बहन के गुजरने के बाद, उसकी बेटी को अपनी बेटी की तरह पाल रहा है ये भाई | The Better India Hindi

बहन के गुजरने के बाद, उसकी बेटी को अपनी बेटी की तरह पाल रहा है ये भाई | The Better India Hindi

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“मैं अपनी बहन की जगह कभी नहीं ले सकता, लेकिन उसकी बेटी को कभी अकेला महसूस नहीं होने दूंगा।”

बहन को खोना रॉय नोड की जिंदगी का सबसे दर्दनाक पल था।

लेकिन पीछे रह गई उसकी छोटी-सी बेटी अनाईशा अब उनके लिए एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसकी बहन की आखिरी निशानी है।

आज रॉय अपनी भांजी आशु को अपनी बेटी की तरह पाल रही हैं- उसकी पढ़ाई, सेहत, सपनों और हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखते हुए।

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Operation Majnu | Bhilwara Police | Dr Neha Singh Rao RPS officer | The Better India Hindi

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जिन्हें मनचलों ने आम लड़कियां समझकर घेरा था,. वो असल में अंडरकवर महिला पुलिसकर्मी थीं।

दो रातों तक भीलवाड़ा की सड़कों पर 18 महिला पुलिसकर्मियों ने छेड़छाड़ करने वालों पर नज़र रखी।
और फिर शुरू हुआ ‘ऑपरेशन मजनू’।

18 पुरुष गिरफ्तार हुए, जिनमें 5 नाबालिग भी थे।

RPS ऑफिसर डॉ. नेहा सिंह राव की अगुवाई में ये टीम सिर्फ़ अपराधियों को पकड़ने नहीं निकली थी, बल्कि एक साफ़ संदेश देने निकली थी – महिलाओं को परेशान करना कोई मज़ाक नहीं है और अब इसका जवाब सख्त पुलिस कार्रवाई से मिलेगा।

क्या आपके शहर में भी ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए?

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पशुओं की जान बचाने के लिए Scooty को बना दिया Ambulance | The Better India Hindi

पशुओं की जान बचाने के लिए Scooty को बना दिया Ambulance | The Better India Hindi

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पशुओं की सेवा करना अच्छी बात है, लेकिन क्या इसकी कोई सीमा होती है?

24 साल के देवेंद्र ने जानवरों के लिए अपनी जॉब, घर और परिवार तक को छोड़ दिया।

एक-एक पैसा जोड़कर एक सेकंड-हैंड स्कूटी खरीदी है जिससे वो आगरा शहर के कोने-कोने में ज़रूरतमंद जानवरों को रेसक्यू करने पहुँचते हैं, वो भी बिना चप्पल या जूते के।

जी हाँ, देव ने अपनी चप्पलें भी त्याग दी हैं। क्यों? क्योंकि वह सड़क पर रहने वाले बेज़ुबानों के दर्द का अनुभव करना चाहते हैं। वह तब तक चप्पल नहीं पहनेंगे जब तक जानवरों के बेहतर इलाज के लिए अपने शेल्टर होम में एक ऑपरेशन थिएटर न बना लें।

देखिए उनकी पूरी कहानी और जल्द से जल्द OT बनाने में उनका साथ दीजिए। 100 हो या १०००, आपका एक छोटा सा योगदान भी बहुत बड़ी मदद बन सकता है

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न महंगे कपड़े, न कोई फैशन रैंप… बस एक सपना!

भोपाल की गलियों में पुरानी साड़ियों से बने आउटफिट्स पहनकर वॉक करने वाली प्रीति प्रजापति ने अपनी मेहनत और हुनर से सोशल मीडिया पर पहचान बनाई।

जहाँ कुछ लोगों को उसकी शुरुआत छोटी लगी, वहीं उसने अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया।

आज उसका सपना दुनिया के बड़े फैशन रैंप पर चलने का है।

क्योंकि शुरुआत कहाँ से करते हैं, यह मायने नहीं रखता… मायने रखता है कि आप अपने सपनों के लिए कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं।

आज उसकी बस्ती उसका रैंप है।
कल पूरी दुनिया हो सकती है!

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बेंगलुरु में Urban Company की सर्विस पर विवाद, पत्नी की अंगूठी चोरी होने के आरोप पर कंपनी का आया जवाब

ऑनलाइन ऐप से घर की सफाई के लिए प्रोफेशनल बुलाना आजकल आम बात है, लेकिन अगर इसी दौरान घर से कोई कीमती सामान गायब हो जाए तो भरोसे पर सवाल उठना लाजिमी है। बेंगलुरु के एक विज्ञापन पेशेवर ने Urban Company की क्लीनिंग सर्विस को लेकर ऐसा ही आरोप लगाया है। उनका दावा है कि घर की सफाई के दौरान उनकी पत्नी की शादी की सोने की अंगूठी गायब हो गई। मामला तब और चर्चा में आ गया, जब उन्होंने बताया कि पुलिस ने अंगूठी शहर से करीब 100 किलोमीटर दूर से बरामद की। इस घटना के बाद कंपनी की ग्राहक सेवा और ऑनलाइन बुकिंग वाली घरेलू सेवाओं की जवाबदेही पर बहस छिड़ गई है।

प्रीमियम क्लीनिंग सर्विस बुक की, फिर गायब हुई अंगूठी

बेंगलुरु के विज्ञापन पेशेवर शुभम मजूमदार ने LinkedIn पर अपना अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, उन्होंने Urban Company की InstaHelp सेवा के तहत घर की सफाई के लिए ‘Gold Expert’ कैटेगरी बुक की थी। इसी दौरान उनकी पत्नी की शादी की सोने की अंगूठी गायब हो गई।

मजूमदार ने आरोप लगाया कि सर्विस के लिए आए कर्मचारी ने अंगूठी चुराई। हालांकि, यह उनका आरोप है और मामले में किसी की दोषसिद्धि की जानकारी सामने नहीं आई है।

कंपनी से शिकायत की, लेकिन जवाब से नहीं हुए संतुष्ट

मजूमदार के मुताबिक, उन्होंने अंगूठी गायब होने की जानकारी तुरंत ऐप के जरिए कंपनी को दी। ग्राहक सहायता टीम ने उन्हें बताया कि कंपनी की रिकवरी टीम मामले की जांच करेगी और इसमें चार से पांच दिन लग सकते हैं।

उनका दावा है कि एक दिन बीतने के बाद भी कोई खास प्रगति नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने कंपनी के शिकायत अधिकारी से संपर्क कर मामले की जानकारी और संबंधित कर्मचारी का विवरण मांगा। लेकिन मजूमदार के अनुसार, उन्हें संतोषजनक जवाब मिलने के बजाय सामान्य तरह का संदेश मिला।

उन्होंने बताया कि कंपनी की ओर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की सलाह भी दी गई, जबकि वह पहले ही पुलिस से संपर्क कर चुके थे।

100 किलोमीटर दूर से मिली अंगूठी, Uber भी करनी पड़ी बुक

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात अंगूठी की बरामदगी को लेकर सामने आई। मजूमदार ने दावा किया कि पुलिस ने अंगूठी बेंगलुरु से करीब 100 किलोमीटर दूर एक जगह से बरामद की। उनके मुताबिक, पुलिस को वहां तक पहुंचाने के लिए उन्हें इंटरसिटी Uber बुक करनी पड़ी।

शिकायत के बीच आया सर्विस रेटिंग का मैसेज

मजूमदार ने कंपनी के ऑटोमेटेड मैसेज के स्क्रीनशॉट भी साझा किए। उनका कहना था कि अंगूठी गायब होने की शिकायत के बीच कंपनी ने उनसे सर्विस को रेट करने और रिव्यू देने के लिए संदेश भेज दिया। इससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई।

Urban Company ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए उनसे रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर निजी संदेश में साझा करने को कहा, ताकि मामले की जांच की जा सके। इस पर मजूमदार ने सवाल उठाया कि जब शिकायत पहले से दर्ज है, तो दोबारा जानकारी क्यों मांगी जा रही है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

इस घटना के बाद कुछ लोगों ने कंपनी की ग्राहक सेवा पर सवाल उठाए, जबकि कुछ यूजर्स ने ग्राहकों को कीमती सामान सुरक्षित रखने की सलाह दी। फिलहाल, यह मामला घरेलू सेवाओं में भरोसे, सुरक्षा और कंपनियों की जवाबदेही को लेकर चर्चा में है।

Tiger Attack Video: टाइगर के बाड़े में घुसा व्यक्ति, फिर बाघ ने किया हमला… वीडियो से सामने आया खौफनाक मामला

Young Environmentalist Shreya Kumawat | Rajasthan | | The Better India Hindi

Young Environmentalist Shreya Kumawat | Rajasthan | | The Better India Hindi

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सड़क चौड़ी करने के लिए जब पेड़ काटे गए, तो राजस्थान की 9वीं क्लास की श्रेया कुमावत ने इसे सिर्फ एक घटना की तरह नहीं देखा।

पेड़ों से उनका प्यार पहले ही लॉकडाउन में शुरू हो चुका था। लेकिन इस घटना ने उनके इस प्यार को एक मिशन में बदल दिया।

आज श्रेया 50,000+ पौधे तैयार कर चुकी हैं, 2,100+ पेड़ लगा चुकी हैं और बच्चों को प्रकृति से जोड़ने के लिए ‘Green Bachpan’ जैसी पहल चला रही हैं।

उनका सपना है कि लोग सिर्फ पेड़ लगाएं नहीं, बल्कि उन्हें बचाएं भी… और प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करें।

क्योंकि बदलाव के लिए उम्र बड़ी नहीं, सोच बड़ी होनी चाहिए।

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IIT कानपुर की ग्रेजुएट ने बताया, आखिर क्यों दोस्त ने वर्क फ्रॉम होम की नौकरी छोड़ दी? 10 से 6 की शर्त बनी वजह

वर्क फ्रॉम होम को अक्सर आजादी और सुविधा से जोड़कर देखा जाता है। लोगों को लगता है कि घर से काम करने पर वे अपने समय के हिसाब से जिंदगी और नौकरी के बीच संतुलन बना सकते हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा है? एक महिला ने इसी सवाल के बीच अपनी पूरी तरह रिमोट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। वजह थी कंपनी की यह शर्त कि उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार ऑनलाइन और उपलब्ध रहना होगा। इस घटना ने काम के घंटों, कर्मचारियों की आजादी और कंपनियों के भरोसे को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

ऑफिस से बचने के लिए चुना वर्क फ्रॉम होम

इस मामले को IIT कानपुर की पूर्व छात्रा और McKinsey में काम कर चुकीं कनक अग्रवाल ने LinkedIn पर साझा किया। उन्होंने अपनी एक दोस्त का अनुभव बताते हुए सवाल उठाया कि अगर कर्मचारी को घर से काम करते हुए भी ऑफिस जैसी समय-सारणी का पालन करना पड़े, तो रिमोट वर्क का असली फायदा क्या है? कनक के मुताबिक, उनकी दोस्त ने इसी वजह से नौकरी छोड़ दी। वह घर से काम तो कर रही थीं, लेकिन कंपनी चाहती थी कि वह तय समय के दौरान लगातार ऑनलाइन रहें और अपनी उपलब्धता दिखाती रहें। कनक ने इस स्थिति को केवल ऑफिस बनाम घर से काम करने का मामला नहीं, बल्कि अपने समय पर नियंत्रण रखने की आजादी से जुड़ा मुद्दा बताया।

काम पूरा करना जरूरी या पूरे दिन ऑनलाइन दिखना?

कनक का कहना है कि रिमोट वर्क की असली ताकत सिर्फ काम करने की जगह बदलने में नहीं, बल्कि काम करने के समय पर कुछ हद तक नियंत्रण मिलने में है। कर्मचारी अपनी ऊर्जा, उत्पादकता और निजी जरूरतों के अनुसार दिन की योजना बना सकें, तो उनके लिए काम और जिंदगी के बीच संतुलन बनाना आसान हो सकता है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कई कंपनियां कर्मचारियों के काम के नतीजों के बजाय उनकी ऑनलाइन मौजूदगी को प्रतिबद्धता का पैमाना क्यों मानती हैं। उनके अनुसार, जब कर्मचारी अपने समय को खुद व्यवस्थित करने लगते हैं, तो कुछ संगठनों को नियंत्रण कम होने का डर सताने लगता है।

क्या हर नौकरी में मिल सकती है समय की पूरी आजादी?

LinkedIn पर इस पोस्ट के बाद लोगों की अलग-अलग राय सामने आई। कुछ यूजर्स ने माना कि अपने समय पर नियंत्रण मिलने के बाद उसे छोड़ना मुश्किल होता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि रिमोट वर्क और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स दोनों अलग-अलग चीजें हैं। कुछ लोगों ने टीमवर्क की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके मुताबिक, अगर हर कर्मचारी अपनी सुविधानुसार अलग-अलग समय पर काम करेगा, तो मीटिंग, बातचीत और जरूरी कामों में तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। एक यूजर ने तो यह भी कहा कि कंपनी की 10 में से 9 भूमिकाओं में पूरी तरह लचीले समय की व्यवस्था लागू करना संभव नहीं होगा।

आखिर कर्मचारी चाहते क्या हैं?

यह बहस बताती है कि आज कर्मचारियों के लिए केवल घर से काम करना ही पर्याप्त नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके काम की गुणवत्ता और परिणामों को महत्व मिले, साथ ही उन्हें अपनी निजी जिंदगी के लिए भी समय मिल सके। हालांकि, हर नौकरी में एक जैसी आजादी संभव नहीं है। कंपनियों को टीम की जरूरतों और कर्मचारियों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कर्मचारी कहां से काम करते हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें अपने काम और समय को व्यवस्थित करने की कितनी आजादी मिलती है।

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छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | The Better India Hindi

छोटे कमरे से बड़े मंच की तैयारी करती गाँव की सोनाली | The Better India Hindi

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पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव की सोनाली के पास न कोई बड़ी Dance Academy है, न महंगा कैमरा और न कोई शानदार सेटअप।

पिता एक मामूली पेंटर हैं, माँ ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करती हैं।

घर में आर्थिक तंगी की वजह से सोनाली की पढ़ाई तक छूट गई, लेकिन उनके बचपन का सपना एक बेहतरीन डांसर बनने का आज भी ज़िंदा है।

पुराने फोन से विडियोज बनाकर और यूट्यूब से सीखकर सोनाली रोज़ अपने सपने के थोड़ा और करीब बढ़ रही है।

क्योंकि उन्हें खुद पर यकीन है कि उनकी। मेहनत एक दिन उन्हें उस बड़े मंच तक पहुँचा देगी।

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2000+ जानवरों की जान बचाने वाले One-Man Army | Uttarakhand | The Better India Hindi

2000+ जानवरों की जान बचाने वाले One-Man Army | Uttarakhand | The Better India Hindi

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नाले में फंसा कोई कुत्ता या सड़क किनारे ज़िंदगी से लड़ रही कोई गाय… इनकी मदद के लिए कितने लोग आगे आते हैं? अगर बात उत्तराखंड, नैनीताल के हल्द्वानी शहर की हो तो ऐसी किसी भी परिस्थिति में बंटी ज़रूर आते हैं, चाहे दिन हो या आधी रात!

इन्हें One-man Army कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि पशुओं को बचाने के लिए ये अकेले ही काम करते हैं। एक बाइक, एक फर्स्ट-ऐड बैग और एक रस्सी के दम पर करीब 2000 जानवरों की जान बचा चुके हैं।

इस काम की सीख उन्हें अपनी नानी से मिली थी, आज नानी दुनिया में नहीं, लेकिन बंटी ने इस काम को पूरी ज़िंदगी सौंप दी है।

अगर आप भी एक पशु-प्रेमी हैं, तो इनसे ज़रूर जुड़ें

[Animal Rescuer in Haldwani Uttarakhand, Man Who Rescued 2000 Animals in India, Stray Animal Rescue and Rehabilitation in India, Indian Animal Welfare Hero and Changemaker, Solo Animal Rescuer Saving Injured Street Animals]

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