El Nino impact: मजबूत हो रहा अल नीनो! अगले 2 हफ्तों में मानसून को लेकर सामने आई टेंशन वाली बात, इन चीजों को लेकर रिस्क बढ़ा

Monsoon & El Nino update: भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। मौसम विभाग (IMD) के दो वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मजबूत हो रहे अल नीनो (El Nino) के असर की वजह से अगले दो हफ्तों के दौरान देश के पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में औसतन से कम बारिश होने की संभावना है। ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक मानसून में आने वाली इस सुस्ती और शुष्क मौसम के लंबे खिंचने से हाल ही में बोई गई कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों (दलहन) की फसलों पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।

मानसून में कमी से सिंचाई और कृषि आजीविका पर बड़ा असर

भारत में वार्षिक वर्षा का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसूनी बारिश से ही आता है। ये देश के महत्वपूर्ण जल स्रोतों को रीचार्ज करने के लिए बेहद जरूरी है। भारत में कृषि भूमि का लगभग आधा हिस्सा आज भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है और देश की करीब आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है।

न्यूज एजेंसी ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, IMD के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगले दो हफ्तों के दौरान देश के कुछ पूर्वी और उत्तरी राज्यों को छोड़कर अधिकांश हिस्सों में बारिश की गतिविधियों में कमी आएगी। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि इसदौरान देश के पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में बारिश की कमी काफी महत्वपूर्ण या गंभीर हो सकती है।

1 जून से अब तक 12 प्रतिशत कम हुई बारिश और बढ़ा तापमान का खतरा

चालू मानसून सीजन में 1 जून से लेकर अब तक भारत में औसत से 12 फीसदी कम बारिश हुई है। देश के कुछ राज्यों में स्थिति और भी चिंताजनक है। उदाहरण के लिए दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में बारिश की कमी का आंकड़ा 34 फीसदी तक पहुंच गया है।

मौसम विभाग के एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि मजबूत होते अल नीनो की वजह से आने वाले हफ्तों में बारिश और कम होगी। इससे महीने के अंत तक बारिश की कमी का यह अंतर और अधिक बढ़ सकता है। इसके साथ ही आने वाले सप्ताहों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान में बढ़ोतरी होने और इसके सामान्य से ऊपर बने रहने की संभावना जताई गई है।

नई बोई गई सोयाबीन, कपास और मक्का की फसलों पर मंडराया जोखिम

जुलाई महीने में हुई सामान्य के करीब बारिश की वजह से मिट्टी में नमी बढ़ गई थी। इसके बाद किसानों ने सोयाबीन, कपास, मक्का, दालें और धान जैसी खरीफ की फसलों की बुवाई में तेजी दिखाई थी। मुंबई बेस्ड एक ग्लोबल ट्रेड हाउस के डीलर के मुताबिक नई बोई गई इन फसलों की जड़ें अभी तक मिट्टी में गहराई तक नहीं पहुंची हैं। ऐसी स्थिति में, बारिश के बिना लंबा शुष्क दौर चलने से ये फसलें बेहद संवेदनशील हो जाती हैं और इन्हें भारी नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ जाता है।

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कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त तक किसानों ने 96.8 मिलियन (9.68 करोड़) हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई कर ली थी। ये एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में करीब 2 प्रतिशत कम है। अब अल नीनो के मजबूत होने और मानसून के कमजोर पड़ने से इन फसलों के उत्पादन को लेकर जोखिम काफी बढ़ गया है।

Balochistan Independence Day: 11 अगस्त को ही आजादी सेलिब्रेट करने वाला था बलूचिस्तान, जानिए आज ही के दिन वहां क्या क्या हुआ

Balochistan Independence Day: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘आजादी दिवस’ मनाए जाने को लेकर एक बार फिर अलग देश की मांग तेज हो गई है। बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जा रहा है। इस मौके पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के तौर पर कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक मान्यता दी जाए।

बलोच नेता मीर यार बलोच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जाए। इस मौके पर बलूच नेता ने पाकिस्तान पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के छह करोड़ लोग हर साल 11 अगस्त को अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। आज हम उस मुकाम पर पहंच गए हैं जहां हम सिर्फ अपनी आजादी का जश्न ही नहीं मनाते। बल्कि दुनिया से यह मांग भी करते हैं कि बलूचिस्तान की आजादी को कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक रूप से मान्यता दी जाए। आजादी के इस पवित्र अवसर पर बलूचिस्तान में रहने वाले बलोच, पश्तून, हिंदू, सिख, ईसाई और सभी धर्मों के भाइयों और बहनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।”

भारत का किया जिक्र

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य दुनिया के और खासकर भारत के बहादुर मुख्यधारा के मीडिया, थिंक टैंक, शोधकर्ताओं, कवियों, लेखकों, छात्रों, वकीलों, नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय, धार्मिक नेताओं, सांसदों और उन सभी भाइयों और बहनों का दिल से आभार व्यक्त करता है जिन्होंने बलोचिस्तान की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया और हमारे लोगों की आवाज बने। बलूचिस्तान के लोगों को नैतिक समर्थन मिलना जारी रहना चाहिए ताकि हम अपनी जमीन, बलूचिस्तान से पाकिस्तान रूपी कैंसर को हटा सकें।”

50 हजार बलोच पाकिस्तान में कैद

बलूचिस्तान में आजादी को दबाने के पाकिस्तान के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हुए मीर यार बलोच ने दावा किया कि 50 हजार से ज्यादा बलोच अभी भी पाकिस्तान की यातना कोठरियों में अमानवीय अत्याचार सह रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। आज की आजादी की सफलता हमारे महान शहीदों, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कैदियों के अमर बलिदानों की वजह से मिली है।”

बलूचिस्तान में कुर्बानियों के मजबूत इतिहास को याद करते हुए उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के लोगों ने हमेशा विदेशी हमलावरों को रोका है। उन्हें बलूचिस्तान से पीछे हटने पर मजबूर किया है। पाकिस्तान के पास भले ही हजारों टैंक, सैकड़ों लड़ाकू विमान, तोपखाने और एक बड़ी सेना हो, फिर भी शारीरिक, मानसिक और लड़ने की क्षमता के मामले में बलूचिस्तान की सेना पाकिस्तान की सेना से 10 गुना ज्यादा ताकतवर और सफल है।

बलूचिस्तान की सेना एक मजबूत फोर्स है जो हर स्थिति का सामना करने में सक्षम है। दुनिया की पेशेवर सेनाओं से मुकाबला करने के लिए तैयार है। बलूचिस्तान के इलाके को देखते हुए एक बड़ी सेना की जरूरत है। इसलिए बलूचिस्तान गणराज्य ने पांच लाख सैनिकों की सेना तैयार की है।”

11 अगस्त को ही क्यों चुना अपनी ‘आजादी’ का दिन?

जब बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित किया, तो ‘वर्ल्ड पीस यूनाइटेड’ के एम्बेसडर डॉ. परविंदर सिंह ने कहा, “1947 में जब अंग्रेज भारत से गए, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश अपने मौजूदा रूप में मौजूद नहीं थे। लेकिन बलूचिस्तान मौजूद था। उसने 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से अपनी आजादी का ऐलान किया था। अगर बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी इजाजत मिलनी चाहिए। इसे विश्व शांति की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान की ज़मीन खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे सोना और कीमती पत्थरों से बहुत समृद्ध है। अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाता है, तो पाकिस्तान को अपने आर्थिक आधार का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ सकता है, क्योंकि यह इलाका चीन और दूसरे देशों को खनिजों के निर्यात का मुख्य स्रोत है।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान का हाथ से निकलना पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान उस पर से अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहता। आज 56 से ज्यादा देश बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन करते हैं। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। एक ऐसा दौर जिसमें टकराव और जबरदस्ती से अब कोई नतीजा नहीं निकलता।”

दुनिया भर में मनाया गया आजादी का जश्न

मंगलवार को बलूचिस्तान ने अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह एक वार्षिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे कई बलूच मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान की ओर से क्षेत्र के ‘अवैध कब्जे’ के विरोध के रूप में देखते हैं। बलूच स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ें 1947 तक जाती हैं, जब ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद कलात रियासत ने कुछ समय के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित किया था। हालांकि, 1948 में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का विलय कर लिया, जिसका बलूच राष्ट्रवादी समूह लगातार विरोध करते रहे हैं।

सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म X पर मीर यार बलूच ने आरोप लगाया कि ‘कब्जा करने वाली’ पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में व्यापक प्रतिबंध लगाए हैं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय आयोजनों को रोकने के लिए 7 अगस्त से 30 अगस्त तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती, सैन्य संसाधनों या हवाई शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद पाकिस्तान बलूचिस्तान में अपनी मौजूदगी को अनिश्चित समय तक बनाए नहीं रख सकता, क्योंकि बलूच जनता का संकल्प मजबूत है।

मीर ने कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य बलूच लोगों को उग्रवादी या अलगाववादी बताने की कोशिशों को खारिज करता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानी बलूचिस्तान की रक्षा, सुरक्षा और सैन्य ताकत का हिस्सा हैं और उन्हें छह करोड़ बलूच लोगों का समर्थन प्राप्त है। लोग उन पर भरोसा करते हैं क्योंकि वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां हैं और अपने राष्ट्र के हित में काम करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये बल किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं लड़ रहे हैं और न ही अशांति या हिंसा फैलाने के लिए काम कर रहे हैं। वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य निभा रहे हैं, जिसमें शांति और सुरक्षा बनाए रखना, लोगों की रक्षा करना और एक शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा विकसित बलूचिस्तान की नींव रखना शामिल है।”

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मीर ने दावा किया कि बलूच सशस्त्र समूहों की कार्रवाइयों का उद्देश्य उन नेटवर्कों को खत्म करना और बाहर निकालना है, जिन्हें वे पाकिस्तान से जुड़ा मानते हैं और जो उनके अनुसार बलूचिस्तान में अस्थिरता, असुरक्षा और हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।

हूती विद्रोहियों का सऊदी जहाज पर मिसाइल हमला:2 पाकिस्तानी समेत 3 की मौत; रेड सी में अब तक 8 जहाजों को निशाना बनाया

यमन के ईरान से जुड़े हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में एक सऊदी जहाज पर मिसाइल हमला किया। यमन की सरकारी मीडिया के मुताबिक, हमले में जहाज के तीन क्रू मेंबर मारे गए। इनमें दो पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक शामिल हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, हमले की चपेट में आया तंजानिया के झंडे वाले तिहामा नाम का यह कार्गो जहाज ओमान के सलालाह बंदरगाह से जिबूती होते हुए आगे जा रहा था। हूतियों ने अब तक हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हुतियों की सऊदी जहाज पर नाकेबंदी शुरू होने के बदा से रेड सी में अब तक 8 जहाजों को निशाना बनाया गया है। इन हमलों का केंद्र बाब अल-मंदेब स्ट्रेट रहा है। यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। होर्मुज के बाद बाब-अल-मंदेब में भी बढ़ा खतरा यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से पहले ही समुद्री कारोबार पर दबाव है। बाब अल-मंदेब में जहाजों पर बढ़ते हमलों से शिपिंग कंपनियों के लिए अनिश्चितता और बढ़ गई है। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। रॉयटर्स के मुताबिक, अगर तीन लोगों की मौत की पुष्टि होती है तो फरवरी के अंत में अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद किसी जहाज पर हूतियों के हमले में यह पहली मौत होगी। इसके बाद मध्य-पूर्व का संघर्ष और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। लाल सागर में जहाजों की आवाजाही पर असर हूतियों के हमलों से सऊदी अरब का तेल निर्यात प्रभावित हुआ है। समुद्री यातायात पर भी असर पड़ा है, जिसके चलते जहाज सुरक्षा कारणों से लाल सागर और स्वेज नहर से बच रहे हैं। अब जहाज पश्चिमी देशों तक पहुंचने के लिए अफ्रीका के चारों ओर से जा रहे हैं। इससे सामान की डिलीवरी धीमी हो रही है, सामान की कमी बढ़ रही है, सप्लाई लाइन का संकट बन रहा है और रोजमर्रा का खर्च बढ़ रहा है। यमन में ईरान और सऊदी अरब आमने-सामने ईरान और सऊदी अरब यमन में छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। दोनों देश वहां विरोधी पक्षों का समर्थन करते हैं। सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है, जबकि ईरान हूतियों के साथ है। हूती संगठन यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है। हूतियों ने 2023 और 2024 में भी लाल सागर में नियमित रूप से जहाजों पर हमले किए थे। इससे समुद्री यातायात पर असर पड़ा था। इस समय हूतियों के हमलों का असर इसलिए ज्यादा महसूस हो रहा है, क्योंकि दुनिया पहले से ही होर्मुज स्ट्रेटके बंद होने से जूझ रही है। होर्मुज और स्वेज नहर में यातायात धीमा ईरान जहाजों को होर्मुज स्ट्रेटसे गुजरने की अनुमति नहीं दे रहा है। वहीं, हूती संगठन अब लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर हमला कर रहा है। दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आवाजाही होर्मुज स्ट्रेटसे होती है। लाल सागर में मौजूद स्वेज नहर पूर्वी गोलार्ध को पश्चिमी गोलार्ध से जोड़ती है। अब दोनों जलमार्गों में जहाजों की आवाजाही बहुत धीमी हो गई है।

तीसरी बार वेस्टइंडीज को क्यों खेलना पड़ेगा वर्ल्ड कप क्वालिफायर? 2 बार की वर्ल्ड चैंपियन की बढ़ी मुश्किलें

दो बार की वर्ल्ड चैंपियन वेस्टइंडीज अगले साल होने वाले वनडे वर्ल्ड कप में डायरेक्ट क्‍वालिफाई नहीं कर पाई है। अब टीम को विश्व कप में पहुंचने के लिए क्वालिफायर मुकाबला खेलना होगा। सोमवार को अफगानिस्तान ने आयरलैंड को वनडे मैच में हरा दिया, जिसके बाद वेस्टइंडीज के 30 सितंबर तक सीधे क्वालिफाई करने की उम्मीद खत्म हो गई। अब वेस्टइंडीज को टूर्नामेंट में जगह बनाने के लिए क्वालिफाइंग मुकाबलों में अपना दम दिखाना होगा। आईसीसी मेंस वनडे वर्ल्ड कप 2027 का आयोजन अगले साल 4 अक्टूबर से 21 नवंबर 2027 के बीच साउथ अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया की संयुक्त मेजबानी में खेला जाएगा।

इन टीमों को मिलेगा डायरेक्ट एंट्री

30 सितंबर तक आईसीसी की वनडे रैंकिंग में शीर्ष आठ स्थान पर रहने वाली टीमों को विश्व कप में सीधे प्रवेश मिल जाएगा। लेकिन, इस लिस्ट में दक्षिण अफ्रीका और जिम्बाब्वे को शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि दोनों टीमें अगले साल होने वाले वनडे विश्व कप की मेजबानी करेंगी। अफगानिस्तान ने वनडे विश्व कप में अपनी जगह पक्की कर ली है। उसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, भारत, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका, इंग्लैंड और बांग्लादेश भी टूर्नामेंट में खेलते नजर आएंगे। मेजबान दक्षिण अफ्रीका और जिम्बाब्वे की जगह भी तय है।

वेस्टइंडीज तीसरी बार खेलेगा क्वालिफायर मुकाबला

आईसीसी वनडे रैंकिंग में 10वें स्थान पर मौजूद वेस्टइंडीज की मुश्किलें बढ़ गई हैं। टीम को विश्व कप में पहुंचने के लिए एक बार फिर क्वालिफाइंग टूर्नामेंट का सामना करना पड़ेगा। खास बात यह है कि वेस्टइंडीज लगातार तीसरी बार विश्व कप में जगह बनाने के लिए क्वालिफायर खेलने की स्थिति में पहुंची है। 2027 वनडे विश्व कप के लिए क्वालिफाइंग टूर्नामेंट अगले साल फरवरी में खेला जाएगा, लेकिन अभी यह तय नहीं हुआ है कि इसकी मेजबानी कौन सा देश करेगा। क्वालिफायर जीतने वाली टीम को विश्व कप के दूसरे राउंड में सीधे जगह मिलेगी। वहीं, दूसरे से चौथे स्थान पर रहने वाली टीमों को पहले राउंड से शुरुआत करनी होगी। इस राउंड को सुपर सीरीज कहा जाता है। जहां टीमों के पास आगे बढ़कर विश्व कप में अपनी जगह बनाने का मौका रहेगा।

ये टीमें लेंगी हिस्सा

इस क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में आयरलैंड और वेस्टइंडीज़ के अलावा वर्ल्ड कप लीग 2 में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली चार टीमें भी हिस्सा लेंगी। आयरलैंड और वेस्टइंडीज को 30 सितंबर 2026 की वनडे रैंकिंग के आधार पर जगह मिलेगी, क्योंकि वे मेजबान देशों को छोड़कर सबसे नीचे रैंक वाली पूर्ण सदस्य टीमें हैं। वहीं, बदले हुए क्वालिफिकेशन फॉर्मेट को लेकर कुछ एसोसिएट देशों ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की है। नए सिस्टम में टीमों को विश्व कप तक पहुंचने के लिए पहले से ज्यादा मुकाबलों और अलग-अलग चरणों से गुजरना पड़ सकता है।

कैसे होगा क्वालिफायर मुकाबला

विश्व कप क्वालिफायर में बची चार जगहों के लिए टीमों को पहले प्लेऑफ खेलना होगा। इस प्लेऑफ में कुल आठ टीमें होंगी। इनमें वर्ल्ड कप लीग 2 की निचली चार टीमें और चैलेंज लीग की चार टीमें शामिल होंगी। चैलेंज लीग को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का तीसरा स्तर माना जाता है। चैलेंज लीग में कुल 12 टीमें हैं, जिन्हें छह-छह टीमों के दो ग्रुप में बांटा गया है। हर ग्रुप में तीन चरणों में मुकाबले होंगे और सभी टीमें एक-दूसरे से खेलेंगी। ग्रुप में सबसे ऊपर रहने वाली दो-दो टीमें प्लेऑफ में पहुंचेंगी। इसके बाद प्लेऑफ में टॉप चार टीमें विश्व कप क्वालिफायर में जगह बनाएंगी।

वेस्टइंडीज से फिर छूटी वनडे विश्वकप की सीधी एंट्री, खेलना पड़ेगा क्वालिफायर

दो बार के वनडे वर्ल्ड कप चैंपियन वेस्टइंडीज़ को 2027 में होने वाले क्रिकेट वर्ल्ड कप में जगह बनाने के लिए एक बार फिर क्वालिफ़ाइंग टूर्नामेंट का रास्ता अपनाना होगा। 30 सितंबर 2026 को जारी आईसीसी वनडे रैंकिंग में शीर्ष आठ स्थान पर रहने वाली टीमें सीधे 2027 वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई करेंगी। हालांकि, मेजबान देशों में शामिल दक्षिण अफ़्रीका और ज़िम्बाब्वे के लिए रैंकिंग ज़रूरी नहीं।

आयरलैंड के ख़िलाफ़ बेलफ़ास्ट में रोमांचक जीत दर्ज करने के बाद अफ़ग़ानिस्तान ने भी टॉप आठ में अपनी जगह पक्की कर ली है। उसके साथ मौजूदा चैंपियन ऑस्ट्रेलिया, भारत, न्यूज़ीलैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका, इंग्लैंड, बांग्लादेश, दक्षिण अफ़्रीका और ज़िम्बाब्वे भी 2027 वर्ल्ड कप में जगह बना चुके हैं।

वहीं, आईसीसी वनडे रैंकिंग में 10वें स्थान पर मौजूद वेस्टइंडीज़ के पास कटऑफ तारीख़ से पहले भारत के ख़िलाफ़ दो वनडे मैच खेलने हैं। लेकिन इन दोनों मैचों में जीत हासिल करने के बावजूद वेस्टइंडीज़ शीर्ष आठ में वापसी नहीं कर पाएगा।

इसका मतलब साफ़ है कि वेस्टइंडीज़ को एक बार फिर क्वालिफ़ायर टूर्नामेंट की कठिन राह से गुज़रना होगा। यह क्वालिफ़ायर अगले साल फ़रवरी में आयोजित किया जाना है और यहीं से वेस्टइंडीज़ के पास 2027 वर्ल्ड कप का टिकट हासिल करने का एक और मौक़ा होगा। वेस्टइंडीज़ के लिए यह स्थिति नई नहीं है।

2023 वनडे वर्ल्ड कप में भी वे सीधे क्वालिफ़ाई नहीं कर पाए थे और उन्हें क्वालिफ़ायर टूर्नामेंट में हिस्सा लेना पड़ा था। हालांकि, क्वालिफ़ायर के सुपर सिक्स चरण में वेस्टइंडीज़ पांचवें स्थान पर रहा और वर्ल्ड कप में जगह बनाने में नाकाम रहा। यह क्रिकेट इतिहास में पहली बार था जब वेस्टइंडीज़ वनडे वर्ल्ड कप का हिस्सा नहीं बना।

वर्ल्ड कप से बाहर होने का असर आगे भी देखने को मिला और इसी वजह से वेस्टइंडीज़ 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए भी क्वालिफ़ाई नहीं कर सका। वह 2013 के बाद पहली बार इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट से बाहर रहा। 2027 वर्ल्ड कप के क्वालिफ़ायर में कुल आठ टीमें हिस्सा लेंगी। इनमें 30 सितंबर 2026 की वनडे रैंकिंग के आधार पर दो सबसे निचली रैंक वाली गैर-मेज़बान फ़ुल मेंबर टीमें, आयरलैंड और वेस्टइंडीज़ शामिल होंगी।

इसके अलावा क्रिकेट वर्ल्ड कप लीग 2 की शीर्ष चार टीमें और वर्ल्ड कप क्वालिफ़ायर प्लेऑफ़ की शीर्ष चार टीमें भी क्वालिफ़ायर में जगह बनाएंगी। क्वालिफ़ायर का विजेता सीधे वर्ल्ड कप के दूसरे दौर में प्रवेश करेगा। वहीं दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रहने वाली टीमों को सुपर सीरीज़ से गुज़रना होगा। इस त्रिकोणीय सीरीज़ की विजेता टीम दूसरे दौर में पहुंचेगी।वेस्टइंडीज़ के लिए 2027 वर्ल्ड कप का सफ़र एक बार फिर आसान नहीं होने वाला है। दो बार की विश्व चैंपियन टीम को पहले क्वालिफ़ायर की परीक्षा पास करनी होगी और तभी वह क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर वापसी कर सकेगी।

ईरान के डर से ट्रम्प ने सीक्रेट फ्लाइट ली थी:तुर्किये में एयरफोर्स वन में बैठने का दिखावा किया, फिर सामान वाली गाड़ी दूसरे प्लेन में पहुंचे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले महीने तुर्किये से ब्रिटेन जाने के लिए सीक्रेट रूप से एक छोटे मिलिट्री विमान का इस्तेमाल किया था। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान से ट्रम्प की हत्या की विश्वसनीय धमकी मिलने के बाद उनकी यात्रा का पूरा प्लान बदला गया था। तुर्किये की राजधानी अंकारा से निकलते समय ट्रम्प कैमरों के सामने पुराने एयरफोर्स वन में सवार हुए। इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट पर सामान और खाना पहुंचाने वाली कैटरिंग गाड़ी से चुपचाप छोटे मिलिट्री विमान C-32A तक पहुंचाया गया। पहले बड़े विमान में बैठे, फिर चुपचाप बाहर निकले ट्रम्प 8 जुलाई को नाटो समिट में शामिल होने के लिए अंकारा में थे। वे तुर्किये नए बोइंग 747-8 विमान से पहुंचे थे, जो कतर के शाही परिवार ने अमेरिका को दिया है। वापसी के समय ट्रम्प पुराने, हल्के नीले रंग के एयरफोर्स वन की सीढ़ियां चढ़ते हुए कैमरों में दिखाई दिए। उस समय यही माना गया कि वे इसी विमान से ब्रिटेन जाएंगे। ट्रम्प ने खुद कहा था कि वे नए विमान की जगह पुराने एयरफोर्स वन से ब्रिटेन जाएंगे। उन्होंने इसे “पुराने समय की याद में” उड़ान बताई थी। नया विमान भी ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल एयरबेस जाना था, जहां अमेरिकी सैनिक उसे देख सकते थे। लेकिन पुराने विमान में बैठने के बाद ट्रम्प उसी से ब्रिटेन नहीं गए। सामान वाली गाड़ी से दूसरे विमान तक पहुंचाया वॉशिंगटन पोस्ट ने एक अमेरिकी अधिकारी और अपनी जांच में मिली अन्य सामग्री के हवाले से बताया कि ट्रम्प के पुराने एयरफोर्स वन में सवार होने के कुछ देर बाद एक कैटरिंग गाड़ी वहां से निकली। इस गाड़ी के जरिए ट्रम्प को एयरपोर्ट पर खड़े छोटे C-32A विमान तक पहुंचाया गया। यह बोइंग 757 का मिलिट्री वर्जन है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में सामने आए वीडियो में भी कैटरिंग गाड़ी को पुराने एयरफोर्स वन से निकलकर छोटे विमान की तरफ जाते देखा जा सकता है। इसके बाद C-32A ट्रम्प को लेकर ब्रिटेन के लिए रवाना हो गया। मीडिया को भी नहीं पता था कि ट्रम्प विमान में नहीं हैं पुराने एयरफोर्स वन में यात्रा कर रहे पत्रकारों को लगा कि राष्ट्रपति उनके साथ ही विमान में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों को भी इसकी जानकारी नहीं थी। इस विमान में मौजूद पत्रकारों को उड़ान के दौरान प्रेस केबिन की खिड़कियों के शेड बंद रखने को कहा गया। ऐसी सावधानी आमतौर पर युद्ध वाले इलाकों में उड़ान के दौरान बरती जाती है। बाद में पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि खिड़कियों के शेड बंद रखने को क्यों कहा गया था। ट्रम्प ने जवाब दिया, “शायद हम एक खतरनाक फ्लाइट पर थे।” ट्रम्प वाला विमान पहले ब्रिटेन पहुंचा ट्रम्प को लेकर C-32A रात करीब 10:20 बजे ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल पहुंचा। इसके कुछ मिनट बाद पुराना एयरफोर्स वन भी वहां पहुंच गया, जिसमें पत्रकार सवार थे। यह साफ नहीं है कि ट्रम्प C-32A से उतरने के बाद पुराने एयरफोर्स वन तक कैसे पहुंचे। हालांकि, ट्रम्प के साथ यात्रा कर रहे प्रेस पूल के मुताबिक, वे रात 10:56 बजे पुराने एयरफोर्स वन की सीढ़ियों से नीचे उतरते दिखाई दिए। उन्होंने पत्रकारों की तरफ हाथ हिलाया, लेकिन उनसे बात नहीं की। इसके बाद अमेरिकी सैनिकों से मुलाकात की और कतर से मिले नए विमान की तरफ चले गए। ईरान से खतरे के कारण बदला गया था पूरा प्लान वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ट्रम्प को निशाना बनाए जाने की विश्वसनीय धमकी के बाद उनकी तुर्किये से वापसी को सीक्रेट रखा गया। अमेरिकी मीडिया में पहले भी रिपोर्ट आई थी कि ईरान से जुड़े खतरे के कारण ट्रम्प ने तुर्किये से कतर के नए विमान में वापस जाने के बजाय पुराने एयरफोर्स वन का इस्तेमाल किया। यानी जिस विमान में ट्रम्प को जाते हुए दिखाया गया, वह असल में लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस्तेमाल हुआ था। ट्रम्प को दूसरे विमान से ब्रिटेन भेजा गया। ऐसा तरीका पहले भी इस्तेमाल हो चुका है राष्ट्रपति को खतरे से बचाने के लिए दूसरे विमान का इस्तेमाल करने का ऐसा तरीका पहले भी अपनाया जा चुका है। साल 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान गए थे। तब क्लिंटन एक बिना पहचान वाले सरकारी विमान से पाकिस्तान पहुंचे थे, जबकि उनका आधिकारिक एयरफोर्स वन डिकॉय के तौर पर भेजा गया था। कतर का नया विमान भी सवालों में रहा ट्रम्प जिस नए बोइंग 747-8 विमान से तुर्किये पहुंचे थे, उसे कतर के शाही परिवार ने पिछले साल अमेरिका को दिया था। अमेरिकी डिफेंस कंपनी L3Harris Technologies ने इसे राष्ट्रपति के इस्तेमाल के लिए तैयार किया है। ट्रम्प ने पहली बार इस विमान का इस्तेमाल 1 जुलाई को नॉर्थ डकोटा जाने के लिए किया था। इसके कुछ दिन बाद यह उन्हें लेकर पहली विदेश यात्रा पर तुर्किये पहुंचा। नए विमान की सुरक्षा को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने एयरफोर्स वन में मौजूद कुछ सुरक्षा सुविधाएं नए विमान में नहीं हैं या अलग तरह से काम करती हैं। इनमें मिसाइल हमले से बचाने वाली सुरक्षा भी शामिल है। व्हाइट हाउस ने कहा- राष्ट्रपति की सुरक्षा सबसे जरूरी सीक्रेट उड़ान की खबर सामने आने के बाद व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीव चेउंग ने नए विमान की सुरक्षा का बचाव किया। उन्होंने कहा कि नए एयरफोर्स वन में राष्ट्रपति और उनके स्टाफ की सुरक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की गई है। चेउंग ने कहा, “अमेरिका के कई दुश्मन हैं जो राष्ट्रपति को निशाना बनाना चाहते हैं। इन खतरों से निपटने के लिए हम अपने पास मौजूद हर तरीके का इस्तेमाल करते हैं।” पेंटागन ने इस मामले पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

ईरान के डर से ट्रम्प ने सीक्रेट फ्लाइट ली थी:तुर्किये में एयरफोर्स वन में बैठने का दिखावा किया, फिर सामान वाली गाड़ी से दूसरे प्लेन में पहुंचे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले महीने तुर्किये से ब्रिटेन जाने के लिए सीक्रेट रूप से एक छोटे मिलिट्री विमान का इस्तेमाल किया था। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान से ट्रम्प की हत्या की धमकी मिलने के बाद उनकी यात्रा का पूरा प्लान बदला गया था। तुर्किये की राजधानी अंकारा से निकलते समय ट्रम्प कैमरों के सामने पुराने एयरफोर्स वन में सवार हुए। इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट पर सामान और खाना पहुंचाने वाली केटरिंग गाड़ी से चुपचाप छोटे मिलिट्री विमान C-32A तक पहुंचाया गया। पहले बड़े विमान में बैठे, फिर चुपचाप बाहर निकले ट्रम्प 8 जुलाई को नाटो समिट में शामिल होने के लिए अंकारा में थे। वे तुर्किये नए बोइंग 747-8 विमान से पहुंचे थे, जो कतर के शाही परिवार ने अमेरिका को दिया है। वापसी के समय ट्रम्प पुराने, हल्के नीले रंग के एयरफोर्स वन की सीढ़ियां चढ़ते हुए कैमरों में दिखाई दिए। उस समय यही माना गया कि वे इसी विमान से ब्रिटेन जाएंगे। ट्रम्प ने खुद कहा था कि वे नए विमान की जगह पुराने एयरफोर्स वन से ब्रिटेन जाएंगे। नया विमान भी ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल एयरबेस जाना था, जहां अमेरिकी सैनिक उसे देख सकते थे। लेकिन पुराने विमान में बैठने के बाद ट्रम्प उसी से ब्रिटेन नहीं गए। सामान वाली गाड़ी से दूसरे विमान तक पहुंचाया वॉशिंगटन पोस्ट ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया कि ट्रम्प के पुराने एयरफोर्स वन में सवार होने के कुछ देर बाद एक केटरिंग गाड़ी वहां से निकली। इस गाड़ी के जरिए ट्रम्प को एयरपोर्ट पर खड़े छोटे C-32A विमान तक पहुंचाया गया। यह बोइंग 757 का मिलिट्री वर्जन है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में सामने आए वीडियो में भी केटरिंग गाड़ी को पुराने एयरफोर्स वन से निकलकर छोटे विमान की तरफ जाते देखा जा सकता है। इसके बाद C-32A ट्रम्प को लेकर ब्रिटेन के लिए रवाना हो गया। मीडिया को भी नहीं पता था कि ट्रम्प विमान में नहीं हैं पुराने एयरफोर्स वन में यात्रा कर रहे पत्रकारों को लगा कि राष्ट्रपति उनके साथ ही विमान में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस के कुछ कर्मचारियों को भी इसकी जानकारी नहीं थी। इस विमान में मौजूद पत्रकारों को उड़ान के दौरान प्रेस केबिन की खिड़कियों के शेड बंद रखने को कहा गया। ऐसी सावधानी आमतौर पर युद्ध वाले इलाकों में उड़ान के दौरान बरती जाती है। बाद में पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि खिड़कियों के शेड बंद रखने को क्यों कहा गया था। ट्रम्प ने जवाब दिया, “शायद हम एक खतरनाक फ्लाइट पर थे।” ट्रम्प वाला विमान पहले ब्रिटेन पहुंचा ट्रम्प को लेकर C-32A रात करीब 10:20 बजे ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल पहुंचा। इसके कुछ मिनट बाद पुराना एयरफोर्स वन भी वहां पहुंच गया, जिसमें पत्रकार सवार थे। यह साफ नहीं है कि ट्रम्प C-32A से उतरने के बाद पुराने एयरफोर्स वन तक कैसे पहुंचे। हालांकि, ट्रम्प के साथ यात्रा कर रहे प्रेस पूल के मुताबिक, वे रात 10:56 बजे पुराने एयरफोर्स वन की सीढ़ियों से नीचे उतरते दिखाई दिए। उन्होंने पत्रकारों की तरफ हाथ हिलाया, लेकिन उनसे बात नहीं की। इसके बाद अमेरिकी सैनिकों से मुलाकात की और कतर से मिले नए विमान की तरफ चले गए। ईरान से खतरे के कारण बदला गया था पूरा प्लान वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, ट्रम्प को निशाना बनाए जाने की विश्वसनीय धमकी के बाद उनकी तुर्किये से वापसी को सीक्रेट रखा गया। अमेरिकी मीडिया में पहले भी रिपोर्ट आई थी कि ईरान से जुड़े खतरे के कारण ट्रम्प ने तुर्किये से कतर के नए विमान में वापस जाने के बजाय पुराने एयरफोर्स वन का इस्तेमाल किया। यानी जिस विमान में ट्रम्प को जाते हुए दिखाया गया, वह असल में लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस्तेमाल हुआ था। ट्रम्प को दूसरे विमान से ब्रिटेन भेजा गया। ऐसा तरीका पहले भी इस्तेमाल हो चुका है राष्ट्रपति को खतरे से बचाने के लिए दूसरे विमान का इस्तेमाल करने का ऐसा तरीका पहले भी अपनाया जा चुका है। साल 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान गए थे। तब क्लिंटन एक बिना पहचान वाले सरकारी विमान से पाकिस्तान पहुंचे थे, जबकि उनका आधिकारिक एयरफोर्स वन डिकॉय के तौर पर भेजा गया था। कतर का नया विमान भी सवालों में रहा ट्रम्प जिस नए बोइंग 747-8 विमान से तुर्किये पहुंचे थे, उसे कतर के शाही परिवार ने पिछले साल अमेरिका को दिया था। अमेरिकी डिफेंस कंपनी L3 हैरिस टेक्नोलॉजीस ने इसे राष्ट्रपति के इस्तेमाल के लिए तैयार किया है। ट्रम्प ने पहली बार इस विमान का इस्तेमाल 1 जुलाई को नॉर्थ डकोटा जाने के लिए किया था। इसके कुछ दिन बाद यह उन्हें लेकर पहली विदेश यात्रा पर तुर्किये पहुंचा। नए विमान की सुरक्षा को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने एयरफोर्स वन में मौजूद कुछ सुरक्षा सुविधाएं नए विमान में नहीं हैं या अलग तरह से काम करती हैं। इनमें मिसाइल हमले से बचाने वाली सुरक्षा भी शामिल है। व्हाइट हाउस ने कहा- राष्ट्रपति की सुरक्षा सबसे जरूरी सीक्रेट उड़ान की खबर सामने आने के बाद व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीव चेउंग ने नए विमान की सुरक्षा का बचाव किया। उन्होंने कहा कि नए एयरफोर्स वन में राष्ट्रपति और उनके स्टाफ की सुरक्षा के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की गई है। चेउंग ने कहा, “अमेरिका के कई दुश्मन हैं जो राष्ट्रपति को निशाना बनाना चाहते हैं। इन खतरों से निपटने के लिए हम अपने पास मौजूद हर तरीके का इस्तेमाल करते हैं।” पेंटागन ने इस मामले पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

JNU में उमर खालिद की किताब पर बवाल, आखिरी वक्त पर वेन्यू रद्द…नारेबाजी से गरमाया कैंपस

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में जेल में बंद स्कॉलर उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ पर चर्चा के दौरान सोमवार को हंगामा हो गया। कार्यक्रम के दौरान काफी नारे लगाए गए और दोनों पक्षों के बीच टकराव जैसी स्थिति बन गई। बताया गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही इसके लिए बुक की गई जगह रद्द कर दी थी। इसके बावजूद कार्यक्रम को लेकर छात्रों के बीच विरोध और समर्थन देखने को मिला।

यह कार्यक्रम ‘इंटरनेशनल डे ऑफ द वर्ल्ड्स इंडिजिनस पीपल्स’ यानी दुनिया के मूल निवासियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) की ओर से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का आयोजन मूल रूप से दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज-1 (SSS-1) के ऑडिटोरियम में होना था। हालांकि, आखिरी समय में वेन्यू की बुकिंग रद्द किए जाने के बाद कार्यक्रम को लेकर विवाद और बढ़ गया।

JNU ने आखिरी समय पर कार्यक्रम की जगह की बुकिंग रद्द की

कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही जेएनयू प्रशासन ने ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कर दी और कार्यक्रम की अनुमति वापस ले ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक बयान में जेएनयू प्रशासन ने कहा कि आयोजकों ने कार्यक्रम से जुड़ी पूरी जानकारी विश्वविद्यालय को नहीं दी थी, इसलिए ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द की गई।

विश्वविद्यालय ने अपने बयान में कहा कि जेएनयू एक लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत संस्थान है। कार्यक्रम की अनुमति स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज (एसएसएस) के डीन ने दी थी और उसे रद्द करने की कार्रवाई भी उन्हीं की ओर से की गई। हालांकि, कार्यक्रम की जगह रद्द होने के बावजूद बड़ी संख्या में छात्र वहां पहुंच गए। बताया गया कि चर्चा के लिए करीब 300 से 400 छात्र इकट्ठा हुए। इस दौरान एसएसएस-2 ब्लॉक के बाहर उमर खालिद की किताब की प्रतियां भी बेची गईं। खालिद पहले इसी ब्लॉक में पढ़ाई कर चुका है। मौके पर झारखंड ट्राइबल स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य भी मौजूद थे।

कार्यक्रम में कौन-कौन वक्ता शामिल थे?

कार्यक्रम के पोस्टर के मुताबिक, चर्चा में कई जाने-माने वक्ताओं को शामिल किया गया था। पैनल में इतिहासकार प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, प्रोफेसर उमा चक्रवर्ती, शुद्धाब्रत सेनगुप्ता, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और सामाजिक कार्यकर्ता बनोज्योत्स्ना लाहिड़ी शामिल थीं। बनोज्योत्स्ना लाहिड़ी उमर खालिद की पार्टनर भी हैं। कार्यक्रम की शुरुआत जेएनयू एआईएसए की अध्यक्ष अदिति के शुरुआती भाषण से हुई। उन्होंने झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के प्रति समर्थन जताया और कार्यक्रम की जगह की बुकिंग रद्द किए जाने के विश्वविद्यालय प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाए।

अदिति ने सवाल उठाया कि प्रशासन को जेएनयू के एक पूर्व छात्र की लिखी किताब से आपत्ति क्यों है, जबकि उमर खालिद अभी बिना मुकदमे के जेल में बंद हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी तंत्र एक मुस्लिम व्यक्ति के एक्टिविज्म के प्रतीक के रूप में उभरने से परेशान है और उसे इतिहासकार के रूप में पहचान देने के बजाय हाशिए पर रखना चाहता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कार्यक्रम की जगह रद्द करने का फैसला धोखे से लिया गया और प्रशासन ने अपने इस कदम के पीछे कोई ठोस वजह नहीं बताई।

ABVP ने कार्यक्रम रद्द करने के फैसले का समर्थन किया

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने जेएनयू प्रशासन की ओर से कार्यक्रम की जगह की बुकिंग रद्द करने के फैसले का समर्थन किया। ABVP ने उमर खालिद को “देश-विरोधी” बताया और कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से शुरुआत में कार्यक्रम को अनुमति देना ही गलत था। CNN-News18 को दिए बयान में ABVP सदस्यों ने कहा कि वे SSS-1 में होने वाली चर्चा को जबरन रोकने की कोशिश नहीं करेंगे। हालांकि, उनका कहना था कि अगर JNUSU कैंपस में हंगामा करने की कोशिश करता है, तो वे स्थिति संभालने में विश्वविद्यालय प्रशासन की मदद करेंगे।

प्रोफेसर के भाषण के दौरान हुआ हंगामा

कार्यक्रम में प्रोफेसर प्रभु महापात्रा के भाषण के दौरान हंगामा शुरू हो गया। महापात्रा ने बताया कि वह झारखंड के उसी इलाके में पले-बढ़े हैं, जहां से उमर खालिद का संबंध है। उन्होंने अपनी बात में किताब की शैक्षणिक अहमियत और शोध के तरीके पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि किताब अलग-अलग वर्गों और समुदायों के बीच मौजूद विरोधाभासों को समझने की कोशिश करती है। महापात्रा ने मौजूदा राजनीतिक संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके पास संसाधन हैं और जो उन संसाधनों को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और आदिवासी आबादी के भविष्य के बीच के अंतर को भी चर्चा का अहम हिस्सा बताया।

नारों के जवाब में लगे नारे

कुछ ही देर बाद एबीवीपी समर्थक छात्रों ने प्रोफेसर प्रभु महापात्रा के भाषण के बीच विरोध शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारी हाथों में पोस्टर लिए हुए थे। इनमें से एक पोस्टर पर सवाल लिखा था, “क्या उमर के पिता सिमी आतंकी संगठन से जुड़े नहीं थे?” इसके साथ छात्र “इस्लामाबाद की खबर खुदेगी” जैसे नारे भी लगा रहे थे। एक अन्य पोस्टर में सवाल किया गया, “क्या उमर खालिद ने अफजल गुरु का बचाव नहीं किया?” वहीं एक और पोस्टर पर लिखा था, “पाकिस्तान में हिंदुओं के पास मानवाधिकार क्यों नहीं हैं?”

एबीवीपी समर्थक छात्रों ने कार्यक्रम में मौजूद पैनल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब चर्चा में शामिल लोग एक “एलीट पैनल” का हिस्सा हैं, तो वे समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों की समस्याओं और उनके सामने मौजूद असमानताओं पर किस तरह चर्चा कर सकते हैं। इस दौरान एसएसएस-2 के पास नारेबाजी जारी रही, जिससे कैंपस का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया।

भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम करेगी विश्वकप का आगाज, देखें शेड्यूल

स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत श्रीलंका से पहले टेस्ट में भिड़ेगा लेकिन भारत की पुरुष हॉकी टीम विश्वकप में भिड़ने के लिए अपने अपने प्रतिद्वंदियों से लोहा लेगी। दोनों ही टीमों को पूल डी में रखा गया है। पुरुष टीम के लिए टूर्नामेंट 15 अगस्त और महिला टीम के लिए 16 अगस्त से टूर्नामेंट शुरु होगा।

बेल्जियम और स्पेन में होने वाले हॉकी  विश्वकप में भारतीय पुरुष टीम का पहला मैच वेल्स से होगा वहीं भारतीय महिला टीम का पड़ोसी मुल्क चीन से होगा। दोनों ही टीमों का पहला मैच 4.30 बजे खेला जाएगा।

भारतीय पुरुष टीम का अगला मैच इंग्लैंड से 17 अगस्त को शाम 6.30 बजे होगा। इसके बाद विश्वकप की सबसे सफल टीम पाकिस्तान भारत से 19 तारीख को 6.30 बजे भिड़ेगी। वहीं महिला टीम की बात करें तो पहले मैच के बाद टीम का अगला मैच दक्षिण अफ्रीका से 18 अगस्त शाम 6.30 बजे होगा। इंग्लैंड के खिलाफ महिला टीम को 20 अगस्त को शाम 6.30 बजे लोहा लेना होगा।

अगर भारतीय पुरुष टीम और महिला टीम के पूल को देखा जाए तो पुरुष टीम का पूल आसान लगता है। वहीं महिला टीम की स्थिति देखते हुए यह ग्रुप कठिन लगता है।

नए प्रारुप से खेला जाएगा टूर्नामेंट

पुरुष और महिला हॉकी विश्वकप नए प्रारुप से खेला जाएगा जिसमें क्वार्टरफाइनल की जगह नहीं होगी। ट्रॉफी के लिए कुल 16 टीमें – पुरुष और महिला दोनों वर्गों में – मुकाबला कर रही हैं। इन टीमों को चार-चार टीमों वाले चार ग्रुप में बांटा गया है। हर ग्रुप की टॉप दो टीमें दूसरे राउंड के लिए क्वालिफ़ाई करेगी। दूसरे राउंड में, क्वालिफ़ाई करने वाली आठ टीमों को चार-चार टीमों वाले दो ग्रुप में बांटा जाएगा।

भारतीय पुरुष टीम की ए पूल में नीदरलैंड्स, अर्जेंटीना, न्यूज़ीलैंड, जापान हैं। बी पूल में बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस, मलेशिया। सी पूल में ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका है। भारतीय महिला टीम की बात करें तो ए पूल में नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया, चिली, जापान हैं। बी पूल में अर्जेंटीना, जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, स्कॉटलैंड हैं। सी पूल में बेल्जियम, स्पेन, न्यूज़ीलैंड, आयरलैंड हैं।दोनों ही टीमों के फाइनल 29 अगस्त को खेले जाएंगे।

यह टूर्नामेंट टीवी पर स्टार सिलेक्ट स्पोर्ट्स और OTT पर जियो हॉटस्टार पर देखा जा सकेगा।

भारतीय बॉक्सर ने PM को बताया पाकिस्तानी बॉक्सर को नरेंद्र नाम से है नफरत (Video)

राष्ट्रमंडल खेलों में झंडा गाढ़ के आए भारतीय बॉक्सर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्मान समारोह में मिले तो एक दिलचस्प किस्सा सुनाया जिसको सुनकर सब हंसने लगे। रजत पदक विजेता बॉक्सर नरेंद्र बेरवाल ने कहा कि उनकी पाकिस्तानी प्रतिद्वंदी से मुलाकात हुई और उन्होंने बताया कि वह नरेंद्र नाम से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसका (बॉक्सर का) नाम  नरेंद्र  था, उसके कोच का नाम नरेंद्र था यहां तक की प्रधानमंत्री तक का नाम नरेंद्र था।

हालांकि यह किस्सा 2015 विश्व मिलिट्री गेम्स का है जब नरेंद्र बेरवाल के कोच नरेंद्र राणा थे। इन खेलों में बेरवाल के प्रतिद्वंदी पाकिस्तानी बॉक्सर थे। बेरवाल पहला राउंंड 4-1 से और दूसरा राउंड 3-2 से जीते थे। लेकिन दोनों के सिर पर चोट लग गई थी। यह बात पाकिस्तानी प्रतिद्वंदी ने बेरवाल को टांके लगने के दौरान बताई थी।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में भारत के कॉमनवेल्थ गेम्स मेडल विजेताओं से मुलाकात की और ग्लासगो गेम्स में उनके शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें बधाई दी। भारत ने मेडल तालिका में चौथा स्थान हासिल किया, जिसमें 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और नौ ब्रॉन्ज़ मेडल शामिल थे।

बॉक्सिंग भारत के लिए सबसे ज़्यादा मेडल दिलाने वाला खेल बनकर उभरा, जिसमें टीम ने 10 मेडल जीते, जिनमें सात गोल्ड शामिल थे। राष्ट्रमंडल खेल में यह भारत का अब तक का सबसे अच्छा बॉक्सिंग प्रदर्शन था, जिसमें भारतीय महिला खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सात में से पाँच गोल्ड मेडल जीते।

श्री मोदी ने मेडल विजेताओं से बातचीत की और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने देश से सभी खेलों में एथलीटों का समर्थन जारी रखने का आग्रह किया और एक ऐसा खेल कल्चर बनाने के महत्व पर जोर दिया जो अधिक युवाओं को खेल अपनाने के लिए प्रेरित करे।

“जो खेलेगा वो खिलेगा” खेल के महत्व और भारत के युवाओं की अधिक भागीदारी के बारे में श्री मोदी के लगातार दिए जाने वाले संदेशों में से एक रहा है। प्रधानमंत्री ने पहले भी भारत के बदलते खेल संस्कृति और युवा खिलाड़ियों के लिए अधिक अवसर पैदा करने की आवश्यकता के बारे में बात करते हुए इस वाक्यांश का इस्तेमाल किया है।