कश्मीरी पंडितों को फिर आतंकी धमकी! LeT से जुड़े टेरर ग्रुप ने जारी की हिट लिस्ट, घाटी के बाहर भी हमले की चेतावनी

लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक आतंकी संगठन ने कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों को धमकी दी है। सीएनएन-न्यूज18 के मनोज गुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, संगठन ने एक नया धमकी भरा नोट जारी किया है, जिसमें कुछ कर्मचारियों की निजी जानकारी साझा की गई है। साथ ही, कश्मीर घाटी और जम्मू में उन्हें निशाना बनाकर हमले करने की चेतावनी दी गई है। यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल यानी यूएलसी को भारतीय खुफिया एजेंसियां लश्कर-ए-तैयबा का एक छद्म संगठन मानती हैं। यूएलसी ने कश्मीरी पंडित अधिकारियों की एक कथित ‘हिट लिस्ट’ जारी की है। इसमें छह सरकारी कर्मचारियों के नाम और फोन नंबर शामिल हैं।

यह धमकी खास तौर पर उन कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को दी गई है, जो सरकारी रोजगार योजनाओं के तहत काम कर रहे हैं। संगठन ने यह भी धमकी दी है कि अगर आतंकियों और उनके समर्थकों की संपत्तियों को जब्त या कुर्क किया गया, तो सुरक्षा बलों और प्रशासन के खिलाफ कड़ी जवाबी कार्रवाई की जाएगी।

‘हिट लिस्ट’ में कश्मीरी पंडित कर्मचारी

धमकी भरे नोट में दावा किया गया है कि संगठन सरकारी विभागों पर नजर रख रहा है। इनमें खास तौर पर राजस्व विभाग शामिल है, जहां सरकारी पैकेज के तहत कई कश्मीरी पंडित कर्मचारी तैनात हैं। नोट में छह कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों के नाम और फोन नंबर भी दिए गए हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इस तरह निजी जानकारी सार्वजनिक करने का मकसद कर्मचारियों में डर पैदा करना और उन्हें संभावित टारगेट के रूप में पहचानना हो सकता है। हालांकि, सीएनएन-न्यूज18 ने सुरक्षा कारणों से धमकी में शामिल कर्मचारियों के नाम और उनके संपर्क नंबर सार्वजनिक नहीं किए हैं।

घाटी से जम्मू जाने पर भी हमले की धमकी

संगठन ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को चेतावनी दी है कि अगर वे कश्मीर घाटी से जम्मू चले भी जाते हैं, तो वे पूरी तरह सुरक्षित नहीं होंगे। धमकी में कहा गया है कि उन्हें कश्मीर के बाहर भी निशाना बनाया जा सकता है। संगठन ने प्रवासी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए दी जा रही प्रशासनिक सुविधाओं का भी विरोध किया है। इनमें घर से काम करने और दूर रहकर काम करने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। संगठन ने ऐसी सुविधाएं जारी रखने पर भी धमकी दी है।

एलजी, डीजीपी और केंद्र को खुली चेतावनी

धमकी भरे नोट में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (एलजी), पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और दिल्ली में मौजूद अधिकारियों को भी चेतावनी दी गई है। संगठन ने दावा किया है कि भविष्य में होने वाले हमलों के दौरान वह लोगों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा। नोट के एक अन्य हिस्से में स्थानीय पुलिस को लेकर भी धमकी दी गई है। इसमें दावा किया गया है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा स्थानीय पुलिसकर्मी स्थानीय इलाकों में ही रहते और आते-जाते हैं। संगठन ने इसी आधार पर पुलिसकर्मियों पर कहीं भी और कभी भी हमले का खतरा बताया है।

लश्कर ‘शैडो फ्रंट’ के जरिए करता है काम: खुफिया सूत्र

भारत के वरिष्ठ खुफिया सूत्रों ने सीएनएन-न्यूज18 को बताया कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन कई बार अलग-अलग नामों से बने ‘शैडो फ्रंट’ के जरिए काम करते हैं। इनमें द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ), यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) और पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ) जैसे नाम शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, इन संगठनों का इस्तेमाल खास तौर पर आम लोगों और धार्मिक समुदायों के खिलाफ होने वाले हमलों की जिम्मेदारी लेने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य इन हमलों को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के बजाय किसी स्थानीय और धर्मनिरपेक्ष प्रतिरोध के रूप में पेश करना हो सकता है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि ऐसे प्रॉक्सी संगठनों के जरिए आतंकी संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली जांच और आतंकवाद के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों से बचने की कोशिश भी करते हैं। इनमें फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की निगरानी और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध शामिल हैं।

कर्मचारियों का डेटा जारी करना सोची-समझी साजिश

खुफिया जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत भर्ती किए गए कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर और उनकी तैनाती की जगहों की जानकारी सार्वजनिक करना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इस जानकारी का इस्तेमाल इन कर्मचारियों को डराने या उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। सुरक्षा एजेंसियों ने यह भी पाया है कि ‘हाइब्रिड आतंकियों’ द्वारा की जाने वाली लक्षित हत्याओं में छोटे और आसानी से छिपाए जा सकने वाले हथियारों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इनमें पिस्तौल और रिवॉल्वर जैसे हथियार शामिल हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, हाइब्रिड आतंकी ऐसे लोग होते हैं जो सामान्य नागरिकों की तरह अपनी नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी जीते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ऐसे लोगों का इस्तेमाल खास लोगों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाई गई

सरकारी कर्मचारियों को मिल रही धमकियों और आतंकवादियों की मदद करने वालों की संपत्ति जब्त किए जाने के बाद सामने आई धमकियों को देखते हुए सुरक्षा बलों ने प्रवासी कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनके रहने की जगहों के आसपास निगरानी भी बढ़ा दी गई है। सुरक्षा एजेंसियां कर्मचारियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए सुरक्षित रास्ते तय कर रही हैं। इसके साथ ही, कर्मचारियों की निजी जानकारी ऑनलाइन साझा करने वाले आतंकी गुटों के खिलाफ खुफिया जानकारी के आधार पर अभियान भी तेज किए गए हैं। इन अभियानों का मकसद ऐसे आतंकी नेटवर्क और उनके मददगारों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करना है।

इंडियन एयरफोर्स का ऑफिसर कैसे हुआ हनीट्रैप, पाकिस्तान को भेजा सीक्रेट डेटा?

IAF Officer Honey Trap: सोशल मीडिया पर एक महिला से हुई बातचीत धीरे-धीरे कथित तौर पर ‘हनी ट्रैप’ में बदल गई। इंडियन एयरफोर्स का एक विंग कमांडर पाकिस्‍तानी हनी ट्रैप का शिकार हुआ है। आरोप है कि इस दौरान भारतीय वायु सेना के एक विंग कमांडर ने महिला के साथ रक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा कर दी। इंडियन एयरफोर्स की तरफ से मंजूरी मिलने के बाद आरोपी अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। अब सवाल उठता है कि IAF का विंग कमांडर इस जाल में कैसे फंसा ?

मामले की जानकारी मिलने के बाद इंडियन एयरफोर्स की खुफिया शाखा ने दिल्ली पुलिस के साथ जरूरी जानकारी साझा की। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने 30 मई की रात विंग कमांडर को गिरफ्तार कर लिया। उनके खिलाफ सरकारी गोपनीयता कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में हैं। पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद 7 जुलाई को अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया। अब इस मामले की सुनवाई अदालत में चल रही है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, जांच में एक बड़े जासूसी नेटवर्क के बारे में जानकारी सामने आई है। आरोप है कि इस नेटवर्क का मकसद देश की रणनीतिक सैन्य खुफिया जानकारी हासिल करना था।

चैट और वीडियो कॉल के जरिए बढ़ी नजदीकी

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, विंग कमांडर एक फील्ड यूनिट में तैनात थे। इसी दौरान सोशल मीडिया के जरिए एक महिला ने उनसे संपर्क किया। दोनों के बीच पहले चैट और फिर वीडियो कॉल के जरिए बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे महिला ने कथित तौर पर अधिकारी का भरोसा जीत लिया। आरोप है कि महिला ने विंग कमांडर से सैन्य गतिविधियों, सैनिकों की तैनाती और दूसरी अहम जानकारियों के साथ-साथ तस्वीरें और वीडियो भी साझा करने को कहा। जांचकर्ताओं के मुताबिक, जांच के दौरान पता चला कि अधिकारी ने कथित तौर पर डिजिटल माध्यमों के जरिए महिला को महत्वपूर्ण दस्तावेज और डेटा भेजे थे।

डेटा चुराने वाला ऐप कैसे सामने आया

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि महिला ने कथित तौर पर विंग कमांडर से अपने एक साथी अधिकारी के मोबाइल फोन में एक खास ऐप इंस्टॉल करने को कहा था। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, महिला ने पहले विंग कमांडर से जरूरी जानकारी हासिल की और इसके बाद उनसे दूसरे अधिकारी के फोन में यह ऐप इंस्टॉल करने के लिए कहा। जांचकर्ताओं का कहना है कि यह ऐप सामान्य ऐप नहीं था, बल्कि स्पाइवेयर या रिमोट एक्सेस मैलवेयर की तरह काम कर सकता था। ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल मोबाइल से डेटा चुराने, उसकी लोकेशन पता करने या बातचीत पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है।

पुलिस के अनुसार, आरोपी अधिकारी ने दूसरे अधिकारी के मोबाइल फोन में यह संदिग्ध ऐप इंस्टॉल किया था। जांच में इस ऐप की भूमिका को भी अहम माना जा रहा है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस जांच में यह भी पता चला कि जब महिला ने विंग कमांडर से संपर्क किया था, उस समय वह अपनी निजी जिंदगी में मुश्किल दौर से गुजर रहे थे।

पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स की भूमिका की जांच

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, सोशल मीडिया के जरिए विंग कमांडर से संपर्क करने वाली महिला कथित तौर पर पाकिस्तान में बैठे कुछ हैंडलर्स के इशारे पर काम कर रही थी। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि अधिकारी ने महिला के साथ कितनी संवेदनशील जानकारी साझा की थी और क्या यह पूरा मामला किसी बड़े जासूसी नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसियां विंग कमांडर और महिला के बीच हुई चैट, वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल बातचीत के रिकॉर्ड की भी जांच कर रही हैं। इसके जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि दोनों के बीच कब से संपर्क था और इस दौरान किस तरह की जानकारी साझा की गई।

मुस्लिम नाटो- पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये के बीच रक्षा समझौता साइन:एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा; साझा ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग बढ़ेगा

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में बढ़ा कदम उठाया है। तीनों देशों ने शुक्रवार को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक, अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो इसे तीनों देशों पर अटैक माना जाएगा। इस समझौते पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान साइन किए। समझौते के तहत तीनों देश आपस में रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे। इसके लिए संयुक्त सैन्य ट्रेनिंग, सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा करने और सुरक्षा समन्वय बढ़ाने पर काम किया जाएगा। साथ ही तीनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी मजबूत किया जाएगा। समझौते के तहत सैन्य मदद कितनी तय है विश्लेषकों के मुताबिक, तीनों देशों ने क्षेत्रीय विरोधियों को नाराज करने से बचने की कोशिश की है। यह अभी साफ नहीं है कि समझौता अपने किसी सदस्य पर हमला होने पर बाकी सदस्यों को उसकी रक्षा के लिए कितना मजबूर करेगा। किलोवेन ग्रुप सलाहकार कंपनी के चेयरमैन हार्लन उलमैन ने अल जजीरा से कहा, “हमने अभी मक्का घोषणा नहीं देखी है। हमारा मानना है कि इसमें कहा गया है कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाना चाहिए। यहां ‘माना जाना चाहिए’ महत्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि इसका मतलब ‘जरूरी तौर पर’ नहीं है।” क्षेत्रीय खतरे इन देशों से दूर नहीं हैं। पाकिस्तान फरवरी से अफगानिस्तान के साथ सीमा संघर्ष में उलझा हुआ है। मई 2025 में उसका परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ भी कई दिनों तक गोलीबारी का आदान-प्रदान हुआ था। सऊदी अरब पर फरवरी के अंत में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान और उसके सहयोगी बार-बार हमले कर चुके हैं। तुर्किये कई साल से देश के अंदर और बाहर कुर्द सशस्त्र समूहों से लड़ता रहा है। इजराइल के साथ उसका तनाव भी बढ़ा है। उलमैन जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौता तीनों देशों को इनमें से किसी संघर्ष में कैसे खींच सकता है। उलमैन ने कहा, “मान लीजिए यमन में हूती सऊदी अरब पर हमला करते हैं, तो क्या इससे तुर्किये इसमें शामिल होगा? क्या पाकिस्तान शामिल होगा? यह अभी देखा जाना बाकी है।” मध्य पूर्व में बदलते समीकरण मध्य पूर्व में पिछले कुछ सालों में काफी उथल-पुथल हुई है। इसमें सबसे अहम घटनाएं 7 अक्टूबर 2023 को हमास का इजराइल पर हमला और उसके बाद गाजा में इजराइल का नरसंहार हैं। ईरान और इजराइल के बीच दशकों से चल रही धमकियां भी ऐसे क्षेत्रीय युद्ध में बदल गई हैं, जो अभी खत्म नहीं हुआ है। अब मध्य पूर्व और उसके बाहर के कई देश इस अव्यवस्था से निपटने और अगले दौर की तैयारी का तरीका तलाश रहे हैं। इनमें से कई देश पुराने मतभेद पीछे छोड़कर आपसी खतरों के सामने व्यावहारिक रास्ता अपनाने का फैसला करते दिख रहे हैं। तुर्किये और सऊदी अरब इसके उदाहरण हैं। 2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की अपने देश के इस्तांबुल वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार आ गई थी। यह तनाव कई साल तक बना रहा। लेकिन 2022 तक रियाद और अंकारा ने पुराने मतभेद पीछे रखने शुरू कर दिए। सऊदी अरब पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा था, जबकि तुर्किये अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करना चाहता था। इसके बाद से इजराइल और ईरान ने मध्य पूर्व पर दबाव बनाया है और इस क्षेत्र के लिए अलग-अलग योजनाओं पर आगे बढ़े हैं। माना जाता है कि इसी दबाव ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये को एक-दूसरे के करीब आने में मदद की है। तीनों देशों की अलग-अलग ताकत मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का मकसद तीनों देशों के सामने आने वाले किसी भी खतरे को रोकना है। अल जजीरा के संवाददाता उसामा बिन जावेद ने कहा कि तीनों देश इस समझौते में अलग-अलग ताकत लेकर आए हैं। बिन जावेद ने कहा, “इनमें से हर देश अपनी खास क्षमता लेकर आया है। पाकिस्तान के पास युद्ध का अनुभव रखने वाली सेना, हथियार और परमाणु हथियार हैं। मुस्लिम बहुल देश में परमाणु हथियार रखने वाला यह इकलौता देश है।” उन्होंने कहा, “नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य तुर्किये के पास दुनिया की बेहतरीन ड्रोन तकनीक और उन्नत रक्षा निर्माण क्षमता है। सऊदी अरब इन सबको आर्थिक ताकत देने का काम करेगा।” अमेरिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नए सैन्य गठबंधनों और खतरों से बचाव के नए तरीकों की जरूरत और ज्यादा महसूस की जा रही है। सऊदी अरब और कुछ हद तक तुर्किये लंबे समय से अमेरिका को अपना प्रमुख सुरक्षा सहयोगी मानते रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति लगातार बदलती और अनिश्चित होती जा रही है। ऐसे में दुनिया के कई देश दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि मध्य पूर्व में इजराइल अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता दिखाई देता है। इससे यह चिंता बढ़ी है कि अमेरिका अपने दूसरे सहयोगियों की रक्षा करने के लिए कितना तैयार होगा। उलमैन ने कहा, “ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि सहयोगियों को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। मेरे लिए यह साफ है कि हमारे सहयोगी दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं।” इजराइल और ईरान को लेकर सावधानी इजराइल और ईरान ने खुद को क्षेत्रीय खतरे के रूप में दिखाया है। फिर भी मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल देशों ने यह बताने से सावधानी बरती है कि यह गठबंधन किसी बाहरी ताकत के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरे साफ हैं। बिन जावेद ने कहा, “तीनों देशों के लिए इजराइल क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता का सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।” उन्होंने कहा, “ईरान इस खतरे की सूची में उसके ठीक बाद आता है। खासकर ईरान की ओर से वॉशिंगटन के हितों पर हमलों के बाद सऊदी अरब के लिए यह खतरा और ज्यादा है।” क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि इजराइल ने 2023 के बाद यह दिखाया है कि वह मतभेदों को बातचीत से सुलझाने के बजाय सैन्य ताकत से सुलझाने में ज्यादा रुचि रखता है। इससे पहले इजराइल ने सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की थी। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उभरते हुए “सुन्नी गठबंधन” के खतरों की बात भी शुरू की है। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया है कि उनका मतलब किस गठबंधन से है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेतन्याहू के बयान ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिसमें सुन्नी बहुल ताकतें वास्तव में एक साथ आ जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये तीनों देशों में सुन्नी बहुसंख्यक हैं। ईरान पहले ही सऊदी अरब पर हमला कर चुका है। ईरान समर्थित दूसरे समूह भी सऊदी अरब पर हमले कर चुके हैं। इसके जवाब में सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित समूहों पर हमले किए हैं। क्या गठबंधन में नए देश जुड़ेंगे यह अभी साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में मिस्र, कतर, सीरिया और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई जैसे दूसरे देश भी शामिल होंगे या नहीं। ऐसे गठबंधन के फायदे समझ में आते हैं। मध्य पूर्व के सुन्नी बहुल देश अक्सर अलग-अलग रहे हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी वजह से वे इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरों से निपट नहीं पाए हैं। हालांकि, पुराने मतभेद और अलग-अलग हित इस गठबंधन के विस्तार को तय नहीं मानने की वजह देते हैं। सीरिया इस समय 13 साल चले भीषण संघर्ष के बाद युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर ध्यान दे रहा है। इजराइल की उत्तरी सीमा पर उसकी स्थिति ऐसी है कि वह ऐसे समझौते में शामिल होने से हिचक सकता है, जिसे इजराइल नकारात्मक नजर से देखे। मिस्र ने भी साफ संकेत दिए हैं कि उसका ध्यान अर्थव्यवस्था पर है और वह देश के अंदर किसी उथल-पुथल से बचना चाहता है। अतीत में वह क्षेत्र में जहाजों के रास्तों की सुरक्षा के लिए सऊदी अरब की अगुआई वाले समुद्री गठबंधन में शामिल होने से हिचक चुका है। मिस्र को डर था कि वह क्षेत्रीय संघर्ष में खिंच सकता है। यूएई भी सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के गठबंधन में संभावित सदस्य हो सकता है। लेकिन हाल के सालों में यूएई के रुख कई बार इन देशों से अलग रहे हैं। यमन और इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने जैसे मुद्दों पर यह अंतर सबसे ज्यादा दिखाई दिया है। अमेरिका के समर्थन से हुए अब्राहम समझौते इजराइल के साथ ज्यादा करीबी रखने वाले एक दूसरे क्षेत्रीय समूह को सामने लाते हैं। इसे मक्का गठबंधन में शामिल देशों के प्रतिद्वंद्वी समूह के रूप में देखा जा सकता है। गठबंधन की असली परीक्षा कब होगी मध्य पूर्व के रिश्तों की जटिलता शुक्रवार को हुए समझौते के बाद नए क्षेत्रीय समीकरण के उभरने वाली किसी भी धारणा की मुश्किलें दिखाती है। इस क्षेत्र में गठबंधन दशकों से बदलते रहे हैं। आगे भी इनमें बदलाव हो सकते हैं। इस गठबंधन का असली आकलन तब होगा, जब इसकी वास्तविक परीक्षा होगी। इजराइल और ईरान ने दिखाया है कि वे युद्ध करने और उसके नतीजे झेलने के लिए तैयार हैं। अब सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान एक-दूसरे के लिए ऐसा करने को तैयार हैं। आज के मध्य पूर्व में ऐसी स्थिति बन सकती है, जो उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर करे। आखिरकार, उनके फैसले ही साफ करेंगे कि क्या वास्तव में एक तीसरा क्षेत्रीय ध्रुव उभर रहा है।

5000वां एतिहासिक एकदिवसीय मुकाबला खेला गया इन दो टीमों के बीच में

डुंडी में शुक्रवार को स्कॉटलैंड और कनाडा के बीच मैच के साथ ही पुरुष वनडे के 5000 मुक़ाबले पूर्ण हो गए।इस प्रारूप का जन्म जनवरी 1971 में हुआ था और इन 55 वर्षों में प्रारूप में लगातार बदलाव आया है। पांच हज़ार मुक़ाबलों को हज़ार-हज़ार के अलग समूह में बांटकर एक बेहतर तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई है। पहले तीन वनडे विश्व कप में प्रति टीम 60 ओवर के मुक़ाबले खेले जाते थे जबकि इंग्लैंड में होने वाले दो देशों के बीच मुक़ाबले प्रति टीम 55 ओवर के मुक़ाबले होते थे।

ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और पाकिस्तान में शुरुआती मुक़ाबले प्रति टीम 40 और 35 ओवर के मुक़ाबले होते थे, जिसमें एक ओवर में आठ गेंदें होती थीं। एशिया में प्रति टीम 40 ओवर के मुक़ाबले होते थे जिसमें एक ओवर में छह गेंदें होती थीं। पिछला पुरुष वनडे मुक़ाबला जो कि 50 ओवर का मुक़ाबला नहीं था, वो 1995 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ के बीच मुक़ाबला खेला गया था। 1995 में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ के बीच खेला गया यह मुक़ाबला 1002वां वनडे था और यह प्रति टीम 55 ओवर का मुक़ाबला था।

पहले 24 वर्षों में 1000 वनडे और अगले 31 वर्षों में 4000 वनडे

1000वां वनडे मैच 1995 में उसी इंग्लैंड-वेस्टइंडीज़ सीरीज़ के दौरान नॉटिंघम में खेला गया था जो कि रिज़र्व डे तक गया था। पहले 1000वें मुक़ाबले तक पहुंचने के लिए 24 वर्षों का इंतज़ार करना पड़ा और अगले 31 वर्षों में चार हज़ार वनडे खेले गए।अगले 1000 हज़ार वनडे आठ वर्षों के अंतराल पर खेले गए, जिसमें पहले 1000 वनडे के मुक़ाबले एक तिहाई कम समय लगा। टी 20 प्रारूप के आगमन के बावजूद वनडे खेले जाने की निरंतरता में सीधे तौर पर कमी नहीं आई।

2007 में कुल 191 वनडे खेले गए जिस साल पहली बार टी 20 विश्व कप खेला गया था, इस साल एक साल में सबसे ज़्यादा वनडे खेले गए थे और ऐसा करते हुए 2006 में खेले गए सर्वाधिक 160 वनडे का रिकॉर्ड पीछे छूट गया था। अगले 1000 वनडे 2630 दिनों के अंतराल पर खेले गए जो कि किसी भी ब्लॉक में लिए गए सबसे कम दिन थे।

2023 में खेले गए सबसे हालिया वनडे विश्व कप ने एक साल में सर्वाधिक मुक़ाबलों का रिकॉर्ड तोड़ दिया, इस साल 218 वनडे मुक़ाबले खेले गए। इसके पिछले साल भी 161 वनडे खेले गए थे। लेकिन 1000 वनडे के पांचवें ब्लॉक को पूर्ण करने में 3063 दिन लग गए। 2020 में आई महामारी, टी 20 लीगों का बढ़ना, द्विपक्षीय सीरीज़ कम खेला जाना और अन्य कारण वनडे की संख्या में आई कमी की वजह रहे हैं।

PoK में पाकिस्तान के साथ हो गया खेल! वहां चुनाव के मामले को लेकर आया बड़ा ट्विस्ट और बढ़ गईं मुश्किलें

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सुरक्षा कारणों से दो विधानसभा क्षेत्रों में मतदान फिलहाल टाल दिया गया है। चुनाव आयोग ने शुक्रवार को पुंछ और पलंदरी सीटों पर चुनाव स्थगित करने का फैसला लिया। इन सीटों पर 10 अगस्त को आम चुनाव के तीसरे चरण में मतदान होना था। बताया गया है कि इलाके में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन और बिगड़ती कानून-व्यवस्था को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। अधिकारियों ने अगले आदेश तक इन दोनों सीटों पर मतदान नहीं कराने का निर्णय किया है।

टल गया चुनाव 

चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला लेने से पहले गृह विभाग की सुरक्षा रिपोर्ट का अध्ययन किया गया। साथ ही राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की राय भी ली गई। आयोग ने कहा कि सुरक्षा स्थिति सामान्य होने के बाद नए मतदान कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब अवामी एक्शन कमेटी (एएसी) के नेतृत्व में पिछले कई हफ्तों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। संगठन राजनीतिक और प्रशासन से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहा है।

खासकर पुंछ डिवीजन के कई इलाकों में प्रदर्शन ज्यादा तेज रहे हैं। स्थानीय नेताओं का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा हालात का असर मतदाताओं और चुनाव प्रक्रिया पर पड़ सकता है। अधिकारियों के अनुसार, चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से कराना जरूरी है। इसी वजह से पुंछ और पलंदरी सीटों पर मतदान फिलहाल टाल दिया गया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने साफ किया है कि 10 अगस्त को तीसरे चरण का मतदान बाकी सभी निर्वाचन क्षेत्रों में तय कार्यक्रम के अनुसार होगा।

लोगों के अंदर है गुस्सा 

10 अगस्त को बाग जिले की तीन सीटों और हवेली जिले की एक सीट पर भी मतदान होना है। इसके साथ ही पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में चुनाव का अंतिम चरण पूरा होगा। ये चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं, जब इलाके में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और कई जगह विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विपक्षी दल प्रशासन पर शासन व्यवस्था और चुनाव कराने के तरीके को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पुंछ और पलंदरी सीटों से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों ने भी चुनाव आयोग से मतदान टालने की मांग की थी। उनका कहना था कि मौजूदा सुरक्षा हालात मतदाताओं, मतदान कर्मियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि पुंछ और पलंदरी में मतदान की नई तारीख का ऐलान तभी किया जाएगा, जब अधिकारियों को भरोसा हो जाएगा कि वहां शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से चुनाव कराए जा सकते हैं।

‘एक और पाकिस्तान…’, आतंकवाद पर को शेख हसीना के बेटे ने दिखाया आईना, भारत ने कही ये बात

भारत ने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे साजीब वाजेद जॉय के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया दी। बता दें कि, जॉय ने दावा किया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और बढ़ते आतंकवाद के कारण बांग्लादेश, भारत के पूर्वी हिस्से के लिए “एक और पाकिस्तान” बन गया है। शुक्रवार 8 अगस्त को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मुद्दे पर कहा कि भारत पूरी तरह सतर्क है और पड़ोसी देशों में हो रही हर गतिविधि पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा, “हम अपने क्षेत्र और पड़ोसी देशों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं। सुरक्षा के लिहाज से हर स्थिति की निगरानी की जाती है और जरूरत पड़ने पर उचित कदम भी उठाए जाते हैं।”

हसीना के बेटे ने क्या दावा किया?

साजीब वाजेद जॉय ने यह बयान बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया। यह कार्यक्रम साउथ एशिया फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब (एफसीसी) की ओर से आयोजित किया गया था। उन्होंने यह बात बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के वर्चुअल संबोधन से पहले कही। भारत की सुरक्षा का जिक्र करते हुए जॉय ने दावा किया कि “भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होनी चाहिए कि बांग्लादेश उसके पूर्वी मोर्चे पर एक और पाकिस्तान बनता जा रहा है।” उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस) को बांग्लादेश में खुलकर काम करने की छूट मिली हुई है।

शेख हसीना के वर्चुअल संबोधन पर क्या बोला विदेश मंत्रालय?

बांग्लादेश में 5 अगस्त 2024 को छात्रों के नेतृत्व में हुए बड़े आंदोलन के बाद शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद से वह भारत में रह रही हैं। हसीना के पद छोड़ने के बाद मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उनकी देखरेख में देश में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हुई और इस साल फरवरी में चुनाव कराए गए।

इस बीच, भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शेख हसीना के वर्चुअल संबोधन के आयोजन में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस वार्ता में कहा, “जिस कार्यक्रम की बात की जा रही है, उसका आयोजन एक निजी मीडिया संस्था कर रही है। इसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं है और न ही सरकार उस मंच पर रखे जाने वाले विचारों का समर्थन करती है।”

अगले महीने की इस तारीख को होगा भारत बनाम पाकिस्तान का मुकाबला

एशियन क्रिकेट काउंसिल ने गुरुवार को घोषणा की कि 2026 महिला एशिया कप का मुख्य मुकाबला भारत और पाकिस्तान के बीच पांच सितंबर को दुबई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में खेला जाएगा। टूर्नामेंट की शुरुआत 28 अगस्त को थाईलैंड और हांगकांग के बीच मैच से होगी। यह महिला एशिया कप का छठा संस्करण होगा जो टी-20 प्रारूप में खेला जाएगा।

आठ टीमों को दो ग्रुप में बांटा गया है; ग्रुप ए में भारत और पाकिस्तान के साथ थाईलैंड, हांगकांग और चीन शामिल हैं, जबकि ग्रुप बी में श्रीलंका, बंगलादेश, यूएई और इंडोनेशिया हैं। टूर्नामेंट का पहला मैच थाईलैंड और हांगकांग के बीच खेला जाएगा।हर ग्रुप की टॉप दो टीमें सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई करेंगी और फाइनल 13 सितंबर को खेला जाएगा। सभी मैच दुबई अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में फ्लडलाइट्स की रोशनी में खेले जाएंगे।

टी-20 प्रारुप में भारत का पलड़ा पाकिस्तान पर हमेशा भारी रहा है। टीम ने कुल 16 मुकाबलों में से 13 मैचों में जीत हासिल की है। हाल में हुए टी-20 विश्वकप मैच में भी भारत ने पाकिस्तान को 60 रनों से बड़ी हार थमाई थी। इसका कारण है पॉवर हिटिंग और स्पिन गेंदबाज जिसका तोड़ सालों साल पाकिस्तान भारत के खिलाफ नहीं निकाल पाया है।पाकिस्तान ने अंतिम बार भारत को इस प्रारुप में साल 2016 के टी-20 विश्वकप में हराया था।

Donald Trump: ‘हमारे पास हथियारों की कमी नहीं’ ट्रंप ने अमेरिकी मिसाइलों की कमी की खबरों को किया खारिज, कहा- ईरान के साथ जल्द होगा समझौता

Donald Trump Statement: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को उन खबरों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि ईरान के साथ महीनों के टकराव के बाद अमेरिका के पास अहम मिसाइलों का स्टॉक कम हो गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सेना के पास हथियारों की पर्याप्त आपूर्ति है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि कुछ हथियारों का स्टॉक “थोड़ा कम” हो गया है।

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि पेंटागन (अमेरिकी रक्षा विभाग) के पास अभी भी हथियारों का पर्याप्त भंडार है। उन्होंने उन मीडिया रिपोर्टों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि ईरान के साथ पांच महीने के संघर्ष के दौरान देश ने अपनी सटीक मारक क्षमता वाली लंबी दूरी की मिसाइलों का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है।

ट्रंप ने हथियारों की कमी के दावों को किया खारिज

हथियारों की व्यापक कमी के दावों को खारिज करते हुए, उन्होंने माना कि कुछ तरह के हथियारों की सप्लाई दूसरों की तुलना में कम थी। उन्होंने कहा, “कुछ मामलों में सप्लाई थोड़ी कम है।”

हालांकि, उन्होंने बड़े स्तर पर हथियारों की कमी की खबरों को खारिज करते हुए माना कि हथियारों की सप्लाई दूसरों की तुलना में कम थी। उन्होंने कहा, कुछ मामलों में सप्लाई थोड़ी कम है।”

उन्होंने कहा कि अमेरिका “बहुत अच्छी स्थिति” में है और जaर देकर कहा, “हमारे पास सचमुच भारी मात्रा में गोला-बारूद है।”

रक्षा कंपनियां प्रोडक्शन बढ़ा रही हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि रक्षा कंपनियां अपना प्रोडक्शन बढ़ा रही हैं, जिसमें पैट्रियट और टॉमहॉक मिसाइलें बनाने के लिए नई सुविधाएं तैयार करना भी शामिल है। उन्होंने कहा, “हम हमेशा और ज्यादा चाहते हैं। हमारे पास और ज्याद होना चाहिए।”

वहीं, कई अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान के साथ चले युद्ध के दौरान पेंटागन ने अपनी वैश्विक मिसाइल भंडार का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल किया है। इनमें बेहद सटीक मारक क्षमता वाली लंबी दूरी की मिसाइलें भी शामिल हैं।

ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा

ट्रंप ने भरोसा जताया कि ईरान के साथ चल रहा युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह बहुत जल्द खत्म हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि वे इसे ज़्यादा देर तक खींच पाएंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि वे तेहरान के साथ बातचीत में शामिल हैं। “सब ठीक चल रहा है। जल्द ही कोई समझौता हो सकता है।”

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अमेरिका में पहली बार ‘बर्थ टूरिज्म’ पर रोक:यहां पैदा हुए विदेशियों के बच्चे को नागरिकता नहीं मिलेगी; ट्रम्प बोले- बर्थराइट सिटीजनशिप मजाक बन गई थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर अमेरिका में जन्म लेने वाले लोगों को नागरिकता मिलने के दायरे को सीमित करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति ने बताया कि उन्होंने इमिग्रेशन से जुड़े दो कार्यकारी आदेश साइन किए हैं। इनमें से एक अमेरिका में पैदा होने वाले उन लोगों की संख्या को सीमित करेगा, जो यहां नागरिकता पाने के हकदार हैं। ट्रम्प ने बताया कि दूसरा आदेश ‘बर्थ टूरिज्म’ पर लगाम लगाने के लिए है। इसके तहत उन विदेशी पर्यटकों पर वीजा प्रतिबंध बढ़ाए जाएंगे, जो अमेरिका में आकर बच्चे को जन्म देना चाहते हैं। इससे पहले बर्थराइट सिटीजनशिप को सीमित करने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था, लेकिन अब वे दोबारा इसके लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इन आदेशों के बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन ट्रम्प का मानना है कि उनके ये नए कदम संवैधानिक होंगे। जून में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था इससे पहले जून में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने बर्थराइट सिटीजनशिप को बरकरार रखा था। कोर्ट ने ट्रम्प के उन पिछले प्रयासों को खारिज कर दिया था, जिनमें उन्होंने यह घोषित करने की कोशिश की थी कि अमेरिका में अवैध-अस्थायी रूप से रह रहे लोगों के बच्चे अमेरिकी नागरिक नहीं हैं। कोर्ट ने कहा था कि अमेरिका में गैर-कानूनी या अस्थायी रूप से मौजूद लोगों के बच्चे अपने-आप अमेरिकी नागरिकता पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने ‘यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क’ मामले में अपने पहले के फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि विदेशी माता-पिता से अमेरिका में पैदा हुए बच्चे इसके हकदार हैं। कैसे मिला था बर्थराइट सिटीजनशिप का अधिकार व्हाइट हाउस के सलाहकार स्टीफन मिलर ने कहा कि ये एग्जीक्यूटिव एक्शन 14वें संशोधन के मूल मकसद पर आधारित हैं। अमेरिकी संविधान में किया गया 14वां संशोधन खास तौर पर गृह युद्ध के बाद इसलिए बनाया गया था ताकि यह पक्का किया जा सके कि गुलामों के बच्चे नागरिक बन सकें। इसका उद्देश्य हर विदेशी नागरिक के बच्चे को स्वतः नागरिकता देना नहीं था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, ऐसी नागरिकता के लिए अयोग्य लोगों की कैटेगरी का दायरा बढ़ाने के लिए कमांडर-इन-चीफ के तौर पर अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। बर्थराइट-बर्थ टूरिज्म पर नए आदेश का असर 2024 में बर्थ टूरिज्म से पैदा हुए बच्चों की संख्या 9600 थी ट्रम्प प्रशासन इसे बहुत बड़े खतरे के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन आधिकारिक आंकड़े कुछ और बताते हैं। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (MPI) के मुताबिक अमेरिका में हर साल जन्म लेने वाले बच्चों में से एक बहुत ही छोटा हिस्सा ‘बर्थ टूरिज्म’ से जुड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक 22,000 से 26,000 बच्चों के पेरेंट्स अमेरिकी नागरिकता पाने के मकसद से वहां पहुंचते हैं। 2024 के सरकारी आंकड़ों में विदेशी पते वाली मांओं के केवल 9,600 जन्म दर्ज किए गए थे। ————– ट्रम्प से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम: पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए अब राह पहले जैसी आसान नहीं रही। ट्रम्प सरकार की सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी के बीच 2025 में भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट आई है। इसके उलट पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले के मुकाबले ज्यादा वीजा मिले हैं। पढ़ें पूरी खबर…

ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम:65 साल में पहली बार अप्रवासियों की संख्या घटी; पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा

अमेरिका में ट्रम्प सरकार की सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी का सबसे बड़ा असर भारतीय छात्रों पर दिख रहा है। 2025 में भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट आई है। वहीं, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले के मुकाबले ज्यादा स्टूडेंट वीजा मिले हैं। सिर्फ छात्रों पर ही नहीं, सख्ती का असर अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों की संख्या पर भी दिखा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 में अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या रिकॉर्ड 5.33 करोड़ थी, जो जून तक घटकर 5.19 करोड़ रह गई। 1960 के दशक के बाद यह पहली बार है, जब अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या कम हुई है। भारतीय स्टूडेंट्स को मिलने वाले अमेरिकी वीजा 62% घटे सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (CIS) के मुताबिक, मई से अगस्त के बीच जब एडमिशन पीक पर होता है तब 2025 में भारतीय छात्रों को पिछले साल के मुकाबले 62% कम वीजा मिले। चीनी छात्रों को भी 2025 में 34% कम वीजा मिले। वहीं कई दूसरे एशियाई देशों के छात्रों की संख्या बढ़ी है। 2025 की पहली छमाही में वियतनाम के छात्रों को 5,324 F-1 वीजा मिले, जो पिछले साल से 19.6% ज्यादा हैं। इसी दौरान बांग्लादेश के छात्रों को 2,098 F-1 वीजा मिले, यानी 20.1% की बढ़ोतरी हुई। पाकिस्तान के छात्रों को 1,928 वीजा मिले, जो 44.3% ज्यादा हैं। ट्रम्प सरकार ने वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग की वीजा में आई इस गिरावट की एक बड़ी वजह ट्रम्प सरकार के नए नियम रहे। जैसे- अमेरिका की जगह यूरोप का रुख कर रहे हैं भारतीय छात्र कई भारतीय छात्र अब यूरोप का रुख कर रहे हैं। जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देश भारतीय छात्रों की नई पसंद बन रहे हैं। इसकी वजह कम फीस, आसान वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद नौकरी के बेहतर मौके हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, यूरोप की कई यूनिवर्सिटीज की फीस अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से 50% से 80% तक कम होती है। 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 45% बढ़ी, जबकि जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड में भारतीय छात्रों का दाखिला 68% बढ़ा। वहीं, कुछ भारतीय प्रोफेशनल भी वीजा नियमों और नौकरी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत लौटने या दूसरे देशों का रुख करने लगे हैं। H-1B वीजा में अब भी भारत सबसे आगे स्टूडेंट वीजा में गिरावट के बावजूद नौकरी के लिए मिलने वाले H-1B वर्क वीजा में भारत की पकड़ अब भी सबसे मजबूत है। 2024 में जारी H-1B वीजा में 71% भारतीयों को मिले। चीन दूसरे स्थान पर रहा, जबकि फिलीपींस, कनाडा और साउथ कोरिया की हिस्सेदारी करीब 1-1% रही। यानी, स्टूडेंट वीजा घटे हैं, लेकिन नौकरी के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। अमेरिका अब भी सबसे बड़ा प्रवासी देश सख्त नियमों और वीजा में गिरावट के बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी देश बना हुआ है। बेहतर शिक्षा, नौकरी और कमाई के मौके आज भी लाखों लोगों को अमेरिका की ओर आकर्षित करते हैं। 2023 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में सबसे ज्यादा 1.1 करोड़ प्रवासी मेक्सिको से हैं। इसके बाद भारत (32 लाख), चीन (30 लाख), फिलीपींस (21 लाख) और क्यूबा (17 लाख) का स्थान है। प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, अमेरिका में रहने वाले कुल प्रवासियों में 52% लैटिन अमेरिका और 27% एशिया से हैं। यानी, अमेरिका की प्रवासी आबादी में एशियाई देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में वीजा नियमों में होने वाले बदलाव का असर भारत, चीन और दूसरे एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। अमेरिका में विदेशी टूरिस्टों की भी संख्या घटी अमेरिका आने वाले विदेशी टूरिस्टों की संख्या भी घटी है। 2025 में करीब 6.83 करोड़ विदेशी टूरिस्ट अमेरिका पहुंचे, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 7.23 करोड़ था। टूरिस्टों के खर्च में भी 8 अरब डॉलर से ज्यादा की कमी आई। सबसे ज्यादा गिरावट कनाडा से आने वाले टूरिस्टों में रही। भारत, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और चीन से आने वाले टूरिस्टों की संख्या भी कम हुई, जबकि मेक्सिको से आने वाले टूरिस्ट बढ़े। यानी, ट्रम्प सरकार की सख्ती का असर सिर्फ स्टूडेंट वीजा ही नहीं, बल्कि इमिग्रेशन और विदेशी टूरिज्म पर भी साफ दिख रहा है।