता है।

हम सभी जानते हैं कि इस समय दुनिया में एआई ड्रिवेन बबल बन चुका है। लेकिन ये कब फटेगा हमें नहीं पता है। इस नजरिए से कोस्पी इस समय बहुत बड़ा केस स्टडी बन गया है। कोरियन मार्केट अपने हाई से 33 फीसदी टूट चुका है। लेकिन लीवरेज बबल फटने पर इसमें और बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।

विवेक बजाज ने आगे कहा कि भारत में मार्जिन ट्रेडिंग या MTF 2000 शेयरों में हैं। वहीं, कोरिया में सिर्फ 20 शेयरों में भारत से कई गुना बड़ा लीवरेज्ड पोजीशन है। भारत में फ्री फ्लोट बेसिस पर MTF पोजीशन मार्केट कैप का 0.74 फीसदी है। ऐसे में भारत में मार्जिन ट्रेंडिंग का बड़ा रिस्क नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि कोरिया का बाजार एक ट्रिगर का काम करेगा। अगर वहां,लीवरेज्ड शेयरों में गिरावट आती है तो इसका असर भारत सहित पूरे ग्लोबल मार्केट पर देखने को मिलेगा। ऐसे में जहां भी लीवरेज ज्यादा होगा वहां दबाव दिखेगा।

MTF क्या है?

मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी ‘आज खरीदें,बाद में भुगतान करें’के मॉडल की तरह काम करता है। इसमें निवेशकों को ट्रेडिंग के लिए जरूरी पैसों का कुछ हिस्सा ही चुकाना पड़ता है और बाकी पैसा ब्रोकर लोन की तरह देता है। जैसे कि मान लें कि 100 रुपये के भाव वाले 1 हजार शेयरों की ट्रेडिंग करनी है तो 1 लाख रुपये की जरूरत पड़ेगी। अब या तो आप पूरे एक लाख रुपये अपने पास से लगाएं या 30 फीसदी यानी 30 हजार रुपये खुद का लगाएं और बाकी 70 फीसदी यानी 70 हजार रुपये ब्रोकर से लोन के रूप में मिल जाएगा।

मार्जिन ट्रेडिंग का फायदा ट्रेडर्स और ब्रोकर्स दोनों को मिलता है। ट्रेडर्स ज्यादा पैसा लगाने के लिए लोन ले सकते हैं और बड़ा मुनाफा कमाने की कोशिश कर सकते हैं, वहीं ब्रोकर्स दिए गए लोन पर ब्याज कमाते हैं।

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

दक्षिण कोरिया का बाजार 11% क्रैश, सिर्फ इन दो शेयरों ने निकाली कोस्पी की हवा

बीते एक महीने में कोरिया के शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आई है। बाजार के प्रमुख सूचकांक इस दौरान 28 फीसदी से ज्यादा गिरा है। 28 जुलाई को कोस्पी करीब 11 फीसदी फिसला। इसमें चिप बनाने वाली दो कंपनियों के शेयरों का बड़ा हाथ है। हालांकि, इस गिरावट के बावजूद दक्षिण कोरिया का बाजार दुनिया में बीते एक साल में सबसे ज्यादा चढ़ने वाला बाजार है।

SK Hynix का शेयर एक महीने में 41 फीसदी क्रैश

दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार बीते एक साल में करीब 88 फीसदी चढ़ा है। बीते एक महीने से दक्षिण कोरिया के बाजार पर बिकवाली का दबाव है। सबसे ज्यादा गिरावट SK Hynix और Samsung Electronics के शेयरों में दिखी है। 28 जुलाई को SK Hynix का शेयर 14 फीसदी से ज्यादा क्रैश कर गया। बीते एक महीने में यह शेयर 41 फीसदी गिरा है।

सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स का शेयर एक महीने में 32 फीसदी फिसला

Samsung Electronics का शेयर 28 जुलाई को 13.39 फीसदी क्रैश कर गया। बीते एक महीने में यह शेयर करीब 32 फीसदी गिरा है। इन दोनों शेयरों में आई गिरावट ने दक्षिण कोरिया के बाजार को आसमान से जमीन पर ला पटका है। इन दोनों शेयरों ने ही दक्षिण कोरिया के बाजार को बीते एक साल में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाला शेयर बाजार बनाया था।

एसके हायनिक्स का शेयर एक साल में 491% चढ़ा

SK Hynix और Samsung Electronics चिप बनाती हैं। बीते एक-डेढ़ साल में दुनियाभर में चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में ग्लोबल इनवेस्टर्स ने खूब दिलचस्पी दिखाई थी। इससे एस के हायनिक्स और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के शेयरों की कीमतें आसमान में पहुंच गई थी। हालिया गिरावट के बावूजद इन दोनों कंपनियों के शेयरों का रिटर्न हैरान करता है। एसके हायनिक्स का शेयर बीते एक साल में 491 फीसदी चढ़ा है। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स का शेयर इस दौरान 212 फीसदी चढ़ा है।

चीन में CXMT की जोरदार लिस्टिंग ने बढ़ाया दबाव 

कोस्पी में इन दोनों कंपनियों का वेटेज करीब 60 फीसदी है। अब चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी घट रही है। इसका असर एसके हायनिक्स और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के शेयरों पर दिख रहा है। उधर, चीन से आने वाली खबरों ने इन दोनों शेयरों पर दबाव और बढ़ा दिया है। चीन की ChangXin Memory Technologies (CXMT) के शेयर की लिस्टिंग धमाकेदार रही।

चीन की चिप बनाने की क्षमता बढ़ने से बढ़ा डर

CXMT का शेयर पहले ही दिन अपने इश्यू प्राइस से 466 फीसदी चढ़ गया। दूसरा, खबर है कि चीन की एक सरकारी कंपनी ने इमर्सन DUV लिथोग्राफी इक्विपमेंट का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया है। इससे माना जा रहा है कि चीन की चिप बनाने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर दक्षिण कोरिया में चिप बनाने वाली कंपनियों पर पड़ेगा। इस वजह से एसके हायनिक्स और सैमसंग इलेक्ट्रिॉनिक्स के शेयरों में बड़ी बिकवाली दिख रही है।

OnePlus N6x की लॉन्च डेट कन्फर्म! 7000mAh बैटरी और 50MP कैमरा के साथ करेगा एंट्री, जानें कीमत और फीचर्स

OnePlus N6x: इस महीने की शुरुआत में OnePlus N6 लॉन्च करने के बाद, OnePlus अब ज्यादा किफायती OnePlus N6x को लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। यह हैंडसेट पहले ही ऑफिशियल टीजर में दिखाई देने लगा है, जिसमें चीनी स्मार्टफोन मेकर ने इसकी लॉन्च डेट, कलर ऑप्शन और कुछ खास फीचर्स की पुष्टि की है। आने वाले OnePlus N6x के बारे में अनुमानित कीमत, स्पेसिफिकेशन्स और उपलब्धता जानने के लिए आगे पढ़ें।

OnePlus N6x स्पेसिफिकेशन्स और फीचर्स (अनुमानित)

ऑफिशियल टीजर से पता चलता है कि OnePlus N6x में पिल-शेप वाले कैमरा मॉड्यूल के साथ एक फ्लैट रियर पैनल होगा, जो हाल ही में आए Nord-सीरीज के स्मार्टफोन के डिजाइन जैसा ही है। इस हैंडसेट में 3.5mm हेडफोन जैक भी होगा, जबकि पावर और वॉल्यूम बटन दाईं ओर दिए गए हैं।

इस स्मार्टफोन में 120Hz रिफ्रेश रेट वाला 6.67-इंच का HD+ LCD डिस्प्ले होने की उम्मीद है। लीक्स के अनुसार, चीनी टेक कंपनी इस डिवाइस में MediaTek Dimensity 6000-सीरीज का चिपसेट और Android 16 पर आधारित OxygenOS 16 दे सकती है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक प्रोसेसर के बारे में आधिकारिक तौर पर जानकारी नहीं दी है।

कैमरे की बात करें तो, OnePlus N6x में 50MP का रियर कैमरा मिलने की उम्मीद है। जबकि, सेल्फी और वीडियो कॉल के लिए 8MP का फ्रंट कैमरा दिया जा सकता है।

बता दें कि OnePlus ने पहले ही कन्फर्म कर दिया है कि हैंडसेट में 7000mAh की बैटरी मिलेगी और दावा किया है कि यह एक बार चार्ज करने पर 2.5 दिन तक चल सकती है। कंपनी के अनुसार, यह बैटरी 20.56 घंटे का वीडियो प्लेबैक, 133.56 घंटे का म्यूजिक प्लेबैक, 25.04 घंटे का सोशल मीडिया इस्तेमाल या 11.26 घंटे की वीडियो रिकॉर्डिंग दे सकती है।

OnePlus N6x की लॉन्च डेट, अनुमानित कीमत और उपलब्धता

चीन की टेक कंपनी ने कन्फर्म किया है कि OnePlus N6x भारत में 31 जुलाई को दोपहर 12 बजे (IST) लॉन्च होगा। लॉन्च होने के बाद, यह हैंडसेट Amazon India और OnePlus India के ऑनलाइन स्टोर पर उपलब्ध होगा। खरीदने के इच्छुक लोगों को दो कलर ऑप्शन भी मिलेंगे: बरगंडी रेड और आइस ब्लू।

हालांकि, कीमत के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक OnePlus N6x की कीमत लगभग 20,000 रुपये हो सकती है, जिससे यह OnePlus N6 के मुकाबले सस्ता होगा। तुलना के लिए, N6 को भारत में 4GB + 128GB वेरिएंट के लिए 22,999 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया गया था, जबकि 6GB + 128GB मॉडल को 24,999 रुपये में लॉन्च किया गया था।

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EXPLAINER: गलवान के 6 साल बाद फिर खुलेगा नाथू ला दर्रा, भारत-चीन की कूटनीति में क्यों बेहद खास है ‘सिल्क रूट’ की यह खिड़की?

India China Nathu La Trade Explainer: भारत और चीन के रिश्तों का मिजाज समझना हो, तो हिमालय की 14,000 फीट की ऊंचाई पर जमे बर्फ से ढके नाथू ला दर्रे की ओर रुख करना काफी होगा। गलवान घाटी के खूनी संघर्ष और कोविड-19 की मार के चलते पिछले 6 वर्षों से ठप पड़ा सीमा व्यापार 1 अगस्त 2026 से एक बार फिर पटरी पर लौटने जा रहा है।

अगस्त 2025 में दोनों देशों के बीच सिक्किम के नाथू ला, हिमाचल के शिपकी ला और उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से व्यापार बहाली पर सहमति बनी थी। उसी कड़ी में अब नाथू ला के कपाट भी फिर से खोले जा रहे हैं।

सालाना कई अरब डॉलर के भारत-चीन व्यापार के समुद्री कारोबार के आगे नाथू ला से होने वाली खरीद-फरोख्त भले ही ऊंट के मुंह में जीरा लगे, लेकिन भू-राजनीतिक बिसात पर इसका रणनीतिक और कूटनीतिक वजन कहीं ज्यादा है। आइए आपको बताते हैं कि आखिर क्यों नाथू ला सिर्फ एक ट्रेड रूट नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों का असली थर्मामीटर है?

जब डाक के थैलों से बची रही रिश्तों की सांस

ऐतिहासिक सिल्क रूट की एक अहम कड़ी रहा नाथू ला प्राचीन काल से ही तिब्बत की चुम्बी घाटी को सिक्किम के गंगटोक, कालिम्पोंग और कोलकाता के बंदरगाहों से जोड़ता आया है। 20वीं सदी की शुरुआत में भारत-चीन के कुल जमीनी व्यापार का करीब 80 फीसदी हिस्सा इसी दर्रे के जरिए गुजरता था। 1962 के युद्ध ने इस सदियों पुरानी व्यापारिक डोर को एक झटके में काट दिया और नाथू ला अगले 44 सालों के लिए पूरी तरह सील हो गया।

वैसे युद्ध के बाद भले ही व्यापार और बंदूकें खामोश हो गईं, पर कूटनीतिक धागा नहीं टूटा। हर गुरुवार की सुबह 14,000 फीट की बर्फीली हवाओं के बीच एक भारतीय डाकिया कटीले तारों तक जाता और चीनी डाकिये से डाक का थैला बदलता। बिना एक-दूसरे की बोली समझे, महज 3 मिनट में अंजाम दी जाने वाली यह मूक रस्म दशकों तक दोनों देशों के बीच संपर्क का अकेला जीवित जरिया बनी रही।

2006 का री-ओपनिंग मॉडल: नई सदी में पुराने जमाने का सौदा

साल 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक बीजिंग यात्रा के बाद बनी सहमति के आधार पर 6 जुलाई 2006 को नाथू ला को व्यापार के लिए दोबारा खोला गया। उसकी तस्वीरें भले ही भव्य थीं, लेकिन जिस व्यापार की इजाजत दी गई, वह गुजरे जमाने की याद दिलाता था:

चीन की ओर से भारत आने वाली चीजें (15 प्रोडक्ट्स): याक की पूंछ, बकरी-भेड़ की खाल, कच्चा रेशम, ऊन, बोरेक्स, नमक और घोड़े।

भारत से जाने वाला सामान (29 प्रोडक्ट्स): चावल, आटा, चाय, तंबाकू, कंबल और तांबे के बर्तन।

दौर बदल चुका था, लेकिन सामान की लिस्ट 19वीं सदी वाली ही रही। नतीजतन, नाथू ला कभी कोई बड़ा आर्थिक कॉरिडोर नहीं बन सका और सीमित दायरे में ही सिमटकर रह गया।

अरबों डॉलर के कारोबार के आगे कितना बड़ा है नाथू ला?

अगर आप आंकड़ों के चश्मे से देखेंगे, तो नाथू ला का व्यापार दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए शून्य नजर आएगा:

2016 (पीक टाइम): कुल व्यापार रिकॉर्ड ₹82.68 करोड़ तक पहुंचा।

2017 (डोकलाम विवाद): तनातनी का असर सीधा दिखा और व्यापार सिमटकर महज ₹8.86 करोड़ रह गया।

2019 (आखिरी सीजन): महामारी से ठीक पहले यहां ₹43.51 करोड़ की आवाजाही दर्ज हुई।

व्यापारिक घाटे की कड़वी हकीकत

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन के साथ कुल माल व्यापार $151.1 अरब रहा, जिसमें भारत का व्यापार घाटा $100 अरब के पार चला गया। ऐसे में नाथू ला के कुछ करोड़ का कारोबार इस विशाल खाई को नहीं पाट सकता। हां, सिक्किम के उन 600 से अधिक स्थानीय लाइसेंसधारी व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों के लिए यह रोजी-रोटी का मुख्य जरिया जरूर है, जिनका सामान 2020 में अचानक सीमा बंद होने से वहीं फंसा रह गया था।

बॉडर ट्रेड से परे क्यों यह ‘डिप्लोमैटिक इंडिकेटर’ है?

कूटनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नाथू ला में माल का आना-जाना उतना मायने नहीं रखता, जितना कि गेट का खुलना और बंद होना। नाथू ला का हालिया इतिहास बताता है कि जब-जब दिल्ली और बीजिंग की दूरी घटी है, यह गेट खुला है और जब भी सरहद पर गोलियों या डंडों की गूंज हुई, ताला सबसे पहले इसी दरवाजे पर लगा।

2020 के गलवान हादसे के बाद रिश्ते सबसे गहरे अविश्वास के दौर में पहुंच गए थे। अब सीधी उड़ानों, वीजा, मानसरोवर यात्रा और नाथू ला व्यापार की एक साथ बहाली इस बात का साफ इशारा है कि दोनों मुल्क अब तनाव को नियंत्रण में रखकर रिश्तों को ‘न्यू नॉर्मल’ की तरफ ले जाना चाहते हैं।

1 अगस्त से नाथू ला का खुल जाना न तो रातों-रात सीमा विवाद सुलझाएगा और न ही चीनी सामान की निर्भरता को खत्म करेगा। लेकिन, वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में यह बहाली दर्शाती है कि दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी संवाद और सह अस्तित्व की टेबल पर बने रहने के इच्छुक हैं। इस बर्फीले दर्रे पर व्यापार की आहट, कूटनीति के मोर्चे पर एक पॉजिटिव संकेत है।

Kospi Crashed: दो स्टॉक्स ने 10% तोड़ दिया कोस्पी, 20 मिनट थम गई ट्रे़डिंग, तीन वजहों से दक्षिण कोरियाई मार्केट में हाहाकार

Kospi Crashed: चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में वैश्विक बिकवाली ने दक्षिण कोरियाई बाजार में कोहराम मचा दिया। टेक स्टॉक्स पर दबाव में दक्षिण कोरिया का बेंचमार्क कोस्पी (Kospi) इंडेक्स 724.37 प्वाइंट्स यानी 10.73% टूटकर 6,031.38 पर आ गया जिसके कारण 20 मिनट के लिए ट्रेडिंग भी थम गई। निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली ने सिर्फ दक्षिण कोरियाई बाजार को ही नहीं बल्कि जापान की चिप हैवी निक्केई 225 और ताइवान के Taiex को भी 4% से अधिक तोड़ दिया।

Kospi Crash: ये है वजहें

वैल्यूएशन से जुड़ी चिंताएं

एआई पर खर्च लगातार बना रहेगा या नहीं, इसे लेकर चिंता ने वैश्विक चिप कंपनियों के शेयरों पर दबाव डाला और बिकवाली की आंधी चलने लगी। दिग्गज चिप कंपनी एनवीडिया कॉर्प (Nvidia Corp) के $75 हजार करोड़ के एआई इंफ्रा डील के बाद भी शेयरों में गिरावट ने चिंता बढ़ाई जिसने बिकवाली तेज की। यूनियन बैंकेयर प्रिवी के एमडी Vey-Sern Ling का कहना है कि एआई से जुड़े शेयरों को लेकर लालच अब डर में बदल गया है और किसी भी खबर के असर को देखने की बजाय उसे शेयर बेचने के लिए इस्तेमाल कर रहे।

चीन से तगड़ा कॉम्पटीशन

निवेशक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या एआई निवेश की जबरदस्त लहर और कंपनियों की ऊंची वैल्यूएशन लंबे समय तक बनी रह सकती है, खासकर इसलिए क्योंकि चीन की कंपनियां उम्मीद से अधिक रफ्तार से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। एएसएमएल होल्डिंग एनवी के शेयरों में जून महीने की शुरुआत के बाद से सबसे बड़ी गिरावट आई। इसमें यह गिरावट एक रिपोर्ट के बाद आई जिसमें ये है कि चीन की सरकारी कंपनी ने कुछ खास चिप बनाने वाली मशीनों का बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन शुरू कर दिया है, जिससे डच कंपनी की बिक्री पर असर पड़ सकता है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक के मुताबिक शंघाई की एक कंपनी ने इमर्शन डीप अल्ट्रावायलेट (DUV) लिथोग्राफी टूल्स बनाना शुरू कर दिया है। इसने दुनिया भर की चिप कंपनियों के शेयरों को तोड़ दिया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में चैंगजिन मेमोरी टेक्नोलॉजीज (ChangXin Memory Technologies- CXMT) की मार्केट में धांसू एंट् ने मार्केट सेंटीमेंट को और कमजोर किया है।

बड़ी टेक कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली

दक्षिण कोरिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के शेयरों में बिकवाली दक्षिण कोरिया के बेंचमार्क इंडेक्स को तोड़ दिया। मेमोरी-चिप बनाने वाली कंपनियों सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (Samsung Electronics) और एसके हीनिक्स (SK Hynix) के शेयर धड़ाम हो गए। इसमें से एसके हीनिक्स के शेयरों में न्यूयॉर्क में इसके ADR (अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स) के टूटकर शुरुआती यूएस ऑफरिंग प्राइस से नीचे रिकॉर्ड निचले स्तर पर आने के चलते 10% की गिरावट आई। वहीं सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के शेयर 9.15% फिसल गए। इन दोनों की कोस्पी में हिस्सेदारी आधे से अधिक है, जिससे इस सेक्टर की बिकवाली की आंच पूरे मार्केट पर और भी अधिक दिखा।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।