रेलवे बोर्ड ने सूरत-उदयपुर वंदे भारत ट्रेन को दी मंजूरी, 9 स्टॉपेज के साथ जानें टाइमिंग और रूट

Surat-Udaipur Vande Bharat Express: रेल मंत्रालय ने गुजरात को राजस्थान से जोड़ने वाली एक नई वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन सेवा को मंज़ूरी दे दी है। यह नई सेमी-हाई स्पीड ट्रेन सूरत और उदयपुर के बीच चलेगी। इस ट्रेन का रखरखाव और संचालन वेस्टर्न रेलवे (WR) जोन करेगा।

वेस्टर्न रेलवे और नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे के जनरल मैनेजर (ऑपरेटिंग) को 31 अगस्त को लिखे एक पत्र में, रेलवे बोर्ड ने बताया कि उसने 26903/26904 सूरत-उदयपुर सिटी वंदे भारत एक्सप्रेस शुरू करने को मंजूरी दे दी है।

इंडियन रेलवे एक वंदे भारत ट्रेन बंद करेगा

रेलवे बोर्ड ने ट्रेन नंबर 26963/26964 उदयपुर सिटी-असारवा वंदे भारत एक्सप्रेस को बंद करने की भी मंजूरी दी है। उदयपुर सिटी-असारवा (अहमदाबाद) वंदे भारत एक्सप्रेस फरवरी 2026 में शुरू की गई थी। अभी यह ट्रेन मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन चलती है।

सूरत-उदयपुर वंदे भारत ट्रेन: दूरी और यात्रा का समय

सूरत-उदयपुर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन लगभग 690 किलोमीटर की दूरी 7 घंटे 30 मिनट में तय करती है। यह अधिकतम 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकती है।

सूरत-उदयपुर वंदे भारत एक्सप्रेस: ​​स्टॉपेज और फ्रीक्वेंसी

सूरत-उदयपुर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में 6 दिन चलेगी। सूरत और उदयपुर सिटी के बीच अपनी यात्रा के दौरान, यह ट्रेन 9 रेलवे स्टेशनों पर रुकेगी। ये स्टेशन हैं: भरूच, वडोदरा, आणंद, मणिनगर, असरवा, हिम्मतनगर, शामलाजी रोड, डूंगरपुर और जावर।

सूरत-उदयपुर सिटी वंदे भारत: कोच की संख्या और समय

सूरत-उदयपुर सिटी वंदे भारत एक्सप्रेस में 8 कोच होंगे। ट्रेन नंबर 26903 सूरत से सुबह 06:10 बजे चलेगी और दोपहर 13:40 बजे उदयपुर सिटी पहुंचेगी। वापसी में, ट्रेन नंबर 26904 उदयपुर सिटी से दोपहर 15:35 बजे चलेगी और रात 23:00 बजे सूरत पहुंचेगी।

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Mumbai Local Train update: मुंबईकरों के लिए खुशखबरी! अब दौड़ेगी वंदे मेट्रो AC लोकल ट्रेन, जानें कब तक तैयार हो जाएगी ये पूरी फ्लीट

Mumbai Local Train update: मुंबई की लाइफलाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेन में सफर करने वाले लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। मुंबई को जल्द ही 238 नई वंदे मेट्रो एसी लोकल ट्रेनें (2856 कोच) मिलने जा रही हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई रेलवे विकास कॉर्पोरेशन ने ऐलान किया है कि इन नई एसी लोकल ट्रेनों को भारतीय रेलवे की ही तीन अलग-अलग प्रोडक्शन यूनिट में तैयार किया जाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक एमआरवीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक विलास वाडेकर ने बताया है कि रेलवे की तीन मैन्युफैक्चरिंग सर्विस में बनने वाली पहली 12-कोच वाली एसी लोकल ट्रेन 2027 में मिल जाएगी जबकि 238 ट्रेनों की पूरी फ्लीट 2030 तक उपलब्ध करा दी जाएगी।

19,293 करोड़ रुपये की लागत आएगी

एमआरवीसी के मुताबिक मुंबई अर्बन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (MUTP) 3 के तहत खरीदी जा रही इन 238 वंदे मेट्रो उपनगरीय ट्रेनों (2,856 कोच) के रोलिंग-स्टॉक की अनुमानित लागत 19293 करोड़ रुपये है। इन 12-कोच वाली एसी लोकल ट्रेनों का निर्माण रेलवे की तीन प्रमुख इकाइयों इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला और मॉडर्न कोच फैक्ट्री रायबरेली में किया जाएगा।

पहले इन ट्रेनों को निजी या विदेशी कंपनियों के माध्यम से खरीदने और उनके जीवनकाल के रखरखाव के लिए इंटरनेशनल टेंडर मंगाए गए। इसे लेकर मन लायक रिस्पॉन्स नहीं मिलने की वजह से सरकार ने इसे अपने कारखानों में बनाने का फैसला लिया है।

अंतरराष्ट्रीय टेंडर में आ रही थीं दिक्कतें, रेल मंत्री ने बताया नया प्लान

प्रक्रिया में हुए बदलाव को लेकर बुधवार शाम जारी एक वीडियो संदेश में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि पुरानी खरीद प्रक्रिया में कई समस्याएं थीं। इसी वजह से केंद्र सरकार ने अब इन ट्रेनों का निर्माण अपनी खुद की तीन उत्पादन इकाइयों में करने का निर्णय लिया है। रेल मंत्री ने कहा कि पुरानी योजना के तहत पूरी खरीद 2030 में जाकर पूरी होने वाली थी, जो हमें कतई स्वीकार्य नहीं थी। इसीलिए आज यह नया फैसला लिया गया है कि इनका उत्पादन भारत सरकार की तीन उत्पादन इकाइयों ICF, RCF और MCF में किया जाएगा, ताकि पहली लोकल ट्रेन 2027 तक हर हाल में पटरी पर आ जाए।

एमआरवीसी द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, पुरानी खरीद प्रक्रिया के तहत अगर काम होता तो सीरीज प्रोडक्शन शुरू होने में ही करीब तीन साल लग जाते। इस वजह से पहली ट्रेन 2030 में मिलती और पूरी फ्लीट 2034 तक जाकर तैयार हो पाती। जून 2023 में एमआरवीसी ने 238 एसी लोकल ट्रेनों की खरीद और उनके 35 वर्षों के रखरखाव के लिए अंतरराष्ट्रीय बोलियां आमंत्रित की थीं। मई 2023 में रेलवे बोर्ड की मंजूरी के बाद जारी इस टेंडर में दो साल का समय प्रोटोटाइप ट्रेन बनाने के लिए और उसके बाद औसतन 50 ट्रेनें प्रति वर्ष की दर से पांच साल में निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था।

सफल बोलीदाता को पालघर जिले के वणगांव और रायगढ़ जिले के भिवपुरी में नए रखरखाव डिपो स्थापित करने, मौजूदा सुविधाओं को अपग्रेड करने और 35 वर्षों के लिए रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने की शर्त रखी गई थी।

इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर 22000 करोड़ का निवेश, सफर होगा आरामदायक

एमआरवीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नए संशोधित विनिर्माण कार्यक्रम से इन एसी ट्रेनों को मुंबई रेल नेटवर्क के नए कॉरिडोर और क्षमता विस्तार कार्यों के शुरू होने के साथ ही पटरी पर उतारा जा सकेगा। क्षमता विस्तार कार्यों में लगभग ₹22,000 करोड़ का भारी निवेश किया जा रहा है। इसमें नए कॉरिडोर बनाना, अतिरिक्त रेलवे लाइनें बिछाना, 15-कोच वाली ट्रेनों को चलाने के लिए प्लेटफॉर्मों की लंबाई बढ़ाना, यार्डों का पुनर्गठन करना और नेटवर्क को मजबूत करने वाले कई काम शामिल हैं।

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IRCON Q1 Results: सरकारी रेल कंपनी का मुनाफा 44% घटा, रेवेन्यू और ऑपरेटिंग प्रॉफिट बढ़ा

IRCON Q1 Results: रेलवे सेक्टर की सरकारी इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी IRCON International Ltd ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 43.6% घटकर ₹92.74 करोड़ रह गया।

पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी का मुनाफा ₹164.5 करोड़ था। हालांकि, रेवेन्यू और ऑपरेटिंग प्रॉफिट में बढ़ोतरी हुई।

IRCON का रेवेन्यू 9.5% बढ़ा

IRCON का कंसोलिडेटेड ऑपरेशंस से रेवेन्यू 9.5% बढ़कर ₹1,955.8 करोड़ हो गया। पिछले साल की जून तिमाही में यह ₹1,786.3 करोड़ था। EBITDA भी 2.6% बढ़कर ₹205.17 करोड़ रहा। एक साल पहले यह करीब ₹200 करोड़ था।

हालांकि, EBITDA मार्जिन में गिरावट आई। यह पिछले साल के 11.19% से घटकर 10.49% रह गया।

ISTPL का टोल कलेक्शन अधिकार खत्म

IRCON ने बताया कि उसकी ज्वाइंट वेंचर कंपनी Ircon-Soma Tollway Pvt. Ltd. (ISTPL) का टोल कलेक्शन अधिकार 14 मई को खत्म हो गया। यह अधिकार बढ़ाई गई कंसेशन अवधि पूरी होने के बाद खत्म हुआ। ISTPL में IRCON की 50% हिस्सेदारी है। अब हाईवे से जुड़े एसेट्स नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को सौंपे जा रहे हैं।

30 जून तक ISTPL की नेटवर्थ करीब ₹216.17 करोड़ थी। इसमें IRCON का हिस्सा करीब ₹108.09 करोड़ है। कंपनी ने कहा कि उसे ज्वाइंट वेंचर में अपने निवेश की वैल्यू में किसी तरह की कमी यानी इम्पेयरमेंट की उम्मीद नहीं है।

दूसरे प्रोजेक्ट्स पर भी अपडेट

रेल मंत्रालय ने Bastar Railway Pvt. Ltd. को बंद करने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। कंपनी के मुताबिक, इससे जुड़ी कानूनी और दूसरी प्रक्रियाएं चल रही हैं। IRCON ने यह भी बताया कि उसने MCL प्रोजेक्ट के फेज I और फेज II को रेल मंत्रालय को सौंपने का फैसला किया है।

इसके अलावा, 23 जून को IRCON ने बताया था कि Badri Rai & Company के साथ उसके ज्वाइंट वेंचर को ₹763.1 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट मिला है। यह ऑर्डर त्रिपुरा स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कॉरपोरेशन ने अगरतला में स्मार्ट-ग्रिड प्रोजेक्ट के लिए दिया है।

शेयर में 1.32% की गिरावट

पिछले 6 महीने में स्टॉक 18.14% गिरा है। वहीं, 1 साल में यह 24.34% नीचे आया है। कंपनी का मार्केट कैप 11.87 हजार करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ट्रेन को टेम्पो बना दिया! परिवार को चढ़ाने के लिए क्रॉसिंग पर रुकी ट्रेन? वायरल वीडियो देखकर इंटरनेट यूजर्स ने रेलवे से मांगा जवाब

बिहार के पश्चिम चंपारण में रेलवे क्रॉसिंग से जुड़ा एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है। वजह है वहां दिखाई देने वाला एक ऐसा नजारा, जिसकी शायद ही किसी ने उम्मीद की होगी। जहां आमतौर पर लोग ट्रेन के गुजरने तक इंतजार करते हैं, वहीं इस घटना में एक परिवार अचानक ट्रेन की तरफ बढ़ता नजर आया। देखते ही देखते परिवार के चार सदस्य ट्रेन के करीब पहुंचे और उसमें सवार हो गए। मौके पर मौजूद लोगों के लिए यह पूरा घटनाक्रम काफी हैरान करने वाला था। किसी ने इस पल को कैमरे में कैद कर लिया और बाद में वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया।

वीडियो सामने आने के बाद लोग तरह-तरह के सवाल पूछ रहे हैं और इस असामान्य घटना को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। खास बात यह है कि पूरा मामला किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि रेलवे क्रॉसिंग के पास हुआ।

क्रॉसिंग पर इंतजार कर रहा था परिवार

बताया जा रहा है कि यह घटना 8 अगस्त को कुमारबाग रेलवे स्टेशन के पास हुई। वीडियो में रेलवे क्रॉसिंग बंद दिखाई दे रही है और दूसरी तरफ कई वाहन ट्रेन के निकलने का इंतजार कर रहे हैं। इसी दौरान चार लोगों का एक परिवार क्रॉसिंग के पास खड़ा नजर आता है। वीडियो रिकॉर्ड करने वाले शख्स ने दावा किया कि परिवार काफी देर से वहीं मौजूद था और करीब एक घंटे से ट्रेन का इंतजार कर रहा था।

फोन के बाद कुछ ऐसा हुआ कि सब चौंक गए

वीडियो में परिवार के एक सदस्य को फोन पर बातचीत करते हुए भी देखा गया। रिकॉर्डिंग करने वाले व्यक्ति को लगा कि शायद वह किसी परिचित से बात कर रहा था और उसी संपर्क के जरिए ट्रेन को वहां रुकवाने की व्यवस्था की गई। कुछ ही देर बाद मुजफ्फरनगर-नरकटियागंज DEMU ट्रेन वहां पहुंची। ट्रेन पहले धीमी हुई और फिर रेलवे क्रॉसिंग के पास पूरी तरह रुक गई। बस फिर क्या था, परिवार के चारों सदस्य तुरंत ट्रेन के एक कोच के दरवाजे की तरफ बढ़े और उसमें चढ़ गए।

गेटमैन भी देखता रह गया पूरा नजारा

वीडियो में रेलवे क्रॉसिंग पर मौजूद गेटमैन भी इस पूरी घटना को देखते हुए दिखाई देता है। ट्रेन के रुकते ही परिवार के लोगों का तेजी से कोच में चढ़ना वहां मौजूद लोगों के लिए भी असामान्य दृश्य था। वीडियो बनाने वाले शख्स ने इसी बात को लेकर रेलवे की व्यवस्था पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या इस तरह रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन रोककर यात्रियों को सवार करने की अनुमति है।

‘ट्रेन को टेंपो बना दिया’

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने भी जमकर प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने घटना पर हैरानी जताई, तो कुछ ने पूरे मामले पर मजेदार अंदाज में टिप्पणी की। एक यूजर ने लिखा, “ट्रेन को टेंपो बना दिया।” वहीं दूसरे ने बिहार का जिक्र करते हुए कहा कि यहां कुछ भी हो सकता है। कुछ यूजर्स ने सीधे लोको पायलट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कार्रवाई की मांग की। एक कमेंट में तो लोको पायलट को निलंबित करने तक की बात कही गई।

रेलवे से जांच की मांग

मामले को लेकर कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने रेलवे और संबंधित अधिकारियों को टैग करते हुए जांच की मांग की। एक यूजर ने रेल मंत्रालय से सवाल किया कि आखिर सड़क वाले रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन को यात्रियों के चढ़ने के लिए कैसे रोका गया। एक अन्य व्यक्ति ने जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि इस तरह आम लोगों का समय बर्बाद करना उचित नहीं है।

वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल

फिलहाल वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे घटनाक्रम की वजह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह भी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है कि ट्रेन वहां किस कारण रुकी थी और परिवार के सदस्यों को चढ़ने की अनुमति किस परिस्थिति में मिली। हालांकि, इस वीडियो ने रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन के अचानक रुकने और यात्रियों के इस तरह सवार होने को लेकर कई सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर लोग अब पूरे मामले की जांच और स्पष्ट जानकारी की मांग कर रहे हैं।

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ट्रेन टिकट बुकिंग में होने वाला है ऐतिहासिक बदलाव! अब चंद सेकंड में यात्रियों को मिलेगा टिकट, रेलवे का नया PRS सिस्टम मचाएगा तहलका

Indian Railways Reservation System: इंडियन रेलवे ट्रेन टिकट बुकिंग को आधुनिक बनाने और यात्रियों के लिए रिजर्वेशन को तेज एवं सुविधाजनक बनाने के लिए एक नया पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (PRS) शुरू करने जा रहा है। सेंटर फॉर रेलवे इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स (CRIS) द्वारा विकसित PRS लगभग चार दशकों से रेलवे रिजर्वेशन की रीढ़ रहा है। 1986 में शुरू किए गए इस सिस्टम ने पुराने मैनुअल रिजर्वेशन सिस्टम की जगह ली थी।

तब से यह ऑनलाइन और मोबाइल टिकट बुकिंग को सपोर्ट करने के लिए विकसित हुआ है। मई में राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर ने घोषणा की थी कि 40 साल पुराने PRS (Passenger Reservation System) सिस्टम को अगस्त से शुरू करके चरणों में अपग्रेड किया जाएगा।

यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत

नए सिस्टम के लागू होने के बाद टिकट बुकिंग, सीट उपलब्धता, वेटिंग लिस्ट, RAC और यात्रियों की पूछताछ से जुड़ी सेवाओं में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। सबसे खास बात यह है कि नया PRS मौजूदा सिस्टम की तुलना में कई गुना ज्यादा टिकट बुकिंग का दबाव संभाल सकेगा। रेलवे के मुताबिक, नया सिस्टम एक मिनट में 1.5 लाख से ज्यादा टिकट बुकिंग संभालने में सक्षम होगा।

जबकि मौजूदा सिस्टम की क्षमता करीब 32,000 टिकट प्रति मिनट बताई गई है। इसी सिस्टम के जरिए टिकट बुकिंग, टिकट कैंसिलेशन, सीट अलॉटमेंट, वेटिंग लिस्ट, RAC, रिजर्वेशन चार्ट और यात्रियों की पूछताछ जैसी कई महत्वपूर्ण सेवाएं संचालित होती हैं। अब रेलवे इस पुराने सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से नई तकनीक वाले PRS से बदलने की तैयारी कर रहा है।

भारी ट्रैफिक को संभालने की क्षमता

तत्काल टिकट के समय IRCTC वेबसाइट पर अचानक बढ़ने वाले भारी ट्रैफिक को संभालने में नया सिस्टम पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सक्षम हो सकता है। Indianexpress.com से बात करते हुए रेलवे बोर्ड के पब्लिक रिलेशंस (PR) के एडिशनल डायरेक्टर जनरल धर्मेंद्र तिवारी ने कहा कि नए सिस्टम में चरणबद्ध तरीके से बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। उन्होंने कहा कि हाल ही में लॉन्च की गई IRCTC बीटा वेबसाइट इसी बदलाव का हिस्सा है।

अधिकारी ने कहा कि यह बदलाव धीरे-धीरे किया जाएगा। पुराने PRS को पूरी तरह से बदलने से पहले नए सिस्टम का अलग-अलग यूजर लोड स्तरों पर चरणों में टेस्ट किया जाएगा। अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “नए यूजर-फ्रेंडली लुक और फील को चरण-दर-चरण लागू करने में लोड-आधारित टे्ट शामिल होगा, क्योंकि हम पुराने PRS से नए PRS की ओर बढ़ रहे हैं।”

भारतीय रेलवे में अभी पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम क्या है?

PRS एक कंप्यूटराइज्ड सिस्टम है जिसका उपयोग भारतीय रेलवे रिजर्व-टिकटों के मैनेज के लिए करता है। यह यात्रियों को टिकट बुक करने, बदलने और रद्द करने की सुविधा देता है। साथ ही सीट आवंटन, वेटलिस्ट, RAC स्टेटस, रिजर्वेशन चार्ट और यात्री पूछताछ को भी संभालता है। यह सिस्टम रेलवे रिजर्वेशन सेंटरों को ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म से जोड़ता है। इससे टिकट रिजर्वेशन की प्रक्रिया आसान और अधिक कुशल हो जाती है।

PRS ने रेलवे टिकट बुकिंग को कैसे बदला?

PRS ने मैनुअल रिजर्वेशन रजिस्टर और काउंटर-आधारित बुकिंग की जगह एक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम ले लिया। जैसे-जैसे रेलवे नेटवर्क का विस्तार हुआ। यह एक राष्ट्रव्यापी रिजर्वेशन प्लेटफॉर्म बन गया। इससे यात्री कंट्री-वाइड नेटवर्क फॉर कंप्यूटराइज्ड एन्हांस्ड रिजर्वेशन एंड टिकटिंग (CONCERT) के माध्यम से देश भर में अलग-अलग जगहों से ट्रेन टिकट बुक कर सकते हैं।

फिलहाल यात्री रेलवे रिजर्वेशन काउंटर, वेबसाइट और मोबाइल ऐप के माध्यम से रिजर्वेशन कर सकते हैं। ऑनलाइन बुकिंग इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) की वेबसाइट और मोबाइल ऐप के साथ-साथ RailOne ऐप के माध्यम से भी उपलब्ध है। इससे यात्री कहीं से भी टिकट बुक कर सकते हैं।

अगस्त से शुरू हुआ बदलाव, धीरे-धीरे होगा पूरा माइग्रेशन

रेलवे ने मई में घोषणा की थी कि करीब चार दशक पुराने PRS को चरणबद्ध तरीके से अपग्रेड किया जाएगा। इसका काम अगस्त से शुरू किया जाएगा। धर्मेंद्र तिवारी के मुताबिक, नए सिस्टम की ओर माइग्रेशन शुरू हो चुका है। रेलवे इसे एक साथ पूरी तरह बदलने के बजाय धीरे-धीरे और अलग-अलग चरणों में लागू कर रहा है।

पहले नए सिस्टम को अलग-अलग स्तर के यूजर लोड पर टेस्ट किया जाएगा। इसके बाद जैसे-जैसे सिस्टम स्थिर और सक्षम साबित होगा। फिर पुराने PRS से नए PRS की ओर माइग्रेशन बढ़ाया जाएगा। रेलवे के मुताबिक, नए सिस्टम के यूजर इंटरफेस और सुविधाओं को भी धीरे-धीरे बेहतर बनाया जा रहा है।

तत्काल टिकट वालों को मिल सकता है सबसे बड़ा फायदा

ट्रेन यात्रियों के लिए सबसे बड़ी चिंता अक्सर तत्काल टिकट बुकिंग को लेकर होती है। टिकट विंडो खुलते ही लाखों लोग एक साथ बुकिंग की कोशिश करते हैं। भारी ट्रैफिक के कारण वेबसाइट या ऐप पर दबाव बढ़ जाता है। IRCTC के अनुसार, 15 जुलाई को बीटा वेबसाइट लॉन्च होने के बाद टिकट बुकिंग की स्पीड में सुधार देखने को मिला।

महीने के पहले और दूसरे पखवाड़े की तुलना में पहले तीन मिनट के अंदर पूरी होने वाली तत्काल टिकट बुकिंग में 5 प्रतशित से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पांच मिनट के भीतर पूरी होने वाली बुकिंग में करीब 3 फीसदी और 30 मिनट के भीतर पूरी होने वाली बुकिंग में 2 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई।

प्रति मिनट 1.5 लाख की होगी बुकिंग

रेल मंत्रालय के अनुसार, अपग्रेड किया गया PRS प्रति मिनट 1.5 लाख से ज्यादा टिकट बुकिंग संभाल सकेगा। जबकि मौजूदा सिस्टम में यह क्षमता लगभग 32,000 टिकट की है। यह प्रति मिनट 40 लाख से ज्यादा पूछताछ को भी प्रोसेस करेगा। जबकि अभी यह संख्या लगभग 4 लाख है। नए सिस्टम में टिकट बुकिंग और पूछताछ के लिए कई भाषाओं वाला और इस्तेमाल में आसान इंटरफेस होगा। इसे रेलवे रिजर्वेशन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए ज्यादा स्केलेबिलिटी, फ्लेक्सिबिलिटी और भरोसेमंदता देने के लिए भी डिज़ाइन किया गया है।

नए सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी क्षमता होगी

रेल मंत्रालय के अनुसार:-

मौजूदा PRS: करीब 32,000 टिकट प्रति मिनट क्षमता है।

नया PRS: 1.5 लाख से ज्यादा टिकट काटने की प्रति मिनट क्षमता होगी।

मौजूदा पूछताछ क्षमता: करीब 4 लाख प्रति मिनट होगी।

नई पूछताछ क्षमता: 40 लाख से ज्यादा प्रति मिनट होगी।

इसका मतलब है कि नया सिस्टम टिकट बुकिंग के साथ-साथ ट्रेन, सीट और रिजर्वेशन से जुड़ी बड़ी संख्या में यात्रियों की पूछताछ भी एक साथ संभाल सकेगा।

देशभर में ऑनलाइन टिकट बुकिंग का दबाव कितना बढ़ गया है?

रेलवे के आंकड़े बताते हैं कि जून 2025 से जून 2026 के बीच PRS के जरिए 65.08 करोड़ आरक्षित टिकट बुक किए गए। इनमें से 57.90 करोड़ टिकट ऑनलाइन बुक हुए। यानी करीब 89 फीसदी आरक्षित टिकट ऑनलाइन माध्यम से बुक किए गए। इससे साफ है कि रेलवे की टिकट बुकिंग व्यवस्था अब तेजी से डिजिटल हो चुकी है। ऐसे में पुराने सिस्टम की क्षमता बढ़ाना रेलवे के लिए बेहद जरूरी हो गया है।

नई व्यवस्था में मिलेगा ज्यादा आसान और मल्टी-लैंग्वेज इंटरफेस

नए PRS में यात्रियों के लिए ज्यादा यूजर-फ्रेंडली और मल्टीलिंगुअल इंटरफेस देने की तैयारी है। यानी टिकट बुकिंग और पूछताछ को ज्यादा आसान बनाने के साथ-साथ अलग-अलग भाषाओं में सेवाएं उपलब्ध कराने पर भी जोर रहेगा। नए सिस्टम को ज्यादा स्केलेबल, फ्लेक्सिबल और भरोसेमंद बनाया जा रहा है। ताकि भविष्य में यात्रियों की संख्या और ऑनलाइन ट्रैफिक बढ़ने पर भी सिस्टम पर अचानक अत्यधिक दबाव न पड़े।

सिर्फ PRS ही नहीं, रेलवे का पूरा डिजिटल नेटवर्क हो रहा आधुनिक

CRIS ने यात्रियों की अलग-अलग जरूरतों के लिए कई डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं। इनमें UTS, NTES, IRCTC Rail Connect, RailOne, RailMadad, CoachMitra, Rail Sugam और Rail Rajbhasha शामिल हैं। इन प्लेटफॉर्म के जरिए यात्रियों को टिकट बुकिंग, ट्रेन की जानकारी, शिकायत दर्ज कराने और रेलवे से जुड़ी कई अन्य रेलवे से जुड़ी सर्विस मिलती हैं। नए PRS और इन डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच बेहतर टेक्नोलॉजी के तालमेल से रेलवे की ऑनलाइन सेवाओं को और मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।

40 साल पुराने सिस्टम से Next-Generation PRS तक

भारतीय रेलवे का PRS चार दशक पहले मैनुअल रिजर्वेशन की जगह इलेक्ट्रॉनिक टिकटिंग व्यवस्था लेकर आया था। अब वही सिस्टम एक और बड़े तकनीकी बदलाव की ओर बढ़ रहा है। अगर चरणबद्ध तरीके से हो रहा यह माइग्रेशन सफल रहता है, तो आने वाले समय में ट्रेन टिकट बुकिंग ज्यादा तेज, ज्यादा स्थिर और ज्यादा डिजिटल हो सकती है। यानी रेलवे के इस बदलाव का असली असर सिर्फ वेबसाइट की स्पीड पर नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों के रोजमर्रा के टिकट बुकिंग अनुभव पर दिखाई दे सकता है।

रेलवे के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, यात्रियों ने जून 2025 और जून 2026 के बीच PRS के ज़रिए 65.08 करोड़ रिजर्व्ड टिकट बुक किए। इनमें से 57.90 करोड़ टिकट (यानी 89 प्रतिशत) ऑनलाइन बुक किए गए थे। IRCTC ने कहा कि 15 जुलाई को अपनी बीटा वेबसाइट लॉन्च करने के बाद टिकट बुकिंग की स्पीड में सुधार हुआ है।

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महीने के पहले और दूसरे पखवाड़े (15-15 दिन के समय) की तुलना करने पर पहले तीन मिनट के अंदर पूरी होने वाली तत्काल बुकिंग में 5 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। पांच मिनट के अंदर पूरी होने वाली बुकिंग में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जबकि 30 मिनट के अंदर पूरी होने वाली बुकिंग में 2 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई।

RAC यात्रियों के लिए खुशखबरी! अब AC कोच में मिलेगी पूरी बेडरोल किट, रेलवे ने जारी किया निर्देश

ट्रेन के एसी कोच में RAC टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों के लिए अच्छी खबर है। रेल मंत्रालय ने एसी कोच में RAC (रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसलेशन) टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों को लेकर नया निर्देश जारी किया है। मंत्रालय ने सभी रेलवे जोन से कहा कि, RAC टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों को भी यात्रा के दौरान पूरी बेडरोल किट, यानी चादर, कंबल और तकिया समेत सभी जरूरी सामान उपलब्ध कराया जाए। ये फैसला लगातार मिल रही शिकायतों के बाद दोबारा स्पष्ट किया गया है, ताकि RAC यात्रियों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

रेल मंत्रालय ने बताया कि, उसे लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि RAC टिकट पर सफर करने वाले कई यात्रियों को चादर, कंबल और तकिया जैसी बेडरोल सुविधाएं नहीं मिल रही हैं या पूरी किट उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। RAC में दो यात्रियों को एक ही बर्थ पर यात्रा करनी पड़ती है, जब तक उन्हें कन्फर्म बर्थ नहीं मिल जाती।

RAC यात्रियों को मिले बेडरोल

रेल मंत्रालय ने साफ किया कि, एसी चेयर कार को छोड़कर सभी एसी कोच में RAC टिकट पर सफर करने वाले हर यात्री को भी अन्य कन्फर्म यात्रियों की तरह पूरी बेडरोल किट दी जाए। मंत्रालय ने सभी रेलवे जोन को निर्देश दिया कि, इस नियम का सख्ती से पालन किया जाए, ताकि यात्रा के दौरान किसी भी यात्री को असुविधा का सामना न करना पड़े। अधिकारियों को निर्देश दिया कि, मौजूदा नियमों का पूरी तरह पालन किया जाए। मंत्रालय ने कहा कि, एसी कोच में यात्रा करने वाले सभी पात्र RAC यात्रियों को बिना किसी भेदभाव के चादर, कंबल और अन्य बेडरोल का सामान उपलब्ध कराया जाए, ताकि सभी को समान सुविधा मिल सके।

बेड ना मिलने पर किससे करे शिकायत

रेलवे का कहा कि, नए निर्देशों का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना कि RAC यात्रियों को भी यात्रा के दौरान पूरी बेडरोल सुविधा मिले और उन्हें किसी तरह की असुविधा न हो। अगर RAC टिकट पर एसी कोच में सफर के दौरान आपको चादर, कंबल या तकिया नहीं मिलता है, तो सबसे पहले कोच अटेंडेंट या टीटीई से इसकी मांग करें। यदि इसके बाद भी सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो आप रेलवे के शिकायत पोर्टल या हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

भारत का बॉर्डर रेल प्रोजेक्ट! चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर 45000 करोड़ खर्च कर बिछेगा रेलवे का जाल

Indian Rail Border Project: बदलती रीजनल मोबिलिटी और रणनीतिक चुनौतियों के बीच केंद्र सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। ‘ब्लूमबर्ग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी स्ट्रैटिजिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की कोशिशों के तहत चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगती अपनी सीमाओं पर रेलवे नेटवर्क के विस्तार और अपग्रेडेशन के लिए लगभग ₹45000 करोड़ ($4.7 बिलियन) के निवेश की योजना बना रहा है। आने वाले 18 से 24 महीनों के भीतर लागू होने वाली यह परियोजना अगले दो वर्षों के लिए नियोजित कुल रेलवे इंफ्रा आउटले का करीब 22 फीसदी हिस्सा है।

इन सीमावर्ती राज्यों में बिछेगा रेलवे का जाल

रिपोर्ट के मुताबिक इस डेवलपमेंट से जुड़े लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस खर्च का इस्तेमाल देश के संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों में नई पटरियां बिछाने, नए प्लेटफॉर्म बनाने और नेटवर्क को मजबूत करने के लिए किया जाएगा। इस योजना में पाकिस्तानी सीमा से लगते पश्चिमी राज्य पंजाब और राजस्थान, बांग्लादेश सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटे पश्चिम बंगाल और असम के रणनीतिक क्षेत्र, चीन सीमा के पास और सुदूर पर्वतीय क्षेत्र वाले हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं।

आपको बता दें कि ये नया प्लान भारत सरकार के सीमावर्ती क्षेत्रों में रेलवे नेटवर्क, पुल और सुरंगों बनाने के उस $3.4 बिलियन ($340 करोड़) के प्लान से भी बड़ा है, जिसकी जानकारी पहले सामने आई थी।

संवेदनशील सीमाओं पर बदलती रणनीतिक स्थितियां

सीमावर्ती कनेक्टिविटी पर भारत का ये फोकस तब सामने आया है जब पड़ोसी देशों के साथ संबंध नए फेज में आगे बढ़े हैं। 6 साल पहले हुई घातक झड़प के बाद चीन के साथ संबंधों में अब स्थिरता आई है। आपको बता दें कि पिछले साल पाकिस्तान के साथ एक ब्रीफ कॉन्फ्लिक्ट देखने को मिला था। इसके अलावा साल 2024 में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक उलटफेर ने भारत के पहले से स्थिर साझेदारी के संबंधों को जटिल बना दिया है।

नागरिक सुविधा के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स को मजबूती

इस भारी निवेश से डुअल यूजर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि ये सिविलियन रेलवे नेटवर्क होंगे जिनका इस्तेमाल आम नागरिकों की आवाजाही के लिए तो होगा ही, साथ ही आपात स्थिति में ये सैन्य लॉजिस्टिक्स को भी पूरा सहारा देंगे।

हिमालयी क्षेत्रों, सिलीगुड़ी कॉरिडोर और पूर्वोत्तर के राज्यों जैसी संवेदनशील सीमाओं तक उच्च क्षमता वाले, ऑल-वेदर रेल नेटवर्क को मजबूत करके ट्रूप मोबलाइजेशन टाइम को भी स्ट्रैटिजकली कम किया जा सकता है। इसके साथ ही रिजनल प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ यह अहम सप्लाई लाइन को भी सुरक्षित करता है।

सीमावर्ती बुनियादी ढांचे पर पीएम मोदी का जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संवेदनशील क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को लगातार प्राथमिकता दी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने इसे लेकर लगातार कदम उठाए हैं। पाकिस्तान सीमा के पास 1450 किलोमीटर नई सड़कें बनाई गई हैं। डोकलाम के करीब इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर है।

पिछले साल कश्मीर घाटी को बाकी भारत से जोड़ने वाले दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुल का उद्घाटन किया गया। पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर भारत में लगभग 1700 किलोमीटर नई रेल लाइनें जोड़ी गई हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों के इस्तेमाल के लिए 1962 से निष्क्रिय पड़े एयरसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से सक्रिय किया गया है।

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चीन की ओर से भी जारी है निर्माण

रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरी तरफ चीन ने भी 2017 में डोकलाम में हुए सैन्य गतिरोध के बाद से अपनी ओर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण काफी तेज कर दिया है। चीन अपनी सीमा में एयरपोर्ट और हेलीपोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है। चीन के इस विस्तार ने उपकरण और सैनिकों की तेजी से आवाजाही के जरिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की लॉजिस्टिक्स क्षमताओं को बढ़ाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अभी भारत के रेल मंत्रालय की ओर से इस निवेश योजना पर कोई आधिकारिक बयान या टिप्पणी नहीं आई है।

भारत में इस्तीफे जोर जबरदस्ती ही होते हैं

दुनिया के संभवतः किसी दूसरे देश में नैतिकता की उतनी बात नहीं होती होंगी, जितनी भारत में होती हैं। भारत ने दया, करुणा, सत्य, प्रेम, भाईचारे आदि के जितने प्रतीक गढ़े हैं, दुनिया के किसी और देश में उतने नहीं होंगे। भारत में तो एक सतयुग ही था, जिसमें सत्य हरिश्चंद्र थे। लेकिन यह भी सही है कि सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारे, करुणा, दया आदि से जितनी दूरी भारत में है उतनी शायद ही कहीं और होगी। इस पर लंबी बहस हो सकती है। इसलिए उसमें जाने की जरुरत नहीं है। लेकिन दुनिया के जिन देशों में सत्य और नैतिकता आदि का ढोल रोज नहीं बताया जाता है वहां लोग ज्यादा नैतिक होते हैं। वहां लोग नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं और अगर कोई अपराध किया है तो उसे भी स्वीकार करके सजा पाते हैं। भारत में कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेता है और अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया व्यक्ति भी अदालत में खड़े होकर कहता है कि वह बेकसूर है और उसका पूरा परिवार और ज्यादातर मामलों में पूरी जाति उसके बचाव में खड़ी होती है।

भारत की राजनीति में भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने का कोई सिद्धांत नहीं रहा है। नैतिक जिम्मेदारी लेकर कुछ मंत्रियों आदि ने जरूर इस्तीफे दिए, जिनकी आज तक चर्चा होती है। लाल बहादुर शास्त्री, माधवराव सिंधिया या नीतीश कुमार का जिक्र किया जाता है। यह संयोग है कि इन तीनों के इस्तीफे ट्रेन दुर्घटना को लेकर हुए थे। इनके रेल मंत्री रहते ट्रेन दुर्घटनाएं हुईं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया। यह अलग बात है कि रेल मंत्रालय में विफल होने के बाद भी इन सभी लोगों को दूसरे मंत्रालयों में अहम जिम्मेदारी मिली। लाल बहादुर शास्त्री तो बाद में प्रधानमंत्री बने। बहरहाल, भारत में गंभीर से गंभीर विफलता या आर्थिक अपराध में शामिल होने के आरोपों के बाद भी इस्तीफा कराना बड़ा मुश्किल होता है। आर्थिक अपराध के मामलों में तो अब गिरफ्तार होकर जेल जाने के बाद भी नेता इस्तीफा नहीं देते हैं। दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते अरविंद केजरीवाल ने कमाल की मिसाल बनाई। वे कई महीने जेल में रहे और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। हेमंत सोरेन ने थोड़ी शर्म दिखाई और गिरफ्तारी से चंद मिनट पहले इस्तीफा दे दिया। अगर गिरफ्तारी की बाध्यता नहीं होती तो वे भी इस्तीफा नहीं देते।

सवाल है कि ऐसा क्यों होता है कि भारत में केंद्र या राज्य का मंत्री या मुख्यमंत्री किसी भी विवाद में फंसने या अपनी कैसी भी विफलता के बाद इस्तीफा नहीं देते हैं? इसे दो पहलुओं से देख सकते हैं। एक आपराधिक मामला और दूसरा विफलता व नैतिकता का मामला। जहां तक आपराधिक मामलों में फंसने पर इस्तीफे का सवाल है तो वह इसलिए आसानी से नहीं होता है क्योंकि भारत में पहले से जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं ऐसे, सैकड़ों लोग सांसद और विधायक चुने गए हैं। सवाल है जब गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने और उनकी जानकारी सार्वजनिक होने के बावजूद जनता उनको चुन देती है तो चुने जाने के बाद किए गए किसी अपराध के लिए वे क्यों इस्तीफा देंगे? जब जनता ने उनको सांसद चुन दिया है तो वे केंद्र में मंत्री बनने के योग्य हैं और जनता ने विधायक चुना है तो वे राज्य में मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं। ऐसे में उनके और जनता के बीच में नैतिकता की बात कहां से आ गई! उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी अगर जनता ने चुना है तो वे वैसे ही किसी अन्य अपराध के मामले में भी क्यों इस्तीफा देंगे? तभी भारत में ऐसे मामलों में भी जोर जबरदस्ती ही इस्तीफा होता है। गिरफ्तार होने या गिरफ्तारी की नौबत आने या पार्टी व सरकार के प्रमुख की ओर से राजनीतिक नुकसान की आशंका देख कर दबाव डालने के बाद ही इस्तीफा होता है।

अब रही जिम्मेदारी के निर्वहन में विफलता की बात तो उसमें भी आजादी के बाद से ही यह परंपरा चलती आ रही है कि इस्तीफा जोर जबरदस्ती ही होगा। ध्यान रहे भारत में पहला हाई प्रोफाइल इस्तीफा वीके कृष्ण मेनन का हुआ था। चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर दबाव था कि वे इस्तीफा दें। लेकिन वे इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे। जब जन दबाव बहुत बढ़ा तो अंत में उन्होंने इस्तीफा दिया। हालांकि जयराम रमेश ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी है, ‘अ चेकर्ड ब्रिलियंसः द मेनी लाइव्स ऑफ वीके कृष्ण मेनन’, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि कृष्ण मेनन तो बहुत पहले इस्तीफा देने को तैयार थे लेकिन उन्हें रोका गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मानते थे कि चीन के साथ युद्ध में पराजय का मेनन से कोई संबंध नहीं है। फिर वे क्यों इस्तीफा देंगे।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर चल रही बातें सुन कर क्या कृष्ण मेनन के इस्तीफे की कहानी से समानता नहीं दिखती है? ध्यान रहे पिछले कई दिनों से कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान तो बहुत पहले इस्तीफा देना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री को लगता था कि पेपर लीक होने से उनका कोई लेना देना नहीं है, बल्कि उन्होंने तो पेपर लीक होने के तुरंत बाद सक्रियता दिखाई। सारे आरोपी पकड़े गए और रिकॉर्ड समय में दोबारा परीक्षा करा ली गई ताकि छात्रों का एक साल बरबाद न हो। इसके बाद भी उनका इस्तीफा हुआ तो उसका कारण यही है कि जन दबाव बहुत बढ़ गया यानी जोर जबरदस्ती से ही उनका इस्तीफा हुआ।

सोचें, पेपर लीक कितनी बड़ी विफलता है! एक मंत्री के कार्यकाल में दो बार नीट यूजी जैसी विशाल अखिल भारतीय परीक्षा के पेपर लीक हो जाएं तो उससे बड़ी विफलता क्या हो सकती है? आश्चर्य यह है कि 2024 के शुरू में बजट सत्र में पेपर लीक का कठोर कानून बना था और मई में पेपर लीक हो गया, उसके बाद भी जून में जब नई सरकार बनी तो फिर धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बना दिया गया! फिर 2026 के मई में नीट यूजी की परीक्षा का पेपर लीक हो गया और धर्मेंद्र प्रधान कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे।

यह सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का मामला नहीं है। यह भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का मामला है, जहां हर व्यक्ति चाहता है कि जवाबदेही और नैतिकता का तकाजा दूसरे पर लागू हो। अपनी जवाबदेही और नैतिकता का ध्यान किसी को नहीं रहता है। जोर जबरदस्ती न हो तो न वीके कृष्ण मेनन का इस्तीफा होता और न धर्मेंद्र प्रधान का। याद करें कैसे कारगिल युद्ध के समय ताबूत घोटाला खुला था और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने कितनी मुश्किल से इस्तीफा दिया था। ऐसे ही दबाव नहीं होता और पार्टियों को चुनावी नुकसान का भय नहीं होता तो न ए राजा इस्तीफा देते और न अशोक चव्हाण की विदाई होती। महिलाओं का दबाव नहीं होता तो एमजे अकबर का भी इस्तीफा नहीं होता। सोचें, इंगलैंड में क्रिस्टीन किलर कांड में एक मंत्री लॉर्ड प्रोफ्यूमो का नाम आया था तो प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन की पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। भारत में मी टू के उतने बड़े मुद्दे में एमजे अकबर फंसे तो उनका भी इस्तीफा मुश्किल से हुआ और दुनिया के सबसे बड़े सेक्स अपराधी एपस्टीन के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद भी हरदीप पुरी का इस्तीफा नहीं हुआ।

Ravneet Singh: केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का इस्तीफा मंजूर, छोड़ा रेल राज्यमंत्री का पद

केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस्तीफा तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शुक्रवार को पंजाब भाजपा के वरिष्ठ नेता रवनीत सिंह का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया। हालांकि, उनके इस्तीफे की आधिकारिक वजह अभी सामने नहीं आई है। माना जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले उनकी राज्य की राजनीति में सक्रिय वापसी की अटकलों के बीच यह फैसला लिया गया है। रवनीत सिंह का राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल जून में ही समाप्त हो गया था। वह केंद्र सरकार में रेल मंत्रालय और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

खबर अपडेट हो रही है…

Udhna Station: सूरत के उधना स्टेशन पर बना देश का पहला स्टील सबवे! सिर्फ 8 घंटे में हुआ तैयार, रेलवे ने रचा इतिहास

Udhna Station: भारतीय रेलवे ने इंफ्रास्ट्रक्चर और यात्री सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा काम कर दिखाया है। गुजरात में सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर रेलवे पटरियों के नीचे देश का पहला स्टील पैदल यात्री सबवे बनाने में सफलता हासिल हुई है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्टके मुताबिक, पश्चिम रेलवे द्वारा चलाए गए इस पायलट प्रोजेक्ट को बिल्कुल नई और आधुनिक ट्रैक कट-एंड-कवर तकनीक का इस्तेमाल करके मात्र 8 घंटे के रिकॉर्ड समय में पूरा कर लिया गया है।

इस सबवे के बन जाने से अब प्लेटफॉर्म बदलने के लिए पटरियों को पार करने की खतरनाक प्रथा पर लगाम लगेगी और यात्रियों की सुरक्षा में बड़ा सुधार होगा।

कैसे हुआ यह कारनामा? जानिए क्या है ट्रैक Cut-and-Cover तकनीक

पश्चिम रेलवे के मंडल रेल प्रबंधक (DRM) पंकज सिंह ने इस प्रोजेक्ट के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस तकनीक के तहत निर्धारित ट्रैफिक ब्लॉक के दौरान रेलवे पटरी को काटा जाता है और पटरियों के नीचे की जमीन की खुदाई की जाती है। खुदाई के बाद फैक्ट्री में तैयार स्टील आर्च स्ट्रक्चर को नीचे स्थापित कर दिया जाता है और फिर गड्ढे को भरकर पटरी को तुरंत चालू स्थिति में बहाल कर दिया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड 8 घंटे के भीतर पूरा करने के लिए डिजाइन किया गया था ताकि ट्रेन संचालन पर कम से कम असर पड़े। रेलवे अधिकारियों के मुताबिक इस काम को तय 8 घंटे की विंडो में बिना किसी बड़े ट्रेन प्रभाव के पूरा कर लिया गया।

इस ऑपरेशन के दौरान गुजरात के उधना को महाराष्ट्र के जलगांव से जोड़ने वाली रेलवे पटरियों को अस्थायी रूप से हटाया गया, मिट्टी की खुदाई की गई, प्रीफैब्रिकेटेड स्टील आर्च स्ट्रक्चर को रखा गया और फिर लाइन को तुरंत बहाल कर दिया गया।

कितना बड़ा है यह स्टील सबवे?

पारंपरिक प्रबलित सीमेंट कंक्रीट संरचनाओं की तुलना में इसके निर्माण में काफी कम समय लगा है। इसकी लंबानी करीब 12 मीटर, चौड़ाई 4.8 मीटर और ऊंचाई 2.7 मीटर है। इसमें स्टील आर्च और प्रीकास्ट कंक्रीट नींव का इस्तेमाल किया गया है। अधिकारियों ने बताया कि फैक्ट्री में तैयार संरचना होने के कारण गुणवत्ता बेहतर रही और ट्रैक ब्लॉक की समयसीमा को न्यूनतम करने में मदद मिली।

उधना स्टेशन पर क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

उधना रेलवे स्टेशन पर रोजाना करीब 10000 यात्री आवाजाही करते हैं। त्योहारों के सीजन में यहां यात्रियों की संख्या में भारी उछाल आता है। इस साल की शुरुआत में ईरान संघर्ष के दौरान जब बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओडिशा समेत अन्य राज्यों के प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों को लौटे थे तब उधना स्टेशन पर यात्रियों की संख्या रोजाना 30000 को पार कर गई थी।

पटरियों को पार करके प्लेटफॉर्म बदलना या बाईपास लाइन पर जाना बेहद खतरनाक होता है, खासकर उन जगहों पर जहां मुड़े हुए ट्रैक होते हैं और विजिबिलिटी सीमित होती है। उधना बाईपास लाइन पर भी ऐसी ही खतरनाक स्थिति बनी रहती थी, जिससे अक्सर दुर्घटनाएं होती थीं। इसी खतरे को देखते हुए और यात्रियों व कुलियों को सुरक्षित प्लेटफॉर्म बदलने की सुविधा देने के लिए रेल मंत्रालय की मंजूरी के बाद इस तकनीक को अपनाया गया।

देश भर के व्यस्त स्टेशनों पर लागू हो सकता है यह मॉडल

पश्चिम रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उधना में इस पायलट प्रोजेक्ट की शानदार सफलता के बाद अब देश भर के अन्य व्यस्त रेलवे स्टेशनों और रेल सेक्शनों पर भी इस तरह के स्टील सबवे बनाने का रास्ता साफ हो सकता है। एक बार इस सबवे के पूरी तरह से चालू हो जाने के बाद उधना में बाईपास लाइन पर खतरनाक तरीके से पटरी पार करने की समस्या खत्म हो जाएगी और दुर्घटनाओं का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा।

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