नेतन्याहू ने ब्रिटेन को बताया ‘इस्लामिक रिपब्लिक’:बोले- परमाणु हथियार रखने वाला पहला ऐसा देश होगा; इजराइल को लेकर इंग्लैंड में सोच बदली

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ब्रिटेन पर तंज कसते हुए उसे ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन ऐसा इस्लामिक देश बन सकता है, जिसके पास परमाणु हथियार हों। नेतन्याहू ने यह बात गुरुवार को आर्मी रेडियो के एक पॉडकास्ट में कही। नेतन्याहू ने ब्रिटेन की मौजूदा स्थिति की तुलना ईरान से करते हुए कहा कि इजराइल यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके। नेतन्याहू ने कहा- आप ब्रिटेन को ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’ कह सकते हैं। किसी ने कहा था कि परमाणु हथियार रखने वाला पहला इस्लामिक रिपब्लिक ब्रिटेन होगा। हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ऐसा दूसरा देश न हो… आप जानते हैं मैं ईरान की बात कर रहा हूं।” नेतन्याहू का बयान सुनिए…
नेतन्याहू बोले- ब्रिटेन में इजराइल को लेकर सोच बदली नेतन्याहू ब्रिटेन और यूरोप में आबादी में हो रहे बदलावों की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कुछ दशक पहले ब्रिटेन में इजराइल को लेकर सोच आज से काफी अलग थी। उन्होंने 1967 में अरब देशों के साथ हुए युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के बेटे और पोते उस समय पत्रकार बनकर इजराइल आए थे। उन्होंने युद्ध की रिपोर्टिंग इजराइल के पक्ष में की थी। नेतन्याहू ने कहा कि आज के ब्रिटेन में ऐसा माहौल देखना मुश्किल है। नेतन्याहू यूरोप को लेकर ऐसा क्यों कहते हैं? नेतन्याहू ने यह भी कहा कि पूरे यूरोप में ब्रिटेन जैसी स्थिति बन रही है। वह पहले भी यूरोप में बढ़ती मुस्लिम आबादी और दूसरे देशों से आने वाले मुस्लिम प्रवासियों को लेकर चिंता जता चुके हैं। उनका कहना है कि यूरोपीय देशों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ वहां की सरकारों का इजराइल के प्रति रुख भी बदल रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले के बाद गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई शुरू हुई। इसके बाद कई यूरोपीय देशों ने इजराइल की कार्रवाई और गाजा में आम लोगों की स्थिति को लेकर उसकी आलोचना की। नेतन्याहू का मानना है कि यूरोप में आबादी में हो रहे बदलाव भी इजराइल के खिलाफ बढ़ती आलोचना की एक वजह हैं। वेंस ने भी ब्रिटेन को लेकर ऐसा बयान दिया था नेतन्याहू का यह बयान अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की 2024 की एक टिप्पणी से मिलता-जुलता है। उन्होंने एक भाषण में बताया था कि वह और उनका एक दोस्त इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि परमाणु हथियार रखने वाला पहला इस्लामी देश कौन होगा। वेंस ने कहा- मुझे लगा कि शायद यह ईरान हो सकता है। पाकिस्तान तो पहले से ही परमाणु हथियार रखने वाला देश है। हालांकि ब्रिटेन भी ऐसा देश बन सकता है, क्योंकि वहां लेबर पार्टी सत्ता में आ गई है। दरअसल, उस समय ब्रिटेन में लेबर पार्टी की जीत के बाद कीर स्टार्मर प्रधानमंत्री बने थे। वेंस ब्रिटेन में प्रवासियों को लेकर लेबर पार्टी की नीतियों पर तंज कसते हुए यह टिप्पणी कर रहे थे। वेंस उस समय ओहायो से अमेरिकी सीनेटर थे।

पाकिस्तानी PM बोले- भारत पानी रोकेगा तो मुंहतोड़ जवाब देंगे:कश्मीर पर रुख कभी नहीं बदलेंगे, मुनीर की लीडरशिप में हमने दुश्मन को हराया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर एक बार फिर से भारत को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर इसे रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। प्रधानमंत्री शहबाज ने गुरुवार को इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान का रुख कभी नहीं बदलेगा। अपने भाषण में शहबाज ने एक बार फिर सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तारीफ करते हुए दावा किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को हराया। चीन की दोस्ती को हिमालय से भी मजबूत बताया शहबाज ने अपने भाषण में चीन-पाकिस्तान की दोस्ती को हिमालय से भी बुलंद बताया। उन्होंने कहा कि चीन पाकिस्तान का अजीम दोस्त है। हर मुश्किल घड़ी में वह चट्टान की तरह देश के साथ रहा है। फिर दोहराया- ट्रम्प ने कराया था युद्धविराम शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में एक बार फिर दावा किया कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोकने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अहम भूमिका रही थी। उन्होंने ट्रम्प की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी पहल से समय रहते युद्धविराम संभव हो सका। हालांकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि संघर्ष विराम दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे बातचीत से हुआ था और इसमें किसी तीसरे देश की कोई मध्यस्थता नहीं थी। कश्मीर, फिलिस्तीन और अफगानिस्तान पर भी बोले अपने भाषण में शहबाज शरीफ ने कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान का रुख नहीं बदलेगा और कश्मीरियों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान फिलिस्तीन के लोगों के अधिकारों का समर्थन करता रहेगा। अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार से उन्होंने अपील की कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दे। साथ ही दावा किया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई है। भारत ने पहलगाम हमले के बाद संधि पर लगाई थी रोक अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया था। तभी से यह मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव की बड़ी वजह बना हुआ है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि पर रोक जारी रहेगी। वहीं, पाकिस्तान का दावा है कि यह संधि अब भी कानूनी रूप से प्रभावी है और इसे एकतरफा निलंबित नहीं किया जा सकता। 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों का बंटवारा किया गया था। इसी संधि को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं और हाल के महीनों में यह विवाद फिर से गहरा गया है। गंभीर जल संकट का सामना कर रहा पाकिस्तान रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। खासकर सिंध और बलूचिस्तान में पानी की कमी लगातार बढ़ रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक- पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था के अहम हिस्से सुक्कुर बैराज को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। पानी का स्तर लगातार घटने से कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

इमरान खान से रिश्तेदारों की मुलाकात पर कोर्ट करेगी फैसला:जेल से अस्पताल भेजने की याचिका पर भी सुनवाई, पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के 3 जज सुनेंगे केस

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर 18 अगस्त को सुनवाई तय की है। तीन जजों की बेंच मामले की सुनवाई करेगी। इसमें जस्टिस शाहिद वाहिद, जस्टिस नईम अफगान और जस्टिस इश्तियाक इब्राहिम शामिल हैं। कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय ने सभी संबंधित पक्षों और उनके वकीलों को नोटिस जारी कर दिया है। इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में हैं। उन पर भ्रष्टाचार से लेकर आतंकवाद तक के कई मामले चल रहे हैं। 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उनकी सरकार गिरने के बाद से उनकी राजनीतिक पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) लगातार उनकी रिहाई और मुलाकात की मांग करती रही है। पाकिस्तानी पत्रकार ने इमरान की मौत का दावा किया था अमेरिका में रह रहे पाकिस्तानी पत्रकार वजाहत सईद खान ने एक वीडियो जारी कर इमरान की मौत की आशंका जाहिर की थी। वजाहत ने कहा कि इमरान की मौत की आशंका सेना के अफसरों की सूचनाओं के आधार पर किया गया एक आकलन था। इमरान अगस्त 2023 से रावलपिंडी की अडियाला जेल में बंद हैं। पाकिस्तानी पत्रकार के दावे के बाद इमरान की बहनों ने भी सवाल उठाया कि उन्हें भाई से मिलने नहीं दिया जा रहा है। इमरान की पार्टी बोली- सड़कों पर उतरेंगे इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने कहा है कि अगर उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई, तो 20 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। पार्टी ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने कहा कि PTI का केंद्रीय और प्रांतीय लीडरशिप और उसके सहयोगी दल इस फैसले पर साथ हैं। उन्होंने कहा कि मार्च का मकसद सिर्फ इमरान खान की रिहाई नहीं, बल्कि पार्टी संस्थापक तक पहुंच और उनसे मुलाकात सुनिश्चित करना है। नवंबर 2025 में इमरान से मिली थीं बहनें इमरान खान की बहन उज्मा खान ने नवंबर 2025 में अडियाला जेल में उनसे मुलाकात की। जेल से बाहर आकर उज्मा ने बताया था कि भाई इमरान पूरी तरह ठीक हैं। दोनों के बीच करीब 20 मिनट तक मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा था- इमरान खान की सेहत बिल्कुल ठीक है, लेकिन वे बेहद गुस्से में हैं। उन्हें मेंटली टॉर्चर किया जा रहा है और इस सब के लिए आसिम मुनीर जिम्मेदार हैं। उनकी बाहरी दुनिया तक कोई पहुंच नहीं है। पिछली बार मई 2024 में नजर आए थे इमरान इमरान खान पिछली बार 16 मई 2024 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि आम चुनाव से 5 दिन पहले मुझे अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया, जिससे मैं चुनाव से दूर रहूं। इमरान ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा- केजरीवाल को भी भारत में चुनाव के दौरान कैंपेन के लिए जमानत दी गई थी। इमरान पर चल रहे केस के बारे में जानिए… ————– यह खबर भी पढ़ें… लाल किला धमाका अलकायदा ने कराया:UN की रिपोर्ट में दावा, NIA की जांच में भी यही निकला था; 11 मौतें हुई थीं लाल किले के पास हुए धमाके में अलकायदा से जुड़े संगठन का हाथ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 38वीं रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। पूरी खबर पढ़ें…

इमरान खान से रिश्तेदारों की मुलाकात पर कोर्ट करेगी फैसला:जेल से अस्पताल भेजने की याचिका पर भी सुनवाई, पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के 3 जज सुनेंगे केस

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात और उनके इलाज से जुड़ी याचिकाओं पर 18 अगस्त को सुनवाई तय की है। मामले की सुनवाई तीन जजों की बेंच करेगी। कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय ने सभी संबंधित पक्षों और उनके वकीलों को नोटिस जारी कर दिए हैं। बेंच में जस्टिस शाहिद वाहिद, जस्टिस नईम अफगान और जस्टिस इश्तियाक इब्राहिम शामिल हैं। इमरान खान अगस्त 2023 से रावलपिंडी की अडियाला जेल में बंद हैं। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार, आतंकवाद समेत कई मामलों की सुनवाई चल रही है। अप्रैल 2022 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उनकी सरकार गिरने के बाद से उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) लगातार उनकी रिहाई और उनसे मुलाकात की मांग करती रही है। इमरान ने अरविंद केजरीवाल का जिक्र किया था इमरान खान जब आखिरी बार सुनवाई के लिए पेश हुए थे तब उन्होंने आरोप लगाया था कि आम चुनाव से पांच दिन पहले अलग-अलग मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया, ताकि वे चुनाव से बाहर हो जाएं। इमरान ने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी गई, जबकि उन्हें ऐसा कोई मौका नहीं दिया गया। उनका कहना था कि लोकतंत्र में चुनाव के दौरान सभी नेताओं के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। पाकिस्तानी पत्रकार ने जताई थी मौत की आशंका अमेरिका में रह रहे पाकिस्तानी पत्रकार वजाहत सईद खान ने इस हफ्ते एक वीडियो जारी कर इमरान खान की मौत की आशंका जताई थी। इस दावे के बाद इमरान खान की बहनों ने भी सवाल उठाए थे कि उन्हें अपने भाई से मिलने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है। बाद में वजाहत ने सफाई दी कि इमरान खान की मौत की खबर की उन्होंने पुष्टि नहीं की थी। यह सिर्फ सेना के कुछ अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर लगाया गया उनका अनुमान था। इमरान की पार्टी ने दी आंदोलन की चेतावनी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने कहा है कि यदि इमरान खान से मुलाकात की अनुमति नहीं दी गई तो वह बड़े पैमाने पर आंदोलन करेगी। पार्टी ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च का भी ऐलान किया है। पार्टी का दावा है कि जरूरत पड़ने पर 20 लाख से ज्यादा समर्थक सड़कों पर उतर सकते हैं। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी ने कहा कि PTI की केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व इस फैसले के साथ है। उनके मुताबिक, लॉन्ग मार्च का मकसद सिर्फ इमरान खान की रिहाई नहीं, बल्कि उनसे मुलाकात का अधिकार सुनिश्चित कराना भी है। नवंबर 2025 में बहनों को मिलने की मिली थी अनुमति इमरान खान की बहन उज्मा खान ने नवंबर 2025 में अडियाला जेल में उनसे मुलाकात की थी। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा था कि इमरान खान शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं, लेकिन उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। उज्मा ने आरोप लगाया था कि इमरान की बाहरी दुनिया तक पहुंच लगभग खत्म कर दी गई है और इसके लिए उन्होंने सेना प्रमुख आसिम मुनीर को जिम्मेदार ठहराया था। अगस्त 2023 से जेल में हैं इमरान इमरान खान अगस्त 2023 से अडियाला जेल में बंद हैं। उनके खिलाफ कई मामलों में मुकदमे चल रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी के बाद से PTI लगातार उनकी रिहाई, नियमित मुलाकात और बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करती रही है। इमरान पर चल रहे केस के बारे में जानिए… ————– यह खबर भी पढ़ें… लाल किला धमाका अलकायदा ने कराया:UN की रिपोर्ट में दावा, NIA की जांच में भी यही निकला था; 11 मौतें हुई थीं लाल किले के पास हुए धमाके में अलकायदा से जुड़े संगठन का हाथ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 38वीं रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। पूरी खबर पढ़ें…

14 लाख सैनिक, 6000 टैंक, 3400 विमान… पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की का ये ‘इस्लामिक नाटो’ कितना मजबूत है?

अल जजीरा के एक विश्लेषण के अनुसार, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के तहत अपने सैन्य सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस समझौते के तहत तीनों देश मिलकर लगभग 14 लाख सक्रिय सैन्य कर्मियों, 3,400 से ज्यादा विमानों और 6,000 से अधिक टैंकों को एक साथ ला रहे हैं।

7 अगस्त को हुआ यह समझौता अब केवल एक राजनीतिक घोषणा से कहीं आगे बढ़ चुका है। तीनों देश एक ऐसी संयुक्त व्यवस्था बनाने की योजना बना रहे हैं जिसमें उनके रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और सैन्य प्रमुख शामिल होंगे। इसके अलावा, तीनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास भी किए जाएंगे। आने वाले समय में यह सहयोग रक्षा उपकरण बनाने और सैन्य तकनीक साझा करने तक भी बढ़ सकता है।

वहीं, इस समझौते को उभरते हुए “इस्लामिक NATO” के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि इसमें सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान है, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को सभी पर हमला माना जाएगा। लेकिन यह व्यवस्था अभी NATO-जैसी एकीकृत सैन्य गठबंधन बनने से काफी दूर है, क्योंकि किसी भी सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में बाकी देश किस तरह सैन्य मदद करेंगे, इसे लेकर अभी कोई निश्चित नियम तय नहीं किया गया है।

तीनों देशों का मिलिट्री ग्रुप कितना ताकतवर है?

अल जजीरा की ओर से 2026 ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के हवाले से बताए गए आंकड़े इनकी मिली-जुली मिलिट्री ताकत का पैमाना दिखाते हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के पास कुल मिलाकर लगभग 14 लाख एक्टिव सैनिक, 3,415 मिलिट्री एयरक्राफ्ट, 6,046 टैंक और 344 नेवल एसेट्स (नौसेना के संसाधन) हैं।

एक्टिव मिलिट्री मैनपावर में पाकिस्तान का हिस्सा सबसे ज्यादा है, जिसके पास लगभग 6,60,000 सैनिक हैं। जबकि तुर्की के पास लगभग 4,81,000 और सऊदी अरब के पास लगभग 2,47,000 सैनिक हैं।

वहीं, इन तीनों देशों में टैंकों का सबसे बड़ा बेड़ा भी पाकिस्तान के पास है, जिसके पास लगभग 2,677 टैंक हैं। इसके बाद तुर्की (2,284 टैंक) और सऊदी अरब (1,085 टैंक) का नंबर आता है।

एयरक्राफ्ट के मामले में भी पाकिस्तान सबसे आगे है, जिसके पास लगभग 1,397 मिलिट्री एयरक्राफ्ट हैं। जबकि तुर्की के पास लगभग 1,101 और सऊदी अरब के पास 917 एयरक्राफ्ट हैं।

नौसेना के ताकत की बात करें तो, इसका हिसाब-किताब अलग है। तुर्की के पास 192 नेवल एसेट्स हैं, जबकि पाकिस्तान के पास 120 और सऊदी अरब के पास 32 हैं। वहीं, तीनों देशों के पास कुल मिलाकर 33 फ्रिगेट, 24 कार्वेट और 22 सबमरीन हैं।

सऊदी अरब के पास सबसे ज्यादा पैसा है

हालांकि, सिर्फ मिलिट्री के आंकड़ों से पूरी बात समझ नहीं आती।

हालांकि, सिर्फ सैन्य संख्या से तीनों देशों की पूरी ताकत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए रक्षा बजट बजट भी बहुत भी जरूरी है, जिसमें सऊदी अरब इन तीनों देशों से काफी आगे है।

अल जजीरा के आंकड़ों के मुताबिक, इन तीनों देशों में सऊदी अरब का डिफेंस बजट सबसे ज्यादा है। 2026 में उसका अनुमानित डिफेंस खर्च लगभग 63.9 अरब डॉलर है, जबकि तुर्की का खर्च 51.4 अरब डॉलर और पाकिस्तान का सिर्फ 9.1 अरब डॉलर है।

यह अंतर इस्लामाबाद के लिए अहम है, क्योंकि उसे लगातार आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है और वह बाहरी आर्थिक मदद पर बहुत ज्यादा निर्भर है।

फिर भी, इस समझौते से पाकिस्तान को सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध मजबूत करने और साथ ही अपने रक्षा उद्योग के लिए नए बाजार तलाशने का मौका मिलता है।

एकेडमिक और सिक्योरिटी एनालिस्ट एंड्रियास क्रीग ने अल जजीरा को बताया कि सऊदी अरब “पूंजी, भौगोलिक स्थिति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राजनीतिक रूप से लोगों को साथ लाने की क्षमता” का योगदान देता है, जबकि तुर्की “लगातार बेहतर होते रक्षा-औद्योगिक आधार, ड्रोन, मिसाइल, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, नौसैनिक सिस्टम और NATO-आधारित सैन्य विशेषज्ञता” लाता है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का योगदान “मैनपावर, एक बड़ी पेशेवर सैन्य व्यवस्था, ऑपरेशनल अनुभव, रक्षा उत्पादन और परमाणु क्षमता” है।

सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्की से क्या मिलता है?

रियाद के लिए, यह समझौता अमेरिका पर उसकी लंबे समय से चली आ रही निर्भरता के अलावा सुरक्षा का एक और जरिया देता है।

ईरान और उसके सहयोगियों से जुड़े बार-बार होने वाले क्षेत्रीय संघर्षों और हमलों के बीच, सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश की है। तुर्की का रक्षा उद्योग रियाद को ड्रोन, मिसाइल और अन्य सैन्य तकनीकें उपलब्ध कराता है, जबकि पाकिस्तान एक बड़ा सैन्य ढांचा और परमाणु प्रतिरोध क्षमता प्रदान करता है।

अमेरिकी रक्षा विभाग में अरब प्रायद्वीप मामलों के पूर्व निदेशक डेविड डेस रोशेस ने अल जजीरा को बताया कि इस समझौते से सऊदी अरब को पश्चिमी देशों से हथियारों के निर्यात को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने में मदद मिल सकती है।

क्या पाकिस्तान सच में सऊदी अरब के लिए लड़ेगा?

यहीं पर ‘सामूहिक सुरक्षा’ वाली शर्त की सबसे बड़ी परीक्षा हो सकती है।

समझौते के मुताबिक, अगर किसी एक सदस्य पर हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। लेकिन इसमें NATO के आर्टिकल 5 की तरह तुरंत सैन्य कार्रवाई करने की कोई बात नहीं कही गई है।

यह फर्क पाकिस्तान के लिए इसलिए अहम है क्योंकि इस्लामाबाद के ईरान के साथ संबंध हैं और वह बड़े मिडिल ईस्ट संघर्ष में खुद को मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश करता रहा है।

इसलिए सवाल यह है कि अगर सऊदी अरब पर सीधे हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान सच में ईरान के खिलाफ सेना भेजेगा?

अगर हम पहले की घटनाओं को देखें तो, पता चलता है कि इस्लामाबाद किसी आक्रामक संघर्ष में सीधे शामिल होने के बजाय कूटनीतिक या रक्षात्मक भूमिका निभाना पसंद कर सकता है।

क्या यह अमेरिका के नेतृत्व वाले सुरक्षा ढांचे के लिए चुनौती है?

इस समझौते का असर सिर्फ इन तीन देशों तक ही सीमित नहीं रहेगा।

पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी है और उसे अमेरिकी सुरक्षा सहायता मिलती है। सऊदी अरब अमेरिकी सैन्य उपकरणों के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है, जबकि तुर्की के पास अमेरिका के बाद NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना है।

हार्डकैसल एडवाइजरी के जैद एम. बेलबागी ने अल जजीरा को बताया कि “पाकिस्तान को अमेरिकी मदद मिलती है, सऊदी अरब अमेरिकी सैन्य उपकरणों का सबसे बड़ा विदेशी खरीदार है, और तुर्की के पास अमेरिका के बाद NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना है।”

ऐसे में अमेरिका के तीन प्रमुख साझेदारों को शामिल करते हुए एक अलग सुरक्षा व्यवस्था का उभरना, क्षेत्र में तेजी से बदलते रणनीतिक समीकरणों में एक नई परत जोड़ सकता है।

क्या मिस्र इस समझौते में शामिल हो सकता है?

यह सुरक्षा समझौता आगे चलकर और देशों तक फैल सकता है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने खुले तौर पर मिस्र के इस समझौते में शामिल होने का समर्थन किया है। उन्होंने मिस्र को इसका “स्वाभाविक साझेदार” बताया है।

मिस्र की मजबूत सैन्य ताकत और उसकी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, खासकर स्वेज नहर पर उसका नियंत्रण, उसे इस गठबंधन के लिए एक अहम सदस्य बना सकता है।

हालांकि, मिस्र को इस तरह के सामूहिक रक्षा समझौते में शामिल होने से पहले कई बातों पर विचार करना होगा। इनमें अमेरिका के साथ उसके संबंध, मौजूदा सैन्य गठबंधन और क्षेत्र में उसकी दूसरी जिम्मेदारियां शामिल हैं।

फिलहाल, अभी मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की अपनी बड़ी संयुक्त सैन्य क्षमताओं को एक कारगर सुरक्षा तंत्र में बदल सकते हैं।

पाकिस्तान के लिए यह बात खास तौर पर अहम हो सकती है। क्योंकि यह देश इस समूह में सबसे ज्यादा सैनिक बल और परमाणु क्षमता का योगदान देता है, लेकिन इसका रक्षा बजट अपेक्षाकृत कम है और आर्थिक रूप से इसकी निर्भरता बनी हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि सैन्य कर्मियों और रणनीतिक प्रतिरोध के अलावा यह कितना योगदान दे सकता है।

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बांग्लादेश राष्ट्रपति चुनाव में बीएनपी महासचिव फखरुल की जीत तय:ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ा, वहीं लेक्चरर बने; खालिदा सरकार में मंत्री रह चुके

बांग्लादेश की रूलिंग पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम अलमगीर अब देश के अगले राष्ट्रपति बनने की राह पर हैं। BNP ने गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी और 1972 में वे ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। 2001 में खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार में वे पहले कृषि राज्य मंत्री रहे। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। उम्मीदवारी मिलते ही 78 साल के फखरुल ने BNP के महासचिव पद और पार्टी की स्थायी समिति से इस्तीफा दे दिया। गुरुवार को ही उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा कर दिया गया। 20 अगस्त को होगा राष्ट्रपति चुनाव बांग्लादेश में राष्ट्रपति को जनता सीधे नहीं चुनती। संसद के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। राष्ट्रपति चुनाव के लिए 20 अगस्त को मतदान होगा। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिला था। इसलिए फखरुल की जीत लगभग तय मानी जा रही है। फखरुल चुनाव जीतते हैं तो वे बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति होंगे। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका कार्यकाल अभी करीब दो साल बाकी था। फिलहाल संसद के स्पीकर हाफिज उद्दीन अहमद कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर फखरुल का राजनीतिक सफर करीब छह दशक पुराना है। 1960 के दशक में ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति शुरू की। वे उस समय ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े थे। 1969 में राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ बड़े जन आंदोलन के दौरान वे छात्र संगठन की ढाका यूनिवर्सिटी इकाई के अध्यक्ष थे। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और जेल जाना पड़ा। हालांकि, छात्र राजनीति के बाद वे तुरंत सक्रिय राजनीति में नहीं आए। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के तौर पर करियर शुरू किया। 1972 में ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। बाद में कई सरकारी कॉलेजों में भी पढ़ाया। 1986 में सरकारी नौकरी छोड़ राजनीति में आए खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP सरकार में उन्हें पहले कृषि राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। करीब एक दशक तक BNP के महासचिव रहे 2009 में BNP की राष्ट्रीय परिषद ने फखरुल को वरिष्ठ संयुक्त महासचिव बनाया। 2011 में वे पार्टी के कार्यवाहक महासचिव बने। करीब पांच साल बाद 30 मार्च 2016 को उन्हें आधिकारिक तौर पर BNP का महासचिव नियुक्त किया गया। इसके बाद करीब एक दशक तक वे पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे। खालिदा जिया की गिरफ्तारी से लेकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों और चुनावों को लेकर हुए राजनीतिक टकराव तक, फखरुल लगभग हर बड़े मुद्दे पर BNP की तरफ से सामने रहे। वे मीडिया के सामने पार्टी का पक्ष रखने वाले प्रमुख नेताओं में भी शामिल रहे। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और कुछ समय जेल में भी बिताना पड़ा। दूसरे कई BNP नेताओं की तुलना में उनकी राजनीतिक भाषा ज्यादा संयमित रही है। लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण वे पार्टी के अनुभवी नेताओं और प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। विपक्ष ने भी उतारा उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनाव में बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद ने अपना नामांकन पत्र जमा कर दिया है। हालांकि, संसद में BNP के दो-तिहाई बहुमत के कारण फखरुल की जीत की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है।

पीएम रात में नहीं सोते, अमित शाह संसद से भाग गए…राहुल गांधी ने दिखाए तेवर, कहा- हम इनको पागल कर देंगे!

पीएम रात में नहीं सोते, अमित शाह संसद से भाग गए...राहुल गांधी ने दिखाए तेवर, कहा- हम इनको पागल कर देंगे!

Rahul Gandhi vs PM Modi: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी एक कार्यक्रम में एकदम बेबाक और आक्रामक अंदाज में नजर आए। 'रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय अधिवेशन' के मंच से उन्होंने न सिर्फ केंद्र सरकार की नीतियां पर सवाल खड़े किए, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और संघ (RSS) पर भी ऐसा तंज कसा कि सियासी गलियारों में खलबली मच गई। अपनी चिर-परिचित बेबाकी में राहुल ने कहा कि सरकार किसी की सुनना नहीं चाहती, लेकिन हम इनको पागल कर देंगे।

पीएम को रात को नहीं सोते… 

राहुल गांधी ने पीएम मोदी की कार्यशैली पर सीधा कटाक्ष करते हुए कहा कि पीएम रात-रात भर नहीं सोते। इसके पीछे कई गहरे और छुपे हुए कारण हैं। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लपेटे में लेते हुए कहा कि खुद को चाणक्य और सरदार पटेल बताने वाले अमित शाह संसद में घुस भी नहीं पाए और भाग निकले। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे पहली बार देश की असली आवाज (एक्सप्रेशन) सुन रहे हैं।

राहुल ने लोगों से निडर होने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश में कई लोग इन कायरों की फौज के सामने खुद भी कायरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जब आपकी लड़ाई जोकरों के एक समूह से है, तो फिर किसी से डरने की क्या जरूरत? राहुल ने मंच से कार्यकर्ताओं को दिल खोलकर बोलने की आजादी का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि जो दिल में है, बेझिझक बोलिए। अगर हिंदू हैं तो शिव की बात कीजिए, मुस्लिम हैं तो अल्लाह की बात कीजिए। अगर कोई भटक जाएगा तो हम प्यार से सही राह दिखा देंगे।

सरकार की विदेश नीति पर सवाल

राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका-ईरान युद्ध हुआ। ऐसे में अगर इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व होता, तो हमारे पास सबसे बड़ा अवसर होता। क्योंकि ईरान हमारा पुराना दोस्त है, अमेरिका और रूस भी हमारा दोस्त है तो हम इनकी आपस में दोस्ती करा सकते थे। लेकिन पाकिस्तान हमारी जगह उठाकर ले गया और नरेंद्र मोदी देखते रह गए।

आरएसएस को भारत की समझ ही नहीं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा कि संघ के लोगों को 3000 साल पुराने भारत का ताना-बाना नहीं, बल्कि आज के आधुनिक भारत को समझने की जरूरत है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में मंच से आरएसएस के स्टाइल में सैल्यूट करने की बात कही और जोड़ा कि आरएसएस का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन अगर कोई आरएसएस को अनुचित तरीके से दबाने की कोशिश करेगा, तो हम उसकी रक्षा के लिए भी खड़े होंगे।

पीएम पीसी क्यों नहीं करते?

मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के मुद्दे पर राहुल ने अपनी एक पुरानी मुलाकात का दिलचस्प किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि मैं पहले सोचता था कि पीएम मोदी का प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना कोई 'मार्केटिंग स्ट्रेटजी' है। लेकिन जब मैं 5 मिनट उनके साथ एक कमरे में बैठा, तब मुझे समझ आ गया कि वे बहुत देर तक बिना लिखे-पढ़े बोल ही नहीं सकते।

बचपन का एक यादगार संस्मरण

जब मैं 12 साल का था, तब दादी (इंदिरा गांधी), मां, प्रियंका और मैं अमेरिका गए थे। आधिकारिक रात्रिभोज में दादी और मां गईं। लौटकर दादी ने मां से कहा— 'ये अमेरिकन हमें क्या समझते हैं? हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री केवल हाथ मिलाने या दोस्ती करने नहीं जाता, वह हमेशा अपने देश के स्वाभिमान और हित के लिए जाता है।

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक, 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक,  9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान के सुराब इलाके के गोंधान गांव में पाकिस्तानी सेना की कथित एयरस्ट्राइक से हड़कंप। आजादी के जश्न के बीच आधी रात हुए इस कायराना हमले में 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत की खबर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

बलूचिस्तान से एक बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पाकिस्तानी सेना और बलोच जनता के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। दावा किया जा रहा है कि बलूचिस्तान में आजादी का जश्न मना रहे आम नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने आधी रात को एयरस्ट्राइक कर दी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूचिस्तान के सुराब इलाके में स्थित गोंधान गांव (Gondhan Village) को निशाना बनाकर यह कायराना हवाई हमला किया गया।

रात के अंधेरे में तबाही: 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 की मौत का दावा
स्थानीय सूत्रों और बलोच कार्यकर्ताओं के दावों के मुताबिक, आधी रात को जब ग्रामीण अपने घरों में मौजूद थे, तब पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने गोंधान गांव पर बमबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई मकान जमींदोज हो गए।

कुल मौतें: शुरुआती दावों में 28 लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है।

मासूम शिकार: मृतकों में 9 मासूम बच्चे और 7 महिलाएं शामिल हैं।

घायल: इस भीषण हमले में 17 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

यदि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना द्वारा आम नागरिकों के खिलाफ किए गए सबसे भीषण मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक माना जाएगा। हालांकि, संघर्ष प्रभावित और दूरदराज के क्षेत्रों में मीडिया की सीमित पहुंच के कारण हताहतों की सटीक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है।

आम गांव को क्यों बनाया निशाना?
इस सैन्य कार्रवाई के बाद गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं:
क्या पाकिस्तानी सेना ने केवल स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे निहत्थे नागरिकों को अपनी बौखलाहट का शिकार बनाया?
क्या किसी प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ सैन्य अभियान के नाम पर आम बलोच नागरिकों को निशाना बनाया गया?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का बहाना बनाकर अक्सर बलोच आम जनता को प्रताड़ित किया जाता रहा है।

बलूचिस्तान में असंतोष की जड़ें: आखिर क्यों जल रहा है बलूचिस्तान?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज और तेल) से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। दशकों से बलोच जनता पाकिस्तान के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रही है। असंतोष की मुख्य वजहें निम्न हैं:

संसाधनों का दोहन: बलोच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि पंजाब केंद्रित पाकिस्तान सरकार उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिलता।

सुरक्षा बलों का अत्याचार: 'मिसिंग पर्सन्स' (जबरन गायब किए गए लोग) बलूचिस्तान की एक विकराल समस्या है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि हजारों बलोच युवाओं को सेना उठाकर ले गई है, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला।

राजनीतिक अधिकारों का हनन: बलोच समुदाय लगातार स्वायत्तता, रोजगार और बुनियादी विकास की मांग करता रहा है, जिसे इस्लामाबाद हमेशा बलप्रयोग से दबाता आया है।

जनरल आसिम मुनीर और पाक सेना की भूमिका पर सवाल
बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बलोच विद्रोह और असंतोष को बातचीत के जरिए सुलझाने के बजाय सैन्य बल के कठोर इस्तेमाल से कुचला जा रहा है, जिससे स्थिति सुधरने की जगह और अधिक विस्फोटक होती जा रही है।

सुराब के गोंधान गांव में हुई यह घटना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक संकट बन सकती है। विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों से मांग की जा रही है कि वे इस कथित एयरस्ट्राइक की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि बेकसूर बच्चों और महिलाओं की मौत का सच दुनिया के सामने आ सके।

Kangana Ranaut: ‘पाकिस्तान के प्यार में मारे रहते हैं’, कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह को सुनाई खरी-खोटी

Kangana Ranaut: एक्टर और BJP सांसद कंगना रनौत ने हाल ही में स्टूडेंट प्रोटेस्ट पर सीनियर एक्टर नसीरुद्दीन शाह की टिप्पणियों पर तीखा तंज कसते हुए उन्हें “लोमड़ी” कहा। अब कंगना ने अपनी बात का बचाव किया है और एक्टर पर “पाकिस्तान के प्रति उनके प्यार” को लेकर निशाना साधा है, साथ ही फिल्म इंडस्ट्री पर “दोहरेपन” का आरोप भी लगाया है।

कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह को ‘लोमड़ी’ कहने का बचाव किया

ANI के साथ बातचीत में, कंगना ने फ़िल्म इंडस्ट्री के “लगातार बने हुए रवैये” की आलोचना की और जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान मची अफरातफरी को याद किया। उन्होंने दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उनके कई सांसद दोस्तों की गाड़ियों पर लोग चढ़ गए थे और उनकी खिड़कियां तोड़ दी थीं, जबकि उनके घर के बाहर करीब 2,500 लोग जमा हो गए थे, जिसके कारण भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा और उनके परिवार को रात भर जागना पड़ा।

उन्होंने आगे कहा, “तो जब जंतर-मंतर पर ऐसी स्थिति बन रही थी, तो वे सभी मगरमच्छ के आंसू बहा रहे थे। लेकिन अब जब झारखंड में बच्चे इस तरह के उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं, तो क्या वे भी ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) नहीं हैं? क्या कोई व्यक्ति तभी ‘जेन ज़ी’ माना जाता है जब वह देश के खिलाफ काम करता है या प्रधानमंत्री को अपशब्द कहता है? उन्हें खुद ही युवाओं के खिलाफ दिखाया गया है। फिल्म इंडस्ट्री का यह पाखंड नहीं चलेगा। फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग जंतर-मंतर के लिए जो मगरमच्छ के आंसू बहा रहे थे, उन्हें झारखंड के बच्चों के लिए भी वैसे ही आंसू बहाने चाहिए।”

इसके बाद उन्होंने नसीरुद्दीन शाह के बारे में अपनी “लोमड़ी” टिप्पणी का बचाव करते हुए कहा, “मैंने नसीरुद्दीन शाह के बारे में ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उन्होंने एक बेहद आपत्तिजनक वीडियो बनाया था जिसमें वे इस तरह की धमकियां दे रहे थे। और जब भी आप उनकी फिल्में, साक्षात्कार या बयान देखें, बात हमेशा पाकिस्तान की ही होती है। ये पाकिस्तान की प्रेम कथा कब खत्म होगी? जब देखो पाकिस्तान के प्रेम में ये मरे रहते हैं। अब बंटवारे को भी इतने साल हो गए हैं तो ये प्रेम कहानी खत्म क्यों नहीं हो रही है?”

कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह को ‘लोमड़ी’ क्यों कहा?

पिछले हफ्ते, अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पर, कंगना ने नसीरुद्दीन की टिप्पणी पर अभिनेता पीयूष मिश्रा की एक टिप्पणी को दोबारा पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने झारखंड में छात्र विरोध प्रदर्शन पर अनुभवी अभिनेता की चुप्पी पर सवाल उठाया था। उन्होंने एक अलग नोट जोड़ा जिसमें लिखा था, “सच तो ये है कि हर कोई न किसी का कुत्ता है लेकिन मुझे इस बात का गर्व है कि मैं जिस घर (देश) की रोटी खाती हूं उसकी रखवाली करती हूं, उसके लिए लड़की हूं। नसीर साहब खाते तो इस देश के हैं लेकिन लड़ते पड़ोसी देश के लिए हैं।” (सच्चाई यह है कि हममें से हर कोई किसी न किसी का पालतू है। मुझे गर्व है कि मैं उसी घर की रक्षा और बचाव करता हूं जहां से मुझे खाना मिलता है। लेकिन नसीर साहब इस जमीन से खाते हैं और पड़ोसी देश की रक्षा करते हैं)।”

उन्होंने आगे कहा, “PS: आज के समय में कुत्ता कहलाना एक तारीफ़ है क्योंकि वफ़ादारी और क्यूटनेस बहुत कम देखने को मिलती है। मैं नसीरुद्दीन की तरह लोमड़ी बनने के बजाय कुत्ता बनना ज़्यादा पसंद करूंगी।” इससे पहले नसीरुद्दीन शाह ने NEET पेपर लीक को लेकर CJP के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ कथित पुलिस बर्बरता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

लाल किला धमाका अलकायदा ने कराया:UN की रिपोर्ट में दावा, NIA की जांच में भी यही निकला था; 11 मौतें हुई थीं

लाल किले के पास हुए धमाके में अल-कायदा से जुड़े संगठन का हाथ था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 38वीं रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। 10 नवंबर 2025 की शाम लाल किले के पास हुए इस धमाके में 11 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) ने इस धमाके को अंजाम दिया। इसमें कहा गया है कि AQIS अब छोटे-छोटे सेल के जरिए काम कर रहा है और उसने अपना लॉजिस्टिक्स, फाइनेंशियल नेटवर्क भी तैयार कर लिया है। इससे पहले आई UNSC की 37वीं रिपोर्ट में एक सदस्य देश ने इस हमले के पीछे जैश-ए-मोहम्मद (JeM) का हाथ बताया था। यानी इस हमले को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की लगातार दो रिपोर्टों में दो अलग-अलग आतंकी संगठनों के नाम सामने आए हैं। हालांकि, NIA की चार्जशीट में दावा किया गया था कि आरोपी AQIS से जुड़े थे। AQIS बांग्लादेश में भी अपने आतंकी सेल बनाने की कोशिश कर रहा UNSC की एनालिटिकल सपोर्ट एंड सेंक्शंस मॉनिटरिंग टीम की यह रिपोर्ट 10 अगस्त को जारी की गई। इसमें कहा गया है कि AQIS अब बिखरे हुए छोटे आतंकी संगठन की बजाय एक क्षेत्रीय आतंकी नेटवर्क के रूप में विकसित हो चुका है। संगठन ने अपना लॉजिस्टिक्स और फाइनेंशियल नेटवर्क तैयार कर लिया है और अब बड़े समूहों के बजाय छोटे-छोटे, अलग-अलग सेल के जरिए काम कर रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि AQIS बांग्लादेश में भी अपने आतंकी सेल बनाने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट में इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। रासायनिक और जैविक हथियार बनाने की कोशिश में जुटा अलकायदा रिपोर्ट में कहा गया है कि अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट (ISIL/दाएश) लंबे समय से ऐसे जहरीले रासायनिक और जैविक हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे बड़ी संख्या में लोगों को नुकसान पहुंचाया जा सके। हालांकि, अब तक वे इसमें पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, क्योंकि ऐसे हथियार बनाना बेहद मुश्किल काम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन आतंकी संगठनों से जुड़े ऑनलाइन नेटवर्क पर अब भी ऐसे जहरीले पदार्थ बनाने के तरीके और जानकारी साझा की जा रही है।

फरवरी में ISIL की अंग्रेजी पत्रिका ‘इनवेड’ में बोटुलिनम टॉक्सिन और साइनाइड जैसे जहरीले पदार्थ तैयार करने से जुड़े निर्देश प्रकाशित किए गए थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ISIL-K ने पिछले 12 महीनों के दौरान अपने नेटवर्क में ‘राइसिन’ नाम के एक बेहद जहरीले विष को तैयार करने से जुड़ी जानकारी भी साझा की है। 2014 में बना था AQIS AQIS अल-कायदा का दक्षिण एशिया में सक्रिय संगठन है। इसको सितंबर 2014 में अल-कायदा प्रमुख अयमान अल-जवाहिरी ने बनाया था। इसका मकसद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में अल-कायदा का नेटवर्क बढ़ाना था। अमेरिकी नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के मुताबिक, AQIS फिलहाल मुख्य रूप से अफगानिस्तान में सक्रिय है, जबकि इसके नेटवर्क की गतिविधियां पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में भी बताई गई हैं। यह संगठन बड़े हमलों के बजाय छोटे-छोटे सेल के जरिए काम करता है और हत्या, हथियारबंद हमले, घात लगाकर हमला और आत्मघाती हमले जैसी गतिविधियों में शामिल रहा है। अमेरिका ने 2016 में इसे विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया था। UNSC दिल्ली ब्लास्ट रिपोर्ट क्यों दे रहा? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों पर नजर रखता है। इसके लिए एक मॉनिटरिंग टीम काम करती है, जो आतंकी संगठनों के नेटवर्क, फंडिंग और गतिविधियों की जानकारी जुटाकर रिपोर्ट तैयार करती है। अल-कायदा और ISIS से जुड़े संगठनों के लिए UNSC की 1267 सैंक्शंस कमेटी काम करती है। इसके तहत मॉनिटरिंग टीम अलग-अलग देशों से मिली जानकारी के आधार पर आतंकी संगठनों से जुड़े खतरे का आकलन करती है। UNSC ऐसे संगठनों और उनसे जुड़े लोगों पर यात्रा प्रतिबंध, हथियारों पर रोक और संपत्ति फ्रीज जैसे प्रतिबंध भी लगाता है। लाल किला ब्लास्ट में UNSC इसलिए अहम है, क्योंकि उसकी मॉनिटरिंग टीम की रिपोर्ट में इस हमले को AQIS से जोड़ा गया है। NIA ने भी AQIS का हाथ बताया था NIA ने मई में 11 आरोपियों के खिलाफ करीब 7,500 पेज की चार्जशीट दाखिल की है। राउज एवेन्यू कोर्ट इस पर 27 अगस्त को सुनवाई करेगा। चार्जशीट में 580 से ज्यादा गवाहों के बयान भी शामिल हैं। इसमें दावा किया गया था कि सभी आरोपी आतंकी संगठन सार गजवत-उल-हिंद और अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से जुड़े थे। धमाके में इस्तेमाल TATP विस्फोटक आरोपियों ने खुद तैयार किया था NIA की जांच में सामने आया था कि कुछ आरोपी कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित मेडिकल प्रोफेशनल थे। 2022 में श्रीनगर में हुई एक गुप्त बैठक में उन्होंने “AGuH Interim” नाम से संगठन को फिर सक्रिय किया और “Operation Heavenly Hind” शुरू किया था। आरोपियों ने नए सदस्यों की भर्ती और बड़े पैमाने पर विस्फोटक तैयार किया था। एजेंसी ने बताया कि धमाके में इस्तेमाल TATP विस्फोटक आरोपियों ने खुद तैयार किया था। इसके लिए केमिकल और उपकरण ऑनलाइन व ऑफलाइन जुटाए गए थे। जांच में यह भी सामने आया था कि आरोपी AK-47, Krinkov राइफल और अन्य हथियार जुटाने के साथ-साथ ड्रोन और रॉकेट ऑपरेटेड IED पर भी प्रयोग कर रहे थे। IA ने अब तक इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया है। फरार आरोपियों की तलाश जारी है। 10 नवंबर 2025 की शाम दहल उठी थी दिल्ली दिल्ली के ऐतिहासिक रेड फोर्ट इलाके में 10 नवंबर 2025 की शाम अचानक एक जोरदार धमाका हुआ था। धमाका इतना भीषण था कि आसपास खड़ी गाड़ियों के शीशे टूट गए थे। कई दुकानों और इमारतों को भी नुकसान पहुंचाथा। इस धमाके में 11 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। शुरुआती जांच में ही जांच एजेंसियों को शक हो गया था कि यह कोई साधारण ब्लास्ट नहीं, बल्कि हाई-इंटेंसिटी VBIED हमला था। घटना के बाद पूरे दिल्ली-NCR में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया था। देश की कई सुरक्षा एजेंसियों और फॉरेंसिक टीमें मौके पर पहुंची थी।बाद में इस केस की गंभीरता को देखते हुए जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई थी। ——————– कश्मीर के अनंतनाग में आतंकी हमला, हेड कॉन्स्टेबल की मौत:अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा में तैनात थे; लश्कर से जुड़े आतंकी संगठन ने जिम्मेदारी ली जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग के लाल चौक इलाके में बुधवार को आतंकियों ने पुलिस पर हमला किया। इसमें हेड कॉन्स्टेबल (35 साल) की मौत हो गई। अधिकारियों के मुताबिक दोपहर करीब 12:30 बजे आतंकियों ने अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर अचानक फायरिंग की। पूरी खबर पढ़ें…