Crude Oil Price: 60 डॉलर से नीचे जा सकता है कच्चा तेल! एक्सपर्ट बोले- चीन बदलेगा पूरा खेल

Crude Oil Price: कच्चे तेल की कीमतों में इस साल बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। Crystol Energy के ग्लोबल एडवाइजर Christof Ruehl का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो कच्चे तेल का भाव 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकता है। फिलहाल, कच्चा तेल 72 डॉलर के आसपास बना हुआ है।

हालांकि, इसमें सबसे बड़ा रोल चीन का होगा। अगर चीन अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) को भरने में देरी करता है, तो कीमतों पर और दबाव आ सकता है।

सप्लाई ज्यादा होगी, मांग घटेगी

Christof Ruehl का कहना है कि आने वाले महीनों में तेल का उत्पादन खपत से ज्यादा रह सकता है। उनके मुताबिक, Strait of Hormuz से जहाजों की आवाजाही अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। हाल के भू-राजनीतिक तनाव भी कम हुए हैं। इसका मतलब है कि बाजार में तेल की सप्लाई पहले के मुकाबले आसान होगी।

उनका मानना है कि साल की दूसरी छमाही में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक चीन तय करेगा। सवाल सिर्फ इतना है कि चीन तेल कब खरीदता है और कितनी मात्रा में खरीदता है।

60 डॉलर से नीचे क्यों जा सकता है तेल?

Christof Ruehl का कहना है कि अगर चीन सस्ती कीमत का इंतजार करता है और खरीदारी टाल देता है, तो कच्चे तेल का भाव कुछ समय के लिए 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकता है।

हालांकि, उन्हें यह भी लगता है कि 60 डॉलर के नीचे जाते ही चीन अपने रणनीतिक भंडार को भरने के लिए बड़ी खरीदारी शुरू कर सकता है। ऐसा हुआ, तो कीमतों को सहारा मिल सकता है।

OPEC+ भी बढ़ा रहा है उत्पादन

तेल की सप्लाई बढ़ने की एक और वजह OPEC+ है। Ruehl का कहना है कि OPEC+ देशों ने हाल ही में उत्पादन बढ़ाया है। इसके अलावा UAE, रूस, इराक और ईरान जैसे देश भी ज्यादा तेल निकाल रहे हैं।

यानी बाजार में तेल की कमी नहीं दिख रही। सप्लाई लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

OPEC के सामने भी मुश्किल

Christof Ruehl का मानना है कि आने वाले वर्षों में OPEC के सामने बड़ी चुनौती आ सकती है। अगर दुनिया में तेल की मांग अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचकर घटने लगती है, तो तेल उत्पादक देशों के बीच बाजार हिस्सेदारी की लड़ाई और तेज हो जाएगी।

उनका कहना है कि अगर भविष्य में 2025 को ‘पीक ऑयल डिमांड’ का साल माना गया, तो यह पूरी ऑयल इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में और देश UAE की तरह OPEC छोड़ने का फैसला करते हैं, तो बाकी सदस्य देशों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव और बढ़ जाएगा।

अभी सबसे बड़ा फैक्टर क्या है?

Christof Ruehl का मानना है कि फिलहाल तेल की कीमतों के लिए सबसे बड़ा जोखिम गिरावट का है। बशर्ते कोई नया बड़ा भू-राजनीतिक संकट न खड़ा हो।

हालांकि, उनके मुताबिक 60 डॉलर प्रति बैरल का स्तर काफी अहम है। अगर कीमतें इससे नीचे जाती हैं, तो चीन बड़ी खरीदारी करके बाजार को सहारा दे सकता है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में पूरी दुनिया की नजर चीन की खरीदारी पर रहेगी।

Tata Motors PV Q1 Update: तीन गुना बढ़ी Curvv, Sierra की बिक्री; पंच, नेक्सॉन ने भी दिखाया दम

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

क्रू़ड ऑयल की कीमतें 60 डॉलर से नीचे जा सकती हैं, डिमांड के मुकाबले ज्यादा सप्लाई का असर कीमतों पर पड़ेगा

क्रूड ऑयल की कीमतें गिरकर 60 डॉलर से नीचे जा सकती हैं। इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा। क्रिस्टल एनर्जी में ग्लोबल एडवाइजर क्रिस्टॉफ रुएल ने यह अनुमान जताया है। उनका कहना है कि क्रूड की ग्लोबल सप्लाई डिमांड के मुकाबले रोजाना 10 लाख बैरल ज्यादा है। इस साल फरवरी के आखिर में मध्यपूर्व में तनाव बढ़ने पर क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान में पहुंच गई थी। अमेरिका-ईरान में डील होने से अब कीमतें नीचे आ रही हैं।

एनर्जी ट्रेड फ्लो सामान्य होने से बढ़ेगी सप्लाई

क्रिस्टॉफ रुएल ने कहा कि अमेरिका-ईरान में डील और एनर्जी ट्रेड फ्लो के सामान्य होने से सप्लाई बढ़ेगी। उधर, क्रूड की सुस्त डिमांड ग्रोथ का असर मीडियम टर्म में इसकी कीमतों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि अमेरिका-ईरान में समझौता हो गया है। हालांकि, कुछ शर्तों को लेकर अब भी बातचीत जारी है। लेकिन, एक हफ्ते पहले के मुकाबले हालात बेहतर लगते हैं।”

ऑयल मार्केट ने नई स्थितियों से बैठाया है तालमेल

उन्होंने कहा कि मध्यपूर्व में टेंशन की वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद मार्केट के बदली हुई स्थितियों के साथ जल्द तालमेल बैठाया। तेल उत्पादक देशों ने सप्लाई के लिए पाइपलाइन का ज्यादा इस्तेमाल किया और इसके दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल किया। रिफाइनरियों ने भी सप्लाई बनाए रखने के लिए ऑपरेशन में बदलाव किए। इससे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में मजबूती देखने को मिली।

बीते पांच दशकों में काफी बदली है ऑयल इंडस्ट्री

हालिया संकट पर ऑयल मार्केट की प्रतिक्रिया से यह पता चला कि बीते पांच दशकों में यह इंडस्ट्री कितनी बदल चुकी है। ग्लोबल इकोनॉमी को अब उत्पादन के लिए कम ऑयल की जरूरत है। इससे पहले की क्राइसिस के मुकाबले सप्लाई को लेकर कम झटका लगा। दुनियाभर में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स का बढ़ता इस्तेमाल ऑयल की कम खपत वाली गाड़ियों के आने का असर भी ऑयल की डिमांड पर पड़ा है।

चीन के स्ट्रेटेजिक रिजर्व बनाने से कीमतों को मिलेगा सपोर्ट

ऑयल मार्केट्स के लिए चीन काफी अहम है। कीमतों में गिरावट आने पर चीन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बना रहा है। इससे डिमांड को कुछ सपोर्ट मिल सकता है। हालांकि, ऑयल का बढ़ता उत्पादन, स्ट्रॉन्ग एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और सुस्त कंजम्प्शन ग्रोथ से मीडियम टर्म में क्रूड की कीमतों का आउटलुक कमजोर दिखता है। क्रूड की कीमतों में भारत जैसे देश के लिए अच्छी खबर है। भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी ऑयल इंपोर्ट से पूरी करता है।