चार किरदार, एक अनोखी ‘वाइब’ और ढेर सारे सवाल, ‘वाइब’ का नया पोस्टर किया जारी, कल रिलीज होगा टीजर

अमेजन एमजीएम स्टूडियोज ने आज अपनी आने वाली थिएटर फिल्म ‘वाइब’ का टीजर पोस्टर जारी किया है। यह पोस्टर कुणाल खेमू की इस हाई-स्टेक्स एक्शन कॉमेडी की एक और झलक दिखाता है और साथ ही कई सवाल भी खड़े करता है कि आखिर इस अनोखी चौकड़ी के साथ क्या होने वाला है।

नए पोस्टर में प्रीति जिंटा एक दमदार बॉस-लेडी अवतार में नजर आ रही हैं, वहीं इसके बिल्कुल उलट कुणाल खेमू, स्पर्श श्रीवास्तव और वंशिका धीर काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं। इससे इशारा मिल रहा है कि आखिर वे जिस मुसीबत में फंसे हैं, वह पूरी तरह से उनके हाथ से निकल चुकी है।

‘वाइब’ की कहानी दो ऐसे जिगरी दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी सीधी-सादी जिंदगी अचानक एक अनजान और हाई-एनर्जी एडवेंचर में बदल जाती है। यह सफर उनकी जान बचाने की काबिलियत और उनकी दोस्ती, दोनों की कड़ी परीक्षा लेता है।

कुणाल खेमू ने फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया है। ‘वाइब’ को कुणाल खेमू और चिराग निहलानी ने ड्रोंगो फिल्म्स के बैनर तले प्रोड्यूस किया है। फिल्म में कुणाल खेमू के साथ प्रीति जी जिंटा, स्पर्श श्रीवास्तव और डेब्यू कर रहीं वंशिका धीर लीड रोल में हैं। कल टीजर रिलीज होने वाला है और इसके साथ ही फिल्म दर्शकों को एक हाई-एनर्जी एडवेंचर पर ले जाने के लिए तैयार है। अमेजन एमजीएम स्टूडियोज की फिल्म ‘वाइब’ 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

अमेजन एमजीएम स्टूडियोज के बारे में

अमेजन एमजीएम स्टूडियोज एक प्रमुख एंटरटेनमेंट कंपनी है, जो फिल्मों और टीवी कंटेंट के निर्माण और दुनियाभर में डिस्ट्रीब्यूशन पर फोकस करती है। इसकी ओरिजिनल सीरीज प्राइम वीडियो पर रिलीज होती हैं, जिसे दुनियाभर के 240 से ज्यादा देशों और क्षेत्रों में सैकड़ों तरह के कंपैटिबल डिवाइस पर देखा जा सकता है। अमेजन एमजीएम स्टूडियोज थिएटर रिलीज और खास तौर पर प्राइम वीडियो के लिए ओरिजिनल फिल्मों का निर्माण और अधिग्रहण भी करता है। इसके अलावा, अमेजन एमजीएम स्टूडियोज प्रीमियम पे टेलीविजन नेटवर्क एमजीएम+ के लिए भी कंटेंट तैयार करता है।

ड्रोंगो फिल्म्स के बारे में

ड्रोंगो फिल्म्स एक प्रोडक्शन बैनर है, जिसे एक्टर-डायरेक्टर-राइटर कुणाल खेमू और प्रोड्यूसर चिराग निहलानी ने मिलकर शुरू किया है। यह दोनों की ईमानदार और दिलचस्प कहानियां पेश करने के जुनून से बना है। क्रिएटिविटी और बिजनेस के बीच संतुलन बनाने के विजन के साथ यह कंपनी ऐसी कहानियों को सपोर्ट करने पर फोकस करती है, जो असली, दिलचस्प और सोच-समझकर तैयार की गई हों। क्रिएटिविटी के साथ-साथ मजबूत और साफ तरीके से काम करने पर फोकस करते हुए ड्रोंगो फिल्म्स ऐसी नई और दिल को छू लेने वाली कहानियों को पर्दे पर लाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में अपनी छाप छोड़ें।

34वां Birthday और 34 बच्चियां-प्रीति ज़िंटा का दिल छू लेने वाला फैसला |Preity Zinta Adopted 34Girls

34वां Birthday और 34 बच्चियां-प्रीति ज़िंटा का दिल छू लेने वाला फैसला |Preity Zinta  Adopted 34Girls

अगर अपने Birthday पर खुद को महंगी कार देने का मौका हो… तो क्या आप वो छोड़कर 34 बच्चियों की जिम्मेदारी उठाएंगे?
साल था 2009।
Preity Zinta अपने 34वें birthday पर खुद को एक महंगी car gift करने वाली थीं। लेकिन एक बच्ची की कहानी ने उनका पूरा फैसला बदल दिया।
उन्होंने ऋषिकेश के Mother Miracle Orphanage की 34 बच्चियों की पढ़ाई, खाना, कपड़े और परवरिश की जिम्मेदारी लेने का फैसला किया।
और ये सिर्फ एक birthday decision नहीं था। Preity इससे पहले भी महिलाओं और बच्चों से जुड़े कई causes के लिए काम करती रही हैं।
और शायद यही वजह है कि आज भी उनकी ये कहानी याद की जाती है।
क्या आपको लगता है कि किसी की जिंदगी बदलने के लिए सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि जिम्मेदारी लेना ज्यादा मायने रखता है?

@realpz

34वां Birthday और 34 बच्चियां- प्रीति ज़िंटा का दिल छू लेने वाला फैसला | Preity Zinta Adopted 34 Girls

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Batwara 1947 Review: विभाजन के दर्द के बीच इंसानियत ने कायम कि मिसाल, सनी देओल की फिल्म ने जीता लोगों का दिल

Batwara 1947 Review: 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक रहा है। इस विषय पर बनी फिल्मों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि कहानी कहीं धर्म, राजनीति और हिंसा के दायरे तक सीमित न रह जाए। Batwara 1947 की खासियत यह है कि राजकुमार संतोषी विभाजन की त्रासदी के बीच भी अपना ध्यान इंसान और उसके रिश्तों पर बनाए रखते हैं।

यह फिल्म सिर्फ भारत-पाकिस्तान की सीमा बनने की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिनकी जिंदगी उस सीमा के साथ ही बदल गई। जो घर अपना था, वह अचानक पराया हो गया। जो पड़ोसी वर्षों से परिवार का हिस्सा था, वह धर्म के नाम पर अजनबी बना दिया गया। इसी माहौल में फिल्म इंसानियत का सबसे जरूरी सवाल सामने रखती है-क्या नफरत के दौर में भी इंसान दूसरे इंसान के लिए खड़ा हो सकता है?

सनी देओल के करियर का नया चैप्टर

सनी देओल के लिए ‘कमबैक’ शब्द पिछले कुछ समय से लगातार इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन Batwara 1947 देखने के बाद लगता है कि यह सिर्फ वापसी नहीं, बल्कि उनके अभिनय के एक नए दौर की शुरुआत है। सिकंदर मिर्जा के किरदार में सनी देओल अपनी आवाज, व्यक्तित्व और गुस्से का प्रभावी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि उनका सबसे असरदार अभिनय उन सीन्स में दिखाई देता है, जहां वह ऊंची आवाज में नहीं, बल्कि अपनी आंखों और भावनाओं से बात करते हैं।

सिकंदर का गुस्सा सिर्फ हिंसा के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस इंसानियत के लिए है जो उसके आसपास खत्म होती जा रही है। एक बुजुर्ग हिंदू महिला को बचाने के लिए भीड़ के सामने खड़े होने वाला उसका किरदार फिल्म के मूल संदेश को मजबूती देता है।

शबाना आजमी का काम

शबाना आजमी की ‘माई’ इस कहानी का भावनात्मक केंद्र हैं। वह सिर्फ एक पीड़ित महिला नहीं हैं। उनके किरदार में आत्मसम्मान, जिद, हंसी, समझदारी और अपने घर से गहरा लगाव है। शबाना इस भूमिका को इतनी सहजता से निभाती हैं कि धीरे-धीरे माई किसी फिल्मी किरदार की बजाय अपने परिवार की किसी बुजुर्ग महिला जैसी महसूस होने लगती हैं। सनी देओल और शबाना आजमी के बीच का रिश्ता फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। धर्म की दीवारों के बीच पनपता मां-बेटे जैसा यह रिश्ता दिखाता है कि इंसानी रिश्ते किसी धर्म या सीमा के मोहताज नहीं होते।

करण देओल की एक्टिंग

सनी देओल के सामने स्क्रीन शेयर करना करण देओल के लिए आसान चुनौती नहीं थी। इसके बावजूद वह कई दृश्यों में आत्मविश्वास के साथ अपनी जगह बनाते हैं। उनकी संवाद अदायगी में विश्वास है और भावनात्मक तथा टकराव वाले दृश्यों में उनकी ऊर्जा दिखाई देती है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह अपने पिता की शैली को दोहराने के बजाय अपने किरदार के लिए अलग अंदाज तलाशते हैं।

प्रीति जिंटा और अली फजल का प्रभाव

प्रीति जिंटा की वापसी फिल्म में सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं जोड़ती, बल्कि कहानी के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देती है। अली फजल अपने शांत और संवेदनशील अभिनय से फिल्म की तीव्रता के बीच कुछ सुकून भरे पल लेकर आते हैं। वहीं अभिमन्यु सिंह का याकूब पहलवान कट्टर सोच का प्रतिनिधित्व करता है, जहां इंसान की पहचान से पहले उसका धर्म देखा जाता है। पूरी सपोर्टिंग कास्ट मिलकर उस दौर के टूटते समाज की तस्वीर को विश्वसनीय बनाती है।

1947 का लाहौर दिखा पर्दे पर

फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन, सिनेमैटोग्राफी, कॉस्ट्यूम, लोकेशन और बैकग्राउंड स्कोर मिलकर 1947 के लाहौर का माहौल तैयार करते हैं। राजकुमार संतोषी मूल कहानी को सिर्फ मंचीय प्रस्तुति की तरह शूट नहीं करते, बल्कि उसे बड़े पर्दे के लिए विस्तार देते हैं। गलियां, घर, भीड़ और बदलता सामाजिक माहौल फिल्म को एक मजबूत सिनेमाई पहचान देते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी का भावनात्मक असर और गहरा होता जाता है। क्लाइमैक्स के बारे में ज्यादा बताना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसका प्रभाव तभी महसूस होगा जब दर्शक उसे खुद देखें।

Batwara 1947 की सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह विभाजन की हिंसा दिखाते हुए भी नफरत को बढ़ावा नहीं देती। इसके बजाय यह इंसानियत को केंद्र में रखती है। फिल्म एक बेहद जरूरी सवाल छोड़ जाती है-जब पूरी दुनिया आपको किसी से नफरत करने की वजह दे रही हो, तब क्या आप फिर भी इंसानियत और प्रेम को चुन सकते हैं? सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी इस बार अपने गुस्से को ज्यादा संवेदनशील और परिपक्व रूप देती है। फिल्म का जवाब तलवार या हिंसा में नहीं, बल्कि रिश्तों और इंसानियत में मिलता है। हम फिल्म को 5 में से 4 स्टार रेटिंग देते हैं।