Crude Oil Price: कच्चे तेल में तूफानी तेजी, ट्रंप की धमकी के बाद 7% उछलकर 90 डॉलर के पार पहुंचा भाव

Crude Oil Price: पश्चिम एशिया में हालात एक बार फिर बिगड़ते दिख रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को नई सैन्य कार्रवाई की खुली चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिकी ठिकानों पर हमले जारी रहे तो अमेरिका जोरदार जवाब देगा। इसके चलते कच्चे तेल के दामों में जोरदार तेजी आई और वो 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए।

ट्रंप बोले- ईरान पर करेंगे जोरदार हमला

ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकाने को निशाना बनाने का दावा किया है। वहीं, अमेरिका और सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित गुटों पर संयुक्त हवाई हमले किए हैं। इन घटनाओं से कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है।

Fox News से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने कहा, “हम ईरान पर जोरदार हमला करेंगे।” ट्रंप ने साफ कहा कि जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमलों का जवाब सीधे ईरान को दिया जाएगा। उनके बयान से संकेत मिला है कि दोनों देशों के बीच तनाव फिर से तेजी से बढ़ सकता है।

100 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल

बुधवार को रात 8.20 बजे तक क्रूड 7.68% चढ़कर 90.54 डॉलर प्रति बैरल पर था। DBS बैंक का अनुमान है कि आने वाले दिनों में ब्रेंट क्रूड 80 से 100 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकता है। वहीं, OPEC+ भी अक्टूबर से कुछ समय के लिए उत्पादन बढ़ाने की योजना टाल सकता है।

DBS बैंक के एनर्जी रिसर्च हेड सुव्रो सरकार का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत के संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन इससे हॉर्मुज का संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगर तनाव कम भी होता है, तब भी कच्चे तेल की कीमतों के 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जाने की संभावना फिलहाल कम दिखती है।

हूती विद्रोही वसूल सकते हैं शुल्क

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यमन का हूती समूह अब दक्षिणी लाल सागर से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों से शुल्क लेने पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने हूती विद्रोहियों से सीधे बातचीत की है। मकसद यह है कि उसके तेल टैंकरों को इस रास्ते से सुरक्षित गुजरने दिया जाए।

अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, 24 जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में अमेरिका का कच्चे तेल का भंडार करीब 33 लाख बैरल घटा है।

OPEC+ भी ले सकता है बड़ा फैसला

रॉयटर्स के मुताबिक, OPEC+ अक्टूबर से अगले तीन महीने तक उत्पादन बढ़ाने की योजना रोक सकता है। अगर ऐसा होता है तो बाजार में सप्लाई सीमित रह सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों को और सहारा मिल सकता है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर उत्पादन में कटौती के साथ ईरान युद्ध का संकट गहराता है, तो कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं।

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सऊदी अरब ने सस्ता किया तेल, 26 साल में सबसे बड़ी कटौती; जानिए क्या है वजह

सऊदी अरब ने एशियाई ग्राहकों के लिए बड़ा दांव खेला है। सरकारी तेल कंपनी Saudi Aramco ने अगस्त के लिए अपने सबसे ज्यादा बिकने वाले Arab Light Crude की कीमत में 11 डॉलर प्रति बैरल की कटौती कर दी है। यह कम से कम 26 साल में सबसे बड़ी कटौती मानी जा रही है।

अब कंपनी एशिया के ग्राहकों को Arab Light क्षेत्रीय बेंचमार्क के मुकाबले 1.50 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर बेचेगी। दिलचस्प बात यह है कि Bloomberg के सर्वे में एनालिस्टों ने औसतन 8 डॉलर प्रति बैरल की कटौती का अनुमान लगाया था। लेकिन Saudi Aramco ने उससे भी बड़ी कटौती कर दी।

आखिर कीमत घटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

इसकी सबसे बड़ी वजह है कच्चे तेल की बढ़ती सप्लाई। जून के बीच से ही तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है। इस दौरान अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम हुआ। इसके बाद Strait of Hormuz से जहाजों की आवाजाही फिर सामान्य होने लगी।

जब तेल की सप्लाई आसान हुई, तो बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ गया। इसी का असर Brent Crude पर भी दिखा। इसकी कीमत गिरकर करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। यानी लगभग वहीं, जहां यह फरवरी के आखिर में थी।

मिडिल ईस्ट से तेजी से बढ़ रही है सप्लाई

मध्य पूर्व से अब पहले के मुकाबले ज्यादा तेल बाजार में आ रहा है। युद्ध के दौरान Saudi Aramco ने फारस की खाड़ी के Ras Tanura बंदरगाह से निर्यात कम कर दिया था। उस समय कंपनी ने ज्यादातर तेल Yanbu बंदरगाह के जरिए भेजा था, क्योंकि Strait of Hormuz में आवाजाही बुरी तरह प्रभावित थी।

अब हालात बदल चुके हैं। समुद्री यातायात फिर सामान्य हो रहा है। ऐसे में Aramco ने Ras Tanura से भी निर्यात बढ़ा दिया है। एक समय यह युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर के करीब 90% तक पहुंच गया।

OPEC+ ने भी बढ़ाया उत्पादन

तेल बाजार पर दबाव बढ़ने की एक और वजह OPEC+ का फैसला है। इस समूह की अगुवाई सऊदी अरब और रूस कर रहे हैं। OPEC+ ने अगस्त के लिए एक बार फिर उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है।

युद्ध के दौरान कई खाड़ी देशों के लिए उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं था, क्योंकि Hormuz के रास्ते तेल भेजने में दिक्कत थी। अब समुद्री रास्ता सामान्य हो रहा है। ऐसे में सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश अपने बढ़े हुए उत्पादन कोटे का पूरा फायदा उठा सकेंगे।

एनालिस्टों का मानना है कि OPEC+ के इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि फिलहाल संगठन अपने सदस्य देशों को ज्यादा तेल निकालने से नहीं रोकना चाहता। अगर सप्लाई इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

Crude Oil Price: 60 डॉलर से नीचे जा सकता है कच्चा तेल! एक्सपर्ट बोले- चीन बदलेगा पूरा खेल

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Crude Oil Price: 60 डॉलर से नीचे जा सकता है कच्चा तेल! एक्सपर्ट बोले- चीन बदलेगा पूरा खेल

Crude Oil Price: कच्चे तेल की कीमतों में इस साल बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। Crystol Energy के ग्लोबल एडवाइजर Christof Ruehl का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो कच्चे तेल का भाव 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकता है। फिलहाल, कच्चा तेल 72 डॉलर के आसपास बना हुआ है।

हालांकि, इसमें सबसे बड़ा रोल चीन का होगा। अगर चीन अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) को भरने में देरी करता है, तो कीमतों पर और दबाव आ सकता है।

सप्लाई ज्यादा होगी, मांग घटेगी

Christof Ruehl का कहना है कि आने वाले महीनों में तेल का उत्पादन खपत से ज्यादा रह सकता है। उनके मुताबिक, Strait of Hormuz से जहाजों की आवाजाही अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। हाल के भू-राजनीतिक तनाव भी कम हुए हैं। इसका मतलब है कि बाजार में तेल की सप्लाई पहले के मुकाबले आसान होगी।

उनका मानना है कि साल की दूसरी छमाही में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक चीन तय करेगा। सवाल सिर्फ इतना है कि चीन तेल कब खरीदता है और कितनी मात्रा में खरीदता है।

60 डॉलर से नीचे क्यों जा सकता है तेल?

Christof Ruehl का कहना है कि अगर चीन सस्ती कीमत का इंतजार करता है और खरीदारी टाल देता है, तो कच्चे तेल का भाव कुछ समय के लिए 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकता है।

हालांकि, उन्हें यह भी लगता है कि 60 डॉलर के नीचे जाते ही चीन अपने रणनीतिक भंडार को भरने के लिए बड़ी खरीदारी शुरू कर सकता है। ऐसा हुआ, तो कीमतों को सहारा मिल सकता है।

OPEC+ भी बढ़ा रहा है उत्पादन

तेल की सप्लाई बढ़ने की एक और वजह OPEC+ है। Ruehl का कहना है कि OPEC+ देशों ने हाल ही में उत्पादन बढ़ाया है। इसके अलावा UAE, रूस, इराक और ईरान जैसे देश भी ज्यादा तेल निकाल रहे हैं।

यानी बाजार में तेल की कमी नहीं दिख रही। सप्लाई लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

OPEC के सामने भी मुश्किल

Christof Ruehl का मानना है कि आने वाले वर्षों में OPEC के सामने बड़ी चुनौती आ सकती है। अगर दुनिया में तेल की मांग अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचकर घटने लगती है, तो तेल उत्पादक देशों के बीच बाजार हिस्सेदारी की लड़ाई और तेज हो जाएगी।

उनका कहना है कि अगर भविष्य में 2025 को ‘पीक ऑयल डिमांड’ का साल माना गया, तो यह पूरी ऑयल इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में और देश UAE की तरह OPEC छोड़ने का फैसला करते हैं, तो बाकी सदस्य देशों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव और बढ़ जाएगा।

अभी सबसे बड़ा फैक्टर क्या है?

Christof Ruehl का मानना है कि फिलहाल तेल की कीमतों के लिए सबसे बड़ा जोखिम गिरावट का है। बशर्ते कोई नया बड़ा भू-राजनीतिक संकट न खड़ा हो।

हालांकि, उनके मुताबिक 60 डॉलर प्रति बैरल का स्तर काफी अहम है। अगर कीमतें इससे नीचे जाती हैं, तो चीन बड़ी खरीदारी करके बाजार को सहारा दे सकता है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में पूरी दुनिया की नजर चीन की खरीदारी पर रहेगी।

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