12th और Graduation में फेल, फिर बने Civil Servant | Dancer to Civil Servant | Brijesh Parmar

12th और Graduation में फेल, फिर बने Civil Servant | Dancer to Civil Servant | Brijesh Parmar

कभी Physics में सिर्फ 3 नंबर पाने वाले
सिरोही, राजस्थान के Brijesh Parmar ने 12वीं और फिर BA First Year में भी असफलता देखी।
पढ़ाई छोड़कर Dance की दुनिया में गए, दिल्ली में ट्रेनिंग ली और मुंबई में बड़े Choreographers के साथ काम किया।
लेकिन Lockdown में जब घर लौटे, तो लोगों के तानों ने उन्हें अंदर तक चोट पहुंचाई।
उसी अपमान को उन्होंने अपनी ताकत बनाया।
2020 से दोबारा पढ़ाई शुरू की और लगातार मेहनत करते रहे।
नतीजा?
RAS 2023 और RAS 2024 में सफलता।
आज उनका सफर उन हजारों Aspirants के लिए उम्मीद है, जिन्हें कभी खुद पर भरोसा नहीं होता।
क्या एक असफलता किसी इंसान का भविष्य तय कर सकती है?

@brijeshparmar__ras

brijeshparmar__ras

12th और Graduation में फेल, फिर बने Civil Servant | Dancer to Civil Servant | Brijesh Parmar | Rajasthan

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कैब ड्राइवर को फोन पर अंग्रेजी बोलते देख पैसेंजर हुआ शॉक, बाद में सच्चाई ने खोला राज

आजकल AI रोजाना की जिंदगी का हिस्सा बन गया है, जो लोगों को ऑफिस के काम से लेकर नई स्किल्स सीखने तक में मदद करता है। लेकिन कभी-कभी AI का इस्तेमाल ऐसे मौकों पर भी देखने को मिलता है, जिसकी हम उम्मीद नहीं करते।

ऐसा ही कुछ दिल्ली में सुबह के समय कैब से सफर कर रहे मैनेजमेंट कंसल्टेंट तुषार जेजानी के साथ हुआ। उन्होंने देखा कि उनका कैब ड्राइवर फोन पर अंग्रेजी में बात कर रहा था। शुरुआत में यह देखकर उन्हें लगा कि आखिर फोन पर क्या हो रहा है।

लेकिन जब जेजानी ने ड्राइवर से एक साधारण सा सवाल पूछा, तो उन्हें ऐसी बात पता चली जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी। जिसके बाद एक आम कैब यात्रा सीखने, टेक्नोलॉजी और मेहनत से जुड़ी ऐसी कहानी बन गई, जिसने सफर खत्म होने के बाद भी उन्हें काफी समय तक प्रेरित किया।

जेजानी ने लिंक्डइन पोस्ट में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा, “सुबह 4:13 बजे, नई दिल्ली। एक ऐसी कैब यात्रा जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।”

उन्होंने आगे बताया, “मेरा ड्राइवर अपने फोन पर अंग्रेजी में बात कर रहा था, अपनी सुबह की दिनचर्या और यात्रा की लोकेशन बता रहा था। मैं थोड़ा घबरा गया और ध्यान से सुनने लगा क्योंकि एक पल के लिए मुझे लगा कि वह हमारी लोकेशन और जानकारी किसी और के साथ साझा कर रहा है। तभी उसने देखा कि मैं असहज महसूस कर रहा हूं। उसने बातचीत शुरू कर दी।”

ड्राइवर ने फिर पूछा, “सर, आप कहां जा रहे हैं?”

जेजानी ने जवाब दिया, “मैं बैंगलोर जा रहा हूं।”

इसके बाद ड्राइवर ने पूछा कि वह वहां काम के सिलसिले में जा रहे हैं या निजी काम से?

जेजानी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हमेशा काम के लिए।”

दोनों के बीच करीब 10 मिनट तक बातचीत हुई। ड्राइवर अंग्रेजी में बात कर रहा था, जबकि जेजानी उसे हिंदी में जवाब दे रहे थे। हालांकि, जेजानी के मन में अभी भी यह सवाल था कि ड्राइवर फोन पर आखिर किससे बात कर रहा था। आखिरकार उन्होंने सीधे उससे पूछ ही लिया।

तभी ड्राइवर ने जेजानी को बताया कि वह फोन पर किसी और से बात नहीं कर रहा था। बल्कि वह ChatGPT का इस्तेमाल करके अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस कर रहा था।

ड्राइवर ने कहा, “नहीं भैया, फोन पर नहीं। मैं ChatGPT पर अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस कर रहा था। अभी मैं फर्राटे से अंग्रेजी नहीं बोल पाता। मेरी अभी बेटी हुई है। उसके लिए सीख रहा हूं। जब बड़ी होगी, तो उसे भी सिखाऊंगा।”

इस पल को याद करते हुए जेजानी ने लिखा, “सुबह 5 बजे उस लगभग खाली सड़क पर मुझे एक बात समझ आई। वह सिर्फ अंग्रेजी नहीं सीख रहा था। वह चुपचाप अपनी बेटी के लिए जिंदगी में एक नई शुरुआत की तैयारी कर रहा था। मुझे नहीं पता कि AI किन-किन नौकरियों की जगह लेगा। लेकिन यह जरूर है कि AI ने भारतीय समाज के हर वर्ग के लोगों तक टेक्नोलॉजी की पहुंच आसान कर दी है।”

इस घटना ने जेजानी को यह सोचने पर भी मजबूर किया कि कैसे टेक्नोलॉजी ने सीखने की राह में आने वाली कुछ रुकावटों को कम किया है। उन्होंने लिखा, “कोई कोचिंग क्लास नहीं। कोई गेटकीपर नहीं। बस सीखने की इच्छा और AI वाला एक स्मार्टफोन। पिछले साल की इस कैब यात्रा को याद करते हुए जेजानी ने AI में आए बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने अंत में लिखा, “क्या सफर था और क्या जबरदस्त सीख मिली। सीखते रहो, सीखते रहो और सीखते रहो।”

सोशल मीडिया पर लोगों के रिएक्शन

इस पोस्ट के बाद LinkedIn पर AI, सीखने और टेक्नोलॉजी तक पहुंच के बारे में बड़ी चर्चा शुरू हो गई।

एक यूजर ने कमेंट किया, “ड्राइवर की कहानी दिखाती है कि जिज्ञासा, इरादा और टेक्नोलॉजी तक पहुंच नए रास्ते खोल सकती है, चाहे कोई कहीं से भी शुरुआत करे। सीखने के लिए क्लासरूम की जरूरत नहीं होती; कभी-कभी, बस एक स्मार्टफोन और खुद को बेहतर बनाते रहने की इच्छा ही काफी होती है।”

एक और यूजर ने कहा, “कभी-कभी AI का सबसे असरदार इस्तेमाल ऑफिस या स्टार्टअप में नहीं, बल्कि ऐसी रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिलता है।”

एक यूजर ने लिखा, “AI का सबसे बड़ा असर शायद ऑटोमेशन नहीं, बल्कि आम लोगों को उन टूल्स तक पहुंच देना हो सकता है, जो पहले मुश्किल से ही मिल पाते थे।”

यह भी पढ़ें: Sukhbir Singh Badal Attack: सुखबीर सिंह बादल पर हमला करने वाला आरोपी गिरफ्तार, CM फडणवीस ने दिए जांच के आदेश

गाँव की लड़की ने YouTube से बदली किस्मत | Poonam Kushwaha | Desi Food Creator | Madhya Pradesh

गाँव की लड़की ने YouTube से बदली किस्मत | Poonam Kushwaha | Desi Food Creator | Madhya Pradesh

मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव शिवपुरी की रहने वाली पूनम कुशवाहा ने YouTube और Instagram पर देसी खाना बनाकर अपनी किस्मत बदल दी।
200 वीडियो तक सिर्फ 1000 views मिलने के बाद भी हार नहीं मानी और एक दिन 35 Million views के साथ Viral हो गई।
आज वीडियो पर व्यूज भी आते है और लोगों का प्यार भी। इस सफर में उनका साथ दिया उनके छोटे भाई नरेंद्र ने जिन्होंने हर मुश्किल वक्त पर भी बहन का साथ नहीं छोड़ा।

@poonamk.official

Desi Food Vlogger, Brother Sister Bond, Small Village Success Story

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|खुलकर जीना सिखाते हैं ये Down Syndrome कलाकार | Ritesh Hindocha | The Better India Hindi

|खुलकर जीना सिखाते हैं ये Down Syndrome कलाकार | Ritesh Hindocha | The Better India Hindi

रितेश हिंडोचा को 3 साल की उम्र में Down Syndrome होने का पता चला। लेकिन उनके परिवार ने उन्हें कभी सीमाओं में नहीं बाँधा। Swimming, Speech Classes, Sports, लोगों से जुड़ना, हर कदम ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया।
45 साल की उम्र में भी रितेश उसी जोश के साथ ज़िंदगी जीते हैं। Covid के दौरान शुरू हुआ उनका Instagram आज लाखों लोगों तक मुस्कान और उम्मीद पहुँचा रहा है। इतना ही नहीं, उन्होंने आमिर खान की फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ में भी काम किया।
रितेश की कहानी याद दिलाती है कि सही साथ, प्यार और भरोसा किसी भी Diagnosis से बड़ा हो सकता है।

@riteshhindocha

Person with Down Syndrome Achievement, Family Support for Down Syndrome Child, Down Syndrome Influencer

खुलकर जीना सिखाते हैं ये Down Syndrome कलाकार | Ritesh Hindocha

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इस एक आइडिया ने बचा दिए 10,000 पेड़ | FALDAAR Initiative | Revamp India Foundation | Uttar Pradesh

इस एक आइडिया ने बचा दिए 10,000 पेड़ | FALDAAR Initiative | Revamp India Foundation | Uttar Pradesh

हर साल लाखों पेड़ लगाए जाते हैं।
लेकिन उन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी कौन लेता है?
उत्तर प्रदेश के 28 वर्षीय वैभव राठौर ने इसी सवाल का जवाब खोजा। उनकी संस्था Revamp India Foundation की ‘Faldaar’ पहल में पेड़ों को सिर्फ़ लगाया नहीं जाता, उनसे रिश्ता बनाया जाता है।
जब हर पौधे को एक पहचान मिली और हर बच्चे को उसकी ज़िम्मेदारी, तो नतीजा भी बदल गया।

40+ सरकारी स्कूल
10,000+ फलदार पेड़
करीब 75% सर्वाइवल रेट

आज ये पेड़ सिर्फ़ छाया और फल नहीं दे रहे, बल्कि बच्चों को ज़िम्मेदारी, टीमवर्क और प्रकृति से जुड़ाव भी सिखा रहे हैं।

लेकिन सफर अभी बाकी है।
कुछ पौधे आज भी जानवरों या ट्री गार्ड की कमी की वजह से नुकसान झेलते हैं।
अगर आप सिर्फ़ ₹200 का योगदान करते हैं, तो एक पौधे के लिए ट्री गार्ड लगाने में मदद कर सकते हैं।

Revamp India Foundation के साथ
आप वॉलंटियर बनकर भी इस मिशन से जुड़ सकते हैं।

Support Revamp India Foundation
Account Name: REVAMP INDIA FOUNDATION
Account Number: 00000041354317942
IFSC: SBIN0003752
UPI ID: revampindia@sbi
Volunteer: 9305716172

कभी-कभी बदलाव किसी बड़ी तकनीक से नहीं, बल्कि एक छोटे-से आइडिया से शुरू होता है।

क्या आपको लगता है कि हर स्कूल में ऐसी पहल होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताइए।:point_down:

@vaibhavrathoree

naming trees helped 10000 saplings survive, Children protecting trees in schools, How to increase tree survival rate

इस एक आइडिया ने बचा दिए 10,000 पेड़ | FALDAAR Initiative | Revamp India Foundation | Uttar Pradesh

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खुदीराम बोस: 18 साल की उम्र में अमर शहीद | Khudiram Bose | Martyred at Just 18

18 साल की उम्र में फांसी के फंदे तक पहुंचे, लेकिन चेहरे पर डर नहीं था…
11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
जिस उम्र में एक युवा अपनी ज़िंदगी के सपने बुनता है, उस उम्र में खुदीराम ने आज़ाद भारत का सपना देखा और उसके लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।
एक माँ ने अपना बेटा खोया, लेकिन भारत ने एक ऐसा वीर पाया, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को साहस, देशभक्ति और बलिदान की सीख देती रहेगी।
खुदीराम बोस सिर्फ़ इतिहास का एक नाम नहीं—वो उस जज़्बे का नाम हैं, जो देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना सिखाता है।
आज उनकी शहादत को नमन करें और याद रखें—
आज़ादी हमें विरासत में नहीं, बल्कि ऐसे अनगिनत वीरों के बलिदान से मिली है।
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अस्पताल पहुँचने में लगते थे घंटे, तो बना दी उड़ने वाली कार | Ravi Tamta | Flying Car | Uttarakhand

क्या हो अगर पहाड़ों के ऊपर से उड़कर जाया जा सके, वो भी बिना एयरपोर्ट के?

इसी सोच से उत्तराखंड के अल्मोड़ा के रवि तम्टा ने 13 साल तक लगातार प्रयोग किए और एक इलेक्ट्रिक फ्लाइंग व्हीकल का प्रोटोटाइप तैयार किया।

रवि के पास न इंजीनियरिंग की डिग्री थी न कोई बड़ी लैब थी, बस एक समस्या को हल करने की जिद थी।

उनका सपना है कि पहाड़ी इलाकों में, खासकर मेडिकल इमरजेंसी के दौरान, लोगों तक जल्दी पहुँचा जा सके।

फ्लाइंग व्हीकल अभी प्रोटोटाइप स्टेज में है और इसे कई और टेस्ट से गुजरना बाकी है।

लेकिन रवि की कहानी बताती है –
बड़े आविष्कार हमेशा बड़ी लैब में नहीं जन्म लेते। कभी-कभी एक मुश्किल सवाल ही उनकी शुरुआत होता है।

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माँ और पिता, बेटे को दे रहे हैं दोनों का प्यार | Single Father | Uttar Pradesh | Kuldeep Satvik Vlog

कहते हैं कि माँ की जगह कोई नहीं ले सकता। लेकिन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले कुलदीप भारद्वाज वो पिता हैं, जो अपने ढाई साल के बच्चे की मुस्कान के लिए हर दिन माँ और पापा, दोनों की भूमिका निभाते हैं।

पत्नी के निधन के बाद कुलदीप ने अपने बेटे की परवरिश की ज़िम्मेदारी अकेले उठाई। आज वह उसके लिए पिता भी हैं और माँ भी।

सोशल मीडिया पर उनके छोटे-छोटे वीडियोज़ आज हज़ारों लोगों का दिल जीत रहे हैं। और उन Single Parents के लिए भी उम्मीद बन रहे हैं, जो अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया हैं। आइए जानते हैं नन्हे सात्विक और उसके पापा की कहानी

@kuldeepsatvikvlogs

माँ और पिता, बेटे को दे रहे हैं दोनों का प्यार | Single Father | Uttar Pradesh | Kuldeep Satvik Vlogs

[Single Father from Uttar Pradesh Making Inpiring Vlogs on Parenthood, Single Parent

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हर Parent को सुननी चाहिए Harshad की बात | child safety awareness through Harshad Chopda’s story

सालों तक Harshad Chopda ने अपने बचपन का ये दर्द किसी से साझा नहीं किया।

पर अब उन्होंने पहली बार Netflix के show Lock Upp Season 2 में अपना सच बताया, तो उनका मकसद सिर्फ़ अपनी कहानी सुनाना नहीं था, बल्कि हर माता-पिता को ये याद दिलाना था कि बच्चों की बात सुनना कितना ज़रूरी है।
शर्म Survivor की नहीं, गुनाहगार की होनी चाहिए।
अगर आप Parent, Guardian या Teacher हैं, तो इस वीडियो को ज़रूर देखें और शेयर करें। क्योंकि एक बातचीत किसी बच्चे के लिए फ़र्क ला सकती है।
@harshad_chopda

Child sexual abuse awareness, Good touch bad touch awareness, Harshad Chopda childhood abuse story

हर Parent को सुननी चाहिए Harshad की बात | child safety awareness through Harshad Chopda’s story | Lock Upp Season 2 | Netflix
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Gen Z की अनोखी नौकरी वाली मांग ने छेड़ी बहस, IITian फाउंडर ने बताया क्यों कैंडिडेट को किया सिलेक्ट

नौकरी के इंटरव्यू में कैंडिडेट आमतौर पर सैलरी, छुट्टियों, वर्क फ्रॉम होम और जॉब रोल से जुड़ी बातें पूछते हैं। लेकिन नोएडा के एक फाउंडर के सामने एक उम्मीदवार ने ऐसी मांग रख दी, जिसने इंटरव्यू का माहौल ही बदल दिया। कैंडिडेट ने बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा कि उसे हर दोपहर 30 मिनट की नींद लेने की जरूरत होगी, क्योंकि इससे उसकी productivity बेहतर होती है। हैरानी की बात यह थी कि उसने यह बात न तो मजाक में कही और न ही किसी झिझक के साथ।

फाउंडर नितिन वर्मा के मुताबिक, उम्मीदवार ने अपनी इस जरूरत को ऐसे रखा जैसे वह सैलरी पर बातचीत कर रहा हो। पहली प्रतिक्रिया में उन्हें इंटरव्यू खत्म करने का ख्याल आया, लेकिन बाद में उन्होंने इस मांग को एक अलग नजरिए से देखने का फैसला किया। सवाल यह था कि क्या कर्मचारी के काम के नतीजे अच्छे हों तो 30 मिनट की nap वास्तव में बड़ी समस्या है?

 ‘हर दोपहर मुझे Nap चाहिए’

IIT-backed कंपनी के फाउंडर और CEO नितिन वर्मा ने LinkedIn पर इस इंटरव्यू का अनुभव शेयर किया। उनके मुताबिक, उम्मीदवार ने पूरी गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ कहा कि दोपहर की 30 मिनट की झपकी उसके काम को बेहतर बनाती है। वर्मा ने बताया कि उम्मीदवार ने यह बात ऐसे रखी, जैसे वह सैलरी पर बातचीत कर रहा हो। उनका पहला विचार इंटरव्यू खत्म करने का था, लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि क्या यह मांग वाकई इतनी गलत है।

फाउंडर को पसंद आई कैंडिडेट की बेबाकी

नितिन वर्मा ने माना कि छोटी दोपहर की नींद से फोकस, एनर्जी और याददाश्त बेहतर हो सकती है। उन्होंने मजाक में कहा कि कॉरपोरेट ऑफिस में दोपहर की मीटिंग्स के दौरान कई लोग वैसे भी ऊंघते नजर आते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि यह उम्मीदवार अपनी जरूरत खुलकर बता रहा था। फाउंडर के मुताबिक, ज्यादातर लोग इंटरव्यू में खुद को कंपनी की पसंद के हिसाब से पेश करते हैं, जबकि इस कैंडिडेट ने साफ बताया कि वह किस तरह काम करने पर सबसे ज्यादा productive रहता है।

‘मुझे फर्क नहीं पड़ता तुम कब सोते हो’

वर्मा ने कैंडिडेट को फिक्स 30 मिनट की Nap Break देने के बजाय साफ कहा कि उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कर्मचारी कब आराम करता है। उनके लिए जरूरी यह है कि सौंपा गया काम समय पर पूरा हो। यानी शर्त सीधी थी, काम पूरा करो, तो घंटे गिनने की जरूरत नहीं; काम नहीं हुआ तो कोई Nap मदद नहीं करेगी।

आखिरकार मिल गई नौकरी

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कैंडिडेट को नौकरी मिल गई। फाउंडर ने कहा कि उसकी Nap की मांग असली मुद्दा नहीं थी। उन्हें उसकी ईमानदारी और आत्मविश्वास ने प्रभावित किया। इस घटना ने उन्हें यह सोचने पर भी मजबूर किया कि क्या आधुनिक वर्कप्लेस में कर्मचारियों की productivity को ऑफिस में बिताए घंटों से मापा जाना चाहिए या उनके actual results से।

LinkedIn पर लोगों ने क्या कहा?

पोस्ट वायरल होने के बाद कई यूजर्स ने इसे बदलते workplace culture का संकेत बताया। कुछ ने कहा कि अगर कर्मचारी अपना काम पूरा कर रहा है तो उसे अपनी working style में थोड़ी आजादी मिलनी चाहिए। वहीं, कुछ यूजर्स ने Gen Z के इस अंदाज पर मजाक भी किया। एक यूजर ने कहा कि Gen Z को पता है कि जरूरी benefits के लिए negotiation कैसे करनी है।

Raksha Bandhan Mehndi Designs: रक्षाबंधन पर हाथों की खूबसूरती में लगाएं चार चांद, ट्राई करें ये लेटेस्ट और आसान मेहंदी डिजाइन