कौन हैं एमके दास? जिन्होंने PM मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ विजन के लिए झोंक दी अपनी पूरी ताकत

Who is Manoj Kumar Das

Manoj Kumar Das (MK Das) : यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) की परीक्षा पास करने वाला हर सिविल सर्वेंट ऊंचे पदों पर पहुंचकर देश सेवा करने का सपना देखता है। बिहार के दरभंगा के मूल निवासी और 1990 बैच के IAS अधिकारी मनोज कुमार दास (एमके दास) की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायी है। दरभंगा में अपनी 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने प्रतिष्ठित IIT खड़गपुर से कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की और इसके बाद वे भारतीय सिविल सेवा में शामिल हो गए।

 

2. गुजरात सरकार के नए 'श्री विश्वसनीय'

नवंबर 2025 में गुजरात के मुख्य सचिव के रूप में कार्यभार संभालने के बाद एमके दास प्रशासनिक गलियारों में सरकार के नए 'श्री विश्वसनीय' (Mr. Dependable) बनकर उभरे हैं। पहले ऐसा माना जा रहा था कि लंबे समय तक आर्थिक और नीतिगत विभाग संभालने वाले दास के लिए सामाजिक क्षेत्र एक बड़ी चुनौती साबित होगा। हालांकि शासन की गहरी समझ और सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं को सही ढंग से पहचानकर उन्होंने प्रशासनिक तंत्र पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है।

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3. आलोचकों को जवाब और सामाजिक सुधार

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार में मुख्य प्रशासनिक प्रमुख के रूप में सेवा दे रहे एमके दास ने पिछले 9 महीनों में अपने आलोचकों को गलत साबित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री के दृष्टिकोण (Vision) के अनुरूप वे न केवल नीतिगत ढांचे को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि सामाजिक क्षेत्र के कल्याणकारी कार्यक्रमों को भी नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। विशेष रूप से गुजरात में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों (Dropouts) की दर को कम करने और बाल कुपोषण को जड़ से खत्म करने के लिए उन्होंने एक निर्णायक अभियान शुरू किया है।

 

4. एमके दास का प्रगतिशील '3E' फॉर्मूला

एमके दास का मानना है कि आज के बच्चे वर्ष 2047 के 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वे राज्य के श्रमिकों के बच्चों तक भी 'शाला प्रवेशोत्सव' जैसे प्रगतिशील कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। वे शासन चलाने के लिए खास '3E' फॉर्मूले पर भरोसा करते हैं, जिसका अर्थ है Effective (असरदार), Efficient (कुशल) और Easy (आसान)।

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5. फील्ड ऑफिसर से कलेक्टर तक का सफर

उन्होंने अपने सिविल सर्विस करियर की शुरुआत गुजरात के डभोई में SDM के रूप में की थी। इसके बाद, जब 2 अक्टूबर 1997 को जूनागढ़ से पोरबंदर जिला अलग हुआ, तो वे वहां के पहले जिला कलेक्टर बने। इसके अलावा, उन्होंने बनासकांठा और सूरत जैसे महत्वपूर्ण जिलों में कलेक्टर के रूप में और सूरत व वडोदरा नगर निगम में म्यूनिसिपल कमिश्नर के रूप में यादगार सेवाएं दी हैं। वडोदरा में कमिश्नर के तौर पर उनका 5 साल का कार्यकाल आज भी लोग बड़े आदर के साथ याद करते हैं।

 

6. केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और CMO में दोहरी सेवा

राज्य स्तर के अलावा एमके दास ने केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है, जिसमें गृह मंत्रालय के तहत जम्मू-कश्मीर मामलों के निदेशक (Director) के रूप में उनकी भूमिका प्रमुख है। गुजरात में उन्होंने उद्योग, राजस्व, बंदरगाह, परिवहन, पंचायत और गृह जैसे कई संवेदनशील विभागों में अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) के रूप में कार्य किया है।

इसके अलावा, उन्हें दो बार मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) में सेवा करने का अवसर मिला, जहां उन्होंने 2017-2021 और 2024-2025 के दौरान मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

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7. एमके दास की व्यक्तिगत प्रोफाइल और तकनीक का उपयोग

जन्म तिथि : 20 दिसंबर, 1966

सेवा प्रवेश वर्ष : 20 अगस्त, 1990

मुख्य सचिव के रूप में पदभार ग्रहण : 1 नवंबर, 2025

 

वे प्रशासनिक कार्यों में टेक्नोलॉजी के व्यापक उपयोग के हिमायती हैं। उनके मार्गदर्शन में गुजरात में अधिकांश सरकारी प्रमाणपत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाकर पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया गया है और आवश्यक दस्तावेजों की संख्या में भी भारी कटौती की गई है।

 

8. पॉलिसी फ्रेमवर्क और भविष्य का प्रशासनिक नेतृत्व

गुजरात को देश का अग्रणी डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हब बनाने के लिए हाल ही में 'विकसित गुजरात डेटा सेंटर नीति 2026-29' घोषित की गई है। इसके अतिरिक्त उनके नेतृत्व में पिछले 9 महीनों में 4 अन्य महत्वपूर्ण नीतियां भी लागू की गई हैं:

 

गुजरात ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर नीति 2025-30

गुजरात एकीकृत नवीकरणीय ऊर्जा नीति 2025

विकसित गुजरात औद्योगिक नीति 2026

गुजरात निर्यात नीति 2025

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सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि एमके दास ने प्रशासन पर इस कदर पकड़ बनाई है कि उन्होंने लंबे समय तक सुपर-ब्यूरोक्रेट रहे के. कैलाशनाथन की कमी महसूस नहीं होने दी। उनका कार्यकाल दिसंबर 2026 के अंत में समाप्त होने जा रहा है और वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2027 से ठीक पहले उनकी सेवानिवृत्ति नजदीक होने के कारण 1991 बैच की वरिष्ठ IAS अधिकारी जयंती एस. रवि को उनका संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है।


Manoj Kumar Das

अब देश को मिलेगी पहली सरकारी AI यूनिवर्सिटी! जानिए इसे लेकर क्या हुआ ऐलान, कैसी है तैयारी

AI university in India: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में भारत एक नया इतिहास रचने जा रहा है। देश को जल्द ही अपनी पहली सरकारी एआई यूनिवर्सिटी मिलने वाली है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मंगलवार (14 जुलाई) को यह बड़ा ऐलान किया कि राज्य देश की पहली सरकारी स्तर की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यूनिवर्सिटी स्थापित करेगा।

मुख्यमंत्री ने यह महत्वपूर्ण घोषणा बेंगलुरु में आयोजित Google I/O Connect India 2026 के उद्घाटन के दौरान की। इस कार्यक्रम में देश और दुनिया भर से टेक्नोलॉजी लीडर्स, इनोवेटर्स, एंटरप्रेन्योर्स, डेवलपर्स, रिसर्चर्स और पॉलिसी मेकर्स हिस्सा ले रहे हैं।

एआई यूनिवर्सिटी और AI Hub की होगी स्थापना

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सीएम डीके शिवकुमार ने बताया कि राज्य सरकार जिम्मेदार एआई इनोवेशन के मामले में कर्नाटक को एक वैश्विक लीडर बनाना चाहती है। इसके लिए दो बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। पहला सरकारी एआई यूनिवर्सिटी बनाई जाएगी। यह प्रस्तावित यूनिवर्सिटी विश्व स्तरीय एआई टैलेंट तैयार करने, रिसर्च को आगे बढ़ाने और अकादमिक जगत, इंडस्ट्री एवं सरकार के बीच सहयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

दूसरा AI Hub भी स्थापित होगा जो स्टार्टअप्स, कंपनियों और अन्य संस्थानों द्वारा एआई के क्षेत्र में रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए एक इनक्यूबेशन सेंटर के रूप में काम करेगा। सीएम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तुलना भाप के इंजन, बिजली, इंटरनेट और मोबाइल टेक्नोलॉजी से करते हुए कहा कि यह इस पीढ़ी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है।

आईटी सेक्टर में कर्नाटक की मजबूत हिस्सेदारी

बेंगलुरु और कर्नाटक के मौजूदा तकनीकी दबदबे को बताते हुए सीएम डीके शिवकुमार ने कुछ बेहद महत्वपूर्ण आंकड़े भी साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत के कुल सॉफ्टवेयर निर्यात में अकेले कर्नाटक की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। बेंगलुरु वर्तमान में 17000 से अधिक स्टार्टअप्स और हजारों ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का घर है जो वैश्विक बाजार के लिए प्रोडक्ट्स डिजाइन और इंजीनियर करते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य राज्य को एक AI-native राज्य बनाना है। ऐसा राज्य जहां एआई केवल एक तकनीकी नारा बनकर न रहे बल्कि इसका इस्तेमाल सुशासन और लोगों के रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जिम्मेदारी से किया जाए।

इन 5 क्षेत्रों में गूगल के साथ साझेदारी का न्योता

मुख्यमंत्री शिवकुमार ने कर्नाटक के साथ दो दशकों से अधिक समय की गूगल की साझेदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि सर्च, एंड्रॉयड, यूट्यूब, मैप्स, क्रोम, जीमेल और गूगल पे जैसे गूगल के प्रोडक्ट्स ने भारतीयों के ज्ञान प्राप्त करने, व्यापार करने और सरकारी सेवाओं के साथ जुड़ने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है।

मुख्यमंत्री ने गूगल को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु अनुकूलन, अर्बन मोबिलिटी और सुशासन के लिए एआई समाधान बनाने में सहयोग करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने सहयोग के लिए 5 प्रमुख क्षेत्रों का खाका पेश किया:-

1- एआई टूल्स का विकास: शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और छोटे व्यवसायों के लिए विशेष एआई टूल्स विकसित करना।

2- भारतीय स्टार्टअप्स को सपोर्ट: बड़े पैमाने पर भारतीय चुनौतियों का समाधान खोजने वाले स्टार्टअप्स को सहायता देना।

3- एआई लर्निंग का विस्तार: पूरे कर्नाटक में छात्रों के लिए एआई सीखने के अवसरों को बढ़ाना।

4- ग्लोबल लैबोरेटरी बनाना: कर्नाटक को जिम्मेदार टेक्नोलॉजी के लिए एक वैश्विक प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना।

5- लॉन्ग-टर्म पार्टनरशिप: इकोसिस्टम पार्टनर के रूप में गूगल की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को और गहरा करना।

भविष्य के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की तैयारी

कर्नाटक सरकार देश के इस तकनीकी हब के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए राज्य सरकार डेटा सेंटर्स सहित अपने डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार जारी रखेगी ताकि एआई इनोवेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग और अगली पीढ़ी की डिजिटल सेवाओं को जरूरी सपोर्ट मिल सके।

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समारोह के अंत में डेवलपर्स और युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीकी क्रांतियां हमेशा जिज्ञासा और ‘क्या हम इसे अलग तरीके से कर सकते हैं?’ पूछने की इच्छा से शुरू होती हैं। उन्होंने डेवलपर्स को निडर होकर निर्माण करने, उद्यमियों को बड़े सपने देखने और शोधकर्ताओं को नवाचार जारी रखने का आग्रह किया।

भारत में इंजीनियर बनने का सपना फीका क्यों पड़ रहा है?

Engineering Colleges Closing in India

समीरात्मज मिश्र

एक समय इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना एक सुरक्षित कारोबार माना जाता था। आज उनमें से कई खाली हैं या बंद हो रहे हैं। आखिर ऐसा क्या बदला कि इंजीनियर बनने का सपना लाखों युवाओं के लिए पहले जैसा आकर्षक नहीं रहा? ALSO READ: पर्यावरण संरक्षण में क्यों पिछड़ रहा है भारत

 

करीब डेढ़ दशक पहले उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता था। हर साल हजारों छात्र बीटेक में दाखिला लेते थे और निजी कॉलेजों का तेजी से विस्तार हो रहा था। लेकिन अब वही संस्थान छात्रों के इंतजार में खाली पड़े हैं। कई कॉलेज बंद हो चुके हैं और कई बंद होने की कगार पर हैं। एक समय जिस तकनीकी शिक्षा को रोजगार की गारंटी माना जाता था, वही मॉडल आज सवालों के घेरे में है।

 

यही नहीं, इंजीनियरिंग की महंगी डिग्री लेने के बाद छात्रों को या तो बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है या फिर बहुत कम तनख्वाह वाली नौकरियां मिलती हैं। नतीजा यह हुआ कि इंजीनियरिंग और एमबीए जैसे तमाम अन्य तकनीकी संस्थान धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं।

 

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन यानी एआईसीटीई की एक ताजा रिपोर्ट ने न सिर्फ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एक गंभीर चेतावनी दी है बल्कि देश के शैक्षिक परिवेश और बेरोजगारी की स्थिति पर भी सोचने को मजबूर किया है। एआईसीटीई के मुताबिक, शैक्षणिक सत्र 2025-26 के दौरान देश भर में 58 से ज्यादा इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थान बंद कर दिए गए।

 

जिन राज्यों में ये कॉलेज बंद हुए हैं, उनमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष पर हैं। इन दोनों राज्यों में 12-12 संस्थान बंद हुए हैं जबकि मध्य प्रदेश में आठ और तेलंगाना और पंजाब में चार-चार संस्थान बंद हुए हैं। इन 58 संस्थानों में से तीन सरकारी मदद वाले थे, जबकि बाकी निजी तौर पर संचालित हो रहे थे। ALSO READ: अमेरिकी नागरिकता के पक्ष में फैसले से क्यों खुश हैं भारतीय

 

क्यों बंद हो रहे हैं कॉलेज?

दरअसल, एआईसीटीई उन स्थितियों में किसी संस्थान को बंद करने का आदेश देती है जब वहां छात्रों का दाखिला लगातार कम हो रहा हो, संस्थान में स्वीकृत संख्या में शिक्षकों की कमी हो और इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन के नियमों का सही तरीके से पालन न हो रहा हो।

 

एआईसीटीई भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए कानूनी तौर पर बनी राष्ट्रीय संस्था और नियामक है। यह इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, मैनेजमेंट और फार्मेसी जैसे कार्यक्रमों की देख-रेख करती है और गुणवत्ता और मानक बनाए रखने की निगरानी करती है।

 

नोएडा के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में मेकेनेकिल इंजीनियरिंग पढ़ाने वाले एक शिक्षक नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि चार साल की पढ़ाई के दौरान एक छात्र औसतन आठ-दस लाख रुपये खर्च करता है लेकिन इस खर्च के अनुरूप उन्हें नौकरी नहीं मिलती।

 

उनके मुताबिक, “कई कॉलेजों की फीस तो और भी ज्यादा है। चार साल में इंजीनियर बनकर जब छात्र बाहर जाते हैं तो उन्हें 15-20 हजार महीने की नौकरी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यही नहीं, इसके बाद वो फिर उन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं जिसके लिए सिर्फ स्नातक की अर्हता होती है। तो धीरे-धीरे पेरेंट्स को भी लगता है कि बीटेक कराने से फायदा ही क्या?” ALSO READ: पश्चिम बंगाल: पुलिस मुठभेड़ में अभियुक्त की मौत से उठे सवाल

 

समस्या सिर्फ रोजगार की नहीं है

यानी समस्या सिर्फ रोजगार की नहीं है, बल्कि चार साल की पढ़ाई पर होने वाले निवेश और उससे होने वाले लाभ या रिटर्न के बिगड़ते समीकरण की भी है। दीपाली राज मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं। नोएडा के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। वो बताती हैं, “कैंपस प्लेसमेंट में जो ऑफर मिले, उनकी सैलरी चार साल की पढ़ाई पर हुए खर्च के मुकाबले बहुत कम थी। इसलिए मैंने बैंकिंग की तैयारी शुरू कर दी। कम से कम वहां नौकरी की स्थिरता तो है”

 

दीपाली पिछले तीन साल से तैयारी में हैं लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली। दीपाली कहती हैं कि उनकी तरह हजारों की संख्या में इंजीनियरिंग करने वाले छात्र इन परीक्षाओं की तैयारी क रहे हैं। वजह यह कि कम से कम स्थाई नौकरी तो मिल जाएगी, बीटेक की डिग्री में इसकी गारंटी नहीं है।

 

प्राइवेट संस्थानों के बंद होने के पीछे और भी कई कारण हैं। जानकारों के मुताबिक, एक तो ये अभी भी पुराने पाठ्यक्रमों के हिसाब से चल रहे हैं जबकि आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के जमाने में चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं। इसके अलावा बीटेक के पाठ्यक्रमों का विकल्प अन्य पाठ्यक्रमों में भी है जिन्हें पूरा करने में समय भी कम लगता है और खर्च भी।

 

गाजियाबाद के एबीईएस कॉलेज में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर आदित्य टंडन बताते हैं, “बीटेक में भीड़ बढ़ गई है। डेटा साइंस में भरमार हो गई है और इसमें सिर्फ बीटेक ही नहीं चाहिए, दूसरे क्षेत्रों के लोग भी आते हैं। इसके अलावा, बीटेक के विकल्प के रूप में बीसीए, बीएससी कंप्यूटर साइंस जैसे कोर्स तीन साल में ही हो जा रहे हैं। इनका पाठ्यक्रम बीटेक जैसा ही है। यही नहीं, कई प्रोग्राम ऑनलाइन और डिस्टेंस लर्निंग मोड में भी हैं। तो छात्रों को यह भी एक विकल्प मिल जाता है। छात्रों की संख्या में कमी की वजह ये भी है।”

 

तकनीक तेजी से बदल रही है

पिछले कुछ वर्षों में आईटी और तकनीकी कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया भी बदली है। कई कंपनियां अब केवल डिग्री के आधार पर भर्ती करने के बजाय उम्मीदवार के कौशल, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और समस्या सुलझाने की क्षमता पर ज्यादा जोर दे रही हैं। ऐसे में केवल बीटेक की डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं रह गई है।

 

यहीं एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा होता है कि यदि इंजीनियरिंग का आकर्षण कम हो रहा है, तो फिर हर साल लाखों छात्र जेईई जैसी परीक्षाओं की तैयारी क्यों कर रहे हैं?

 

दिल्ली, कोटा, पुणे, कानपुर जैसी जगहों पर लाखों की संख्या में छात्र इन्हीं प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। दिल्ली में एक इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले दुर्गेश कुमार खुद भी आईआईटी से इंजीनियर रहे हैं। नौकरी करने की बजाय उन्होंने छात्रों को पढ़ाने का फैसला किया।

 

डीडब्ल्यू से बातचीत में दुर्गेश कहते हैं, “यह कहना ठीक नहीं है कि इंजीनियरिंग में लोगों की दिलचस्पी कम हो गई है। लेकिन हां, उन संस्थानों से बीटेक का क्रेज जरूर खत्म हुआ है जहां पढ़ाई, ट्रेनिंग और प्लेसमेंट का स्तर कमजोर है। जो संस्थान इसे सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बनाए हुए हैं। आज भी आईआईटी, एनआईटी और तमाम अन्य संस्थानों की मांग वैसी ही बनी हुई है जैसी बीस-तीस साल पहले थी। इसका कारण है कि इन संस्थानों ने अपनी गुणवत्ता बरकरार रखी है और आधुनिक तकनीक और समय के हिसाब से खुद को ढालते रहे हैं। ज्यादातर संस्थान सरकारी नियंत्रण में हैं जहां पैसा कमाना संस्थान का लक्ष्य नहीं बल्कि संस्थान से बेहतर प्रशिक्षित लोग तैयार करना है।”

 

सिर्फ यही संस्थान टिक पाएंगे

जानकारों का मानना है कि उद्योगों की मांग अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स और सेमीकंडक्टर जैसी नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है। जिन संस्थानों ने समय के अनुरूप अपने पाठ्यक्रम, प्रयोगशालाओं और उद्योगों से जुड़ाव को मजबूत नहीं किया, वहां छात्रों का रुझान लगातार घटा है। आदित्य टंडन कहते हैं कि आने वाले समय में वही संस्थान टिक पाएंगे, जो आधुनिक तकनीकों को अपनाने के साथ कौशल आधारित शिक्षा और उद्योगों के साथ बेहतर समन्वय पर जोर देंगे।

 

उनके मुताबिक, “चूंकि निजी क्षेत्र के ज्यादातर संस्थान किसी तरह मान्यता लेने की कोशिश करते हैं, इसके लिए तमाम मानकों का उल्लंघन भी करते हैं लेकिन जब छात्र यहां आते हैं तो खुद को ठगा महसूस करते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे वहां छात्रों की संख्या में कमी आने ही लगती है। यही नहीं, संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता और उनका प्रोफाइल भी बहुत मायने रखता है। बहुत से निजी संस्थान इस तरफ भी ज्यादा ध्यान नहीं देते। नतीजा, छात्रों की कमी होना ही है।”

 

दरअसल, यह कहानी केवल 58 इंजीनियरिंग कॉलेजों के बंद होने की नहीं है बल्कि यह भारत की तकनीकी शिक्षा के उस दौर के खत्म होने की कहानी है, जिसमें सिर्फ डिग्री मिल जाना ही सफलता की गारंटी माना जाता था। अब छात्र डिग्री नहीं, रोजगार तलाश रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में वही इंजीनियरिंग संस्थान टिक पाएंगे जो बदलती तकनीक, उद्योगों की जरूरत और छात्रों की अपेक्षाओं के साथ खुद को बदल सकेंगे। बाकी संस्थानों के लिए चुनौती और कठिन होती जाएगी।

UN सिक्योरिटी कॉउंसिल सीट के लिए भारत ने लॉन्च किया SHANTI कैंपेन, जानें क्या है विदेश मंत्री जयशंकर का सुपर प्लान

UNSC Seat: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में साल 2028-29 के कार्यकाल के लिए भारत ने अपनी मजबूत दावेदारी पेश करते हुए आधिकारिक तौर पर अपना अभियान शुरू कर दिया है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत का सुपर प्लान पेश किया। इसे SHANTI कैंपेन का नाम दिया गया है। इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र के कई राजदूत, राजनयिक और वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

PTI की रिपोर्ट के मुताबिक इस आधिकारिक कैंपेन को लॉन्च करने के साथ ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ मुलाकात की और पश्चिम एशिया, यूक्रेन और सूडान सहित कई वैश्विक घटनाक्रमों पर विस्तृत चर्चा की। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय से निकलते समय जब पीटीआई ने उनसे पूछा कि बैठक कैसी रही तो जयशंकर ने संक्षिप्त शब्दों में कहा कि हमेशा की तरह अच्छी।

क्या है भारत का SHANTI कैंपेन?

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2028-29 कार्यकाल के लिए देश की प्राथमिकताओं को स्पष्ट। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘SHANTI’ यानी ‘Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity’ (नियमों, विश्वास और अखंडता के माध्यम से समग्र प्रगति सुनिश्चित करना) पर आधारित है। जयशंकर ने भारत के इस सुपर प्लान के तहत सुरक्षा परिषद के लिए अपनी 6 मुख्य प्राथमिकताओं को सामने रखा है।

पहली ग्लोबल साउथ की आवाज बनना। यानी अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के मंच पर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की चिंताओं और मुद्दों को मजबूती से उठाना। दूसरी सुधारित बहुपक्षवाद यानी वैश्विक शासन में सुधार को आगे बढ़ाना ताकि इसे अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाया जा सके। तीसरी भविष्य के लिए तैयार पीसकीपिंग, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन को आधुनिक और भविष्य की चुनौतियों के अनुकूल बनाना। चौथी एआई (AI) के दुरुपयोग से निपटना, जिसके तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के गलत इस्तेमाल से पैदा होने वाले खतरों को एड्रेस करना। पांचवीं समुद्री सुरक्षा जिसके तहत वैश्विक समुद्री मार्गों और सुरक्षा को मजबूत करना। छठी टेरर फाइनेंसिंग पर लगाम। इसके तहत आतंकवाद को मिलने वाली वित्तीय मदद का कड़ा विरोध करना और इसे रोकना।

इस अभियान की शुरुआत के अवसर पर एक विशेष वीडियो भी दिखाया गया। इसमें वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका, उसके योगदान और यूएनएससी अभियान की प्राथमिकताओं को दिखाया गया। वीडियो में मिसाइल हमलों से तबाह होते शहरों और प्राकृतिक आपदाओं के फुटेज के बीच भारत द्वारा पहुंचाई गई मानवीय और राहत सहायता को दिखाया गया। वीडियो में कहा गया कि एक अव्यवस्थित दुनिया के लिए, एक सभ्यता ने हमेशा केवल एक ही शब्द में उत्तर दिया है – शांति (Shanti).

इस विशेष वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस ऐतिहासिक आह्वान को भी शामिल किया गया, जो उन्होंने जून 2023 में अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए किया था कि यह युद्ध का युग नहीं है बल्कि यह संवाद और कूटनीति का युग है। जयशंकर ने कहा कि वैश्विक शासन में बदलाव लाने के लिए सुधार आवश्यक हैं। बहुपक्षवाद को लोकतांत्रिक, प्रतिनिधिमूलक और प्रभावी होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भारत जैसे देशों का मतभेदों को पाटने और आम सहमति बनाने का एक लंबा इतिहास रहा है। ऐसे देश निश्चित रूप से इस दिशा में अपना उचित योगदान दे सकते हैं।

अगले साल जून में होगा मुकाबला, 9वीं बार सीट की तैयारी

यूएनएससी के 2028-29 कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल यानी जून 2027 में आयोजित किए जाएंगे। इस चुनाव में एशिया-पैसिफिक ग्रुप श्रेणी की इकलौती सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा। भारत इससे पहले आठ बार संयुक्त राष्ट्र के इस शक्तिशाली 15-सदस्यीय निकाय में गैर-स्थायी सदस्य के रूप में बैठ चुका है। भारत का पिछला कार्यकाल 2021-22 में था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में इस प्रतिष्ठित टेबल पर रह चुका है।

विदेश मंत्री ने कहा कि भारत अपनी उम्मीदवारी ऐसे समय में पेश कर रहा है जब दुनिया एक गहरे विरोधाभास का सामना कर रही है। एक तरफ दुनिया के पास मानव कल्याण को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की अभूतपूर्व क्षमताएं हैं तो दूसरी तरफ हम संघर्ष, हिंसा और अस्थिरता का ऐसा दौर देख रहे हैं जो दूर बैठे लोगों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। इस जटिलता से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व करना होगा और सुरक्षा परिषद को रास्ता दिखाना होगा इसलिए इस सदस्यता के चुनाव का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

यूएन चीफ एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात

सप्ताहांत में न्यूयॉर्क पहुंचे विदेश मंत्री जयशंकर ने इस कैंपेन लॉन्च के बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से मुलाकात की। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वथनेनी और भारत के यूएन मिशन के अन्य अधिकारी भी मौजूद थे।

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टाटा की TCS 8900 खास इंजीनियरों की टीम बनाएगी, OpenAI और माइक्रोसॉफ्ट को टक्कर देने की तैयारी

देश की सबसे बड़ी आईटी सर्विसेज कंपनी Tata Consultancy Services (TCS) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी में है। टाटा ग्रुप की यह कंपनी AI से जुड़ी नई सर्विसेज को बढ़ाने के लिए 5,900 से 8,900 तक फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स (FDEs) की टीम तैयार करेगी। इसके साथ ही AI से जुड़ी कंपनियों को खरीदने (Acquisition) के विकल्प भी तलाश रही है।

आखिर FDE क्या होते हैं?

फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स (FDEs) ऐसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर होते हैं, जो सिर्फ कंपनी के ऑफिस में बैठकर कोड नहीं लिखते। वे सीधे क्लाइंट के साथ काम करते हैं और उसकी समस्याओं के हिसाब से AI या टेक्नोलॉजी सॉल्यूशन तैयार करते हैं।

अब मान लीजिए किसी बैंक को AI से अपने कस्टमर सर्विस सिस्टम को बेहतर बनाना है। ऐसे में TCS का FDE उस बैंक के साथ मिलकर काम करेगा। वह बैंक के मौजूदा सॉफ्टवेयर, डेटा और बिजनेस प्रोसेस को समझेगा। फिर AI मॉडल को उसी हिसाब से जोड़ेगा और उसे लागू करेगा।

इन इंजीनियरों का काम क्या होगा?

TCS के CEO के. कृतिवासन ने रॉयटर्स से कहा कि कंपनी अपने कुल कर्मचारियों में से 1% से 1.5% को फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर बनाना चाहती है।

ये इंजीनियर सीधे क्लाइंट के साथ काम करेंगे। उनका काम कंपनियों में AI टूल्स को लागू करना, उन्हें मौजूदा सिस्टम से जोड़ना और कारोबार की जरूरत के हिसाब से AI सॉल्यूशन तैयार करना होगा।

OpenAI और Microsoft से मुकाबला

TCS की यह रणनीति ऐसे समय आई है, जब OpenAI, Anthropic और Microsoft जैसी कंपनियां भी फॉरवर्ड-डिप्लॉयड इंजीनियर्स की भर्ती बढ़ा रही हैं। इन इंजीनियरों की मदद से कंपनियां अपने ग्राहकों के यहां AI को तेजी से लागू कर रही हैं।

AI, डेटा सिक्योरिटी में अधिग्रहण की तैयारी

TCS अब AI, डेटा सिक्योरिटी और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े अधिग्रहणों पर भी विचार कर रही है। TCS के CFO समीर सेक्सरिया ने कहा कि कंपनी ऐसे कारोबार तलाश रही है, जो उसकी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत बना सकें।

AI से आउटसोर्सिंग मॉडल को खतरा नहीं

कई निवेशकों को डर है कि AI की वजह से आईटी कंपनियों को मिलने वाले प्रोजेक्ट कम हो सकते हैं। लेकिन TCS के CEO का मानना है कि ऐसा नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि कंपनियों को AI अपनाने के लिए ऐसे पार्टनर की जरूरत होगी, जो उनके मौजूदा सिस्टम, डेटा और प्रक्रियाओं को अच्छी तरह समझते हों। यही TCS की सबसे बड़ी ताकत है। उनके मुताबिक, यह सिर्फ कम लागत का मामला नहीं, बल्कि कंपनी के अनुभव और प्रतिभा का फायदा है।

AI कारोबार की ग्रोथ धीमी हुई

हालांकि, जून तिमाही में TCS के AI कारोबार की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी है। पहली तिमाही में AI से होने वाली सालाना आय की ग्रोथ 13% रही, जबकि पिछली तिमाही में यह 28% थी।

CEO ने कहा कि लंबी अवधि में वह AI कारोबार में करीब 25% तिमाही-दर-तिमाही ग्रोथ देखना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने माना कि यह बढ़ोतरी हर तिमाही एक जैसी नहीं रहेगी।

AI पर ₹8,500 करोड़ खर्च

TCS हर साल करीब 1 अरब डॉलर (लगभग ₹8,500 करोड़) टैलेंट डेवलपमेंट और AI पर खर्च करती है। इसमें कर्मचारियों की ट्रेनिंग, AI स्किल्स डेवलप करना और नई AI तकनीकों के लिए एक्सपर्ट्स की हायरिंग शामिल है।

*रॉयटर्स से इनपुट के साथ

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कर्नाटक के गांव से निकल बिना IIT डिग्री के पृथ्वीराज ने NVIDIA में पाई 2.6 करोड़ की जॉब, जानिए कैसे किया मुमकिन

कर्नाटक के एक इंजीनियर की सफलता की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। चित्रदुर्ग के पास एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के दम पर अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित NVIDIA में करीब 2.6 करोड़ रुपये सालाना के पैकेज वाली नौकरी हासिल की। वहीं उन्होंने ये उपलब्धि IIT डिग्री के बिना हासिल की है। ये कहानी पृथ्वीराज पी की है, जिनका बचपन कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के कटमदेवरकोट गांव में बीता, जहां संसाधन और टेक्नोलॉजी सुविधाएं काफी सीमित थीं।

इसके बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई और मेहनत के दम पर आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। आज उनकी सफलता की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है, जो छोटे शहर या गांव से निकलकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ा मुकाम हासिल करने का सपना देखते हैं।

आईआईटी से नहीं की पढ़ाई

पृथ्वीराज पी ने किसी आईआईटी से नहीं, बल्कि बेंगलुरु की PES यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ नई तकनीक सीखने और अपने प्रैक्टिकल स्किल्स को बेहतर बनाने पर लगातार मेहनत की। इसी लगन और सीखने की इच्छा ने उन्हें आगे बढ़ने और टेक इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाने में मदद की। पृथ्वीराज ने सफलता पाने के लिए किसी बड़े कोचिंग संस्थान या नामी कॉलेज के सहारे पर भरोसा नहीं किया।

उन्होंने ऑनलाइन कोर्स किए, इंटर्नशिप की, अपने खुद के प्रोजेक्ट्स पर काम किया और लगातार प्रैक्टिकल अनुभव हासिल करते रहे। कई वर्षों की मेहनत से उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीप लर्निंग के क्षेत्र में अपनी अच्छी पकड़ बनाई, जिसने उनके करियर को नई दिशा दी।

NVIDIA में करते हैं काम

रिपोर्ट्स के अनुसार, पृथ्वीराज बाद में मास्टर डिग्री करने के लिए अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने एक टियर-3 यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। सीमित आर्थिक संसाधनों और कम मार्गदर्शन के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार अपनी तकनीकी कौशल को बेहतर बनाया और करियर में आगे बढ़ने के लिए मेहनत जारी रखी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगातार मेहनत और सीखने की लगन की बदौलत पृथ्वीराज ने NVIDIA की कठिन चयन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पार की। अब वह कंपनी के अमेरिका स्थित सांता क्लारा मुख्यालय में डीप लर्निंग से जुड़े सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इंजीनियर के रूप में काम कर रहे हैं और उनकी सालाना आय करीब 2.6 करोड़ रुपये बताई जाती है।

उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे लगातार सीखते रहें, धैर्य रखें और अपनी मेहनत पर भरोसा बनाए रखें, क्योंकि समर्पण से बड़े अवसर हासिल किए जा सकते हैं।

एक साल में ₹1 लाख को बना दिया ₹10 लाख! AI या डिफेंस नहीं, कंडोम बनाने वाली इस कंपनी ने किया कमाल

Cupid Share Price Multibagger Return: शेयर बाजार में पिछले एक साल से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिफेंस सेक्टर के शेयरों की धूम है। लेकिन इन सबके बीच मार्केट का सबसे बड़ा वेल्थ क्रिएटर एक ऐसे बिजनेस से निकलकर आया है जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था।

मेल और फीमेल कंडोम, ल्यूब्रिकेंट्स और डायग्नोस्टिक उत्पाद बनाने वाली स्मॉलकैप कंपनी क्यूपिड लिमिटेड (Cupid Ltd) के शेयरों ने पिछले एक साल में निवेशकों को छप्परफाड़ रिटर्न देकर निवेशकों को मालामाल कर दिया है। पिछले एक साल में इस शेयर ने 866% से ज्यादा की तूफानी तेजी दिखाई है। आइए जानते हैं कि कैसे इस स्मॉलकैप शेयर ने बाजार में गदर मचाया है और इसके पीछे की वजह क्या है।

1 साल का जादुई रिटर्न: ₹1 लाख बन गए ₹9.7 लाख

क्यूपिड लिमिटेड के शेयरों की रफ्तार पिछले कुछ महीनों से लगातार तेज है:

1 साल का रिटर्न: एक साल पहले जिन निवेशकों ने इस शेयर में ₹1 लाख लगाए थे, उनकी वैल्यू आज बढ़कर करीब ₹9.7 लाख हो चुकी है।

शॉर्ट टर्म का रिटर्न: पिछले 6 महीने में यह शेयर 145%, पिछले 3 महीने में 128% और महज पिछले एक महीने में 40% से ज्यादा चढ़ चुका है।

मार्केट कैप: 10 जुलाई को क्यूपिड के शेयर ₹212.24 पर बंद हुए, जिससे कंपनी का कुल मार्केट कैप बढ़कर करीब ₹28,500 करोड़ पर पहुंच गया है।

क्यों भाग रहा है शेयर? मुनाफे में आया बंपर उछाल

बाजार में कई स्मॉलकैप शेयर बिना किसी ठोस वजह के सिर्फ हवा में भागते हैं, लेकिन क्यूपिड के साथ ऐसा नहीं है। इस शेयर की तेजी को कंपनी के मजबूत वित्तीय नतीजों का पूरा सपोर्ट मिला है:

सालाना प्रदर्शन (FY26): वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का रेवेन्यू दोगुने से अधिक बढ़कर ₹391 करोड़ हो गया, जो इससे पिछले साल ₹183 करोड़ था।

नेट प्रॉफिट में उछाल: कंपनी का शुद्ध मुनाफा ₹41 करोड़ से बढ़कर सीधे ₹108 करोड़ पर पहुंच गया। वहीं, ऑपरेटिंग मार्जिन भी सुधरकर 38% हो गया।

मार्च तिमाही के नतीजे: मार्च तिमाही में सालाना आधार पर रेवेन्यू 116% बढ़कर ₹132 करोड़ और नेट प्रॉफिट 214% बढ़कर ₹36 करोड़ से ज्यादा रहा, जो कंपनी के इतिहास की सबसे बेहतरीन तिमाहियों में से एक है।

मैनेजमेंट का भरोसा: रेवेन्यू गाइडेंस में बड़ी बढ़ोतरी

जून तिमाही के लिए कंपनी द्वारा जारी किए गए मजबूत बिजनेस अपडेट ने इस शेयर में रॉकेट जैसी तेजी ला दी है:

Q1 FY27 का अनुमान: मैनेजमेंट को उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1 FY27) में रेवेन्यू ₹150 करोड़ के पार निकल जाएगा।

पूरे साल का टारगेट बढ़ाया: कंपनी ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने रेवेन्यू गाइडेंस को ₹600 करोड़ से बढ़ाकर ₹660 करोड़ से अधिक कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती मांग, घरेलू प्राइवेट सेक्टर की डिमांड, सरकारी खरीद और PFSCM के साथ हुई रणनीतिक साझेदारी के दम पर कंपनी को आने वाले दिनों में बड़ी ग्रोथ की उम्मीद है।

सिर्फ कंडोम नहीं, डायग्नोस्टिक्स में भी जलवा

क्यूपिड को भले ही लोग कंडोम बनाने वाली कंपनी के रूप में जानते हैं, लेकिन अब इसका दायरा काफी बड़ा हो चुका है। कंपनी कंडोम और वाटर-बेस्ड ल्यूब्रिकेंट्स के अलावा पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और इन विट्रो डायग्नोस्टिक्स (IVD) किट्स भी बनाती है।

क्यूपिड दुनिया की पहली ऐसी कंपनी है जिसे पुरुष और महिला दोनों कंडोम की सप्लाई के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) से प्री-क्वालिफिकेशन मिला हुआ है। इसी वजह से यह कंपनी वैश्विक स्तर पर बड़े-बड़े हेल्थकेयर टेंडर्स में आसानी से हिस्सा ले पाती है।

रिटेल निवेशकों की भीड़, लेकिन वैल्यूएशन बहुत महंगा

कंपनी के शानदार प्रदर्शन को देखकर रिटेल निवेशक इस शेयर पर टूट पड़े हैं। मार्च 2026 तक कंपनी के शेयरधारकों की संख्या बढ़कर 2.09 लाख के पार पहुंच गई है, जो तीन साल पहले महज 26,000 थी। कंपनी में प्रमोटर्स की हिस्सेदारी करीब 46% है।

एक्सपर्ट नोट- दे रही छप्परफाड़ रिटर्न लेकिन सावधानी है जरूरी

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, क्यूपिड कंपनी के फंडामेंटल्स बेहद मजबूत हैं, लेकिन इस भारी तेजी के कारण शेयर का वैल्यूएशन काफी महंगा हो गया है। क्यूपिड का शेयर फिलहाल अपनी कमाई के मुकाबले 264 के पीई मल्टीपल और बुक वैल्यू के 63 गुना से अधिक पर ट्रेड कर रहा है, जो एफएमसीजी सेक्टर की अन्य कंपनियों से काफी ज्यादा है। इसका मतलब है कि निवेशकों ने भविष्य की बड़ी ग्रोथ को पहले से ही इस कीमत में शामिल कर लिया है, इसलिए नए निवेशकों को सावधानी बरतनी चाहिए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

एक महीने में भेजे 500 रिज्यूमे, नहीं आया एक भी कॉल, फ्रेशर्स की मुश्किलें आईं सामने

भारत में इंजीनियरिंग करने के बाद अच्छी नौकरी पाना आज कई युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी परेशानी को दिखाती है बेंगलुरु के एक बीटेक ग्रेजुएट की कहानी, जिसने नौकरी की तलाश में एक महीने के भीतर 500 से ज्यादा आवेदन भेजे, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उसे एक भी इंटरव्यू कॉल नहीं मिला। इस युवा इंजीनियर ने लिंक्डइन, अलग-अलग जॉब पोर्टल और कंपनियों की करियर वेबसाइटों पर लगातार प्रयास किया, लेकिन हर जगह से निराशा हाथ लगी।

उसका कहना है कि वो किसी बड़ी सैलरी या नामी कंपनी की तलाश में नहीं है, बल्कि सिर्फ एक ऐसा मौका चाहता है जहां वह काम सीख सके और अपने करियर की शुरुआत कर सके। उसकी पोस्ट ने सोशल मीडिया पर हजारों फ्रेशर्स की परेशानियों को उजागर कर दिया है।

‘बड़ी सैलरी नहीं, बस शुरुआत का एक मौका चाहिए’

युवा इंजीनियर ने कहा कि उसका लक्ष्य किसी बड़ी कंपनी में भारी पैकेज हासिल करना नहीं है। वह सिर्फ ऐसा अवसर चाहता है जहां वह काम सीख सके, इंडस्ट्री का अनुभव हासिल कर सके और अपने करियर की मजबूत शुरुआत कर सके।

उसने लिखा कि वह किसी भी अच्छे टेक रोल, यहां तक कि शुरुआती दौर के स्टार्टअप में भी काम करने के लिए तैयार है, जहां उसे सीखने और योगदान देने का मौका मिले।

जब ऑनलाइन आवेदन भी बेअसर हुए तो रेडिट से मांगी मदद

लगातार कोशिशों के बाद जब कोई रास्ता नजर नहीं आया, तो इंजीनियर ने रेडिट पर अपनी परेशानी साझा की। उसने नौकरी देने वालों, स्टार्टअप फाउंडर्स और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से मदद की अपील की।

उसकी पोस्ट का शीर्षक था  “एक महीने में 500+ नौकरियों के लिए आवेदन किया, लेकिन एक भी इंटरव्यू नहीं मिला।”

पोस्ट वायरल होते ही कई फ्रेशर्स ने अपनी-अपनी परेशानियां साझा करनी शुरू कर दीं।

फ्रेशर्स की सबसे बड़ी चुनौती

कई यूजर्स ने कहा कि आज के समय में सिर्फ ऑनलाइन आवेदन करना काफी नहीं रह गया है। एक यूजर ने सलाह दी कि उम्मीदवारों को सीधे कंपनी के फाउंडर्स, एचआर या कर्मचारियों से संपर्क करने की कोशिश करनी चाहिए।

हालांकि, कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने भी ऐसा करके देखा, लेकिन 100 से ज्यादा एचआर को मैसेज करने के बाद भी उन्हें इंटरव्यू का मौका नहीं मिला।

‘स्किल्स हैं, फिर भी दरवाजे बंद हैं’

एक कमेंट में एक टेक उम्मीदवार ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि उसके पास इंटर्नशिप अनुभव और कई आधुनिक टेक्नोलॉजी की जानकारी होने के बावजूद नौकरी पाना मुश्किल हो रहा है। उसने बताया कि वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एजेंट ऑर्केस्ट्रेशन, ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर, लैंगचेन और लैंगग्राफ जैसी तकनीकों पर काम कर चुका है, फिर भी कंपनियों तक पहुंच बनाना चुनौती बनी हुई है।

सोशल मीडिया पर बंटी राय

इस पोस्ट के बाद इंटरनेट पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने कहा कि मौजूदा जॉब मार्केट में फ्रेशर्स के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद बढ़ गई है, जबकि कुछ ने उम्मीदवारों को नेटवर्किंग और सीधे संपर्क जैसे तरीकों पर ध्यान देने की सलाह दी।

वहीं कुछ लोगों ने उम्मीद भी दिखाई। एक यूजर ने बताया कि उसे एक जॉब प्लेटफॉर्म के जरिए इंटरव्यू मिला और पूरी प्रक्रिया में करीब एक महीना लगा।

नौकरी बाजार की नई हकीकत

इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ डिग्री और तकनीकी ज्ञान आज के जॉब मार्केट में पर्याप्त हैं? बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नौकरी की तलाश में हैं, लेकिन कंपनियां अनुभव, प्रोजेक्ट्स और नेटवर्किंग को भी तेजी से महत्व दे रही हैं।

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CBSE Free online Courses 2026: 8वीं और 12वीं के छात्रों को सीबीएसई ने दिया फ्री कोर्स का तोहफा, ऑनलाइन सीख सकेंगे एआई और पाइथन

CBSE Free online Courses 2026: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 8वीं से 12वीं कक्षा तक के छात्रों के लिए डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में नई पहल की गई है। बोर्ड ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (NIELIT) के साथ मिलकर 19 फ्री ऑनलाइन कोर्स शुरू किए हैं।

इन कोर्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), पायथन प्रोग्रामिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, जेनरेटिव AI, AWS DevSecOps, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग और VLSI डिजाइन जैसे हाई-डिमांड सब्जेक्ट्स की एक बड़ी रेंज शामिल है। कई कार्यक्रम इंग्लिश और हिंदी दोनों में उपलब्ध हैं, जिससे पढ़ाई की सामग्री ज्यादा छात्रों तक आसानी से पहुंच पाते हैं। बोर्ड के अनुसार, कोर्स का समय अलग-अलग होगा। कुछ शुरुआती मॉड्यूल लगभग 90 मिनट में पूरे किए जा सकते हैं, जबकि एडवांस्ड प्रोग्राम 100 घंटे से ज्यादा लंबे होते हैं, जिससे छात्र अपनी पसंद, सीखने के लक्ष्यों और उपलब्ध समय के आधार पर कोर्स चुन सकते हैं।

यह पहल छात्रों को बिना किसी खर्च के एडवांस्ड टेक्नोलॉजी कोर्स कराएगी, जिससे वे किसी भी जगह से अपनी स्पीड से ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं। सीबीएसई ने अपने सभी संबद्ध स्कूलों को भी इस कार्यक्रम और ज्यादा से ज्यादा छात्रों की भागीदारी को बढ़ावा देने का निर्देश दिया है। छात्र बिना किसी रजिस्ट्रेशन या कोर्स फीस के सीधे एनआईईएलआईटी डिजिटल यूनिवर्सिटी पोर्टल के जरिए इन पाठ्यक्रमों के लिए रजिस्टर कर सकते हैं। लचीले ऑनलाइन फॉर्मेट की मदद से छात्र अपने स्कूल की नियमित पढ़ाई के साथ-साथ कोर्स भी पूरा कर सकते हैं।

बोर्ड की यह पहल उसके डिजिटल लिटरेसी, कोडिंग और नई टेक्नोलॉजी को स्कूली शिक्षा में शामिल करने पर बढ़ते फोकस को दिखाती है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इंडस्ट्री से जुड़ी टेक्नोलॉजी से जल्दी परिचित होने से छात्रों को प्रैक्टिकल प्रॉब्लम-सॉल्विंग एबिलिटी, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग और इनोवेशन स्किल डेवलप करने में मदद मिल सकती है, साथ ही हायर एजुकेशन और इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, डेटा एनालिटिक्स और दूसरे डिजिटल डोमेन में करियर के लिए उनकी तैयारी भी मजबूत हो सकती है।

इन फ्री ऑनलाइन कोर्स को शुरू करके, सीबीएसई ने स्कूली शिक्षा को डिजिटल इकॉनमी और भारत के बढ़ते टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम की स्किल जरूरतों के साथ जोड़ने की दिशा में एक और कदम उठाया है।

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‘AI से TCS में नौकरियां नहीं जाएंगी’, CEO बोले- बस बदल जाएगा काम का तरीका

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर के कृतिवासन का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से कंपनी में कर्मचारियों की संख्या कम नहीं होगी। उन्होंने कहा कि TCS आगे भी भर्ती जारी रखेगी। हालांकि, कर्मचारियों को नए AI स्किल्स सीखने होंगे।

यह बयान इंजीनियरिंग छात्रों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए राहत की खबर माना जा रहा है। इससे पहले TCS के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने संकेत दिए थे कि कंपनी भर्ती को लेकर पहले से ज्यादा चयनात्मक होगी।

AI खत्म नहीं करेगा नौकरियां

Q1 FY27 के नतीजों के बाद हुई कॉन्फ्रेंस कॉल में कृतिवासन ने कहा कि AI की वजह से कर्मचारियों का काम जरूर बदलेगा, लेकिन नौकरियां खत्म नहीं होंगी।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और कोडिंग के साथ अब प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, AI मॉडल की ट्रेनिंग, मॉडल टेस्टिंग और लाइफ-साइकिल मैनेजमेंट जैसे नए रोल तेजी से बढ़ेंगे। इन क्षेत्रों में नए मौके बनेंगे।

उन्होंने कहा कि कंपनी जरूरत के मुताबिक लगातार टैलेंट हायर करेगी। उनका मानना है कि AI से व्हाइट-कॉलर नौकरियों में बहुत बड़ी कटौती नहीं होगी।

भर्ती में दिखी तेजी

कृतिवासन का बयान ऐसे समय आया है, जब TCS ने जून तिमाही में चार साल की सबसे बड़ी भर्ती की है। कंपनी ने अप्रैल-जून तिमाही में 9,279 कर्मचारियों की नेट हायरिंग की। इसके बाद कुल कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 5,93,798 हो गई।

कंपनी ने इस तिमाही में देश के प्रमुख संस्थानों से 14,000 फ्रेशर्स को भी शामिल किया।

तिमाही नतीजे कैसे रहे?

TCS का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट पहली तिमाही में 2.7% घटकर 13,349 करोड़ रुपये रहा। यह बाजार के अनुमान से थोड़ा कम था। कंपनी ने बताया कि एक कानूनी मामले के 668 करोड़ रुपये के एकमुश्त सेटलमेंट का असर मुनाफे पर पड़ा।

हालांकि, कंपनी का रेवेन्यू 72,275 करोड़ रुपये रहा, जो बाजार के अनुमान से बेहतर था। एकमुश्त खर्चों को छोड़ दें तो कंपनी का नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 8.5% बढ़कर 13,849 करोड़ रुपये रहा। वहीं, रेवेन्यू में सालाना आधार पर 13.9% और तिमाही आधार पर 2.2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।