अफगानिस्तान जाने की तैयारी…TTP आतंकी से चैट और भारत पर हमले की साजिश, बंगाल का युवक गिरफ्तार

बेंगलुरु पुलिस ने पश्चिम बंगाल के 25 साल के एक युवक को हिरासत में लिया है। उस पर आरोप है कि उसने आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के एक सदस्य से संपर्क करने की कोशिश की। पुलिस के मुताबिक, युवक ने संगठन में शामिल होने और पाकिस्तान की सेना व भारत के खिलाफ जवाबी हमले की योजना को लेकर बातचीत करने की कोशिश की थी।

युवक को पुलिस ने किया गिरफ्तार 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी की पहचान पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के नाओपारा गांव निवासी असाफुल मल्लिक के रूप में हुई है। पुलिस ने उसे बेंगलुरु के जिगनी इलाके से हिरासत में लिया। उस पर संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों और आतंकी संगठनों से संपर्क रखने का आरोप है।

पुलिस के मुताबिक, बोम्मासंद्रा इंडस्ट्रियल एरिया में गश्त के दौरान अधिकारियों को मल्लिक की संदिग्ध गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद पुलिस ने उसे रोककर पूछताछ की। पूछताछ में मल्लिक ने कथित तौर पर बताया कि वह पाकिस्तान में मुसलमानों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई से नाराज था। उसका दावा था कि वहां मस्जिदों और आम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, मल्लिक इजरायल-फिलिस्तीन विवाद को लेकर पाकिस्तान के रुख से भी नाराज था। आरोप है कि उसे इस तरह से उकसाया जा रहा था कि अगर भारत में मुसलमानों को किसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़े, तो वह उसके जवाब में कार्रवाई करे।

टीटीपी के संपर्क में था

पुलिस का दावा है कि मल्लिक ने फेसबुक के जरिए अफगानिस्तान के रहने वाले इमरान हैदर नाम के एक व्यक्ति से संपर्क किया था। जांच एजेंसियों को शक है कि हैदर का संबंध आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से हो सकता है। जांचकर्ताओं के मुताबिक, मल्लिक ने अफगानिस्तान जाने में मदद के लिए हैदर से संपर्क किया था। उसने अफगानिस्तान जाने के लिए वीजा का आवेदन भी किया था। हालांकि, बाद में पैसों की कमी और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उसने यह योजना छोड़ दी।

इसके बाद पुलिस ने मल्लिक का मोबाइल फोन जांच के लिए अपने कब्जे में लिया। पुलिस के अनुसार, फोन में मल्लिक और हैदर के बीच हुई चैट, कई वॉयस कॉल और ऑडियो बातचीत के रिकॉर्ड मिले हैं। जांचकर्ता अब इन चैट, रिकॉर्डिंग और फोन में मिली दूसरी सामग्री की जांच कर रहे हैं। इसका मकसद यह पता लगाना है कि मल्लिक का हैदर और टीटीपी से कथित संपर्क कितना गहरा था। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि दोनों के बीच हुई बातचीत में भारत या पाकिस्तानी सेना के खिलाफ किसी हमले की कोई ठोस योजना बनाई गई थी या नहीं।

Independence Day 2026: तेरी मिट्टी से लेकर संदेशे आते हैं तक…, देशभक्ति से भरपूर हैं हिंदी सिनेमा के ये गाने

Independence Day 2026: भारत इस साल अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। और इस मौके को मनाने का देशभक्ति गीतों से बेहतर तरीका क्या हो सकता है? आज़ादी के बाद के इतिहास में, देश ने ऐसे शानदार गाने दिए हैं जो हर भारतीय के अपने देश के प्रति प्यार और सम्मान को ज़ाहिर करते हैं।

अपनी देशभक्ति की भावना को जगाने के लिए इन गानों के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाएं। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसे क्लासिक गानों से लेकर ए.आर. रहमान और सुखविंदर सिंह के दिल को छू लेने वाले गाने ‘देश मेरे देश’ तक, ये गाने देश के प्रति आपके प्यार को ज़ाहिर करने के लिए एकदम सही हैं।

ऐ मेरे वतन के लोगों

भारतीय देशभक्ति गीतों की कोई भी प्लेलिस्ट लता मंगेशकर के इस क्लासिक गाने के बिना पूरी नहीं हो सकती। 1962 के भारत-चीन युद्ध में अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों के सम्मान में लता मंगेशकर ने इसे पहली बार 1963 में लाइव गाया था। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को सी. रामचंद्र ने कंपोज़ किया था और कवि प्रदीप ने लिखा था।

देश मेरे देश

जब हम ‘द लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ फ़िल्म की बात करते हैं, तो सबसे पहले यही गाना याद आता है। ए.आर. रहमान का बनाया यह दिल को छू लेने वाला गाना सुखविंदर सिंह ने गाया है। ए.आर. रहमान ने ‘माँ तुझे सलाम’ जैसे कई देशभक्ति वाले गाने बनाए हैं, लेकिन देश की आज़ादी के लिए अपनी जान देने वालों को सम्मान देने के लिए ‘देश मेरे देश’ एक बेहतरीन गाना है।

ऐ वतन

आलिया भट्ट की फ़िल्म ‘राज़ी’ में पाकिस्तान में मौजूद एक भारतीय जासूस की कहानी दिखाई गई थी। ‘ऐ वतन’ गाने ने फ़िल्म के मुख्य विषयों—देश के लिए त्याग और प्रेम—को बखूबी दर्शाया है।

तेरी मिट्टी

मनोज मुंतशिर के लिखे और बी प्राक के संगीतबद्ध किए गए गाने ‘तेरी मिट्टी’ को सुनकर इस स्वतंत्रता दिवस पर आपकी आँखों में ज़रूर आँसू आ जाएँगे। यह गाना उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। यह गाना 2019 की फ़िल्म ‘केसरी’ का हिस्सा था।

‘ये जो देश है तेरा’

फिल्म ‘स्वदेश’ के इस गाने में ए.आर. रहमान की आवाज़ और जावेद अख्तर के बोलों ने लोगों के अपने देश के लिए प्यार और लगाव को बखूबी दिखाया है। बैकग्राउंड में बजती शहनाई गाने में पुरानी यादों का एहसास जगाती है। ‘ये जो देश है तेरा’ गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस की प्लेलिस्ट का एक ज़रूरी हिस्सा बन गया है।

संदेशे आते हैं – बॉर्डर

फिल्म ‘बॉर्डर’ का ‘संदेशे आते हैं’ आज भी लोगों के दिलों में बसा है। ये देशभक्ति गानों की लिस्ट में खास जगह रखता है। गाने में सैनिकों और उनके परिवारों के बीच की भावनाओं को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। इसे बॉर्डर 2 में रीक्रिएट भी किया गया है।

तो, इस स्वतंत्रता दिवस पर आप अपनी प्लेलिस्ट में कौन से गाने शामिल कर रहे हैं?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान से लड़ाई के बाद अमेरिका का इलाका हो जाएगा! डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बारे में बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि ईरान से लड़ाई खत्म होने के बाद वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिका का इलाका घोषित करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया का यह अहम समुद्री रास्ता अमेरिकी सेना के नियंत्रण में है।

रिपब्लिकन उम्मीदवारों की रैली में ट्रंप ने कई बातें कहींं

लॉन्ग आईलैंड में रिपब्लिकन उम्मीदवारों की रैली में ट्रंप ने ईरान से चल रही लड़ाई के बारे में कई बाते कहीं। उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिकी इलाका घोषित करने का ऐलान वह ईरान की पराजय के बाद करेंगे। उन्होंने कहा, “ईरान को पूरी तरह हराने के बाद जल्द ही मैं स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिका का इलाका घोषित कर दूंगा।”

ट्रंप ने कहा कि ईरान लड़ाई में बुरी तरह से हार रहा है

ट्रंप ने यह भी कहा कि लड़ाई में ईरान बुरी तरह से हार रहा है। उन्होंने सैन्य शक्ति के इस्तेमाल के अपने सरकार के फैसले को भी सही बताया। उन्होंने कहा, “मैंने उससे ज्यादा सेना की तैनाती की है, जितना मैं पहले चाहता था।” उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए लगातार दबाव बनाना जरूरी था।

अमेरिका किसी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा

अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर यह दोहराया कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा। अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल समझौते के संकेत नहीं दिख रहे है। 17 जून को दोनों देशों के बीच शांति को लेकर सहमति बनी थी। लेकिन, यह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई।

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते में दो सबसे बड़ी बाधा

अमेरिका और ईरान के बीच समझौता नहीं होने की दो बड़ी वजहें हैं। पहला, अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूरी तरह से रोक लगाना चाहता है। इसके लिए ईरान तैयार नहीं है। दूसरा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान अपना नियंत्रण चाहता है। अमेरिका इसके लिए भी तैयार नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनियाभर में क्रूड ऑयल की सप्लाई का एक बड़ा समुद्री रास्ता है।

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पहले भी ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बयान दे चुके है्ं

ऐसा पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मजु को अमेरिका का इलाका बनाने की बात कही है। उन्होंने मार्च में भी कहा था कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नाम बदलकर ‘स्ट्रेट ऑफ अमेरिका’ किया जा सकता है। भारत और चीन देशों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज काफी अहम है। भारत के क्रूड इंपोर्ट का बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है।

दावा- चीनी सामान भारत के रास्ते अमेरिका भेजा जा रहा:टैरिफ से बचने की कोशिश; अमेरिकी रिपोर्ट में पुणे, गुजरात और चेन्नई नेटवर्क का हिस्सा

अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए चीनी प्रोडक्ट्स को भारत के रास्ते अमेरिकी बाजारों में पहुंचाया जा रहा है। यह दावा व्हाइट हाउस की रिपोर्ट ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज, स्कोप एंड कॉस्ट्स’ में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से आने वाले सामान या पार्ट्स को पहले भारत समेत दूसरे एशियाई देशों में भेजा जाता है। वहां उन्हें प्रोसेस, असेंबल या किसी दूसरे प्रोडक्ट में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद तैयार सामान को अमेरिका निर्यात किया जाता है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इससे चीन पर लगाए गए टैरिफ से बचने का रास्ता मिल सकता है। रिपोर्ट में इसके लिए दुनिया भर में ट्रेड रूट्स का नेटवर्क बनने की बात कही गई है। भारत के पुणे, गुजरात और चेन्नई को चीन से आने वाले सामान के एक अहम रास्ते के तौर पर बताया गया है। रिपोर्ट में यहां बनने वाले इंडस्ट्रियल पंप और कंप्रेसर में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल होने की संभावना का खास तौर पर जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में रूट नेटवर्क को ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए अमेरिका भेजने के लिए इस्तेमाल हो रहे रूट नेटवर्क को रिपोर्ट में ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया है। इसका मतलब शहरों की सुंदरता या बदसूरती से नहीं है। यह शब्द अलग-अलग देशों के ऐसे औद्योगिक शहरों के लिए इस्तेमाल किया गया है, जहां एक जैसे प्रोडक्ट बनते हैं और वे अमेरिकी बाजार में एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं। भारत के मामले में रिपोर्ट ने पुणे, गुजरात और चेन्नई की तुलना अमेरिका के ओहायो राज्य के सिनसिनाटी, डेटन और कोलंबस से की है। इन अमेरिकी शहरों में भी पंप, कंप्रेसर और दूसरे औद्योगिक सामान का उत्पादन और कारोबार होता है। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर तीसरे देशों के जरिए कम टैरिफ पर सामान अमेरिका पहुंचता है, तो वहां के स्थानीय निर्माताओं को नुकसान हो सकता है। अमेरिकी कंपनियों को कम कीमत वाले आयात से मुकाबला करना पड़ सकता है। इसका असर उत्पादन, ऑर्डर और नौकरियों पर भी पड़ सकता है। मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड का भी जिक्र व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में सिर्फ भारत का जिक्र नहीं है। इसमें मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड के उन इलाकों का भी जिक्र है, जहां बड़े पैमाने पर सामान बनाया और दूसरे देशों को भेजा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे रास्तों से हर साल अरबों डॉलर का सामान अमेरिकी बाजार तक पहुंच सकता है, जिसमें चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल किया गया हो। क्या ये टैरिफ से बचने की कोशिश को साबित करता है? किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट का इस्तेमाल होना और चीन का सामान सिर्फ भारत के रास्ते अमेरिका भेजना, दोनों अलग बातें हैं। अगर भारत में किसी प्रोडक्ट की असली मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और उस पर काफी काम हो रहा है, तो उसे सिर्फ चीन का सामान घुमाकर अमेरिका भेजना नहीं माना जा सकता। इसलिए यह देखा जाता है कि प्रोडक्ट बनाने में असल काम और प्रोडक्ट की कीमत में कितना हिस्सा किस देश में तैयार हुआ है। सिर्फ किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट लगा होने से यह साबित नहीं होता कि टैरिफ से बचने की कोशिश हुई है। आज की ग्लोबल सप्लाई चेन में एक प्रोडक्ट के अलग-अलग पार्ट कई देशों में बनते हैं और उसकी आखिरी असेंबली किसी दूसरे देश में हो सकती है। अमेरिका अब AI और डेटा से संदिग्ध शिपमेंट पकड़ेगा रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका तीसरे देशों के जरिए टैरिफ से बचने की कोशिशों पर निगरानी बढ़ा रहा है। व्हाइट हाउस ने सीमा पर आने वाले सामान की जांच में टेक्नोलॉजी और डेटा एनालिसिस के ज्यादा इस्तेमाल की बात कही है। रिपोर्ट में ऐसे AI सिस्टम का भी जिक्र है, जो अमेरिकी कस्टम अधिकारियों को संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करने में मदद कर सकता है। इसका मकसद पूरी सप्लाई चेन को ट्रैक करना है। —————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी सर्वे-10 में 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं: भारतीयों के लिए रूस सबसे अहम पार्टनर, पाकिस्तानियों की पहली पसंद चीन 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं, ये बात अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में सामने आई है। इंडियंस भी अपना सबसे बड़ा दुश्मन पाकिस्तान को ही मानते हैं। सर्वे में कहा गया कि दोनों देशों के लोग पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन भरोसे की कमी है। पूरी खबर पढ़ें…

हाथों में कटोरा लेकर आजादी मना रहा 80 साल का पाकिस्तान! कंगाली के ये निशान बयान कर रहे उसके असली हालात

पाकिस्तान को बने करीब 80 साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था आज भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के कर्ज पर निर्भर है। पिछले कई दशकों में पाकिस्तान को कई बार कर्ज और आर्थिक सुधारों के लिए मदद मिली है। इसके बावजूद देश बार-बार भुगतान संकट में फंसता रहा है और उसे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आईएमएफ का सहारा लेना पड़ता है। फिलहाल पाकिस्तान करीब 7 अरब डॉलर के IMF प्रोग्राम के तहत है। वहीं, देश पर सरकारी कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था के कुल आकार यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 70 फीसदी है।

सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने रक्षा पर अपना खर्च बढ़ाया है, जबकि विकास से जुड़े कामों पर खर्च काफी सीमित है। आईएमएफ के हालिया कार्यक्रम से पाकिस्तान को 2023 के लगभग डिफॉल्ट की स्थिति के बाद अपनी विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक स्थिर करने में मदद मिली है। हालांकि, देश की कई पुरानी आर्थिक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। इन्हीं समस्याओं के कारण पाकिस्तान को बार-बार आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ता है।

पाकिस्तान में टैक्स से होने वाली कमाई कम है, निर्यात का दायरा सीमित है और कर्ज चुकाने में सरकार का बड़ा पैसा चला जाता है। इसके अलावा, ऊर्जा क्षेत्र की हालत भी खराब है और देश अपनी जरूरतों के लिए लगातार विदेशी कर्ज और आर्थिक मदद पर निर्भर रहता है। ऐसे में पाकिस्तान जब अपनी आजादी की 80वीं सालगिरह मना रहा है, तो बड़ा सवाल यह है कि उसे बार-बार आईएमएफ के पास क्यों जाना पड़ता है। साथ ही, कई वर्षों से चल रहे आर्थिक सुधार कार्यक्रम आखिर इस कर्ज के चक्र को खत्म करने में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं।

पाकिस्तान 25 बार आईएमएफ के पास जा चुका है

आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान 1950 में इस संस्था का सदस्य बना था। इसके बाद से वह 25 बार आईएमएफ के साथ अलग-अलग समझौते कर चुका है। इन समझौतों में कई तरह के कर्ज कार्यक्रम शामिल हैं। हालांकि, इनमें से हर कार्यक्रम को आर्थिक संकट से बाहर निकालने वाला बेलआउट पैकेज नहीं कहा जा सकता। फिर भी, बार-बार आईएमएफ की मदद लेने से पता चलता है कि पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझता रहा है।

पाकिस्तान का मौजूदा ‘विस्तारित कोष सुविधा’ कार्यक्रम करीब 7 अरब डॉलर का है। इसे सितंबर 2024 में 37 महीने के लिए मंजूरी दी गई थी। इससे पहले 2023 में पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की ‘स्टैंडबाय व्यवस्था’ मिली थी। उस समय देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम हो रहा था और पाकिस्तान के कर्ज न चुका पाने यानी डिफॉल्ट का खतरा बढ़ गया था।

आईएमएफ ने मई 2026 में पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक कार्यक्रम की समीक्षा पूरी की। इसके बाद करीब 1.1 अरब डॉलर की एक और कर्ज की किस्त जारी करने को मंजूरी दी गई। आईएमएफ के मुताबिक, अलग ‘लचीलापन और स्थिरता सुविधा’ के तहत मिलने वाली रकम को जोड़ने पर दोनों कार्यक्रमों के तहत पाकिस्तान को अब तक करीब 4.8 अरब डॉलर जारी किए जा चुके थे।

इसी आर्थिक स्थिति के बीच पाकिस्तान अपनी आजादी के 80वें साल में प्रवेश कर रहा है। आईएमएफ के नए कार्यक्रमों से देश को कुछ समय के लिए आर्थिक स्थिरता जरूर मिली है, लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को बार-बार संकट में डालने वाली बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।

पाकिस्तान के हालात हैं बेहद खराब

पाकिस्तान की सबसे बड़ी आर्थिक समस्याओं में से एक लगातार विदेशी मुद्रा की कमी रही है। जब देश का आयात खर्च, पुराने कर्ज की किस्तें और दूसरी विदेशी देनदारियां उसकी निर्यात से होने वाली कमाई और विदेश से आने वाली रकम से ज्यादा हो जाती हैं, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को भुगतान संकट से बचने के लिए दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। पाकिस्तान के आर्थिक इतिहास में यह स्थिति बार-बार देखने को मिली है। हर कुछ साल बाद देश के सामने विदेशी मुद्रा का संकट खड़ा होता है और उसे आईएमएफ से मदद लेनी पड़ती है।

2023 में पाकिस्तान डिफॉल्ट के करीब पहुंच गया था। इसके बाद सितंबर 2024 में आईएमएफ ने उसके लिए एक नया आर्थिक कार्यक्रम मंजूर किया। करीब 7 अरब डॉलर के इस कार्यक्रम का मकसद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना, टैक्स से होने वाली कमाई बढ़ाना, सरकारी कंपनियों में सुधार करना और ऊर्जा क्षेत्र की स्थिति बेहतर करना था। इसके साथ ही, लंबे समय तक टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए बेहतर माहौल तैयार करने पर भी जोर दिया गया।

आजादी के 80 साल बाद भी पाकिस्तान का आईएमएफ के एक बड़े कार्यक्रम पर निर्भर रहना बताता है कि देश की कई पुरानी आर्थिक कमजोरियां अब तक दूर नहीं हो पाई हैं।

कछुए की चाल से बढ़ रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान की आर्थिक रिकवरी अभी भी बहुत धीमी है। आईएमएफ के जुलाई 2026 के अनुमान के मुताबिक, 2026 में पाकिस्तान की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 3.6 फीसदी रहने की उम्मीद है। वहीं, खुदरा महंगाई करीब 7.2 फीसदी रह सकती है। 2025 में पाकिस्तान की कुल अर्थव्यवस्था का आकार करीब 407.8 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया था। आईएमएफ ने मई 2026 की समीक्षा में कहा था कि वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर में सुधार हुआ है। महंगाई भी नियंत्रण में रही और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की दिशा में उम्मीद से बेहतर काम हुआ। हालांकि, आईएमएफ ने यह भी चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के सामने आगे भी अनिश्चितता बनी हुई है और जोखिम कम नहीं हुए हैं।

पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी बढ़ा

पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियों का एक संबंध देश में सेना की बढ़ती राजनीतिक ताकत से भी जोड़ा जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स ने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को पाकिस्तान की विदेश नीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली शख्सियतों में से एक बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनका प्रभाव अब सिर्फ सैन्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में भी उनकी भूमिका बढ़ गई है।

2025 में फील्ड मार्शल बनने के बाद आसिम मुनीर की स्थिति और मजबूत हुई है। इसी बीच, आईएमएफ के आर्थिक कार्यक्रम के तहत वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की जरूरत के बावजूद पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पाकिस्तान सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 18 फीसदी ज्यादा है। दूसरी ओर, सरकार ने विकास से जुड़े कामों के लिए सिर्फ 1 लाख करोड़ रुपये का संघीय बजट रखा है। इससे साफ है कि आर्थिक दबाव के बावजूद पाकिस्तान में रक्षा खर्च को विकास खर्च की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।

अमेरिकी सर्वे-10 में 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं:भारतीयों के लिए रूस सबसे अहम पार्टनर, पाकिस्तानियों की पसंद चीन

अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के नए सर्वे में सामने आया है कि करीब 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं। वहीं भारतीय भी पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। सर्वे में दावा किया गया है कि दोनों देशों के लोग अपने पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं। लेकिन दोनों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। दूसरी ओर, भारत रूस को अपना सबसे बड़ा दोस्त मानता है। वहीं, पाकिस्तान ने चीन को अपना सबसे बड़ा सहयोगी देश माना है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान पर पॉजिटिव राय रखी प्यू के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पाकिस्तान को लेकर नेगेटिव सोच कोई नई बात नहीं है। हालांकि, भारत के अलग-अलग समुदायों में राय एक जैसी नहीं है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान के बारे में पॉजिटिव राय जताई। हिंदुओं में यह आंकड़ा 6% रहा। खतरे के सवाल पर भी अंतर दिखा। 34% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान को भारत का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक खतरा बताया, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 57% था। दूसरी ओर, सर्वे में पाकिस्तानियों की भारत को लेकर यह नेगेटिव सोच पाकिस्तान के अलग-अलग साजाजिक समूहों में ज्यादा दिखाई दी है। पहलगाम हमले के बाद रिश्ते और बिगड़े सर्वे में भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव का भी जिक्र है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें ज्यादातर पर्यटक थे। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया। इसके बाद भारत सरकार ने 1960 की सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला किया। सिंधु जल संधि पाकिस्तान के लिए खास तौर पर अहम है। पाकिस्तान की खेती और पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। 58% भारतीयों की रूस को लेकर पॉजिटिव राय भारत में 36% लोगों ने रूस को अपना सबसे जरूरी सहयोगी बताया। अमेरिका को 16% लोगों ने चुना। वहीं, पाकिस्तान में 75% लोगों ने चीन को अपना बड़ा सहयोगी माना। 12% ने सऊदी अरब को देश का दोस्त बताया। रूस चीन अमेरिका भारत की विदेश नीति किसी एक देश के साथ नहीं जुड़ी सर्वे से भारत की विदेश नीति की एक और अहम बात सामने आती है। भारत में किसी एक विदेशी देश को लेकर पाकिस्तान जैसी एकतरफा मजबूत पसंद नहीं दिखती। भारत की विदेश नीति में कई बड़े देशों के साथ एक साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ रूस के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध हैं। चीन के साथ सीमा पर तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देश कई मुद्दों पर साथ भी काम करते हैं। इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट की नीति से जोड़कर देखा जा सकता है। मल्टी-अलाइनमेंट यानी कई देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते रखना। यानी भारत किसी एक बड़े देश के खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते बनाए रखना चाहता है। ——————- पाकिस्तान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तानी PM की धमकी- पानी रोका तो मुंहतोड़ जवाब देंगे: कश्मीर पर रुख कभी नहीं बदलेंगे, मुनीर की लीडरशिप में हमने दुश्मन को हराया पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर भारत को एक बार फिर धमकी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर इसे रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

NSA अजीत डोभाल ने खोला पहलगाम हमले के दिन का सबसे बड़ा राज! प्लेन से उतरते ही पीएम मोदी ने उनसे पूछा था ये पहला सवाल

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुरंत प्रतिक्रिया के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि हमले के बाद पीएम मोदी भारत की ओर से जवाबी कार्रवाई तय करने से पहले यह जानना चाहते थे कि इस हमले के पीछे कौन जिम्मेदार है। अजीत डोभाल ने ये बातें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर बनने वाली डिस्कवरी की नई डॉक्यूमेंट्री में कही हैं। इस डॉक्यूमेंट्री में भारत के कई बड़े राजनीतिक नेताओं, सेना के अधिकारियों और सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों के बयान शामिल किए गए हैं। ये सभी लोग  ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से सीधे तौर पर जुड़े थे।

अजीत डोभाल ने बताई ये बात

‘एक्स’ पर शेयर की गई इस सीरीज की क्लिप में अजीत डोभाल ने बताया कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब की अपनी यात्रा बीच में छोड़कर भारत लौटे थे। भारत पहुंचते ही उन्होंने अधिकारियों से हमले की पूरी जानकारी मांगी। डोभाल के मुताबिक, प्रधानमंत्री के भारत लौटने के बाद एयरपोर्ट पर ही बैठक हुई। इस दौरान पीएम मोदी ने सबसे पहले घटना से जुड़े सभी तथ्यों के बारे में जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने पूछा कि पहलगाम हमले के पीछे कौन है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। अजीत डोभाल ने बताया कि प्रधानमंत्री ने उस समय साफ कर दिया था कि भारत हमले के जिम्मेदार लोगों की पहचान करेगा और उनके खिलाफ कार्रवाई करेगा।

अजीत डोभाल ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने जल्द ही यह साफ हो गया था कि पहलगाम हमले के पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में भारत की खुफिया एजेंसियों ने बहुत अच्छा काम किया। उनकी मदद से कम समय में हमले के जिम्मेदार लोगों को लेकर स्थिति साफ हो गई और भारत इस नतीजे तक पहुंच सका कि इसके पीछे कौन था।

ऑपरेशन सिंदूर अभी भी जारी है’

अजीत डोभाल ने यह भी बताया कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी भी जारी है, तो इसका मतलब क्या है। डोभाल के मुताबिक, प्रधानमंत्री का संदेश साफ है कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक आखिरी आतंकवादी का भी सफाया नहीं हो जाता। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अपने पहले बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।” इसे पाकिस्तान के लिए भारत का कड़ा संदेश माना गया था। इसका मतलब था कि भारत किसी भी आतंकी हमले को गंभीरता से लेगा और उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा। अजीत डोभाल के बयान से यह भी पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जवाबी सैन्य कार्रवाई का फैसला किस तरह लिया था।

पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की गई थी जान

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले के पीछे पाकिस्तान से जुड़े आतंकियों का हाथ बताया गया था। इसके कुछ दिनों बाद भारत ने 6-7 मई की रात ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया। इस कार्रवाई में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर अभियान चलाया। भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया। इस दौरान लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़े नौ आतंकी ठिकानों और हमले की तैयारी वाले स्थानों पर कार्रवाई की गई। भारत की इस कार्रवाई के बाद दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। करीब चार दिनों तक दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बना रहा। आखिरकार 10 मई को संघर्ष विराम पर सहमति बनी। यह सहमति तब हुई, जब पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक ने अपने भारतीय समकक्ष से संपर्क किया।

Batwara 1947 Review: विभाजन के दर्द के बीच इंसानियत ने कायम कि मिसाल, सनी देओल की फिल्म ने जीता लोगों का दिल

Batwara 1947 Review: 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक रहा है। इस विषय पर बनी फिल्मों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि कहानी कहीं धर्म, राजनीति और हिंसा के दायरे तक सीमित न रह जाए। Batwara 1947 की खासियत यह है कि राजकुमार संतोषी विभाजन की त्रासदी के बीच भी अपना ध्यान इंसान और उसके रिश्तों पर बनाए रखते हैं।

यह फिल्म सिर्फ भारत-पाकिस्तान की सीमा बनने की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिनकी जिंदगी उस सीमा के साथ ही बदल गई। जो घर अपना था, वह अचानक पराया हो गया। जो पड़ोसी वर्षों से परिवार का हिस्सा था, वह धर्म के नाम पर अजनबी बना दिया गया। इसी माहौल में फिल्म इंसानियत का सबसे जरूरी सवाल सामने रखती है-क्या नफरत के दौर में भी इंसान दूसरे इंसान के लिए खड़ा हो सकता है?

सनी देओल के करियर का नया चैप्टर

सनी देओल के लिए ‘कमबैक’ शब्द पिछले कुछ समय से लगातार इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन Batwara 1947 देखने के बाद लगता है कि यह सिर्फ वापसी नहीं, बल्कि उनके अभिनय के एक नए दौर की शुरुआत है। सिकंदर मिर्जा के किरदार में सनी देओल अपनी आवाज, व्यक्तित्व और गुस्से का प्रभावी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि उनका सबसे असरदार अभिनय उन सीन्स में दिखाई देता है, जहां वह ऊंची आवाज में नहीं, बल्कि अपनी आंखों और भावनाओं से बात करते हैं।

सिकंदर का गुस्सा सिर्फ हिंसा के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस इंसानियत के लिए है जो उसके आसपास खत्म होती जा रही है। एक बुजुर्ग हिंदू महिला को बचाने के लिए भीड़ के सामने खड़े होने वाला उसका किरदार फिल्म के मूल संदेश को मजबूती देता है।

शबाना आजमी का काम

शबाना आजमी की ‘माई’ इस कहानी का भावनात्मक केंद्र हैं। वह सिर्फ एक पीड़ित महिला नहीं हैं। उनके किरदार में आत्मसम्मान, जिद, हंसी, समझदारी और अपने घर से गहरा लगाव है। शबाना इस भूमिका को इतनी सहजता से निभाती हैं कि धीरे-धीरे माई किसी फिल्मी किरदार की बजाय अपने परिवार की किसी बुजुर्ग महिला जैसी महसूस होने लगती हैं। सनी देओल और शबाना आजमी के बीच का रिश्ता फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। धर्म की दीवारों के बीच पनपता मां-बेटे जैसा यह रिश्ता दिखाता है कि इंसानी रिश्ते किसी धर्म या सीमा के मोहताज नहीं होते।

करण देओल की एक्टिंग

सनी देओल के सामने स्क्रीन शेयर करना करण देओल के लिए आसान चुनौती नहीं थी। इसके बावजूद वह कई दृश्यों में आत्मविश्वास के साथ अपनी जगह बनाते हैं। उनकी संवाद अदायगी में विश्वास है और भावनात्मक तथा टकराव वाले दृश्यों में उनकी ऊर्जा दिखाई देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह अपने पिता की शैली को दोहराने के बजाय अपने किरदार के लिए अलग अंदाज तलाशते हैं।

प्रीति जिंटा और अली फजल का प्रभाव

प्रीति जिंटा की वापसी फिल्म में सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं जोड़ती, बल्कि कहानी के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देती है। अली फजल अपने शांत और संवेदनशील अभिनय से फिल्म की तीव्रता के बीच कुछ सुकून भरे पल लेकर आते हैं। वहीं अभिमन्यु सिंह का याकूब पहलवान कट्टर सोच का प्रतिनिधित्व करता है, जहां इंसान की पहचान से पहले उसका धर्म देखा जाता है। पूरी सपोर्टिंग कास्ट मिलकर उस दौर के टूटते समाज की तस्वीर को विश्वसनीय बनाती है।

1947 का लाहौर दिखा पर्दे पर

फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन, सिनेमैटोग्राफी, कॉस्ट्यूम, लोकेशन और बैकग्राउंड स्कोर मिलकर 1947 के लाहौर का माहौल तैयार करते हैं। राजकुमार संतोषी मूल कहानी को सिर्फ मंचीय प्रस्तुति की तरह शूट नहीं करते, बल्कि उसे बड़े पर्दे के लिए विस्तार देते हैं। गलियां, घर, भीड़ और बदलता सामाजिक माहौल फिल्म को एक मजबूत सिनेमाई पहचान देते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी का भावनात्मक असर और गहरा होता जाता है। क्लाइमैक्स के बारे में ज्यादा बताना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसका प्रभाव तभी महसूस होगा जब दर्शक उसे खुद देखें।

Batwara 1947 की सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह विभाजन की हिंसा दिखाते हुए भी नफरत को बढ़ावा नहीं देती। इसके बजाय यह इंसानियत को केंद्र में रखती है। फिल्म एक बेहद जरूरी सवाल छोड़ जाती है-जब पूरी दुनिया आपको किसी से नफरत करने की वजह दे रही हो, तब क्या आप फिर भी इंसानियत और प्रेम को चुन सकते हैं? सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी इस बार अपने गुस्से को ज्यादा संवेदनशील और परिपक्व रूप देती है। फिल्म का जवाब तलवार या हिंसा में नहीं, बल्कि रिश्तों और इंसानियत में मिलता है। हम फिल्म को 5 में से 4 स्टार रेटिंग देते हैं।

51 साल पहले भारत ने जीता था हॉकी विश्वकप, 1971 से 2023 तक ऐसा रहा है सफर

भारत को हॉकी विश्वकप जीते हुए 51 साल हो गए हैं। पिछले संस्करण में भारत मेजबान था और आशा थी कि वह इंतजार खत्म होगा लेकिन न्यूजीलैंड की टीम ने पेनल्टी शूटआउट में हराकर भारत को विश्वकप से बाहर कर दिया था। ओलंपिक में भारत ने सबसे ज्यादा मेडल इस खेल में जीते हों लेकिन विश्वकप में संघर्ष करना पड़ा है क्योंकि जब विश्वकप शुरु हुआ तब भारतीय हॉकी का स्तर ढलान पर था और एस्टरो टर्फ के आने के बाद भारतीय टीम कभी खड़ी ही नहीं हो पाई। जान लेते हैं कि भारतीय हॉकी टीम का सफर कैसा रहा-  

1971 बार्सीलोना

भारत और पाकिस्तान ने मिलकर मार्च 1969 में FIH परिषद की बैठक में फुटबॉल की तर्ज पर हॉकी विश्व कप कराने का प्रस्ताव रखा जिसे अगले साल ब्रसेल्स में हुई बैठक में मंजूरी मिली। पाकिस्तान को मेजबानी दी गई लेकिन 1971 में दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव के चलते पहला विश्व कप स्पेन के बार्सीलोना में हुआ।

पांच उपमहाद्वीपों की दस टीमों ने FIH के आमंत्रण पर इसमें भाग लिया।ओलंपिक की सबसे कामयाब टीम भारत पूल ए में फ्रांस, अर्जेंटीना, कीनिया और पश्चिम जर्मनी को हराकर शीर्ष पर रहा। सेमीफाइनल में पाकिस्तान ने भारत को 2-1 से हराया और फिर स्पेन को हराकर पहला विश्व कप जीता। भारत ने कीनिया को 2-1 से हराकर कांस्य पदक जीता।

1973 एम्सटर्डम :

एम्सटेलवीन के वेगनेर स्टेडियम पर खेले गए इस विश्व कप में मेजबान नीदरलैंड ने पेनल्टी शूटआउट में भारत को 4-2 से हराकर खिताब जीता ।भारत पूल ए में पांच जीत और तीन ड्रॉ के साथ पश्चिम जर्मनी के बाद दूसरे स्थान पर रहा।सेमीफाइनल में बी पी गोविंदा के गोल के दम पर भारत ने पाकिस्तान को हराया। फाइनल में अतिरिक्त समय तक मैच 2-2 से बराबर था लेकिन पेनल्टी शूटआउट में नीदरलैंड ने भारत को हराया।

1975 कुआलालम्पुर :

भारतीय हॉकी के विश्व कप इतिहास का सबसे सुनहरा अध्याय लिखा गया 15 मार्च 1975 को कुआलालम्पुर में जब फाइनल में अजित पाल सिंह की कप्तानी में भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से हराया।फाइनल में पाकिस्तान ने बढत बना ली थी लेकिन सुरजीत सिंह ने 44वें और अशोक कुमार ने 51वें मिनट में गोल करके भारत को खिताब दिलाया। पूल चरण में शीर्ष पर रहे भारत ने सेमीफाइनल में मलेशिया को मात दी थी। तब तक सात ओलंपिक स्वर्ण जीत चुकी भारतीय टीम का यह पहला विश्व कप खिताब था।

1978 ब्यूनस आयर्स :

गत चैम्पियन भारत बेहद निराशाजनक प्रदर्शन के बाद सेमीफाइनल तक नहीं पहुंच सका और छठे स्थान पर रहा। पूल चरण में भारत ने छह में से तीन मैच जीते और दो गंवाये जिसमें पश्चिम जर्मनी से 7.0 से मिली हार शामिल थी। पाकिस्तान ने नीदरलैंड को 3-2 से हराकर खिताब जीता और आस्ट्रेलिया को कांस्य पदक मिला।

1982 मुंबई :

अपने देश में पहली बार विश्व कप खेलते हुए भारत फिर अंतिम चार में नहीं पहुंच सका और पांचवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा। पाकिस्तान ने अपराजेय रहकर वानखेड़े स्टेडियम पर फाइनल में पश्चिम जर्मनी को 3-1 से हराकर तीसरी बार खिताब जीता। भारत के राजिंदर सिंह सीनियर ने टूर्नामेंट में सर्वाधिक 12 गोल दागे थे।

1986 लंदन :

इस विश्व कप में भारतीय टीम अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन के बाद 12वें और आखिरी स्थान पर रही लेकिन इसी टीम के एक सितारे मोहम्मद शाहिद ने अपने जबर्दस्त खेल से दुनिया को चौंका दिया। ड्रिबलिंग के जादूगर शाहिद को टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया।आस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को 2-1 से हराकर खिताब जीता जबकि पश्चिम जर्मनी तीसरे स्थान पर रहा । तीन बार का चैम्पियन पाकिस्तान 11वें स्थान पर रहा।

1990 लाहौर :

राजनीतिक तनाव, मेजबान दर्शकों की आक्रामकता और सुरक्षा चिंताओं के बीच भारतीय टीम ने परगट सिंह की कप्तानी में लाहौर में विश्व कप खेला। भारत दसवें स्थान पर रहा लेकिन इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आपा नहीं खोने के कारण FIH ‘फेयरप्ले’ पुरस्कार भारतीय टीम को मिला।नीदरलैंड ने पाकिस्तान को हराकर खिताब जीता जबकि आस्ट्रेलिया तीसरे स्थान पर रहा।

1994 सिडनी:

जूड फेलिक्स की कप्तानी में भारतीय टीम ने कृत्रिम टर्फ पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए पांचवां स्थान हासिल किया था। पाकिस्तान ने नीदरलैंड को पेनल्टी शूटआउट में 4-3 से हराकर खिताब जीता जबकि आस्ट्रेलिया तीसरे स्थान पर रहा।

1998 यूट्रेक्ट :

इस विश्व कप में पूरी तरह से यूरोपीय टीमों का दबदबा रहा। मेजबान नीदरलैंड ने स्पेन को हराकर तीसरा खिताब जीता जबकि जर्मनी तीसरे स्थान पर रहा। धनराज पिल्लै की कप्तानी वाली भारतीय टीम नीदरलैंड में परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने में नाकाम रही और निराशाजनक नौवें स्थान पर रही।

2002 कुआलालम्पुर :

पहली बार 16 टीमों की भागीदारी में हुए विश्व कप में जर्मनी ने आस्ट्रेलिया को हराकर पहली बार खिताब जीता जबकि नीदरलैंड तीसरे स्थान पर रहा। भारत नौ मैचों में तीन जीत, एक ड्रॉ और पांच हार के साथ दसवें स्थान पर रहा।

2006 मोंशेंग्लाबाख , जर्मनी :

दिलीप टिर्की की कप्तानी में भारतीय टीम पूल चरण में एक भी मैच नहीं जीत सकी और एकमात्र ड्रॉ दक्षिण अफ्रीका से खेलने के बाद आखिरी स्थान पर रही। क्लासीफिकेशन मैच में राजपाल सिंह के एक गोल से दक्षिण अफ्रीका को हराने के बाद 12 टीमों में 11वें स्थान पर रही। जर्मनी ने आस्ट्रेलिया को हराकर लगातार दूसरा खिताब जीता जबकि स्पेन तीसरे स्थान पर रहा।

2010 दिल्ली :

दिल्ली में हुए इस विश्व कप में खचाखच भरे मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम पर पूल चरण में पाकिस्तान को 4-1 से हराना ही मेजबान भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। पूल चरण में चौथे स्थान पर रही भारतीय टीम सेमीफाइनल में जगह नहीं बना सकी और आठवां स्थान हासिल किया। आस्ट्रेलिया ने जर्मनी को 2-1 से हराकर खिताब जीता जबकि नीदरलैंड तीसरे स्थान पर रहा।

 2014 द हेग :

पूल चरण में बेल्जियम, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया से करारी हार झेलने वाली भारतीय टीम नौवे स्थान पर रही। आकाशदीप सिंह ने टूर्नामेंट में पांच गोल किये । आस्ट्रेलिया ने नीदरलैंड को 6-1 से हराकर खिताब जीता और अर्जेंटीना तीसरे स्थान पर रहा।

2018 भुवनेश्वर :

हॉकी के गढ ओडिशा में पहली बार हुए विश्व कप में भारत ने पूल चरण में बेल्जियम जैसे दिग्गज को ड्रॉ पर रोका और दक्षिण अफ्रीका तथा कनाडा को हराकर शीर्ष पर रहा। मनप्रीत सिंह की कप्तानी वाली मेजबान टीम क्वार्टर फाइनल में नीदरलैंड से कड़े मुकाबले में 1-2 से हारकर छठे स्थान पर रही जो कई साल में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। बेल्जियम ने पेनल्टी शूटआउट में नीदरलैंड को हराकर खिताब जीता जबकि आस्ट्रेलिया तीसरे स्थान पर रहा।

2023 भुवनेश्वर और राउरकेला:

लगातार दूसरी बार अपनी मेजबानी में हुए विश्व कप में भारत पूल चरण में दूसरे स्थान पर रहा। क्रासओवर मैच में न्यूजीलैंड ने उसे पेनल्टी शूट आउट में हराया। हरमनप्रीत सिंह की कप्तानी में भारतीय टीम नौवे स्थान पर रही। जर्मनी ने बेल्जियम को शूटआउट में हराकर खिताब जीता जबकि नीदरलैंड तीसरे स्थान पर रहा।

UAE में छिपा था 13 हजार करोड़ की ड्रग्स का आरोपी, NCB वीरेंद्र सिंह बसोया को भारत लाई, क्या बोले अमित शाह?

UAE में छिपा था 13 हजार करोड़ की ड्रग्स का आरोपी, NCB वीरेंद्र सिंह बसोया को भारत लाई, क्या बोले अमित शाह?

Drug Smuggler Virendra Singh Basoya

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने UAE से भगोड़े ड्रग किंगपिन वीरेंद्र सिंह बसोया को भारत वापस लाने में कामयाबी हासिल की है। शाह ने इसे नशीले पदार्थों के खिलाफ मोदी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति में एक नया मील का पत्थर बताया। ALSO READ: सत्ता की भूख में सनातन राष्ट्र के टुकड़े किए, हिंदू बाहुल्य सिंध भी पाकिस्तान को दे दिया, विभाजन विभीषिका दिवस पर योगी की हुंकार

 

अमित शाह ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि मोदी सरकार विदेशों में छिपे ड्रग तस्करों का लगातार पता लगा रही है और एक कठोर दृष्टिकोण के साथ उनके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को नष्ट कर रही है।

 

उन्होंने कहा कि नशीली दवाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति में एक नया मील का पत्थर स्थापित करते हुए, एनसीबी ने यूएई से भगोड़े ड्रग सरगना वीरेंद्र सिंह बसोया की वापसी सुनिश्चित की है। 'ऊपर से नीचे' और 'नीचे से ऊपर' के दृष्टिकोण से अपराधी का पता लगाकर, हमारी एजेंसियों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ड्रग तस्कर चाहे कहीं भी छिप जाएं, वे भारतीय कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सकते। ALSO READ: Census 2027: पहली बार जाति भी पूछेगी सरकार, बैंक अकाउंट से कोविड वैक्सीन तक होंगे ये 40 सवाल

कौन है ड्रग किंगपिन वीरेंद्र सिंह बसोया?

ड्रग किंगपिन वीरेंद्र सिंह बसोया को यूएई से दिल्ली लाया जा चुका है। वह दिल्ली, गुजरात और पंजाब से बरामद की गई 13 हजार करोड़ की ड्रग्स बरामदगी मामले में आरोपी है। उसे इस सिंडिकेट का मास्टरमाइंड भी माना जा रहा है। गिरफ्तारी से पहले ही बसोया दुबई भाग गया। इसके बाद, एनसीबी में भी उसके खिलाफ केस दर्ज किया था।

 

वीरेंद्र के भाई रविंदर बसोया को भी पुलिस ने अक्टूबर 2024 में ड्रग तस्करी मामले में गिरफ्तार किया था। उसकी कार से करीब 1.096 किलो ड्रग्स बरामद हुई थी। वीरेंद्र के बेटे ऋषभ बसोया का नाम भी इस नेटवर्क में सामने आया है। वीरेंद्र को जून 2026 में इंटरपोल के नोटिस के आधार पर यूएई में गिरफ्तार किया गया था।