सपा-कांग्रेस की मुस्लिम वोट की खींचतान

वैसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानो के मन में कोई भ्रम नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सपा ही इस बार भाजपा से लड़ने वाली मुख्य ताकत है। पिछले लोकसभा चुनाव मे उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं में भी अगर भाजपा से नाराजगी होती है तो वे भाजपा को हराने के लिए सपा के साथ जाते हैं। संविधान और आरक्षण पर खतरे से जो वर्ग नाराज हुआ वह भाजपा को हराने के लिए सपा के साथ गया और तभी लोकसभा में सपा 37 सीट जीत कर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसके साथ तालमेल का फायदा कांग्रेस को भी हुआ।

सो, मुस्लिम मतदाताओं के मन में कोई भ्रम नहीं है। फिर भी कांग्रेस के नेता इस कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह से समाजवादी पार्टी के मन में यह आशंका पैदा की जाए कि मुस्लिम कांग्रेस के साथ जा सकता है। इसका मकसद दबाव बना कर विधानसभा की ज्यादा सीटें हासिल करना है। हालांकि सपा को हकीकत पता है। जब लोकसभा चुनाव में मुस्लिम उसके साथ आया तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ क्यों जाएगा। इसके बावजूद सपा भी इस खेल में शामिल है। सपा ने पिछले दिनों कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के दामाद को अपनी पार्टी में शामिल कराया। इसके जवाब में कांग्रेस ने बसपा और एमआईएम के कई मुस्लिम नेताओं को पार्टी में शामिल कराया है। एमआईएम के मुखर नेता आसिम वकार पिछले दिनों कांग्रेस में शामिल हुए। अब बसपा सरकार में मंत्री रहे इजहारुल हक और 2024 में बसपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े नईम अहमद को पार्टी में शामिल कराया। इससे पहले पूर्व सांसद आमिर आलम खान और उनके बेटे नवाजिश आलम खान भी कांग्रेस में शामिल हुए। नवाजिश पहले विधायक रह चुके हैं। दोनों पिता पुत्र कई पार्टियों में रहे हैं। आमिर आलम रालोद से कैराना के सांसद रहे हैं।

कांग्रेस ने शुरू की आंदोलन की तैयारी

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानी को लेकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में हुए खुलासे पर बड़ा आंदोलन करने की तैयार कर रही है। पार्टी इसे छोड़ने के मूड में नहीं है। तभी अगले तीन दिन तक लगातार राजनीतिक कार्यक्रम तय किए गए हैं। सोमवार, 28 सितंबर को कांग्रेस कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। इसके अगले दिन मंगलवार, 29 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक होगी और उसके अगले दिन 30 सितंबर को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। अगर बीजद के प्रतिनिधि इसमें हिस्सा लेते हैं तो इसे विपक्ष की बैठक कहा जाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी इस मसले पर अपनी रणनीति बनाने के लिए 29 सितंबर को कार्य समिति यानी सीडब्लुसी की बैठक करेगी। सोनिया व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा इसमें शामिल होंगे। इसमें विपक्षी गठबंधन की बैठक को लेकर भी बात होगी। अगले दिन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेता इसमें शामिल होंगे। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद बैठक में नहीं पहुंच पाएंगे लेकिन उनकी पार्टी के नेता इसमें हिस्सा लेंगे।

बताया जा रहा है कि कांग्रेस और सपा के अलावा इस बैठक की पहल करने वाली ममता बनर्जी और लेफ्ट के नेता भी शामिल होंगे। इसमें डीएमके और आम आदमी पार्टी के भी शामिल होने की संभावना है। गौरतलब है कि पिछली बैठक में इन दोनों पार्टियों ने दूरी बनाई थी। बताया जा रहा है कि बीजू जनता दल को भी इसमें शामिल होने का न्योता भेजा गया है और कहा जा रहा है कि नवीन पटनायक का कोई प्रतिनिधि बैठक में शामिल हो सकता है। अगर बीजद का कोई नेता आता है तो इस बैठक को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बजाय विपक्ष की बैठक नाम दिया जा सकता है।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी और चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेद की खबरों के बाद विपक्षी पार्टियां नए सिरे से एकजुट हो रही हैं। पश्चिम बंगाल में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के बीच बातचीत शुरू हो गई है। असल में सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने ‘इंडिया’ ब्लॉक के सभी नेताओं को पत्र लिखा और चुनाव आयोग के हालात पर विचार के लिए बैठक बुलाने की अपील की।

एमए बेबी की चिट्ठी के जवाब में ममता बनर्जी ने सीपीएम महासचिव को फोन कर दिया। कोई 30 साल के बाद ममता की उनसे बात हुई। ममता बनर्जी ने एमए बेबी को कहा कि पूरे विपक्ष को मिलकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक साझा रणनीति बनाने की जरूरत है। इसके बाद ही बैठक की तारीख तय की गई।

विपक्ष के जानकार नेताओं का कहना है कि गठबंधन की ओर से 2029 का लोकसभा का चुनाव पुरानी मतदाता सूची से ही कराने की मांग की जाएगी। यानी एसआईआर को रद्द करने की मांग की जा सकती है। इस बैठक में यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि एसआईआर के बाद कितने बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए और कितनों को वापस बांग्लादेश भेजा गया? इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनौती दी है कि वे सोमवार को दिल्ली आ रहे हैं और सरकार में हिम्मत है तो उनको पकड़ कर दिखाए।

विपक्ष क्या साझा आंदोलन करेगा?

विपक्षी पार्टियों को एक के बाद एक ऐसे मुद्दे मिल रहे हैं, जिन पर वह साझा आंदोलन करे तो सरकार के खिलाफ नाराजगी को दिशा दे सकता है। ताजा मामला चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए खुलासे का है। अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक खोजी रिपोर्ट में बताया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर आयोग में एक राय नहीं है और इसे लेकर 10 महीने के अंदर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई। नाम जोड़ने वाले फॉर्म छह में किए गए बदलाव को तो दो आयुक्तों ने अवैध और अनधिकृत तक बताया। ऐसे ही ईआरओ को चुनाव आयोग का सेंट्रल डाटा बेस इस्तेमाल करने से रोकने और नाम काटने व जोड़ने के उनके मूल अधिकार को ही कमतर करने का आरोप लगाया। यह बहुत बड़ा मुद्दा है और अभी तक विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जो आरोप लगाती थीं, इस रिपोर्ट से एक तरह से उनकी पुष्टि हुई है।

फिर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर इसके खिलाफ आंदोलन करेंगी। जंतर मंतर का प्रदर्शन हो या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला हो सभी पार्टियां अपनी राजनीति अलग कर रही हैं। राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम कर रहे हैं तो अखिलेश यादव अपने राज्य के चुनाव में लगे हैं। ममता बनर्जी अपने राज्य में फंसी हैं तो तेजस्वी यादव को किसी बात से मतलब नहीं है। झारखंड में हेमंत सोरेन सत्ता में हैं तो उनकी चिंताएं अलग हैं। एमके स्टालिन गठबंधन से अलग हो गए हैं तो शरद पवार की पोजिशन स्पष्ट नहीं है कि वे इंडिया ब्लॉक में हैं या तटस्थ हैं और एनडीए में जाने की तैयारी कर रहे हैं। रही बात उद्धव ठाकरे की तो उनके पास बहुत ताकत नहीं बची है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के पास ताकत है और नैरेटिव बनाने की क्षमता भी है लेकिन उनको पंजाब में कांग्रेस से चुनाव लड़ना है और गोवा में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की राजनीति करनी है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के कुछ नेता चाहते हैं कि विपक्षी पार्टियों के साथ बात हो और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर आई रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन छेड़ा जाए। मुश्किल यह है कि साझा आंदोलन का चेहरा कौन होगा? पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामले में जैसे राहुल गांधी अभियान चला रहे हैं उसी आधार पर कांग्रेस चाहेगी कि इस आंदोलन का चेहरा भी राहुल हों। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के नेता चाहते हैं कि केजरीवाल आंदोलन का नेतृत्व करें। आप और ममता बनर्जी की पार्टी ने इस मामले में सबसे दो टूक स्टैंड लिया है। दोनों ने हाल के सभी चुनावों को रद्द करने और एसआईआऱ को भी रद्द करने की मांग की है। अगर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इन दो मांगों को लेकर एकजुट होती हैं और देशव्यापी आंदोलन शुरू होता है तो उसका बड़ा असर होगा। एसआईआर के बाद मसौदा सूची में 13 करोड़ लोगों के नाम कटे हैं। हालांकि बाद में कुछ लोगों के नाम जुड़े लेकिन फिर भी करोड़ों लोगों के नाम कटे हैं। सो, एसआईआर को रद्द करना एक बड़े आंदोलन का मुद्दा हो सकता है। लेकिन मुश्किल यह है कि जून में बैठक के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक की फिर दोबारा बैठक नहीं हुई है। कौन बैठक की पहल करे, कौन एजेंडा तय करे, खर्च कौन जुटाए और कौन नेतृत्व करे ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं के पास नहीं है। इसलिए ऐसा लग रहा है कि सब अपनी अपनी लड़ाई लड़ेंगे और संसद सत्र का इंतजार करेंगे कि उसमें इस मुद्दे को उठा कर जवाब मांगेंगे। सिर्फ संसद में विरोध प्रदर्शन करने की राजनीति से विपक्ष को कोई लाभ नहीं हो रहा है।

पूरे विपक्ष का ज्ञानेश पर हमला

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऊपर विपक्ष ने जोरदार हमला बोला है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट सामने आने के बाद राहुल गांधी सहित सभी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोप दोहराए। राहुल गांधी ने एक वीडियो जारी कर वोट चोरी को संविधान के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि समय आने पर किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। अखिलेश यादव से लेकर अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे सबने ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाया। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की।

असल में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्ञानेश कुमार अपने संवैधानिक दायरे से बाहर निकल कर फैसले करते हैं और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को फैसलों में शामिल नहीं करते हैं। दोनों आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार इसकी शिकायत की है। दोनों आयुक्तों ने ‘अवैध और अनधिकृत’ काम करने का आरोप भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाया है। इस रिपोर्ट को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने एक वीडियो में कहा है, ‘मैं इलेक्शन कमीशन और इलेक्शन ऑफिसर्स को साफ कह रहा हूं कि आप जो कर रहे हो गलत कर रहे हो। ये राजद्रोह है, देश के खिलाफ है। टाइम आएगा। हम आपको पकड़ेंगे। बचने वाले नहीं हो’। कांग्रेस के सांसद और सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील अभिषेक सिंघवी ने इस मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि इस खुलासे के बाद ज्ञानेश कुमार को पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने महाभियोग की भी मांग की।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले की जांच की मांग करते हुए कहा है, ‘सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं। एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी कोई सुनवाई नहीं है तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। कुछ लोगों द्वारा सत्ता की कठपुतली बनकर लोकतंत्र को धोखा देना घोर सांविधानिक अपराध है। ये लोकतंत्र को मिटाने के किसी षड्यंत्र से कम नहीं है’।

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने अखबार की रिपोर्ट को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने का अधिकार सिर्फ ईआरओ को है, फिर दिल्ली में बैठे लोग पूरे देश की वोटर लिस्ट कैसे बदल रहे हैं’? महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग की आलोचना करते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बैलट पेपर का उपयोग करके फिर से चुनाव होने चाहिए’।

सिर्फ जाति समीकरण कितना काम आएगा!

उत्तर प्रदेश का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायने में बहुत खास होने वाला है। आजादी के बाद से आज तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार इतने दिन तक पद पर नहीं रहा। जब लगातार कांग्रेस की सरकार बनती थी तब भी मुख्यमंत्री बदलते रहते थे। दूसरी खास बात यह है कि 1990 में कांग्रेस का वर्चस्व खत्म होने के बाद पिछले 36 साल में पहली बार किसी एक पार्टी का 10 साल तक राज रहा है। अगले साल फरवरी में एक पार्टी और एक व्यक्ति के 10 साल के राज के बाद चुनाव होगा। सो, भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है। वैसे तो भाजपा ने सत्ता में रहते हुए सत्ता विरोधी माहौल यानी एंटी इन्कम्बैंसी की गुत्थी काफी हद तक सुलझा ली है। उसकी सरकारों के बार बार सत्ता में लौटने की संभावना दूसरी पार्टियों से ज्यादा होती है। यह भी कह सकते हैं कि भाजपा ने प्रो इन्कम्बैंसी को साध लिया है।

उत्तर प्रदेश का चुनाव इस मायने में भी बहुत खास होने वाला है कि पहली बार मुलायम सिंह का परिवार इतने समय तक सत्ता से बाहर रहा है। 2017 से पहले उनकी पार्टी थोड़े थोड़े अंतराल पर किसी न किसी फॉर्मूले से सरकार में आ जाती थी। कभी बसपा से तालमेल करके तो कभी लोकतांत्रिक कांग्रेस, रालोद या बसपा के बागियों के सहारे तो कभी अकेले। असल में उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला था। 1990 से लेकर 2007 तक 17 वर्षों में कई बार सपा की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो पांच साल के बाद सपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आई और अखिलेश यादव सीएम बने। लेकिन 2017 के बाद से सपा लगातार विपक्ष में है। एक और खास बात यह है कि लंबे अरसे के बाद उत्तर प्रदेश में बिल्कुल आमने सामने का विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछली बार यानी 2022 का विधानसभा चुनाव भी भाजपा और सपा के बीच ही था लेकिन तब तक मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक ताकत थी। उसके 10 सांसद थे और लगभग 20 फीसदी वोट था। लेकिन अब वह शून्य सांसद, शून्य विधायक और लगभग नौ फीसदी वोट वाली पार्टी है, जिसमें बहुत अंतर्कलह है। पिछले चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। इस बार बसपा पहले ही मुकाबले से बाहर है और यह लगभग तय लग रहा है कि कांग्रेस और सपा मिल कर लड़ेंगे। सो, भाजपा का पांच पार्टियों का गठबंधन सपा के गठबंधन से लड़ेगा।

कम से कम अभी दोनों पार्टियों की जो चुनावी तैयारी दिख रही है वह अपना अपना सामाजिक समीकरण साधने की है। दोनों गठबंधन अपने हिसाब से जातियों का गणित ठीक करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वैसे तो हर भाषण में बाबर, औरंगजेब, सालार मसूद गाजी आदि का नाम लेते हैं, पोस्टर में आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें लगाई जाती हैं और 80-20 की राजनीति की बात की जाती है। माफिया को पूरी तरह से खत्म कर देने के नैरेटिव से कानून व्यवस्था सुधरने की धारणा तो बनाई जाती है, साथ ही अतीक और मुख्तार के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मैसेजिंग भी बोती है।

इसके साथ ही भाजपा जातियों का प्रबंधन भी कर रही है। वह इस भरोसे में है कि उसके पास सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है, जो राजभर वोट लाएगी। निषाद पार्टी है, जिसके सहारे मल्लाह वोट मिलेंगे। अपना दल है, जिससे कुर्मी वोट सुनिश्चित है और रालोद है, जिसके सहारे जाट पूरी तरह से एकजुट रहेंगे। सामान्य वर्ग की जातियों यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ का वोट भाजपा पहले से पक्का मान रही है। उसको लग रहा है कि इनमें से अगर किसी जाति में कोई नाराजगी है तो वह रूठने जैसा है और चुनाव तक उसके मान जाने की संभावना सौ फीसदी है। इस तरह हिंदुत्व के अंदर जातियों का परफेक्ट समीकरण भाजपा बना हुआ मान रही है।

दूसरी ओर अखिलेश यादव की उम्मीदें लोकसभा चुनाव के बाद कई गुना बढ़ गई हैं। उनको लग रहा है कि पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का उनका फॉर्मूला कामयाब होगा। असल में उनके पास माई समीकरण यानी मुस्लिम और यादव का लगभग 30 फीसदी वोट है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होकर मुख्य मुकाबले से बाहर होने और कांग्रेस के सपा के साथ आऩे से मुस्लिम वोट में बिखराव की संभावना समाप्त हो गई है। लेकिन यह 30 फीसदी वोट सपा को कहीं नहीं पहुंचाएगा। तभी अखिलेश गैर यादव पिछड़ा और गैर जाटव दलित को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे है। इसमें कोई बुराई नहीं है। भारत में चुनाव जीतने के लिए जातियों का समीकरण बहुत अहम होता है। लेकिन सिर्फ इस आधार पर कोई भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती है।

समाजवादी पार्टी की इस रणनीति में समस्या इसलिए है क्योंकि उसे 10 साल से सत्ता में बैठी भाजपा को हराना है। सरकार चला रही किसी भी पार्टी को सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं हराया जा सकता है। आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई भी सरकार तभी हारी है, जब उसके खिलाफ कोई बहुत मजबूत और प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर हो। अगर सरकार के खिलाफ थोड़ी बहुत नाराजगी है या थोड़ी बहुत शिकायतें हैं तो उनके दम पर उस सरकार को नहीं हराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टी अपने जातीय समीकरण के दम पर ज्यादा से ज्यादा मजबूत विपक्ष का दर्जा बचाए रख पाएंगी। जैसा बिहार में राजद के साथ हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि जो सत्ता में बैठा है या लगातार चुनाव जीत रहा है उसका एक मजबूत सामाजिक समीकरण बना होता है और वह ऐसा लाभार्थी वर्ग तैयार करता है, जो हर हाल में उसे वोट करता है। यह विपक्ष का एक डिसएडवांटेज है।

सो, अखिलेश यादव को कांग्रेस से तालमेल करने और जातीय समीकरण साधने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर तैयार करने का प्रयास करना चाहिए था। हालांकि अगर सरकार के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा नहीं है तो सिर्फ प्रयास करने से सत्ता विरोधी लहर नहीं पैदा होगी। सत्ता विरोधी लहर दो तरह से बनती है। पहली, सरकार के कामकाज से नाराज होकर स्वाभाविक रूप से या फिर विपक्षी पार्टी के निरंतर प्रयास से। सरकार से नाराज होने की पर्याप्त वजह होने के बावजूद विपक्ष के निरंतर प्रयास की कमी से उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर नहीं बन सकी है। कम से कम अभी सतह के ऊपर ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है। जबकि ऐसा होना चाहिए था। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ युवाओं में नाराजगी है। समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव ने इसके खिलाफ जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया। लेकिन सपा इस नाराजगी को एक दिशा देने के लिए जरूरी निरंतरता के साथ काम नहीं कर सकी। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला है। संसद के मानसून सत्र में सपा ने इसे लेकर खूब राजनीति की लेकिन सत्र समाप्त होने के बाद सपा की ओर से इस मुद्दे पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है।

महंगाई वैसे तो पिछले 10 साल से लगातार बढ़ रही है लेकिन रूस व यूक्रेन युद्ध और इस साल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका के हमले की वजह से जिस तरह आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है उससे महंगाई में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। इसे हर आम और खास व्यक्ति महसूस कर रहा है। परंतु मुख्य विपक्षी पार्टी महंगाई को मुद्दा नहीं बना पाई है। रोजगार और लोगों की आर्थिक समस्याओं पर भी विपक्ष का फोकस कम ही रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले ‘संविधान खतरे में है’ और ‘आरक्षण समाप्त हो जाएगा’ का नैरेटिव जन जन तक पहुंच गया था। उसका भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन वह नैरेटिव विधानसभा चुनाव में नहीं चल सकता है क्योंकि मतदाता इतना तो समझता है कि राज्य की सरकार संविधान नहीं बदल सकती है और न आरक्षण खत्म कर सकती है। तभी विपक्ष के पास कोई ग्रैंड नैरेटिव नहीं है और न सरकार के खिलाफ बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर है। तभी सिर्फ जातीय समीकरण साधने से चुनाव जीतना मुश्किल होगा। हालांकि अभी पांच महीने का समय है और राजनीति में पांच महीने को अनंतकाल माना जाता है।

चुनाव आयोग में आंतरिक कलह? दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार दर्ज कराई आपत्तियां, विपक्ष ने उठाए सवाल

चुनाव आयोग में आंतरिक कलह? दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार दर्ज कराई आपत्तियां, विपक्ष ने उठाए सवाल

Gyanesh Kumar

भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) में फैसले लेने का अधिकार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। ECI के नियमों के मुताबिक, अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त किसी मामले पर सहमत होते हैं, तो बहुमत का फैसला ही मान्य होता है। बहरहाल SIR पर इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर बवाल मच गया। विपक्ष ने भी इस मामले में चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट से भी मामले को संज्ञान देने की सलाह दी। ALSO READ: 2,700 की कैंसर दवा 27,000 में! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह मरीजों से ‘दिनदहाड़े डकैती’ है, अधिकारियों की चुप्पी पर उठाए सवाल

 

चुनाव आयुक्तों के बीच सहमति पर सवाल

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयोग के अंदर दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना उन मामलों पर फैसले लिए गए, जिन पर उन दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी।

 

रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 में भारतीय चुनाव आयोग ने बिहार से SIR की शुरुआत की। इसके बाद 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हुए। इसी प्रक्रिया के दौरान नए वोटर्स के रजिस्ट्रेशन, पुराने वोटर्स के नाम और अपीलों से जुड़े कई सवाल सामने आए। आयोग के भीतर भी इसी दौरान असहमति दर्ज होने लगी। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। एक ही दिन में अधिकतम चार बार आपत्ति दर्ज की गई। ये आपत्तियां उन फैसलों और निर्देशों को लेकर थीं, जो उनके मुताबिक, उनकी सहमति के बिना जारी किए गए।

 

विपक्ष ने उठाए सवाल

कांग्रेस ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, मोदी के चहेते ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में अपनी मनमर्जी चला रहे हैं। इस बारे में खुद दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार शिकायत की है। शिकायत में साफ कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्त – सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी नहीं दी जाती। उनसे सलाह नहीं ली जाती। उनसे बिना पूछे या बताए हुए फैसले लिए जा रहे हैं। ये 14 शिकायतें मुख्य तौर से – SIR, फॉर्म 6 में बदलाव, नए वोटर का रजिस्ट्रेशन, वोटर लिस्ट से नाम हटाना और जोड़ना, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील, वोटर लिस्ट की सुरक्षा और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर है।

 

पार्टी ने कहा कि इन शिकायतों से साफ होता है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ ज्ञानेश कुमार की चल रही है। ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह तानाशाही कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए ‘वोट चोरी’ का काम कर रहे हैं। हम पहले भी कहते आए हैं – मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्जा कर रखा है। ज्ञानेश कुमार मोदी के हाथ की कठपुतली है। इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से ये बात साबित होती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है। लेकिन ये बात याद रखना – वक्त आने पर सबका हिसाब होगा, जवाबदेही तय होगी। इस अपराध की सजा जरूर मिलेगी।

सपा नेता अखिलेश यादव ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि ये एक बेहद गंभीर समाचार है कि पिछले 10 महीनों में 2 चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के गलत निर्णयों पर 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई है। इसका सीधा मतलब ये है कि सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं। एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी कोई सुनवाई नहीं है तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और ख़तरनाक हालात हैं। कुछ लोगों द्वारा सत्ता की कठपुतली बनकर लोकतंत्र को धोखा देना घोर सांविधानिक अपराध है। ये लोकतंत्र को मिटाने के किसी षड्यंत्र से कम नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान ले!

चुनाव आयोग ने मतेभदों के आरोपों पर दी सफाई

इस मामले पर चुनाव आयोग ने सफाई देते हुए कहा है कि ECI में मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति से फैसले लिए जाते हैं। कई मीडिया खबरों में मामले की सीधी जानकारी रखने वाले लोगों के हवाले से बताया कि किसी भी चुनाव आयुक्त ने कोई असहमति नहीं जताई। उन्होंने केवल कुछ टिप्पणियां की थीं जिन पर आयोग ने विचार किया। ECI द्वारा लिए गए सभी फैसलों पर तीनों अधिकारियों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के हस्ताक्षर हैं।

आरक्षण की चोरी करने वाले ज्ञान दे रहे, अंबेडकर को अपमानित करने वाले सम्मान की बात करते हैं: अनिल राजभर

आरक्षण की चोरी करने वाले ज्ञान दे रहे, अंबेडकर को अपमानित करने वाले सम्मान की बात करते हैं: अनिल राजभर

Uttar Pradesh Cabinet Minister Anil Rajbhar targeted Akhilesh Yadav

– ‘सपा मुखिया राजधानी में बैठकर जनता को गुमराह कर रहे, चार सरकारों में पिछड़ों-दलितों का आरक्षण चुराया, एक जाति विशेष को मलाई दी’

– 2012-17 में बाबा साहेब की मूर्तियां खंडित करने का आरोप, जांच होगी, आजम खान ने अंबेडकर को सबसे बड़ा भूमाफिया बताया था

– उनके पास जनता के बीच जाने का समय नहीं है, जनता के बीच जाएंगे भी नहीं

Cabinet Minister Anil Rajbhar : समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरक्षण, दलित समाज और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को लेकर भाजपा सरकार पर लगे आरोपों का उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने तीखा जवाब दिया है। एएनआई से बातचीत में राजभर ने कहा कि सपा के मुखिया प्रदेश की राजधानी में बैठकर प्रतिदिन प्रदेश और सम्मानित जनता को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। उनके पास जनता के बीच जाने का समय नहीं है, जनता के बीच जाएंगे भी नहीं।

 

राजभर ने कहा कि आज सपा आरक्षण की बात कर रही है, जबकि उनकी चार सरकारों में पिछड़ों और दलितों के आरक्षण की जितनी डकैती हुई, उतनी शायद ही कभी हुई हो। उन्होंने आरोप लगाया कि आरक्षण की चोरी करने वाले आज आरक्षण पर ज्ञान दे रहे हैं। सपा ने सारे पिछड़ों और अति पिछड़ों का आरक्षण चुराया। जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, तब-तब आरक्षण की मलाई एक जाति विशेष के लोगों को दी गई। पूरी मलाई खाकर आज ये आरक्षण और बाबा साहब की बात कर रहे हैं।

 

आजम खान पर अनिल राजभर का हमला 

उन्होंने कहा कि 2012 से 2017 का दौर याद करना चाहिए। यह साजिश है। समाजवादी पार्टी गुंडों को आगे करके समाज में वैमनस्यता पैदा करने की कोशिश कर रही है। राजभर ने कहा कि अब इसकी भी जांच होगी कि समाजवादी पार्टी के किस गुंडे ने कहां मूर्ति खंडित की। उन्होंने सपा से अपने गिरेबान में झांकने को कहा और आरोप लगाया कि 2012 से 2017 के बीच सपा के संरक्षण में बाबा साहब की मूर्तियों को खंडित करने का काम हुआ।

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दोहरे चरित्र के लोग हैं सपाई

मंत्री ने सवाल किया कि बाबा साहब को भूमाफिया किसने बताया? उन्होंने कहा कि सपा के तत्कालीन मंत्री आजम खान ने बाबा साहब को प्रदेश का सबसे बड़ा भूमाफिया बताया था। जहां बाबा साहब की मूर्तियां लगी हैं और उनके नाम के पार्क बने हैं, वहां यह कहा गया मानो दलित समाज ने उन पर कब्जा कर लिया हो और बाबा साहब सबसे बड़े भूमाफिया हों।

राजभर ने कहा कि आज इन्हीं लोगों को बाबा साहब और दलित समाज याद आ रहे हैं। ये दोहरे चरित्र के लोग हैं। आरक्षण की चोरी करने वाले आज आरक्षण पर ज्ञान दे रहे हैं और बाबा साहब को अपमानित करने वाले आज उनके सम्मान की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सपा और उसके नेता जनता को कितना नासमझ समझते हैं, यह उनके बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से निकलकर आता है।

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प्रतिदिन बदल रहे पीडीए का परिभाषा

राजभर ने कहा कि चिंता न करें, समाज गुमराह होने वाला नहीं है। प्रदेश उनके असली चेहरे को अच्छी तरह जानता है। पीडीए में दलित का ‘डी’ है, कल क्या कहेंगे पता नहीं। अखिलेश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि इतना कन्फ्यूज नेता तो हम लोगों ने देखा ही नहीं। प्रतिदिन पीडीए की परिभाषा बदल रहे हैं। जनता सब कुछ देख और समझ रही है। समाजवादी पार्टी की दाल नहीं गलने वाली, निश्चिंत रहें।

यूपी में महिला नेताओं का मुकाबला दिखेगा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अविवाहित हैं। इसलिए उनके चुनाव प्रचार में परिवार के सदस्य नहीं दिखते हैं, जैसा आमतौर पर दूसरे नेताओं के प्रचार में दिखता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला नेताओं का मुकाबला नहीं होगा। इस बार यूपी में जिस तरह से राज्य सरकार ने महिलाओं को एक वोट वर्ग के रूप में देखा है और उनके लिए योजनाएं शुरू की हैं उससे लग रहा है कि आधी आबादी इस बार चुनाव प्रचार के केंद्र में है। यह अभी से दिखने भी लगा है। समाजवादी पार्टी से लेकर राष्ट्रीय लोकदल तक के सर्वोच्च नेताओं के परिवार के सदस्य चुनाव मैदान में उतर गए हैं।

एक तरफ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव हैं तो दूसरी ओर रालोद के अध्यक्ष जयंत चौधरी की पत्नी चारू चौधरी हैं। दोनों ने प्रचार शुरू कर दिया है। डिंपल को खैर कई बार की सांसद हैं। लेकिन अखिलेश यादव की ‘चवन्नी’ वाली टिप्पणी के बाद सहारनपुर में रालोद की रैली हुई, जिसमें चारू चौधरी ने जोरदार भाषण दिया और लोगों से चौधराहट बनाए रखने की अपील की। डिंपल और चारू चौधरी के अलावा कई और महिला नेता इस बार पहले से ज्यादा सक्रिय दिखेंगी। खबर है कि बसपा की प्रमुख मायावती अपने दोनों भतीजों आकाश और ईशान आनंद की बजाय भतीजी दीपिका को आगे कर रही हैं। उनको इस बार यूपी के लोग चुनाव प्रचार में देख सकते हैं।

अपना दल की अनुप्रिया पटेल और अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल पहले से राजनीति में हैं और इस बार भी दोनों बहनों की पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ लड़ेंगी। प्रियंका गांधी वाड्रा भले केरल की वायनाड सीट से लोकसभा सांसद हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनकी सक्रियता इस बार भी रहेगी और भाजपा की नई बनी महामंत्री स्मृति ईरानी भी इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में रहेंगी। कहा जा रहा है कि एक बार फिर वे अमेठी और रायबरेली में भी सक्रिय होंगी।

एआई का भारत में मजाक चल रहा है

वह तो भला हो गलगोटिया वालों का कि उन्होंने भारत में हुए एआई समिट में चीन का रोबोटिक कुत्ता अपना आविष्कार बता कर पेश कर दिया, जिस पर पूरी दुनिया में हंसी उड़ी अन्य़था उस सम्मेलन के बाद तो भारत को एआई में विश्वगुरू घोषित किए जाने की तैयारी थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भारत का एआई समिट दो कारणों से चर्चा में रहा। एक चीन के रोबोटिक कुत्ते को भारत की एक यूनिवर्सिटी द्वारा अपना कह कर बताने। दूसरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एआई के दिग्गजों के हाथ उठा कर चुनावी रैली जैसा प्रदर्शन करने के कारण।

वह तस्वीर दुनिया भर में वायरल हुई थी। ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो आमोदेई दोनों को मोदी के जोर देने पर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उठाना पड़ा, जबकि दोनों एक दूसरे से बात करना तक पसंद नहीं करते। दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उठाते समय बहुत असहज दिख भी रहे थे। लेकिन मोदी को उसकी परवाह नहीं थी। उन्हें तो दिखाना था कि वे दुनिया के एआई दिग्गजों के साथ मिल कर भारत में एआई क्रांति का ऐलान कर रहे हैं।

खैर, उसके बाद भारत में एआई की चर्चा दूसरे ही संदर्भों में होने लगी। उस समय जो मजाक बना उसके बाद मान लिया गया कि एआई से मजाक ही बन सकता है। तभी भारत में एआई का इस्तेमाल राजनीतिक दल एक दूसरे का मजाक बनाने, एक दूसरे को कमजोर बताने और एक दूसरे को अपमानित करने के लिए कर रहे हैं। हालांकि अमेरिका में भी भले प्रौद्योगिकी के दिग्गज एआई के क्षेत्र में बड़े काम कर रहे हैं और इसकी प्रगति को लेकर चिंतित भी हैं। लेकिन वहां भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता एआई का इस्तेमाल अपना मजाक बनवाने और दूसरे का मजाक बनाने के लिए कर रहे हैं। ट्रंप ने एआई से बना कर दर्जनों मीम्स सोशल मीडिया में शेयर किए। किसी में वे ग्रीनलैंड पर कब्जा कर रहे होते हैं तो किसी में कनाडा को अमेरिका का हिस्सा बना रहे होते हैं तो किसी में ईरान को नष्ट कर रहे दिखते हैं। एआई का जैसा इस्तेमाल राष्ट्रपति ट्रंप कर रहे हैं वैसी ही इस्तेमाल भारत के नेता भी कर रहे हैं। सिर्फ एआई का ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भारत में ऐसे ही कामों के लिए किया जा रहा है।

भारत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स का भी ऐसा ही इस्तेमाल है तो फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन आदि का भी इसी तरह का इस्तेमाल हो रहा है। सभी पार्टियों ने सैकड़ों या हजारों फर्जी अकाउंट बना रखे हैं। भाजपा के तो ‘भाजपा इजराइल’ और ‘भाजपा फिलस्तीन’ के नाम से भी अकाउंट बने हैं। हालांकि पार्टी कहेगी कि इससे उनका कोई लेना देना नहीं है। लेकिन असल में वहां से वह काम सारे काम हो रहे हैं, जो पार्टी अपने आधिकारिक हैंडल से नहीं कर सकती है। वहां जिस तरह का ऑफेंसिव कंटेंट डाला जाता है, उसकी इजाजत किसी भी सभ्य समाज में नहीं हो सकती है। बात बात में कंटेंट हटाने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश देने वाली सरकार इन मामलों में चुप रहती है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भाजपा ऐसा कर रही है। भाजपा का स्केल थोड़ा बड़ा है। वैसे भी आजकल प्रधानमंत्री अपने लगभग हर भाषण में स्केल और स्पीड की बात कर रहे हैं। तो विपक्षी पार्टियों के लिए अपमानजनक कंटेंट तैयार करके सोशल मीडिया में उसे शेयर करने के मामले में भी भाजपा की स्पीड और स्केल बड़ा है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। अगर भाजपा समर्थकों के हैंडल से सोनिया गांधी से मिलती जुलती शक्ल वाली महिला की तस्वीर और वीडिया बना कर बार बाला नाम से पोस्ट किया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर से नरेंद्र मोदी से मिलते जुलते शक्ल वाले व्यक्ति को वडनगर रेलवे स्टेशन पर जेबतराशी करते दिखाया जा रहा है। भाजपा समर्थकों की ओर से अखिलेश यादव को टोंटी चोरी के रूप में दिखाया जा रहा है तो सपा समर्थक अखिलेश को हीरो और योगी आदित्यनाथ को विलेन बता कर फिल्मी अंदाज में पेश कर रहे हैं।

भारत के नेताओं के लिए एआई का कोई सार्थक या सकारात्मक इस्तेमाल नहीं है। यह प्रचार सामग्री तैयार करने और विपक्ष के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा अपमानजनक कंटेंट तैयार करने में इस्तेमाल हो रहा है। पहले पार्टियों के कार्यकर्ता हाथ से पोस्टर और बैनर तैयार करते थे। तब उनमें सार्थक और समय की वास्तविकताओं को बताने वाले नारे लिखे होते थे। बाद में प्रिटिंग प्रेस में पोस्टर, बैनर छपने लगे। तब पोस्टर के साथ प्रेस का नाम लिखना होता था। इसलिए कोई प्रेस वाला अपमानजनक सामग्री नहीं छापता था। बाद में कंप्यूटर ने इस काम को बहुत आसान बना दिया। कंप्यूटर से तैयार करके बिना प्रिटिंग प्रेस गए अपने प्रिंटर से पोस्टर, पैम्फलेट आदि बनाए जाने लगे। तब नेताओं के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालना बहुत आसान हो गया। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और एआई ने मिल कर इस काम को बहुत बड़े स्तर पर पहुंचा दिया है। अब आइडिया भी एआई जेनरेट कर रहा है, तस्वीरें और वीडियो भी वही तैयार कर रहा है और उससे कंटेंट भी वही बना रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फर्जी अकाउंट बना कर उस पर एआई से तैयार कंटेंट शेयर करना और उसे वायरल कराना आज की राजनीति का और प्रचार का भी सबसे बड़ा सत्य है। भारत में कम से कम नेता और पार्टियां एआई का इस्तेमाल इसके लिए ही कर रही हैं।

भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं

भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं

gurugram hit and run case

साहिबा खान

अगर आप एक पुरुष हैं और मोटरसाइकिल चलाते हैं तो मुमकिन है कि जब आप घर से बाहर निकलते होंगे तो जेहन में सिर्फ काम या बाहर जाने की वजह, हेलमेट, वॉलेट और घर की चाबी साथ होती होगी। आप एक निक्कर या हाफ पेंट पहन सकते हैं। सुकून भरा मौसम हो तो बिना बांह की शर्ट या टी शर्ट पहन सकते हैं। लेकिन अगर आप दोपहिया पर सफर करने वाली एक महिला हैं तो आपको कपड़ों से लेकर कई किस्म के अदृश्य भयों के बारे में भी सोचना पड़ता है। ALSO READ: भारत सस्ते पैकेटबंद खाने पर इतना निर्भर कैसे हुआ

 

भारत के जम्मू शहर की सोनाली डब चंडीगढ़ में एक ग्राफिक डिजाइनर और इलस्ट्रेटर के तौर पर काम करती हैं। उन्हें अपनी मोटरसाइकिल से देश को जानना पंसद है। डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया, “निकलने से पहले मैं किसी परिजन को अपनी लोकेशन भेजती हूं, उनसे अपना रूट साझा करती हूं और यह सुनिश्चित करती हूं कि रात में भी वह जगह आने जाने के लिए सुरक्षित है या नहीं।”

 

इतनी तैयारी के बावजूद कई महिलाओं को खासकर भारत की सड़कों पर अभद्र भाषा, आक्रामक ओवरटेक करने और यौन हिंसा व उत्पीड़न जैसे खतरनाक व्यवहार का सामना करना पड़ता है।

 

हाल ही में राजधानी नई दिल्ली से सटे गुरुग्राम की एक घटना सामने आई, जहां एक महिला राइडर को एक कार ड्राइवर ने ओवरटेक करके ऐसी टक्कर मारी कि वे मोटरसाइकिल से ही गिर गईं और भीड़ भाड़ से भरे ट्रैकिफ के बीच बाल बाल बचीं। इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ।

 

इस घटना में एक तरफ सड़क पर गुस्सा, आक्रामक ड्राइविंग और ट्रैफिक उल्लंघनों का मुद्दा है और दूसरी तरफ महिलाओं का सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न, असुरक्षा और उनकी आवाजाही का सवाल है। क्या सड़कें, रुतबा, मर्दानगी और हैसियत दिखाने का मैदान बन गई हैं? ALSO READ: कैसा है 2027 यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव का ‘नीला दांव’

 

सड़क पर गुस्सा केवल पुरुषों की समस्या नहीं है

इंटरनेशनल जर्नल और सोशल साइकेट्री ने ‘रोड रेज’ नाम का अध्ययन पब्लिश किया है। 2013 के इस शोध में शोधकर्ताओं ने पाया कि दिल्ली में हॉर्न बजाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, तेज संगीत बजाना ड्राइविंग से जुड़े गुस्से को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल था। दिल्ली के 200 वाहन चालकों पर किए गए इस अध्ययन में गर्म और उमस भरे मौसम के साथ ही इन कारणों को अहमियत दी गई। ज्यादा गुस्सा महसूस करने वाले ड्राइवरों में आक्रामक तरीके से ओवरटेक करने, गाली देने, चिल्लाने, दूसरे ड्राइवरों को रास्ता न देने और यहां तक कि दूसरे वाहन चालकों से लड़ने या उन्हें टक्कर मारने जैसा व्यवहार ज्यादा दिखाई पड़ा।

 

हालांकि, पुरुषों को स्वाभाविक रूप से ज्यादा आक्रामक ड्राइवर मान लेना शोध से पूरी तरह साबित नहीं हुआ। भारत में रोड रेज पर प्रवीण जैन और उनके सहयोगियों ने भी 2022 में एक शोध किया। 282 प्रतिभागियों पर आधारित यह शोध यूरोपियन साइकेट्री में भी प्रकाशित हुआ। इसके शोधकर्ताओं को पुरुषों और महिलाओं के रोड रेज स्कोर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। इसके बजाय कम उम्र के प्रतिभागियों में ड्राइविंग के दौरान गुस्से का स्तर अधिक पाया गया।

 

लेकिन इससे एक दूसरा सवाल खत्म नहीं होता। अगर भारत की सड़कों पर गुस्सा इतना आम हो चुका है तो क्या उसका इजहार महिलाओं के खिलाफ अलग तरीके से किया जाता है?

 

सड़क किसकी? 

कल्पना विश्वनाथ भारत में एक सोशल एंटरप्रेन्योर हैं और ‘सेफ्टीपिन’ नाम की ऐप की को-फाउंडर और सीईओ हैं। सेफ्टीपिन शहरों के सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा का आकलन करता है जैसे रोशनी, दृश्यता, सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षा और पैदल चलने की सुविधाएं। यह आकलन डाटा के आधार पर किया जाता है। विश्वनाथ को जेंडर-समावेशी शहरीकरण पर अच्छी पकड़ हासिल है। डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया “सड़क पुरुषों के लिए उनका अपना मैदान होता है जहां वो शोहरत, गाड़ी और रफ्तार की नुमाइश करते हैं। अब उसमें एक दोपहिया सवार महिला उनकी पितृसत्ता पर चोट करती है। वो सोचते हैं कि एक महिला कैसे इस रफ्तार से मोटरसाइकिल चला कर निकली?” विश्वनाथ कहती हैं कि यह गुस्सा, महिलाओं को उनकी जगह बताने पर आमादा हो जाता है।

 

प्रियंका ठाकुर कुल्लू से हैं और चंडीगढ़ में पत्रकारिता करती हैं। वे भी सोनाली की तरह ही मोटरसाइकिल चलाती हैं। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें भी एक ऐसे व्यक्ति का सामना करना पड़ा जो उनकी मोटरसाइकिल स्टार्ट ना होने पर हॉर्न पर हॉर्न मारता रहा ताकि वो डर जाएं। उनका कहना है कि उनकी मोटरबाइक अचानक रुक गई थी क्योंकि वह व्यक्ति बहुत करीब आ गया था और उन्हें अचानक ब्रेक लगाने पड़े थे। ऐसी कई घटनाएं कई महिलाओं के साथ सड़कों पर हर रोज होती हैं।

 

सार्वजनिक जगह में महिलाओं की मौजूदगी

दिल्ली में युवा महिलाओं के अनुभवों पर 2014 में प्रकाशित एक अध्ययन में 18 से 30 वर्ष की 20 महिलाओं का इंटरव्यू किया गया। महिलाओं ने सड़क पर होने वाले उत्पीड़न के अलग-अलग रूपों और उसके कारण अपने जीवन में लगने वाली बंदिशों के बारे में बताया। अध्ययन में महिलाओं ने उत्पीड़न को महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये और कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन से भी जोड़ा।

 

इससे यह समझने में मदद मिलती है कि सड़क पर किसी महिला का अनुभव सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने सुरक्षित तरीके से वाहन चला रही है। उसके भीतर यह बेचैनी भी रहती है कि दूसरे लोग उसके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं।

 

भूगोल और जनसांख्यिकी का असर

शहरीकरण के संदर्भ में कल्पना विश्वनाथ बताती हैं कि जिस रोड पर गुरुग्राम हादसा हुआ, वह सिर्फ तेज चलने वाली गाड़ियों के लिए ही बनी है। उसके इर्द गिर्द न ज्यादा खाने पीने की जगहें हैं, और सभी ट्रैफिक लाइट्स भी हटा दी गई हैं। उन्होंने मानना है कि यह इलाका उत्तरी भारत के हरियाणा राज्य में आता है, जहां ज्यादातर पुरुष पितृसत्ता और सामंती मानसिकता से आते हैं। उन्होंने आगे कहा, “इन जगहों पर इमारतें तो बन गईं लेकिन शहरीकरण के साथ चलने वाले मानदंडों को ठीक से व्यक्तिगत व्यवहार में नहीं अपनाया जा सका है।”

 

उत्तर भारत, खासकर दिल्ली और आसपास के शहरों में, सड़क पर होने वाली रोड रेज और महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा को लेकर काफी चर्चा और शोध हुए हैं। लेकिन सिर्फ दर्ज किए गए मामलों की संख्या अधिक होने के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तर भारत में रोड रेज या महिलाओं के खिलाफ सड़क पर होने वाली लैंगिक हिंसा देश के दक्षिणी हिस्से से अलग है। अब तक ऐसा कोई भी अध्ययन सामने नहीं आया है जो क्षेत्रीय व्यवहार से जुड़े आंकड़े सटीकता से सामने रख सके। ALSO READ: क्या वाकई रोकी जा सकती है एआई के विकास की रफ्तार?

 

सड़कें हैं या मर्दानगी का मंच

यहीं पर शहरी नियोजन और जेंडर के बीच का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है। सड़क पर वाहन चलाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं है। ड्राइविंग, सड़क इस्तेमाल कर रहे बाकी लोगों के साथ एक तरह का सामंजस्य भी है। इसे प्रतिस्पर्धा या किसी किस्म की रेस बना लेना, दूसरों को हॉर्न बजा बजाकर बाध्य करना, पदयात्रियों को कुछ ना समझना या फिर सब्र और संयम के साथ दूसरों का सम्मान करते हुए सही मौके का इंतजार करना, इस पूरी प्रक्रिया में एक तरह की सामाजिक बातचीत जैसे हैं।

 

दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर यौन उत्पीड़न के हॉटस्पॉट को मैप करने वाले 2026 के एक अध्ययन ने भी यह दिखाया कि पर्यावरण और जगह की विशेषताएं रोड रेज के पैटर्न को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। और शायद यही वह जगह है जहां सड़क का सवाल शहरी नियोजन और जेंडर के सवाल में बदल जाता है।