पाकिस्तान में जेल में बंद पूर्व PM इमरान खान भी पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह देश छोड़ सकते हैं। विपक्षी नेता महमूद खान अचकजई ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यहा दावा किया। अचकचई ने कहा कि सरकार इमरान पर समझौते के लिए दबाव बना रही है। वे नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो की तरह देश छोड़कर जा सकते हैं। अचकचई पख्तूनख्वा मिल्ली अवामी पार्टी (PKMP) के अध्यक्ष और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता हैं। नवाज-बेनजीर ने क्यों छोड़ा था पाकिस्तान? अचकजई ने अपने दावे के समर्थन में पाकिस्तान के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के पुराने मामलों का हवाला दिया। नवाज शरीफ: 1999 में तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने सैन्य तख्तापलट कर नवाज सरकार को हटा दिया था। नवाज को जेल में डाल दिया गया। इसके बाद 2000 में सऊदी अरब और लेबनान के नेताओं की मध्यस्थता से हुए समझौते के तहत वे पाकिस्तान छोड़कर चले गए। समझौते की शर्तों के मुताबिक, नवाज को 10 साल तक पाकिस्तान से बाहर रहना था और राजनीति से दूर रहना था। बेनजीर भुट्टो: 1997 में तत्कालीन राष्ट्रपति फारूक लेघारी ने बेनजीर को भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था। इसके बाद 1997 के आम चुनाव में उन्हें हार मिली। इसके बाद बेनजीर भुट्टो ने देश छोड़ दिया। वह 9 साल तक ब्रिटेन और दुबई में रहीं। अगस्त 2023 से जेल में हैं इमरान 73 साल के इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में हैं। उन्हें सबसे पहले तोशाखाना मामले में 3 साल की सजा मिलने के बाद गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन पर सिफर, अल-कादिर ट्रस्ट और इद्दत निकाह समेत कई मामले दर्ज हुए। बाद में सिफर और इद्दत निकाह मामलों में उन्हें अदालत से राहत मिल गई। तोशाखाना मामले में भी उनकी एक सजा रोक दी गई। इसके बावजूद दूसरे मामलों के चलते वह अभी जेल में हैं। इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई का कहना है कि 2022 में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद उनके खिलाफ मामले राजनीतिक वजहों से दर्ज किए गए। उनका आरोप है कि उन्हें राजनीति और चुनाव से दूर रखने के लिए ऐसा किया गया। वहीं, पाकिस्तान सरकार और जांच एजेंसियां इन आरोपों को खारिज करती हैं और कहती हैं कि ये मामले कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहे हैं। तोशाखाना क्या है और इमरान खान का मामला क्या है? तोशाखाना पाकिस्तान सरकार का सरकारी भंडार है। यहां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री और दूसरे सरकारी अधिकारियों को विदेशों से मिले कीमती तोहफे जमा किए जाते हैं। इनमें घड़ियां, गहने, पेंटिंग जैसी चीजें शामिल होती हैं। इमरान खान से जुड़े विवाद इमरान खान 2018 से 2022 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्हें कई महंगे विदेशी तोहफे मिले। आरोप है कि कुछ तोहफों की जानकारी और उनकी बिक्री से मिली रकम की पूरी जानकारी नहीं दी गई। इससे जुड़े तीन मामले… 1. तोहफों की जानकारी छिपाने का आरोप 2022 में पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने इमरान को तोहफों की जानकारी गलत तरीके से घोषित करने का दोषी माना और उन्हें अयोग्य ठहराया। 2. तोशाखाना का पहला मामला इमरान पर आरोप था कि उन्होंने कुछ महंगे तोहफे तय कीमत देकर अपने पास रखे और बाद में बेच दिए। अगस्त 2023 में उन्हें 3 साल की सजा सुनाई गई। बाद में सजा निलंबित हो गई। 3. तोशाखाना-2 मामला इसमें 2021 में सऊदी क्राउन प्रिंस से मिले बुल्गारी ज्वेलरी सेट का मामला है। अभियोजन के मुताबिक इसकी कीमत करीब 8 करोड़ पाकिस्तानी रुपए थी, जबकि इसे करीब 29 लाख रुपए में रखने का आरोप है। इमरान खान के प्रमुख केस की वर्तमान स्थिति 1. तोशाखाना केस 2023 में इमरान खान को तोशाखाना मामले में 3 साल की सजा हुई थी। बाद में यह सजा निलंबित हुई। हालांकि, बाद में तोशाखाना से जुड़े एक अन्य मामले में दिसंबर 2025 में इमरान खान और बुशरा बीबी को 17-17 साल की सजा सुनाई गई। यह सजा महंगे सरकारी तोहफों की कथित कम कीमत पर खरीद से जुड़े मामले में है। 2. साइफर केस इमरान खान को साइफर/स्टेट सीक्रेट्स केस में मिली 10 साल की सजा हाईकोर्ट ने पलट दी थी। जून 2024 में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया। 3. इद्दत निकाह केस फरवरी 2024 में इमरान खान और बुशरा बीबी को 7-7 साल की सजा मिली थी। जुलाई 2024 में दोनों को इस मामले में बरी कर दिया गया। 4. अल-कादिर ट्रस्ट/£190 मिलियन केस यह मामला इमरान खान के प्रधानमंत्री रहते हुए ब्रिटेन से पाकिस्तान लौटाए गए करीब £190 मिलियन और उससे जुड़े कथित भ्रष्टाचार से संबंधित है।17 जनवरी 2025 को इमरान खान को 14 साल और बुशरा बीबी को 7 साल की सजा सुनाई गई। मई 2026 में इस सजा को निलंबित करने की उनकी याचिका इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। उनकी मुख्य अपील पर सुनवाई जारी है।
कच्चे तेल की कीमत में फिर से तगड़ा उछाल है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत मई के बाद पहली बार 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई। इसकी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव है, जिससे कच्चे तेल की आपूर्ति में जल्द राहत मिलने की उम्मीदें कम हो रही हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 3.94 डॉलर (3.7 प्रतिशत) बढ़कर 109.86 डॉलर पर बंद हुआ, जो 19 मई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड फ्यूचर्स 3.44 डॉलर (3.5 प्रतिशत) बढ़कर 101.41 डॉलर पर बंद हुआ, जो 17 सितंबर के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।
इस सप्ताह अब तक ब्रेंट क्रूड की कीमत 4.9 प्रतिशत और WTI की कीमत 10.4 प्रतिशत चढ़ी है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी अरब पर लगातार मिसाइल और ड्रोन से हमले कर रहे हैं। वहीं रूस और यूक्रेन एक-दूसरे के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर निशाना बना रहे हैं।
इस साल 70 प्रतिशत चढ़ा कच्चा तेल
इस साल कच्चे तेल की कीमतों में 70 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी आई है, क्योंकि मध्य पूर्व और रूस में चल रहे युद्धों के कारण आपूर्ति बाधित हुई है। फिजिकल बाजारों में भी तंगी के संकेत मिल रहे हैं; डीजल जैसे रिफाइंड उत्पादों की कीमतों में और भी तेज उछाल आया है। यूरोप में इस कमोडिटी के लिए फ्यूचर्स की कीमतें इस साल दोगुनी से भी ज्यादा हो गई हैं।
Windfall Tax: सरकार ने पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाया, डीजल पर ड्यूटी और घटी
रूस से डीजल रिलीज के समझौते पर रोक की कोशिश
शुक्रवार को अमेरिकी सांसदों ने एक बिल पेश किया, जिसका मकसद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के बीच हुए उस समझौते को रोकना है, जिसके तहत रूस से कई सौ मिलियन बैरल डीजल रिलीज किया जाना था। समझौते पर रोक का कदम ऐसे किसी भी उपाय के खिलाफ व्यापक विरोध को दर्शाता है, जिससे रूस को अपने युद्ध कोष (War Chest) को मजबूत करने का मौका मिल सके।
अगर वैश्विक बाजारों से रूसी डीजल बाहर रहता है, तो अन्य जगहों की रिफाइनरियों को मांग पूरी करने के लिए ऑयल प्रोसेसिंग बढ़ानी पड़ेगी। हालांकि, ट्रंप ने फिर दोहराया है कि रूस डीजल जारी करने के समझौते पर अमल करेगा। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्लैक सी के आसपास लगातार तनाव बना हुआ है। रूस की रियाजान तेल रिफाइनरी पर हाल ही में हमला हुआ है। इसके कारण वहां कामकाज रोकना पड़ा। इस हमले ने डीजल रिलीज के समझौते के पूरा होने को लेकर संदेह और बढ़ा दिया है।
सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा पर दशकों से अरबों डॉलर खर्च किए हैं। उसके पास आधुनिक फाइटर जेट हैं। मिसाइलों को हवा में नष्ट करने वाले महंगे सिस्टम भी हैं। सैन्य खर्च के मामले में वह दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। हूतियों के पास सऊदी अरब जैसी बड़ी सेना और आधुनिक हथियार नहीं हैं। लेकिन उन्होंने सस्ते ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों को अपनी ताकत बना लिया है। इन हथियारों का पता लगाना और उन्हें हवा में ही नष्ट करना मुश्किल होता है। सऊदी अरब के लिए हूतियों के सस्ते ड्रोन रोकना महंगा सौदा साबित हो रहा है। करीब 15 लाख रुपए के एक ड्रोन को नष्ट करने के लिए 25 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं। हूती विद्रोही इसका फायदा उठाकर सऊदी अरब की महंगी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब के पास इतने आधुनिक हथियार होने के बावजूद हूती उसके अहम ठिकानों तक पहुंच कैसे जा रहे हैं? महंगे हथियारों के सामने सस्ते ड्रोन की चुनौती सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों से आधुनिक और महंगे हथियार खरीदता रहा है। इनमें अत्याधुनिक फाइटर जेट, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। लेकिन हूतियों के हमले के आगे ये सब बेअसर हैं। वे कम कीमत वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। ये हथियार कई बार जमीन के काफी करीब उड़ते हैं। ऐसे में रडार के लिए उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। सऊदी अरब को इन हमलों को रोकने के लिए कई बार बेहद महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 30 करोड़ होती है। इसके मुकाबले एक ड्रोन की कीमत महज 15 लाख होती है। इसका नुकसान सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है। महंगी मिसाइलों का भंडार भी सीमित होता है। यूक्रेन और ईरान जंग से इंटरसेप्टर मिसाइल की मांग बढ़ी यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों के कारण दुनियाभर में मिसाइल इंटरसेप्टर की मांग बढ़ी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक इसी तरह हमलों को रोकते रहना मुश्किल हो सकता है। हूतियों की ताकत भी पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने अपने हथियारों के भंडार को बढ़ाया है। अब वे कुछ हथियार खुद भी बनाने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र भी किया गया है कि अब हूती ईरान के भरोसे नहीं रहे। सऊदी की सुरक्षा का फोकस गलत दिशा में रहा सऊदी अरब की एक बड़ी कमजोरी उसका रडार सिस्टम है। देश ने अपनी सुरक्षा के लिए पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दिया। इन दिशाओं से ईरान और इराक की तरफ से खतरा माना जाता रहा है। लेकिन यमन दक्षिण-पश्चिम में है। इस तरफ से होने वाले हमलों को पकड़ने और रोकने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। हवाई हमलों को रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल का समय रहते पता चल जाए। अगर हमले का पता देर से चलता है, तो जवाबी कार्रवाई के लिए कम समय बचता है। ऐसे में महंगी और आधुनिक मिसाइलें होने के बावजूद हमले को रोकना मुश्किल हो जाता है। सेना की बनावट भी बन रही है परेशानी सऊदी अरब की मुश्किल सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। उसकी सेना का ढांचा और काम करने का तरीका भी चुनौती पैदा करते हैं। सऊदी अरब की नियमित सेना में करीब 2.5 लाख सैनिक हैं। वहीं, नेशनल गार्ड में करीब 1.25 लाख सैनिक हैं। नेशनल गार्ड सेना से अलग है। इसमें ऐसे कबीलों के लोगों की भर्ती की जाती रही है, जिन्हें सऊदी राजपरिवार का वफादार माना जाता है। सेना में सुधार के लिए मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया। रियाद में संयुक्त सैन्य कमान बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए, ताकि सेना की अलग-अलग इकाइयों के बीच तालमेल बेहतर हो सके। हालांकि, सेना की कार्यशैली बदलना आसान नहीं है। आधुनिक हथियारों के साथ उन्हें चलाने का प्रशिक्षण, तेजी से फैसले लेने की क्षमता और बेहतर तालमेल भी जरूरी है। 2015 में यमन युद्ध शुरू किया, लेकिन जीत आसान नहीं रही सऊदी अरब की मौजूदा परेशानी को समझने के लिए यमन युद्ध का इतिहास देखना जरूरी है। 2015 में मोहम्मद बिन सलमान ने रक्षा मंत्री के रूप में यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था। उस समय उम्मीद थी कि हूतियों को कुछ ही हफ्तों में कमजोर कर दिया जाएगा। लेकिन युद्ध लंबा खिंचता गया।हूतियों ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने सऊदी अरब पर भी बार-बार हमले किए। इस युद्ध में सऊदी अरब को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धक्का लगा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ। इससे लड़ाई कुछ समय के लिए थमी, लेकिन संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। अब अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बीच क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ गया है। हूती भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सऊदी अरब के सामने अब समस्या यह है कि वह केवल हवाई हमलों के जरिए हूतियों को हरा पाएगा या नहीं, इस पर गंभीर संदेह है। यमन में हूतियों के विरोधी गुट भी बंटे हुए हैं। उनके बीच एकजुटता की कमी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए जमीन पर किसी मजबूत सहयोगी के सहारे हूतियों को पीछे धकेलना भी आसान नहीं है। ईरान को कैसे मिल रहा है फायदा? हूती ईरान के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाते हैं। वे सऊदी अरब और अमेरिका के लिए संघर्ष की लागत बढ़ा सकते हैं। इससे ईरान को क्षेत्र में दबाव बनाने का मौका मिलता है। अमेरिका ने 2025 में हूतियों के खिलाफ करीब चार महीने तक सैन्य अभियान चलाया था। इसके बावजूद वह उन्हें पूरी तरह झुका नहीं सका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी दोबारा बड़े सैन्य अभियान में उतरने को लेकर हिचक दिखा चुके हैं। अगर हूती अपनी शर्तों पर समझौता कराने में सफल होते हैं या सऊदी अरब को पीछे हटने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह ईरान और उसके सहयोगी गुटों के लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि होगी। यमन मामलों की विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी के मुताबिक, हूती अपनी समस्याओं का हल बातचीत के बजाय युद्ध के जरिए निकालने की कोशिश करते हैं। वहीं, सऊदी अरब को लगता था कि ज्यादा पैसा खर्च करके और आधुनिक हथियार खरीदकर वह अपने दुश्मनों को काबू में कर सकता है। लेकिन हूतियों के लगातार हमलों ने दिखा दिया कि सिर्फ पैसा और हथियार होने से दुश्मन को हराना आसान नहीं है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। सूचना मंत्रालय के मुताबिक, हमले में 4 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 2 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। हूती विद्रोहियों ने कहा कि उन्होंने अदन में सऊदी अरब के सैन्य अभियान मुख्यालय पर हमला किया। हूती मीडिया ने हथियारों के भंडार को निशाना बनाने का दावा भी किया। हालांकि, इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। अदन यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की अंतरिम राजधानी है। देश में सरकार और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संघर्ष जारी है। सऊदी अरब के समर्थन से लड़ रही यमन की सरकार यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है और हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सरकारी सेनाओं को हवाई मदद देता है। वहीं, ईरान पर हूती विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रपति भवन परिसर पर हमले से यमन में संघर्ष और बढ़ने की आशंका है। हूतियों ने कहा है कि उनका निशाना सऊदी सैन्य अभियान से जुड़े ठिकाने थे। रिपोर्ट- चीन की मदद से मिसाइल बना रहे हूती विद्रोही यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई ———————- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। हथियार बनाने के लिए जरूरी सामान जुटा रहे हूती रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के अधिकारियों ने जुलाई में चीन से भेजे गए दो संदिग्ध सामानों की खेप पकड़ी थी। इनमें मिसाइल बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पुर्जे मिले। पकड़ी गई खेप चीन से भेजी गई थी। इसे यमन के होदेइदा बंदरगाह पहुंचाया जाना था। इजराइली अधिकारियों का कहना है कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईरान हथियारों की सप्लाई के लिए करता रहा है। पकड़ी गई खेप में क्या-क्या मिला? रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था के वरिष्ठ विश्लेषक फैबियन हिंज के मुताबिक, हूती ईरान में डिजाइन की गई खास तरह की मिसाइल बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन पुर्जों का इस्तेमाल आम नागरिक कामों में करना मुश्किल है। हूतियों की हथियार बनाने की क्षमता पहले से ज्यादा हूती करीब दो दशक पहले यमन में एक विद्रोही संगठन के तौर पर उभरे थे। शुरुआत में उनके पास यमन की सेना से हासिल सोवियत दौर के और उत्तर कोरिया में बने हथियार थे। समय के साथ उन्हें ज्यादा आधुनिक हथियार और तकनीक मिलने लगी। ईरान पर निर्भरता घटाने की कोशिश क्यों? ईरान लंबे समय से हूतियों को हथियार बनाने की तकनीक, डिजाइन और जरूरी पुर्जे देता रहा है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, अब हूती चीन समेत दूसरे देशों से भी हथियार बनाने का सामान जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के ईरान कार्यक्रम के वरिष्ठ निदेशक बेहनाम बेन तालेब्लू ने कहा कि हथियार बनाने के लिए कई जगहों से सामान मिलना किसी संगठन के लिए फायदेमंद होता है। उनके मुताबिक, ईरान पर रोक के बीच हूती सामान जुटाने के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हूती अभी मिसाइल के लिए जरूरी जटिल सिस्टम के लिए ईरान पर निर्भर हैं। वे दूसरे देशों से मिले पुर्जों को जोड़कर कुछ हथियार बना सकते हैं, लेकिन आधुनिक हथियारों की पूरी तकनीक खुद विकसित नहीं कर सकते। चीन के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है चीन ईरान और सऊदी अरब, दोनों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। 2023 में चीन ने दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने में भी भूमिका निभाई थी। चीन ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हूतियों के हमलों की निंदा की है और संघर्ष कम करने की अपील की है। अब अगर चीन से आए पुर्जों का इस्तेमाल हूती मिसाइल बनाने में होने के दावे की पुष्टि होती है, तो सऊदी अरब और चीन के रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है। चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञ क्रिस्टियन उलरिचसन के मुताबिक, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे और एयरपोर्ट पर हमलों के बाद चीन पर इस मुद्दे को लेकर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। फिलहाल यह साफ नहीं होता कि चीन की सरकार ने जानबूझकर हूतियों को मिसाइल बनाने के लिए सामान भेजा था। ————————- यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज में बारूदी सुरंग से टकराकर जहाज डूबा: जंग शुरू होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराकर बुधवार सुबह एक मालवाहक जहाज डूब गया। जहाज में 2500 कंटेनर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने यह जानकारी दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने इजराइल पर हमला किया, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा। नेतन्याहू ने कहा कि अगर ईरान इजराइल पर मिसाइलें दागता है, तो उनके विरोधी इसके लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराएंगे। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू चुनाव से पहले ईरान के साथ लड़ाई शुरू कर सकते हैं। जून के बाद से ईरान और इजराइल के बीच सीधा हमला नहीं अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों पर हमले किए। जून के बाद से दोनों देशों के बीच सीधे हमले नहीं हुए हैं। नेतन्याहू ने कहा कि मिडिल-ईस्ट के कई देश इजराइल की सैन्य कामयाबी के बाद उससे संपर्क कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि क्या इजराइल सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों से बचाने में मदद कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में सऊदी अरब पर हूतियों के हमले बढ़े हैं। शनिवार, 10 अक्टूबर को रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमले में 13 लोगों की मौत हुई थी। 7 अक्टूबर के हमले के बाद भी सत्ता में लौट सकते हैं नेतन्याहू टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावना बनी हुई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। इसे इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी नाकामी माना गया था। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली और सुरक्षा में चूक के लिए सेना व अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। हमले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की मांग भी उठी, लेकिन इस पर विवाद बना रहा। इसके बावजूद विपक्ष नेतन्याहू को कड़ी चुनौती नहीं दे पा रहा है। कुछ सर्वे में विपक्ष आगे है, तो कुछ में नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। विपक्ष में एकजुटता की कमी का फायदा मिल सकता है टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, विपक्षी नेताओं के बीच मतभेद नेतन्याहू के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन जैसे नेता उन्हें चुनौती दे रहे हैं, लेकिन विपक्ष अब तक एकजुट होकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाया है। दूसरी ओर, नेतन्याहू टीवी कार्यक्रमों, सोशल मीडिया और जनसभाओं के जरिए अपने समर्थकों को जोड़ने में जुटे हैं। वह यह भी कोशिश कर रहे हैं कि दक्षिणपंथी पार्टियों के वोट आपस में न बंटें। छोटी पार्टियों के वोट तय करेंगे चुनाव का नतीजा इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। किसी पार्टी को संसद में सीटें पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट हासिल करना जरूरी है। ऐसे में छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी अहम होगा। अगर कोई पार्टी जरूरी वोट नहीं जुटा पाती, तो उसे संसद में एक भी सीट नहीं मिलेगी। इससे दूसरी पार्टियों के लिए सरकार बनाने का रास्ता आसान हो सकता है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल जाने वाली उड़ानों में अब पाकिस्तान समेत 31 देशों के पायलटों और केबिन क्रू की तैनाती पर रोक लगाई जा रही है। ये नियम उन देशों के पायलटों और क्रू पर लागू होते हैं, जिनके देश के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इनमें पाकिस्तान के अलावा ईरान, ओमान, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट हमाम अल-हमामी ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला किया था। इसके बाद से इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस के पायलटों और क्रू की जांच सख्त कर दी। नियम पहले से थे लेकिन पालन नहीं हो रहा था रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये नियम पहले से मौजूद थे, लेकिन इनका सख्ती से पालन नहीं हो रहा था। लागू नियमों के तहत राजनयिक संबंध न रखने वाले देशों के पायलट और केबिन क्रू इजराइल जाने वाली उड़ानों में ड्यूटी नहीं कर सकेंगे। कुछ मामलों में दूसरी नागरिकता रखने वाले कर्मचारियों पर भी रोक लग सकती है। इंडोनेशियाई पायलट के कारण फ्लाइट लौटानी पड़ी थी इजराइल के नियमों का असर मंगलवार को इथियोपियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट पर भी पड़ा। द जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विमान इथियोपिया के हवाई क्षेत्र में था, तभी इजराइली अधिकारियों ने उसे वापस लौटने को कहा। अधिकारियों को पता चला था कि विमान में इंडोनेशियाई पायलट मौजूद है। इंडोनेशिया के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बाद विमान इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा लौट गया। वहां पायलट को बदला गया और फिर विमान ने दोबारा उड़ान भरी। इसके बाद वह तेल अवीव पहुंचा। इथियोपियन एयरलाइंस ने इसे गलती बताया। कंपनी का कहना था कि उसे जानकारी नहीं थी कि संबंधित पायलट इजराइल जाने वाली फ्लाइट नहीं उड़ा सकता। एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से दूसरी नागरिकता की जानकारी मांगी फ्रांस की राष्ट्रीय एयरलाइन एयर फ्रांस का कहना है कि उसने अपने कर्मचारियों को नियमों की जानकारी दे दी है। फ्रांस की वेबसाइट मेडियापार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से यह भी पूछा है कि क्या उनके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जानकारी छिपाने पर कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस को नियमों की जानकारी भेजी इजराइल के चैनल N12 की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां के परिवहन मंत्रालय ने 1 अक्टूबर को विदेशी एयरलाइंस को इन नियमों की जानकारी दी थी। नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एयरलाइंस पर है। इजराइली अधिकारी हर उड़ान के क्रू की नागरिकता की नियमित जांच नहीं करते थे। इसी वजह से पाकिस्तान, ओमान, ईरान, इराक और लेबनान जैसे देशों के पायलट पहले भी तेल अवीव जाने वाली उड़ानें संचालित करते रहे। अब इजराइल इन नियमों का सख्ती से पालन करा रहा है। फिलहाल एयर फ्रांस, यूनाइटेड एयरलाइंस और स्मार्टविंग्स ने नियमों का पालन करने की बात कही है। ऐसे में इन एयरलाइंस को इजराइल जाने वाली उड़ानों के लिए पायलटों और केबिन क्रू की ड्यूटी में बदलाव करना पड़ सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि कितनी और एयरलाइंस इन नियमों को लागू करेंगी। इसका असर उन कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है जिनके पास किसी प्रतिबंधित देश के साथ-साथ दूसरे देश की नागरिकता भी है। ओमानी को-पायलट विमान को एयरपोर्ट से टकराना चाहता था 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला कर दिया था। UAE के मुताबिक को-पायलट विमान को हाइजैक करके उसे इजराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट के टर्मिनल से टकराना चाहता था। हमले के दौरान विमान करीब 1 मिनट में 16 हजार फीट नीचे आ गया था। घायल कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोल पाए इसके बाद यात्रियों और क्रू ने को-पायलट को काबू कर लिया। विमान में 174 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे। इसके बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक शहर में इमरजेंसी लैंडिंग करानी पड़ी थी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी संसद में कैप्टन स्मित के सम्मान में प्रस्ताव पारित: आतंकी हमले को नाकाम करने की तारीफ की अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर के सम्मान में प्रस्ताव पास किया है। इसे दोनों पार्टियों ने समर्थन दिया है। इसमें 30 सितंबर को फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए हमले के दौरान कैप्टन मच्छर की बहादुरी की तारीफ की गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल जाने वाली उड़ानों में अब पाकिस्तान समेत 31 देशों के पायलटों और केबिन क्रू की तैनाती पर रोक लगाई जा रही है। ये नियम उन देशों के पायलटों और क्रू पर लागू होते हैं, जिनके देश के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इनमें पाकिस्तान के अलावा ईरान, ओमान, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट हमाम अल-हमामी ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला किया था। इसके बाद से इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस के पायलटों और क्रू की जांच सख्त कर दी। इंडोनेशियाई पायलट के कारण फ्लाइट लौटानी पड़ी थी इजराइल के नियमों का असर मंगलवार को इथियोपियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट पर भी पड़ा। द जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विमान इथियोपिया के हवाई क्षेत्र में था, तभी इजराइली अधिकारियों ने उसे वापस लौटने को कहा। अधिकारियों को पता चला था कि विमान में इंडोनेशियाई पायलट मौजूद है। इंडोनेशिया के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बाद विमान इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा लौट गया। वहां पायलट को बदला गया और फिर विमान ने दोबारा उड़ान भरी। इसके बाद वह तेल अवीव पहुंचा। इथियोपियन एयरलाइंस ने इसे गलती बताया। कंपनी का कहना था कि उसे जानकारी नहीं थी कि संबंधित पायलट इजराइल जाने वाली फ्लाइट नहीं उड़ा सकता। एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से दूसरी नागरिकता की जानकारी मांगी फ्रांस की राष्ट्रीय एयरलाइन एयर फ्रांस का कहना है कि उसने अपने कर्मचारियों को नियमों की जानकारी दे दी है। फ्रांस की वेबसाइट मेडियापार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से यह भी पूछा है कि क्या उनके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जानकारी छिपाने पर कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस को नियमों की जानकारी भेजी इजराइल के चैनल N12 की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां के परिवहन मंत्रालय ने 1 अक्टूबर को विदेशी एयरलाइंस को इन नियमों की जानकारी दी थी। नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एयरलाइंस पर है। इजराइली अधिकारी हर उड़ान के क्रू की नागरिकता की नियमित जांच नहीं करते थे। इसी वजह से पाकिस्तान, ओमान, ईरान, इराक और लेबनान जैसे मुस्लिम बहुल देशों के पायलट पहले भी तेल अवीव जाने वाली उड़ानें संचालित करते रहे। अब इजराइल इन नियमों का सख्ती से पालन करा रहा है। फिलहाल एयर फ्रांस, यूनाइटेड एयरलाइंस और स्मार्टविंग्स ने नियमों का पालन करने की बात कही है। ऐसे में इन एयरलाइंस को इजराइल जाने वाली उड़ानों के लिए पायलटों और केबिन क्रू की ड्यूटी में बदलाव करना पड़ सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि कितनी और एयरलाइंस इन नियमों को लागू करेंगी। इसका असर उन कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है जिनके पास किसी प्रतिबंधित देश के साथ-साथ दूसरे देश की नागरिकता भी है। ओमानी को-पायलट विमान को एयरपोर्ट से टकराना चाहता था 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला कर दिया था। UAE के मुताबिक को-पायलट विमान को हाइजैक करके उसे इजराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट के टर्मिनल से टकराना चाहता था। हमले के दौरान विमान करीब 1 मिनट में करीब15 हजार फीट नीचे आ गया था। घायल कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोल पाए इसके बाद यात्रियों और क्रू ने को-पायलट को काबू कर लिया। विमान में 174 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे। इसके बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक शहर में इमरजेंसी लैंडिंग करानी पड़ी थी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी संसद में कैप्टन स्मित के सम्मान में प्रस्ताव पारित: आतंकी हमले को नाकाम करने की तारीफ की अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर के सम्मान में प्रस्ताव पास किया है। इसे दोनों पार्टियों ने समर्थन दिया है। इसमें 30 सितंबर को फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए हमले के दौरान कैप्टन मच्छर की बहादुरी की तारीफ की गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

